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श्रीमद् भागवत कथा (भाग-4)/ नारद जी के पूर्व जन्म की कथा / भगवान द्वारा परीक्षित जी की गर्भ में रक्षा

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तवै पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल मायाम परम शीतल माया श्री वृंदावन तो ही कर प्रणाम श्री वृंदावन तो ही कर प्रणाम रंग भरी केली [गाना गाने की आवाज़] करत जहां नित नित रंग भरे श्यामा श्याम रंग [गाना गाने की आवाज़] भरे श्यामा श्याम श्री वृंदावन तो ही कर प्रणाम रंग भरो जमुना तीर सुहायो रंग भरे राजत धाम रंग भरी कुंज लता [चीखने की आवाज़] तरु पल्लव शोभा अभिराम श्री वृंदावन तो ही कर प्रणाम रंग भरे खग मृग रंग भरे द्रुमन पे ते रत राधा राधा नाम रंग भरी ललित रागिनी गावत रंग भरी सह चरी बा तोहे करो प्रणाम श्री वृंदा वृंदावन तो ही करो प्रणाम भोरी हृदय रंग में बोरो भोरी हृदय रंग में बोरो देहु प्रेम निष्का हे रंग भर श्यामा श्याम देहु प्रीति निष्काम श्री वृंदावन तो ही कर प्रणाम सबसे प्रथम परमधाम निज महल चैतन्य घन स्वरूप आनंद कंद को भी आनंद प्रदान करने वाला महामहिम श्री वृंदावन धाम आपको बार-बार प्रणाम करते हैं।

जहां प्रेम रंग में भरी हुई कुंजों में प्रेममय केली रंग भरे श्यामा श्याम करते रहते हैं। जहां आसपास प्रेम स्वरूपा यमुना जी प्रवाहित है। जहां रंग भरे समस्त सहचरिया विराजती हैं। जहां अद्भुत अद्भुत प्रेम रंगमई लताएं तरु पल्लव पुष्प भ्रमर खग मृग पशु पंछी सब और सब जहां रंग भरे राधा राधा राधा ऐसा पुकारते रहते हैं। यहां के पत्तों से भी राधा नाम की ध्वनि यहां के खग पशु पंछी सब राधा यश गायक हैं। राधा यशो मुखर मत खगावली के रंग भरे अर्थात प्रेम रंग में भरे हुए यहां के खग मृग पशु पंछी सब राधा राधा पुकारते रहते हैं।

और ललित राग रागिनियों की परम प्रवीण स्वामिनी जी की सहचर्या स्वामिनी जी को प्रसन्न करने के लिए अद्भुत भाव अद्भुत राग रागिनियों से गायन करती रहती है। भोरी सखी कहती हे वृंदावन हे वृंदावन के खग मृग पशु पंछी हे वृंदावन की तरु लताओं हे वृंदावन की यमुना महारानी रसरानी रजरानी हम पर कृपा करो हमें केवल प्रीति चाहिए प्रिया लाल की और कुछ नहीं मेरा हृदय व्याकुल होकर श्यामा श्याम के लिए प्रतिपल तड़पता रहे रोता रहे यह प्रीति चाहिए अहो भाग्य जिनके हृदय की समस्त कामनाएं उपासना की धारा के प्रवाह में बह गई और एक चाह रह गई श्यामा श्याम की प्रीति की श्यामा श्याम की सेवा की श्यामा श्याम के सुमिरन की श्यामा श्याम के मिलन की अहो भाग धन्याति धन्य हो गया पर ये प्रीति हमारे हृदय में कैसे उत्पन्न हो यह तो परम पवित्र रात दिन प्रियाल के धाम में रहकर प्रियाल की उपासना बड़ी अद्भुत रीति से कर रहे हैं।

भोाना जी भोरी सखी तो इनके हृदय में तो प्रीति है ही अपने अधम जो इंद्रियों के विलास में विचर रहे हैं। कैसे प्रीति हो प्रियाल से? तो श्रीपाद प्रबोधनांद जी कह रहे हैं त कृत कुकर्म कोटे रपी चांडाला महा अधमस्यास्य चिंता नहीं करनी कह यदि तुमसे त कृत तुम्हारे जो कर्म है वो कुकर्म कोटि रप करोड़ों प्रकार से पापमय ही है और सबसे नीच पुरुषों द्वारा भी धिक्कार योग्य तुम्हारे कर्म है तो भी तुम्हें अब चिंता नहीं करनी। यदि हमारी बात तुम्हारे कान तक पहुंच रही है तो तुम्हें चिंता नहीं करनी।

ईशोप न शरणम ईश्वर की कभी शरण नहीं हुई। कभी नाम जप नहीं किया। करोड़ों कुकर्म किए और नीच पुरुषों द्वारा भी धिक्कार योग्य है। ऐसा भी है। तो कह रहे हां वृंदारण्य किम विधास में क्या आपके पास मेरे कल्याण करने के लिए विधान नहीं है। अर्थात ऐसे भी पुरुष का परम कल्याण श्री धाम वृंदावन कर देगा। विश्वास मानो धाम में अपार सामर्थ है। जैसे जंग भरे लोहे में कभी ऐसी कामना ही नहीं हो सकती कि किसी राजा महाराजा का मुकुट बनकर लगे। लेकिन पारस के स्पर्श से वो सौभाग्य प्राप्त कर लेगा।

ऐसे ही आलय बन बसत संग पारस के आयस कनक समान भय जैसे लोहा जंग भरा पारस के स्पर्श से स्वर्ण जैसा बनकर चमकने लगता है और आभूषणों के काम में आता है। भला लोहा स्वर्ण जैसा कैसे बन सकता था? ये पारस का चमत्कार तो ये धाम का प्रभाव कि जो करोड़ों कुकर्म करने वाला वो नरक जाएगा। जो कभी भगवान का शरणागत नहीं हुआ, कभी भजन नहीं किया, केवल पापाचरण और नीच पुरुषों द्वारा भी धिक्कार योग। ऐसे कुछ कर्म है जिन कर्मों को नीच पुरुष भी धिक्कारते हैं कि धिक्कार है। यद्यपि मैं पापी हूं।

लेकिन ये मिश्र मुझसे बड़ा पापी है। क्योंकि ये निकृष्ट कर्म कुछ ऐसे हैं। जैसे बाल हत्या, सोते हुए पुरुष की हत्या, गर्भ हत्या, ब्रह्म हत्या। ये ऐसे बड़े-बड़े पाप हैं जिन्हें नीच पुरुष भी कहते हैं इनको नरक में भी ठोर नहीं मिलेगी। अर्थात नारकी पुरुष भी उसको धिक्कारते हैं। यदि ऐसा भी पुरुष यह कमाल की बात चमत्कार की बात धाम का आश्रय और वास स्वीकार कर ले तो श्रीपाद प्रश्न वाचक करते हैं वृंदावन से कि वृंदावन क्या आपके पास उसके कल्याण के लिए कोई विधान नहीं अर्थात पक्का विधान है।

धाम के वास मात्र से पहाड़ के पहाड़ पाप ऐसे भस्म होते हैं जैसे एक दिया सिलाई लगा दे तो पहाड़ लगा हो रुई का तो वो भस्म हो जाता है। ऐसे धाम के वास से धाम की धाम चिदानंद है। कोई जड़ देश नहीं है। ये चिदानंद है। जैसे प्रिया प्रीतम वैसे ही धाम वैसे ही सहचरिया वैसे ही लता खग पशु पंछी यमुना जी सब ये चिदानंद वपू अति दुर्लभ पद आसा वासाहित तू दुर्घटा त्व में यह सुनकर अब मेरे हृदय में दुर्लभ आशा जागृत हो गई क्या अखंड वृंदावन वास करूंगा जब यह महिमा सुनी कि इंद्रियां जिसकी पापाचरण रत है, मन भी पापाचरण रत है।

ऐसे गंदे आचरण की नीच पुरुष भी धिक्कार दे। कभी ईश्वर की शरण में नहीं हुआ। कभी चर्चा नहीं सुनी, कभी नाम जप नहीं किया। अगर ऐसा पुरुष भी वृंदावन वास करे अखंड तो वृंदावन धाम उसे परम पद प्रदान कर देगा। इसमें कोई संशय नहीं। तो कह रहे हैं अति दुर्लभ पद आशा अब हमारे हृदय में एक दुर्लभ आशा जागृत हो गई है कि मैं अखंड वृंदावन वासी बनू पर शाही तू दुर्घटात तो में किंतु मेरे जैसे के लिए तो बड़ा दुर्लभ है वृंदावन वास क्योंकि ना इंद्रियां पवित्र है ना मन पवित्र है ना व्यवस्था है कैसे हो कृत सर्वेंद्र शत्रु कहा मेरी इंद्रियां ही मेरी दुश्मन है।

मेरा मन ही मेरे दुश्मन है। गलत फसा रहे हैं। गलत आचरण करवा रहे हैं। तो वृंदाण्य किम नुमे भविता क्या वृंदावन मेरी आशा पूर्ण नहीं करेगा? मैं वृंदावन की शरण में हूं। अब तो वृंदावन ही मेरी आशा पूर्ण करेगा। सच्ची मानो एक होता है व्यवस्था से वृंदावन वास और एक होता है वृंदावन की व्यवस्था से वृंदावन वास बस केवल वृंदावन का आश्रय तो आप देखो ये वृंदावन की व्यवस्था है। ये वृंदावन की व्यवस्था है। अगर अपनी व्यवस्था से रहते तो कितना बड़ा कर लेते और वृंदावन की व्यवस्था से रहे तो देखो कैसे रख रहे हैं।

कोई भी यह मत सोचो कि मेरे पास व्यवस्था नहीं है तो वृंदावन कैसे व्यवस्था करेगा जैसे हमारी की ऐसे करेगा पक्का मान लो पर भरोसा दृढ़ परीक्षा पर पक्का परीक्षा क्या अब प्राण त्याग देंगे लेकिन वृंदावन नहीं छोड़ेंगे संपूर्णता जोर से हाथ पकड़ लिया कि अब तुम जाने की सोचोगे भी तो हम तुम्हें नहीं जाने देंगे ऐसे वृंदावन प्रकता ये कोई ना सोचे कि हमारी व्यवस्था नहीं तो वृंदावन कैसे भाग जिनके पास व्यवस्था है उनसे बढ़िया व्यवस्था वृंदावन करेगा। बस धैर्य रखो। किसान भी फसल बोता है तो छ महीने में तैयार होती है।

सिंचाई हो सब मेहनत कर आप धैर्य रखो। थोड़ा ठोकरे खाओ। फुटपाथ का सेवन करो। इधरउधर जैसे समय व्यतीत करो। रो हां वृंदावन। फिर जिस दिन सुन लेगा वृंदावन वो ऐसी भारी व्यवस्था करेगा कोई त्रिभुवन में नहीं कर सकता ऐसी व्यवस्था क्या शरीर वास की व्यवस्था भजन की व्यवस्था प्रियाल के मिलन की व्यवस्था प्रियालाल के समीप पहुंचाने की व्यवस्था अनंत जन्मों की बिगड़ी बना देता है श्री धाम वृंदावन बड़ा कृपालु है। चलते हैं श्रीमद् भागवत जो भगवान का वांगमय स्वरूप है। वेद धातु पदवी परस दुरंत वीर्यस रथांग पाण यो माया संतयावत्या भजेत तत सरोज गंधम जो मुरली मनोहर भगवान श्री कृष्ण का आश्रय ले लेता है।

अनंत शक्ति अनंत पराक्रम सावेद धातु पद परस दरंत वीर रथांग पाण कोई आज तक ऐसा नहीं हुआ कि संपूर्ण रूप से भगवान की सामर्थ्य को बल को और महिमा को जान सके। इसीलिए वेद भी स्वयं नेति नेति कहते हैं। नैति इतना ही नहीं है। इसीलिए भग अनंत महिमाम में जो उनका ज्ञान जो वैराग्य जो बल जो ऐश्वर्य जो प्रेम वो आज तक कोई था नहीं पा पाया। भगवान सारे जगत के रूप में भी है और इससे परे भी हैं। उनके स्वरूप को उनकी लीला को उतना ही वह जान सकता है जितना भगवान जनाते हैं। संपूर्णतया तो भगवान भी अपनी महिमा को पूर्ण रूप से नहीं जानते।

जैसे नाम की महिमा के लिए कहा गया कहो कहां लगे नाम बढ़ाई राम न सकत नाम गुण गाई ऐसे प्रभु का रूप ऐसे प्रभु की लीला ऐसे प्रभु के अनंत महिमा स्वयं भगवान ही तो शेष जी के रूप में है अनंत महिमाशाली भगवान शेष ही है भगवान और महिमा 2000 जिभ्या से वर्णन करते रहते हैं पार नहीं पाते स्वयं भगवान की ही बुद्धि शक्ति से तो सरस्वती जी प्रकट हुई लेकिन वह भी महिमा का पार नहीं पाती। स्वयं भगवान ही अपुष वेद के रूप में प्रकट हुए। पर वेद भी नेति नेति कह रहे हैं। अनंत महिमा श्री भगवान की है।

जो नित्य निरंतर निष्कपट भाव से भगवान के चरणों का आश्रय लेकर नाम जप करता है। और सेवा करता है। सोई जाने जे देहु जनाई भगवान स्वयं उसको फिर अपनी महिमा जितना उतना ही पार पाता है। जैसे मच्छर से लेकर गरुण जी तक अनंत महिमाशाली आकाश में उड़ते हैं पर कोई पार नहीं पाया। ऐसी अपनीप बुद्धि के अनुसार भगवत प्रदत्त बुद्धि के अनुसार भगवान की लीला महिमा नाम महिमा धाम महिमा गुण महिमा रूप महिमा का सब ऋषियों ने गान किया पर इतना ही है ऐसा नहीं अनंत महिमा है ध्यान देने योग्य बात है जो नित्य निरंतर निष्कपट भाव से भगवान का नाम जप करता है भगवान के चरणों का आश्रय लेकर उनकी सेवा भावना में वह धन्य धन्य हो जाता है।

अनंत महिमा, अनंत पराक्रम, अनंत ज्ञान, अनंत प्रेम ऐसे भगवान उसके अधीन हो जाते हैं जो निष्कपट भाव से मोहि कपट छल छिद्र न भावा। निष्कपट भाव से भगवान के लिए भगवान का भजन करना। इसे निष्कपट भाव कहते हैं। सरल शब्दों में भगवान से कुछ चाहना ये अलग बात हो गई। भगवान को चाहना ये अलग बात हो गई। भगवान के लिए भगवान का भजन करना। भजन के लिए भजन करना। भजन किए बिना जिया नहीं जाता। भजन किए बिना रह नहीं सकते। यह है निष्कपट भाव का भजन। भगवान के चरणों का आश्रय निष्कपट भाव से निरंतर नाम जप और उनकी सेवा इससे भगवान अधीन हो जाते हैं।

अनंत महिमाशाली सूत जी महाराज कह रहे हैं सोनकादश्यों आप लोग बड़े सौभाग्यशाली हैं। धन्य हैं। क्योंकि मानव जीवन विघ्न बाधाओं से भरा हुआ है। आज तुम मस्ती कर लो। कल मस्ती करने लायक नहीं रहोगे ना शरीर रहेगा ना समय रहेगा ना व्यवस्था रहेगी बड़ा विचित्र है बड़ा विचित्र यह मानव जीवन संघर्ष विपत्ति अपमान दुख दुविधा से भरा हुआ है संसार में तुम्हें दुख दुविधा संघर्ष से केवल एक बचा सकते हैं भगवान श्री कृष्ण क्योंकि उन्हीं से यह प्रचंड माया शक्तिशाली है। उन्हीं की शक्ति से तो जो अनिर्वचनीय प्रेम भगवान से प्राप्त हो गया तो ना दुख ना दुविधा ना संघर्ष ना विपत्ति सब आनंदमय हो जाता है।

पर यह प्रेम नाम जापक भगवत आश्रित भगवत सेवा परायण उसी को प्राप्त होता है। तीन बातें खास भगवान का आश्रय नित्य निरंतर नाम जप और भगवत सेवा बढ़िया बढ़िया आनंदमय जीवन हो जाएगा परमानंदमय जीवन फिर इस जन्म मरण रूपी संसार के भयंकर चक्र में तुम्हें नहीं आना पड़ेगा। सूत जी महाराज कह रहे हैं हे ऋषियों आप बड़े सौभाग्यशाली हैं। आपका जीवन धन्य है। तीन बातें पकड़ लो पकड़ लो निष्कपट भाव से निरंतर भगवन नाम जप और दृढ़ भगवान के चरणों का भरोसा और जो भी कर रहे हो ये भगवान की सेवा अपने कर्तव्य को भगवान की सेवा बढ़िया उसे फिर इस संसार चक्र में जन्म मरण के चक्र में नहीं आना पड़ता बैठा लो हृदय हे ऋषियों ऋग्वेदी शौनक जी और 88,000 ऋषि ये सब बैठे हुए हैं।

ये जो हम आपको सुना रहे हैं ये भगवान श्री सुखदेव जी ने परीक्षित जी को सुनाया है। शौनक जी ने कहा महाराज किस स्थान पर यह कथा श्री सुखदेव जी ने परीक्षित जी को सुनाई। कारण क्या था? मुनि श्रेष्ठ श्री कृष्ण द्वैपायन भगवान व्यास देव जी ने इस परमहंस संहिता की रचना की। श्री सुखदेव जी महाराज तो बड़े योगी समदर्शी भेदभाव रहित और संसार निद्रा से जगे हुए महापुरुष हैं। वो प्राय ऐसे छिप कर के चलते हैं कि लोग उनको पागल समझते हैं। बड़ी ऊंची स्थिति श्री सुखदेव जी महाराज की।

एक बार जब व्यास जी पीछे पीछे जा रहे थे सुखदेव जी के तो वहां नदी में कुछ युवतियां स्नान कर रही थी तो आगे सुखदेव जी दिगंबर निकले तो उनको कोई लज्जा नहीं आई पर वस्त्र पहने जब व्यास जी निकले तो सब झट से बाहर आकर वस्त्र धारण कर लिया आश्चर्यचकित होकर के व्यास जी ने युव वतियों से पूछा ऐसा भेद क्यों मेरा जवान पुत्र 16 वर्ष की अवस्था दिगंबर तुम्हें कोई संकोच नहीं लेकिन मेरे को वृद्ध को देखकर के वस्त्र धारण किए हुए को देखकर लज्जा क्यों तो उन्होंने कहा महाराज आपकी ज्ञान दृष्टि अमोग है पर आपकी दृष्टि में अभी स्त्री पुरुष है परंतु आपकी पुत्र की दृष्टि में ब्रह्म के सिवा कुछ नहीं है।

इसलिए मुझे कोई लज्जा संकोच नहीं हुआ। और आपकी दृष्टि में स्त्री पुरुष है इसलिए लज्जा लगी और हमने वस्त्र धारण किया। व्यास जी से ऊंची स्थिति श्री सुखदेव जी महाराज की। तो यह ऐसे महापुरुष कैसे परीक्षित जी के पास पहुंच गए और कथा सुनाए क्योंकि ऐसे उच्च कोटि की अवस्था को प्राप्त जो अवधूत वेश में पहचाने ही न जा सके तो कुर जांगल देश में जाना हस्तिनापुर में फिर वहां जड़वत व्यवहार वाले महापुरुष को पहचान लेना पांडव नंदन राज्षि परीक्षित ऐसा सौभाग्य कैसे उदय हुआ कि महान परमहंस श्री सुखदेव जी उनको उपदेश दिए।

महाभाग मैं सुनना चाहता हूं। श्री सुखदेव जी गृहस्थों के घरों में अगर कभी भिक्षा याटन के लिए गए तो बहुत विनय करने पर उतनी देर रुके जितनी देर गाय धोई जाती। इससे ज्यादा कभी नहीं रुके। फिर सात दिन रुककर कथा सुनाला ऐसे महापुरुष को सूत जी हमने सुना है अभिमन्यु नंदन महाराज परीक्षित भगवान के बड़े प्रेमी भक्त थे। उनके जन्म में भी बड़ा आश्चर्यमय प्रसंग घटा। ये पांडव वंश के गौरव बढ़ाने वाले सम्राट थे। भला इनको श्राप क्यों मिला? ऐसे भगवत प्रेमी ऐसे धर्मात्मा राजा और फिर यह सर्वस्व त्याग करके आमरण अनशन व्रत लेकर गंगा किनारे बैठ गए।

अरे महाराज महाराज परीक्षित इतने बलवान राजा थे कि शत्रु पक्ष के राजा इनके चरण रखने की चौकी में आकर रत्नों के ढेर समर्पित करते थे। इन्होंने दुष्टज लक्ष्मी परिवार का मोह त्याग कर गंगा किनारे भूखे प्यासे रहकर प्राण त्यागने की इच्छा की। मुझे लगता है कि जो भगवान के आश्रित हैं संसार के परम कल्याण हृदय समृद्धि के लिए ही वह जीवन धारण करते हैं। उनका अपने शरीर से कोई स्वार्थ नहीं रहता। फिर वो शरीर त्याग की बात क्यों सोचे? यह मैं जानना चाहता हूं। सूत जी आपको वेद वाणी छोड़कर अन्य समस्त शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान है।

इसलिए इस समय जो हम आपसे प्रश्न कर रहे हैं आप कृपा करके बताइए। श्रुति जी ने कहा इस समय वर्तमान चतुरयुगी के तीसरे युग द्वापर में महर्षि पराशर के द्वारा वश कन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान का कलावतार योगीराज श्री कृष्णान व्यासदेव जी के रूप में जन्म हुआ। भगवान व्यास देव जी सूर्योदय के समय सरस्वती के पावन जल में स्नान करके फिर एकांत स्थान पर बैठे हुए थे। भगवान व्यासदेव जी भूत भविष्य वर्तमान सब कुछ ऐसे देखते हैं वर्तमान की तरह जैसे हथेली पर आंवला रखा हो चारों तरफ देख सके ऐसे अनंत ब्रह्मांडों को देख सकते हैं वो भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालों के ज्ञाता है।

बड़ी दृष्टि अचूक थी। उन्होंने देखा कि एक कलयुग सब की बुद्धि भ्रष्ट करेगा। भगवत प्राप्ति में बाधा पहुंचा देगा। धर्म का ह्रास हो जाएगा। धर्म संकरता फैल जाएगी। वस्तुओं का पवित्रता और उनमें जो जीवनी शक्ति वो सब रास होती चली जाएगी। संसार के लोग श्रद्धाहीन होते चले जाएंगे। सब शक्ति रहित होते चले जाएंगे। सबकी बुद्धि कर्तव्य का क्या ठीक ठीक निर्णय करने में असमर्थ हो जाएगी। यह कलयुग वर्ण और आश्रम व्यवस्था को भंग कर देगा। देख लो कर रहा है। लोगों की भाग्यहीनता बढ़ती चली जाएगी।

दिव्य दृष्टि से देखकर संसार का कैसे मंगल हो यह विचार महापुरुषों का हृदय एक बात में केवल दुखी होता है कि कैसे संसार भगवत प्राप्त हो जाए। कैसे जीव दुख से पार होकर आनंद समुद्र भगवान में डूब जाए। व्यास जी सोच रहे कि वेदोक्त चातुरहोत्र कर्म लोगों का हृदय शुद्ध करने वाला है। इस दृष्टि से हमने यज्ञों का विस्तार किया। एक वेद के चार भाग किए। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद इतिहास पुराणों की रचना की जो पांचवा वेद, ऋग्वेद को पैल ऋषि शामगान को जैमिनी ऋषि यजुर्वेद के एकमात्र स्नातक वैशंपायम जी अथर्ववेद में दरु नंदन सुमंत मुनि जी इतिहास और पुराणों में उग्रशवाद जी कह रहे हैं मेरे पिता रोम हर्षण जी इन सबका मैंने विभाग किया।

व्यास देव जी सरस्वती नदी के किनारे बैठे चिंतित हो रहे हैं। पर कलयुग आएगा तो वेद को पढ़ पाना सिद्धांत समझ पाना बड़ा कठिन है। इसलिए कल्याण हो जाए। ऐसे आचरणों में सब चूक कर बैठेंगे क्योंकि ज्ञान नहीं रहेगा। अब उनका भी कल्याण हो जाए जिनकी ज्यादा बुद्धि काम नहीं करती। मन चंचल है। इंद्रियां भोगों में लगी हैं। भगवान व्यास देव जी ने विचार किया वेदों का सार हमने पूरे महाभारत में रख दिया। कोई ऐसा सूत्र नहीं, कोई ऐसा श्लोक नहीं, किसी भी ज्ञान, वैराग, भक्ति का जो महाभारत में ना रचा गया हो।

सब कुछ है। पूरी शक्ति लगा के हमने जीवों के कल्याण के लिए महाभारत की रचना की। फिर भी आज मेरे मन को शांति नहीं मिल रही। ऐसा लग रहा है कि सहज सरल मार्ग भी जगत के कल्याण के लिए हमने प्रकट नहीं किया। व्यास जी मन ही मन ऐसा विचार करके बड़े खिन्न हो रहे हैं। व्यास जी सोच रहे हैं मेरी खिन्नता कब कैसे मिट सकती है? मैंने निष्कपट भाव से ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। वेदों का स्वाध्याय, गुरुजनों का, अग्नियों का सम्मान महाभारत के रूप में पूरा वेद का रहस्य खोल दिया।

मैं ब्रह्म तेज से संपन्न हूं और समर्थ हूं। फिर भी आज खिन्नता क्यों? हमें लगता है कि भगवान को प्रिय भगवान की प्राप्ति कराने वाला सहज सरल मार्ग हमने अभी प्रकाशित नहीं किया। इसीलिए मेरा हृदय खिन्न हो रहा है। भगवान व्यास देव जी इस प्रकार जब खिन्न होकर सोच ही रहे थे तो देखा वीणा की झंकार करते हुए नारायण नारायण देवर्ष नारद जी देवर्षि नारद जी को आया देखकर व्यास जी खड़े हो गए और देवर्षि नारद जी का पूजन किया सुख पूर्वक वीणा पाणी भगवान नारद जी को विराजमान किया पूजन किया व्यास जी की तरफ देखकर नारद जी ने कहा व्यास जी आपका शरीर एवं मन दोनों कर्म और चिंतन से संतुष्ट है ना आपके शरीर से कर्म और आपके मन से चिंतन दोनों सही है ना क्योंकि आपका इस समय खिन्न अवस्था दिखाई दे रही है या आपका चिंतन या कर्म इसी से खिन्नता उदासीनता होती है।

दोनों सही है ना? आपकी तो जिज्ञासा पूर्ण हो चुकी है। आप ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष है। आपने जगत कल्याण के लिए महाभारत की रचना की। वेद का विभाग किया। सब सूत्र खोल दिए महाभारत में। सनातन ब्रह्म तत्व को भी खूबचारा है आपने। जाना है, अनुभव किया है। फिर आपका जो आज हम दर्शन कर रहे हैं, ठीक नहीं लग रहा। ये अकृतार्थ पुरुष की तरह आप खिन्न क्यों दिखाई दे रहे हैं? व्यास जी ने कहा आपने मेरे विषय में जैसा देखा ठीक वैसा ही मैं खिन्न हूं। मेरा हृदय संतुष्ट नहीं है सब करके।

पता नहीं क्या कारण है। हे देवर्षि नारद आपका ज्ञान अगाध है। आप साक्षात ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। इसलिए मैं आपसे अपनी खिन्नता का कारण जानना चाहता हूं। आप सूर्य की भांति तीनों लोकों में स्वक्षंद भ्रमण करते हैं। कहीं रोकटोक नहीं। योग बल से आप प्राण वायु के समान सबके भीतर अंतःकरणों में क्या हो रहा है जान सकते हैं। सबके साक्षी योगानुष्ठान नियम द्वारा परम ब्रह्म और शब्द ब्रह्म दोनों की पूर्णता ये आप में है। इसलिए आप कृपा करके बताइए कि मेरा मन खिन्न क्यों है?

भगवान व्यास जी ने कहा नारद जी ने कहा व्यास जी एक शब्द में बोल दूं। आपने बहुत घुमा घुमाकर सब चर्चाएं की लेकिन सीधी भगवत प्राप्ति की भगवान की चर्चा नहीं की जो एक मात्र भगवान की चर्चा जो भगवान की प्राप्ति करा दे इसलिए भवतादित प्रायम यशो भगवतो अमलम ये वासो न तत मनने त दर्शनम खिनम आपके दर्शन की खिन्नता का कारण मैंने जान लिया। आपने एकमात्र सहज ऐसा उपाय नहीं रचा जिससे भगवान की महा महिमा का गान करते हुए भगवत प्राप्ति हो जाए। आपने धर्म का, अर्थ का, काम का, मोक्ष का सबका वर्णन किया।

वेदांत मोक्ष का है। लेकिन श्री कृष्ण प्रेम प्राप्ति श्री कृष्ण की सहज में प्राप्ति ऐसी महिमा का वर्णन थोड़ा थोड़ा वर्णन सब है महाराज जिस वाणी से चाहे वो रस भाव अलंकार आदि से युक्त क्यों ना हो जगत को पावन करने वाले भगवान श्री कृष्ण का यश गान नहीं होता वो वाणी अपवित्र मानी जाती है वो सुनने योग्य नहीं मानसरोवर के कमनी कमल वन में विहार करने वाले हंसों की भांति भगवत धाम में विहार करने वाले भगवत चरणारविंदा परमहंस कभी ऐसी वाणी नहीं सुनते इसके विपरीत जिसमें सुंदर रचना भी नहीं है दूषित शब्द भी है परंतु जिसका प्रत्येक शब्द भगवान श्री कृष्ण से जुड़ता है वह वाणी जिसके कान में पड़ेगी सारे पापों का नाश कर देगी।

क्योंकि संत पुरुष ऐसी ही वाणी का आदर करते हैं, श्रवण करते हैं, गान करते हैं, कीर्तन करते हैं। जिस निर्मल ज्ञान का आपने वर्णन किया जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यदि भगवान से प्रेम ना हो, भगवान की प्रेम लक्षणा भक्ति उदित ना हो तो वो ज्ञान किस काम का? गोस्वामी जी ने भी कहा है। जोग कुजोग ज्ञान अज्ञानु जहां नहीं राम प्रेम परधानु महाराज जो साधन सिद्धि दोनों दशाओं में अमंगल रूप है वो कामना काम्य कर्म जो भगवान को अर्पण नहीं किया गया ऐसा निष्काम कर्म ये सब व्यर्थ है भगवान से संबंधित महाभाग व्यास जी आपकी दृष्टि अमोग है आपकी कीर्ति पवित्र है आप सत्य परायण दृढ़ व्रत है इसलिए इसलिए आप संपूर्ण जीवों को कैसे बंधन मुक्त किया जाए इसलिए खिन्न है वो होगा केवल अचिंत शक्ति भगवान श्री कृष्ण के लीला चरित्रों का गायन और श्रवण करने से जो मनुष्य भगवान के नाम और रूप लीला गुण धाम के सिवा और कुछ बोलना चाहता है उसी समय माया उसे फांस लेती है।

सेवक जी महाराज कह रहे हैं तब सुख हरिवंश गुण नाम रसना रटत और बहुवचन अति दुख दानी हानि हरिवंश के नाम अंतर परे लाभ हरिवंश उच्चरत वाणी उसी समय दुख घेर लेगा जब भगवत चर्चा के सिवा प्रपंच की बात करोगे फसा लेगा कोई ना कोई अपराध वाणी का बन जाएगा किसी किसी की निंदा, किसी की अवहेलना। देवर्षि नारद जी कहते हैं जब कोई मनुष्य भगवान की चर्चा के सिवा और कुछ बोलने की इच्छा करता है उसी समय भगवान की माया उसको चक्कर में फंसा लेती है। उसकी बुद्धि अपवित्र हो जाती है। जैसे हवा के झकोरों से डगमगाती हुई डोंगी को कहीं भी ठहरने का ठोर नहीं मिलता।

ऐसे भगवत विमुख बुद्धि चंचल होकर माया में भ्रमित हो जाती। उसे कहीं ठोर नहीं मिलता। भगवान अनंत कोई विचारवान विवेकी पुरुष संसार की वार्ता छोड़कर भगवान की चर्चा करता है। संसार की बातें सुनना बंद करके भगवान की बातें सुनता है और वह परमानंद का अनुभव करता है। इसलिए जगत के कल्याण के लिए अब आप भगवान की लीलाओं का गायन कीजिए। बड़ी जोर की बात देवर्षि नारद जी यहां कह रहे हैं तक्त स्वधर्म चरणा भुजम हरे भजन पको पते ततो यदि बहुत जोर की बात है यत्रवा भद्रभुष्य किम को वार्थ आपतो भजता स्वधर्मत जो अपने धर्म का त्याग करके भगवान की शरण में हुआ वो मर गया।

कोई भजन साधन नहीं बना। जैसे आज सुना आपने और शाम तक शरीर पूरा हो गया। कोई भजन साधन नहीं बना। भजन ना तो परिपक्व हुआ ना साधन बना। तो बोले क्या उसका अमंगल हो सकता है? अभी कोई साधना नहीं बनी। कोई भजन परिपक्व नहीं हुआ। क्या अमंगल हो सकता है? नहीं इतने मात्र से भगवत प्राप्ति भगवान की शरण में हो। तक्त स्वधर्म चरणा भुजम हरे। यह बात समझना होगा कि अब तो सर्व धर्म परितज है। मामेम शरणम जो भगवान ने आदेश किया अब मैं वही स्वीकार करता हूं तक्त स्वधर्म चरणाम भुजम हरे ये अंदर की बात है आज सत्संग सुना और मन में निश्चय किया कि अब सब धर्म कर्म भगवान के लिए अब तो मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य श्री कृष्ण चंद्र वो मर गया कोई साधन भजन नहीं हुआ भजन न पको पते ततो यदि ना भजन हुआ ना कोई परिपक्व अवस्था आई तो क्या होगा यत्र वाभद्र मभदुष्य क्या उसका मंगल हो सकता है बोले कदापि नहीं सीधे शरणागति का फल सीधे शरण की प्राप्ति और जो

धर्मानुष्ठान खूब कर रहा भगवान की शरण में नहीं भगवान का भजन नहीं करता तो बोले क्या कभी उसका मंगल हो सकता है नहीं क्यों ऐसे ऐसे अपराध बन जाएंगे मान लो एक वैष्णव निंदा बन गई तो पूरे जीवन का स्वधर्ष्ठान सब चाट लिया साधु अवज्ञा तुरत भवानी कर कल्याण अखिल के हानी भक्तन निंदा अति बुरी भूल करे जिन कोई के सुकृत बहु जन्म के क्षिण में दारे खो होए कौन सा लाभ मिल जाएगा यदि हरि से विमुख होकर धर्मानुष्ठान करता है और हरि के शरणागत हो गया सब धर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया और शरीर छूट गया कोई भजन परिपक्व नहीं हुआ तो भी उसे भगवत प्राप्ति होगी क्योंकि वो भगवान की शरण में तक्त स्वधर्म चरणाम भुजम हरे भजन पको पते ततो यदि पक्का नहीं हुआ सिद्ध नहीं हुआ कुछ शरीर छूटा भगवान को क्यों भगवान की शरण में था भगवान का उभय भात ते दोनों स्थिति में लाओ चाहे वो कामना से हो चाहे निष्कामना से चाहे जैसे भाव से हो अगर मेरे शरण में आ गया तो भगवान कह रहे कोटि विप्र बदला जाहु आए शरण तजो नहींता इसलिए बुद्धिमान पुरुष

को चाहिए कि भगवत आनंद की प्राप्ति के लिए दुख निवृत्ति के लिए एकमात्र भगवान की शरण ले लो। भगवान खुद गीता जी में कह रहे हैं देवी हसा गुणमई मम माया दत्तया मामे प्रपद्यते माया मेंताम तरंतते जयघोष है तर जाएगा वही बात देवर्षि नारद जी कह रहे हैं तिनके से ले ब्रह्मा तक ऊंचीनीची योनिया सब कर्म के फल स्वरूप है यह स्वयं प्राप्त नहीं होती। कर्म के अनुसार प्राप्त होती है। लेकिन भगवान की शरण में हो जाए तो शरण मात्र से भगवत प्राप्ति माया मुक्ति शरण हो जाए हृदय से हो जाए।

संसार के विषय सुख में तो चीटा चींटी पशु पक्षियों को भी वही भोग सुख मिल रहा है जो तुम मनुष्य शरीर में कर्म के अनुसार सब लेकिन इस कर्म के चक्र से निकाल के परमानंद की अनुभूति ये तो तक्त स्वधर्म चरणाम भुजम हरे ये भगवान श्री कृष्ण के चरणों के आश्रय से होगी। बहुत ध्यान देने योग्य बात है। इससे बहुत पुष्टता होती है। व्यास जी भगवान श्री कृष्ण के चरणों का आश्रय ले लिया। शरणागत हो गया वो जल। पर उसमें बुरा भाव अंदर अभी है बहुत बहुत जोर की बात है। तो भी वो संसार में जन्म मृत्यु के चक्र में नहीं आएगा।

नाव जनो जात कथन चना ब्रजे मुकुंद सेव्य नद संस्कृति स्मरण मुकुंदगह पुनर विहाते न रसग्रो यत बड़ी बात है बड़ी बात है इसी से मस्ती आती है भगवान श्री कृष्ण के चरण चरणारविंद का शरणागत सेवक हो गया और उसमें दवात बुरा भाव है। बुरा भाव धर्म विरुद्धचरण तो बोले क्या वो अन्य मनुष्यों तरह दुर्गति को प्राप्त होगा। बोले ना वो जन्म मृत्यु संसार में नहीं आएगा। यह है हमारे प्रभु के लात न प्रभु चित चूक किए की करत सुरत से बार की जय घोष है संस्कृति चक्र में अब नहीं आ सकता बुरा भाव भी है पर भगवान का शरण इसीलिए कहा गया है कि भगवान जो गीता जी में कह रहे कि साधु समंतव्य उसे मानो साधु है साधु को साधु मानने के लिए नहीं कहा जाता।

जो साधु नहीं है उसको साधु मान मेरी शरण में आ गया पचेस दुराचारो भजते मा अनन्य भाग साधु समंत समिता अब वो दुराचारी दुराचारी गति को नहीं जाएगा वो मेरे को प्राप्त होगा यह है भगवान की शरणागति ओो सब सिद्धांत एक तरफ भगवान की करुणा एक तरफ व्यास जी जो भगवान श्री कृष्ण के चरणारविंद की शरण में आ गया दवा का भी बुरा भाव उसके अंदर है तो वह जन्म मृत्यु संसार चक्र में नहीं आएगा बुरा होते हुए भी वो भगवान को प्राप्त हो जाएगा क्यों क्योंकि भगवान का आश्रय लिया मुकदमा में फांसी की सजा पक्की वकालत पक्की न्यायाधीश पक्का दस्तखत पक्की लेकिन राष्ट्रपति ने माफ कर दिया अब क्या करोगे अब जज ये थोड़ी कहेगा कि घंटों सालों से हम दिमाग लड़ा करके फिर इसको निर्णय किया आप रद्द क्यों कर रहे हैं?

वकील कहे हम बहुत वकालत की है और यह पक्का दोषी है। तो राष्ट्रपति कहेंगे पक्का दोषी है पर हमने माफ कर दिया। अहम तम सर्व पाप मोक्ष्या माचा ये हमारे अखिल कोटि ब्रह्मांडों के अधिपति बोल रहे हैं सर्व धर्म परित्यज माम एकम शरणम एक छाती फूल जाती है बात सुनकर नहीं तो एक एक कर्म का बहुत बड़ा बड़ा हिसाब है यहां कह रहे हैं व्यास जी जो भगवान श्री कृष्ण के चरणारविंद की शरणागति स्वीकार कर ली उसमें दवा बुरा भाव द कहते प्रारब्ध प्रारब्ध के अनुसार बुरा भाव तो क्या वह जन्म मृत्यु संसार चक्र में आएगा कभी नहीं जीत गए जीत गए हम जीत गए इसीलिए कहते हैं भगवत प्राप्ति को समझो आप जिसने भगवान के चरण कमलों का एक बार आश्रय ले लिया फिर भगवान उसे कभी नहीं छोड़ते ये मंगल बात और जिसे चसका लग गया भगवान के भजन का भगवान की लीला कथा सुनने का उसको कल्याण कल्याण की फिक्र नहीं कल्याण तो उसका हो गया जो बुरा भाव वाला भी है लेकिन भगवान का शरण आश्रय ले लिया अपचुराचारो कैसा मंगल भगवान की शरणागति है मैंने तो आपको इशारा बताया है आप तो खुद सब कुछ जानते हैं देवर्षि नारद जी कह रहे हैं व्यास जी आप अपनी अमोग दृष्टि का प्रयोग कीजिए।

आप भगवान पुरुषोत्तम के कला अवतार हैं। आपने अजन्मा होकर ये जन्म धारण किया है जगत मंगल के लिए। ये तपस्या वेदाध्यन यज्ञ अनुष्ठान स्वाध्याय ज्ञान दान तीर्थ याटन सबसे भगवत प्राप्ति नहीं। श्री कृष्ण लीला गुणों का गायन करके श्री कृष्ण के शरणागत होकर श्री कृष्ण का नाम जप ये भगवत प्राप्ति कराएगा। मैं तुम्हें अपने पूर्व चरित्र को बताता हूं। देवर्षिनाथ जी कहते हैं यह पिछले कल्प की बात है। युग की नहीं कल्प की बात है। मुझे तीनों काल का ज्ञान है। मैं वेदवादी ब्राह्मणों की एक दासी का लड़का था।

यह पहले बहुत सुंदर गंधर्व थे। उपवरहण जो देवर्षि नारद जी अपनी कथा सुना रहे कि मैं पूर्व जन्म में दासी पुत्र था। उसके पहले उपवरहण नाम के गंधर्व थे। वह बहुत ही सुंदर थे। इनको इतना सब पसंद करते चाहे कोई भी हो इनका दर्शन करना इनसे संभाषण करना चित्ररथ गंधर्व ने 50 दिव्य सुंदर अपनी पुत्रियों को उपवरण को ब्या था। बड़े ही सुंदर थे ये। एक बार ब्रह्मा जी ने भी इनको अपनी सभा में गाने के लिए बुलाया। उपवरण को भगवान का यश गाने के लिए अब उस सभा में तो गए बहुत रूपवान थे जो देखे लुभायमान हो जाए तो ये भगवान का यश ना गा के जो अप्सराएं और सब तो रूप सौंदर्य सांसारिक गाने लगे ब्रह्मा जी गए सभा में बुलाए गए हो हरि यश गान करने के लिए तुमने सांसारिक रूपों का गायन किया।

इसलिए तुम दंड के अधिकारी हो। जाओ नीच योनि को प्राप्त हो। तुम्हें गर्व है अपने इस रूप का। जाओ तुम नीच योनि को प्राप्त हो। शाप सुनते तत्काल शरीर क्षीण हो गया। नष्ट हो गया। और ये कालांतर में ध्रुमिल गोप की पत्नी कलावती के गर्भ से प्रकट हुई। किसी कारण से ध्रुमिल गोप जब पधार गए तो कलावती इनको एक लेकर साधु सेवी ब्राह्मण थे उनके यहां दासी भाव से रहकर इनका पालन पोषण करने लगी तो वही कह रहे हैं कि मैं पिछले कल्प के अपने पूर्व जीवन में वेदवादी ब्राह्मणों की एक दासी का लड़का था।

वर्षा ऋतु में चातुर्मास जैसे चल रहा है तो महात्मा जन एक स्थान पर चार महीने टिकते प्राय ऐसा था पहले से वो स्थान देख लेते थे कि जहां चार महीना भिक्षा मिलेगी और वो चार महीना वर्षा में एक जगह रहते थे वो जब देव उत्तष्नी एकादशी आती है तब फिर सब चातुर्मास पूर्ण करके भ्रम करते थे। तो ऐसा ही उन ब्राह्मण के यहां चातुर्मास करने बड़े महात्मा जन आए। उन ब्राह्मण ने मुझको मेरी बाल्यावस्था थी। देवर्षि नारद जी कह रहे उन संतों की सेवा में नियुक्त कर दिया। देखो संत सभा में अपराध किया।

ब्रह्मा जी की सभा संत सभा तो है तो नीची गति को प्राप्त हुई। अब यहां संत सेवा तो सर्वोत्तम गति को प्राप्त होंगे। मुझे संत सेवा में नियुक्त कर दिया गया। यह बड़ा सौभाग्य होता है जब संत सेवा का अवसर मिले। उनके चरण धोने का, उनको परोस के पवाने का, उनकी जूठल पत्तल फेंकने का, उनकी पत्तल से झूठे किनका लेकर बड़ा जो भगवत प्रेमी महात्मा ये सांसारिक लोग उपहास करेंगे। मत सुनना ये संसार के रजोगुणी लोग नहीं जानते हैं बाततुल भूत विवस मतवारे ये ते नहीं बोले वचन बिचारे तिनकर कहा सुने नहीं कान्हा अहो भाग्य संतो का चरणामृत मिले संतों की झूठी पत्तल से एक एक कण उठा के पाने का आप खुद अनुभव करके देख लेना कैसा हृदय होता है रोने का मन होगा प्रभु के लिए जब संतों की जूठन मिलेगी यद्यपि मैं बालक था पर मैं संतों के सामने बहुत सौम्य होकर रहता।

चंचलता नहीं करता। बालक था इसलिए हमारी इंद्रिय विषय भोग संबंधी कोई चेष्टा ही नहीं थी। और खेल कूद में मेरी रति नहीं थी। तो संत मुझे बहुत पसंद करते हैं क्योंकि शांत भाव रहना, उनकी आज्ञा में रहना, उनकी सेवा में तो सब संत हमें सेवा देते हैं। ए पानी ले आओ। हे ऐसा मेरा शील स्वभाव देखकर समदर्शी सब संतों ने हम पर बड़ी कृपा की उष्ट लेप अनुमोदितो द्विजय स्म भजे तद पा किलविष देख लो मुझे संतों की झूठी पत्तल फेंकना उनके पात्र मार्जन करना और उसमें लगा हुआ जूठन निकाल के एकत्रित करके खाना इससे क्या हुआ भजे तद पा किल विष जितने पाप थे सब भस्म हो गए ये बड़ी बात है ये बड़ी बात है सब जनों को यही समझाते जबरदस्ती आ गए चलो संत सेवा में चलो संत सेवा करो चाहे आपको दोना पत्तल फेंक कुछ भी करो संत आ रहे हैं आप ही त्रिशो संत आए उनके चरण धो एक रुमाल से पोछो, एक उनकी आरती करो, एक चंदन लगाओ, बैठा लो, भगवान की तरह उनको पवाओ और जब पा के चले तो उससे जूठन उठाओ।

एक एक किनका उठाकर एकत्रित करके पाओ। तो कह रहे सत्कष्म भंजे तद पास्त किल विष सारे पाप भस्म हो गए। जो बर्तनों में पात्र में लगी हुई जूठन होती उसको एकत्रित कर लेता और एकांत में उसे पाता तो भगवान के लिए रोना आता है। हृदय से सारे पाप नष्ट हो गए। अब तो रोज यही सौभाग्य मिलता चातुर्मास संतों की कथा सुनना बैठकर उनकी जूठन पाला उनकी सेवा करना तो मेरी भगवान श्री हरि में अपार रुचि हो गई। रुचि पूरा जीवन व्यतीत हो जाता है। उद्देश्य श्री भगवान भले हो लेकिन रुचि भोग रहती है।

रुचि संसार रहती है। रुचि भगवान में हो गई। ये संतों का जूठन संतों के वचनामृत श्रवण का। प्यारे व्यास जी संतों के संग में जब भगवान की लीला कथा होती तो मैं एकाग्रता पूर्वक सुनता और रोता क्योंकि हृदय पवित्र हो रहा है। मेरी भगवान में अपार प्रीति होने लगी। भगवान में रुचि महात्माओं की सेवा से मेरी बुद्धि भगवान में अचल हो गई। ये बहुत बड़ी बात। बुद्धि का भगवान में अचल हो जाना। अब उस बुद्धि में शुद्ध ज्ञान जागृत हुआ। बालक ही है अभी। यह संपूर्ण संसार असत है।

यह ब्रह्म स्वरूप में कल्पित है। यह सत्य नहीं है। मैं ऐसा देखने लगा। यह बहुत ऊंची स्थिति। इस प्रकार शरद और वर्षा इन दो ऋतुओं में तीनों समय महात्माओं का चरण धोना महात्माओं की जूठन पाना महात्माओं के वस्त्र धोना उनके पास बैठकर भगवान की चर्चा सुनना मेरेित से रजोगुण तमोगुण का पूरा नाश और विशुद्ध त्रिगुणातीत भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया तसवम मेनु रक्तस प्रसितस स हत स श्रद्धधानस बालस दस्या अनुचरस च मेरा संतों में बड़ा अनुराग हो गया बड़ी प्रीति हो गई मैं विनय पूर्वक संत हूं संतों से यदि कुछ लेना है तो दैन्य जैसे भगवान को दैन्य प्रिय से संतों से मैं विनय पूर्वक बर्ताव करता संत जन मेरी मेरी श्रद्धा, मेरा संयम, मेरी विनम्रता, आज्ञाकारिता ये देखकर के बहुत प्रसन्न हुए।

जब जाने का समय हुआ तो मैं सब संतों के चरणों में लौट कर रोया कि अब कैसे जिऊंगा। चार महीने आपका सानिध्य चरणामृत वचनामृत उच्छिष्टामृत उनमें से जो एक महापुरुष थे एकांत ले गए और उन्होंने भगवान के गुरतम ज्ञान का हमें उपदेश किया जिसका उपदेश आगे भगवान ने उद्धव जी को किया है एकादशी स्कंध में भगवान श्री कृष्ण के माया के प्रभाव को मैं जान गया। अब तो कुछ अच्छा नहीं लगा। कैसे भगवान मिले? कैसे भगवान का दर्शन? सत्य संकल्प व्यास जी पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के प्रति समस्त कर्मों को समर्पित कर देने से और निरंतर भगवान की स्मृति से तीनों तापों का नाश करने वाला शुद्ध ज्ञान प्रकट हो जाता है।

वो मेरे हृदय में प्रकट हो गया। अब तो जन्म मृत्यु चक्र में डालने वाली माया का मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं। बड़ी प्रसन्नता हृदय में परा भक्ति का प्रादुर्भाव। अब प्रभु का नाम, गुण, स्मरण बस यही चल पड़ा। प्रभु का नाम जप रहे, प्रभु की लीला गायन कर रहे, प्रभु का स्मरण कर रहे हैं। कभी-कभी एकांत में हे प्रभु मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे प्राणाधार आपका कैसे साक्षात्कार होगा? ऐसे प्रार्थना करता। अब मुझे संतों की कृपा से ब्रह्म ज्ञान और परा भक्ति भाव रूपा दोनों का परिचय प्राप्त हो गया था।

व्यास जी ने कहा नारद जी जब वह ज्ञानोपदेश देने वाले महात्मा जन चले गए तब फिर आपने क्या किया उस समय आपकी अवस्था तो बहुत छोटी थी फिर आपने अंतिम समय शरीर कैसे परित्याग किया आप इस समय पूरी याद रखे हुए हैं काल तो सब स्मृति का नाश कर देता है आपको पूर्व कल्प की स्मृति कैसे पीछे युग की नहीं पूर्व कल्प की देवर्षि नारद जी ने कहा जब मुझे ज्ञान देने वाले महात्मा गण चले गए तो मैं भगवान का नाम जप भगवान का ध्यान भगवान का स्मरण करते हुए बहुत छोटी अवस्था थी समय व्यतीत कर रहा था मैं अपनी मां का इकलौता लड़का था वो मुझे बहुत प्यार करती थी यह मुझे पच नहीं रहा था यह मुझे पच नहीं रहा था कि मां मुझे प्यार कर रही मैं ही उसका सहारा था इकलौता लड़का मैंने भगवान से प्रार्थना की प्रभु मां के स्नेह पाप से मुझे मुक्त करो देखो जननी जनक बंद सुतारा तन धन धाम सुरद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मन बांध बर डोरी मेरी योगेम की चिंता मां बहुत करती हर समय खाया कि नहीं खाया ऐसा वैसा और ये मुझे बहुत अखरता क्योंकि मेरे ध्यान

में विक्षेप पड़ता कठपुतली जैसे नचाने वाले की इच्छा के अनुसार नाचती है। भगवान व्यास देव जी से देवर्षि नारद जी कहते संसार चक्र जिनसे चलता है वो ईश्वरों के ईश्वर भगवान श्री कृष्ण मैंने भी सोचा भगवान का जब विधान कोई होगा तभी मुक्त हो पाऊंगा। अभी पांच वर्ष की अवस्था थी। मुझे देश काल का कुछ ज्ञान नहीं था। एक दिन मुझे सूचना मिली कि मेरी मां गौ धोने के लिए घर से बाहर निकली थी। रास्ते में सर्प ने काले सर्प ने डस लिया। अब सर्प का क्या दोष पैर छू गया होगा। काल की प्रेरणा उसने डस लिया।

मां पधारी मैंने सोचा महामंगल हो गया। ये लो यह है भक्तों का हृदय। महामंगल में जोई जोई प्यारो करे सोई मोहे भावे। अब तो कोई रोक टोक नहीं ना कोई प्यार कर भक्तों को डर किससे लगता है जानते हो नफरत करने वालों से नहीं प्यार करने वालों से जो भगवान के प्रेमी जन होते हैं वो अपमान तिरस्कार निंदा करने वालों से कभी डरते नहीं लेकिन प्यार करने वाले से डरते हैं श्रद्धावान जो कहीं हमारी चित्तवृत्ति इधर ना चली जाए नारद जी ने कहा महामंगल महामंगल बड़ा अनुग्रह और चल पड़े उत्तर दिशा की ओर बस चलते ही गए नगर गांव देश खाने खेड़े नदी इन सबको पार करते हुए आगे देखा बड़ा शीतल जल जो जलाशय विशाल है कमल खिले हुए हैं पक्षी कुक रहे हैं भरे मरा रहे हैं बालक पांच वर्ष का अकेला ही इतना लंबा लंबा मार्ग तय करके नरकट, बांस, सेठा, कुश, कीचक ऐसे जंगल में वहां सांप, उल्लू, सियार, भयंकर जीवों का घर पर मुझे भय नहीं लगा क्योंकि मैंने जान लिया था कि वही होगा जो श्री कृष्ण रचे हैं।

मुझे जोर से प्यास लगी थी, बालक था ही, इंद्रियां शिथिल हो गई थी, भूखा भी था। अब उस बढ़िया सरोवर में स्नान किया और जलपान किया। थकावट मिट गई। पास में देखा विशाल एक पीपल का वृक्ष था। वहीं जाकर आसन लगाया और बैठ गया। भयाव जंगल पर जैसा संत महात्माओं ने मुझे बताया था भगवान का स्वरूप वैसे ही मन ही मन ध्यान करने लगा। एकांत भक्ति भाव वशीकृतित द्वारा जे भी आर भाव से भगवान को पुकारा मेरे नेत्रों में आंसू शरीर में रोमांच और भाव में भगवान प्रकट हो गए भगवान ये व्यास जी उस समय मुझे कैसे तुम्हें बतावे जो आनंद प्रकट हुआ भगवान के प्रकट होने पर रोम रोम पुलकित हो गया हृदय शीतल शांत हो गया।

आनंद की बाढ़ आ गई। और मुझे तनिक भी ध्यान नहीं रहा। मैं कौन हूं, कहां हूं, कैसा हूं। भगवान का ऐसा सुंदर रूप मेरा मन लुभायमान हो गया। बस अभी आनंद ले ही रहा था कि सहसा रूप अंतर्ध्य हो गया। अब तो आसन से उठ खड़ा हुआ। विकल हो गया। चिल्ला चिल्ला कर रोने लगा। बहुत बार आसन लगाया ध्यान धरने की चेष्टा की पर वह रूप नहीं आया। बार-बार विकल होकर भगवान को पुकारा। अब इस रूप के बिना मैं जी नहीं सकता। अतृप्त हो गया। अशांति बढ़ गई। कैसे प्रभु का रूप अब दोबारा देखिए।

वन में भटकने लगा तो आकाशवाणी हुई। खेद है इस जन्म में तुम दोबारा दर्शन नहीं कर सकते। अध कचरे योगी को मेरा दर्शन असंभव। यह मैंने तुम्हारा चित्त लुभायमान करने के लिए अपनी तरफ से दर्शन दिया है। ऐ निष्पाप बालक तुम बस इसी रूप का ध्यान करते हुए निरंतर मेरा नाम जप कर और शरीर की आयु पूरी होने का इंतजार कर। अब तुझे कोई वासना नहीं फंसा पाएगी। अल्पकाल में संत सेवा से तुम्हारी चित्तवत्त परम पवित्र हो गई। इसीलिए संत सेवा से प्रभावित होकर मैंने तुम्हें दर्शन दिया।

यह तुम्हें लुभायमान करने के लिए अब तुम्हारा यह शरीर जब छूटेगा तो तुम मेरे दिव्य पार्षद देवर्ष नारद के रूप में जन्मोगे। प्रकट होगे। यह भगवान ने कहा। तुम्हारा दृढ़ निश्चय कभी नहीं टूटेगा। सृष्टि का प्रलय हो जाने पर भी तुम्हें एक एक बात की स्मृति रहेगी। मैं हर समय तुम्हें देख रहा हूं। तुम निश्चिंत रहना। बस मेरे ध्यान में, मेरे भजन में शरीर छोड़ो और आओ मैं दिव्य पार्षद रूप तुम्हें प्रदान करूंगा। मैंने आकाशवाणी जिस दिशा से हुई थी झुक कर प्रणाम किया। बस लज्जा संकोच छोड़कर भगवान के नाम का कीर्तन करता हुआ समय व्यतीत करता।

कब शरीर छूटे? स्प मत्सर यह सब नष्ट हो चुके थे। अब तो काल की प्रतीक्षा करता हुआ केवल विचरण करता। भगवान की कृपा से मेरा हृदय कृष्ण प्रेम से भर गया। जैसे बिजली कौदती ऐसे अचानक मृत्यु आई और मेरे शरीर को नष्ट कर दिया। ये भी शरीर नष्ट हुआ तो सीधे भगवान के समीप गया और भगवान ने मुझे दिव्य चिदानंदमय देवर्षि नारद शरीर दिया। यह पांच भौतिक नहीं है। यह चिदानंद है। त्रिभुवन में कहीं भी वायु के समान देवर्षि नारद जी जाते और कभी मृत्यु नहीं होनी। प्रारब्ध कर्म पंच भौतिक शरीर में होते हैं।

चिदानंद में नहीं। सबको चिदानंद मिलता है जो भगवान के निज जनन होते हैं। जैसे दास्य, साख्य, वात्सल्य, गोपी, सहचरी ये सब चिदानंद जरूरी। जब भगवान नारायण कारणों प्रणय कालीन समुद्र के जल में सहन करते हैं। उस समय भगवान ब्रह्मा जी सारी सृष्टि को समेट के जैसे दुकानदार अपनी पूरी दुकान को समेट के घर जाता है। ऐसे सब समेट के भगवान की स्वास के साथ उनके उदर में जाकर पूरी सृष्टि ले शयन करते हैं। 1000 चतुर युगी बीत जाने पर जब ब्रह्मा जी जगते हैं तब सृष्टि करने के लिए तीनों लोक तीनों लोकों के जीव सब बाहर आ जाते हैं।

फिर दुकान फैला दी। ये ऐसे ही चल रहा है। मैं भगवान की कृपा से बैकुंठ से लेकर अनंत जितनी रचना है सब में बिना रोक-टोक के विचरण करता हूं। मेरा कभी एक क्षण के लिए भी भगवान का भजन नहीं छूटता और भगवान ने मुझे अपने कर कमल से स्वर ब्रह्म ये वीणा दी है। और इस वीणा में सा रे गा म प ध नी सडज र ऋषभ ग गांधार मध्यम पंचम धवत और न निषाद ये सातों स्वर सातों राग ये सब विराजमान है इस वीणा में डज ऋषभ गांधार मध्यम पंचम दैवत निषाद सा रे गा म प ध नी ये विभूषित दिव्य वीणा है।

इसमें मैं भगवान के नाम का और लीलाओं का गायन करता रहता हूं। और जब चाहता हूं उसी समय प्रभु प्रकट होकर मुझे दर्शन देते हैं। जब जब जहां पुकारा भगवान वही है कैसा सौभाग्य ये भजन का फल तुरंत बुलाने पर तुरंत आकर भगवान हमें दर्शन देते। देवर्षि नारद जी कह रहे तुरंत आहुत में शीघ्रम दर्शनम याति चेतस हे कृष्ण तो उसी समय जिस समय पुकारा तो कह रहे हैं आहुति में शीघ्रम दर्शनम याति चेतस उसी समय शीघ्रता पूर्वक भगवान आते हैं। जिन लोगों का चित्त निरंतर विषय भोगों की कामना से आतुर हो रहा है।

उनके लिए बात समझना भी बड़ा कठिन होगा। लेकिन यदि वह भी नाम जप करने लगे भगवान की लीलाओं का गायन करें तो मेरा अपना अनुभव है कि इसी से उनको भगवत प्राप्ति हो जाएगी। ये काम और चोट लोभ की मोह की क्रोध की ऐसी बार-बार दे रहे हैं हृदय में भगवान के नाम जप से लीला गायन से जैसी शांति मिलती है वैसी किसी और साधना से नहीं। बार-बार इस बात को पकड़ लो। यम नियम आदि योग मार्गों से वैसी शांति नहीं मिलती। व्यास जी आप निष्पाप हैं। आपने मुझसे जो कुछ पूछा था वो अपने जन्म और साधन का रहस्य और आपकी आत्म तष्टि का उपाय मैंने बतला दिया।

श्री सूत जी कहते हैं सोनकाद ऋषियों देवर्षि नारद जी व्यास जी से इस प्रकार कहकर जाने की अनुमति ली और वीणा में तान छेड़ते हुए स्वछंद विचरण करते हुए भगवान का नाम नारद जी हर समय भगवान का नाम वो धन्य भाग है उस महा भागवत को जिसकी जिभ्या पर नाम चल रहा है आहा अहो देवर्ष धन्य य कीर्ति सारंग धनना गायन माध्य निदम तंत्र्या रमत्यातुरम जगत हर समय वीणा में नारायण नारायण नारायण नारायण और भगवान की लीलाओं का गायन धन्य है ये देवर्षि नारद जो सारंग पाणी भगवान श्री हरि की कीर्ति उनका नाम हर समय आनंद मगन होकर गाते हैं और त्रिभुवन में जिधर जाते हैं उधर मंगल करते त्रिताप का नाश करते हैं श्री शौनक जी ने पूछा सूत जी सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान भगवान व्यास देव जी ने जब नारद जी का यह वचन सुना फिर उनके चले जाने पर उन्होंने क्या किया श्री सूत जी ने कहा ब्रह्म नदी सरस्वती के पश्चिम तट पर साम्याप्रास नामक एक आश्रम है वहां ऋषियों के यज्ञ चलते ही रहते हैं वही व्यास जी का अपना आश्रम है।

उसके चारों ओर बेर का सुंदर वन है। उस आश्रम में बैठकर उन्होंने आचमन किया बद्रीवन और स्वयं अपने मन को समाहित किया। उन्होंने भक्ति योग के द्वारा अपने मन को पूर्णतया एकाग्र और निर्मल करके आदि पुरुष परमात्मा और उनके आश्रय में रहने वाली माया को देखा। जिस माया से मोहित होकर यह जीव तीनों गुणों से अतीत होने पर भी अपने को त्रिगुणात्मक मान लेता है और इस मान्यता के कारण भारी दुख भोगता है जन्म मरण आदि इस अनर्थों की शांति का साक्षात साधन है केवल भगवान का निरंतर चिंतन पकड़ो संपूर्ण माया से बचने का एकमात्र उपाय है निरंतर भगवान का भजन निरंतर चिंतन परंतु संसार के लोग इस बात को नहीं जानते हैं।

यही कारण है कि उनकी दुर्गति होती है। बात पकड़ लो। इसीलिए बहुत सरल भावों से भगवान की महिमा भगवान के सिद्धांत जिसमें भरे पड़े हैं। ऐसे श्रीमद् भागवत की संहिता की रचना की भगवान व्यास देव जी ने। इसके श्रवण मात्र से पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के प्रति परम प्रेममय भक्ति हो जाती है। जो निरंतर भगवान की भक्ति से हृदय भरा रहता है। उसका परिचय होता है कि निरंतर भगवत स्मरण परायण भक्ति का क्या स्वरूप है? देवर्षि नारद जी ने बताया। तदपिता अखिलाचारिता त स्मरण परम व्याकुल हर समय भगवान के स्मरण में इतना मगन है कि स्मरण छूटने का आभास मात्र हो जाए तो परम व्याकुल हो जाए और हर आचरण भगवान को समर्पित यही परम भक्ति योग है।

जो यह भक्ति योग धारण करता है तो उसका शोक नष्ट हो जाता है। मोह नष्ट हो जाता है। भय नष्ट हो जाता है। विकार नष्ट हो जाते हैं। वो निर्विकार हो जाता है। इस महान भागवत संहिता को अपने प्रिय श्री सुखदेव जी को क्योंकि यही अधिकारी दिखाई दिए भगवान व्यासदेव जी को। चौक जी ने पूछा सुखदेव जी तो अत्यंत निवत्त परायण है। वह आत्मा में रमण करते रहते हैं। उनको पढ़ने लिखने का ग्रंथ अभ्यास का कैसे भाव आ गया? 18,000 श्लोक पढ़े कैसे? वह तो अपने स्वरूप में रमण करते हैं। श्री सूत जी ने कहा जो लोग वास्तविक ज्ञानी हैं जिनकी अविद्या की गांठ खुल गई है ऐसे आत्माराम पुरुष भी भगवान श्री कृष्ण की हेतु रहित भक्ति किया करते हैं।

क्योंकि भगवान के गुण ही ऐसे हैं। भगवान के गुण बड़े-बड़े सिद्ध आत्मा रामों को भी आकर्षित कर लेते हैं। श्री सुखदेव जी तो भगवान के भक्तों के अत्यंत प्रिय और स्वयं भगवान वेदव्यास के पुत्र हैं। भगवान के गुणों ने उनके हृदय को अपनी ओर खींच लिया और वह विवश होकर के श्रीमद् भागवत का अध्ययन किया। आपने प्रश्न किया था कि महाराज परीक्षित ने राज्य लक्ष्मी त्याग करके क्यों गंगा किनारे आमरण अनशन व्रत लिया? जिस समय महाभारत युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्षों के बहुत से वीर वीरगति को प्राप्त हो चुके थे।

भीमसेन की भयंकर गदा के प्रहार से दुर्योधन की जंघा टूट चुकी थी। तब अश्वत्थामा गया नजदीक और कहा प्रिय मित्र अब मैं तुम्हारा सेनापति हूं। तुम्हारी जरूर कमर टूट गई है लेकिन तिलक करो। अब जितने बचे हैं मैं पांडवों सहित सबका विनाश करूंगा। ऐसा ही हुआ। वो अपने स्वामी दुर्योधन का प्रिय कार्य समझकर जितने सो रहे थे सबको काट डाला था। अश्वत्थामा ने। बहुत से वीर बचे थे। बहुत से वीरों को रात्रि में सोते समय सबको दृष्ट दमनाद सबको और यह द्रोपदी के पुत्रों को पांडव समझकर काटा था और यह भगवान ने बचाव पक्ष किया पांडवों को उठाकर के अपने शिव की तरफ ले गए और वहां द्रोपदी के पुत्र सोए हुए थे तो समझा कि ये पांचों पांडव क्योंकि ज्यों के त्यों वैसे ही महारथी थे।

ये सोते हुए सबको काट डाला। द्रोपदी के पांच पुत्रों के सिर काट के दुर्योधन के पास लाया और कहा मैं पांडवों का सर ले आया देखो तो उनका कहा भीम का सर लाओ तो भीम का सर भीम के जो पुत्र थे उन पांचों में उनका दिया दबाया तो फट गया उनका भीम का सर ऐसा नहीं होता तब देखा कि ये तो पुत्र अब तो कहा है तुमने तो हमारा सर्वनाश कर दिया हमारे वंश का भी विनाश कर दिया। अरे हमारी दुश्मनी पांडवों से थी। तुम सोते हुए द्रोपदी के पुत्रों को क्यों मार डाला? बड़ी निंदा की अश्वत्थामा की।

जे द्रोपदी को पता चला वो तो अत्यंत दुखी हो गई। उनकी आंखों में आंसू बहने लगे। अर्जुन ने उनको सांत्वना दी। कल्याणी सावधान। तुम वीर माता हो। पर मैं तुम्हारे आंसू तभी पोछूंगा जब साता ताई का सिर धनुष से काटकर तुम्हारे सामने रखूंगा। तब तुम उस पर पैर रखकर अपने पुत्रों की अंत्यष्टि क्रिया करना। अर्जुन ने ऐसी बात कही। भगवान श्री कृष्ण से कहा चलो सारथी बनो और मैं कवच धारण करता हूं और भयानक गांडीव धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर गुरु पुत्र अश्वस्थामा के मारने के लिए दौड़े अपराधी तो था ही सोते हुए ये वीर पुरुष का लक्षण नहीं सोते हुए को नहीं सावधान करके युद्ध करके मारा जाता है ये तो बहुत निंदनीय कर्म तो निंदनीय कर्म से बड़ा भयभीत था अश्वत्थामा।

जब देखा कि भगवान श्री कृष्ण सारथी और रथी अर्जुन और गांडीव में प्रत्यंचा चढ़ाकर ललकारते हुए आ रहे हैं। तब प्राणों की रक्षा के लिए भागा। जहां जहां भागा वहां वहां भगवान श्री कृष्ण रथ को उसने देखा कि अब तो मारा गया मैं। तो अपने बचाव के लिए एकमात्र साधन ब्रह्मास्त्र का संधान किया द्रोणाचार्य जी द्वारा प्रदत्त लेकिन ब्रह्मास्त्र संधान करना सिखाया था वापस करना नहीं इसको वापस करना अर्जुन को सिखाया था योग्य शिष्य पुत्र से भी अधिक प्यारा होता है ब्रह्मास्त्र लौटाने की विधि उसे नहीं मालूम थी पर प्राण संकट आ गया तो तत्काल आचमन किया और ध्यानस्थ होकर ब्रह्मास्त्र का संधान किया।

ब्रह्मास्त्र तुरंत प्रचंड तेज। अब तो सीधे अर्जुन की ओर ब्रह्मास्त्र। अर्जुन जी ने हाथ जोड़ा और भगवान श्री कृष्ण से कहा श्री कृष्ण तुम सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा हो। मैं जानता हूं तुम्हारी शक्ति अनंत है। तुम ही भक्तों को अभय देने वाले हो। जो संसार की धकती हुई आग में जल रहे हैं। जीवों को उबारने के एकमात्र तुम ही लक्ष्य हो। प्रभु तुम प्रकृति से परे रहने वाले आदि पुरुष साक्षात परमात्मा हो। तुम अपनी स्वरूप शक्ति से बहिरंग एवं त्रिगुणमय माया को दूर भगाकर अपने अद्वितीय स्वरूप में स्थित हो।

तुम अपने प्रभाव से माया मोहित जीवों के लिए धर्मा आदि रूप कल्याण का विधान करते हो। हे प्रभु यह आपका अवतार पृथ्वी का भार हरण करने के लिए अनन्य प्रेमी भक्त जनों की रक्षा के लिए उनके चिंतन के लिए हे सु प्रकाश परम बह्म परमात्म श्री कृष्ण देखो ये भयंकर तेज मेरी ओर आ रहा है ये मुझको बिल्कुल पता नहीं कि क्या है और ये क्या करेगा भगवान ने कहा डरो मत ये अश्वत्थामा का चलाया हुआ ब्रह्मास्त्र है। वो प्राण संकट उपस्थित होने पर इसका प्रयोग तो कर दिया पर लौटालना नहीं जानता।

और इस ब्रह्मास्त्र को कोई दूसरा अस्त्र दबा सके। ऐसा आज तक कोई अस्त्र निर्माण नहीं हुआ। तुम शास्त्र विद्या के पारंगत हो। तत्काल आचमन करो और ब्रह्मास्त्र को शांत करने के लिए ब्रह्मास्त्र का ही प्रयोग करो। अर्जुन विपक्षी वीरों के मारने में बड़े प्रवीण थे। भगवान की बात सुनकर आचमन किया और भगवान की चार परिक्रमा की और ब्रह्मास्त्र के निवारण के लिए ब्रह्मास्त्र का ही संधान कर दिया। अब दोनों ब्रह्मास्त्र जब भयंकर प्रलयाग्न प्रकट हो गई। जब दोनों ब्रह्मास्त्र टकराए प्रजा जलने लगी।

सबने समझा मानो प्रलय कालीन समय आ गया है। भगवान ने इशारा किया तो दोनों ब्रह्मास्त्र को शांत करके अर्जुन ने वापस कर लिया क्योंकि अर्जुन को देखो द्रोणाचार्य जी ने अश्वत्थामा को यह विद्या नहीं सिखाई। ये अर्जुन को सिखाई। फिर अर्जुन क्रोध से लाल होकर दौड़ पड़े और अश्वत्थामा को जाकर पकड़ लिया। जैसे कोई बलवान पशु को बांध लेता है। ऐसे बांध लिया और उठाकर लाए रथ के पीछे के हिस्से में पटक दिया स्वस्थामा को। भगवान श्री कृष्ण जी भी बहुत कुपित हो रहे थे। कहा अर्जुन इसको छोड़ना बिल्कुल नहीं।

इसने रात में सोए हुए निरपराध बालकों की भी हत्या की है। धर्मता पुरुष असावधान मतवाले पागल सोए हुए बालक स्त्री शरणागत रथहीन पागल आदि को कभी नहीं मारते महत अपराध है ऐसा नहीं मारना चाहिए और इसने वह सब कर डाला यह दुष्ट है क्रूर है यह जीता रहेगा तो और भी महान पाप करेगा मेरे सामने तुमने द्रोपदी से प्रतिज्ञा की थी कि जिसने तुम्हारे पुत्रों का वध किया उसका सिर उतार कर लाऊंगा। यह आताताताई है। वध किया है। इसने अपने स्वामी दुर्योधन को भी दुख पहुंचाया। अर्जुन देख रहे थे कि भगवान बड़ी मुस्कुराहट के साथ आज्ञा दे रहे हैं।

इसका मतलब कुछ रहस्य है। भगवान बार-बार कह रहे हैं आताई है इसको मार डालो। भगवान रथाग्रह अर्जुन रथी पथ पे पीछे अश्वत्थामा बंधा हुआ अश्वत्थामा को पशु की तरह बांधकर निंदित कर्म करने से बहुत खिन्न मन उदास द्रोपदी जी ने जे ही ऐसा देखा तो उन्होंने कहा नहीं नहीं हमारे गुरु पुत्र का ऐसा अपमान नहीं होना चाहिए नमस्कार अश्वत्थामा को प्रणाम किया और कहा तत्काल बंधन मुक्त करो गुरु पुत्र का इस प्रकार अपमान बिल्कुल नहीं। हे अर्जुन रहस्य सहित सारे धनुर्वेद उनका उपसंहार जिन गुरुदेव ने दिया वही गुरुदेव ही अपने आत्म पुत्र के रूप में विराज हमको गुरु के समान इसका आदर करना है।

द्रोपदी जी ने कहा नहीं नहीं जैसे मैं आज दुखी हो रही हूं ऐसे इसकी मां कृपी भी दुखी होगी। मैं नहीं चाहूंगी। छोड़ दो इसे। छोड़ दो। आर्य पुत्र तुम धर्मज्ञ हो। गुरु वंश का कभी अपमान नहीं किया जाता। गुरु वंश की सदैव पूजा करनी चाहिए। चाहे जितना भारी पाप बन जाए। कभी दंड नहीं देना चाहिए। कभी व्यथा नहीं पहुंचानी चाहिए। मैं दुखी हो चुकी। अब मैं और किसी को दुखी नहीं करना चाहती। इसकी माता दुखी हो यह मैं नहीं चाहूंगी। जो उच्च श्रंखल बलवान से भी चाहे जितना बड़ा बलवान हो यदि वह गुरुकुल का अपमान करता है, गुरु वंश का अपमान करता है तो शोकाग्नि के द्वारा वह एक न एक दिन भस्म हो जाता है।

द्रोपदी की बात धर्म और न्याय के अनुकूल थी। बिल्कुल कपट नहीं। करुणा और ममता से भरी थी। अत राजा युधिष्ठिर जी ने भी इन बातों का अनुमोदन किया। नकुल शाहदेव सात्यकी अर्जुन भगवान श्री कृष्ण वहां उपस्थित सभी नर नारियों ने द्रोपदी की प्रशंसा की। [गला साफ़ करने की आवाज़] भीमसेन ने कहा कि ये सब बातें एक तरफ रखो। जिसने सोते हुए बच्चों को काट डाला ना अपने लिए ना अपने स्वामी के लिए बल्कि व्यर्थ में मार डाला। तुम सब हटो। इसे घूसे से मार डालता हूं। को भीमसेन भगवान ने द्रोपदी की भी बात सुनी।

भीमसेन की बात सुनी। अर्जुन की तरफ देखकर के कहा भगवान श्री कृष्ण बोले अर्जुन मेरी दोनों आज्ञाओं का पालन करो। द्रोपदी की भी बात रह जाए और भीम की भी बात रह जाए। शास्त्र में दो आज्ञा है। आता ताई को मार डालना चाहिए। कोई भी हो। और एक आज्ञा है कि कितना भी पतित नीच हो पर ब्रह्म ऋषि की हत्या नहीं करनी चाहिए। मेरी आज्ञा का पालन करो। अर्जुन भगवान के हृदय की बात ताड़ गए। तलवार निकाली अश्वत्थामा के सिर के बाल मूड़ दिए। ब्रह्म मणि थी उसको निकाल लिया। श्रीहीन तत्काल हो गया।

ब्रह्म तेज रहित हो गया। रस्सी से उसके बंधन खोले। और अपमानित करके निकाल दिया। जा तुझे जीवन दान देते हैं। यह सबसे बड़ा अपमान मृत्यु तुल्य ही होता है। मूढ़ देना, धन छीन लेना, कठोर वचन करके धक्का कर मारकर बाहर निकाल देना। यही मृत्यु तुल्य दंड भी है और मारा भी नहीं। दोनों बातें हो गई। अब अंत्यष्टि क्रिया अपने पुत्रों की पांडवों ने की। जलांजलि अर्पित की। गंगाजल में स्नान किया। भगवान श्री कृष्ण और धौम्यादि मुनियों ने पवित्र इतिहास सुनाकर उनको सांत्वना प्रदान की।

भगवान श्री कृष्ण युधिष्ठिर को रास तिलक सिंहासन आरूढ़ सब काम ठीक अब हो गया। अश्वमेध यज्ञ करा दिए। जाने का विचार हुआ। युधिष्ठिर से और बड़े बुजुर्गों से भगवान ने कहा अब हम उद्धव आदि के साथ द्वारिका। सबने विवश होकर के भगवान से प्रार्थना की कि अब आपको जाने की अनुमति कौन दे? आपके दर्शन मात्र से सुख मिलता है। पर जैसे आपको सुख मिले भगवान के लिए दारुक ने रथ सजाया छत्र चवर आदि जैसे भगवान बैठने ही जा रहे थे कि आवाज आई प्र पाहमाम पाहिमाम महा योगिन देव देव जगत पते नान्यम तद भयं प यत्र मृत्यु परस्परम प्रभु प्रभु रक्षा करो रक्षा करो आपके अतिरिक्त कोई नहीं है कि इस लोक में मुझे बचा सके क्योंकि यहां सब परस्पर एक दूसरे की मृत्यु के निमित्त बन रहे हैं।

प्रभु यह देखो कोई तेजोमय बाण मेरे गर्भ की ओर दौड़ा रहा है। उत्तरा के गर्भ में महाराज परीक्षित थे। स्वामिन मुझे भले मार डाले लेकिन मेरे गर्भ की रक्षा हो। मैं आपकी शरण में हूं। भक्तवत्सल भगवान ने दृष्टि डाली तो देखा कि यह नीच माना नहीं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग गर्भ शिशु पर कर दिया अश्वत्थामा ने और उधर पांच बाण संधान किए पांडवों क्योंकि वंश नहीं रहने देंगे पांडवों को भी नष्ट करने के लिए पांच बाण और एक बाण उत्तरा के गर्भ में विराजमान महाराज परीक्षित के नाथ के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग पांडवों ने देखा बोले बोले प्रभु ये पांच बाण तेजों में हमारी ओर आ रहे हैं।

सब ने अस्त्र उठा लिया। भगवान ने कहा तुम सब शांत हो जाओ। ध्यान किया सुदर्शन चक्र का। ये अमोग अस्त्र है भगवान का पार्षद है। और सुदर्शन चक्र को रक्षा में लगा दिया। पांडवों की कोई भी अस्त्र शस्त्र अब छू नहीं सकता। देखो यह कथाएं ही नहीं है। इनको जीवन में उतारना है। हर परिस्थिति में यदि हम भगवान का आश्रय लिए रहेंगे तो भगवान हमारी रक्षा करेंगे। पक्का सुदर्शन चक्र से निज जनों की रक्षा की। योग योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने जब देखा कि पांडवों की वंश परंपरा जिससे चलने उस परीक्षित के ऊपर ब्रह्मास्त्र तो तुरंत अपने माया के द्वारा कवच रख दिया गर्भस्थ शिशु को कवच में सुदर्शन चक्र की रक्षा में पांडवों को ब्रह्मास्त्र अमोग है कोई शस्त्र उसको नहीं रोक सकता फिर भगवान श्री कृष्ण का तेज सुदर्शन के सामने आते ही पांचों बाण शांत हो गए।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। भगवान सर्व्श्चर्यमय है। भगवान निज शक्ति माया से स्वयं अजन्मा होकर संसार की सृष्टि पालन और लय करते हैं। भगवान श्री कृष्ण ब्रह्मास्त्र की ज्वाला तो सुदर्शन से और आप अंदर सूक्ष्म रूप रख के गर्भस्थ शिशु परीक्षित की रक्षा के बड़ा सौभाग्य परीक्षित जी का गर्भ में भगवान के दर्शन हो गए। ब्रह्मास्त्र की ज्वाला से मुक्त कर दिया। पांडवों को भी और गर्भस्थ शिशु को भी। फिर भगवान ने सांत्वना दी और कहा अब चले। जब कुंती जी ने देखा कि भगवान जा रहे हैं भगवान के समीप आई और भगवान से स्तवन करने लगी जो स्तवन वो आगे चर्चा श्री राधा वल्लभ लाल की जय है।

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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