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प्रभु और देवताओं से माँगने में क्या अंतर है? प्रभु से माँगने पर क्या मिलता है?// 15/04/2026

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हद पितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माश्रया निर्वा परम शीतल माया परम सच्चिदानंद घन आनंद समुद्र प्रेम समुद्र ज्ञान वैराग्य भक्ति ऐश्वर्य समस्त शक्ति ियों के स्वामी प्रभु श्री कृष्ण चंद्र जी कृपा करके ऐसा अमृतमय उपदेश कर रहे हैं। हम सब ध्यान पूर्वक सुने मनन करें और आचरण में उतारे। यदि हमारा जीवन विषयों के प्रवाह में बहता ही रहा तो इस दुख में संसार से मुक्त होने का फिर हमें आगे अवसर कब मिलेगा हरि जाने 84 लाख योनियां हैं और इनमें केवल एक योनि के द्वारा ही हम मुक्त हो सकते हैं।

मनुष्य योनि और वह हमें प्राप्त हो गई है। मनुष्य योनि में भी जो अत्यंत दुर्लभ विषय है भगवत वार्ता सुनना भगवन नाम की महिमा सुनना अपने जीवन में द्वंदों से ऊपर उठने की साधना की भावना जागृत होना यह सब दुर्लभ बातें हैं। वह भी भगवत कृपा से प्राप्त है। अब अपने को सावधानी पूर्वक प्रमाद ना करते हुए इसी जन्म में भगवत प्राप्ति करनी है। भगवत प्राप्ति में बाधा है कामना। यह बहुत बड़ा शत्रु है। अध्यात्म मार्ग का बहुत बड़ा दुश्मन है। पूरा जीवन निकल जाता है सतार्ग की चेष्टाएं करते हुए पर यह कामना ही हमें अनुभव में नहीं आने देती।

साधना का जो फल है प्रभु पद पंकज प्रीति निरंतर यह सब साधन कर फल सुंदर समस्त साधनाओं का सुंदर फल है। आराध्य देव श्री हरि के चरणों में निरंतर अनुराग भरी वृत्ति से हमारा संपूर्ण अंतःकरण उसी में डूब जाए। अहम इनहीं चरणों की दासता में बुद्धि यही निश्चय कि प्रभु ही सुख है। मन इनहीं की सेवा का चिंतनित एक एक वृत्ति के द्वारा इन्हीं का पूजन करें। यही जीवन का सार पर कामना ऐसा नहीं होने देती। कामना का स्वरूप है प्रभु के सिवा और कुछ भी चाह करना। बोले फिर जीवन कैसे चलेगा?

यह जीवन तो कामना से ही चलता है। हमें यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए। तो आपको भरोसा नहीं है क्या? एक देसीय शरीर में ममता करने वाली मां अपने बेटे की चाहे जितना सयाना हो जाए वो चिंता करती है। कब उसे क्या चाहिए? वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयास करती है। तो क्या अखिल शक्तियों के स्वामी सर्वज्ञ सर्वत्र विद्यमान सर्वशक्तिमान प्रभु हम जिनके बच्चे हैं जिनके अंश हैं क्या हमको बताना पड़ेगा कि प्रभु मेरी आवश्यकता है। आवश्यकता वो खुद पूर्ण करेंगे। अनावश्यक मांगे हमें परेशान किए हुए आवश्यक मांगे।

जीवन जीने के लिए जो आवश्यक है वह प्रभु पहले से पहले भेजते रहेंगे। विश्वास कीजिए वह दिए हैं। पर अनावश्यक मांगे जो अहंकार की पुष्टता के लिए इंद्रियां जो भोग सुख के लिए लालायित है। अनावश्यक यह मांगे हमें भगवत विमुख कर देती है। तो कहां फिर हम इस मांग को कैसे मिटाए? चलो मांगो पर केवल इनहीं से मांगो। भगवान ने रास्ता दे दिया। आर अर्थार्थी जिज्ञासु ज्ञानी चार ही प्रकार से मेरे को भजने वाले हैं। भगवान ने उसमें कहा कि जो ज्ञानी है वह मुझे बहुत प्रिय है। बहुत प्रिय है।

तो फिर ऐसा लगा कि ये जो तीन है आर अर्थार्थी जिज्ञासु ये आपको प्रिय नहीं है। श्री भगवान मानो इसी भाव को आगे पुष्ट करते हुए कहते हैं उदारा सर्वते भगवान उदार कह रहे हैं जो इनसे मांगता है देखो कैसे उदार शिरोमणि है। प्रभु से जो मांगता है प्रभु उसे उदार कहते हैं। दरिद्र नहीं कह रहे भिखारी मांगता ही रहता है। यह दे दो ये दे दो। जैसे कोई संपत्तिवान माता-पिता हो और उसका पुत्र उससे मांग रखे बार-बार तो उसे अच्छा लगता है कि इसी के लिए तो वैभव है। अच्छा है। और क्या चाहिए तेरे को?

और क्या चाहिए? उनको और दुलार आता है। फिर ये तो अनंत शक्तियों के स्वामी हैं। पर शर्त है केवल इनहीं से। इस शर्त में हम सब फेल हो जाते हैं। अगर केवल एक बात रहे कि इनहीं से तो आप निहाल हो जाओगे। यह शब्द याद कर लो। केवल इनहीं से इंतजार करो। ऐसा नहीं कि अभी बोला अभी हो जाए। बहुत बच्चे हैं उनके एक दो थोड़ी है। और पुकार तो अभी आपकी पहुंच जाएगी। अभी पास हो जाएगा। पर वह पुकार नहीं अभी आर नहीं है, दैन्यता नहीं है, प्रियता नहीं है। इसलिए हमारी पुकार वहां तक पहुंच नहीं पा रही है।

पुकारते रहिए। केवल इन्हीं को पुकारिए। जिस दिन सुन लेंगे ना। तो इस दरबार की बात ही कुछ ऐसी है कि एक बार इस दरबार का आश्रय लेने वाले को कभी दूसरी तरफ देखना भी नहीं पड़ा। और ऐसे उदार दाता है कि मांगने वालों को कह रहे हैं उदार है। उदारा सर्व एते ज्ञानीत्म में मतम आस्थित सहयुक्तात्मा मामेवत्तमाम गतिम कितने कृपालु है उत्तमाम गतिम जो मांगोगे वो तो मिलेगा ही और ये अपनी तरफ से एक बात देंगे उत्तम गति दे देंगे। हे अन्य की तरफ मत देखो। एकमात्र प्रभु का भरोसा कर लो तो कामना की भी पूर्ति हो जाएगी और जो निष्काम धर्म के आचरण से फल मिलता है उत्तम गति वो उत्तम गति भी दे देंगे।

कितने कृपालु हैं। भगवान कह रहे हैं कि ऐसा ना समझो कि ज्ञानी ही मुझे प्रिय है और तो सब बेकार। कह रहे नहीं उदारा सर्व एते ये जो आर है ये जो जिज्ञासु है अर्थार्थी है ये बड़े उदार है। कै कैसी करुणा है? भला मांगने वाला उदार कैसे हो सकता है? लेकिन ये अति उदार वि सुंदर ये ऐसे प्रिया प्रीतम है ऐसे महामहिम है कि इनके दरबार में जो मांगा तो उसको उदार कहते हैं। बड़ा उदार है। बड़ा लाडला बच्चा है। इधर उधर ना भटक कर सीधे हमसे कह रहा है। प्रभु का प्यार देखो। हम भटक रहे हैं अज्ञान की धरा में।

प्रभु सत्संग के द्वारा हमारे हृदय का मोड़ कर रहे हैं। अपनी तरफ उनको जरूरत नहीं है। हमारे मंगल के लिए ये जो उदार भक्त हैं पर इनमें जो प्रेमी भक्त हैं मेरे से प्यार करते हैं और कुछ नहीं चाहते हैं। मैं कैसे बताऊं वो मेरी आत्मा है। वह मेरा स्वरूप है। ऐसा मेरा मत है। जो कुछ यहां दिखाई दे रहा है वह सब है प्रभु ही। पर जब तक त्रिगुणात्मिका माया का हमारे अंतःकरण में प्रभाव है तब तक हम अनुभव नहीं कर पाएंगे। जब त्रिगुणातीत अवस्था जागृत होती है तभी भगवत आनंद का साक्षात्कार होता है।

प्रभु का नाम, प्रभु का रूप, प्रभु की लीला, प्रभु का धाम यह त्रिगुणातीत अवस्था है। जो इसी में रमण करता रहता है, वह निस्त्रगुण्य हो जाता है। जिसको एक बार भगवनंद की अनुद्भूति हुई फिर अंतःकरण धर्म से वह ऊपर उठ जाता है। संसार का मनन चिंतन, संसार का आकर्षण, भोगों की दासता यह सब खत्म हो जाती है। प्रभु ने कहा है कि वैसे तो मेरा सिद्धांत है ये यथा माम प्रपद्यते ता भजाम्यम मुझे तुम जैसे भजोगे वैसे मैं तुम्हें भजूंगा। शिव भगवान यह सिद्धांत कह रहे हैं। पर यहां बड़ा दुलार भरा उनहीं के वचन कि उारा ये बड़ा उदार है जो मेरे दरबार में आकर के अपनी कामना की पूर्ति चाहता है।

संतों ने तो निषेध किया है। क्योंकि वो इनके रहस्य को जानते हैं। भला सच्चिदानंद प्रभु के सन्मुख होकर के विषय भोग मांगना कितनी निंदनीय बात है। प्रभु को ना अरे परम पद जब ध्रुव जी को मिला तो उनको ग्लानी हो गई ऐसे प्रेम रस से भरे हुए श्री अंग वाले प्रभु की दासता ना मांगकर मैंने परम पद मांग लिया। अब क्या होगा? अब तो प्रभु ने तथास्तु कह दिया। ऐसा ही हो। तुम्हें जो चाह थी वो तुम्हें प्राप्त हुई। यह चाह ने मुझे गिरा दिया। परम पद में आरूढ़ होने पर उनको अनुभव हुआ मैं गिर गया।

प्रभु की दासता से चूक गया। निरंतर प्रभु के समीप रहता। इनके मुख माधुरी का दर्शन करता और इनकी सेवा सुख में निमग्न रहता। इससे बड़ा क्या सुख? ये अब अनुभव हुआ। सोचा कि चूक हो गई। कैसे चूक हो गई? बहुत काल सत्संग नहीं हुआ। इसलिए बात चुभ गई कि मुझे ऐसा पद प्राप्त करना है कि सब आश्चर्यचकित हो जाए। तो इसीलिए प्रभु से कहा प्रभु जो चाह थी वह पूरी कर दी। पर एक बात और मांग रहा हूं। मुझे अपने प्रेमी भक्तों का संग दीजिए। क्योंकि मुझे मांगना ही नहीं आया। अगर प्रेमी भक्तों का बहुत काल तक संग हुआ होता तो हम आपका प्रेम मांगते।

आपकी अविरल भक्ति मांगते। आपकी श्री अंग की सेवा मांगते। यह जो प्रभु से चाह की जाती है, संतों ने इसे पसंद नहीं किया। जो प्रेमी जन पर भगवान उसका भी स्वागत करें। आओ आओ तुम आओ तो हमारी तरफ आओ। कितने कृपालु हैं। हम सब इनकी कृपा को नहीं देख पा रहे हैं। प्रभु कहते हैं किसी भी तरह से तुम मेरे से संबंध जोड़ तो लो। तुम्हें बेपरवाह कर दूंगा। किसी भी तरह से धन की चाह से, संकट निवृत्ति से, किसी भी कामना से कामात द्वेष भयात स्नेहा यथा भक्तेश्वरे मन आवेश तदघम हित्वा वह गति गता काम से, द्वेष से, भय से, स्नेह से, किसी भी भाव से, यदि प्रभु का अपनापन स्वीकार कर लिया जाए।

मेरे स्वामी अब मेरी बात आपसे ही बनेगी। कहते एक नहीं अनेक जन परम पद में आरूढ़ हो गए। जैसे भक्त भक्ति से भगवान को अधीन कर लेता है। वैसा सुख इनको वर्तमान में तो नहीं मिलता। अब भगवान से द्वेष करेगा। और एक है कि स्नेह में भरकर उनको भोग लगा रहा है, नाम कीर्तन कर रहा है, नाच रहा है। उसको जो वर्तमान में सुख मिल रहा है, उसको जो द्वेष से भज रहा है, उसको थोड़ी अनुभव में आएगा सुख पर परिणाम सबका एक ही होगा। कितने कृपालु? कितने कृपालु काम से किसी भी कामना से प्रभु है ना स्वामी है अखिल कोटि ब्रह्मांडों के अधीश्वर है सर्वलोक महेश्वर है किसी भी कामना से वही परम पद देंगे वह वस्तु तो देंगे ही परम पद दे देंगे यदि इनके सिवा और किसी से जैसे कोई भी बड़ा से बड़ा देवता है, वह विधि विधान देखेगा आपका।

अगर विधि में त्रुटि है तो आपका अनुष्ठान सफल नहीं होगा। सांगोपांग अनुष्ठान होना चाहिए। और उसी के अनुसार आपको फल देगा। आप जहर मांगो तो जहर दे देगा। जो मांगो वो आपकी जितना तपस्या है जितना साधन है। उसमें अगर त्रुटि है तो नहीं मिलेगा। सांगोपांग अनुष्ठान हो फिर जो चाहोगे दे देगा। पर हमारे प्रभु ऐसा नहीं करते। जो चाहोगे नहीं देंगे। तुम्हारा जिसमें मंगल होगा वही देंगे अन्यथा नहीं देंगे। और त्रुटि हो जाने पर भी तुम्हारी अनुष्ठान की वृत्ति से फल नहीं देंगे।

तुमने प्रभु के लिए प्रयास किया अपनी कामना पूर्ति के लिए प्रभु को वह इस बात पर रीज के अनुष्ठान से भी बढ़कर दे देंगे। इस राशि को सब कोई नहीं जानता इसीलिए जल्दी प्रभु की शरण में नहीं होता। यह ऐसा करुणा में दरबार है। कहीं नहीं सुना। कहीं नहीं देखा। एक श्री हनुमान जी महाराज की सिद्धि कर रहे थे। बताया भी है सत्संग में भीमसेन उनका नाम था और थे भी बहुत बलवान हनुमान जी की सिद्धि और भक्ति में अंतर है। ध्यान रखना किसी भी महान महिमाशाली देवी देवता या जो भी भगवत पार्षद है सहज भाव से इनकी आराधना करो।

सफलता ही सफलता मिलेगी। वह आपको आगे बढ़ाते चले जाएंगे। और सिद्धि का तात्पर्य होता है उनको अधीन करना मंत्र के द्वारा। अब उसमें अगर अनुष्ठान में त्रुटि हुई तो तुम्हारी ऐसी तैसी भी हो जाएगी। परम कृपालु श्री हनुमान जी महा भागवत हैं। आप खूब भगवान के चरित्र सुनाइए। उनको नाम जप कीजिए। उनकी सेवा कीजिए। बड़ी से बड़ी त्रुटि हो जाने पर आपका मंगल नहीं होगा। मंगल भवन तक पहुंचा देंगे। पर यदि आप किसी मंत्र के द्वारा हनुमान जी महाराज के जो मंत्र हैं उनके द्वारा आप उनको सिद्ध करके अपना चमत्कार दिखाना चाहे तो सांगोपांग होना चाहिए।

नहीं फिर सब बिगड़ जाएगा। अब बहुत काल तक नियम निष्ठा में रहना कठिन होता है। उस समय बाल्यावस्था थी। तभी सुना था कि एक गांव पास में है वो ब्राह्मण घर में जन्मे थे और मंत्रों का उनको ज्ञान था अनुष्ठान हनुमान जी का कर रहे थे सिद्धि का खंभे में बांधे गए देख रहे जंजीर से लोहे की जंजीर से खंबे में बांधे ऐसे पेशाब करते ऐसे डालते ऐसे फेंकते पागल एकदम महा शक्ति संपन्न श्री हनुमान जी को मंत्र के द्वारा तुम अधीन करके अपनी कामनाओं की पूर्ति आप उनकी सेवा करो सियाराम नाम का कीर्तन सुनो सुनाओ प्रभु के चरित्र सुनाओ स्वयं अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता है वो वो

कृपा कर देंगे एक से एक सिद्धि आप में प्रकट उनको अधीन प्रेम से किया जा सकता है आप शक्ति के द्वारा तो फिर सांगोपांग पास होना पड़ेगा एक बहुत बड़े महात्मा के गुरु भाई वो श्री आद्या शक्ति त्रिपुर सुंदरी भगवती की उपासना की श्री राधा बाबा ने भी की पर उनकी प्रसन्नता के लिए किया राधा बाबा ने कोई मांग नहीं की आपकी कृपा से श्री कृष्ण हमें प्रीतम रूप में प्राप्त हो गोपी जनों ने भी आद्या शक्ति कात्यायनी की उपास बाबा ने भी की पर वो इस भाव से नहीं कर रहे थे वो दैवी शक्ति को सिद्ध करने की भावना से कर रहे थे और बहुत सावधानी वो जो बड़े महात्मा थे उन्होंने उनको कहा कि देखो आप आग में कूदने जा रहे हो मां भाव से करोगे तो दुलार करते हुए सारी कामनाएं पूर्ण करती रहेंग और शक्ति को अधीन करने के बाद सोचोगे तो आपको कसौटी में कसना पड़ेगा उनका तैयार है बहुत अल्प दूध लेकर के मंत्र का जाप उतने ही मंत्रों का हवन और उस भवन में किसी का प्रवेश नहीं बड़ी सावधानी से कर रहे थे।

जब उनकी सिद्धि का समय आया तो एक मक्खी उनके आसपास घूमी। माता जी का एक नाम भ्रामरी है। इतनी भनमनाहट पैदा हुई कि दिमाग कहना कंट्रोल के बाहर हो गया क्योंकि दैवी शक्ति थी। अब बेटा हो तो मां मां पुकारे। लेकिन वह तो अधीन करना चाहते थे शक्ति के। दिमाग कम सामने देखा अत्यंत सुकुमार अवस्था और एक सुंदरी खड़ी है पूज्य भाव हट गया जो पूज्य भाव हटा या देवी सर्वभूति बुद्धि रूप गायब बुद्धि बुद्धि खत्म जो फुटपाथ में ऐसे पागल जैसी घूमता है स्थिति हो गई खत्म तो जो देवी शक्तियां है बड़े-बड़े देवता हैं ये मंत्र के अधीन है।

ऐसा नहीं मंत्र के अधीन है। अगर सांगोपांग अनुष्ठान हो गया जितना मंत्र का अनुष्ठान होता है तो आपकी कामना पक्की सिद्ध कर देंगे। अगर उनको अधीन करना है कि बोले इनके ऐसा इनकी अमुक शक्ति अधीन है। अमुक शक्ति अधीन यह हमने दर्शन भी किए हैं। ब्रह्मण में बड़े अनुभव हुए हैं। एक जगह गायत्री माता का जो सिद्ध भाव है उनको प्राप्त था। तो ऐसे ही हजारों की लाखों की सभा लगती थी। ऐसे कर देते तो ऐसे खरखर खर कर सोने चांदी के सिक्के गिरते। जैसे ये सब दैवी शक्तियों के चमत्कार अगर आप निष्काम भाव से गायत्री जप करेंगे तो श्री कृष्ण प्रेम प्रदान कर देंगे क्योंकि गायत्री कृष्ण स्वरूपा ही है।

भाव अलग-अलग है। यहां कह रहे हैं कि जो देवताओं का सकाम भाव से अनुष्ठान करते हैं अगर अनुष्ठान की पूर्ति ठीक हुई तो आप जो चाहते हैं वो दे देंगे आपको। परिणाम क्या होगा? कोई मतलब नहीं। तुम्हारा परिणाम क्या होगा? उनका परिणाम क्या होगा? इसका भी मतलब नहीं। आपके पास है तप रूपी धन उतना कर लो। अब आप देखो औरों की तो बात जाने दो। देवाधिदेव महादेव वो असुर शकुन पुत्र वकाश हो। नारद जी से पूछा ऐसा कोई देवता बताओ जो झटपट सिद्ध हो जाए। प्रसन्न हो जाए। हमें वरदान दे दे।

बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले आशुतोष तो भगवान शंकर हैं। सहज भाव में उपासना करो। अत्यंत दुर्लभ प्रेम प्रदान कर देंगे। नरसी मेहता जी पूज्य राधा बाबा बड़े बड़े महापुरुषों को भगवान शिव ने प्रिया प्रीतम का प्रेम प्रदान किया है। मंत्र के द्वारा जो चाह करोगे वो आशतोष है और डर दानी इसीलिए विचार नहीं करते जा। उसने देखा कि प्रभु को प्रसन्न करना बड़ा कठिन है। तो अपने शरीर का मांस काटकर अग्नि में हवन करने लगा और भगवान शिव के मंत्र का उच्चारण भगवान शिव प्रकट हुए और कहा काहे भाई ऐसा कष्टप्रद कार्य कर रहे हो?

हम तो एक अंजुली जल में प्रसन्न हो जाते हैं। क्या चाहिए? बोले महाराज जिसके ऊपर हाथ रख दूं वो भस्म हो जाए। अगर हरि से ऐसा मांगते तो डांट कर हरि अंतर्ध्य हो जाते। हट जिसके ऊपर हाथ रख दे। ऐसा पर वो तो आज तो डर डाली मगन रहते हैं हरि प्रेम दुनिया से मा जाओ तथास्त उसने सोचा परीक्षा पहले गुरु से ही करनी चाहिए इनहीं के ऊपर हाथ रख देते भस्म हो जाएंगे तो कैलाश का वैभव हमारा हो गया बुद्धि होती है भगवान शिव भागे भगवान शिव अपने ही वरदान से अब वो भगवान शिव के जब देखा कि अब उसको आसुरी शक्ति से वह भी संपन्न था।

भगवान जैसे भागते वैसे ही वह पीछे भागता। उन्होंने सोचा बचा सकते हैं तो इस संकट से भगवान शंकर इस संकट से अगर बचा सकते हैं तो श्री हरि बचा सकते हैं। अंदर से चिंतन किया हरि संभालो आके तो बस बीच में ही प्रकट हो गए। प्रणाम प्रकाश जी हमें कौन प्रणाम प्रभावशाली भगवान के वचन इनके पीछे भाग रहे हो हां हां क्यों इन्होंने वरदान दिया है कि जिस पर हाथ रख दोगे भस्म हो जाएंगे तो हम इनहीं को अरे बोले तुम्हें विश्वास है दक्ष ने इनको श्राप दिया था इनकी अब बात सत्य नहीं होती सुनो हम भी तुम्हारे साथी हैं तुम अपने ऊपर हाथ रख करके देखो ना अगर झूठ निकले तो अभी दोनों मिलकर के हां ठीक यह नहीं सोचा कि अगर सत्य हुआ तो वो भगवान की बात में फंस गया उसने हाथ रखा राख का ढेर हो गया महादेव जी ने लौट कर देखा अब महाराज बचा लिया नहीं तो कहां कहां भागते हो सब हंसते कि देखो शिव को खेदे हुए शिव को बोले प्रभु कुछ विचार भी तो कर लिया करो आप ऐसे ये वरदान दे दिए कि आपको खुद भगाए डोल रहा है विचार करके वरदान दीजिए।

नहीं तो यह आशु भाव के जन है। यह सब साधु जनों को देवी संपदावान को जब आपको ही वरदान दाता को ही भस्म करने की सोच रहा है। प्रभु कह जिंदा रहता तो क्या करता? तो उन्होंने कहा प्रभु हम इसलिए अलमस्त रहते कि आप हो ना आप संभाल लोगे। सब संभाल लोगे। तो जो देवता जन है वो ये नहीं देखते किस में जगत मंगल होगा कि नहीं। आपका अनुष्ठान सही है। आप जो मांगेंगे वो दे देंगे। पर हमारे हरि ऐसा प्रभु ऐसा नहीं करते आप और डबल अनुष्ठान कर लो उसमें आपका अमंगल है तो नहीं देंगे नहीं देंगे नहीं देंगे अनुष्ठान में त्रुटि हो गई है उसका फल नहीं मिलना चाहिए जो देवताओं की आराधना में त्रुटि होने पर नहीं मिलता हरि के अनुष्ठान में ऐसा नहीं होता मिलेगा तुम्हारा मंगल होना है ना वो नहीं देखते कि त्रुटि कर दी गलती कर नहीं बच्चा है चल आनंद लो यह बात कहीं और नहीं मिलेगी।

भगवान के दरबार में यह बात है। अगर इसका रहस्य समझ में आ जाता है तो भूल करके भी फिर किसी अन्य का आश्रय नहीं लेता। संसार के भोग रुपए पैसे यह प्रत्यक्ष वर्तमान में केवल महत्व बुद्धि होने के कारण है। जैसे हमको 2000 का रुपया दिखाई दे बहुत आनंद ले। ₹000 और अगर अभी 1000 के एक बोरा रुपया पड़े हो 1000 जो पीछे बंद हो गए एक बोरा पड़े हो तो रुपया ही तो है पीछे महत्व था उनका पर सरकार ने उनको अमान्य कर दिया तो आप क्या वो 1000 के जो बोरा भर पड़े हुए हैं रद्दी कागज से ज्यादा आपकी नजर नहीं होगी मतलब रुपए का महत्व नहीं आपके अंदर ध्यान देना महत्व है उन रुपए से भोग सामग्री मिलती बस इसलिए महत्व है।

ठीक है। भोग सामग्री किसके लिए? बोले इंद्रियां प्रसन्न रहती हैं। मतलब आनंद रहता है। जो चाहो खरीदो जहां चाहो घूम आओ। बड़ा जो चाहो पहनो सोने की चैन वैन सब और शरीर ही नष्ट हो जाएगा। प्यारे तुम्हें मरना है। तुम्हें ध्यान नहीं अब तुम्हारे मरने का समय सोने की जंजीर पराई जाए। आपके कफ, पित्त, वायु पीड़ा पहुंचा रहे हैं। प्राण निकलने के लिए तैयार हैं। और आपके सामने रबड़ी रखी जाए। दुनिया के भोग या फांसी की सजा सुना दी गई और सोने के हार तुम्हें ला दे जाए तो क्या लगेगा?

मिथ्या। क्यों? जब जीवन ही नहीं तो इनका क्या महत्व है? जब विवेक जागृत हो जाता है और श्री कृष्ण प्राप्ति की चाह जग जाती है तो ब्रह्मादिक के भोग सब विषम लागत। इन भोगों का क्या महत्व है? अज्ञान के कारण ही तो महत्व है। एक ने किसी देवी शक्ति की आराधना की कि मुझे सोना मिले और जितना चाहूं खूब सोना मिले। ठीक। मंत्र अनुष्ठान पूर्ति हुई। उसने कहा ठीक है। जहां तुम्हें सोना जमा करना हो वहां खड़े हो जाओ। हम तुम्हें सोने से ठीक। वह समझ नहीं पाए कमरे में कि खो कमरा लाक कर दिया और सोना ही सोना इकट्ठा हो गया।

एक दिन दो दिन तीन दिन फिर उन देवता का चिंतन किया। प्यास लगी। बोले नहीं सोना यही खाओ। यही है दूसरी चीज नहीं मिली। बोले बस हमको एक लोटा जल दे दो। सब सोना हटा दो। एक लोटा जल दे दो। प्यास से प्राण निकल रहे हैं। ये ये सोना किस काम का? ना भूख मिट पा रही ना प्यास मिट पा रही। किस काम का नहीं चाहिए मुझे हर वस्तु निस्वार निस्वार है उसमें कोई दम नहीं आप केवल अहंकार वश मूढ़ता बस उसको महत्व दिए हुए हैं जब प्रभु के चरणारविंद का महत्व जागता है तो सम लुष्टस्म कांचना पत्थर का टुकड़ा माटी का ढेला और सोने की थपिया में कोई अंतर नहीं होता क्या अंतर है केवल अज्ञान की मूढ़ता है इतनी मोटी डाले खुला के बटन देखे कोई के हां सोना सोना जो तुम समझ रहे हो वो नहीं है।

यह कोई अहंकार का कारण नहीं है। अरे गर्व करने का विषय के प्रभु के दासत्व से युक्त है। यह गर्व का ये शाश्वत गर्व है। किस काम में आएगा? प्राय लोग इन भोग सामग्रियों को वर्तमान में सुख देने वाली समझते हैं। संसार के प्रत्यक्ष भोगों को वही छोड़ सकता है जिसके हृदय में कृष्ण लालसा जागृत हो गई। भगवत चरणारविंद की प्राप्ति की बात आ गई। नहीं तो लगता है सामने भोग है। भोग लो ना थोड़ी देर सुखी हो जाओ। थोड़ी देर तो सुख बीज तो इतना ही बड़ा होता है जब उसका वृक्ष होगा तब क्रिया तो इतनी लेकिन उस क्रिया का जब परिणाम आएगा तब फिर नहीं संभल पाओगे अज्ञान की वृत्ति में लगता है कौन देख रहा है क्या है कर लो मनमानी थोड़ी देर मन प्रसन्न मनमानी मन प्रसन्न कहां भूल कर रहे हो दुश्मन को खुराक दे रहे हो तुम्हारा नाश करेगा और जो क्रिया कर रहे हो वही क्रिया तुम्हारे बांधने का अगले जन्म का कारण बनेगी पर प्रभु के दरबार में यदि भोगों की भी मांग करें तो आनंद का अनुभव प्रभु करा देते हैं।

भोगों की भी मांग करें। बहुत बार इसीलिए कहते हैं कि कोई भी कामना है तो प्रभु से कहो। बहुत सुंदर पत्नी मिले। ऐसी कामना करदम जी के हृदय में थी। उन्होंने किसी अन्य का आश्रय नहीं लिया। सुंदर पत्नी चाहिए। भगवान का आश्रय लिया। बड़ा भजन किया। भगवान प्रकट हुए। क्या चाहिए? उनका सुंदर पत्नी भगवान के आंसू गिर पड़े। इतना कठिन भजन करने के बाद मेरा साक्षात करने के बाद सुंदरता की सीमा भगवान है सुंदर पत्नी से वो बिंदु सरोवर बनाओ भगवान की अशु का ठीक है आदि सम्राट महाराज मन की पुत्री श्री देहूदी जी ले आएंगे आपको दे देंगे परम सुंदर हो और तुम्हारे कल्याण कल्याण के लिए मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र बनूंगा।

मांगा नहीं मांगा था सुंदर पत्नी भगवान कपिल देव जी के रूप में आकर के दिव्य सांख योग का उपदेश करके उनको मोक्ष पद पर विराजमान किया। यह है भगवान के दरबार की मांग। जो चाहे जो चाहे प्रभु सबके दाता है बस हृदय में बैठा ले कि केवल प्रभु से मांगना तो प्रभु उसे उदार कहते हैं। भक्त की लौकिक पारलौकिक कामना की पूर्ति करके भगवान उसकी इस बात पर नहीं देखते। इसने मेरा भजन करके लौकिक वस्तु मांगी। मैंने दे दिया फुर्सत हो गई। नहीं वो नहीं जानता पर हम तो जानते हैं ना कि जो वस्तु दी है वो नाशवान है।

मेरा आश्रय मेरा भजन नाशवान नहीं है। क्या उसका फल इतना ही होता है? नहीं तो मैं उसे परम गति प्रदान करता हूं। अपनी तरफ से परम गति प्रदान करते हैं और उसकी मांग वस्तु प्रदान कर देते हैं। गोस्वामी जी कह रहे हैं और का मािए को मांगीबो निवारे अभिमत दातार कौन दुख दरिद्र दारे धर्म धाम [खांसने की आवाज़] धर्म धाम राम काम कोटि रूप रू साहब सब विधि सुजान दान खडग सुरो सुष्मय दिन द्व निशान सबके द्वार बाजे कुसुम मैं दशरथ के दान ते गरीब निवाजे सेवा बिनु गुण विहीन दीनता सुनाए जे ते निहाल किए फूले फिरत पाए तुल तुलसीदास जाचक रुचि जान दान दी [गाना गाने की आवाज़] रामचंद्र [चीखने की आवाज़] चंद्र तू चकोर मोहि की जय प्रभु आपकी कृपा से आपके दरबार में आ गया हूं।

जैसे तिनका हवा के संयोग से कहीं बड़े स्थान में पड़ जाए ऐसी अपने लोगों के ऊपर कृपा हो गई। नहीं इस प्रपंच संसार के दलदल से निकल पाना अपने बस की बात नहीं थी। निकाल दिया। अगर संसार से भागे भी तो शरीरा अभिमान में फंसा हुआ जीव निकल नहीं पाता। प्रभु ही निकालते हैं। प्रभु आपकी कृपा से आपके दरबार तक आ गया। यही सरावत अति कठिनाई राम कृपा बिनवाई न जाए गृह कारज दुर्गम जंजाला ते अति दुर्गम शैल विशाला ये बड़े-बड़े पहाड़ हैं मोह के काम के क्रोध के लोभ के मद के इनको पार करके गृहस्ती की बेड़ियों को काट के इनके दरबार तक कोई आ पावे बहुत कठिन बात है बिना इनकी कृपा के इनके दरबार तक नहीं आया जाता आने का तात्पर्य है अन्य आश्रय त्याग कर भगवत आश्रित होना।

अब जब आपके दरबार में आ गया तो किसी और के आगे हाथ फैलाऊं तो आपकी भी बात आ गई। प्रभु देखो भक्त कितने प्रवीण होते हैं। प्रभु को प्रभु अपनी माया से सबको फसाए। प्रभु प्रदत्त विवेक से ज्ञान से प्रभु को फसा लेते हैं। आपकी कृपा से आपके दरबार में आ गया। अब आपके दरबार में आने के बाद किसी और की तरफ हाथ फैलाना पड़े तो इसमें आपकी भी है। मतलब समझो आप। अब हमारे सर्वलोक महेश्वर प्रभु के दरबार में आने के बाद फिर किसी और के आगे हाथ फैलाना पड़े। तो बोले उसने दिया क्या है?

इतना बड़ा था। तुम्हारे अंदर अभी कुछ कमी रह गई। मांगना पड़ा तो इतने बड़े से मांगने के बाद फिर प्रभु मुझे तो नहीं लगता कि आपके दरबार में आने के बाद किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा। पहले ही बात है कि ऐसा दीजिए कि फिर और चाह ना रह जाए क्योंकि आपके दरबार की यही है। आपके दरबार की आली निराली शान ये देखी सखावत खुद तेरी गलियों में भटकते देखा। यहां सुख मारा घूम रहा है क्योंकि सुख सिंधु का दरबार है। यहां का तात्पर्य भगवत आश्रय में फैलाया हाथ जिसने तेरे दरबार में आकर तुझे देते नहीं देखा मगर झोली भरी।

सुदामा जी जब वापस सो रहे थे तो कह रहे थे बड़े कृपालु है। एक सोने की गिन्नी भी नहीं दी है कि यह भिक्षुक कहीं सुविधा में आकर के हमारा विस्मरण ना कर दे। मेरे कृष्ण कितने कृपालु है डूबते चले जाए एक दिन का भोजन भी नहीं दिया है मेरे ही आश्रित रहे बड़े कृपालु है उन्होंने बड़ी कृपा जब पहुंचे तो वहां द्वारिकापुरी जैसी सुदामापुरी खड़ी थी तुझे देते नहीं देखा मगर झोली भरी दी निहाल कर दिया प्रभु ऐसा आज तक कोई दाता नहीं वेद पुराण सब साक्षी है कि जिसके दरबार में एक बार मांग लिया जाए फिर दोबारा मांगना ही मिट जाए वो तो केवल हरी का दरबार दूसरा कोई नहीं को मांगीबो निवारे ऐसा कोई नहीं है दरबार जिसमें मांगे और मांगना मिट जाए अब नहीं चाहिए अब कछु नाथ न चाही प्रभु भी दे रहे हैं नहीं अब अब कछु नाथ ना चाहिए आपसे भी नहीं चाहिए ऐसा दे देते हैं।

दूसरा ऐसा कोई भी त्रिभुवन में नहीं है जो मनोवांछित फल को प्रदान कर सके। सदा सदा के लिए दुख मिटा सके, दरिद्रता मिटा सके, मांगना मिटा सके। कि वो केवल प्रभु श्री हरि का दरबार है। प्रभु आप तो संपूर्ण धर्मों के मूल हैं। आपसे ही सारे धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ है। इसीलिए भगवान कहते हैं सर्वधर्मान परितज मामेकम शरणम क्योंकि यही से सारे धर्म प्रकट हुए हैं। और आप करोड़ों काम देवों के भी सौंदर्य को लजाने वाले महामहिम सौंदर्य से युक्त हैं। प्रभु मैं जिधर देखता हूं सब आपकी माया से आकर्षित है।

कोई ऐसा नहीं है जो मेरे मन को संतोष प्रदान कर सके। सब प्रकार से मेरे स्वामी समर्थ हो। मेरे मन को अच्छी तरह आप देख रहे हो, जान रहे हो। जैसे कोई शूरवीर तलवार चलाने में बड़ा प्रवीण हो। ऐसे बड़े-बड़े विषय मन के विषय बंधन को काट करके उसे महा सुख में निमग्न करने में आप बड़े प्रवीण हो। प्रभु अच्छे समय में तो हजारों लोग मित्र बन जाते हैं। बढ़िया सब चल रहा हो। हाथ मिलाएंगे आकर बैठेंगे चाय नाश्ता करेंगे कहेंगे कोई एक सेवा हो तो बताना कभी अवसर पड़े लेकिन जब कुसमय आता है तो मोहल्ला गली छोड़ दी जाती है कि अगर जाएंगे तो कहीं कोई बात ना कह दे मांग ना ले लेकिन कुसमय में जो निहाल कर दे वो एक ही दरबार है आपका क्योंकि अपना बच्चा घर कभी भी वापस आवे उसको तो वैसे ही प्यार मिलेगा।

यह संसार अपना नहीं है। श्री हरि अपने हैं। जब मुड़ के देखोगे तो वैसे ही तुम्हें प्यार मिलेगा। तुम्हारे आचरणों से तुम्हारा तिरस्कार नहीं किया जाएगा। यह दरबार ऐसा है। तुम्हारे आचरणों से तुम्हारा हट निकल बाहर यहां से। आज तक पूरा इतिहास साक्षी है। कहीं भी ऐसा शब्द नहीं आया कि जो भगवान के आश्रय के लिए चला हो वो चाहे वैश्यागामी क्रूर पापी बड़ा हिंसक महत अपराधी हो। इस दरबार में उसको गले लगाया गया है। यह हरि का दरबार इसलिए बड़े-बड़े पातकियों को भी महान परमहंसों की स्थिति प्राप्त होती है।

यहां यही बात समझ में आ जाए। बस भगवत आश्रित कैसा है? यह कभी प्रभु ने नहीं देखा। अपने आश्रित को निहाल कर दिया है। यहां सदा गले लगाया गया। कोई कैसा भी हो, कैसा भी हो। महापतित को भी पावन किया गया है। पर इस दरबार में आ वही सकता है जिसको इनके दरबारियों का संग मिल गया है। इनके दरबारी कौन है? भगवत प्रेमी महात्मा। एक बार एक गांव से संत मंडली पहले संत मंडली चला करती थी। जगत मंगल के लिए युग धर्म का प्रभाव होता है। अब ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होना भी चाहिए। क्योंकि जब सुनने को मिलता है कि अमुक जगह संतों को ऐसे पीटा गया ऐसे मारा गया।

बस केवल संभावना कर ली बच्चा चोरी आदि आदि हृदय में कसकता है हमारा शासन विभाग समर्थ है आप उसको अगर आपको संशय है तो आप बंदी बना लीजिए फिर आप उसको कानून को समर्पित करें वो जांच करेंगे क्या है आप तुरंत उसको पीटने लगे मार दें यहां तक कि हत्या कर दी जब बाद में तो हृदय कश कैसे भी हो भगवत वेश धारण किए हम तुम्हें लग रहा है कि पाखंडी हैं, चोर हैं, डाकू हैं। ठीक है। तुम संशय आत्मा हो। ऐसा हो सकता है। आप बहुत लोग हो उनको आप बंदी बना लीजिए और उनको कानून को समर्पित कीजिए।

कानून उसका न्याय करेगा। ऐसे पशुवत हिंसा कर देना। कोई उन्होंने प्रगट में अपराध नहीं किया। प्रगट में कोई हिंसा की होती। किसी को ऐसा आपको दिखाई दिया कि प्रमाण मिल गया कि ऐसा कर रहे थे। तब ऐसा फिर भी कानून को समर्पित करना चाहिए। हमारा राज संविधान कानून बनाए हुए उनको दंड देगा। कोई भी हो कानून के आगे किसी की नहीं चलती। चाहे महात्मा हो चाहे दुरात्मा हो। कानून के सिक्के में बराबर न्याय होता है। वहां थोड़ी न्यायालय में थोड़ी देखा जाता है कि तुम कौन सी पोशाक पहने हुए हो।

कौन से पद में बैठे हो। नहीं। न्यायाधीश तो उसके प्रमाण के अनुसार उसको दंड देता है। लेकिन आज का समाज क्या हो गया? एक ने बोल दिया बच्चा चोर सैकड़ों ने मिलकर के ऐसे पशुवत मार डाला। जैसे पशु किसी को मार डाले ऐसे पशुवत मिलकर के मार। अब कैसे संत मंडली विचरण करें? पहले संत मंडली विचरण करती थी जगत मंगल के लिए। अब तो बड़ा समय भयाव आ गया है। गंगा किनारे अकेले घूमते थे। अब तो कैसे देख के कि भाई ऐसा तो अब साधु महात्मा फिर धाम का तीर्थों का आश्रय ले लिए भगवान जैसा मंगल करें उनकी वाणी अन्य यंत्रों के द्वारा सुने लोग और उसको अपने आचरण में उतारे मंगल हो तो मंडली संत मंडली गांव से निकल रही थी पूछा यहां कोई श्रद्धावान है आज हम रात में रुकना चाहते हैं कोई मंदिर कोई बगीचा देवालय जहां अपने ठाकुर को विराजमान करके रात भर शयन कराएं सुबह चले जाएंगे ेंगे तो उन्होंने उपहास करने के लिए एक वैश्या का बगीचा था।

वह बताया बहुत बढ़िया पवित्र स्थान है। वहां जाओ वो उसका छोटा बगीचा था। बड़ा सुंदर सजा हुआ था। उसके मित्र जन आते ऐसा हास्य विनोद वही वो गए बहुत सुंदर बगीचा देखा। ठाकुर जी विराजमान किए जो 101 संत थे फिर कीर्तन कीर्तन की ध्वनि गूंजी। वैश्या ने महल बना हुआ तो वहां से देखा अरे मुझ नीच के बगीचे में कीर्तन की ध्वनि वहां खिड़की से देखा तो सब संत महात्मा नाच पड़े हृदय उसका नाच पड़ा कि मुझ नीच आचरण करने वाले को ऐसा सौभाग्य मिल सकता है फल मेवा आदि और कुछ अर्थ आदि लेकर के रखा प्रणाम किया दूर से और कहा भगवन यह बगीचा इसी दासी का है पर पहले हमारा परिचय सुन लीजिए हम शरीर बेचकर जीवन यापन करने वाली वैश्या है यह फल ये अर्थ ठाकुर सेवा में आप सब लगा दीजिए और आंसू चल रहे आनंद क्यों पाप नष्ट हुए संत दर्श जी में पाक टरे पाप नष्ट हुए इतना शोक यही यही है कि न जाने कब दया निधान किसका मंगल करने की सोच ले।

जो संत में प्रधान मंडली के थे उन्होंने कहा तुम्हारा कुछ खा तो नहीं सकते पर बेटी तुम्हारा परम मंगल का अवसर आ गया। क्योंकि हमारे ठाकुर तुम्हारे बगीचे में विराजमान हो गए और तुम भाव से ठाकुर जी के सामने लाए हो। ठाकुर सेवा स्वीकार करेगा। हम लोग तो नहीं पा सकते। हम में तो इतनी सामर्थ नहीं कि ऐसे अपवित्र अन्न को पचाकर भजन कर पावेंगे। पर बेटा तुम चिंता मत करो। तुम्हारा परम मंगल होगा। कोई बेटा या बेटी बोले उसे संसार के देह को सुख मानने वाले लोग कैसा कैसा बर्ताव आज उसे कोई बेटा बोला कोई बेटी?

वो चिल्ला के रो पड़े। अब तो कृपा पर कृपा होती जाए। बोले यह भी धन उठाओ और जो तुम्हारे पास धन है उसको बेचो और ठाकुर जी के लिए एक मुकुट बनाओ हीरो से जटित और रंगनाथ जी को पहनाओ ठाकुर जी को तो उनका प्रभु वो स्वीकार करेंगे हां हम प्रार्थना करेंगे ये देखो हम प्रार्थना करेंगे प्रभु से भी और निज सेवकों से भी ठाकुर जी के साक्षात भाल पर तुम्हारी सब संपत्ति लग जाएगी निहाल हो जाओगी और आज से बेटा अब ऐसा आचरण मत करना का शपथ लेती हूं आज बंद देह व्यापार बड़ी उमन सब बेच के साथ भगवान कैसे लीला बिहारी है इस दरबार में किसी का भी अपमान नहीं होता कोई कैसा भी हो वहां कुछ वार्ताएं हुई कि अब वो आचार्य कोटि के महापुरुष थे कि वैश्या तो वैश्या भगवान की नहीं है भगवान के तो सब जन है भगवान ने आदेश किया दुराचारु भजते मा आपको मुकुट धारण करवाना होगा ठाकुर जी को वो लाएगी अब ठाकुर हां ठीक है मुकुट तैयार हो गया संत सभा के सामने मुकुट लेकर थाल में नजदीक पहुंचने वाली थी कदम रोक दिया।

क्या हुआ बेटा? बोले प्रभु दुर्भाग्य साथ नहीं दे रहा। क्या हुआ क्या? बोले मासिक धर्म से युक्त हो गए। वैश्या ऊपर से मासिक धर्म से युक्त हाथ में मुकुट है। एकदम भगवत आवेश में। उन्होंने कहा तू आगे बढ़। तो जो सेवक जन थे उन्होंने विरोध किया नहीं धर्म के विरुद्ध है। तो उनका धर्म के विरुद्ध अगर है तो प्रमाण देंगे ठाकुर जी। अगर धर्म युक्त है तो गवा झुक जाएगी सरकार की और यह मुकुट पहनाएगी अपने हाथ से और धर्म विरुद्ध है तो ग्रीवा नहीं झुकेगी। सब ने देखा कि श्री विग्रह की गवा झुक गई और उसने स्वयं मुकुट धारण कराया।

यह ऐसा करुणा में दर्शा सिद्धांत एक तरफ भगवत प्रेमी महात्माओं का संकल्प एक तरफ वहां बात वैश्या गिले बात भगवत प्रेमी महात्मा के निश्चय की इस दरबार का दरबारी यदि मिल गया निहाल हो जाते तभी मात संग दुर्लभ हो भगवत प्रेमी महात्माओं का संग दुर्लभ है तो कह रहे हैं प्रभु अच्छे समय में गुणवानों को बहुत लोग मित्र मिल जाते हैं। लेकिन दुर्गुणी को और कुमय में केवल आप ही साथ देते हैं। दूसरा कोई साथ देने वाला नहीं। सेवा करने वाला अच्छे गुणों से युक्त सब प्यार करने के लिए तैयार।

लेकिन हीन सेवा में देने के लिए कुछ है नहीं। सबसे अपमानित वह अपना दुखड़ा किसको सुनाए कोई सुनना भी नहीं चाहेगा तिरस्कार कर दे एक दरबार है जाओ उसका बहुत आदर से दुख सुना जाएगा वो श्री हरि आपका दरबार है और जिसने आपके दरबार में दुखड़ा सुनाया सबको आपने निहाल कर दिया आज तक हमने आपके दरबार से जितने भी सबको फूला फूला पाया है गोस्वामी जी कह रहे हैं जिनको वास्तविक दरबार का तात्पर्य आश्रय जिनको भगवत आश्रय मिल गया सब छाती चौड़ी करके डोलते हैं आनंद में मगन होकर प्रभु का गर्व हृदय में आ जाए तो भय मैं प्रभु का दास हूं मैं शिव ये हम समाज की बल अभिमानी ये देहाभिमानी विषय अभिमानी विद्या अभिमानी ज्ञानाभिमानी और यहां तक जबकि भजन अभिमानी के भी पा से अभिमान नहीं होता।

एक कृपा पात्र के अंदर जागृत होता है। हम श्री श्यामा जी के बल अभिमानी। यह अभिमान आम ब्रह्मास्म से भी आगे की बात है। हम श्री श्यामा जी के बल अभिमानी। मैंने उन्हें आनंद से फूले फूले फिरते पाया है। जितने भी आपके होंगे किसी भी संबंध से किसी भी आश्रय से प्रभु आपके दरबार में तुलसी की भी हाजिरी हो गई। आपकी कृपा से पहले ही कहा है प्रभु आपकी कृपा से आपका दरबार तो तुलसी की भी हाजिरी हो गई है। नाथ और तो कोई मांग नहीं है। और कोई चाह नहीं पर भिखारी हूं। अब तो आपके दरबार में आते ही कोई चाह नहीं रह गई।

कोई मांग नहीं रह गई। पर भिखारियों और आपको देना ही होगा। क्या आपका श्री मुख चंद्र की भांति और मेरे नेत्र चकोर की भांति निरंतर पान करते रहे। आपकी रूप माधुरी मेरे नेत्रों में बस जाए। बस यही चाहिए। इस दरबार में संकट निवृत्ति। अरे इस दरबार में आ गए तो संकट रहेगा ही नहीं मांगना नहीं पड़ेगा संकट निवारण के लिए जो पे कृपा बहुत ध्यान से आनंद आ जाएगा कोई भय नहीं रहेगा जो पे कृपा तो आप कहोगे जिन पे है उनकी बात आप कर रहे हो ना भाई साधन करते हैं भजन करते हैं। प्रभु में लीन है।

उनके पास संकट क्या है? प्रभु हम तो प्रभु से दूर हैं। भजन भी नहीं करते हैं। तो प्रभु के हो ना? यह बात तो स्वीकार कर लो। अब बताओ सच्चाई से क्या प्रभु के नहीं हो आप? अरे सारी सृष्टि प्रभु की है। तुम्हारे हृदय में प्रभु बैठे हैं। केवल तुम्हें स्वीकार करना है। यहीं से कृपा शुरू हो जाएगी। जो कृपा है वह आश्रय से होती है। वैसे तो सब पर मोरी बराबर दया पर कृपा शब्द कुछ दया से अलग है। दया से अलग है। बड़ी समर्थ है। कृपा इधर जीव को घसीटती है और उधर ईश को भी घसीटती है।

कृपा एक ऐसी शक्ति है जो दोनों की दूरी मिटा देती है। ईश को इधर घसीटा जीव को इधर जीव के जीवत्व को हटा दिया इस केत्व को भुला दिया और दोनों को मिला दिया दया सब पर है उनकी पर कृपा पात्र कोई बिरला ही बनता है कौन जो अन्य आश्रय त्याग कर भगवान का आश्रय ले लिया किसी भी भाव से जुड़ा हो केवल प्रभु से जुड़ गया जो पे कृपा कृपा रघुपति कृपालु की बैर और के कहा सरे होई न बाको बार भगत को जो को कोटि उपाय करे कह रहे कि यदि आपने प्रभु के दरबार का आश्रय ले लिया है कृपालु की कृपा के सहारे हो गए हो बैर और की कहा करें कोई भी त्रिभुवन का दवी शक्ति संपन्न भी हो बाल बांका भी निकल सकता उसका विश्वास कर लो यदि हमने अंदर से भगवत आश्रय नहीं लिया केवल बाहर भेष बनाए तो बात अलग है बात ध्यान देनी होगी फिर वहां अपने लोगों को संशय हो जाएगा कि भगवान ने क्यों नहीं बचाया।

यह बात छाती की है। यह बात बाहरी किसी लक्षणों से नहीं पहचाना जा सकता। जो कृपा पात्र हृदय का विषय जिसने भगवान का आश्रय ले लिया अंदर से। यदि भगवान का आश्रय ले लिया है और अंत समय में ऐसा कुछ होता है तो अनंत जन्मों का कोई विधान है जिसका भगवान निवारण करके सीधे अपने पास बुला रहे हैं नहीं तो निश्चित समझ लो त्रिभुवन में ऐसा कोई नहीं कि बाल बांका भी कर सके एक बार भी उखाड़ सके पक्का समझ लो जो पे कृपा रघुपति कृपालु की बैर और के कहा सरे हो ना बाको बार भगत को जो कोटि उपाय करे करोड़ों उपाय कर ले बाल बांका भी नहीं हो सकता करोड़ों उपाय कर ले और बात बड़ी महिमा की तके नीचु जो मीचु साधु की सो पाह मीचु मरे वेद विदित प्रहलाद कथा सुनी को न भगति पथ पाव धरे कयादु जी ने बहुत सुंदर श्रृंगार किया पांच वर्ष के बालक हैं।

कूदते हुए हिरण्यकश्यप के सामने आए। साष्टांग प्रणाम किया। क्योंकि देवर्षि नारद जी के आश्रम में जन्म हुआ। देवर्षि नारद जी के गर्भ से ही इनको शिक्षा प्राप्त हुई। महा भागवत है। साष्टांग प्रणाम। उतर पड़ा सिंहासन से। प्रह्लाद जी को उठाया। छाती से लगाया मस्तक चूमा। बड़ा सुख मिला प्रह्लाद जी को। बेटा तुम्हें क्या पसंद है? जैसे छोटा बच्चा तो प्यारे तुमको क्या टॉफी? तुम्हें क्या पसंद? खिलौना कोई चॉकलेट तुम क्या चाहोगे वो पूछ तुम्हें क्या त्रिभुवन पति तपस्या का धन अद्वती तपस्वी अद्वती तपस्वी हिरण्यकश्यप ब्रह्मा जी को भी दिव्य दृष्टि से ढूंढना पड़ा है कहां हिरण्यकश्यप वहां घास जमी हुई थी उसके ऊपर कुशा जमा हुआ था दीमक की बाम लग गई थी मंत्र में तन है तभी तो किसी देवी शक्ति की भी सामर्थ्य नहीं थी कि उसको प्राप्त कर सके ऐसे दुलार का क्या चाहिए बेटा?

तुम्हें क्या पसंद है? कहा मुझे नौ बातें बहुत पसंद है। श्री हरि के प्रति यह जो नवधा भक्ति है श्रवणम कीर्तनम स्मरणम विष्णु पाद सेवनम अर्चनम वंदनम दास्यम श आत्म निवेद जैसे सांप एकदम कूद पड़ा हो ऐसे शिव एकदम क्या बोला पटक दिया नीचे क्योंकि हरि से द्वेष करते थे पटक दिया नीचे किसने शिक्षा दी इस बालक को थरथर काप रहे हैं कयादु जी संडामर्ग जी आए कुछ समय के लिए हमें अवसर दीजिए हम शिक्षा प्रदान करेंगे बालक है बुद्धि संडामर जी पांच वर्ष के बालक को काम शास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं और भी राजनीतियों की कूटनीतियों की इतने चतुर शिरोमणि हैं कि जो वो बोलते हैं उसका उत्तर तत्काल दे देते हैं माने पढ़ाई में बहुत त्रुति है ऐसा अधिकार और जहां हटे ध्यानस्थ है नाम कीर्तन परायण है।

भगवत रूप में डूबे हुए हैं। काफी समय बाद फिर बुलाया। अब उतना प्यार नहीं किया। हां बेटा तुम्हें क्या पसंद है? क्या पढ़ा गुरु जी से? सुनाओ। तो भगवान की महामहिम बात संडा ये सिखाया। बोले प्रभु आप जिसकी शपथ ले लो। हमारे यहां तो चर्चा नहीं हुई है। किसने सिखाया तेरे को? प्रह्लाद जी से किसने नशा मतिव्र स्पमथा मशा पाद रजो अभिषेकम निष्किंना नाम नितवत ऐ दैत्यराज भाव बदल गया हरि से द्वेष करता पिता कैसे हो सकता है ये पढ़ाने लिखाने से बुद्धि नहीं होती ये महापुरुषों की चरण रज अभिषेक से होती है ये हरि में जैसी मेरी रति है ये पढ़ाने लिखाने मेरे गुरु देवर्षि अंदर की बात बाहर नहीं बोले मेरे गुरु देवर्षि नारद जी के कृपा कटाक्ष से हरि प्रेम जागृत हुआ ये पढ़ाने लिखाने से नहीं बंदी बना लिया जाए इसे पांच वर्ष के बालक को आदेश किया हमारे सामने इसे नुकीले शस्त्रों से छेदा जाए मार डाला जाए वो शस्त्र मारते उनकी त्वचा में कहीं खरोच भी नहीं होती बोले महाराज बड़े-बड़े नुकीले अस्त्रों से प्रहार किया जा रहा है आप देख रहे हैं कोई प्रभाव नहीं पड़ता हमारे सामने मत वाले हाथियों से रौदा दिया जाए।

हाथी ऊपर से कचर के चले जाते। प्रह्लाद जी आराम से बैठ जाते। ऐसा लगता है जैसे कोई सुकोमल फूलों का स्पर्श कर रहा हो। मरेगा कैसे ये? जहर पिलाओ। सांप से डसवाओ। पर्वत के नीचे दबा दो। बड़े-बड़े दैत्य और पर्वत उठाकर प्रह्लाद पहाड़ का टुकड़ा बांधकर समुद्र में फेंक दो। मृत्यु भी नहीं छू रही। अग्नि में जलाया कुछ नहीं बाल भी नहीं झुलसा कह रहे वेद विदित प्रहलाद कथा सुनी को भगत पथ पाव धरे बोले वो तो प्रहलाद जी थे सत्य मानो प्रभु की दृष्टि में आप और प्रह्लाद जी में इतना अंतर नहीं ये तो दूसरे लोग अंतर कर सकते हैं कि पढ़ा लिखा बच्चा है और वो मूर्ख है लेकिन उस मां से पूछो उसकी छाती में बराबर प्यार है हर बच्चे के लिए प्यार है ऐसे ही मेरे पिता है प्रभु मेरे परमेश्वर है प्रभु मेरी मां है प्रभु तुम माता च पिता तुम हो तुम बंधु सखा तुम हो तुम विद्या द्रविण तुम सर्व मम देव देव प्रभु हमको वैसे ही प्यार करते जैसे प्रह्लाद जी को पर हम वैसा प्रभु पर भरोसा नहीं रखते जैसा प्रह्लाद जी रखते हैं अंतर हमारी तरफ से प्रभु की तरफ से नहीं गज उधार हरि थापो विभीषण ध्रुव विचल कबहु न टरे अंबरीश की साप सुरत करे अज महामुनि ग्लान करे कह रहे कि देखो गजेंद्र महान बलशाली है ये बल जानते इसको कहां से हो हरि भजन से अगस्त जी महाराज भ्रमण करते हुए जा रहे थे तो देखा ये भजन में लगे हुए थे।

आंख मूंद बैठे ना खड़े हुए ना प्रणाम किया ना ऐसा। अगस्त जी नजदीक गए और कहा राजन यह उचित नहीं है। ना तुम्हें किसी ऋषि ने आदेश किया है। तुम राजधर्म का त्याग करके ऐसे ना तुमने गुरु स्वीकार किया है। और यहां आने पर तुम ऋषियों का स्वागत भी नहीं कर रहे हो। हाथी जैसे बैठे हो। ठीक नहीं है। बिना किसी गुरु परंपरा के उपदेश पाए किसी महर्षि के द्वारा बिना आदेश दिए गए अपराज पद का त्याग कर ऐसे और किसी भी ऋषि का कोई भी स्वागत नहीं तुम्हें दंड मिलना चाहिए जाओ गजराज योनि को प्राप्त हो भले ही मन युक्त होकर भजन कर रहे थे गुरु ने ही किया था किसी महात्मा का आदेश नहीं लिया पर हरि का भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यह खास बात भगवान के भजन में है। वही आकर के गजराज के रूप में प्रकट हुए। समय आया जब ग्राह ने उनको ये ग्राह सबको पकड़ता है। काल रूपी ग्राह जन्म से ही पकड़ लेता है। जन्म से ही माया पकड़ लेती है। भूमि परवा ढावर पानी तिम जी माया लपटानी। पूरे जीवन भर प्रयास करता रहता है अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए दुख निवृत्ति के लिए लेकिन कभी नहीं निकल पाता पर उसको हरि का परिचय नहीं इसलिए पुकार नहीं पाता और फिर काल उस पर प्रहार करके अगले जन्म की व्यवस्था कर देता है दुख ही ग्राह है और यह डुबो ही देगा दुख समुद्र में गजराज ने अपने पूरे पूरे बल का प्रयोग किया फिर हाथनियों का सहयोग हाथियों का सहयोग सब चले गए अकेला वो जलचर जीव बलशाली और होता गया जब देखा कि मरने का समय आ गया अब तो इसी झटके में सूंड

भी डूब जाएगी तब पूर्व का भजन ये भजन की खास बात एक बार विराम कृष्ण हरी का है तुम्हें डूबने नहीं देगा इसलिए कह रहे एक बार राधा बोला है तुम्हारी दुर्गति रुक गई पूज्य श्री राधा एक बार राधा कृष्ण बोला मंगल की नींव पड़ गई मंगल की नींव पड़ गई तो इतनी कीमती जिसकी महिमा है नाम की फिर हम छोड़ेंगे क्यों हम तो रात दिन जपेंगे एक बात कह कि फिर विषय चिंतन थोड़ी करेंगे फिर तो इसी का चिंतन करें हरि ऐसा जे ही हरि तो ये देखा आप बाहर और उसका उद्धार कर दिया गज उधारी हरि थप विभीषण कोई साथी नहीं विभीषण का लात मारा सभा में बड़ा उपदेशक बनता है।

जब लंकाधिपति जैसा लात मार दे तो उसको शरण कौन दे सकता है? यह भी बात है आंतरिक लंकापति विरोध कर रहा है तो कोई देवता भी आश्रय नहीं दे सकता विभीषण को अब क्योंकि महा बलवान है वो लंका में भी फिर कौन उनसे हालचाल पूछ सकता है विभीषण के पक्ष में अब कोई नहीं खड़ा हो सकता क्योंकि लंकाधिपति विरोध में खड़ा हो गया क्या हुआ मिटिया मेट कर दिया विभीषण जी को उसी सिंहासन पर भगवान ने विराजमान किया और अपनी अविरल भक्ति दी निरंतर भगवत प्रेम में डूबे हुए अब भी विभीषण जी शासन कर रहे भागवतिक चिंतन से मस्त होते ध्रुव अविचल कबहु

न टरे अविचल पदवी पर ध्रुव विराजमान अमरीश जी को कृत्या प्रकट की दुर्वासा जी ने बड़ा भय दुर्वासा जी को हुआ आज भी जब याद करते हैं तो छाती जलती है मैंने अमरीश जी के साथ ऐसा क्यों किया अमरीश जी की उदारता देखकर के उनको आंसू आ गए मैंने तो इतना प्रतिकूल व्यवहार किया अमरीश जी जानो क्या बोले थे हाथ में जल लिया और कहा आज तक जितना भजन पुण्य और भगवत सेवन हुआ है उस सब का फल दुर्वासा जी को प्रदान करते हैं जो कृत्या प्रकट की थी अमरीश जी को मारने के लिए सारा भजन पूरे जीवन का दुर्वासा जी को अर्पित कर दिया आंसू आ गए दुर्वासा जी के ओो हरिदास में इतनी सामर्थ होती है मैंने अपनी तपस्या का प्रयोग इनको नष्ट करने के लिए किया और इन्होंने अपने भजन का पूरा का पूरा फल मेरे को दान कर दिया।

यह बहुत बड़ी बात होती है। अभी भजन देने की बात आवे जो आप 100 200 माला 10 माला जो भी कर रहे हो तो आपको भजन कैसे दे सकते हैं? पूरे जीवन का भजन दे दिया। सुदर्शन जी शांत हो गए। अंतर्धान हो गए। दुर्वासा जी चरणों में गिरे कि मैं नहीं समझ पाया हरि चरणारविंद के आश्रय वालों की ऐसी भी महिमा हो। पूरे जीवन का भजन दे दिया तो उसका भी तो फल होता है। यह आंतरिक बात है। भजन करके जगत मंगल हो तो इसका भी तो फल होता है। जगत का ईश्वर उसके अधीन हो जाता है। जो पूरा आश्रित नहीं वो डरेगा कि भजन हम करें मंगल इनका हो।

लेकिन जो भगवत आश्रित होता है वो जानता है कि स्वामी को कैसे प्रसन्नता प्राप्त होगी। बोले चराचर जगत में सबके सुख की भावना करो तो बहुत जल्दी भगवान प्रसन्न हो जाएंगे। यह आंतरिक बात है। तो महापुरुषों का हृदय सबका मंगल। जैसे अपने बेटे बच्चों से प्यार होता है। ऐसे संतों को संपूर्ण विश्व से प्यार होता है। साहब सुखी रहे। कोई भी रोग से युक्त ना हो और अपना भजन सबको देते रहे। तो भजन तो दे दिया। अब क्या होगा इनका? अब हरी इनके अधीन हो जाएंगे। क्योंकि अपने भजन का फल वह अपना नहीं सब का मंगल चाहते हो।

सब में बैठे हरि है तो हरि उनको अपनी गोद में बैठा लेते हैं। पर यह वही समर्पित कर सकता है जो हरि समर्पित है। नहीं तो इतनी ताकत किसी में नहीं कि अपने भजन को दूसरों को दे दे। शोधो कहा ना कियो सुजोधन अबुध आपने मान झरे। क्या क्या नहीं किया दुर्योधन ने ऐसी विपत्ति से तो कोई निकाल ही नहीं सकता था अभी प्रारंभ की ही बात थी हस्तिनापुर में प्रवेश हुआ जब पांडवों का महाराज पांडु पधार चुके थे भीष्मा आदि ने स्वागत किया ऐसे सुंदर थे क्योंकि देवताओं के देवी अंश से प्रकट हुए तो ऐसे धर्मात्मा थे एक-एक शब्द एक एक चाल एक-एक आचरण धर्म युक्त पूरी प्रजा लट्टू हो गई कुछ ही दिनों में पांचों पांडवों से।

यह देखकर के धृतराष्ट्र के भी हृदय में जलन हुई और दुर्योधन भी जल गया कि जिसकी प्रजा वही राजा बनेगा और राज मुकुट तो पांडु के ही माथे पर विराजमान था। उनके पधारने पर धृतराष्ट्र जी के बाल पर हुआ। तो मुख्य अधिकारी तो युधिष्ठिर ही और प्रजा भी प्यार कर रही थी। अब अंदर ही अंदर इनकी प्लानिंग हुई कि माता सहित ये पांचों भस्म हो जाए तो अकंटक राज्य हो जाएगा। ठीक है। उन्होंने बुलाया कि वाराणावत में बहुत सुंदर स्थान है और वहां की प्रजा के पास अपने लोगों का जाना नहीं होता।

धृतराष्ट्र जी ने बेटा यदि कुछ समय वहां रहते यहां देखते हैं पूरी हस्तिनापुर की प्रजा तुमसे अगर वहां की भी प्रजा प्रेम करने लगेगी तो उनको भी बड़ा सुख मिलेगा और आपका एक छत्र राज्य हो जाएगा राज्य तो नहीं पर आपकी जैसी आज्ञा हो आपकी बड़े धर्मात्मा थे उनको राजी किया हां हम तिथि बताएंगे तुमको कब जाना है तैयार हो गए उधर उन्होंने पूरा प्लान बनाया कि एक महल बनाओ इनके लिए विशिष्ट और वो वो सब प्रज्वलित अग्नि करने वाला होना चाहिए। जरा सी आंख छूते ही पूरा पेट्रोलियम से युक्त होना चाहिए।

बड़े ही अग्निदाहक पदार्थ उसमें गूगल ये वो वो सब पदार्थों को मोटी मोटी दीवालें ऊपर से दीवार दिखाए। अंदर सब अग्नि को भड़काने वाली वस्तुओं से ऐसे कोई जान ना पावे। दूसरा कोई कर्मचारी वहां प्रवेश ना करे। बाहर से ऐसे राजा ही थे। पूरी सुरक्षा कर दी। सब सामग्री भिजवा दी। पूरा महल तैयार किया जा रहा है। विदुर जी ने विचार किया कि इतनी चतुराई से वहां महल का निर्माण कुछ तो गड़बड़ है। उन्होंने अपने जो गुप्तच चर थे उनसे कहा हमें संशय हो रहा है कि जो पांडवों के लिए महल निर्माण हो रहा उसमें कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है।

सूचना है कि आपका विचार पक्का है। वहां पांडवों को नष्ट करने के लिए महल बनाया जा रहा है। इतनी दाहिका शक्ति को प्रज्वलित करने वाले पदार्थ लगाए गए हैं कि कोई बुझा भी नहीं सकता। एक साथ पूरा बम की तरह फट जाएगा। पूरे सब महल में आग लग जाएगी। कोई नहीं बच पाएगा। ठीक है। विदुर जी ने एक ऐसे विश्व क्योंकि महामंत्री भी थे। उन्होंने विश्वसनीय आदमी को अपने फिट किया और भेज दिया उन कर्मचारियों के साथ। कहा जब वहां का प्रधान कार्य कराने वाला जानते थे वो जब विश्राम को जाता है सो अमुक जगह अमुक खंबे के नीचे से तुम वो सुरंग बनाना और वो सुरंग नदी के किनारे निकले जाके गंगा और वहां से यहां तक बन जानी चाहिए सुरंग बाहर से अंदर से तुम उसको दरवाजा देना और बिल्कुल ऊपर से खंबा ही लगे नीचे से सुरंग वो भीम के एक गदा में वो ढह जाएगा और सुरंग खुल जाएगी वो निकल चल जाएंगे।

ऐसा बिल्कुल फिट हुआ। युधिष्ठिर जी जब वाराणावत के लिए तैयार हुए चलने के सबसे मिले। विदुर जी वहां नहीं मिले। एकदम एकांत युधिष्ठिर जी को बुलाया और कहा वहां ऐसा दाहिका शक्ति से संपन्न वहां मकान बना महल बनाया गया है। एक जगह आग सोएगी तो बम की तरह पूरा फट जाएगा। पूरा महल आग से तो क्या बोले ये मारने का ही उपाय करेंगे। अगर तुम नहीं जाते तो भी दूसरा करेंगे और इस समय मुझे पता है कि आप बच सकते हो। हमने सुरंग की व्यवस्था कर दी। इतने खंभे की गिनती करना। उस खंभे में जो वो अमुक जगह खंभा मिलेगा पूरा उनको नक्शे में बताया।

इसके नीचे से सुरंग है। भीम इसको गधा के द्वार तोड़ देंगे। सुरंग का द्वार खुल जाएगा। तुम निकल जाना। ऐसा विधान हो गया। अब जो अंदर गए बड़ा उत्सव मनाया गया। वाराणावत के लोग कि हमारे राजा के राजकुमार आए। पांडु महाराज के पुत्र आए बड़ा तो उस दिन बड़ा उत्सव नगर का रखा गया तो पांच पुत्रों सहित एक देखो भगवान का विधान एक जंगली भीलनी भी आई हुई थी उसके पांच जवान पुत्र थे भोजन मिलेगा ऐसा ऐसा वही संयोग वसात वो वही रुकी खूब अच्छा भोजन पाया और वही लेट गई भीमसेन को पूरा बता दिया गया था ऐसा अवसर पाते ही भीमसेन ने व्यवस्था ऐसी फिट कर ली कि अब जाना है यहां से निकल के जाना है।

वो सोच ही रहे थे इतने महल में आग लगा दी गई। तो आग की दूर लपटों से वो इतने नींद में थे कि पांचों पुत्र और भील अंदर की तरफ भागी महल की तरफ बचने के लिए महल सबका शक्ति से वो आके उसी में भस्म हो गई और सुरंग से निकल गए और ढहकर सब सुरंग का द्वार बंद और गंगा के किनारे की तरफ बढ़ गए। जब वहां जांच की गई तो एक स्त्री और पांच वो मरे। बड़ा संतोष हुआ कौरवों को कि हमारे दुश्मन जिनको हम भाव से दुश्मन मान रहे वो तो मर गए। कैसे भगवान ने बचाया। एक बार बालवत्स वृक्षों में चढ़ने वाला खेल खेल रहे थे।

तो जब भीम का नंबर आया कि छूने तो कौरव चढ़े हुए थे। नीचे से पकड़ा हिला दिया तो सब आम की तरह नीचे गिर पड़े। विचार किया उन्होंने कि अगर यह जिंदा रहा तो कौन इससे जीत पाएगा? बोले पहले इसी को मारो। कई जगह भीमसेन खाने पीने को बहुत स्वाद रखते थे तो खीर का निर्माण किया गया। अलग से उनको पांडवों को बैठाला गया कि इनको तो कभी भी चार को ये बहुत बलवान है। भीम इसको दो। भीम से कहा तुम्हारे लिए एक विशेष खीर बनी हुई है। और बड़ा प्यार दुलार करके बैठा लो। पूरी कढ़ाई की खीर खा गए।

अरे ब्रकोदर आग जलती कितना भी खा जाए जब कोई भिक्षा मांग के लाते थेला तो आधे में होते थे कुंती जी और ये सब अर्जुन अकेले भीम को आधा दिया जाता था तब वो कहते थे और नहीं मिलेगा क्या बोले कभी ऐसा अवसर आया उनका पेट ही विध और उसमें हलाहल जहर था तुरंत शरीर नीला हो गया फेंक दिए गए गंगा जी में और यह किसी को पता नहीं चला। ये भी फेंके गए तो तो ये सब भागवतिक शक्ति से संपन्न पवन पुत्र हैं। कोई साधारण थोड़ी है। एक नाग उनको ले गया नाग लोक में। वहां वो परिचित थे। देखा अरे ये तो भीमदेव है।

बाल बाल अवस्था के थे। हां हमें समझ में आ गया कौरवों ने ऐसा उपाय किया है। तो जैसे सांप काट खाए तो कृत्रिम जहर के द्वारा उसे शांत किया जाता है। ऐसे कृत्रिम जहर को शांत करने के लिए उनके पास जहर है। खत्म जहर शांत। बोले सुनो हमें पता है तुम्हें मारने का उपाय क्या है। हम तुम्हें आज इतना बलशाली बना देते हैं कि कौरवों में क्या पृथ्वी में कोई तुम्हारी जोड़ का योद्धा नहीं रहेगा। ये 10 द हजार हाथियों के बल से संपन्न अमृत से युक्त पदार्थ है। तुम जितनी कड़ा पी पाओ 60 हजार हाथियों का बल आ जाए ऐसे ऐसे उनको छह कड़ा पी गए।

बोले आराम से सो जाओ। सो गए सब प बोले अब कोई भारत में ऐसा नहीं कि तुम्हें इस अवस्था में परास्त कर सके। 60 हजार हाथियों का विशाल बल उनके फिर गंगा जी के ऊपर। तभी तो देख के जलत कि मरेंगे कैसे? भगवान के भक्त को मारने वाले इस बात से परेशान हो जाते हैं कि मरेगा कैसे? और उल्टा क्या होता है? तके नीच जो मीच साधु की सो पामर ते मीच मरे वंश का विनाश हो गया उनके। प्रभु प्रसाद सौभाग्य विजय जस पांडव बरिया भरे हस्तिनापुर के सिंहासन पर भगवान के भक्त ये पांडव जन ही राजा हुए बीच में भले उनको कितने कष्ट मिले जोई जोई कूप खगो पर कहा सोसट फिरते कुप पर यदि भक्त के लिए कुआं खोदोगे तो वंस सहित उसी कुआं में गिरोगे जाकर के भक्त का तुम अगर दुख का विधान सोचोगे तो हरि तुम्हें ऐसा दुख देंगे कि सपने सुख ना संत द्रोही कहो सुरतर सो विष फरन फरे यदि कल्पवृक्ष के नीचे भी उसका वास हो जाए जो भक्तों का नाश चाहता है भक्तों को दुख

देना चाहता है तो कल्पतरु विष के फल ही उसको देगा कभी शांति प्रदान नहीं कर सकता क्योंकि भगवान का दास है सपने सुख ना संत द्रोही को स्वप्न में भी उस शांति को प्राप्त नहीं कर सकता है का के द्व शीश ई के जो हठ जन की सीव चरे कौन पैदा हुआ दो खोपड़ी वाला ऐसा दो शीश वाला जो भगवान के भक्त की सीमा को भी छू सके [खांसने की आवाज़] ये बात जब हृदय में बैठ जाएगी ना तो चौड़ी छाती करके घूमोगे आ बस भगवत दासत्व से भगवान के भक्त का जो अहंकार होता है वो जगत मंगल करने वाला होता है।

मैं श्यामा श्याम का हूं। यह अहंकार होना चाहिए। गर्व होना चाहिए। अस अभिमान जाए जन भोरे भ सेवक रघुपति पति मोरे ये गर्व होना चाहिए। इस गर्भ में जानते कोई कामना तुम्हें परास्त नहीं कर पाएगी। तुम्हारे अंदर कोई दरिद्रता नहीं रहेगी। तुम्हारे अंदर ये घगियाना बंद हो जाएगा। देखो तो आप इस गर्व को धारण करके। कौन है दो शीश वाला ऐसा इस ब्रह्मांड में जो भगवान के भक्ति की सीमा को भी छू सके। विश्वास करो जब यहां वो क्या औरंगजेब आया हुआ था वो बहुत अत्याचार किए तो कुछ महामहिम संतों का भी उसने वध किया।

[खांसने की आवाज़] वृंदावन दास चाचा जी जब सुने कि घनानंद जी और अमुक संत को तलवार की घाट उतार दिया गया तो बहुत उनके हृदय में दुख हुआ कि हरि ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा आपके वचन है तब किसी ने उनको बताया था कि जब इस शासक के जन काटने के लिए सामने गए तो उनका काट देख काट करके तेरे अस्त्र काम करें। वो दोनों हाथों से तलवार मार रहे छू भी नहीं रही। भाग पड़े कि ये तो कोई मतलब क्या है? बोले आओ आओ मारो आके। घनानंद जी आज महापुरुष आओ आओ कोई उनको बोले देखो मुझे श्री जी बुला रहे हैं इसलिए मैं जा रहा हूं।

तेरी तलवार में दम नहीं कि काट सके। आजा आप तू मार मेरे को। और आंख मूंद ली। शरीर छोड़ दिया और शरीर को काट दिया। वह ऐसे नहीं गए थे कि उनके पास वृंदावन दास आचार्य जी को यह सब अच्छा नहीं लगा उनका ऐसा कैसे हो सकता प्रभु ऐसा नहीं है आपके जो जन है वृंदावन वासी इतने प्रेम उपासी और ऐसा मक्षु को इतना पावर दे दिया कि वो इतना कर ले और आपके जो दास है उसी दुख में ऐसे बैठे थे कि भाव समाधि लग गई देखा तो श्री जी हंस हंस करके घनानंद नाम से ही पुकार रही थी जिससे परिचय वृंदावन दास जी जान श्री जी की सेवा में लगे हुए है खूब खेल खेल रहे मुस्कुरा रहे हैं।

श्री जी वृंदावन दास चाचा की तरफ देखकर मानो इशारे से कह रहे ये मेरी इच्छा ही थी। इनको बुलाना था। निमित्त केवल वो बना हुआ है। ऐसा कौन पैदा हो गया जो भगवान के भक्त को कष्ट दे सके। किसी नागरीदास नवल नवलदास जी किस के विषय में आता है रसिकन ने माल में कि उनको बांध करके ले गया। अधिकारी था और जंजीरों से वहां बांध दिया। फिर जब खोल के उनको दंड देने के लिए गए देखा जंजीर पड़ी वृंदावन फिर भेजा सैनिक फिर बुलवाया फिर बांध दिया कई बार तो चरणों में गिरा महाराज कुछ आपका हम किसी तरह से बैर विरोध नहीं करते हम आप पर द्वेष नहीं रखते पर यदि आप दंड देने की बात कहे तो आप में इतनी सामर्थ्य नहीं काल में भी इतनी सामर्थ्य नहीं कि मुझे दंड दे सके क्योंकि मैं राधा वल्लभ लाल का हूं इसलिए काल की भी ताकत नहीं कि दंड दे सके वास्तविक बात है जब हरि अपने भक्तों को बुलाते हैं।

अब वो अंतिम लीला क्या करते हैं? जैसे उड़िया बाबा जी महाराज अरे ऐसे ब्रह्मलीन महात्मा को कोई अंगुली से भी छू सकता है। पर उनकी अंतिम देखो भगवान अंतिम लीला में जा रहे हैं। उनके चरण में बाण मार रहा है। वो बहलिया मार रहे है ना ये लीला है भगवान की। इस पर अपने को अविश्वास नहीं करना। यदि यह बात सत्य है तो वो कैसे हो गया? ये उनकी लीला है। वो स्वयं जा रहे हैं। देखो ना जा रहे प्रभु विमान आया हुआ है। तो पहले उस बहेलिए को विमान में भेजा कि किसी भी तरह से ही तुम हमारे परमधाम जाने का हेतु हो रहे हो तो पहले परमधाम तुम जाओ।

कितले कृपाल उसको नरक भेजना चाहिए। प्रभु के श्री चरणों को मृग का मुख समझकर सीधे बाण संधान किया। प्रभु के चरणों में बाण लगा। प्रभु ने विमान में बैलकर उसे परमधाम भेजा। फिर आप गए। परमधाम लीला में श्री लाल जी महाराज श्री कृष्ण द्वारिकाधीश जी महाराज ये लीला दिखा रहे हैं कि अंतिम तो उनके जनों की भी कहीं कोई ऐसी लीला देखने को मिले तो यह श्रद्धा ना करना कि यदि इनमें भगवान की भक्ति होती तो यह लिखा सत्य होता। अगर यह लिखा सत्य होता तो भगवान के भक्त के साथ ऐसा क्यों होता?

ये क्यों मे का उत्तर तो केवल हरि ही जानते हैं। पर इतना विश्वास रख लीजिए कि यदि उनका विधान नहीं है तो कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता। त्रिभुवन में है काके द्व शीश ई के जो हठ जन की सीव चरे सीमा नहीं छू सकता मारने और इसकी तो बात जाने दो तुलसीदास रघुवीर बाहुबल तुलसीदास रघुवीर बाहुबल सदा अभय काहु नरे अभय दंड जिसने प्रभु के चरणों का आश्रय ले लिया निर्भय हो जाता है निश्चित हो जाता है प्रभु जैसा प्यार करने वाला कोई नहीं है। भले हम नहीं समझ पा रहे पर हमारे प्रीतम है।

इतना हम हृदय से स्वीकार करके हमें जो चाहिए अपने स्वामी से चाहिए। अपने प्रीतम से चाहिए। अपने प्यारे से चाहिए। प्यारे की ध्या दी हुई वस्तु प्रसाद होती है। और वो प्रसाद दुखों का नाश करके परम आनंद प्रदान करती है। आराध्य देव के बल पर निर्भय रहो। कभी मत डरो। क्योंकि जो भय देने आया उसमें भी मेरा आराध्य देव विराजमान है। वो सोच भी नहीं सकता। वह चल भी नहीं सकता। वो कुछ कर भी नहीं सकता मेरे आराध्य देव के सिवा। तो अगर प्रभु अपने जन को अपने पास बुलाने वाली कोई लीला करना है वो वो जाने।

अन्यथा अन्य कोई सामर्थ्य नहीं कि उसकी सीमा को भी छू सके। इसलिए चाहे संकट निवृत्ति के लिए, चाहे धन प्राप्ति के लिए, चाहे भगवान को जानने के लिए या भगवान में भगवत स्वरूप होकर उनसे प्रेम करने के लिए हमें केवल प्रभु का आश्रय लेना है। प्रभु बड़े कृपालु हैं। वो हमारी हर चाह को पूर्ण कर देंगे। श्री राधा वल्लभ लाल

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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