भगवद्प्राप्ति का ये गुप्त रहस्य जान लो ! // 23/05/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
गीता जी में भगवान ने एक श्लोक में कहा बंतस भूताना मचम चमे सूक्ष्म तगम दूरस्थम चा बंत नाम अचरम च सूक्ष्मा तदवियम दूरस्थम चा मैं बाहर भी हूं अंदर भी हूं समस्त चारचर जगत में व्याप्त हूं बहुत दूर भी हूं बहुत नजदीक भी हूं यह बात ध्यान देने योग्य है दूरस्थम चा इतने नजदीक है कि हम अपने स्वयं नजदीक नहीं है। हम स्वयं नजदीक नहीं है। क्योंकि हम देह में फंसे हुए हैं। बहुत दूर है अपने से लेकिन प्रभु शांति के तत्व बहुत नजदीक है। दूरस्थम च बहुत दूर है। ऐसा क्यों कहा बंत नाम चम चव च सूक्ष्मा तिकम दूरस्थम शांति के चत मैं बाहर भी हूं भीतर भी हूं चराचर जगत में व्याप्त हूं और बहुत नजदीक भी हूं और बहुत दूर भी हूं।
यह बात भगवान ने गीता जी में कही। हमें दो बातों में समझना है। बाहर भी है, भीतर भी है, चराचर जगत में है। ये तो है मान लिया। लेकिन दूरस्थम शांति के तत्व बहुत दूर है। बहुत नजदीक शांति के तत बहुत नजदीक है। इसमें रहस्य है। जो बुद्धि के द्वारा साधना करता है। बहुत दूर परमात्मा है। जो शरणागत होकर कृपा के द्वारा साधना करता है। साधना उससे भी होती है। शांति के चतुरत बहुत नजदीक है परबह्म परमात्मा जब तक अपने में कर्ता भाव रहता है तो वो साधना नहीं होती वो क्रिया होती है।
जब कृपा भाव आता है तब वह साध ना बोले हमारी साध पूरी हो गई। साध का मतलब क्या होता है? चाह बोले हमने अमुक देवता को मनाया तो हमारी साध पूरी हो गई। साधना माने चाहना यही साधना है। चाहना यही साधना है। दो अर्थ समझे इसके चाहना यही साधना है। और चाहना यही साधना है। इष्ट से जगत से हमारा कोई संबंध कोई चाह ना रह जाए। इष्ट को ही हम केवल चाहे। इष्ट के ही बल बलवान बने। इष्ट की ही कृपा मनावे। इष्ट के विधान में दोष दर्शन ना करें। हम लोग बहुत शद्र बुद्धि के हैं। बहुत नीच बुद्धि जिसे कहते हैं।
हम अपने इष्ट की कृपा को कृपा ना मानकर उसमें अपने बौद्धिक स्तर से देखते हैं कि मेरी उपलब्धि मेरी की हुई। इष्ट के विधान को विधान ना मानकर कृपा ना मानकर फिर वंचित हो जाते हैं। जहां अपनी बुद्धि लगाते हैं। इष्ट नजदीक घसीटना चाहता है। पर हमारी बुद्धि हमको इष्ट से बहुत दूर कर देती है। बस मव मन आदत म बुद्धिम निवेश मेरे में मन और बुद्धि अर्पित कर दे तो तू मेरे में निवास करेगा। अब शरणागति की इतनी शुद्ध वार्ता सुनने के बाद यदि हम अपने शरीर में मैं बुद्धि अपनी क्रियाओं में कर्ता बुद्धि अच्छे विधान में सुख प्रतिकूल विधान में दुख तो हम साधक किस बात के रह गए इष्ट के विधान में दोष दर्शन भगवान को ऐसा नहीं करना चाहिए।
प्रभु को ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसा नहीं। नहीं हम आपके हैं। नहीं तो हम प्रभु से प्रश्न कर सकते हैं। कि बचपन से अभी तक लगे हैं। अभी कोई चाह रह गई है क्या? कुछ पाना, कुछ मिलना, कुछ भोगना, कुछ देखना। कभी प्रश्न नहीं किया। जैसे तुम खिलाड़ी हो खिलाओ। जैसे तुम चाहो वैसे जो रा तुम्हारा इशारा चाहिए बस इशारे पर चलते हम कठपुतली है हम वैसे नाचते हैं जैसे तुम नचाते हो यदि तुम नचाना चाहते हो दक्षिण की तरफ तो हम उत्तर की तरफ नहीं नाचेंगे और तुम नचाना चाहते हो उत्तर की तरफ तो दक्षिण की तरफ कदम नहीं रखेंगे।
बार-बार सत्संग में हम यही कहते थे हमें सिर्फ प्रभु के हो जाना है। यह अवसर बार-बार नहीं मिलता है। जो शानिध्य मिला है, जो कृपा मिली है, उसे गुलाब के फूल में कांटे भगवान को नहीं देने चाहिए थे। कितना सुंदर, सुगंधित, कोमल और कांटों में। कीचड़ में कमल नहीं खिलना चाहिए था। किसी सुगंधित पदार्थ में कमल खिलना चाहिए था। कुछ ये है ऐसे कुछ कांटे रखते हैं जिनमें गुलाब रख दिया है। कांटों से बचा के गुलाब तक पहुंचो। जल्दीबाजी करोगे तो कांटों में ही फंस जाओगे। गुलाब नहीं मिल पाएगा।
ऐसे ही कुछ प्राकृतिक बाधाएं रखी भगवान ने अपने मिलन के लिए। तभी हम इतने लालायत है अगर भगवान से हमारे जैसे मिल जाए ना तो कोई महत्व ही ना रखो आप लोग कोई मात्र तो ना रखो भगवान खेलने लगे ना तो अवहेलना हो जाएगी गोपी जनों के मन में आ गया कि मैं विश्व में सबसे सुंदरी हूं जिससे भगवान मेरे इशारे पर नाच ते इसलिए अंतधान हो गए भगवान बहिस भूत नाम चम च सूक्ष्मा तद दूरस्तम शांति के चत दूर किन के लिए है हम सबके लिए इसीलिए दूर है और शांति के चत कैसे बता साथ खेलते हैं दिमाग में हृदय में बाहर भीतर साथ खेलते हैं।
दृश्य बदल जाता है। चश्मा बदल जाता है। पर वो ऐसे खिलाड़ी है कि इतने शहर में कहां मिलती है? मतलब ये नकली है। अगर आपको सोने का हार दिया जाए तो फिर क्या पहन लो। तो आपको लगेगा मैंने मेहनत तो की नहीं और मुझे ऐसे दे रहे तो ये नकली होगा और जब पसीना चुए खूब मेहनत किए सालों और फिर अगर दे तो उसको इसीलिए भगवान पूरी जिंदगी की जिंदगी नाक रगड़ते व्यतीत हो जाती है और वो झलक भी नहीं देते मुनि मन ध्यान धरत नहीं पावत लेकिन करत विनोद संग बालक भट जो संबंध माने हुए शरणागत जन है उनके साथ भगवान विनोद करते हैं खेलते हैं लीला लीला करते हैं।
इसलिए सबसे प्रार्थना है हमारा मार्ग शरणागति का है। हमारी दृष्टि केवल शरण प्रभु पर रहे और उनके विधान पे रहे। बहुत सूक्ष्म विधान होते हैं भगवान के। वह हमारा भरण पोषण करते हैं। वह हमारी साधना बढ़ाते हैं। वह साधना की रक्षा भी करते हैं। योगक्षम महाम्यम भगवान कह रहे योग जो प्राप्त है उसमें और जो प्राप्त होना है वो मैं कराऊंगा। और जो प्राप्त है उसकी रक्षा भी मैं करूंगा। तो अपने लोग शरणागत है। कोई अनाथ तो है नहीं। अपनी संपत्ति ऐसी तिजोरी में रखी कोई लूट नहीं ले जा सकता।
पूर्ण शरणागत रहो। हर समय नाम जपने का प्रयास करो। शरीर से जितनी भी चेष्टाएं हो रही है। यह देखो कि मेरे द्वारा करवाया जा रहा है। वास्तविक ऐसा दो है माया तो यता रू मम माया और भक्ति तो उमादार जो कि नाई समय नचावत राम गोसाई भगवान कठपुतली की तरह सबको नचा रहे हैं तो उसी में हम भी हैं। यदि आप भक्ति नहीं मानते तो माया के द्वारा जैसा नचाया जा रहा है वैसा नाच रहा है जीव और भक्ति के द्वारा देखो तो जैसा भगवान नचा रहे हैं। मैं तो तेरे नचाए नाचूं। राधा वल्लभ लाल।
मैं तो तेरे ही नचाए नाचूं। जैसे वो नचवा रहे हैं वैसे नाच रहे हैं। अहम का गलित हो जाना देह भाव का गलित हो जाना ही साधना की परिपक्व अवस्था होती है। देह भाव रहित परमात्म चिंतन में हर समय बैठा हुआ है या चल रहा है या पड़ा है या खड़ा है। भगवत चिंतन में तन्मय है। भगवत चिंतन परायण रहो। आस किसी से नहीं रखनी। पूर्णता प्रभु से होती है। बस शांत जो शिष्य है वो शरणागत है। जो शरणागत है उसका भार इष्ट और गुरु के ऊपर है। इष्ट और गुरु समर्थ है। वो आपका निर्वाह करेंगे।
तन से, धन से, मन से आप निश्चिंत देखिएगा क्योंकि हम लोग शरणागत हैं। हमारा भरण पोषण हमसे थोड़ी हो रहा है। हमारे इष्ट से हो रहा है। और खूब तन्मयता पूर्वक खाली मत रहो। हर समय भजन प्रणय जो सेवा सेवा बनी राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवं और शरणागति पर ध्यान दो। हमारा जोश आपको शरणागति पर पहुंचाना है। शरणागति हो गए तो बाजी जीत गए। देखो बड़ा सूक्ष्म विषय है। कहा जाता भजन करो हम भी कह भजन करो। लेकिन हरिराम व्यास जी भजन को दूसरे नंबर पर रखा है। बोले काू के बल भजन को काू के आचार्य व्यास भरोसे कुंवर के सो भाव प्रसार ये भरोसा जो है शरणागति है।
हम श्री जी के भरोसे पूर्ण शरणागत है। मेरा कोई अधिकार नहीं। तन मन प्राण पर मेरी लाडली का अधिकार है। मेरे गुरुदेव का अधिकार मेरे प्रभु का अधिकार कहां? अब कल्याण में कहां कमी रह गई? जब सर्वस्व आपका प्रभु तो फिर कल्याण में कमी हो गया। इसी में अपनापन था। उसी को तो हटाना था। काू केवल भजन को किसी को भजन का बल होता है। लेकिन हरि राम व्यास जी कह मुझे श्री जी के भरोसे पर बल है। गोस्वामी जी ने भी दूसरे नंबर पर भजन रखा है। कहा बिगड़ी जन्म अनेक अब सुधरे आज अब अभी आज सुधर जाएगी।
आज अभी अभी सुधर जाएगी। आज और अभी में कोई साधना है क्या? बोले बिगड़ी जन्म अनेक की अब सुधरे आज हो राम को राम का हो जाओ पहली बात फिर नाम जप दूसरे में भजन और तीसरे में तज कुमा कुमा अपने आप त्याग जाएगी तब लोग खूब नाम जप करो ये दूसरी बात पहली बात तन मन प्राण सर्वस्व लाडली गुरुदेव को समर्पित कर दो। हमारी गुरुदेव लाडली है राधेम संप्रदाय कर्ता आचार्य राधा मंत्रदा सगुरु मंत्रो राधा य सर्वात्म वंदे राधा पा प्रधानम मेरी लाडली समुद्र के समान है हम अवगुनी नीच है हमसे कोई अवगुण बन सकता है कोई नीचता बन सकती है पर वो महान है वो हमें क्षमा करके अपनी तरफ खींचेंगे अपनी तरफ तरफ ना खींचे।
तो जैसे हम कहते हैं कि अमृत कुंड में यदि नाली के कीड़े को डाला जाए तो वह समझेगा मुझे दंड दिया जा रहा है। मुझे नाली से निकाला जा रहा है। वो नाली ही पसंद तो हम है ऐसे पर लाडली ऐसी कृपाल है कि हमको प्रतिपल खींचती रहती है। अपने चरणामृत की तरफ, रूपामृत, लीलामृत, नामामृत की तरफ और हम उसी संसार की तरफ भागना चाहते हैं। इसलिए शरण में रहो जो शरणागत के समस्त शुभ अशुभ का नाश कर देते हैं। ऐसे हरिवंश महाप्रभु के हम सब हैं। खूब आनंद पूर्वक भजन प्रयाण रहो। बिल्कुल चिंता ना करो।
हम मिले ना मिले बोले ना बोले हम आप सबको बहुत प्यार करते हैं। यदि तुम्हें प्यार पर विश्वास है तो हम आप सबको प्यार करते हैं। हृदय से प्यार करते हैं और सबको चाहते हैं कि श्री जी की कृपा प्राप्त हो और सब श्री जी के चरणों तक पहुंचे क्योंकि जैसे भी हम कामी क्रोधी लोभी हैं। घसीटा तो आपने ही है। जितना आप हमें घसीट रहे हो उतना ही मैं आपकी तरफ घसीट रहा हूं। जितना आप छोड़ रहे हो उतने संसार की तरफ जा रहा हूं। अगर आप पूरा घसीट ले तो पूरा आपकी तरफ आ जाऊं। मैं तो ऐसे हाथ उठाए बैठा हूं।
आप घसीटो ना मुझे। आपकी घसीटने की सामर्थ्य अनंत सामर्थ्य है। तो आप अपनी सामर्थ्य से मुझे अपनी तरफ बुला लो। मेरी सामर्थ्य नहीं कि मैं आपकी तरफ आ सकूं। और अंतिम बात यही बिल्कुल चिंता नहीं करनी। मैं मिलूं ना मिलूं बोलूं ना बोलूं आऊं ना आऊं। ना ये चिंता करनी कि कैसे कैसे हमारा उत्थान होगा। बिना बोले तुम्हारे दिमाग में हम होंगे। देख लेना बिना बोले तुम्हारे दिमाग में हम होंगे। तुम वही करोगे जो गुरुदेव कहेंगे। यह भगवत मार्ग है। ऐसा खिलवाड़ का मार्ग नहीं है।
होता है। कभी-कभी होता है। भगवान का खेल ऐसा होता है। आप बिल्कुल निश्चिंत रहिएगा। जो जहां जिस सेवा में है उस सेवा में रहिएगा। किसी की आस मत रखिए। इष्ट की आस रखिए। इष्ट का भरोसा रखिए। गुरु कृपा से सब ठीक हो जाएगा। इसी जन्म में हमें भगवत प्राप्ति कर रहे हैं। इसी जन्म में हमें श्री जी से प्राप्त होना है। खूब नाम जप करो। हम रहे ना रहे आए ना आए मिले ना मिले। तुम्हारा मंगल होगा। तुम्हारे गुरुदेव तुम्हारे दिमाग में बैठे रहेंगे। तुम्हारा भरण पोषण इष्ट के द्वारा होगा।
हमारी गांठ बांध लो। तुम्हारा भरण पोषण इष्ट के द्वारा होगा। किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं और जब लगे कि इस व्यक्ति के द्वारा हो रहा है तो छोड़ देना। इष्ट के द्वारा भरण पोषण हो रहा है। इष्ट ही सबको संभालेगा। हम में बहुत कमियां है। हम में बहुत गलतियां है। उनको श्री जी ही क्षमा करके सुधार करके अपने आप में लाएंगे। हमारी सामर्थ रही श्री जी तक पहुंचने की। पूरा जीवन हो गया। उन्हीं के चरणों के आश्रित अब वो जैसे चाह तैसे चलावे। उन्हीं का बल लेकर के हम आप लोगों से बात करते हैं।
हमारे में क्या बल है? आप निर्भय निश्चिंत निशोक खूब भजन प्रायण रहो। हमारा जब मन होगा तब हम बोल देंगे। नहीं हम मौन चुपचाप शांत एकांत वास कर रहे हैं। और वो एकांत आपके लिए ही है। हमारे लिए हम एकांत नहीं है। हमारे लिए हम भजन नहीं कर रहे। हमारे लिए हमारा मौन नहीं है। हम आपको सही बताएं। हमारा जो कुछ होना था वो हो गया है। सब जो कुछ हो रहा है वह सब आप सबके लिए हो रहा है। खूब भजन करो, नाम जप करो, आश्रित रहो और सुखी रहो, प्रसन्न रहो और देखना गुरु प्रसाद क्या होता है?
ये प्रवचन वचन इन सब से कुछ बात नहीं बनती। वो बात जो बनती है अंदर के संकल्प से बनती है। गुरु प्रसन्नता गुरु प्रसन्न साहब अनुकुला गुरु प्रसन्न साहब अनुकूल हो गए। मिटी सकल कल्पित भय सुला समस्त कष्ट समस्त दोष नष्ट हो गए गुरु प्रसन्न है सब बात बन गई श्री राधा वल्लभ लाल
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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