॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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कौन हैं श्री हरिवंश ? // 10/04/26

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंशंस जय जय श्री हरिवंश जय हरि जय हरिवंश जय हरि जय जय श्री हरिवंश गुरु हरिवंश प्राण हरिवंश जीवन हरिवंश सर्वस्व हरिवंश गुरु हरिवंश प्राण हरि जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय जय श्री हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरि जय जय श्री हरि श्री हरिव श्री सेवक वाणी जो पंचम प्रकरण इष्टाराधन कल की चर्चा में था सेवक जी महाराज इष्टाराधन प्रकरण में प्रथम ही कह रहे हैं प्रथम प्रणम्य सुरम्य मति बुद्धित प्रशंस प्रथम प्रणम सुरम्यति मन बुद्धित प्रशंस इसका चिंतन हुआ मन बुद्धि के द्वारा सदैव प्रशंसनीय सदैव प्रशंसित सदैव मुदित रहना बड़ा कठिन है।

हमारे अनुकूल हो तो तो प्रशंसित हमारे प्रतिकूल होने लगे तो निंदित फिर हम निंदा करने लगेंगे। शरणागति बहुत ऊंची स्थिति है। यज्ञों के द्वारा बल जी महाराज भगवान सर्वेश्वर श्री हरि की ही आराधना कर रहे हैं। माता अदिति ने व्रत धारण किया। भगवान हमारे पुत्रों की संकट निवृत्ति करें। उनके पुत्र हैं देवता। कश्यप और अदिति के द्वारा देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ। कश्यप और दति के द्वारा दैत्यों का प्रादुर्भाव। भगवान ने जब उनका व्रत पूर्ण हुआ तो वामन रूप धारण किया। शरणागति का बड़ा अद्भुत प्रसंग है।

मन बुद्धित प्रशंस हर समय मन से बुद्धि से और चित्त से चित्त से चिंतन होता है। मन से संकल्प विकल्प होता है। ऐसा क्यों? ऐसा क्यों? बुद्धि निश्चय करती है। यह सही है। यह गलत है। सेवक जी कह रहे प्रशंस सही गलत का कोई प्रश्न नहीं प्रशंस मेरे आराध्य देव मेरे प्रभु मेरे जीवन धन आपका हर विधान शर्मा भगवान वामन रूप से यज्ञशाला में पधारते हैं। समस्त अग्नियों के सहित मूर्तिमान ब्रह्म ऋषि सब और भगवान शुक्राचार्य जी सब खड़े हो जाते हैं। इतना तेज है वामन भगवान में सब खड़े हो जाते हैं।

अर्घ पाद्य अर्चन वंदन करके बलि ने कहा आज मेरा बड़ा सौभाग्य है। ऐसा ब्राह्मण हमने नहीं देखा। पहली बार इतना तेजस्वी इतनी कम अवस्था का और इतना प्रचंड तेज जो मैं देख पा रहा हूं वैसे आप किस आशा से हमारे यज्ञ में आए हैं। भगवान ने कहा महाराज मैं संतोषी ब्राह्मण हूं। मुझे ज्यादा नहीं अपने पग से तीन पग पृथ्वी चाहिए। हंस दिया बलि ने और कहा जानते हो किससे मांग रहे हो त्रिभुवन पति महाराज बलि से मांग रहे हो लोक का लोक दे सकता हूं और आप अपने छोटे से शरीर से बोले पहले बोला है ना आपसे कि हम संतोषी ब्राह्मण है भगवान शुक्राचार्य जी बोले बल जानता है तू कौन है संकल्प मत कर देना।

यह भगवान साक्षात श्री हरि है। एक पग में ब्रह्मांड को नाप लेंगे। तीन पग बाद जाने दे। ये अनंत महिमाशाली श्री हरि है। मत दे। तूने कहा गुरुदेव ये तो बहुत बलवान है। ये चाहते तो जबरदस्ती हमसे छीनकर स्वर्ग देवताओं को दे देते। जब ये मांगने आए हैं तो ऐसा अवसर नहीं चूकेंगे। हम देंगे तो जा मैं श्राप देता हूं। राज्य स्त्री से भ्रष्ट हो जा। तेरा सारा वैभव नष्ट हो जाए। तू पराजित हो जाए। कहा स्वीकार है। स्वीकार है। एक कदम कदम पर आप देखते जाइए। स्वीकार है। संकल्प लिया।

ब्राह्मणों से कहा मंत्र बोलो। बहुत सारांश में सुना रहे और भगवान को तीन पग पथरी का दान जे ही दिया तो बस बढ़ना शुरू हो गया भगवान का स्वरूप एक पग ब्रह्मलोक तक गया ब्रह्मा जी ने देखा तो मेरे आराध्य देव भगवान श्री हरि का कोमल चरणारविंद है। तुरंत प्रक्षालन किया और अपने कमंडल में डाला। वही गंगा जी हुई। दूसरे पग में रसातल तलातल महातल पाताल सांप नाप लिए पूरी पृथ्वी से लेकर के सात ऊपर के सात नीचे के दो पगों नाप लिया और बलि की तरफ और बड़ा दानी बनता है क्या की गरुड़ जी से वरुण पास में बांध इसको वरुण पास प्रति पल कसती रहती है और मृत्यु जनित भयानक कष्ट होता है वरुण पास में बांध भगवान नजदीक खड़े होकर कहते हैं बड़ा दानी बनता है।

अब तीसरा पद पूरा कर। बली जी ने हाथ जोड़ा और कहा अभी तो हमने प्रणाम भी नहीं किया आपको। पर प्रणाम कर भी कैसे सकता हूं। आपने मुझे बंधन प्रदान कर दिया। पर प्रभु आप जानते हैं संपत्ति और संपत्तिवान अलग होता है। आपने भी हमारी संपत्ति को नापा दो पल में। आप उसी वामन रूप में आइए और एक चरण से मुझे नाप लीजिए। एक चरण मेरे मस्तक पर पधइए और नाप लीजिए। प्रभु मैं मिथ्यावादी नहीं हूं। दीपक भगवान ने देखा ना रोष ना दोष रोष भी हो सकता है कि आए थे किस रूप में मांगने के लिए और आपने क्या रूप धारण किया।

इसके बाद मुझे वरुण पास में बांध दिया। जहां इनाम देना चाहिए वहां वरुण पास में बांध दिया और ऐसे कठोर वचन बोल रहे हो। भगवान ने कहा बलि चरण पधराया भगवान ने बलि के माथे पर और कहा आज से मैं तुम्हारे अधीन हो गया। आज भी भगवान रसातल में विराजमान जो बलि है उनके द्वारपाल बने हुए भगवान विराजमान है। उसी वामन रूप से बलि की रक्षा करते हुए द्वारपाल रूप से भगवान विराजमान है। वामन रूप से उपेंद्र पद पर विराजमान है और बलि के यहां द्वार पर जब रावण गया था दिग्विजय करने एक पैर के अंगूठे के बल से झटका मारा कि द हजार योजन दूर गिरा जाके जहां मेरी रक्षा वहां तेरा प्रवेश भी नहीं हो सकता हर लोक पर विजय प्राप्त करने शरणागति क्या है सब कुछ हरण कर लिया बांध दिया मृत्यु जनित कष्ट गुरु गुरु ने श्राप दे दिया।

फिर भी बलि जी के हृदय में ना भय है, ना चिंता है, ना शोक है। और भगवान से नम्रता से कहते हैं अभी तो हमने प्रणाम भी नहीं किया आपको। आप बड़े कृपालु हो। आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर धारण। शरणागति का तात्पर्य मन बुद्धि प्रशंस। रोशनी दोष नहीं प्रशंस नहीं कितनी कृपा हम पर कितनी कृपा रोग शोक दुख विपत्ति अभद्र चाहे जो कुछ दे दो मान अपमान इज्जत वैद्य चाहे जैसी परिस्थिति कितनी कृपा है हम मन बुद्धि चित्त प्रशंस प्रथम प्रणम्य सुरम्य मति मन बुद्ध चित्त प्रशंस चरण शरण सेवक सदा जय जय श्री हरिवंश सेवक जी महाराज कहते हैं मैं ऐसे हरिवंश महाप्रभु की चरण शरण में हूं जिनके लिए हमारा मन बुद्धि औरित सदैव प्रशंसा में रहता है।

शरणागति को खाक में मिलना होता है। मिला दे अपने मिटा दे अपनी हस्ती को यदि मर्तबा चाहे दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है इसके आगे नहीं मन बुद्ध चित्त प्रशंस ना मन में ना बुद्धि में ना चित्त में कोई प्रश्न नहीं कोई संशय नहीं कोई बात ही नहीं प्रशंस हर समय प्रशंसा उनकी अहो कितने कृपालु है मुझे दंड देकर पवित्र कर रहे हैं। अहो कितने कृपाल है। मेरा अपमान करके मुझे शुद्ध कर रहे हैं। अहो कितने कृपाल है। सुदामा जी को जब भगवान ने प्रगट में कुछ नहीं दिया तो लौट कर के जब आ रहे थे तो आप पढ़ लेना भागवत में प्रशंसा कर रहे थे।

कि मेरे श्री कृष्ण हम पर कितना प्यार करते हैं कि इस दरिद्री को यदि कहीं संपत्ति दे दी और यह अभिमान में भरकर भूल गया मेरे को तो त्रुटि हो जाएगी उपासना में। इसलिए मेरे मित्र मुझे कितने प्यार करते हैं कि मुझे कुछ नहीं दिया। कितनी अपार कृपा उनकी हम पर है कि हमको कुछ नहीं दिया। खाली हाथ वापस कर दिया। वो इसीलिए दोष नहीं देख रहे। प्रशंस प्रशंसा कर रहे हैं। वो इसीलिए कि दरिद्र ब्राह्मण कहीं वैभव पाकर मेरा विस्मरण ना कर जाए। हाय हमारे मित्र श्री कृष्ण कितने कृपालु है।

प्रशंस मन बुद्धि प्रशंस मन से बुद्धि सेित से अपने गुरुदेव श्री हरिवंश चंद्र जी की प्रशंसा कर रहे हैं सेवक जी आगे का बहुत गुड बात है कुछ इसीलिए किसी की सुनो मत सुनो समझ में आए तो समझो नहीं हो जाओ सुनो और हो जाओ समझने की चेष्टा मत करो तुम्हारी बुद्धि इतनी सीपी है समुद्र को तोल नहीं सकती समुद्र को समझ नहीं सकती जब वह अपने को छुपाने में उतारू हो जाए तो तुम उन्हें पहचान नहीं सकते। मैंने क्या समझता था क्या है? वो अपने को छुपाने में अगर राजी हो जाए तो हमारी ताकत नहीं कि हम उनको पहचान ले।

और जब वो पहचानने में पहचानवाने में उतारू हो जाए तो किसी की ताकत नहीं कि पर्दा डाल सके। हर जगह में बिल्कुल सरेंडर की आवश्यकता पूरी हमारी बुद्धि कितनी सीपी है प्रभु की महिमा गुरु की महिमा अघात समुद्र है कैसे समझ में आवे आगे जो वर्णन कर रहे हैं सेवक जी महाराज ये सब निष्ठा है चतुरासी जी सुधा निधि ये तभी हमारे हृदय में स्फुरित होगी जब ये निष्ठा होगी सच्ची मानी सेवक वाणी जी वो वस्तु है कि इनकी कृपा हो जाए तो परम तत्व का तत्व हित प्रेम रोम रोम में प्रकाशित हो जाए हमें नहीं चाहिए नर्क स्वर्ग अपवर्गास नहीं त्रास मुझे हरिवंश चाहिए मेरे गुरु

हरिवंश जो हरिवंश तजो भजो और तो श्री हरिवंश दुहाई हरिवंश की कसम हरिवंश के सिवा और किसी को नहीं ये तब समझ में आएगा जब हरिवंश प्रदत्त दस मिलेगा कृपा मिलेगी तो तुम इतने खुद अर्पित हो जाओगे और हरिवंश है क्या ये स्टार प्रकरण में आप देख रहे हैं धीरज हरिवंश विरद बल बीरज श्री हरिवंश अभद्र हरम सब कुछ है वो धैर्य जो रसेंद्र और जनेंद्र को काबू में रखे वो यश जो पूरे विश्व में व्याप्त हो जाए वो बल जो हम जानते हैं उसका प्रयोग कर पावे वो पराक्रम जो कोई भी परास्त

ना कर पावे और स्वयं उसके सब अभद्रों का हरण कर देते हैं। ऐसे मैं हरिवंश की शरण में हूं जिनकी कृपा से तृष्णा जागृत होती है। नाम की लोभ जागृत होता है। वाणी गायन वाणी श्रवण वाणी चिंतन का और समस्त कर्म और उनका कारण जो श्री हरिवंश है वही मेरे कर्म बनकर के प्रस्तुत हो रहे। श्री हरिवंश सुगोत कुल देव जाति हरिवंश श्री हरिवंश स्वरूप हित रिद्धि सिद्धि हरिवंश श्री सेवक जी महाराज कह रहे हम जितने हरिवंशी हैं सब एक घर के हैं। अगर आप शरणागत हैं तो अब आपकी कोई जाति नहीं है।

अन्य कोई गोत्र नहीं अन्य भूलकर भी मत उच्चारण कर देना। श्री हरिवंश सुगोत हमारे ब्रह्म ऋषियों की सब संतान है। जितनी पूरी सृष्टि है ये ब्रह्म ऋषियों की ही संतान है। अब हमारा जो दीक्षा का नया जन्म हुआ है। यह हम अपने गुरु के हैं। किसी के नहीं है। बस इसमें मानने की बात है। देखो मानने की बात जितना जोर का समर्पण उतनी जोर की भगवत प्राप्ति की वृत्ति उदय होगी। यह नया जन्म है आपका। आपका कोई जाति नहीं, आपका कोई कुल नहीं, आपका कोई माता नहीं, आपका कोई पिता नहीं।

तो पैदा कहां से हुए? आप गुरु से पैदा हुए। यह जो हमारा जन्म है इसमें पिता हमारे गुरु, माता हमारे गुरु, मित्र हमारे गुरु, प्रीतम हमारे गुरु, प्राण हमारे गुरु, मन हमारे गुरु, बुद्धि हमारे गुरु, चित्त हमारे गुरु, आम हमारे गुरु। चतुर्भुज दास जी के चरित्र में एक प्रसंग में आता है। प्राय सब संत जन जानते हैं। एक चोर राजकीय विभाग कि किसी धनी मानी पुरुष का धन चुरा कर भागा। अब वो पीछे राजकीय कर्मचारी लग गए शासन विभाग के। ऐसे ही भगवत चर्चा चतुर्भुज दास जी बड़े प्रसिद्ध महापुरुष है।

जहां जाते प्रांत के प्रांत को शिष्य बना देते। प्रांत के प्रांत को शिष्य बना देते। सबको वैष्णव बना देते। ऐसा नियम था जिस गांव में वैष्णव ना हो उस गांव का पानी नहीं पीना। अगर एक वैष्णव है तो कम से कम कुआं का पानी तो ले लेंगे। अगर एक भी वैष्णव नहीं तो उस गांव का पानी नहीं लेंगे। जो दीक्षा नहीं ली उसके छुआ स्पर्श किया हुआ पानी भी नहीं पिए। बड़ा नियम वैष्णव जनों को था। चतुर्वदास जी चर्चा कर रहे थे कि जीव का पवित्र उत्तम नया जन्म माना जाता है। जब दीक्षा होती है उसकी उसके सारे पूर्व के पाप नष्ट हो जाते हैं।

यही इतना ही प्रसंग चल रहा था कि वो चोर ने विचार किया कि इस भागवतिक सभा में बैठ जाए तो छुपने का बड़ा अच्छा अवसर है। तो तुरंत बीच में जाकर कथा में बैठ गए। शांति से चुप। कान में शब्द पड़ा। दीक्षा से जीव का नया जन्म होता है। पूर्व के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। बस उसने इतना ही सुना और चिंतन करने लगा कि कहीं राजकीय कर्मचारी तो थोड़ी देर राजकीय कर्मचारियों ने देखा इधर तो आया पर ऐसा चोर आदमी कथा में काहे को बैठेगा। वो लोग चले गए। कथा संपन्न हुई चतुर्भुज दास जी के पास वो गया और कहा महाराज ईमानदारी से मैं बहुत चोर हूं।

हिंसा भी की है। बड़े पाप किए हैं। पहले हम अपना परिचय बता देते हैं। आपने अभी सत्संग में कहा कि जीव जब दीक्षा लेता है उसका नया जन्म हो जाता है। क्या मैं दीक्षा लूं तो मेरा नया जन्म माना जाएगा? मेरे पाप नष्ट हो जाएंगे। बोले हां नियम लो कि आज से चोरी नहीं करूंगा। बोले लिया झूठ नहीं बोलूंगा। बोले लिया चोरी नहीं करूंगा और सत्य बोलूंगा। जाओ आज से तुम्हारे पूर्व के सारे पाप नष्ट हो गए। तुम्हारा नया जन्म मुंडन कराओ। अभी दीक्षा लो। तुरंत दीक्षा दी कि अभी पापी आदमी है।

बुद्धि बदल जाए एक मिनट में तो क्या? अभी दीक्षा ले लेगा तो हरिवंश शरणागत हो जाएगा। इसका मंगल हो जाएगा। महाप्रभु संभाल लेंगे। दीक्षा हो गई। दूसरे दिन वो द्वादश तिलक लगाए। राधावल्लवी चौड़े में घूम रहा था। मेरा तो नया जन्म है। मैं निष्पाप हूं। राजकीय कर्मचारियों ने पकड़ लिया। धनी ने भी देखा। बोले यही चोर है। राजा के सामने बंदी बनाकर पेश किया गया। धनी बोला यही चोर है। यह मूड मुड़ाकर यह साधु वैष्णव बन करके अपने को छुपाने के लिए नाटक कर रहा है। यही था। उनसे पूछा तो उन्होंने कहा महाराज इस जन्म में मैंने चोरी नहीं की।

राजा बड़ा संशय में पड़ा। यदि वैष्णव को इस जन्म में चोरी नहीं की और हम दंड देते तो मेरा नाश हो जाएगा। और वह कह रहा है कल इसने चोरी की है। यही चोर है। तो उस समय परीक्षा के लिए एक पीपल का पत्ता नया कोमल हाथ पर दाहिने बांध के ऐसे पीपल का पत्ता रखा गया और ऊपर कच्चा सूत से लपेट दिया गया। और जलता हुआ लोहे का फार हाथ में रखा गया। ऐसे झुलसना नहीं चाहिए वो सूत भी और सात कदम चलो और बोलो मैंने नहीं किया। अगर ऐसा ठीक हुआ तो तुम सत्यवादी हो और तुम चोर नहीं हो।

उसने मन में कहा गुरुदेव आपने कहा था कि दीक्षा से नया जन्म हो जाता है। इसलिए मैं स्वीकार करता हूं मेरा जन्म है और जोर से बोला इस जन्म में मैंने कोई पाप नहीं किया। और हाथ में लिया सात कदम चला फार को फेंक दिया। कहीं भी सूत झुलसा नहीं कच्चा सूत। राजा ने कहा इसे फांसी दो सेठ को वैष्णव पर दोष करता है। अब वो जो चोर वैष्णव बन गए थे उनके हृदय में दया आई की बात तो इसने भी सत्य बोले महाराज ये भी सत्य बोल रहे हैं। बोले अब तो मानी नहीं जाएगी क्योंकि आपने प्रमाण दे दिया।

बोले महाराज इस जन्म में मैंने चोरी नहीं की। बोले वही तो बात ये कह रहा कल चोरी की। बोले कल चोरी की थी महाराज कल चोरी की थी बोले मेरी बात समझ में नहीं आई तब उन्होंने बताया कि हमारे गुरु जी ने कहा था कि दीक्षा लेने से नया जन्म हो तो चोरी करने के तुरंत बाद हमने दीक्षा ले ली तो मेरा नया जन्म ये इस समय वैष्णव इसमें मैंने चोरी नहीं की इसलिए पास हो गया लेकिन ये जो कह रहे हैं इन्होंने ठीक कहा मैंने कल चोरी मैं पुराना चोर हूं ऐसा तो उन्होंने कहा इतने बड़े संत जो दर्शन मात्र से वाणी मात्र से तुम्हें बदल दिया।

मैं उनके चरणों के दर्शन करना चाहता हूं और वो चतुर्भुज दास जी के दर्शन करने गए। तो दीक्षा से नया जन्म हो जाता है। इसलिए अब हमारा सबका जितने हरिवंशी हैं राधा वल्लभी तिलक लगाने वाले हैं। श्री हरिवंश सुगोत कोई पूछे तुम्हारा गोत्र क्या है? तो श्री हरिवंश ये नहीं आना चाहिए कि भरद्वाज गोत्र है सांडिल्य गोत्र है नहीं श्री हरिवंश सुगोत किस कुल के हो हरिवंश कुल के याद भी नहीं आनी चाहिए मुझे कि मैं किसी और कुल का हूं पक्का तभी तो आनंद की अनुभूति होगी तभी तो बात बनेगी पहले विस्मरण करो सबका का सेवक जी महाराज कह रहे हैं श्री हरिवंश ही मेरे सुंदर गोत्र है।

श्री हरिवंश सु माने सुंदर गोत्र सुगोत्र और मेरे कुल श्री हरिवंश हैं। और मेरे कुल देव श्री हरिवंश है। प्रिया प्रीतम सहचरियों के मध्य में विराजमान जो वृंदावन में यही हमारे कुलदेव हैं। यही हमारे कुलदेव श्री हरिवंश ही हमारा गोत्र है। सब हम हरिवंश महाप्रभु के गोत्र के हैं। तो हम सब ब्राह्मण ही हैं। सब इस समय ब्रह्म ऋषि हैं। विश्वास कर लो। विश्वास से गाड़ी पार होती है। विश्वास नहीं बिन विश्वास भगत नहीं ते बिन द्रव न राम। राम कृपा बिन सपने जीव नला विश्राम।

हित ध्रुव जो विश्वास है तो सुधरे बात ना तर माया पंथ में फिरे जो टक्कर खात विश्वास मैं हरिवंश गोत्र वाला हूं मैं हरिवंश कुल वाला हूं मेरे कुलदेव हरिवंश है मतलब वृंदावन में विराजमान सेचियों के मध्य में प्रिया प्रीतम ये हमारे कुलदेव है तो तुम किस जाति के हो हरिवंश जाति के हमारी जाति हरिवंश है। हमारे सर्वस्व हरिवंश हैं। श्री हरिवंश स्वरूप हित बोले श्री हरिवंश ही हमारे स्वरूप है। आत्मा हरिवंश तो हमारा स्वरूप क्या है? श्री हरिवंश। बस यही सब बातें बैठालने की है।

अब कुछ और याद नहीं आना चाहिए। हरिवंश हरिवंश हरिवंश हमारी सिद्धि क्या है? हरिवंश रिद्धियां क्या है? हरिवंश श्री हरिवंश सुगोत कुल देव जाति हरिवंश श्री हरिवंश स्वरूप हित श्री हरिवंश हमारे स्वरूप है और स्वरूप क्या है? हित प्रेम और रिद्धि सिद्धि यह हरिवंश है रिद्धि सिद्धि हरिवंश बैठा लो हमारी सिद्धि हरिवंश हमारी रिद्धि हरिवंश हमारे कुलदेव हरिवंश हमारा गोत्र हरिवंश हमारी जाति हरिवंश हमारा कुल हरिवंश हमारा स्वरूप हरिवंश श्री हरिवंश स्वरूप हित हरिवंश का स्वरूप क्या है प्रेम प्रेम हम भी प्रेम स्वरूप है।

हम भी हित स्वरूप है। हमारा भी स्वरूप हरिवंश है। आत्मा हरिवंश श्री हरिवंश विदित विधि वेदम श्री हरिवंश जूत भेदम श्री हरिवंश विदित विधि वेदम श्री हरिवंश अब देखो बस सेवक वाणी समझ जाओगे तो सब सब कुछ समझ जाओगे। वेद में दो प्रकरण है। दो कांड है। एक है कर्मकांड और एक है ज्ञान कांड। सेवक जी दोनों कांडों को जब देखा तो उसमें हरिवंश दिखाई दिए। कैसी इष्टाकार वृत्ति है हरिवंश दिखाई दिए बोले श्री हरिवंश विदित विधि वेदम जो वेदों में प्रकाशित विधि है कर्मकांड की बोले कौन है बोले श्री हरिवंश श्री हरिवंश ही वेदों की विधित माने जानकारी जो कर्मकांड की होती है विधि की वो प्रसिद्ध हरिवंश ही है।

दूसरा कोई नहीं। यह है तत्व ज्ञान। शुद्ध तत्व ज्ञान अपने गुरु को अखंड मंडलाकारम व्याप्त चराचरम। तत्व स्वरूप से सेवक जी ने हरिवंश महाप्रभु को देखा, रस स्वरूप से देखा, प्रेम स्वरूप से देखा, सर्वत्र देखा। श्री हरिवंश ही वेदों की प्रसिद्ध विधि है। अर्थात कर्मकांड विधि जो कर्मकांड है वेदों का वो हरिवंश है। ये हमें दूसरों को नहीं समझाना। हमें समझना है कि अगर कोई वेदों के कर्मकांड में रथ है तो हरिवंश में ही रथ है। हमारी दृष्टि में वह अन्यत्र नहीं। हमें खंडन नहीं करना।

मंडना है। यह मंडना है, खंडना नहीं है क्योंकि बोले कर्मकांडों में फंसा हुआ जीव है। तो बोले कर्मकांड भी तो हरिवंश है। श्री हरिवंश विधित विधि वेदम हमारी जहां दृष्टि गई दोष दृष्टि नहीं होगी। हरिवंश दृष्टि है। अब बोले श्री हरिवंश जो तत्व वेदम ये ज्ञान कांड है। इस पंक्ति में वेद के दोनों कांडों का वर्णन किया। कर्मकांड विधि वेदम ज्ञान कांड जो तत्व भेदम श्री हरिवंश विधित विधि वेदम वेद के द्वारा प्रसिद्ध जो विधि है कर्मकांड है बोले वो श्री हरिवंश है और वेद का जो उत्तर भाग है अंतिम भाग है वो वेदांत है उपनिषद है बोले वेदों के वेदांत और उपनिषद में जो तत्व अभेद वर्णन है वो कौन है बोले हरिवंश श्री हरिवंश जो तत्व अभेदम अभेद तत्व ब्रह्म तत्व वेदांत का प्रतिपादित जो तत्व है वो हरिवंश है।

ऐसा सेवक जी ने देखा क्या बकाया रह गया यार सब कुछ हरिवंश बस ये है जब तक ये दृष्टि नहीं होगी तब तक उपासना मानी नहीं जाती। सब पूरा चराचर जगत इष्टाकार हो जाए तभी उपासना मानी जाती है। सिद्धांत प्रतिपादित करो। गुरु जी से जब पहले मिले थे तो सबसे पहले हमारा यही प्रश्न था कि महाराज जी मेरे इस संशय का निवारण कीजिए। हम सर्वम खलदम ब्रह्म के उपासक है। महाराज इनका सर्च परम स्वरा बुद्धि मम एकदम हृदय में बर्फ की सिल्ली सी रख गई कि जो हमारा सिद्धांत वेद कहता है वही महाराज जी कह रहे हैं।

हमारे हरिवंश महाप्रभु भी कहते हैं सर् वस्तया निरीक्ष परम स्वरा बुद्ध सब जगह अपने इष्ट को देखो मेरी दृढ़ मति है। सब जगह इष्ट विराजमान है। निरीक्ष देखो अब जोग का वर्णन करते हैं। श्री हरिवंश प्रकाशित जोगम श्री हरिवंश सुकृत सुख भोगम श्री हरिवंश प्रकाशित जोगम श्री हरिवंश सुत सुख भोगम श्री हरिवंश ही जोग में प्रकाशित होने वाले परमात्मा है। इसमें अर्थ में लिखा है श्री हरिवंश के द्वारा ही योग शास्त्र प्रकाशित हुआ है। ऐसा भी है क्योंकि वही परम तत्व है तो वही परम तत्व ही योग को प्रकट करने वाले हैं।

और श्री हरिवंश प्रकाशित जोगम योग धारण करने पर जो तत्व प्रकाशित होता है वह श्री हरिवंश ही है। बड़ा सुख मिल रहा है क्योंकि पीछे के शास्त्रों का सब कुछ खत्म श्री हरिवंश वही है। अगर अष्टांग योग के द्वारा समाधि में जिस परमात्मा का प्रकाश होता है तो श्री हरिवंश प्रकाशित जोगम श्री हरिवंश से ही जोग प्रकाशित होता है और जोग में जो आप प्रकाश का अनुभव करते हो वो श्री हरिवंश ही है। दोनों बातें श्री हरिवंश प्रकाशित जोगम श्री हरिवंश से ही योग प्रकाशित होता है। मतलब सही योग जो सबसे बड़ा योग क्या है?

प्रेम योग वो हरिवंश से ही प्रकाशित होता है और प्रेम योग में जो प्रकाश होता है वो हरिवंश ही होते हैं। वृंदावन में विराजमान प्रिया प्रीतम सहचरियों के मध्य में वो हरिवंश ही होते हैं। श्री हरिवंश सुकृत सुख भोगम सुकृत माने होता है पुण्य। पुण्य के कर्मों के फल रूप में जो लौकिक पारलौकिक सुख भोग मिलते हैं वो क्या है? बोले श्री हरिवंश तो हम किसका भोग करते हैं? श्री हरिवंश का। कौन भोग करता है? श्री हरिवंश। ये श्री हरिव श्री हरिव श्री क्या मतलब आनंद आ गया। कैसा सेवक जी ने वर्णन किया महाप्रभु को।

सब कुछ वही सब कुछ वही आनंद आ गया, आनंद आ गया। सुकृत का सुख भोग क्या है? हरिवंश। तो भोगता कौन है? हरिवंश, आत्मा हरिवंश, प्रगट परमानंद, मन हरिवंश, चित्त हरिवंश, सुबुद्धि हरिवंश। आगे वर्णन किया ना आगे वर्णन किया है श्री हरिवंश, सुमन सु बुद्धि गणिज, श्री हरिवंश, सुचित, मित हरिवंश भिंज, अरे मन भोगता मन तो कौन है? हरिवंश। तो भोग कौन है? हरिवंश हरिवंश ही भोगता हरिवंश ही भोग श्री हरिवंश सुकृत सुख भोगम प्रज्ञा हरिवंश प्रतीत प्रमाणत प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम प्रज्ञा हरिवंश प्र प्रीतम श्री हरि वंस प्रिय प्रज्ञा माने होता है शुद्ध बुद्धि उत्तम बुद्धि प्रवीण बुद्धि ज्ञानमय बुद्धि इसे प्रज्ञा कहते हैं।

तो बोले प्रज्ञा हरिवंश प्रतीति प्रमाणत अपने इष्ट में विश्वास और इष्ट के लिए जितने प्रमाण दिए गए हैं उनमें विश्वास प्रमाणत प्रतीति प्रतीत माने विश्वास इष्ट के लिए जितने गुण महिमा प्रमाण दिए गए हैं जो इष्ट के प्रति साधन दिया गया है। जो इष्ट दिया गया है साध्य ध वस्तु उसमें पूर्ण विश्वास इसे प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञा धेय वस्तु में प्रतीति अर्थात विश्वास को प्रमाणित करने वाली प्रमाणों द्वारा सिद्ध करने वाली प्रज्ञा उत्तम बुद्धि कौन है? बोले श्री हरिव साधना में विश्वास किसी से काम हो जाएगा।

श्री हरिवंश है। साध्य में विश्वास बोले श्री हरिवंश है। यह विश्वास करने वाली उत्तम बुद्धि बोले श्री हरिवंश है। जय हो। और प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम प्रियम हमारे सबसे प्यारे प्रीतम सबसे अधिक प्रिय प्रियम प्यारे प्रीतम सबसे प्यारे बोले कौन है बोले यही श्री हरिवंश प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम जब आप प्रीतम हरिवंश को मान लेंगे तो रसिकम सो प्रीतम कहा कबहु काल वृथा नहीं जाए रसिकम सो जो हरिवंश को भजने वाले हैं वो हमारे प्रीतम प्रीतम माने इनसे बढ़कर कोई हमारे लिए नहीं शरीर प्राण मन बुद्धि कुछ नहीं ये हमारे प्रीतम है प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम प्रिय और प्रीतम ये दोनों हमारे हमारे हरिवंश ही है।

प्रिय भी हरिवंश है और प्रियतम ही हरिवंश है। अर्थात सबसे प्रिय वस्तु तत्व हरिवंश ही है। गाथा हरिवंश गीत गुण गोचर गुपत गुणत हरिवंश गियम गाथा वो कुम अब जितनी कथाएं भगवान की है जितने इतिहास पुराण हैं गाथा और जितने गीत हैं जितने गुण हैं ये सब क्या है हरिवंश है मतलब आप हरिवंश हरिवंश कह रहे हो आप 18ों पुराण पढ़ लिए वेद पढ़ लिए सब गाथाएं पढ़ ली कोई जरूरत आपको अब नहीं है श्री हरिवंश श्री हरिवंश गाथा हरिवंश गीत गुण गोचर गुपत गुणत हरिवंश ग प्रत्यक्ष गुणों वाले छंदों में गाई गई गाथा इतिहास कथा पुराण ये सब श्री हरिवंश ही है और गुपत गुणत हरिवंश

की हम गुप्त रहस्यमय गुणों वाली वाणी भी जो अप्रकट है शब्द कुछ है उसका अर्थ कुछ है वह भी श्री हरिवंश है तुम श्री हरिवंश श्री हरिवंश कहो शास्त्रों का गुप्त रहस्य तुम्हारे हृदय में प्रकाशित हो जाएगा तुमने समस्त शास्त्रों का स्वाध्याय कर लिया क्योंकि सब गाथा सब इतिहास सब पुराण सब रहस्य श्री हरिवंश ही है सेवक हरिवंश सार संचित सब श्री हरिवंश धर्म धरम सेवक सारित सब श्री हरिव धर्म धम सेवक जी महाराज कह रहे हैं सार संचित सब सेवक सार संचित सब क्या हरिवंश सेवक जी ने देखा सबका सार क्या है हरिवंश और श्री हरिवंश धर्म धरणम मैंने देखा कि सब का सार है हरिवंश सार संचित सब वही हमने अपने छंद में वर्णन किया योग का सार, सुकृत का सार, वेद का सार, सब का सार श्री हरिवंश है।

वही मैंने अपने छंदों में रचित किया है, संचित किया है। और मैं केवल केवल हरिवंश के ही धर्म को धारण करता हूं। बस यही बात ध्यान तर निरापक निरापक केवल हरिवंश धर्म। बहुत जन्मों के सुखित फलीभूत हो गए। यदि हरिवंश धर्मी हो गए, हरिवंश शरणागत होकर हरिवंश धर्मी हो गए। सेवक जी का तात्पर्य है कि हरिवंश के समस्त वैभव के ज्ञान सहित मैं श्री हरिवंश के धर्म का पालन कर रहा हूं। ऐसा नहीं है कि अज्ञानियों की भांति में बिना समझे बुझे इस धर्म को ग्रहण कर लिया और अंधविश्वास से चल रहा हूं।

नहीं मैंने इसका ज्ञान प्राप्त किया कि अभेद तत्व हरिवंश है। वेद की विधि हरिवंश है। आत्मा हरिवंश है। परमानंद हरिवंश है। सब हरिवंश ही हरिवंश है। जय जय हरिवंश जगत मंगल पर श्री हरिवंश चरण शरणम जय जय हरिवंश जगत मंगल पर श्री हरिवंश चरण शरणम संपूर्ण जगत जगत का मंगल करने वाले ऐसे श्री हरिवंश की मैं जय जयकार करता हूं और श्री हरिवंश के चरण ही मेरे आस्त्र हैं। जय जय हरिवंश जगत मंगल पर संपूर्ण जगत का मंगल करने वाले श्री हरिवंश चंद्र जी की जय जयकार करता हूं और उन्हीं श्री हरिवंश की मैं चरण शरण में हूं।

जय जय श्री हरिवंश चंद्र दुजवर कुल मंडल जय श्री हरिवंश कुल जय जय श्री हरिवंश चंद्र कलितम भव खंडन जय जय श्री हरि हरिवंश चंद्र हरि भवन जय जय श्री हरिवंश चंद्र अकलंक प्रकाशित जय जय श्री हरिवंश चंद्र अकलंक प्रकाशित जय जय श्री हरिवंश चंद्र चंद्र सब जग आसित जय जय श्री हरिवंश चंद्र सब जग आसित जय हो जय हो श्री हरिवंश चंद्र जी की जय हो जो दुजवल ब्रह्म ऋषियों में श्रेष्ठ विराजमान व्यास मिश्र है उनके कुल का मंडन करने वाले हैं। ब्रह्म ऋषियों के श्रेष्ठ ब्रह्म ऋषियों के कुल का मंडन करने वाले श्री हरिवंश चंद्र की जय जयकार हो मंडन माने शोभा बढ़ाने वाले जय हो जय हो श्री हरिवंश चंद्र की जय हो कलयुग क्या करता है अज्ञान रूपी अंधकार को फैला के संसार में भ्रष्टाचार फैला देता है जो संसार का प्रिय प्रिय, आसक्ति और मोह, राग, काम आदि बढ़ाने वाला है।

ऐसे कलयुग के अंधकार का कलयुग के द्वारा रचित ये सब भ्रष्टाचरण युक्त संसार का जो खंडन कर देते हैं, नाश कर देते हैं। कलयुग के अंधकार से पूर्ण संसार का खंडन करने वाले श्री हरिवंश चंद्र जो की जय हो, जय हो। अर्थात जो हरिवंश चंद्र जो की शरण में है उसके कल के द्वारा जितने भी अभद्र रचना है वह सब नष्ट हो जाते हैं। कलयुग का प्रभाव उसके ऊपर नहीं पड़ता है जो निरंतर श्री हरिवंश श्री हरिवंश श्री हरिवंश रचता है। जय हो जय हो। संपूर्ण जगत में निष्कलंक प्रकाशित होने वाले हरिवंश रूपी चंद्रमा की जय हो।

जगत में जो चंद्रमा प्रकाशित है वह कलंकित है गुरु पत्नी गामी लेकिन यह हरिवंश रूपी चंद्रमा जो प्रकट हुआ है यह विशिष्ट है हरिवंश चंद्र अमृत बरस सकल जंतु तापन हरणम यह हरिवंश चंद्रमा प्रेमामृत की वर्षा करता है और ये हरिवंश चंद्रमा निष्कलंक है निष्कलंक रूप से प्रकाशित होने वाले हरिवंश रूपी चंद्रमा की जय हो। जय हो। जय हो। श्री हरिवंश जी महाराज की जय हो। जो समस्त जगत में व्याप्त है। आभासित हो रहे हैं। वही व्याप्त वही है। सब जग आभासित। हरिवंश ही हरिवंश। कोई दूसरा नहीं बचा।

सेवक जी की दृष्टि में सब हरिवंश। सब हरिवंश। जय जय श्री हरिवंश चंद्र सब जग आभासित बस यही बात कोई दूसरा नहीं सब हरिवंश है सब चिद लक्षणम सर्वम राधा कृष्णमयम जगत चेतन अचेतन जितना जगत है सब श्यामा श्याम में है सब हरिवंश मेंय है ये बिना आए पूर्णता नहीं होती या नहीं जैसे गोस्वामी तुलसीदास सिया राम में सब जग जानी पूरे संसार को इष्टाकार करना ही होगा। जब तक इष्टाकार नहीं होगा तब तक उपासक सिद्ध नहीं माना जाता। हरिवंश चंद्र अमृत बरसी सकल जंतु तापन हरणम सेवक समीप संतत रहे सुशी हरिवंश चरण शरणम हरिवंश चरण सकल जपन हरणम सेवक समीप हरिवंश चरण शरणम हरिवंश रूपी चंद्रमा प्रिया प्रीतम के प्रेमामृत रूपी किरणों का विस्तार कर रहा है।

प्रेमामृत की वर्षा कर रहा है। अपनी कृपा रूपी किरणों से हरिवंश रूपी चंद्रमा हरिवंश चंद्र अमृत बरस सकल जनु यहां सकल जन तो शरणागतों से ही माना जाएगा सकल जन तो शरणागतों से ही माना जाएगा। वही शरणागत पान कर सकते हैं। हरिवंश रूपी चंद्रमा की प्रेमामृत रूपी किरणों से जो प्रिया प्रीतम की आसक्ति है वो केवल शरणागतों के लिए। इसीलिए सकल जंतु सकल जंतु मतलब जितने भी जीव शरणागत हुए जो भी जीव शरणागत हो जाएंगे संपूर्ण जीवों के ताप का हरण करते हैं ऐसे श्री हरिवंश चंद्र जी के मैं सेवक निरंतर समीप रहता हूं और उनके चरण कमल ही मेरे आश्रय सेवक समीप संतत है तो आप कैसे रहोगे नाम वाणी जहां श्याम श्यामा जहां हरि तहां हरिवंश जहां हरिवंश तहा हरि अगर नाम वाणी चल रही तो आप हरिवंश के समीप सेवक समीप संतत रहा तो श्री हरिवंश चरण शरणम जय जय श्री हितन प्रकरण की जय जय श्री हित अ हित धर्म प्रकरण छठा प्रकरण पहले हरिवंश सुनाम कहो हरिवंश सुधिन संग लहु हरिवंश सुम कहो हरिवंश सुन हरिवंश सुना सदा तिनके सुख संपत्ति दंपत्ति जिनके हरि हंस सुना सदा जिनके सुख संपत्ति जो जिनके जिन्होंने हरिवंश शरणागति ली उन्हें सबसे पहले हरिवंश नाम दिया जाता है।

जैसे अपने जीवन में शरणागति के भी पहले बिल्कुल भागवतिक संविधान से हुआ है। हमारे संप्रदाय की जो रीति है भागवतिक बिल्कुल वैसे हुआ मुझी के साथ मुझे कुछ पता नहीं था बिल्कुल वैसे हुआ जैसे होता है हरिवंश नाम प्रथम सुनाना फिर आचार्य के द्वारा शरणागत मंत्र मिलना फिर रसिक महापुरुष के द्वारा निज मंत्र जैसी पद्धति है वैसे पूरा श्री अव्यक्त हरि ने कृपा करके की पहले हरिवंश सुनाम कहो सबसे पहला काम है शरणागति के पहले भी इसीलिए सबको दिया जाता है कि राधा वल्लभ श्री हरिवंश जपो कुछ महीने कुछ साल जपो फिर शरणागत हो आरंभ में श्री हरिवंश नाम का उच्चारण करता हूं पहले हरिवंश सुना कहो खूब हरिवंश नाम अब इसका फल क्या होगा हरिवंश सुधर्मन संग लहो जो हरिवंश के प्रेमी जन हैं जो हरिवंश धर्म को धारण करने वाले हैं।

ऐसे रसिकों का संग मिलेगा। यह बड़ा दुर्लभ विषय है। नेह पावनो अति दुर्लभ भगवत प्रेमी मिल सकते हैं। संसार में मिल है भगवत लेकिन तत सुख भाव प्रिया प्रीतम का सहचरी भाव वाला रसिक मिलना जिसे रसिक कहते हैं। रसिक छाप है ही सखियों की है। सखियों के लिए ही रसिक छाप है। बड़ा कठिन है। प्रिया प्रीतम का शुद्ध तत सुख भाव से सेवन करने वाला सहचरी भाव वाला रसिक महापुरुष मिलना बड़ा दुर्लभ है। ये कहां से मिलेगा? बोले हरिवंश नाम जप करो। हरिवंश नाम जप करो। हरिवंश नाम तुम्हें मिला देगा।

हरिवंश नाम तुम्हें रसिकों से मिला देगा। रसिकों से मिला देगा। बिल्कुल अज्ञानी। वृंदावन में हमारा कुछ परिचय नहीं था। महाराज जी के श्री मुख से निकला हरिवंश नाम डाल लो बिल्कुल अब उस समय की हमने स्थिति देखी अपनी बिल्कुल अश्रद्धा क्योंकि सन्यासी थे ना जहां ब्रह्म चिंतन योग वाशिष्ट तो हरिवंश जिंदगी में सुना ही नहीं था सुना ही नहीं था कभी कहीं कहीं नहीं सुना था कहीं आगम निगम पुराण अोचर बात है ना तो इसलिए कहीं सुना ही नहीं तो हमें लगा अपने संप्रदाय में घसीटने की बात कर रहे हैं।

संप्रदायवाद ये सब ठीक नहीं है। कल से हम नहीं आएंगे। मंदिर ही नहीं आएंगे। क्योंकि मंदिर आएंगे धोना देंगे प्रसाद का। प्रसाद का धोना देंगे तो पूछेंगे हरिवंश नाम जपते हो कि नहीं? तो हम झूठ बोलेंगे नहीं मंदिर में। हम कह देंगे नहीं जपते। हमारी श्रद्धा नहीं तो इनको दुख पहुंचेगा। पर यही है ना कि आंख लड़ गई तो अब जाओगे। कहां जाओगे? अब तो फंसना ही पड़ेगा। हमें क्या पता हरिवंश नाम ने फांस लिया है। यह बात जरूर कान में सुनाई दी थी कि राधा वल्लभ जी को जब देखते थे तो आनंद गोस्वामी जी जो मुझे ऐसे देखते सांवले से हैं वो कहते फंसेगा ये बाबा फंसेगा।

कहते देख लेना राधेश लाल जी से कहते तो हम ऐसे मुड़ के देखते बोले देख लेना उस समय सन्यासी थे। बोले देख लेना परिणाम में फंसेगा बाबा फंसेगा। क्योंकि जब राधा वल्लभ जी राधा वल्लभ जी को देखते तो देखते ही रहते घंटों देखते रहते ये लसा था कभी यहां ऐसे पकड़ के इधर देखना कभी वहां पीछे बारंडे में खंबे की आड़ में खड़े होके घंटों बस उनको देखते रहना बस यही काम था छड़ी उठाई उनको गए घंटों देखते रहे जब देखतेदे उनकी इच्छा हुई कि जाए तो कमंडल लिया ब्रजवासी गोस्वामी पर के मधुकरी मांगी शंकर जी के मंदिर के पास पाया कोकिल साईं की में आचमन किया और आकर के यहां नलवे जो ये कालीद में वो पंप है ना यहां आकर के आराम से फिर घंटों कभी-कभी रोना भी आता था एकांत शांत कच्चा रोड था कोई परिक्रमा थी नहीं कि किसी का आना बड़ा आनंद रहता अकेले बिल्कुल आनंदमय जीवन था तो पहले हरिवंश सुन बिल्कुल चमत्कार हरिवंश नाम गजब का हरिवंश नाम का चमत्कार का पूरे जीवन के सिद्धांत को पलट के रख दिया।

पूरे जीवन के सिद्धांत को पलट के रख दिया। हरिवंश नाम का अद्भुत प्रभाव अद्भुत प्रभाव नहीं वर्षों बाद गुरु जी से कहा था कि महाराज जी आपकी आज्ञा से चतुरासी जी का पाठ करता हूं। बिल्कुल जो जो आप कहते हो करता हूं लेकिन पाई भर फर्क नहीं हमारे हृदय में हमें विश्राम योग वाशिष्ट में ही मिलता है। आम ब्रह्मास्म की जब बातें हम पढ़ते हैं अष्टावक्र गीता योग वाशिष्ट हो तब हमें जाकर शांति मिलती है। तो एक महाराज जी ने कहा चलो आज वाद ग्राम चलते हैं। महाराज जी ऐसे कभी प्रस्तुत नहीं किए कि ऐसे दाता हैं कि कभी प्रस्तुत नहीं किए मैं दे रहा हूं।

गए बस जाते ही बस ऐसे लेट गए बैठ बोले सेवक वाणी सुनाओ बस मंत्र चल रहा पूरी आपसे सत्य कहते सेवक वाणी पूरी होते बिल्कुल ठसक आ गई मन क्रम वचन शुद्ध सकल मत हमसे हित हरिवंश उपासी एक दिन में एक बार के पाठ में गुरु जी ने पूरा का पूरा हरिवंशी बना दिया एक दिन वो उनहीं कथा पाठ तो हम रोज पुरी सेवक वाणी कंठस्थ थी चतरासी जी कंठस्थ पुट वाणी कंठस्थ सुधा निधि कंठस्थ अब तो सब स्मृति शक्ति कमजोर होती जा रही है नहीं तो यही परिक्रमा में चलता था परिक्रमा लगाते हुए तो पहले हरिवंश सुनाम कहो हरिवंश सुनाम का परिणाम हरिवंश सुधर्मन संग लाओ जो खूब हरिवंश नाम जप करता है उसे हरिवंश धर्मियों से प्रेम हो जाता है अपने घर के लगने लगते हैं।

जो धर्मिन सो प्रीत नहीं तो कहा भयो धर्मी जो कहयो यदि धर्मियों से प्रेम नहीं तो क्या हुआ तुम्हें धर्मी कहलाने से हरिवंश सुनाम सदा तिनके जो हरिवंश धर्मी हैं उन महापुरुषों की सुख संपत्ति श्यामा श्याम है तो जो हरिवंश नाम जापक हैं उन्हें हरिवंश धर्मियों का संग मिला जो हरिवंश नाम जप करते हैं और हरिवंश धर्मियों का संग करते हैं। उनको क्या सुख प्राप्त होता है? श्यामा श्याम उनकी संपत्ति के रूप में होते हैं। दो बातें हरिवंश नाम जप राधा वल्लभ श्री हरिवंश नाम का जप और हरिवंश धर्मियों का संग बस आन उपासक नहीं उपासक नहीं वर्णन है वचन सिद्धांत लीला में अनेक भक्त हैं जिनकी अनेक अनेक भावना उपासना है जिनको तसो अपने को चाहिए कि अपने रस के जो रसिक महापुरुष है उनका संग करें नहीं तो नाम वाणी सब पूरा कर देगी।

नाम वाणी के द्वारा ही सब कुछ हो जाएगा। हमें और किसी के संग की जरूरत नहीं। मतलब बहुत अंतराय पड़ता है। अगर सुलझा हुआ अपने भी धर्म कौन हो तो फंसा दे। बता रहे अपने ही धर्म के थे। कल वो बोले किसके भी ऊपर की कोई बात है। सेवक वाणी के ऊपर वेद नहीं औरों की क्या बात है? वेद नहीं है क्योंकि वेद जिसे नेति नेति कहते हैं ताको ते अध सुधारस जाके उसका वर्णन हो रहा है हरिवंश सुनाम कहो नित के मिलेह कहो कृत सुधरिन के हरिवंश सुना एक सुधर बिन के के हरिवंश उपासन है तिनके सुख संपत्ति संपत्ति जो जिनके हरिवंश उपासन है जिनके सुख संपत्ति दांपति जिन के श्री हरिवंश सुनाम कहो नित के बस हमारे नित्य इतने ही काम है श्री हरिवंश श्री हरिवंश श्री हरिवंश मिल ही कहो कृत सुधर्मिन के हरिवंश नाम जपते हुए हरिवंश धर्मियों से मिलकर के मैं कुछ कर्मों को बतलाता हूं जिससे श्यामा श्याम रूपी सुख संपत्ति प्राप्त होती है।

उपासक जो हरिवंश नाम जप करता है। हरिवंश धर्मियों का संग करता है। उसके मैं कुछ कृत बताता हूं। सुधर्मिन के कृत्य। हरिवंश उपासना जिनके है वो पक्का समझ ले। उनको श्री जी मिलेगी। श्री जी की सेवा मिलेगी। हरिवंश उपासन है तिनके सुख संपत्ति दंपत्ति। ये बैठा लो बात बैठा लो। हमें श्री जी मिलेगी। हमें श्री जी की सेवा में जाना है। हमारे इष्ट श्री श्यामा श्याम है। हम दूसरी बात ना सुनना चाहते हैं ना जानना चाहते हैं। बस इतनी बात हमारे बैठनी है। हरिवंश नाम जपना है।

हरिवंश धर्मी का संग करना है। श्यामा श्याम की प्रेम में डूबना है। उनकी सेवा करनी है। हरिवंश गिरा रस रीति का है। सुकृति जन संगति नित्य रहे हरिवन संगति कछु धर्म विरुद्ध नहीं तिन सुख संपत्ति दत्ति जिनके कछु धर्म विरोध नहीं सुकृति जन संगति नित्य रहे जो बड़े पुण्य आत्मा होते हैं उन्हें रसिकों का संग प्राप्त होता है। वैसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा पुण्य पुंज बिन मिलेह न संता देवर्षि नारद जी ने भी कहा मा संगस्त दुर्लभो लेकिन अगम्य तुरंत लिखा अगम्य क्योंकि कहीं तुम्हारा दोष दर्शन हो सकता है अशुद्धा हो सकती है तुम उनकी मानसिक प्राकृतिक क्रियाओं को देख सकते हो बिल्कुल इस बात से सावधान रहे मानसिक प्राकृतिक क्रियाएं नहीं देखनी मुझे मुझे बिल्कुल कुल दृष्टि रखनी कि मेरे प्रभु मेरे प्रभु मेरे प्रभु तो बोले अमोगस जाओ निश्चित भगवत प्राप्ति होगी अमोगस सुकृति जन संगति नित रहा सुकृति जन पुण्य आत्मा पुरुष पापी पुरुष को दोष दर्शन जिसका मलिन अंतकरण है उसका निश्चित दोष दर्शन हो जाएगा जैसे करोड़पति अपने रुपए को छुपाने के लिए फटीचर बनकर के चलना चाहेगा कि इस गली में चोर लगते हैं तो मैं फटीचर बन के निकल जाऊं जिससे इसको पता ना चलने पावे कि करोड़पति है।

ऐसे रसिकों की लीला होती है कि मैं ऐसा विषय बन के निकल जाऊं। ऐसा संसारी बन के निकल जाऊं कोई जान ना पावे कि मैं किस कोटि का कहां का कैसा हूं। तो उनकी छोटी मोटी सांसारिक क्रियाएं चेष्टाएं उनको देख के पापी पुरुष को जो मलिन अंतकरण का होता है हम तो समझते थे कुछ और यहां तो कुछ और है बस वो गया खिसक गया सुकृति जन संगति नित्य रहा जो पुण्यत्मा पुरुष मेरा जीवन कृतार्थ हो गया अहो भाग्य मुझे रसिकों का संग मिला संभाषण मिला हरिवंश गिरा रस रीति कहे हरिवंश वाणी की ही चर्चा होना हरिवंश वाणी का ही गायन होना और हरिवंश सदस्य रीति से चलना और हरिवंश धर्मियों का संग करना ये किसी बहुत बड़े पुण्य आत्मा का लक्षण है।

बहुत पुण्य एकत्रित होते हैं। तब श्री जी सुकृति जन संगति नित्य रहे तब अपने जनों का संग देती है। जाओ मिलो सुकृति जन संगत नित्य रहे पुण्यत्मा जब पुण्य बहुत एकत्रित होते हैं तब रसिकों का संग मिलता है और रसिकों के संग में मिलकर के श्री प्रिया प्रीतम की बातें हरिवंश वाणी की बातें हरिवंश वाणी का गायन हरिवंश वाणी का चिंतन हरिवंश रस रीति निष्काम भावना की पुष्टता तत सुख भाव ये सब प्राप्त होता है। बोले कछु धर्म विरुद्ध नहीं तिनके सुख संपत्ति दंपत्ति जो जिनके कछु धर्म नहीं जिनके सुख के सुख संपत्ति दंपत्ति जो जिनके जिन प्रेमियों की संपत्ति दंपत्ति प्रिया प्रीतम है अब सब कुछ धर्म विरुद्ध नहीं थे इनके उनका कोई भी कर्म धर्म विरुद्ध नहीं हो सकता क्योंकि उनका सुख संपत्ति प्रिया प्रीतम है बड़े पुण्य से हरिवंश नाम में प्रीति होती है हरिवंश नाम की कृपा से रसिकों का संग मिलता है रसिकों के संग से रस रीति मिलती है चतुरासी जी नाम मंत्र में प्रीति होती

है और इसका फल होता है प्रिया प्रीतम की प्राप्ति कछु धर्म विरुद्ध नहीं तिनके क्या धर्म विरुद्ध है कुछ धर्म विरुद्ध नहीं तिनके सुख संपत्ति दंपत्ति जिनके जिनके सुख संपत्ति श्री प्रिया प्रीतम उनकी सेवा है कुछ धर्म विरुद्ध नहीं हरिवंश प्रसत नित्य रहे रस रीति विवित कृत्य कहे हरिवा प्रशत नित्य रहे रीति विवरित कृत्य कहे जो कछु कुल कर्म नहीं तिन सुख संपत्ति दपति जो जिनके जो कछु कर्म नहीं सुख संपत्ति जिनके अब हरिवंश धर्मी को केवल प्रशंसा करनी है तो हावंश बस प्रिया प्रीतम सहचरी भाव वृंदावन रसिक जन यमुना जी बस और हमें कोई चर्चा नहीं करनी जो नित्य रूप से श्री हरिवंश की ही प्रशंसा करते हैं।

हरिवंश प्रशंसत नित्य है और प्रशंसा पूर्वक बार-बार शरणागति हृदय से जब कृपा का अनुभव होता है ना तो बार-बार शरणागति होती है। बार-बार शरण हुए होते हुए भी प्रतिपल शरणागति बढ़ती रहती है। रस रीति विवर्धित कृत कहे श्री हरिवंश भजन की जो रस रीति है उसी को पुष्ट करने वाले कार्य रसिक जन बताते हैं। श्री युगल के लीला चरित्रों का गायन श्री युगल की आठों पहर सेवा श्री युगल मंत्र का जप यही रसिक जन पुष्ट करते हैं। इसी से पुष्टता आ जाती है। ऐसे उपासकों के लिए जिनकी सुख संपत्ति से दंपत्ति श्यामा श्याम है।

कोई कुलकर्म शेष नहीं रहेगा। अब कुलकर्म नहीं करना चाहिए कि पितृ तर्पण करना है। देव तर्पण करना है। जैसे वो पितर आते हैं तो पिंड कुछ नहीं। हमारा सब कुछ श्री हरिवंश है। हो गया। हरिवंश श्री हरिवंश श्री हरिवंश चतुरासी जी का गायन और प्रिया प्रीतम के आठों पैर सेवा बस इसी से सब कुछ हो गया अलग से हमें कुछ नहीं करना हरिवंश धर्मी कुल कर्म नहीं करता जो कछु कुल कर्म नहीं तिनके तो सुख संपत्ति दंपत्ति जो जिनके हरिवंश सुना जो नित्य रटे छिन जाम समान न ने घटे हरिवंश सुना जिन नाम समान न विधि और निषेध नहीं तिनके सुख संपत्ति दंपत्ति जो जिनके विधि और निषेध नहीं जिनके सुख संपत्ति संपत्ति जो जिनके जो निरंतर राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश हरिवंश सुनाम जो नित्य रटे बस रटते राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश और छिन जाम समान न नेक घटे एक क्षण के लिए भी और एक प्रहरों के लिए भी कभी नाम नहीं रुकता।

नाम निरंतर चलता रहता है। बस यही हमारी कमी है जो नाम नहीं चला पा रहे हैं। हम सब लोगों को चाहिए छिन जाम समान न ने हटे। चाहे एक क्षण हो चाहे एक प्रहर हो एक क्षण के लिए भी नाम नहीं छूटना चाहिए। नाम वाणी बराबर उसमें बने रहना चाहिए। बोले जिनका सुख संपत्ति दंपत्ति प्रिया प्रीतम है और जिन निरंतर प्रति क्षण प्रति पहर नाम जप करते हैं उनके लिए कोई विधि निषेध नहीं है सब हो गया आज ये तिथि ये नक्षत्र ग्रहण ये सब हमारे यहां कुछ नहीं राधा वल्लभ श्री हरिवंश और सुबह मंगला से लेकर सयन तक श्री जी को भोग राग आरती सेवा पूजा वाणी गायन वाणी चिंतन ये रोज आए बस नित्य आए कौन दिन है कौन तिथि है कौन वार है कौन नक्षत्र है कौन ग्रहण है कौन मास है कौन ऋतु हमसे इसे कोई मतलब नहीं आठों पहर प्रिया

प्रीतम की सेवा में अगर ऋतु आदि का हमें ज्ञान है तो प्रिया प्रीतम को सुख पहुंचाने के लिए कि आज बसंत ऋतु प्रारंभ है अब ये ऋतु है तो यह सुख प्रिया प्रीतम को पहुंचावे विधि और निषेध नहीं शास्त्र क्या विधि करता है क्या निषेध करता है अभी ये सब श्री हरिवंश श्री हरिवंश हमें विधि निषेध विधि निषेध नहीं दास अनन्य उत्कट व्रत धारी ये अनन्य उत्कट व्रत है हरिवंश सुधर्म जो नित्य करे हरिवंश कह सु नहीं बिसरे हरिवंश सुध जो हरि हरिवंश क सुरे हरिवंश सदा निधि है तिनके सुख संपत्ति दंपत्ति जो जिनके हरिवंश सदा निधि है जिनके सुख दति जो जिनके हरिवंश सुधर्म जो नित्य करे करें नित्य वो हरिवंश सुधर्म में ही रहते हैं।

यही जो अपनी दिनचर्या है यह हरिवंश सुधर्म है जिसमें मिलावट किसी की नहीं है। और हरिवंश कहे सु नहीं बिरे हरिवंश की आज्ञाओं का पालन करते हरिवंश जो कही श्याम श्यामा पद कमल संगी सिर नायो तेन वचन मानत गुरु द्रोही निश दिन करत आपन भयो इस परमार्थ न उत व्यवहार बीच ही बीच जो जन्म गमायो जो धर्म सो प्रीति करत नहीं कहा भयो धर्म जोो सेवक जी महाराज कह रहे सेवक की हरिवंश की आज्ञा क्या है श्याम श्यामा पद कमल संग सिर नायो हरिवंश की आज्ञा क्या है निजमंत्र हरिवंश की आज्ञा क्या है राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुख नाम हरिवंश की आज्ञा क्या है स्फुट वाणी चतुरासी जी सुधा निधि ये सब इसी में हमें रहना हरिवंश सुधर्म जो नित्य करे और हरिवंश कही सु नहीं बिसरे देखो हमें भले परिचय ना बनावे लेकिन जब हम किसी भी रसिक को देखें राधावल्लवी भी या किसी भी तो हमारे नेत्र तो झुक जाने चाहिए।

इतना तो हो जाना। जैसे हमारे बच्चे हमारे आप लोगों को आप प्रणाम करते हो तो यह स्वाभाविक हो जाता है। तो एक दो बच्चों ने जैसे रोका कि आप हाथ क्यों जोड़ते हैं? तुम कहा हम आपको नहीं जोड़ रहे हैं। हम अपने प्रभु को जोड़ रहे हैं। आप में हमारे प्रभु विराजमान है। हम उनको जोड़ रहे हैं। उनको प्रणाम कर रहे। तो ये नहीं कि हमारा शिष्य है तो नहीं शिष्य तो नाटक है। शिष्य तो स्वांग है तो मेरा इष्ट मैं अपने इष्ट के साथ खेलता हूं। मैं अपने इष्ट के साथ ही पूरा संपूर्ण समय व्यतीत करता हूं।

कोई और दूसरा नहीं। मेरा इष्ट ही हर रूपों में विराजमान है। तो हरिवंश झुक श्याम श्यामा पद कमल संगना। यह बात याद रखनी है कि चाहे जितना हम भजन में हो परिचय बनाना तो हम ठीक नहीं समझते लेकिन नेत्रों से तो प्रणाम करना अनिवार्य है। देखते ही जय मन में ऐसे प्रणाम कर लिया भले क्योंकि ऐसे बातचीत होने का अवसर होता है और फिर वो ठीक नहीं रहता। परिचय भले ना बनाए लेकिन देखते ही चाहे वो स्त्री हो चाहे पुरुष स्वरूप में हो हम उसे नमस्कार जरूर करें। हम प्रणाम जरूर करें।

ये हरिवंश महाप्रभु की आज्ञा है। राधा वल्लभ लाल का नाम जपना, राधा वल्लभ लाल का ध्यान करना ये महाप्रभु की स्पष्ट आज्ञा है। राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुखना अगर हम नहीं करते तो हम गुरु द्रोही कहलाएंगे। रसिकों को प्रणाम और राधा वल्लभ श्री हरिवंश नाम का जप और जिसको निज मंत्र आदि मिल गए हो मंत्रों का जप चतुरासी जी का पाठ बोले हरिवंश क सु नहीं बिरे जो हरिवंश जी ने आज्ञा करी उस आज्ञा को कभी वो विसारते नहीं हरिवंश सदा निधि है तिनके जिनकी सुख संपत्ति से प्रिया प्रीतम है प्रिया प्रीतम रूपी संपत्ति की सेवा रूपी सुख है उनके सर्वस्व हरिवंश है सर्वस्व निधि हरिवंश पूरा मन हरिवंशकार हो जाता है।

हरिवंश मेंय हो जाता है। कुछ नहीं और कोई तत्व नहीं और कोई सब हरिवंश सब हरिवंश हरिवंश प्रताप ही जानत है। हरिवंश प्रबोध प्रमाणत है। हरिवंश प्रताप है हरिवंश प्रभु हरिवंश सु सर्वसु है तिनके सुख संपत्ति दंपति जो जिनके हरिवंश सुसु है जिनके सुख सापति जो के हरिवंश प्रताप ही जानत है क्या है हरिवंश प्रताप थोड़ा समझना पड़ेगा संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड में अनंत ब्रह्मांडों में जिनका प्रभाव है वह है लालचू महाराज जैसे हरिवंश करत अपनो जस प्रगट अखिल ब्रह्मांडन अखिल ब्रह्मांडाधिपति है श्री लाल महाराज अनंत ब्रह्मांड कितनी बड़ी माया का सब रचनाएं पार नहीं पा सकते बड़े-बड़े त्रिकालक ऋषि मुनि पार

नहीं पाए वेद नहीं पार पाए जैसे धरिवंश प्रताप रूप गुण वैब बल श्याम उजागर और वो ऐसे लाल जो महाराज जाकी भू विलास बस पशु दिन विथित रस सागर सबसे बड़ी सत्ता लालू महाराज और लालजू को जो अधीन किए हैं वो तू जस कोटि ब्रह्मांड विराजे श्री राधे स्वामी जी महाराज कह रहे हैं तू जस कोटि ब्रह्मांड विराजे श्री राधे और श्री राधे किन के अधीन है हरिवंश के अधीन पक्का समझो जैसा सजनी डांट भी देती है तू तो सखी सयानी ते मेरी एक को ना मानी हो तो सो कहत हारी जुत जुगत सो पता है मोहन लाल छबी लो अपने रंग रंगीलो मोहत विहंग पस मधुर मुरली रो ते तो गनत तन जीवन जोवन तो जय श्री हरिवंश हरि भजे भा चलो हरि भजे भा जो तो चल पड़ी पुकलित होकर के आलत होकर चल आज्ञा का उल्लंघन लाल जो की आज्ञा का उल्लंघन कोई कर सके त्रिभुवन में ऐसा कोई है नहीं और प्रिया की आज्ञा आज्ञा का उल्लंघन लाल जो कर सके ऐसा हो नहीं सकता और हित सजनी की आज्ञा का उल्लंघन प्रिया लाल नहीं कर सकते आज्ञा भी देते हैं गुरु है श्री जी के ये गुरु है श्री जी के हित्सनी जो को

कला संगीत में सबसे निपुण श्री लाडली जो है वो भी जहां बेशुद्ध होती है वहां सुद्ध धारण करके उपदेश करती है इसलिए नागरी दास जी ने लिखा है हरिवंश गुरु राधिका राधिका गुरु हरिवंशी हरिवंश की गुरु किशोरी जो तो किशोरी जो की गुरु हरित सजनी जो तो सबसे बड़ी सत्ता कौन है हित सजनी जो तो हरिवंश प्रताप जान अगर हरिवंश भरोसे तो पूरा डिपार्टमेंट आपके अधीन हो गया पूरा और अखिल कोटि ब्रह्मांडों के अधिपति सहित प्रियाजू सहित सब यही तो खास बात चाबी मिलती नहीं है। यह है चाबी।

निकुंज की चाबी है। हरिवंश नाम हरिवंश शरणागति। हरिवंश प्रताप अगर हरिवंश प्रताप जानते हो, पड़े सो रहे हो वृंदावन में बस पड़े रहना। तो हरिवंश प्रताप से आपकी नौका निकुंज पहुंच जाएगी। तो सुख तरत निकट हरिवंश सेवक श्री हरिवंश प्रताप नाम नौका और निज खेवक भवसागर सुख तरत निकट हरिवंश नौका में आनंद से हवा लेते बैठे किस में नौका में राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा हमारी नौका निकुंज तक पहुंच रही है कहने वाले स्वयं आप है नौका है नाम और प्रताप के बल से हम निर्भय हैं।

श्री हरिवंश प्रताप के हम बल से निर्भय कि नाविक और नौका दोनों ऐसी नहीं कि कभी डुबो दे। ऐसा नहीं कि नाव कहीं गड़बड़ हो जाए पलटेगी नहीं। और नाविक इतना कि आज तक जो इस नाव में बैठे उनको पार कर ही दिया। कोई ऐसा नहीं रहा जिनको पार नहीं किया। कैसे वो पापी क्यों ना हो पार कर दिया। तो हरिवंश प्रताप ही जानत है और हरिवंश प्रबोध प्रमाणत हरिवंश के उपदेश ही उनके जीवन में प्रमाण है। महाप्रभु ने ये कहा सेवक जी ने ये कहा वृंदावन दास चाचा ने ये कहा धरदास जी ने कहा ये सब हरिवंश प्रमाण है।

इनकी वाणियों का प्रमाण वेद रसकन की वाणी। जैसे कोई भी प्रमाण ढूंढने के लिए वेद शास्त्र होना चाहिए। तो हमारे यहां वेद रसकन की वाणी हरिवंश प्रमाण हरिवंश के वचन ही हमारे लिए प्रमाण है। हरिवंश के वचन, सेवक जी के वचन, ध्रुवदास जी के वचन, वृंदावन दास चाचा के वचन ये सब हरिवंश वचन है। हरिवंश प्रबोध प्रमाण हरिवंश के उपदेशों को प्रमाणिक मानते हैं। ऐसे उपासकों के लिए जिनकी सुख संपत्ति युगल वर्षी श्यामा श्याम है। श्री हरिवंश ही सर्वस्व है। हरिवंश सर्वस्व है जिनके सर्वस्व श्री हरिवंश है।

बस ये विचार कर लो अब भटकने की जरूरत नहीं है। भगवत कृपा से सेवक वाणी सुनने को मिल रही है। अपने सिद्धांत को समझो। राधा वल्लभ श्री हरिवंश कहते हुए यदि हम पड़े हैं तो हम निकुंज की तरफ जा रहे हैं। दृढ़ निष्ठा हरिवंश महाप्रभु के चरणों में कोई विधि निषेध नहीं। बस रसिकों का आदर तेन वचन मानत गुरु द्रोही उसे गुरु द्रोही कहा गया है जो प्रेमी रसिक महापुरुषों का अनादर अगर वो हमें गाली भी दे हमारा अपमान भी करें उनसे कोई त्रुटि भी हो जाए तो हम ऐसे ही रहे देखो उस दिन चर्चा हुई थी भोरी सखी कह रही कि अगर वो अस्त्र लेकर मुझे मारे भी तो मैं हाथ जोड़कर उनके चरणों में ही पड़ूं कभी उन पर क्रोध दृष्टि ना करूं कभी उन पर दोष दृष्टि ना करूं।

ऐसा रसिकों का संग हो। ऐसे रसिकों की प्रतिभाव हो और हम नाम जप करें। वृंदावन तो मिल ही गया है हमें। अब दिव्य वृंदावन मिल जाएगा। इसमें कोई संशय नहीं। जय जय सीता।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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