जब भगवान हर जगह हैं, तो हमें दर्शन क्यों नहीं देते? कर्म और अकर्म में क्या अंतर है?03/04/2026
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावनेश्वरी तवैरविंदम प्रेमाइक मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वापय परम शीतल माशयाम परम शीतल माशया प्यारी अब क्यों हूं क्यों हूं आई है प्यार अब क्यों हूं क्यों हूं आई है इत तुम श्रमित अधिक मनमोहन मैं कोटि जतन समझाई है। मैं कोटि जतन समझाई है। प्यारी अब क्यों हूं क्यों हूं आई है उतठ करती बहुत नवनारी तैसे ये नई ठुराई है श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंज बिहारी करजोरी मोन होए दुबरे की रांधी खीर कहो कौन खाई है कुंज बिहारी कर जोर मौन होए डूबरी की रांधी खीर कहो कौन खाई है प्यारी अब क्यों हूं क्यों हूं आई है सुनी धुन मुरली बन बाजे हरि रास रचो हरि रास रचो सुन धुन मुरली बन बाजे कुंज कुंज ध्रुमबेली प्रफुल्लित मंडल कंचन मनन खच मन मंडल कंचन खचित श्री प्यारी जो प्यारे जो जिस महारस में निमग्न है सखियां उस रस का पान कर रही हैं।
उसी रस में अपने चित्त को लगाने की जो सामर्थ्य नहीं है। बड़े-बड़े ऋषि मुनियों की जहां सामर्थ्य नहीं है। अपने लोगों को उस परम पावन रास भूमि में बैठने का रास रस की रसास्वादन वृत्ति प्रकट होने का अवसर मिला है। यह बहुत दुर्लभ रस है। जान गए कि मैं ब्रह्म हूं तो क्या? वह तो पहले भी थे, अब भी है, आगे भी है। चर्चा उसकी भी होती है। लेकिन जानने मात्र से काम नहीं बना। उसका रसास्वादन यह कठिन विषय है। जानने वाले तो हो सकता है कि लाखों मिल जाए। पर उसका रसास्वादन रति आत्म क्रीड़ा आत्मवान ऐसे ही बहुत से भगवत अवतारों की चर्चाएं भगवत लीलाओं की चर्चाएं पर महा प्रेम रस में डूबे हुए श्री राधा बिहारी जी का पावन लीला विलास उसमें चित्त का लगना बहुत कठिन बात है साधारण भक्ति चलना या वैध सिद्धांत से चलना करोड़ों में लाखों में कोई ऐसे एक लेकिन जहां बड़े-बड़े देवता ऋषि भक्त भगवान के सुरत सखा निज जन इनका भी प्रवेश नहीं है।
उस महारस में अपने को आकर्षित किया गया। यह केवल गायन करने से और महान रसाचार्य जो रस को प्रकट करने के लिए रसिक महापुरुष जन हमें अपनी शरण में लिए उसी से प्राप्त होता है। यह रस अपना अधिकार कर लेता है साधक के हृदय में। किस समय कैसी दशा आती है उसको खुद पता नहीं। एक स्थिति होती है जिसमें कहीं करता नहीं रह जाता केवल होता है। स्वयं में दैन्य भाव की बाढ़ आ जाती है। कहीं किंचिन मात्र अहम नहीं कोई अहम की वृत्ति नहीं। लीला विलास प्रभु का स्वयं प्रकाशित हो जाता है।
उसमें कहीं किंचिन मात्र स्वबल नहीं, साधना का बल नहीं, तप का बल नहीं। किसी भी प्रकार का जब तक बल रहता है तब तक इन लीलाओं का गायन करने का भी सौभाग्य नहीं मिलता। अगर आप सौभाग्य से गायन करेंगे भी तो आप पकड़ नहीं पाएंगे निकल जाएंगे। पद के पद निकल जाएंगे। जब आपको ऐसा अनुभव होगा कि मैं तो गायन करने का भी अधिकारी नहीं हूं इस रस का। बड़े-बड़े महापुरुषों ने बड़ा गुप्त रस कहा है इसे। अभी हमें इसकी महिमा नहीं पता है इसलिए बहुत हल्के में ले लेते हैं। जैसे गायन हो रहा है तो हम अपने चित्त को श्रवण में ना लगाकर गायन में ना लगाकर अन्यत्र लगाते हैं।
पर यदि हम कृपा का आश्रय लेकर के गायन करते रहे तो सिद्ध एक एक अक्षर ऐसे मंत्र हैं जो प्रेम रस में डुबो देंगे। इनका अर्थ क्या है? हमारी आपकी क्या सामर्थ्य है? बड़े-बड़े महापुरुषों के लिए दुर्लभ रस है जो इसका अर्थ है जो इसका भाव है। वो शब्दार्थ नहीं है। ये इनका गढ़ार्थ है। रहस्यार्थ है। वह गढ़ वो रहस्य केवल आचार्य कृपा से जो सखियां हैं आचार्य रूप में उनकी कृपा से स्पित होता है। जो लिखा है वही देखा जा रहा है। जब देखा जा रहा है तो सामर्थ्य नहीं है। ना बोलने की सामर्थ्य रह जाती है ना कुछ सोचने की सामर्थ्य रह जाती है।
देखो स्वयं बिहारी जो महाराज इतने महामहिम सामर्थ्यशाली कर जोर मौन होए हमारे श्री जी के सामने हाथ जोड़कर के मौन होकर केवल दैन्यता दर्शाते हैं। दैन्यता का भाव केवल अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक परात्पर ईश्वर जहां हाथ जोड़कर मौन होकर केवल आज्ञा पालन के लिए दैन्य है वहां हमारी पहुंच होने वाली है। यदि हम अपने सौभाग्य को समझ पावे पक्का समझ लीजिए यहां अपना कोई बल काम नहीं करता। यहां केवल आचार्य कृपा इष्ट कृपा वही इष्ट है वही आचार्य है वही गुरुदेव है जैसे गायन हुआ सुनी धुन मुरली बन बाजे हरि रास रच्यो अब आपको वही वृंदावन की कुंज निकुंज नेत्रों में झलक रही है और बिहारी जो महाराज अपने अधों पर रस की मूल वंशी रस मूल मुरलिका आनंदिनी रस की मूल है हरिवंश महाप्रभु ने कहा क्योंकि स्वयं वही है इसलिए जानकर के वर्णन करते हैं चले राधिके सुजान तेरे हित सुख निधान रास रचो श्याम तट कलिंद नंदिनी निरतत युवती समूह राग रंग अति कुतुहू बाजत रस मूल मुरलिका अनंदिनी रस मूल रस जहां से प्रकट होता है जिसे वेद कहते हैं रसो वै रस स्वरूप है रसम हेवायं लंदी भवतु जो उस रस को प्राप्त कर लेता है वह सदैव आनंदमय हो जाता है।
आनंद स्वरूप हो जाता है। वह रस जिसे वेद कहते हैं वो प्रकट हो रहा है बंसी जी से। रस मूल मुरलिका अनंदिनी। अधों पर वंशी विराजमान होकर के जब लाल जो वादन करते हैं तो समस्त प्रेमी जन जो ब्रज सुंदरी जन है उनका चित्त अपहित हो जाता है और सब कुछ विस्मरण करके त्याग वैराग्य उपरति जिनकी पहुंच नहीं है यहां तक उससे भी उच्च कोटि की अवस्था है आई ब्रजना नार सुनत बंसी रो गृहपति बंधु बिसारे सीधे बंसी जी की कृपा से सीधे दर्शन मदन गोपाल मनोहर मनुषज ताप निवारे हृदय के मनुषज ताप का निवारण करने वाली बंशी ध्वनि सब कुछ भुला देने वाली बंसी ध्वनि श्री कृष्ण मिलन की प्रबल लालसा जगा देने वाली बंसी ध्वनि रास रस में आकर्षित करके प्रवेश करा देने वाली बंशी ध्वनि जिस रास रस में परम ज्ञान समुद्र भगवान शंकर एक रात्रि के लिए गोपी रूप धारण करके प्रवेश पाते हैं।
वह रास रस बंसी जी की कृपा से अपने जैसे अधमों को प्राप्त होने का अवसर है। यह जो पद है यह लीला है। इसमें जो लीला है वह बहुत विस्तृत है। जैसे मंत्र बहुत छोटा होता है पर सामर्थ्य इतनी होती है कि मंत्र के अधिष्ठात्र देवता को अधीन कर ले। जैसे अंकुश बहुत छोटा होता है पर मत वाले हाथी को अधीन कर ले। ऐसे शब्द यहां जो प्रयोग है श्री केमाल जी श्रीमद् चतुराशी जी और भी रस वाणियों में ये आपको देखने को शब्द लग रहा है पर ये सब रस समुद्र है चित्त वृत्ति में जब यह लीलाित होगी तो यही दशा हो जाएगी कर जोर भए रहे मौन बस हाथ हाथ जोड़े मौन होकर उसका रस आस्वादन कौन रस बाढ़ो जहां बोली बोई भारी हरि प्रिया दो नहीं है एक परम तत्व है वही निर्गुण निराकार के लिए प्रभु जैसी वो आराधना करते हैं वैसा ही अनुभव बन जाते हैं।
सगुण साकार के लिए अवतार लिए हुए प्रभु की जो लीला है वह स्पित होती है। लेकिन यह निर्गुण सगुण ब्रह्म ते न्यारो जो प्रिया प्रीतम का नित्य विलास है यह सबसे विलग है। जब आचार्यों की कृपा होगी तब समझ में आएगा। यह नित्य बिहारी हैं। यही से अवतार होता है। पर इनका विहार नित्य निरंतर चलता रहता है। अहो भाग्य ऐसी उपासना में चित्त जोड़ दिया गया। अब हमें चाहिए कि हमारे मन की जो चंचलता है, जो वृत्तियां है, हम में जितनी सामर्थ्य है, हम उसको समेट के दो बात में लगा दें।
कह वाणी हरिवंश की कह हरिवंश नाम या नाम जब चल रहा है या वाणी गायन चल रहा है गायन हो रहा है आपकी समझ में नहीं आ रहा तब भी ध्यान पूर्वक शब्दों को सुनिए ये शब्द हृदय में जाके निर्विकारता पैदा कर देंगे। इसी निर्विकारता से प्रिया प्रीतम के प्रेम रस का रसास्वादन होने की योग्यता आती है। तो ऐसा नहीं कि जो निर्विकार है वह प्रिया प्रीतम के प्रेम में प्राप्त लीलाओं का अनुभव कर ले। ऐसा नहीं है। पर यहां की निर्विकारता आचार्य कृपा से लीला में प्रवेश करा देती है।
ऐसा नहीं कोई जितेंद्र है निर्विकार है तो लीला में प्रवेश पा जाएगा। वो श्री अंग सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर लेगा। अगर ऐसा होता तो यह श्लोक ना गाया जाता कि य नारदा सु अगम्यम इनके लिए अगम्य क्यों कह दिया गया? ये तो ईश्वर कोटि के महापुरुष हैं। आचार्य कृपा से भगवत ईश्वर्य का विस्मरण अत्यंत प्रियता मेरे श्यामा श्याम यह कृपा से आता है। निर्विकार स्थिति में बहुत शीघ्र लीला का स्मूर्ण हो जाता है। इसलिए यही निर्विकार भी करेगी लीला। जैसे जैसे आप लीला का गायन करेंगे तो जो भारी द्वंद है सब अपने आप मिट जाएंगे।
जो बहुमान करे को मेरो के बहुमानत ना बाई जो अपमान करे को केू के अपमान नहीं लगताई। तो आपके ऊपर ये मान अपमान का प्रभाव क्यों नहीं पड़ रहा? सेवक जी कह रहे मेरे ऊपर नहीं पड़ रहा। जो बहुमान करे को मेरो बहुत मेरा कोई मान करे तो हमें कोई हर्ष नहीं होता और बहुत कोई अपमान कर दे तो हमें कोई शोक नहीं होता अर्थात मैं मान अपमान हर्ष शोक सुख दुख शत्रु मित्र लाभ हानि जय पराजय इन द्वंदों में नहीं हूं। अर्थात इनका प्रभाव मेरे ऊपर नहीं है। क्यों? ऐसा क्यों है कि आपके ऊपर इन द्वंदों का प्रभाव नहीं।
बोले श्री हरिवंश गिरा रस माझ मगन सब पाए। मैं हर समय वाणी जी में डूबा रहता हूं। हरिवंश गिरा श्रीमद् चतुराशी जी का मैं गायन और चिंतन करता रहता हूं। उसके प्रभाव से ना हमें मान का ना अपमान का ना लाभ का ना हानि का ना शोक का ना हर्ष का। इनका कोई भी भान ही नहीं होता। कोई मान करे या अपमान करे। श्री हरिवंश गिरा रस सागर ये रस समुद्र है। माझ माने बीच में हम अनुकूल प्रतिकूल में नहीं। जैसे नदी के दो किनारे होते हैं। कुल माने किनारा और मध्य में रस है और किनारे किनारे में अनुकूलता प्रतिकूलता लाभ हानि सुख दुख मान अपमान निंदा स्तुति तो इनके कुल में नहीं है हम मध्य में हैं।
रस में है तो ये किनारे द्वंद आते रहते हैं। उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ पाता। जो वाणी जी का निरंतर गायन और चिंतन श्रवण है। यह बहुत जल्दी प्रेम रस प्रकाशित करता है। यह गुरु कृपा से पता चलता है। पहले आज्ञा का पालन करने के लिए बिल्कुल तत्पर रहे। नियम पूर्वक गायन करें। बड़ा सौभाग्य है कि आप लोग वाणी गायन में बैठते हैं। इसी से श्री जी जाएगी। आप मानो यहां कृपा से सब कुछ हो जाता है। बहुत जल्दी प्रिया प्रीतम की लीलाएं स्पुरित होने लगती है। ये श्री सदगुरुदेव जी के वचन है।
जो रस सिद्ध महापुरुष हैं। ये उनके वचन है। वाणी गायन वाणी का चिंतन और वाणी की लीलाओं में प्रवेश ये वाणी ही जी करा देंगे। ये जैसे आपको सुनने को मिल रहा है अहो भाग्य है। ब्रह्म मुहूर्त की बेला और रस सिद्ध पदों का श्रवण प्रिया प्रीतम की चर्चा सिद्धांत की चर्चा अब तो हमारा मंगल है ही अब तो हमारा परम कल्याण है ही हमारे ऊपर प्रिया प्रीतम की असीम कृपा है सुनी धुन मुरली बन बाजे हरि रास रचो कुंज कुंज ध्रुम बेल प्रफुल्लित मंडल कंचन मनिन खच हरि रास रचो निरत जुग किशोर जुवति जन कैसी कृपा की वर्षा होती है निज जनों पर नृतत जुगल किशोर स्वामी नृत्य कर रहे हैं।
और उनके चरण आश्रित इसका पान कर रहे हैं। सोचो आप तो माया जनित नृत्य में राजी हैं। माया जनित हाव भाव नृत्य ने आपके चित्त को चुरा लेते और एकदम समाधान मानो हो गया हो समाधि में स्थित हो गए हो ऐसी दशा हो जाती है और यहां तो साक्षात प्रेम मूर्ति प्रिया प्रीतम अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी और रसास्वादन चरण दासियां कर रहे हैं और सरकार नृत्य कर रहे हैं। जिनकी चरण नख कांत प्रकट हो जाती है तो शिवादि महापुरुष तांडव करने लगते हैं। वह साक्षात बिहारी बिहारी नृत्य कर रहे हैं।
अद्भुत संगीत बज रहा है। सखियां रसास्वादन करती है इसका। ये ब्रह्मानंद में किंचिन मात्र नहीं है सुख। जिस सुख का रसास्वादन श्री धाम वृंदावन की कृपा से रसिक जनों की चरण धली के प्रताप से मिलता है वो कहीं भी नहीं समाधि में भी नहीं है। क्योंकि इन समाधियों की प्राप्ति श्रीपाद प्रबुद्धंद आदि बड़े-बड़े महापुरुषों को हुई। वह भी उनका त्याग करके वृंदावन प्रेम रस समाधि में स्थित हुए। निरतत जुगल किशोर जुवति जन मन मिल राग केदारो मच्यो श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंज बिहारी नीके आज प्यारो लाल नचो कुंज बिहारी नी के आ प्यारो लाल नचो सुनी धुन मुरली बन बाजी हरि रास रचो श्रीपाद बोधानंद जी महाराज कह रहे हैं ऐसी महा महिमामय रसमय रास भूमि की प्राप्ति यदि आपको हो गई है तो तेनाकार समस्त एव भगवत धर्मोप तेनाभुत कैसे बतावे श्री जी की कृपा की बाढ़ है और हमारी दुष्टता की दोनों की होड़ लगी हुई भी है।
वह हमें रस की तरफ खींच रहे हैं। हम विषय की तरफ जा रहे हैं। वह हमें बंधनों से मुक्त कर रहे हैं। हम स्वयं को बांधते जा रहे हैं। जबकि ऐसा सहयोग मिलने पर हमें मुक्त हो जाना चाहिए। पर एक तरफ हमारी दुष्टता की बाढ़ है और एक तरफ लाडली जी की कृपा की बाढ़ है। दोनों की होड़ चल रही। सच्ची मानिए हम हद किए जा रहे हैं। हमारा मन, हमारी इंद्रियां, हमारा चित्त प्रभु से विमुखता की तरफ और वो हमको अपनी तरफ घसीट रहे हैं। बस उनकी कृपा ही कृपा है। अगर उनकी कृपा ना हो तो सच्ची कहते हैं।
एक बार भी कोई राधा नहीं बोल सकता। ऐसा माया का दुरंत प्रभाव। एक कदम भी प्रभु की तरफ नहीं चल सकता। ऐसा आकर्षण माया का यदि हमारे ऊपर कृपा ना होती हम सबके ऊपर तो यह सौभाग्य ना मिलता। कितनी बड़ी वस्तु मिली है। अरे यहां हो गया साधन। जो वस्तु मिली है उसका अगर स्वाद करने स्वाद लेने लगो। गर्व करो इस बात का कि हमें कौन सी वस्तु मिली। एक एक शब्द जो है वह हृदय को विकल करता है कि कहां हमारी पहुंच थी यहां तक जैसे हम जानते नहीं हमको बड़ा कीमती हीरा मिल गया जब जहरी ने उसका कीमत बताई पर तब लगा हो भाग्य तो हम जानते नहीं थे कि हमें अनजाने में भी क्या मिल गया ऐसे गुरुदेव आचार्य जन महापुरुष जन जोहरी है हमें बताते हैं कि हमें हमें क्या कीमती वस्तु मिली?
यदि ये जहरी ना मिले तो साधारण कांच उठाकर के हीरे को फेंक दे। ऐसी हमारी बुद्धि है। है ऐसी ही है। पाए रतन चीनो नहीं दीनो करते डारी। ये माया श्री कृष्ण की मोहो सब संसार रतन को फेंक के कांच उठा लेना। यह हम लोगों के स्वभाव में है। पर वो तो जब जहरी बता देता है होश में यह बहुत कीमती वस्तु है जिसे तुम कांच के बदले में ले रहे हो। बहुत कीमती वस्तु है। देखो सुनो तुम्हें क्या मिला है? जहां बैठे हो तुम्हें क्या मिला है? इसका फल क्या होगा? कह रहे तेनाकार समस्त एव भगवत धर्मो तेनाभुतः सर्वस्मात पुरुषार्थ तोप परम कश्चित करस्थ कृता तेनाधा समस्त मुरधन पदम ब्रह्मादस्तम नमन त्या देहा धारे वसतो श्री वृंदावने निश्चयम बहुत दुर्लभ बात मिल गई।
ध्यान से सुनो। जिसको वृंदावन आने को मिल गया, वृंदावन कुछ दिन रहने को मिल गया, उसके तो भाग्य हैं ही। पर इस श्लोक में कह रहे हैं कि उसके महाभाग्य है जिनको वृंदावन का वास मिल गया और उसने निश्चय कर लिया कि मैं वृंदावन में ही मरूंगा। यहां तेनाकारी समस्त एव भगवत धर्मो तेनाता उसको जिसने निश्चय कर लिया है त्या देहांत मधन वसतो श्री वृंदावन निश्चयम मेरी देह का पात इसी वृंदावन में होगा दृढ़ निश्चय इससे प्रारब्ध बदल जाता है जैसे हमारे भाग्य में जन्म से लेकर मृत्यु तक का लिख लिख गया है।
आप अमुक जगह मरेंगे। प्रारब्ध में लिख गया। किसी के प्रारब्ध में धाम नाम रूप लीला का संयोग नहीं लिखा होता। ध्यान रखना। प्रारब्ध दो ही प्रकार का होता है। एक शुभ प्रारब्ध, एक अशुभ प्रारब्ध। शुभ प्रारब्ध पुण्यमय सुख प्रदान करने वाला, अशुभ प्रारब्ध, पाप में दुख प्रदान करने वाला। और वह सब प्रकृति के अंतर्गत होता है। परमात्म स्वरूप धाम नाम रूप लीलाएं कृपा से प्राप्त होता है। यह प्रारब्ध से नहीं प्राप्त होता है। श्री राधिका कृपा बिन सबके मनन अगम में यहां प्रवेश पाने में और अखंड वास में तो जिनको वृंदा विपिन है कृपा त नहीं की होए।
जब तक लाडली जी की कृपा नहीं होगा तो यह हृदय में ही नहीं आएगा कि मैं वास करूं। वास करने की तो बात जाने दो हृदय में नहीं आएगा अगर आपको वास मिल गया त्या देहांत मधन वसत श्री वृंदावन निश्चयम यह निश्चय कर लिया कि अब अपने शरीर का पात वृंदावन में करेंगे तो प्रारब्ध पलट गया जो प्रारब्ध लिखा था कि तुम्हें अमुक जगह जाकर मारेगा वह सब नष्ट हो जाएगा। इस संकल्प से नष्ट हो जाएगा। क्या प्राप्त होता है? जो देह त्याग पूर्वक वृंदावन का वास स्वीकार करता है उसे क्या प्राप्त होता है?
तो बोले समस्त एव भगवत धर्मे तेना भता भागवत धर्म की समस्त महिमा उसमें स्वयं प्रकाशित हो जाएगी। धाम वास मात्र से भागवत धर्म किसे कहते हैं? मन से, वचन से, कर्म से, इंद्रियों से, अहंकार से, अनेक जन्मों की स्वभाव से जो जो कर्म हो रहे हैं, वह सब परम पुरुष भगवान नारायण को समर्पित कर देना। निरंतर भगवत चिंतन करना। इसे भागवत धर्म कहते हैं। भगवत समर्पित कर्म और भगवत चिंतन स्वाभाविक वृंदावन धाम के वास की कृपा से जागृत हो जाएगा। श्रीपाद कह रहे हैं पर जिसने यह निर्णय ले लिया है कि अपने शरीर का त्याग वृंदावन में ही करूंगा आगे उसे बोले तेनाभता सर्वस्मात पुरुषार्थो परम कश्चित करस्त कृता उसके हाथ में ये चारों पुरुषार्थ और परम पुरुषार्थ ये पांच आ जाते हैं।
चार पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम मोक्ष पांचवा परम पुरुषार्थ प्रेम देव यह चीज वृंदावन की कृपा से श्रद्धा और विश्वास करो ये जो शास्त्र में लिखा है जो महापुरुष कह रहे हैं अक्षरशा सत्य है ये केवल लुभाने वाली फल स्तुति नहीं है कि किसी पाठ में राग पैदा करने के लिए अनुराग पैदा करने के लिए फल स्तुति लिख दी गई हो ऐसा नहीं जैसे फल स्तुति का स्वरूप होता है कि जो हम पाठ कर रहे हैं उसका क्या फल है। ऐसे लिख देने से हमारे हृदय में उस पाठ की रुचि पैदा होती है। इसके करने से इतना इतना मिलता है।
तो फल स्तुति रुचि वाली नहीं है। यह जो वास्तविक परम सत्य है वह वर्णन कर रहे हैं कि जिसने मरण पर्यंत वृंदावन का नियम ले लिया अखंड वास का उसके हृदय में समस्त भागवत धर्म का जागरण हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्राप्त हो जाते हैं और परम पुरुषार्थ उसके हाथ में आ जाता है। प्रेम तेनाधा समस्त मूर्धन पदम ब्रह्मादस्तम नमन और बड़े-बड़े देवताओं के सहित स्वयं ब्रह्मा जी उसके चरणों में नमस्कार करते हैं। ओ ब्रह्मादस्तम नमन उसको नमस्कार करते हैं जो अखंड धामवासी वृंदावन की रहनी से रह रहा है जिसमें समस्त भागवत धर्मों का जागरण हो गया है।
जो अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष और प्रेम पांचों पुरुषार्थ का अधिकारी हो गया है। उसे समस्त देवता और ब्रह्मा जी नमस्कार करते हैं। केवल यह नियम ले लिया कि आज जीवन वृंदावन वास करूंगा और इस देह को इस पावन भूमि पे धूल बन जाए समर्पित कर दूंगा। ये बहुत बड़ी मंगलमय बात बन गई है। जिसे आप लोग महत्व नहीं दे रहे हैं। बहुत बड़ी चीज मिल गई है। ज्ञान विज्ञान की बातें करते रहो। मन का आकर्षण देखो। वास्तविक ईमानदारी से देखो। ज्ञान विज्ञान की बातें करने से मन नहीं रुकता। निज सुख बिन मन हो कि थरा बिना भगवत सुख के मन स्थित नहीं होता।
और भगवत सुख ये कृपा से है। कोई बिरला ये बात समझ पाता है कि कृपा से यह गुण साधन ते नहीं होई। तुम्हारी कृपा पाओ कोई कोई बड़ी महिमा ये चारों पुरुषार्थ के लिए बड़े-बड़े लगे हुए हैं धर्म अर्थ काम मोक्ष के लिए यहां स्वाभाविक धाम वास्य तो कह रहे जिनका हृदय पवित्र होगा जो थोड़ा भागवतिक होंगे उनकी बात कह रहे होंगे श्रीपाद कह रहे नहीं उषमप हरि भक्त नाना दुर्ग निष्ठप्य धमम अधमम उषप हृदय कैसा है बोले उषर भूमि जैसा उषर भूमि में चाहे जितना खाद पानी लगा दो उसमें तण नहीं जामेगा उष वर्ष तण नहीं जामा नहीं जमता बोले हरि भक्ति के लिए उसका हृदय उष भूमि के समान है कि चाहे जितना समझाओ सिखाओ पढ़ाओ वो उष भूमि समझना ही नहीं चाहता मतलब अंकुरण ही नहीं होगा भक्ति का ऐसे हृदय वाला है दुर्मार्ग निष्ठ गंदे मार्ग की निष्ठा है उसके अंदर जैसे भक्ति निष्ठा नाम निष्ठा निष्ठा पूर्वक भक्ति कर रहा है निष्ठा पूर्वक नाम जप कर रहा है ऐसे वो कैसा है बोले दुर्मार्ग निष्ठा वो निष्ठा पूर्वक पाप आचरण करने वाला रहा है।
यह केवल धाम की ही कृपा की बात है। निष्ठा पूर्वक श्रीपाद कह रहे हैं नाना प्रकार से दुष्ट आचरण जो निष्ठा पूर्वक करता रहा जिसका हृदय उसर भूमि जैसा है। वृंदा विपिन मचिंत्यम प्रभाव सुनो मेरे वृंदावन का अचिंत प्रभाव ऐसे के भी हृदय में मुमाद प्रेमना प्रेम्माद पैदा कर देगा ये बात धाम की कृपा अद्भुत धाम की कृपा यहां फिरे स्वार्थ अपने भजन गहे फिरे बा और देश के बसत ही घटत भजन की बात वृंदावन में स्वार्थ उलट भजन होए जात यहां स्वार्थ के लिए जा रहे हो वृंदावन में भजन माना जाएगा दोष करो हम गुण ले सही सर्वा धमो दुर्लभ वस्तुकाक्षी वृंदा टवी मुज्जल भक्ति सार बीजम कदा प्राप्त भवा पूर्ण मैं निखिल दोषों की खान हूं।
मेरे में लेश मात्र गुण नहीं है। जितनी अधमता है वह सब हम में है। इसलिए मैं सर्वाधम हूं। पर मेरे हृदय में वृंदावन वास से एक आकांक्षा जो बड़ी दुर्लभ है वह जागृत हो चुकी है। प्रिया प्रीतम की उज्जवल प्रेम रसमई दासता मैं कब अपने लाडली लाल का अपने हाथ से श्रृंगार करूं। कब भोग लगाऊं? कब उनकी प्रतिपल परिचर्या करूं। यह सौभाग्य है। मुझे विश्वास है कि श्री धाम की रज मेरी इस कामना को पूर्ण कर देगी। वृंदावी मुज्जल भक्ति सार बीज कदा प्राप्त भवाम पूर्ण यह जो मेरे हृदय में कामना जागृत हुई है अहो भाग्य धन्य भाग्य उस हृदय का जिसके हृदय में प्रिया प्रीतम की सेवा की कामना जागृत हो गई है ये धाम की कृपा से भगवत प्रेमी महात्माओं की कृपा से सेवा भाव जागृत होता नहीं और सब लेकिन सेवा भाव जागृत खूब ज्ञान ज्ञान की नगरी से ही आए खूब ज्ञान बातचीत बहुत यह जो प्रिया प्रीतम के श्रींग की सेवा की भावना है यह बड़ी दुर्लभ है।
यदि आपको थोड़ी भी सेवा मिल चुकी है तो उसको गवाना नहीं। यही क्रम क्रम करके आपको पहुंचा देगी। लाल जी महाराज कहते हैं कि बहुत युगों से मैं साधना कर रहा हूं। प्यारी जो आपकी सेवा के लिए क्रम क्रम करी लाधे आज मुझे मिला है आपकी सेवा का अवसर। बिहारी जी महाराज कह मान जाओ तो जान जाओगे जान जाओगे तो निहाल हो जाओगे। यह जो प्रिया प्रीतम की वृंदावन में सेवा है जो आप जुगल सरकार विराजमान करके या राधा नाम विराजमान यह साक्षात सेवा है यही आपकी दिव्य सेवा में प्रवेश वृत्ति हो जाएगी करा देगी जो आप प्रगट सेवा कर रहे हैं यही आपको दिव्य सेवा में प्रवेश चिदानंद सेवा में प्रवेश करा देगी भाव इसका दोष करो हम चाहे जितने दोष हो हारना नहीं हम आपको हृदय की बात कहते हैं।
ऐसा कोई ना समझे कि चार दिन की साधना से दोष सब नष्ट हो जाते हैं और महात्मा हो जाता है। भ्रम में मत रहना। जिसके तुम हो उसी की माया बहुत ऊंचाई तक इसका प्रवेश है। जहां गर्व करोगे वहीं तुम्हें माया अपना प्रभाव दिखा देगी। यहां से जो निकल पाया है वह बहुत दैन्य होकर निकल पाया है। दन्य के लिए माया मां हो जाती है। थोड़ा भी अहम वो माया के द्वारा जरूर बाधित होगा। बाधा उसके जीवन में पहुंच जाएगी। अहम बहुत कड़वा है। इसी से सब जीवित हैं। इसी अहम से इसी अहम में सब सुखी अपने को मान रहे हैं।
गर्व यही अहम जब प्रभु के चरणों में लगेगा तब सुख का परिचय मिलेगा। इसलिए सुख का परिचय नहीं मिलता। कल एक कहीं वो ज्ञान की बात कह रहे थे कि जब सब ब्रह्म ही है यह बात सत्य है तो फिर वो बहुत संतों की अवहेलना निंदा कर रहे थे सब संत तब लग रहा था कि इसकी दुर्गति पक्की है ये कौन से ज्ञान के भ्रम में भटक रहा है कभी-कभी अज्ञान को हम ज्ञान समझ लेते जैसे स्वप्न में देखा कि हम सो रहे थे अब जग गए हैं। वह स्वप्न में देख रहा है और अब मैं अमुक चेष्टा कर रहा हूं। लेकिन वह स्वप्न में ही देख रहा है।
वो अभी जगा नहीं और जब जगेगा तब उसे समझ में आएगा कि वह भी स्वप्न था। ऐसे ही अज्ञान है। किसी की भी निंदा आदि का दोष अंदर होना अज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान में जब सर्वत्र ब्रह्म है तो निंदा स्तुति का कोई और वही ब्रह्म मैं हूं तो निंदा स्तुति का कोई स्थान ही नहीं। बिना गुरु कृपा के वेदांत पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता। ये महान वेदांती महापुरुष है जिनके वचन सुन रहे हो। कह रहे हैं यदि आप दोष करो वो तो अहम कह रहे हैं मैं में महापुरुष अपने को ले बात करते हैं तो भी आप चिंता मत करना यदि गुण लेश हीना लेश मात्र भी गुण नहीं है तुम में तो चिंता मत करो सर्वाधमो यदि सब अधमों में भी आप बड़े अधम है तो भी आप चिंता मत करो दुर्लभ वस्तु काशी तुम्हारे हृदय में दुर्लभ प्रेम रस की आकांक्षा पैदा कर देगा।
वृंदा टवी मुज्जल भक्ति सार श्री धाम वृंदावन आओ वृंदावन का सेवन करो तो उज्जवल प्रेम लक्षणा भक्ति का प्रादुर्भाव हो जाएगा। भवाम पूर्ण आप पूर्ण पुरुष हो जाएंगे। आप पूर्ण हो जाएंगे। आप तृप्त हो जाएंगे। जन्म जन्म की प्यास आपकी मिट जाएगी। जब भगवान सर्वत्र हैं तो हमको क्यों दर्शन नहीं देते? बहुत मंगलमय ऐसी वृत्ति आ जाए जिसके अंदर कि जब है कहा जा रहा है रोज सुना जा रहा है वासुदेवा सर्वमति भगवान वासुदेव ही सब रूप में है श्री कृष्ण स्वरूप में विराजमान है तो मेरे को क्यों नहीं दिखाई देते है तो सर्वत्र बहुत सुंदर बात है अगर आप इसे समझ ले ध्यान से सुनना भगवान ने जो यह श्लोक कहा यथामा प्रपदते ताथ भजाम्यम मम वर्तमान वर्तते मनुष्य पार्थ सर्वसा भगवान यहां कह रहे हैं कि मैं संसार में साक्षात विराजमान हूं।
माया से ढका हुआ नहीं। साक्षात ज्यों का त्यों ये सब भगवान बने हुए हैं। जैसे कुम्हार निर्माण करता है पात्रों का तो कुम्हार अलग, चाक अलग, पात्र जिससे बने वो धातु अलग। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां बनाने वाले भगवान, बनने वाले भगवान और मिटने वाले भी भगवान। वो अपने आप से अपने आप में लीन हो जाते हैं। अपने आप से अपने आप का विस्तार कर देते हैं। तो मुझे क्यों नहीं दिखाई दे रहे? जब साक्षात भगवान है बहुत सुंदर है। मगर समझ जाओगे तो भी आनंद आ जाएगा। मुझे क्यों नहीं दिखाई दे रहे?
तो कह रहे भगवान के रूप में तुम देखना कहां चाहते हो? अपने को शरीर मान करके अपने लिए जो जो चाहिए वह वह देख रहे तो भगवान उसी रूप में आपके पास है। आपने भगवान को भगवान के रूप में कब देखना चाहा? यह प्रश्न अपने अंदर फिर उत्तर तुम्हें मिल जाएगा। इसीलिए नहीं दिखाई देते। सर्वत्र भगवान है तो मुझे क्यों नहीं दिखाई दे रहे? बोले सब कुछ स्वयं भगवान बने हैं। पर हमने अपने को स्त्री मानकर, पुरुष मानकर, शरीर मानकर अपने लिए जो प्रिय है, भोग प्रिय है, वस्तु प्रिय है, पद प्रिय है, सामान जो जो तो मेरे भगवान वही वही आपके सामने रूप रख के आ रहे हैं।
आप देख रहे हैं। मुझे घड़ी की आवश्यकता है। तो ये घड़ी साक्षात श्री कृष्ण है। ना यह पहले थी ना बाद में रहेगी। वर्तमान में वही है जो पहले थे और बाद में रहेंगे। बीच में भी वही है। पक्का उनकी दर्शन वृत्ति तुम्हारे अंदर नहीं है। तुम्हारे अंदर है वस्तु व्यक्ति स्थान के रूप की सानिध्य की। तो तुम्हारे पास जो जो वस्तु व्यक्ति स्थान है वो स्वयं श्री कृष्ण बने हुए हैं। पर तुमने कभी श्री कृष्ण नहीं माना। तुमने पत्नी माना, पति माना, पुत्र माना, वस्तु माना, पदार्थ माना, घर माना, दृश्य माना।
इसीलिए भगवान तुम्हारे नेत्रों में रहते हुए भी दिखाई नहीं दे रहे। हम भगवान के द्वारा विस्तृत किए हुए अपने स्वरूप को भगवान ने अपने स्वरूप को हम उसे नहीं देखना चाहते। हम अपनी चाह वाली वस्तु चाहते हैं। जो चाह करोगे हरि उसी रूप में आपको जैसे आप जब किसी महापुरुष का प्रभाव सुनते हैं तो लगता है ऐसा कैसे हो सकता है? तो आपको बताएं यह सब कुछ भगवान बने हुए जे भी तन्मय होकर सोचता है जितनी तन्मय कि अब इसकी जगह यह होना चाहिए तो भगवान ये था माम प्रपद्यते ता भजाम्यम भगवान उसी समय उसी रूप का त्याग करके वो रूप धारण कर लेते हैं जो वो संकल्प किया अब आपको दिखाई दे रहा है अभी तो माइक रखा था और अभी यहां अमुक वस्तु आ गई ये तो बड़ा चमत्कार ये चमत्कार नहीं है ये तन्मयता है।
आप में कौन सी सिद्धि है? लेकिन आप जो चाह रहे हैं भगवान वही रूप रख रहे हैं। बहुत सुंदर बात है। ये शायद आप समझ पाए। जैसे बालक खिलौना चाहता है तो माता-पिता यद्यपि उसे गोद में बैठाना चाहते हैं पर हटकर उसे खिलौना दे देते हैं। ऐसे ही परम दयालु भगवान यद्यपि अपने को प्रदान करने के लिए तुम्हें मानव जन्म दिया पर तुम्हें खिलौना चाहिए। विविध प्रकार के खेल खेलने के लिए तो उनहीं खिलौनों के रूप में श्री भगवान आ जाते हैं। हे आज तुम जिनसे जो बर्ताव कर रहे हो सीधे भगवान से कर रहे हो किसी और से नहीं कर रहे।
अगर हमारे अंदर चाह मिट जाए तो भगवान कभी भी भोग और वस्तु के रूप में तुम्हारे सामने नहीं बनावटी रूप नहीं धारण करेंगे। सच्चिदानंद रूप से प्रकाशित हो जाएंगे। गोस्वामी जी ने इसी बात को दोहे में कहा जा ना चाह कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसहु निरंत तास सुर सोरा उर निज गेह जिसे कभी कुछ नहीं चाहिए उसके हृदय में निरंतर भगवान का वास होता है गुप्त रूप से नहीं प्रकट रूप से तो जिधर देखता है उसे जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी भगवान बड़े कृपालु हैं। जो भगवान पर श्रद्धा रखते हैं, वह तो कृपा का अनुभव करते हैं।
पर जो भगवान की निंदा करते हैं। भगवान उन पर वैसे ही कृपा करते हैं जैसे श्रद्धा रखने वाले पर कृपा करते हैं। जीव का दुर्भाग्य है कि वह भगवान के आकर्षण से रहित होकर के भोगों के आकर्षण में है। तो भगवान भोग रूप बनकर के हैं। क्योंकि जब वासुदेवा सर्वम सिद्धांत है वैसे परम सत्य सिद्धांत वासना वासुदेवस वासितम भत्र सर्वभूत निवासोस्म वासुदेव नमोस्तुते जीव का दुर्भाग्य है कि वो इच्छा कर रहा है। अगर इच्छा भोगों की त्याग दे तो अभी सब भगवान ही भगवान बने हुए हैं।
यह अनुभव में आ जाए। सच्ची बात और वो जीवन मुक्त हो जाए। भगवान में आकर्षण भगवत भाव से हो जाए तो यही भगवान बने। अनुभव में आ जाएगा। जब भगवान में आकर्षण भोग भाव से हो रहा है तो भगवान भोग रूप से आ रहे हैं। व्यक्ति रूप से आ रहे हैं। पदार्थ रूप से आ रहे हैं। राग द्वेष की वृत्ति तो भगवान में राग द्वेष की वृत्ति हम कर रहे हैं। ये भगवान ही है चराचर जगत। जब भक्त भगवान की तरमता में भूल जाता है सब कुछ तो भगवान सब कुछ भूल करके वैसा ही प्यार उससे करते हैं। जैसे विदुरानी जी भगवान के आकर्षण में भूल गई तो भगवान भी विदुरानी के प्रेम आकर्षण में भूल गए।
विदुरानी जी छिलका खवा रहे। भगवान छिलका पा रहे हैं। यथाम प्रपदते ता भजाम आस्तिक से आस्तिक व्यक्ति पर जैसे भगवान स्नेह कृपा दुलार करते हैं ऐसे नास्तिक से नास्तिक पर भी करते हैं। ऐसा नहीं है कि नास्तिक भस्म हो जाएगा। वो पृथ्वी में ही रहेगा। वायु उसको मिलेगी। आकाश उसको अवकाश देगा। ये सब भगवान की व्यवस्था और कितने कृपालु हैं। अगर जीव शरीरा अभिमानी ना होकर के भगवान के आकर्षण में आ जाए तो अभी उसको परमानंद की प्राप्ति हो जाए। ये जो सत्संग हो रहा है आकर्षण पैदा करता है भगवान की तरफ।
जब भगवान ने बताया मुझे जिस भाव से स्वीकार किया जाता है मैं उसी भाव से उसके अनुभव में आता हूं। यथामा प्रपदते ता भजाम्यम ध्यान रखना आज आप पुत्र भाव पत्नी भाव संसार भाव तो भगवान ये अनुभव करा रहे हैं संसार भाव और अभी यह भाव अंदर से निकल जाए भजन और सत्संग के प्रभाव से भगवत भाव आ जाए तो तुम पत्नी में देखोगे मुस्कुराते हुए श्री कृष्ण तुम पुत्र में देखोगे मुस्कुराते हुए श्री कृष्ण जैसे नामदेव जी ने कुत्ते में देखा भगवान विट्ठल भूत में देखा भगवान विट्ठल तो ये क्यों ऐसे करुणामय भगवान का लोग आश्रय क्यों नहीं ले पा रहे?
जब भगवान इतने कृपालु है कि नास्तिक से नास्तिक पर भी कृपा करते हैं तो लोग भगवान का भजन क्यों नहीं करते? अनन्य क्यों नहीं हो जाते भगवान श्री कृष्ण के? निरंतर भगवान श्री कृष्ण की आराधना क्यों नहीं करते? क्यों भटक रहे हैं? जब इतने कृपालु भगवान हैं तो सब कोई क्यों नहीं भजन करता? तो भगवान उत्तर दे रहे स्वयं काक्षता कर्मणा सिद्धिम यज देवता छिप मानुष लोके सिद्ध भवती कर्मजा ये चाह भटका रही है ध्यान रखना का कामना चाह बस ध्यान दीजिए परमार्थ भगवत स्वरूप भ्रम स्वरूप माया ब्रह्म स्वरूप माया के मार्ग में चल रहे हैं।
इसकी पहचान चार एक शब्द में अभी आप माया के मार्ग में हैं। पहचान चाह किसकी? भोगों की। शरीर सुख के नाना प्रकार के लौकिक चाह तो आप माया पथ के पथिक हैं। आकांक्षा आकांक्षा परमार्थ का पथिक चाह दोनों में चाह चाह श्री भगवान के भजन की चाह भगवान के दर्शन की चाह संसार से मुक्त हो जाने की चाह प्रिया प्रीतम की श्री अंग सेवा की दोनों में चाह है ध्यान रखना एक चाह परम दुर्लभ परमार्थ की और एक चाह जिसमें अनंत जीव फंसे हुए प्रवाहित होते चले जा रहे हैं। उसी के बाद भगवान कह रहे कि मेरी शरण में क्यों नहीं हो पाता?
मैं इतना करुणामय हूं फिर भी मेरी शरण में क्यों नहीं हो पाता? काक्षता करणाम सिद्धिम यजते देवता। यह कामना करके सोचते हैं कि यह कर्म कर लूं तो मुझे यह सिद्धि प्राप्त हो जाएगी। यह फल प्राप्त हो जाएगा। इसीलिए वह देवताओं की आराधना करते हैं क्योंकि इस मनुष्य लोक में कर्मों से जल्दी फल मिल जाएगा, सिद्धि मिल जाएगी। ऐसा उनको भाव है। इसलिए मेरी शरण में नहीं होते। भाव का कर्मणा सिद्ध यजती देवता मनुष्य में करने की शक्ति है ध्यान रखना यही प्रभु का नहीं होने देती बड़ा सूक्ष्म विषय है ये अगर समझ पाओ कुछ बातें होती है जो एकदम हृदय पर शब्द नहीं मिलता करने की शक्ति को होने में आ जाए।
यह गुरुदेव कराते हैं। करने की शक्ति में हम संबंध बनाते चले जा रहे हैं। क्रियाएं करते चले जा रहे हैं। शुभ अशुभ क्रियाएं होती चली जा रही। फंसते चले जा रहे हैं और होने की गुरुदेव की कृपा शक्ति तो समर्पित होते चले जा रहे हैं। ये जो करने की शक्ति है इसमें नवीन कर्म हो रहे हैं और मनुष्य के अंतःकरण में दृढ़ बात बैठ गई है कि मैं यह करूंगा तो यह फल मिल जाएगा। यह करूंगा तो यह फल मिल जाएगा। वह सांसारिक वस्तुओं की चाह रखता है। इसलिए कर्मों पर विश्वास रखता है।
यह कर्म करूंगा तो यह फल मिल जाएगा। अगर कहीं भगवान की भी बात आती है प्राप्ति की तो उसको भी यही बात आती कि जैसे कर्मों से हर फल मिल जाता है ऐसे कर्मों से भगवान भी मिल जाते हैं। नाशवान पदार्थ की कामना और नाशवान शरीर से किया हुआ कर्म यह तो हो सकता है। लेकिन नाशवान शरीर से किया हुआ कर्म तुम्हें भगवत प्राप्ति करा दे। ये नहीं हो सकता है क्योंकि वह आदि अंत वाला अनंत को कैसे प्राप्त करा लेगा। बहुत ध्यान देने की बात है। एक देश शरीर परिवर्तनशील शरीर और सीमित कर्म अभी प्रारंभ हुआ कुछ समय नष्ट हो जाता है।
भगवान कर्म जन्य नहीं है कि हम कर्म करके भगवान को प्राप्त कर लेंगे। भगवान अपरिवर्तनशील नित्य परिपूर्ण इसलिए भगवत प्राप्ति में कर्म करते जब हार जाता है और प्रभु का हो जाता है तो भगवत प्राप्ति हो जाती है। अब कितने जन्म व्यतीत हो गए अभी तक हारे नहीं। अरे अब हाथ उठाकर कहो मैं हार गया गोविंद अब स्वीकार कर लो। पर यह देहाभिमानी हारता नहीं। बस यही समस्या है। भगवान कह रहे यजती देवता अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए देवताओं का यजन करते मेरी शरण में नहीं आ पाते भगवान सरलता से समझ लीजिए पिता के समान है।
देवता दुकानदार है। जैसे दुकानदार के पास वस्तु लेने जाओ जरा हमको ये मीठा देना कितना कितना दें? बोले भूख लगी भरपेट पवा दो। हां तो कितना पाओगे? लगभग एक किलो पाएंगे तो ₹500 निकालो। नहीं रुपया तो नहीं। चल बाहर। ठीक है। पिता के पास गए। भूख लगी है यह पवा है तो वहां यह नहीं पूछेगा कि पैसा निकालो क्योंकि बेटा है ऐसे इसीलिए हम कभी-कभी विनोद में कहा कि बड़े ही बच्चे हो तुम भगवान के पास जा कहते हो 11000 का भोग लगा देंगे हमारा काम कर दो अरे ऐसा कैसे तुम सोचते हो भगवान के चरणों में महालक्ष्मी उनके श्री चरणों को सहलाते हुए हृदय से लगाते रहती है उन प्रभु को तुम कुछ चंद रुपए देकर करके घस देकर काम कराना चाहते हो।
अरे अपने पिता अपने स्वामी यदि मांग ही आई है तो सीधे मांगो ना। जैसे बालक अपने पिता से हटकर के मांगता है। उसको उचित लगेगा दे देता नहीं झिड़क देता है। नहीं देंगे। तुम्हारे गंदे विचार हैं। तुम्हें पैसा देंगे। गंदगी में खर्चा कर दोगे। नहीं देंगे। भगवान पिता है, देवता दुकानदार हैं। पिता से अधिकार पूर्वक मांगा जाता है और दुकान में पैसे देकर लिया जाता है। दुकानदार को जैसे पैसे दिया जाता है। ऐसे देवताओं से काम कराने के लिए आपको कर्म करना होगा। उसका सांगोपांग तब वो देवता तुम्हारे कर्म के अनुसार वो फल प्रदान करेगा।
पर भगवान को ऐसी जरूरत नहीं है। भगवान को केवल अपनापन मानने की जरूरत है। प्रभु मेरे बस इतनी बात है। पर इसमें दूसरा कोई नहीं होना चाहिए। तो अभी आपको परम लाभ मिल जाए। इसीलिए गोस्वामी जी ने कहा बिगड़ी जन्म अनेक सुधरे आज होई राम को मेरे प्रभु मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई यह लानी है सिद्धि भगवत प्राप्ति के लिए इसमें तुम्हारा कोई पसीना चुहाना काम में नहीं आएगा। वह तो हारने के काम में आएगा। लगे रहो। फिर जब हार जाना कि नाथ मैं हार गया तब कहेंगे मेरा हो जा।
बस यहीं से परमार्थ का दिव्य स्वरूप प्रकट होता है भक्ति मार्ग में। दूसरी बात दुकानदार से कहो कि आप चाकू दे दीजिए। पैसा दीजिए, चाकू ले लीजिए। लेकिन पिता से कहिए चाकू दे दीजिए। तो कहेगा किस काम के लिए क्या काम करना है पहले बोलिए आवश्यकता क्या है अगर आप आवश्यकता सिद्ध नहीं कर पाए तो आपको नहीं देगा लेकिन दुकानदार आवश्यकता नहीं पूछेगा आपको चाकू दे देगा आप अहित कर लो अपना वो तुम जानो ऐसे देवता है हमारे भगवान ऐसे नहीं है मांगोगे अगर आवश्यकता सिद्ध होती है तो ठीक है अगर उनको लगता है कि दुख भोग कर ये हमारी तरफ बढ़ेगा तो नहीं देंगे भोग दुख और मेरी तरफ बढ़ और अपना परम कल्याण कल्याण कर लेकिन देवता ऐसा नहीं अगर आपने सकाम अनुष्ठान
किया है तो आपका हित हो वही तो इससे मतलब नहीं वो वस्तु आपको दे देंगे जैसे दुकानदार दे देता है पिता सदैव अपने बालक का हित चाहता है ऐसे ही भगवान सदैव अपने शरण में आए हुए का हित चाहते हैं हे बहुत कृपालु है अगर उनसे मांगो भी तो उनके ऊपर छोड़ दो जैसा आप चाहो वैसा करो प्रभु छिपम ही मानुष लोके सिद्ध भवती कर्मजा ये जितनी भोग भूमियां हैं जितने भोग के लोक हैं जितनी भोग वस्तुएं हैं मनुष्य चाहता है मैं कर्म करके इनहीं भोगों को भोगू कृपा निधान भगवान ऐसा नहीं होने देते तुम्हें मनुष्य शरीर मिला है मेरी प्राप्ति के लिए जीवन मुक्त होने के लिए तुम फिर फंसने वाली बात मांगते हो इसीलिए भगवान जल्दी भोग लोगों की कामनाओं की बात नहीं सुनते तो लोग क्या करते हैं?
भगवान का आश्रय ना लेकर देवताओं का आश्रय ले लेते क्योंकि उनको इससे कोई मतलब नहीं कि तुम्हारा कल्याण होगा कि नहीं होगा। उसके अनुष्ठान करो और वह तुम्हें फल प्रदान कर देगा। कर्म संगिस जायते। इन सबके दिमाग में बैठ गया कि यह करूंगा तो इससे यह फल प्राप्त होगा और उस फल को भोगूंगा। मैं सुखी हो जाऊंगा। ऐसा नहीं होता है। चाहे जितना आपको वैभव मिल जाए, चाहे जो पद मिल जाए, सुखी नहीं हो सकते, सुखी तभी होगे जब मन को सच्चिदानंद में लगा दोगे। इसके अलावा और कोई सुख का उपाय नहीं है।
यह कई बार चर्चा में हो चुका है। मन विश्राम तभी पाएगा जब सच्चिदानंद प्रभु में जुड़ेगा। यह प्रकृति में कभी विश्राम प्राप्त ही नहीं कर सकता। तो यह जो लोग कर्मों के द्वारा प्राप्त होने वाले फल देवताओं की आराधना के द्वारा प्राप्त होने वाले नाशवान फल हैं ये इसी में आसक्त रहते हैं। भगवान की तरफ नहीं बढ़ते हैं। भगवान ने कहा कि यदि कर्म ही करना है तो अपनी जो धर्म सीमा के अंतर्गत है वह कर्म करो। मेरे को समर्पित कर दो तो इससे भी तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। चातुर्व मयाष्टम गुण कर्म विभाग तस कर्तारमा विध करतार मयम नमाम करण लिम्पती नमे कर्म फलेहा इमाम यो जानातिाती कर्मभ नते भगवान कह रहे मेरे द्वारा ये चारों वर्ण की व्यवस्था की गई है।
पूर्व जन्म के कर्मु में इन चारों वर्णों में जन्म देता हूं। यह मेरे द्वारा की गई व्यवस्था है। कलयुग में नहीं चलेगी। कलिकाल इसे भंग कर देगा। क्षीण कर देगा। युग धर्म का प्रभाव होता है। चारों वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है। पूर्व जन्म के तप, भजन, साधन, कर्म के अनुसार उसका जन्म वर्ण व्यवस्था में होता है। सृष्टि का रचनाकार आदि्ता मैं हूं क्योंकि मेरे से ब्रह्मा और ब्रह्मा से मन शत्र रूपा आदि सब सृष्टि का विस्तार तो आदिता मैं हूं मैंने रचा है ये चार वर्ण मुझ अविनाशी परमेश्वर को इन सब का प्रादुर्भाव करने वाला होने पर भी अकर्ता ही जान कारण कि कर्म फल में मेरी कोई आसक्ति नहीं मुझे कभी कोई कर्म बांध नहीं सकता है।
इस प्रकार जो तत्व से मुझे जान लेता है वह कर्मों में कभी नहीं बंधता है। यह पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार वर्ण में प्रादुर्भाव होता है जीव का। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण इन तीनों गुणों से ही पूरी सृष्टि रची गई है। तो इन गुणों की प्रवृत्ति के अनुसार कर्म बनते हैं। तो जिसकी बहुत सात्विक प्रवृत्ति भगवत आराधना पूर्व में हुई वो प्रथम वर्ण में जिसकी रजोगुण सतोगुण मिश्रित वृत्तियां हुई वो द्वितीय वर्ण में जिसके रज अधिक और तम मिश्रित वो तृतीय वर्ण में और जिसकी तमय वृत्ति वो चतुर्थ वर्ण में मेरे द्वारा रची गई है।
कर्म के अनुसार पूर्व जन्म के तप साधन के अनुसार अगर कोई अपने धर्म के अनुसार बर्ताव करे। पूर्व में महान बड़े-बड़े भागवत में अपने धर्मों को नहीं छोड़ा। अपने धर्म के अनुसार उन्होंने सिद्धि प्राप्त की है। अब कलिकाल का ऐसा प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है कि धर्म की व्यवस्थाएं हैं सब भंग होती चली जा रही है। यह सनातन है। ये सनातन पद्धति है। पुरातन पद्धति है। धर्म व्यवस्था उसको अन्य भाव में ना ले जाए। दुष्ट भाव में ना ले जाए। बड़े पवित्र भाव है। श्री भगवान कह रहे हैं कि इस विभाग को मैंने इस कर्म के अनुसार किया है।
अगर छोटा भाई बड़े भाई के चरणों में झुकता है तो एक प्रियता होती है। वो एक मर्यादा का पालन कर रहा है। ना कि बड़ा भाई इतना महान हो गया कि छोटा झोंक रहा है। नहीं एक धर्म की व्यवस्था है कि बड़े भाई को भगवत स्वरूप मान करके चरण छुआ जाता है। उसकी आज्ञा में स्वयं भगवान जब लीला करते तो अवतार लेते तो देखिए कि अगर लक्ष्मण जी छोटे भाई बने तो कैसे अनुशासन में वही जब बलराम जी रूप में बड़े भाई बने तो चरण छू के भगवान बात करते हैं कि दादा दाऊ दादा इसमें अर्जुन का कोई दोष नहीं है।
हमें लगता है कि इसमें सुभद्रा जी की ही अनुमति है। ऐसा और जब लक्ष्मण रूप में होते हैं तो भगवान की भृकुट के भगवान स्वयं लीला करके दिखाते हैं। पर कलिकाल की ऐसी मलिनता बढ़ती जा रही है। धर्म का ह्रास होता जा रहा है। कोई धर्म की व्यवस्था को नहीं समझता है। बिना धर्म की व्यवस्था के सत्कर्म होना बड़ा असंभव। बड़ा असंभव। इसीलिए सब बहते चले जा रहे हैं। कोई मतलब नहीं। केवल एक विषय रह गया। अपनी इंद्रियों को तृप्त कर ले। उदर पोषण हो जाए बढ़िया कपड़ा लत्ता पहन लो ले मनमानी भोग भोग ले बस इतना रह गया इसीलिए कोई परम पद मोक्ष जिज्ञासा भगवत भाव बहुत कम रह गए श्री भगवान कह रहे हैं कि मेरे इस रहस्य को कोई जान जाए कि जैसे मैं कर्म करता हूं लेकिन कोई फल की आकांक्षा नहीं कोई कर्म मुझे बांध नहीं सकता ऐसे ही तुम्हें कोई कर्म नहीं बांध सकेगा यदि अपने धर्म के अनुसार आचरण करते हुए उसे भगवत भाव में समर्पित कर दे एवं जत्वा कृतम कर्म पूर्व मुमक्ष भी कुर कर्म तस्मात पूर्वतरम कृतम पूर्व काल में मुमुक्षुओं ने इसी प्रकार जानकर कर्म किए हैं।
इसलिए अर्जुन तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही उन्हीं की तरह कर। मुमुक्षु माने होता है मेरा कल्याण हो जाए। मैं मुक्त हो जाऊं। यह हजारों जन्मों की पवित्र साधना के बाद उत्पन्न होता है। इसीलिए यह किसी के हृदय में जल्दी नहीं उत्पन्न होता। भारी व्याकुलता कि मैं मुक्त हो जाऊं। बहुत कठिन है। जब तक संसार के किसी भी भोग में राजी हो तो मुमुक्षता नहीं जागृत होगी। कहीं राजी नहीं है। अब मुझे मुक्त होना है। जैसे बच्चा किसी भी खेल में नहीं खेल रहा।
पर रोना ही रोना है। तो मां उसे गोद में उठा लेगी। मुमुक्षता अब मैं मुक्त होना चाहता हूं। कौन मुक्त होना चाहता है? बिरला कोई ये मुमुक्षता ही बड़ी दुर्लभ है। मोक्ष और भगवत प्राप्ति। मुमुक्षता ही मैं भगवत प्राप्ति करना चाहता हूं। ऊब गया संसार से नहीं उबा। वृद्ध शरीर हो गए। फिर भी नहीं उबागा मृत्यु नजदीक आ रही फिर भी नहीं उबा आखरी श्वास तक ऊब जाता तो भगवान की प्राप्ति हो जाती आखरी शस में राधा बोल दे भगवत प्राप्ति हो जाएगी अभी रास्ते में एक श्लोक लिखा किसी विज्ञ ने दिखाया ऐसे लिखा भगवान शिव पार्वती जिसे कहते हैं जो राधा राधा कह के पूजन करता है राधा राधा कह के दंडवत करता है अभी दिखाया था श्लोक बोले छोटी सी पूजा वस्तु है राधा राधा राधा के बहुत बड़ी हो गई।
हरि उससे प्रसन्न हो गए। कितना सुंदर हमको मिला है राधा नाम। भगवान अर्जुन को कहते हैं कि मुमुक्षता मैं मुक्त होना चाहता हूं। तो कैसे मुक्त होगे? तो कहते जो तुम्हारे बड़े महापुरुष जिस मार्ग में गए उसी में चलना। पूर्वज माने बड़े महापुरुष जो गए हैं। महाजनो गन स्वप पंथा महापुरुष जिसमें गए। आज सब अपने नए पंथ का निर्माण हो रहा है। पहले ऐसा नहीं होता था। जिस मार्ग में गुरुजन जा रहे हैं उनहीं के पद चिन्हों पर चलना। मनमानी आज मनमानी अधिक मात्रा में कोई महापुरुष बिरला ही आचार्य परंपरा की महिमा को लेकर के चलते हैं।
नहीं तो अपने मन के अनुसार मन के अनुसार कभी परमार्थ नहीं होता। परमार्थ के अनुसार मन बनाया जाता है। सिद्ध बनने के लिए सिद्धों के अनुसार चलना होता है। तब सिद्ध होता है। यहां मन मानी अधिक हो रहा है। गुरु मानी शास्त्र मानी बहुत कम। अपने कर्तव्यों का जो हमारे पूर्वजों ने महापुरुषों ने किया वैसे करोगे तो आप मुक्त हो जाओगे। आपका कल्याण हो जाएगा। अन्यथा बंधन ही है। आप कर रहे हो मुक्त होने के लिए लेकिन मन माने तो बंधन ही है। जैसे पीछे भगवान ने उदाहरण किया था जनकादि आदि का विवन का नाम लिया मनु का इच्छद का भगवान कह रहे हैं मुमुक्ष को जो संसार से मुक्त होना चाहता है।
बहुत ध्यान देने का विषय कह रहे हैं। उसे महापुरुषों का अनुगमन करना चाहिए जो आचार्य परंपरा से है। यह परंपरा इसीलिए बनी हुई है कि हमें कोई भूल चूक नहीं होगी। मनमानी से हम अपने मन को ना जोड़े। हम आचार्य परंपरा से जोड़े। आप जिस भक्ति में अभेद भक्ति में चलना चाहो तो आद्य गुरु भगवान शंकराचार्य जी हैं। सखा भाव में चलना चाहो महामहिम श्री भगवान वल्लभाचार्य जी हैं। जो भाव लोग महामहिम निबारकाचार्य जी रामानंदाचार्य जी रामानुजाचार्य जी श्री हिताचार्य जी श्री स्वामी हरिदास जी महाप्रभु चैतन्य ये बड़े-बड़े महामहिम स्वरूप भगवान ने धारण किए मार्ग प्रशस्त करने के लिए हमें महापुरुषों के पद चिन्हों पर चलना है मनमानी नहीं भगवान कहते हैं कि मुमुक्षुओं को जानकारी करके जिस मार्ग में हम चल रहे हैं आचार्य परंपरा से सिद्ध होते चले जा रहे हैं।
आचार्य परंपरा से उपासना आ रही उसी पर हम अपने चित्त को जोड़े जो भाव हमारे अंदर हो शांत भाव दास्य भाव सख भाव वात्सल्य भाव किसी भाव से तो वही चला जाता है शांत भाव का मतलब मोक्ष का भाव मुक्त हो जाना जो अपने कर्तव्य कर्मों का पालन नहीं करता महापुरुषों का अनुगमन नहीं करता वो सिद्ध नहीं हो पाता वो मुक्त नहीं हो पाता है कर्म करता रहता है पर वो जैसे बहुत दिनों से कोई व्रत रह रहा है और बहुत एक दोष बढ़ रहा है अहम मैं इतने दिनों से ऐसा बड़ा सूक्ष्म विषय से संसारी नहीं जलेंगे प्रभावित हो जाएंगे इतने दिनों से केवल पानी लेकिन जो तस्मात शास्त्रम प्रमाणम इसका कोई महत्व नहीं गर्व कर रहे हो अन्य की निंदा कर रहे हो क्या ज्ञान है देव भाव ही तो है तो देव भाव में चाहे जो कुछ करो उसका देह भाव त्याग करके फिर वो जो कर्म करते हुए योग में स्थित रहता है वही कर्म योगी भगवत प्राप्त होता है।
कर्म करते हुए योग में स्थित रहना योग किसे कहते हैं? सत नाम भजता प्रीति पूर्वकम ददाम बुद्धि योगम तम यदि आपकी जिभ्या से राधा राधा राधा ऐसा निकल रहा है आप कर्म कर रहे हो उस कर्म को भगवान को समर्पित करते हो कर्म योग हो रहा है योग में स्थित होते हुए कर्म हो रहा है फल की आकांक्षा भगवान पर छोड़ दो कर्तव्य कर्म करो राधा राधा जपो मुक्त हो जाओगे बात मान लो कर्मों को करना या ना करना दोनों बंधन कारक ही है। दोनों बंधन कारक मैं यह नहीं करता तो वह मैं पुष्ट हो रहा है।
नहीं मैं मैं करता तो उसमें भी पुष्ट हो रहा है। बड़ा सूक्ष्म अध्यात्म का विषय है। दोनों की प्रवृत्ति है। कर्म मैं नहीं करता। मैं करता दोनों की प्रवृत्ति है। निवृत्ति कर्तव्य कर्म का पालन हो रहा है। फल की इच्छा नहीं। भगवान को समर्पित जीवन नाम जब चल रहा है। यह निवृत्ति है। पूर्ण निवृत्ति की कोई अवस्था नहीं है कि इतनी अवस्था में इतने कर्म में आप अभी इसी क्षण स्वीकार करो। कोई भी कर्म करो भगवान को अर्पित करो। कर्म करते समय राधा राधा अंदर से नाम भगवान का प्रभु का स्मरण करते रहो।
शरीर इंद्रियां मन आदि कर्म की सामग्री अपने से भिन्न है। ये मैं नहीं हूं। यह संसार से अभिन्न है, हमसे भिन्न है। इनके द्वारा जो प्राकृतिक कर्म होते हैं, वह हमको बांधने वाले ही हैं। यदि भगवान को अर्पित नहीं करते या प्रकृति में उनकी स्थिति नहीं देखते। प्राय बड़ा सूक्ष्म विषय है। प्रकृति में स्थिति देखना तो भगवान को अर्पित करना सरल है। आप अर्पित कीजिए। अपने कर्म मान के अपने लिए जब किया जाएगा तो योग नहीं होगा। केवल कर्म होगा। भगवान के मान के भगवान के लिए किया जाएगा या सबको भगवत स्वरूप मानकर सबके सुख के लिए किया जाएगा उसे योग कहते हैं जो भगवत स्मृति से युक्त होता है।
देखो कर्म योग से उद्धार होता है। कर्म से बंधन होता है। कर्म किसे कहते हैं? जब प्रकृति के इन अंश शरीर मन इंद्रिया आदि के द्वारा जो कर्म होते हैं वो अपने लिए किए जाते हैं। मैं करता हूं। यही बंधन है और जब प्रभु के लिए है प्रभु के लिए किया जाता है तो वह बंधन मुक्त हो जाता है। संपूर्ण कर्म केवल प्रभु के लिए किया जाए। कर्मों से हमारा कोई संबंध नहीं है। हमारा संबंध प्रभु से है। कर्म प्रभु को समर्पित है। योग नित्य सिद्ध योग हो गया। किम कर्म किम कर्मति कव्यत्र मोहिता त कर्म प्रवक्षाम यदि ज्ञत्वा मोक्ष से सुभ कर्म क्या है अकर्म क्या है इस प्रकार इस विषय में भी बड़े बड़े विद्वान मोहित हो जाते हैं।
अतः कर्म तत्व मैं तुझसे भलीभांति कहूंगा जिसको जानकर तुम इस अशुभ से जो अशुभ तुम्हें दुख दे रहे हैं उनसे तुम मुक्त हो जाओगे। किम कर्म कर्म किसे कहते हैं? किम कर्म किम अकर्मेति किसे कर्म कहते हैं? किसे अकर्म कहते हैं? साधारण मनुष्य शरीर और इंद्रियों की क्रियाओं को कर्म मान लेते हैं। शरीर और इंद्रियों की क्रियाएं रोक दी तो उसे अकर्म मान लेते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। शरीर और इंद्रियों से क्रियाएं ना हो तो भी क्रिया हो रही है। शरीर वाणी मन के द्वारा जो जो भी हो रहा है वो सब क्रियाएं हैं।
शरीर वांग मनोभिर यत कर्म प्रारब्धते नर रहा। अर्थात एक सेकंड भी कोई कर्म किए बिना नहीं रह सकता। अगर हमारी कर्म की वृत्ति सात्विक दिखती है कि यह मैं कर्म कर रहा हूं तो सतोगुणी कर्म राजसिक वृत्त तो रजोगुणी कर्म तामसिक वृत्त तो तमोगुणी कर्म राजसिक तामसिक ये फसाने वाली है। सतोगुणी वृत्ति यह मुक्त करने वाली है। जैसे सतोगुणी वृत्ति में शुद्ध सतोगुणी वृत्ति में कभी क्रोध का प्रादुर्भाव नहीं होगा। जैसे एक दिन आर्मी के कुछ जवान आए थे तो खानपान के विषय जैसी परिस्थिति हो उस परिस्थिति में रहकर भगवत स्मृति करते हुए राष्ट्र सेवा करो हमारे आंतरिक लक्ष्य में था प्याज लहसुन हम संसार का तो कि अगर कहीं ऐसी परिस्थिति है कि आपको प्याज लहसुन युक्त भोजन मिल रहा है आप चाहते हो मैं सात्विक भोजन करूं तो आपके अंदर रज और तम की पूर्ण वृत्ति बनी है।
त्रिगुणातीत नहीं हो गए हो। सतोगुणी भोजन की व्यवस्था का तात्पर्य बहुत ऊंची होती है। धर्म के द्वारा कमाया हुआ सात्विक पात्रों में सात्विक रसोई में सात्विक वृत्त के द्वारा भगवत चिंतन करते हुए बनाया हुआ फिर उसे भगवत अर्पित अब सतोगुणी भोजन हुआ। भाव कहने का कि आपकी कैसी भी परिस्थिति में यदि नाम चल रहा राष्ट्र सेवा का भाव है तो इन छोटी बातों से आपका भाव बिगड़ने वाला नहीं। दूसरी बात जैसे कही थी कि जैसे मूंग की दाल है, रोटी है, बड़े सात्विक वृत्त से बनाया गया है तो आपके अंदर क्रोध का प्रादुर्भाव नहीं होगा।
तो कहा जाता है कि जैसे बहुत से सतोगुणी जन देखे गए उनमें क्रोध आता है तो उस समय रजोगुण होता है। उनमें रजोगुण होता है। रज का तात्पर्य होता है काम। काम का मतलब होता है कामना। कामना का मतलब होता है मैं चाहता हूं ऐसा होना चाहिए। नहीं हुआ तो उसमें क्रोध आ जाएगा। मैं चाहता हूं कि यह होना चाहिए। जब उसमें बाधा पड़ेगी तो क्रोध आ जाएगा। तो इसमें राग और राग रजोगुण रजोगुण आ गया। चिंतन मात्र से रजोगुण आ गया। जैसे कोई किसी देवी की उपासना कर रहा है। उपासना शब्द बड़ा सात्विक है।
परंतु कर्ता कामना की सिद्धि के लिए सांसारिक कामना करते तो कामना करते ही वो राजसिक वृत्त हो गई। अब वही राजसिक वृत्ति तामसिक वृत्त होने में देर नहीं लगेगी यदि कुसंग हो जाए। बोले देवी प्रसन्न करने के लिए अमुक वस्तु तामसिक वृत्त उसके अंदर बढ़ती चली जा रही है। अब यह नहीं समझ पा रहा है कि मां है। मां को किसी अपने संतान की बलि से कभी प्रसन्नता नहीं होती। यदि कर्ता की फलेक्षा ममता आसक्ति नहीं है तो जब कर्म करेगा तो उसमें बंधेगा नहीं और इष्ट देवता बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाएंगे।
केवल सात्विक आचरण से बाहरी क्रिया से आंतरिक ज्ञान का प्रकाश नहीं हो जाता है। इन विषय में शास्त्रों को जानने वाले बड़े-बड़े विद्वान मोहित हो जाते हैं। जिस क्रिया में कर्म मानते हैं वह कर्म भी हो सकता है, अकर्म भी हो सकता है, विकर्म भी हो सकता है। कारण की कर्ता के भाव के अनुसार कर्म का स्वरूप बदल जाता है। जैसे ऊपर भगवान ने की व्याख्या हो रही कि जैसे आप किसी देवी की उपासना कर रहे हैं तो मां अगर आपको बलि का भाव है तो नींबू है नारियल है सात्विक बलि दीजिए भोग लगाइए आरती कीजिए पूजा कीजिए प्यार से पुकारिए मां तो आप उनकी कृपा प्रसाद के भाजन बन जाएंगे रजोगुणी बहुत बड़े-बड़े ऐश्वर्य भोग सामग्रियां तमोगुणी अब आ गया ये तो बोले वो कर्म भी बन जाता है अकर्म भी बन जाता है विकर्म भी बन जाता है और जान नहीं पाते बड़े-बड़े विद्वान मोहित हो जाते हैं।
इसलिए भगवान कह रहे हैं कि वास्तविक कर्म क्या है? वह क्यों बंधता है? कैसे बंधता है? इस इससे मुक्ति कैसे हो सकती है? मैं इसका स्वयं विवेचन करता हूं। यदि मनुष्य ममता आसक्ति और फल इच्छा रखकर के कर्म करता है तो बंधेगा ममता आसक्ति और फल की इच्छा बंधेगा कोई भी कर्म उसे बांध लेगा यदि ममता आसक्ति फले इच्छा का त्याग कर दे सत्संग के द्वारा प्राप्त विवेक से तो कर्म करता हुआ भी कर्म में नहीं बंधेगा जैसे भगवान भगवान कह रहे हैं कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे कुछ प्राप्त करना है।
क्या फिर भी मैं धर्म पूर्वक कार्य करता हूं। जब भगवान अवतार लेते तो कर्म करता हूं। वो कर्म भगवान को नहीं मानता क्योंकि कर्ता भाव नहीं फलेक्षा नहीं ममता नहीं। यदि ममता शक्ति और फलेक्षा नहीं है तो कर्म करते हुए भी कर्म नहीं हो रहा है। नहीं बंध रहा है। जैसे एक बार उदाहरण में बताया था कि दुर्वासा ऋषि के दर्शन करने गोपियां गई ढेर सारा पुआ पूरी कचौड़ी खीर ले गई और उनको पवाया तो सब पा गए। इसके बाद जब वापस के तो कहा प्रभु वह आई थी हम यमुना जी में बाढ़ थी तो प्रभु ने कहा था मैं अखंड ब्रह्मचारी हूं तो मार्ग दे देना दे दिया अब आप कैसे वापस आपके यहां से जाए उन्होंने कहा कह देना दुर्वासा ने अपनी जीभ में दूब के रस के सिवा कुछ ना रखा हो तो मार्ग दे दे उन्होंने कहा अभी तो हम खीर पुआ सब पवाए हैं आपको आपने पाया है अरे पर ये क्या धूप के रस के सिवा जबान में नहीं रखा ऐसा बुझा के यमुना जी से बोली मार्ग मिल गया प्रभु से बात की कि ऐसा क्या तब यही बात फलेक्षा ममता आसक्ति रहित भोगता करता भाव रहित तुम मनो प्रसाद पा गए और शपथ पूर्वक कहा कि दुर्वासा ने अपनी जबान पर दूब के रस के सिवा कुछ नहीं रखा हो तो मार्ग दे दीजिए ये कर्ता भाव लील है प्रभु में कोई फल इच्छा नहीं तो कोई उसका पा गए लेकिन पाते हुए भी नहीं पाए यदि कर्ता निर्लिप्त है तो कर्म उसे फसा नहीं सकता।
हर कर्म बंधन मुक्त करने वाला होता है। अगर कर्ता लिप्त है तो ना करे तो भी फंसता है क्योंकि चिंतन हो रहा है अंदर से। किम कर्मति कर्म दो प्रकार के बताए कर्म और अकर्म। कर्ता भाव से लिप्त भाव से फल इच्छा से जो किया जाता है वो कर्म। कर्ता भाव लिप्त भाव फल इच्छा का भाव त्याग करके जो किया जाता है अकर्म अकर्म माने कोई फल नहीं देगा कोई बंधन नहीं होगा कर्म से जीव बंधता है और अकर्म से जीव मुक्त होता है कर्मों का त्याग करना अकर्म नहीं है भगवान ने मोह पूर्वक किए गए कर्मों के त्याग को तामस बताया शारीरिक कष्ट के भय से किए गए कर्मों के त्याग को राजस बताया तामस और राजस त्याग में कर्मों का स्वरूप से त्याग होने पर भी कर्मों का संबंध और कर्ता भाव का त्याग नहीं होता है।
कर्मों में फल इच्छा और आसक्ति का त्याग कर देना सात्विक त्याग है। इसी से भगवत प्राप्ति होती है। इसी से मोक्ष पद प्राप्त होता है। फिर हम तुमको सारांश में बता रहे सबका जो कर्म करो वो शास्त्र सम्मत हो धर्म युक्त हो। यह सत्संग के द्वारा जानकारी कर लीजिए कि मेरा क्या धर्म है? मेरा क्या कर्तव्य है। और उसे भगवान को अर्पित कर दो। नाम स्मरण करो। पूरा जानने की तुम्हारी क्षमता अगर नहीं कि कर्म क्या है? अकर्म क्या है? विकर्म क्या है? ये सब ठीक हो जाएगा। नाम चल रहा है।
धर्म पूर्वक कार्य कर रहे हो। ज्ञान का प्रकाश होता जाएगा। मुक्त होते जाओगे। पर अगर नाम नहीं चल रहा और कर्म पर कर्म जैसे लोग कहते हैं हम तो कर्म करते हैं भजन नहीं करते तो कर्म का बंधन है चाहे सतोगुणी कर्म हो रजोगुणी कर्म हो तमोगुणी कर्म हो रहोगे प्रकृति राज्य में ही क्योंकि तीनों गुण प्रकृति के ही है परमात्मा राज्य में थोड़ी प्रवेश पा जाओगे तो जन्म मरण से थोड़ी मुक्त हो जाओगे इसलिए कवयोपत्र मोहिता साधारण मनुष्यों की बात क्या बड़े-बड़े विद्वान भी इसमें मोहित हो जाते शास्त्रों के ज्ञाता भी इस विषय में भूल कर देते हैं।
कर्म और अकर्म का तत्व जानने में उनकी बुद्धि चकरा जाती है। सारे कर्म अकर्म हो जाए तो मुक्त हो जाओ। कैसे हो जाएंगे? दो प्रकार। एक तो ज्ञान के द्वारा ये समझ के कि यह कर्म सामग्री मन बुद्धि इंद्र आदि मैं नहीं हूं। यह प्रकृति के हैं। प्रकृति के द्वारा प्रकृति के ही क्रियाएं हो रही। गुणानुगुण वर्तते मैं करता नहीं हूं। मैं फल भोगता नहीं हूं। यह बहुत ऊंची बात है। यह नहीं आएगी समझ में जल्दी सबके एक बात तो बिल्कुल समझ में आ रही यह सब कुछ श्री भगवान का है श्री भगवान की आज्ञा का पालन करने के लिए कर्म कर रहे हो और श्री भगवान को समर्पित कर देते हो राधा राधा समझ में आ रही सीधे भगवान को अर्पित कर दो ये तो सर्वाण कर्माण सनस मत परा वही स्थिति आ जाएगी तुम्हारा कोई भी कर्म तुम्हें बांध नहीं पाएगा क्योंकि भगवत अर्पित हो गया आगे इसका भी वर्णन आता है भगवान वर्णन करते हैं त कर्म प्रवक्षामि जीव को बांधे हुए हैं कर्म तो कर्मों से उसको मुक्त होना है।
यह मुक्त होने के दो ही उपाय हैं। या तो ज्ञान के द्वारा करता या भक्ति के द्वारा कर्ता भाव को समर्पित कर देना। भगवान प्रतिज्ञा करके कहते हैं कि यदि तुम ऐसा करोगे तो बंधन से मुक्त हो जाओगे। कर्म करने की कला भगवान सिखा रहे हैं। प्रवृत्ति मार्ग निवृत्ति मार्ग दो भगवान ने बनाए हैं और दोनों कर्म करते हैं। दोनों को कर्म करना होता है। एक कर्म करते हुए बंधता है और एक कर्म करते हुए मुक्त होता है। जो अपने लिए कर्म करता है, अहंकार पूर्वक करता है, भोग इच्छा से करता है, वह बंधता है।
जो भगवान के लिए करता है या दूसरों के सुख के लिए करता है, धर्म पूर्वक करता है। और उस कर्तापन भाव को भगवान में अर्पित करता है वो मुक्त हो जाता है। कर्मसु कौशलम ये कर्म योग का कौशल है। कुशलता है जिससे कर्म करते हुए भी वो उसमें नहीं बंधता है। भगवान कर्म के तत्व को जानने की प्रेरणा करते। क्या कर्म तत्व का स्वरूप है इसकी चर्चा आगे करते। श्री राधा वल्लभ लाल की, जय।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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