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साधना में मन की चालाकियों को कैसे समझें ? // 07/06/26

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माशयाम निर्वापय परम शी शीतल माय परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप नवन निभत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल चंद्र प्राणाधार हार श्री श्यामा श्याम जो समस्त हित परिककर निज पर यह मनुष्य जीवन मृत्यु माला का एक मन का है। जैसे डोरी में मन का पिरोया हुआ है। ऐसे ही मृत्यु रूपी डोरी में इस शरीर रूपी मन का पिरोया हुआ है। बहुत से मन के ऐसे हो गए।

यह मृत्यु माला का भंजन करना होगा। इसे तोड़ना होगा। इस चक्र को रोकना होगा। और यह केवल समय अभी आपको दिया गया है। संस्कृति माझ बरियाई के पायो मानुष देह वृथा कत डारत अभी समझ में नहीं आ रहा अविद्या के कारण अज्ञान के कारण भगवान ने संस्कृति चक्र को रोक करके हमें अवसर दिया है महा सुख प्राप्ति का दुर्भाग्यवश हमने सुख का भाव कर लिया इस प्रगट जगत के वस्तु व्यक्ति स्थान में एकमात्र संत समागम संतों की वाणी शास्त्र सम्मत वाणी इसी में सामर्थ्य है कि आपके इस मोह निद्रा को भंग करके जगा दे और आपके जागते ही ये मृत्यु की माला टूट जाएगी।

यह स्वप्निक है। जब तक मैं तू तेरा मेरा तब तक आप स्वप्निक पुरुष हैं। आप जगे हुए पुरुष नहीं। जगे हुए पुरुष का लक्षण होता है द्वंदातीत गुणातीत कालातीत किंचिन मात्र कहीं कोई चाह नहीं अचाह स्थिति सोच ही नहीं रहती। जगे हुए पुरुष के हृदय में किसी भी वस्तु व्यक्ति स्थान का अस्तित्व ही नहीं होता। जैसे स्वप्न से जगे हुए पुरुष को स्वप्निक वस्तु व्यक्ति स्थान का अस्तित्व ही नहीं रहता। ऐसे ही इस जगत में अविद्या मोह से ग्रसित जो भूले हुए अपने स्वरूप को विचरण कर रहे हैं।

जब गुरु कृपा से गुरु वचनों से सत्संग के द्वारा वो जगते हैं तो संपूर्ण चराचर जगत में अस्तित्व ही नहीं रहता। नाना तो का ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या स्वप्निक विलास से वो जग गया। यह बहुत कठिन है। इसलिए बहुत कठिन है कि बहुत जन्मों से हमारा राग, आसक्ति, मोह यह पुष्ट हो रहा है। अब अवसर मिला है इनको नष्ट करने का। इनके बंधन से मुक्त होने का। तो इसमें सबसे पहले उपासक की एक चतुरताएं होनी चाहिए। बहुत अनुभव गम में बात है। आपका मन आप नहीं है और जब यह आपको वस्तु व्यक्ति स्थान के भोगने का देखने का सुख लेने का संकल्प बनाना चाहे तो आप इससे निरपेक्ष हो जाए।

भगवत कृपा से अगर यह बात समझ में आ रही हो तो आप बहुत बड़े परमार्थ के पथिक बन सकते हैं। बस एक ही बात है यही हम फेल हो जाते हैं। इसका स्वभाव है तन्मय कर लेना। जहां ये कोई विषय देखा हुआ, सुना हुआ, भोगा हुआ, चिंतन में आया हुआ, यह उसी समय हमें तदात्म कर लेता है। उसकी बात मेरी बात हो जाती है। मैं की बात हो जाती है। मैं देख रहा हूं, मैं सुन रहा हूं। मैं भोग रहा हूं। मैंने देखा, मैंने सुना, मैं भोगूंगा। बहुत पॉइंट की बात है। बड़ी सूक्ष्म बात है। यह पकड़ने लायक बात है।

सब संसार इसी में विचर रहा है। को एक पाव भगत जी मोह जो कहो हरिवंश रस बिरलो समझनहार एक दोई जो पाई खोजी सब संसार यह समझने की चेष्टा कीजिए। बिल्कुल आनंदित होकर आप कभी पराजित नहीं होंगे विकारों से। आप जब मन में आए हुए पूर्व अभ्यास पूर्व संस्कार वश भोगों का स्फूरण होता है। मनन होने लगता है भोगों का। लड़ने की जरूरत नहीं उससे। रोकने की ताकत भी नहीं है। निरपेक्ष होने की बात है। बहुत अच्छे से समझ लीजिए। अगर आप जलन महसूस करके उनमें तन्मय हो गए रोकने के लिए भी तो वो आपको गिरा देगा।

ये कुछ बातें हृदय की अभ्यास में लाई हुई बातें हैं। आप उसमें ये क्यों नहीं होना चाहिए। नहीं आप उसकी सत्ता दे रहे हैं। आप उसका चिंतन कर रहे हैं। आप कमजोर हो रहे हैं। निरपेक्ष हो गए। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा सुनो मत उसकी उस समय पर बहुत प्रवीण साधक ऐसा कर सकता है। नहीं हमारे कहने में देर लगी। उसको तन्मय करने में देर नहीं लगती। मन तन्मय कर लेता है। इतना बोलने में समय ज्यादा लग गया। इससे कम समय में तुम्हें तन्मय कर लेगा। तन्मय कर लिया संकल्प बनेगा परमार्थ से विलग होने वाली बात आ जाएगी वो मिनट वो सेकंड वो वृत्ति विलग हो गई परमार्थ से निरपेक्ष उसकी सुनो ही मत जैसे पागल आदमी बहुत ही पागल है मन बहुत ही पागल है ये हम अनुभव की बात में कहते हैं कभी ऐसी स्थिति पैदा कर देगा बड़ा भजन में मन लग रहा है।

कभी ऐसी स्थिति कर देगा ना भगवान में विश्वास ना साधन में विश्वास। एक खिन्नतासी कभी इतने भोग प्रिय लगने लगेंगे कि लगेगा अगर भगवान प्रसन्न हो तो यह भोग हमें दे दे। देखो आपको तन्मय किए हुए हमें दे दे। जनेंद्रिय रस्द, नेत्रेंद्र, ग्राणेंद्र इनके भोगों को हम मानते हैं। भोगता बने बैठे हैं। मैं भोग रहा हूं। मैंने भोगा मैं भोगूंगा। इसी का नाम अज्ञान है, अविद्या है, बंधन है। यह बहुत विवेक की जरूरत है। इसकी सत्ता ही नहीं है जिसे आप मान रहे हैं। अगर आप उसका विरोध करते हैं तो सत्ता है।

और आप रागात्मक स्वीकार करते हैं तो सत्ता है। और भगवान कह रहे हैं नाशतु विद्यते भाव इनकी सत्ता ही नहीं आगमा पनो अनित्यास तास तितस भारत ये आने जाने वाले हैं चुपचाप सह जाओ सहसहत बाढ़ है भगति मत बोलो कि मुझे ये जलन हो रही है कामा अग्नि क्रोधा अग्नि मोहा मत बोलो नहीं बोलने से सत्ता दृढ़ होती है मत आकर्षित नहीं है झूठा है वो बोलता रहेगा बोलने दो बोल दो उदासीन हो जाओ और यह उदासीनता तभी मानी जाएगी जब भगवत स्मृति चल रही है भगवान नाम चल रहा है नहीं केवल बातों में होगा अंदर आपको तन्मय कर लेगा बहुत बड़ा खिलाड़ी मन है अगर आप इससे उदासीन नहीं रहे तो आपके गुरु संबंध में इष्ट इष्ट संबंध में परमार्थ मार्ग में या श्रद्धा पैदा कर देगा।

इतने दिन हो गए अभी काम सता रहा है। भी क्रोध आ रहा है। भी जलन हो। ये वो बड़ा प्रपंची है। और ये भगवत स्वरूप है। यदि यह प्रभु के नाम रूप में प्रभु के चरणारविंद में लग जाए तो इसका वास्तविक स्वरूप भगवान ही है। इंद्रिय नाम मनुष्य भगवान बोलते मैं हूं। बस अभी सुधारना है। इससे निरपेक्ष हो जाना ही इसको वश में कर लेना है। इस अनुभव की बात कह रहा हूं। इसकी सुनेंगे आप नाराज होंगे तो ये फंसा लेगा। सुनेंगे आप राजी हो जाएंगे तो तो फंसे हैं ही। ना नाराज होना है ना राजी होना है।

उदासीन निरपेक्ष यह तभी हो पाएगा जब आप सत्संग के वाक्यों का मनन करेंगे। जब आपका लक्ष्य हो जाएगा जीवन मुक्त होना। जब आपका लक्ष्य हो जाएगा भगवत प्रेम प्राप्त करना। श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी महाराज कह रहे हैं परम विमुक्ति साक्षात [गला साफ़ करने की आवाज़] परम विमुक्ति साक्षात भू रस सर्वस्व में वा साक्षात आहा साक्षातत विश्व भाग्यम जिया वृंदावनम श्रत मृग्यम हे भाई मोक्ष साक्षात रखा हुआ है तुम्हारे सामने उठा भर लो अर्थात तुम्हें मुक्त होना नहीं है तुम्हें कभी कोई बांध ही नहीं सकता तुमने पकड़ रखा है तुम्हें किसी ने नहीं पकड़ा है तुमने पकड़ रखा है देखो तुमने मन को अपना मैं मान लिया बुद्धि को मान लिया इंद्रियों को मान लिया भोगों में सुख ये आपकी है आपकी गलती है आप अभी नकारिए नहीं नहीं अभी आप ऊंचे चढ़ते चले जाएंगे आपकी स्वीकृति बिल्कुल सहज में समझ लो हमारे शास्त्रों में दो पद्धतियां रखी गई है भगवत प्राप्ति की अन्वय और व्यतिरेक अन्वय वो है व्यतिरेक ये जो दिखाई दे रहा है यह नहीं है यह नहीं है यह [गला साफ़ करने की आवाज़] रूप नहीं है यह सत्य नहीं परिवर्तित होने वाला है।

जो भी दिखाई दे रहा है गोचर जहां लग मनुजाई सो सब माया जानो भाई व्यतिरेक नहीं लेकिन इनमें है वही है वही है जहां हमारा राग है नहीं नहीं मिथ्या इसके बाद जो वैराग्य की स्थिति में बचा वो है सिद्धांत से चलोगे तो बहुत जल्दी आनंद का अनुभव होगा सत्य मानिए जिसे तुम सुख समझते हो जब थोड़ा सा भगवत आनंद होगा तो तुम्हें भयावा लगने लगेगा वो अलम विषय वार्तया नरक कोटि विभत्सया करोड़ों नरकों से भी भयावनी भद्दी बात लगेगी ये विषय सुख विषय वार्ता घृणास्पद है ये कब जब भगवनंद की स्फूर्ति होगी तब तक बात मान के चल दो तो अनुभव आगे हो जाएगा।

साक्षात मुक्ति सामने रखी है। आप मुक्ति को स्वीकार ना करके भक्ति को स्वीकार करें। भोग आपकी स्वीकृति है। यह स्वतंत्रता आपको दी गई है। सब कुछ है। आप जो चाहो ले सकते हो। आप ऐसे आचरण करो कि भूत बन सकते हो। ऐसे आचरण करो राक्षस बन सकते हो। ऐसे आचरण करो सूअर कुत्ता बन सकते हो। आप ऐसे आचरण करो देवता बन सकते हो। ब्रह्मा बन सकते हो, ब्रह्म स्वरूप हो, आप नारायण बन सकते। जो चाहो आपको मनुष्य जन्म में इतनी स्वतंत्रता दी गई है कि आप स्वयं चाह कर सकते हैं। आप अचा हो सकते हैं।

यह स्वतंत्रता है आपकी। इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके आप परतंत्र होते जा रहे हैं। गुलाम होते जा रहे हैं। व्यसनों के इंद्रिय सुखों के कैसे-कैसे मन के कैसे-कैसे स्फुरणाएं कैसी बातें कैसा जलन आप उस असत मन की बातों को चेष्टाओं को सत्य मान रहे हैं। परम विमुक्ति साक्षात बस अनुभव करना है। यही निरपेक्ष होते जाओ। आप इतने तन्मय हैं शरीर में कि इसी को मैं मानकर के कैसे मुक्त आपका कौन होगा? आप तो शरीर को पकड़े। मैं आप इंद्रियों से भोगे हुए विषय कभी भोगते समय चिंतन करो कि अन्न आहार है।

प्राणों का रसेंद्र इसका स्वाद ले रही है। और मैं तो इसका दृष्टा मात्र हूं। फिर इस शरीर का एक प्रारब्ध रचा गया है। प्रारब्ध से आज इसको अच्छा मिला है। कोई हर्ष नहीं। आज सूखा मिला है। कोई शोक नहीं। आज मिला ही नहीं है। कोई शोक नहीं। इस शरीर का प्रारब्ध है। विवेक के द्वारा चिंतन किया जाता है। हर्षित होकर कामना कर सुखास्पद भाव रख के किसी भी इंद्रिय के भोग में आप फंसते चले जाएंगे। फंसने का तात्पर्य आपका अंदर का चिंतन उसी का होगा। आप देख लो अनुभव करके। महापुरुष कह रहे हैं परम विमुक्ति साक्षात सामने रखी उठा लो स्वीकार कर लो।

क्या पहले अस्वीकृति करो व्यतिरेक ये नहीं चाहिए। ये नहीं चाहिए। ये नहीं चाहिए। जा ना चाह कबहु कछु सामने रखिए। क्या चाहिए तुम्हें? कहते मुझे भगवत दर्शन चाहिए। ठीक है। बहुत जल्दी हो जाएंगे। पर आपके अंदर और चाह नहीं होनी चाहिए। बोले वो तो है तो उसको मिटाओ। लगो भजन में लगो। सद्भावना से युक्त होकर सत क्रियाओं को करो। भगवत अर्पित करो। नाम जप करो। भगवत लीला गुणगान करो। महापुरुषों का संग करो। अन्य चाह जिस दिन मिटा दी तो यह प्रश्न खत्म हो जाएगा कि भगवान है कि नहीं है और भगवान है तो कैसे हैं?

उनकी प्राप्ति कैसे ये सब खत्म हो जाएगा। वो आप हैं। आप वो आप ही आप हैं। गुण भाषा है। वो वो नहीं है। वो आप ही आप हैं। अपने आप अनुभव हो जाएगा। बहुत बहुत सुलझ करके हमारी बात जो हृदय की है उसे समझो। एकमात्र मन से निरपेक्ष होना है। इसकी एक भी बात जो भगवत विमुख करने वाली है वह तुम्हारी नहीं है। तुम उसे स्वीकृति के द्वारा इतने फिसल गए, इतने कमजोर हो गए कि उसकी बात माने बिना आप समझते हैं कि मैं जी नहीं पाऊंगा। यही भारी बंधन है ना होते हुए भी। नहीं तो कह रहे परम विमुक्ति साक्षात एक अद्भुत नशा एक अद्भुत आनंद नशा जिससे नशेबाज शिथिल हो जाता है उसको बाह्य शुद्ध नहीं रहती श्रीमद् भागवत में लिखा हुआ है जैसे कोई अधिक मदिरापान किए हुए पुरुष उसको पता नहीं होता कि हमारे वस्त्र हैं कि नहीं है।

मैं कहां पड़ा हूं। मैं किस हालत में हूं। बिल्कुल शुद्ध नहीं रहती। ऐसे ही मना स्थिति जब ब्रह्माकार हो जाती है। अब शरीर का संचालन प्रकृति स्वयं करती है। वो मां की तरह उसकी रक्षा दुलार पोषण कर उसको कोई सुध नहीं होती। ज्ञानी महापुरुष को ऐसे भक्त देह कुटुंब ते जाए छूट सब ही विधि तो अब स्वयं उसके आराध्य देव संभाल करते हैं उसकी देह की। उसको बिल्कुल कोई चिंता कोई आपको लगेगा कि खा रहा है, पी रहा है, चल रहा है, स्नान कर ये सब आराध्य देव ही बैठकर स्वयं करवा रहे हैं।

वहां उसकी सत्ता नहीं रह गई है। उसमें लीन हो चुका है। तन्मय हो चुका है। मैं समा गया है। प्रेम गलियति सा करिता में दो ना समाए। एक होकर के लीन हो रहा है। तन्मय हो रहा है। साक्षात विमुक्ति बोले मुक्ति तो हमें नहीं चाहिए। एक बात अच्छे से समझ लो। मुक्ति का तात्पर्य ही है जिसे कहा जाता है कि मुझे मोक्ष नहीं चाहिए। उस मोक्ष सुख को लेकर के मुझे सेवा सुख चाहिए। पर अगर मोक्ष मुक्ति की बात तो देखो महाप्रभु हरिवंश चंद्र जिस यहां कह रहे हैं विभेम कैवल्यता मुझे कैवल्य पद से भय लगता है।

वही मुक्त होने की बात कह रहे हैं। दूरादपास स्वजन मुक्त होइए। परिवार के शरीर संबंध राग से मुक्त होइए। दूरादपास स्वजन सुखमर्थ कोटि धन के द्वारा प्राप्त होने वाले सुखों के प्रति सुखद भावना त्याग कीजिए मुक्त होइए इससे सर्वे साधन निराशा उत्तम उत्तम साधनाओं का फल और साधनाएं मुक्त होइए इससे फिर क्या मिलेगा बोले वर्ष सहजाध श्री राधिका चरण रेणु महा स्वामिनी जी के चरणारविंद मिल जाए मुक्त परिवार के राग से मुक्त हो, धन के अभिमान से, धन के भोग से मुक्त हो, साधन सुख से भी मुक्त हो।

तब महा प्रेम रस सांद्रानंद घन प्रेम मूर्ति किशोरी इनके चरणों का सानिध्य मिल जाएगा। अगर हम द्वंदों में हैं तो हम कैसे प्रेमी हो जाएंगे? देखो मुक्त होने की जो दशा बताई गई है कि शत्रु में, मित्र में, मान में, अपमान में, स्तुति में, निंदा में वो जीवन मुक्त महापुरुष समान होता है। तो सेवक जी महाराज कह रहे शत्रु मित्र समजानी मान अपमान सम दुख सुख लाभ न हानि ये क्या है? जीवन मुक्त महापुरुष की स्थिति है। तब प्रेम रस की बात कही है। प्रेमी जनों के संग से फिर नित एक धर्म संग रंग बढ़त नित नित सरस नित नित प्रेम अभंग अब उस अभंग प्रेम में निरखत नित्य विहार पुलकित तन रूमावली आनंद नैन सुधार यह जो कृपा हरिवंश की तपित मानत नैन कुंजंद्र अवलोकितन यह सुख कहात बनैन यह जो कृपा हरिवंश की ऐसा नहीं हो सकता कि आप कोई संप्रदायवाद लगा के कोई उपासना मार्ग लगा के कि हमारे में ऐसा नहीं कोई भी मार्ग हो इस जगत के द्वंदों से विषय भोगों से आकर्षण से ऊपर उठने पर ही है।

इसीलिए सब रसों के मूल में रखा हुआ शांत रस कोई भी द्वंद आपको विक्षेप ना पहुंचा पावे। कोई भी भोग आकर्षण ना पैदा कर पावे। कोई भी दुख आपको विचलित ना कर पावे। इसके ऊपर फिर दास सख्य वात्सल्य कांता सहचरी परम विमुक्ति साक्षात नहीं चाहिए मानो मोक्ष तो भू रस सर्वस्व मेंवा साक्षात जिसे श्रुत मृग्यम वेद खोज रहे हैं नेति नेति कह के वो भू रस सर्वस्व में हुआ साक्षात वही परम रस प्रिया प्रीतम यहां साक्षात विराजमान बस देख लो बोले हमें तो नहीं दिखाई दे रहे तो दूर हो दूरद पास स्वजन सुखमर्थ कोटिम सर्वे साधन वरिष्ठम निरासा लाडली की चरणारविंद की शरणागति हृदय में स्वीकार करके एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास अभी देखो आपको दिखाई देंगे यही युगल सरकार करुणा करके विहरते हुए साक्षात विश्वभाग्यम चिया याद आहा विश्व में महा भाग्यशाली वही है उसी का जीवन जीवन है जिसने निश्चय कर लिया कि अब यथालाभ संतोष स्थिति से रहूंगा और निरंतर सच्चिदानंद प्रभु में अपनी संपूर्ण वृत्तियों को समर्पित करूंगा।

बड़े भाग भोर भाग है अहो भाग्य है प्रभु को अपना मानकर निरंतर चिंतन करना यह जन्म केवल हम सब कार्य करते हुए प्रभु को समर्पित करते हुए प्रभु की प्राप्ति में लगा दें नहीं तो बहुत घाटा हो जाएगा बहुत धोखा हो जाएगा इसकी पूर्ति पता नहीं किस कल्प में हो कब ऐसा अवसर मिले तुम्हें यह शरीर मिला है असली धन कमाने के लिए। परम पुरुषार्थ प्रेम तुम इतने भूल भुलैया में फंस गए हो कि ये बाह्य मायाकृत सामग्री मायाकृत शरीरों को अपना लक्ष्य बना रहे हो। देख लो रुपया पैसा शरीर स्वस्थ भोग सामग्री की बहुतायत और भोग प्रवृत्ति तुम्हें कभी यह प्रश्न नहीं उठता है हृदय में कि मैं कौन हूं मुझे कहां जाना है क्या करना है यह सब क्या है कभी प्रश्न उठता है हृदय में जिज्ञासा होती है नहीं क्योंकि तुम्हारी बुद्धि शरीरों की ममता और भोगों की आसक्ति से युक्त हो गई इसलिए प्रश्न नहीं उठता नहीं हाय हाय मच जाता है हृदय में अब तो बस जो सत्य वस्तु शास्त्रों में लिखी हुई है जो गुरुजनों ने प्राप्त किया मुझे वही प्राप्त करना है अब भूल भुलैया में नहीं अब धोखे में नहीं अब तो कितना भी कष्ट ये मन बुद्धि हमें दें अब इनकी बात वही मानेंगे जो भगवत मार्ग में आदेश मिला है अन्यथा इनकी बात बिल्कुल नहीं मानेंगे अभी एकदम हृदय में विराग पैदा हो जाए, रोना आ जाए, विकलता आ जाए या गाढ़ उदासीनता खिन्नता नारायण हरि भजन में पांचों सुभात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीत बहु बात नहीं जहर लगता है बात करना जहर भगवान कृपा करें।

ऐसी मना स्थिति हो कि उनके नाम में लगे तब आप ये बात समझ पाएंगे। बोलना ऐसे जैसे कि कोई दंड दे रहा है हमें। ऐसा लगता है। एक सरस चिंतन नित्य निरंतर उसको छोड़ के बोलना। अब कितना भी हो वृत्ति तो लगी रही तभी तो वाणी निकल रही है। उस गाढ़ रस के चिंतन को छोड़ के बोलना। तभी की भाई मान लो बहुत बड़ा सौभाग्य है अपने लोगों का कि कथन श्रवण का प्रभु यह सौभाग्य दे है पक्का मान लो ये सब दिन होत ना एक समान ये जो मिल रहा है ना नहीं मिलेगा अभी औषध है पान कर लो श्रवण इंद्री के द्वारा वचनामृत को और बलवान होकर विकारों पर विजय प्राप्त करके जय को प्राप्त हो भगवत प्राप्त हो अगर इस सावधानी नहीं तो प्रवाह है माया का बहाता चला जाएगा कहीं अंत नहीं है बह ही रहे जब से सृष्टि हुई आज तक बहते चले जा रहे हैं तुम कौन हो कहां से आए हो कहां जाना है सोचा है कभी ये शरीर तुम नहीं हो ये शरीर का नाम तुम्हारा नहीं है ये शरीर बिल्कुल तुम्हारा संबंधी नहीं है।

तुम कितने आसक्त हो इस पे इस शरीर को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह अपनी ही गति को जाएगा। तुमसे बिल्कुल प्यार नहीं करता। जड़ है ये शरीर। तुम ममता शक्ति करके इसके साथ इतना राग कर लिए कि जो जन्म मृत्यु से परे तुम्हारा स्वरूप है। वही तुम जन्म दुख को प्राप्त होते हो। मृत्यु दुख को प्राप्त होते हो। इसका कारण यह शरीर ही है जिसको तुम मैं माने हुए हो। तुम कभी उत्पन्न होने वाले नहीं हो। सच्ची बात सच्ची बात। तुम कभी मरने वाले नहीं हो। तुम्हें कोई दुख छू नहीं सकता।

तुम तुम ऐसे हो। भूल गए। ये भूल गए। ऐसे ही भूल गए जैसे स्थूल शरीर सैया में पड़ा हुआ। स्वप्न में चाकू चल रही है। और आप चिल्ला रहे हो। कुछ नहीं। एक भी खरोच तुम्हारे शरीर में नहीं। और वहां खून खचर सब दिखाई दे रहा है और जगे तो कोई घाव नहीं कोई कुछ नहीं ऐसे ये स्वप्निक शरीर है जिस पर आप बैठे हुए हैं ये मोह के कारण दुख सुख मान अपमान भोग सुख सब दिखाई दे रहा है जब आप जगोगे तो ना कभी कोई स्पर्श कर पाया है आपका ना भी कोई स्पर्श कर रहा है ना आगे कोई स्पर्श कर सकता है क्योंकि आपके सिवा कोई है ही नहीं आप मत परतरम ना किंचित धनंजय है सत्य वस्तु सत्य वस्तु इसी मोह के वशीभूत होकर के तुम्हारी बुद्धि पशुता को प्राप्त हो गई है।

पशुता पशुता आप देखो आप देखो यहां किसी के प्रमाण की जरूरत नहीं। अपने हृदय रूपी रजिस्टर को पढ़ के देखो। तुम्हारी बुद्धि ने कितनी पशुता की है और अभी कितनी पशुता है खुद देख लो किसी को प्रमाण बाहरी प्रमाण की जरूरत नहीं आप अपने ही रजिस्टर को पढ़ के देखो इसी जन्म के ये कितने दुष्ट हैं मन बुद्धि कहां कहां कैसे कैसे विचार करके देखो इस पशुता को पिशाच अवस्था में मत बदलने दो जहां बुद्धि थी वहां पशुता में आ गई। पशुता से राक्षसी हो जाएगी। पशुता से उठो। क्या पशुता है?

शरीर और इंद्रियों को मन को मैं मानकर भोगों में विचरना यही पशुता है। कर्तत्व भोग तत्व भाव यही मूढ़ता है। अहंकार विमूढ़त्मा कर्ता मन्यते मैंने इसे किया। मैंने ऐसा भोगा मैं ऐसा भोगूंगा। मैं ऐसा करूंगा। यही मूढ़ता यही पशुता है। तुम्हारी ये स्थिति तुम्हारे भविष्य का निर्माण कर रही अगली योनि का। अगर पशुता नहीं छोड़ा तो राक्षसी बुद्धि बढ़ जाएगी और अंधकार अनंत नरकमय दुखमय मृत्यु में तुम्हारा अगला हिसाब होगा। जो सिद्धांत है उसमें किसी की कोई भी चालबाजी नहीं चलती।

यहां मृत्यु लोक में भले तुम चालबाजी चला लो भगवान के विधान में नहीं क्योंकि वो सर्व साक्षी एक एक सेकंड की तुम्हारी बात देख रहा है। बढ़िया अवसर मिला है। अभी चेत जाओ तो तुम अपना उद्धार कर सकते हो। अभी सावधान हो जाओ तो विनाश के गर्त में गिरने से अपने को बचा सकते हो। तुम भगवान के अंश हो। परमात्मा के स्वरूप हो। संसार के बड़े से बड़े भोग तुम्हें मिल जाए तो भी तुम शांत और सुखी नहीं हो सकते। महापुरुषों के वचन है। मानिए तुम एक विलक्षण सुख की चाह लेकर देख लो।

एक विलक्षण आनंद की कितना भी भोगी हो उसको होता है चाहे कुछ क्षण के लिए हो अब नहीं पर वह रास्ता उसको पता नहीं सच्चे सुख का तो फिर उसी मलिन सुखों में तुम एक विलक्षण सुख की भोगता हो ये भौतिक सुखों के नहीं समझ ही नहीं पा रहे तुम्हारा बड़ा अनुपम सुख है उसको उदाहरण में नहीं दिया जा सकता उपमा रहित हो तुम्हारे जो सुख की मांग है वो उपमा रहित है उपमा रहित कौन है भगवान उपमा रहित कौन है आत्मंद ये विषयंद तुम्हारा विषय नहीं है संसार के किसी भी सुख के लिए अपने इस परमानंद में परमार्थ मार्ग में थोड़ी भी बाधा बर्दाश्त मत करो ध्यान से सुनो तुम्हें एक अनुपम सुख चाहिए अनुपम शांति चाहिए।

एक विलक्षण आनंद के तुम भोगता क्योंकि तुम्हारा स्वरूप ही है आनंद में। अब इधर जो तुम भोगता बनकर उस सुख को खोज रहे हो नहीं है। अब तुम्हें जो परमार्थ मार्ग मिला है तो कह रहे हैं अपने परमार्थ मार्ग में परमार्थ सुख की जरा भी बाधा को बर्दाश्त मत करो। अगर बर्दाश्त करोगे चलेगा इतना तो वो गिराता चला जाएगा आपको नहीं सावधान हो जाओ बिना दंड के ये सुधरने वाले नहीं है प्यार से सुधरने वाले सुधर जाए बढ़िया है समझ लो और अगर आप अपने को भोगता मानकर इनको थोड़ा भी परमार्थ बाधक बातों में सपोर्ट देंगे ये आपको गिरा देंगे बहुत फिसलन वाला मार्ग बहुत फिश बहुत संभाल संभाल के बहुत कदम दृढ़ रखते हुए चलना है।

बाधा बर्दाश्त नहीं करनी है। अरे जहां त्रिभुवन की राज लक्ष्मी देने पर भी आधे पल के लिए भगवत विस्मरण नहीं होना उस मार्ग के तुम पथिक हो। तुम घंटों बात कर रहे हो। व्यर्थ की बात हंसी मजाक की बात या ऐसे खानपान विषय में किसी में भी भगवत विस्मरण मतलब रंग नहीं आ रहा तुम्हारी साधना में तुम्हारे मार्ग में। किसी भी हालत में इस मार्ग के पथिक में भजन की शिथिलता नहीं आनी चाहिए। किसी भी हालत में ये अनुभव की बात कह रहे। कभी-कभी मना स्थिति इतनी अशांत स्वाभाविक हो जाती है।

कुछ अच्छा नहीं लगता। भजन में भी रुचि नहीं। एक अंधेरा सा एक घबराहट की स्थिति जब तक भगवत साक्षात्कार की तरफ आगे नहीं ना विषय की चाह है ना भगवत चाह है ना भजन है ना किसी क्रिया में एक अशांत स्थिति हिलना नहीं डरना नहीं डरना नहीं उस स्थिति में भी अगर जितनी बुद्धि काम कर सके नाम को पकड़े रहो नाम को पकड़े रहो वो कोहरा आया है अभी हट जाएगा घबराने की जरूरत नहीं भागकर दूसरे विषय की जरूरत नहीं है कि आप उस स्थिति से बचने के लिए कोई विषय सेवन करने लगे कोई व्यसन करने लगे कोई क्रिया करने लगे नहीं कबहु तो

थो भजन कबहु होत विशाल मन को धीरज छूटे नहीं और गाए ना दूजी चाल वो थोड़ी देर के लिए स्थिति हट जाएगी फिर प्रकाश आ जाएगा वो स्थिति में बहुत संभलने की जरूरत है जो अच्छे उपासक हैं कभी-कभी एकदम ऐसी कभी-कभी एकदम भावात्मक स्थिति ऐसी लगता है आप तो पार हो गए कोई विकार नहीं कोई संसार की नहीं भजन में तन ये अभी एक रस स्थिति नहीं आई है ये गुण के अंतर्गत है ये सात्विक वृत्ति जागृत हुई है वो तामसिक वृत्ति प्रमाद मूढ़ता ऐसी स्थिति अंधकार छा रहा है अंतर में कोई भी सात्विक स्ना नहीं हो रही घबराना नहीं अभी त्रिगुणातीत रस नहीं मिला है धैर्य पूर्वक आगे चलते हो इसीलिए बिना सत्संग के साधक लड़खड़ा जाता है, गिर पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थितियां आती है।

फिर उसे किसी ना किसी के संग की जरूरत होती है। और अगर संत संग नहीं हुआ कुसंग हो गए तो गया या तो असंग या भगवत व्रत का अनुष्ठान भगवत भजन में लगे हुए उत्तम साधक या भगवत प्राप्त महात्मा तभी हमारी बचत हो सकती है। अगर इनसे नीचे मिला तो गिर जाएंगे पक्का। वो ऐसी बात होगी, ऐसी सलाह होगी वो गिर जाएगा। अपने निर्दोष साधन को बिना किसी भय संकोच लोक लज्जा अपने साधन में लोक लज्जा भी नहीं। हम तिलक लगाएंगे, कंठी बांधेंगे, नाम जप करेंगे, सुबह इतने बजे नहा स्नान करके बैठे।

घर के परिवार के लोग या कोई बाहरी उपहा तो भगत है या कुछ भी ना लोक लज्जा ना कोई भय ना कोई संकोच अपने साधन को निर्दोष रखते हुए चले उसे नियम कहते हैं। जो आपको नियम मिला है, दिनचर्या मिली। उसमें तुम्हें बाधा बर्दाश्त करने का। हम लोग बहुत कमजोर है। हम हर बाधा को स्वागत पूर्वक आओ। स्वीकार कर लेते हैं। भजन छूटा, सद्बुद्धि छूट रही है। हम मनोरंजन में लगे हैं। अरे भाई यही अवसर है मन भंजन का। यही अवसर है इंद्रियों को समाहित करके भगवत स्वरूप में लगाने का। अब आप बर्दाश्त कर रहे हो विघ्न तो आप जानो।

फिर क्या हो सकता है? क्योंकि आपकी स्वीकृति है। बहुत बहुत सावधानी की जरूरत। साधन में कहीं बाहरी दिखावा भी ना आ जाए। यह भी ध्यान रखें कहीं बाहर लोगों को यह दिखाने के लिए कि हम भगत हैं। देखो अभी पहले कहा लज्जा नहीं संकोच नहीं भय नहीं अपनी दिनचर्या बिल्कुल वह भगवत रिझाव के लिए जगत रिझावे के लिए नहीं अगर कहीं आपका लक्ष्य बन गया बाहरी लोगों को दिखाना प्रणाम नमस्कार वंदना यश कीर्ति चार लोक ऐसा फिर तो असली वस्तु को नहीं प्राप्त कर पाओगे बहुत लंबा समय नष्ट हो जाएगा हां अगर भगवान की शरण में हो तो ऐसे धक्के लगेंगे आपको कि आपको भागना ही पड़ेगा प्रभु की तरफ।

ऐसे विघ्न उपस्थित हो जाएंगे कि उधर कदम नहीं बढ़ा पाओगे। भागोगे प्रभु की तरफ। पर पता नहीं वो कब समय दें। होश में अपने साधन का दिखावा। दिखावा अंदर पता चलता है। आप ही अंदर से जांच कर लीजिए। दूसरे को दिखावा और प्राय अहंकार देवता यह बहुत पसंद करते हैं। जो अहंकार है वो ये बहुत पसंद उसकी पसंद चीज है। दंभ पाखंड दिखावा ये उसकी पसंद की चीज है। इसी से पुष्ट होता है। बलवान होता है। वो प्रेरित करेगा। हम ऐसा बोले जिससे चार लोग समझे हम ज्ञानी हैं। हम ऐसे बैठे जिसे चार लोग समझे योगी है महात्मा है।

हम ऐसा दृश्य उपस्थित करें जिससे हमें साबित किया जाए। बहुत बड़े भजनानंद जी ये अंतर की वृत्ति है। सुधार कीजिए। साधन में कहीं बाहरी दिखावा ना आ जाए। अगर बाहरी दिखावा आ गया तो असली जो तत्व है असली जो बात है असली जो सच्चिदानंद परमात्म सुख है उससे तुम वंचित हो जाओगे हमें प्रभु को रिझाना है या जगत को रिझाना है जब आप प्रभु को रिझाने की चेष्टा करेंगे तो सारा जगत आपसे रिझ जाएगा जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करे सब कोई प्रभु प्यार करने लगे तो पूरा विश्व प्यार करने लगेगा अंदर से यह देखते रहो।

बिल्कुल शुद्ध परमार्थ की बात है। अंदर से देखो जब आप अंदर से सच्चे साधन में लगे बाहर से तुम्हें कोई कहे ना पाखंडी दंभी दिखावा ये वो तो मुस्कुराहट आएगी। अंदर से दंभ कर रहे हो। फिर तुम्हें कोई दंभ भी कहेगा तो तुम गाली दोगे, लड़ जाओगे और निंदा करने लगोगे। यह पहचान है कि दंभ है तुम्हारे अंदर। उसको बुरा लगा। जैसे कोई निंदा कर रहा है आपके कान में पड़ा तो सबसे पहले बुद्धि का कार्य होता है। वो तुरंत जांच करेगी। अगर सत्य मार्ग में चल रहे हो ये जो जो बोला गया कोई लक्षण है अंदर पूरी जांच कर नहीं ठीक है।

प्रभु की बड़ी कृपा है। मुस्कुराया चल दिया। उसको बुराई जैसे आप गोरे हैं। आपको कहे काला कलूटा तो आप नाराज हो जाएंगे क्या? क्योंकि आपको पता है आप गोरे हैं। आप नहीं नाराज होंगे। काला कलूटा है और उससे कहे भी कि क्या यार गोरे हो तुम उसको बुरा लगेगा क्योंकि वो नहीं गोरा है ऐसे ही यदि सच्चाई से तुम भगवत मार्ग में चल रहे हो और तुम्हें कोई कह रहा है कामी है क्रोधी है लोभी पाखंडी दंभी है तो आपको पता है ना कि गुरु कृपा से इन दोषों का प्रश्न आपके अंदर उत्तेजना नहीं पैदा होगी और यदि है तो आप यह साबित करने के लिए कि नहीं है आप लड़ पड़ेंगे आप ये अंदर की बात है।

सूक्ष्म बात है। आप बहुत सुंदर-सुंदर पदार्थ खा के निकले और बाहर कोई कह रहा है ऐठ के चल रहा है। भूखो मरता है। हमें पता है तो आपको क्या होगा? हंसी आएगी कि अभी-अभी तो खीर पूरी सब पा के आ रहे हैं। ये तो ऐसा बोल रहा है। अच्छा ठीक है। और आप भूखे हो कई दिनों से ऊपर से ऐसे घी पोछ के ऐसे चले और लोग बहुत कहे कि यार हलवा खा के आए। छाती जलेगी कि नहीं? रोटी भी नहीं मिली। तुम हलवा की बात करते हो। ठीक ऐसे ही ऐसे ही दंभ और सच्चाई का है। आप सच्चे भगवत मार्ग के पथिक बनेंगे।

पूज्य श्रीपाद उड़िया बाबा जी महाराज कहते हैं कि जब अपनी भाषा में जैसे जो हम जानते हो बात करता है तो हमें समझ में आती है। लेकिन विदेशी भाषा में जैसे तुम्हें ज्ञान ना हो तुम्हें बल भर गाली दे रहा हो निंदा कर रहा हो तो तुम क्या करोगे? पता ही नहीं वो भाषा ना तो ऐसे सुनोगे कुछ बोल रहा हो चल दोगे। जब तुम्हारी भाषा में ऐसे तुम्हें गाली दे, निंदा दे और तुम चल दो तो जान लो कि तुम सच्चाई के मार्ग में चल रहे हो। नहीं तो एकदम जलन क्योंकि है जलन पैदा हो जाएगी।

साधन में कहीं बाहरी दिखावा ना हो। साधन में बाहरी दिखावा वही सच्चाई का साधन है। वही बाहरी दिखावे का साधन है। प्रियाल का श्रृंगार कर रहे हैं। अंदर से मेरे प्रियाल सुख उनका श्रृंगार उनके सुख के लिए और दूर से खड़े हो गए दर्शन करके आल्हादित अंतर का भाव बदल गया। दिखावा हो गया। अंदर का भाव प्रभु के लिए साधन बन गया। भगवत प्राप्ति का साधन बन गया। अंदर से देखता रहे उपासक कहीं बाहरी दिखावा तो कोई बस बहुत सूक्ष्म विषय है जब लक्ष्मी प्रियालाल है तो हमारा गाना नाचना भजन करना रोना सब सार्थक है अगर यही बाहरी व्यक्ति के रिझाने के लिए तो यही दम हो गया यही पाखंड हो गया नाटक हो गया ये अंतर की बात है इसको बाहर से नहीं पहचाना जा सकता बाहर से नहीं पहचाना जाना जा सकता।

एक बार ठाकुर हरिदास जी जो महाप्रभु चैतन्य देव के परिकर नाम हर समय चलता जा रहे थे तो एक परिकर था जो लीला अनुकरण और लीला गायन करते हुए बहुत सुंदर संगीत नृत्यवाद बहुत भीड़ लगी हुई थी। वो गए विविध प्रकार की कभी काली देह लीला कभी गिरिराज ठान ऐसी लीला पदों में गा के वो नृत्य करते थे उनका परिकर होता था उसमें स्त्रियां भी पुरुष भी और बड़ा भाव में सुनते ही हुंकार भरी मूर्छित होकर गिर गए हा अब तो ऊपर दरज ले रहे सब प्रणाम कर रहे जो देखना कि बहुत ऊंची एक और भी खड़े थे तो और वह भी वैसे ही हवा उसने देखा तो जैसे ढोल बजा रहा था जो एक सूट के भाग पड़े लोगों ने पूछा आप ऐसे क्यों किए बोले यह वास्तविक स्वरूप स्थिति में है और ये इनका नाटक कर रहे थे अगर ये भाव में होते तो हमारे इस ढोल बजाने के एक दो डंडे में इनके होश ही नहीं आते इनका मतलब ही नहीं होता शरीर राग से युक्त होकर ये नाटक कर रहे थे दम नहीं सच्चाई जो हृदय में है वो छुपती नहीं है।

उसमें एक आकर्षण होता है क्योंकि सब में भगवान बैठे हुए हैं। अपने आप आपको संपूर्ण जगत के हृदय में बैठे हुए भगवान का प्यार मिलेगा। नाटक करने की जरूरत क्या है? आप अंदर देखते रहिए। हृदय में काम, क्रोध, लोभ, हिंसा, वैर, दंभ, दर्प यह दोष जैसेजैसे आप सच्चाई से चलोगे क्षीण होते चले जाते हैं। नष्ट होते चले जाते हैं। सच्चाई से चलने पर बहुत दीर्घ काल तक संयम में रहना। यह कोई महीना दो महीना वाली बातें नहीं है। बहुत संयम से यह हर स्थिति में अस्वीकृति ही हमारे हृदय में रहे।

कभी स्वीकृति ना हो। चाहे जैसी परिस्थिति हो। इसलिए कह रहा हूं कि चली हुई बात है। ये बहुत ऊंचाई तक स्फुरण होते रहते हैं। बस तटस्थ भूमिका रखनी है। ये कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे। फिर एक स्थिति आती है जहां यह भी भगवत स्वरूप हो जाते हैं। इनका मलिन स्वरूप खत्म होकर पावन स्वरूप हो जाता है। अब काम काम नहीं रहता है। क्रोध क्रोध नहीं रहता है। सब भगवत स्वरूप हो जाते हैं। बाहर से तुम्हें कोई अच्छा बतावे, साधक बतावे, संत बतावे यह तुम्हारा कोई लाभ नहीं है। अंतर से तुम निर्विकार हो रहे हो।

यह लाभ है। तुम्हारा साधन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है और बाहर से लोग तुम्हारी निंदा कर रहे हैं तो तुम बड़े भाग्यशाली हो। ये देखो परमार्थ है ये। क्योंकि जो पाप तुम्हें पूर्व के थे शरीर से भोगने पड़ते वो अपनी जबान से निंदा करके तुम्हारे पापों को ले रहे हैं। तुम्हारा परमार्थ उज्जवल हो रहा है। आप उनको गाली मत दीजिएगा। अंदर से उनका बुरा मत मनाइएगा। संतों ने तो आशीष दिया है कि हमारी निंदा करने वाला सदैव स्वस्थ रहे। इस लोक परलोक में कभी कोई दंड ना मिले। निरोग होकर स्वस्थ होकर वैसा करता रहे।

साधु निंदक मित्र हमारा वो बहुत बुरा। पर वो वही सच्चाई से चलने वाले को ऐसा लगेगा। नहीं निंदा करने वाले के प्रति रुद्ध दृष्टि हो जाएगी। बड़े भगवान के कृपा पात्र हो तुम। तुम्हारा साधन ठीक चलना चाहिए। फिर निंदा होगी तो तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा। और गलत है तो सच्ची बात कह रहा सुधार कर लो। अगर नहीं है तो फिर तुम्हारी परीक्षा हो रही। तुम ऐसे भाव से कि मुझे गुस्सा नहीं करनी। मुझे इसमें दोष दर्शन नहीं करना। मुझे यह क्रॉस करना है। निकलना ही है इससे। ये बंधन है छोटे-छोटे।

इनको आपको निकलना है। कभी कोई आपका अपमान कर रहा पास बैठे हैं बार-बार वो धक्का मार रहा है। अगर आपका मन भी जा रहा है शरीर शांत। एक बार कह दे फिर तो आप समझिए कि अब आपके अंदर गुस्सा पैदा करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रेरणा कर रहे हैं। शांत होकर नाम जप में एकदम कितना भी वो करे। अब दोबारा ना उससे कहिए कि हमने आपको कहा आप क्यों बार-बार धक्का मार रहे हैं? फिर वो क्रोध आ जाएगा। बिल्कुल आप सावधान हो जाइए। हमारी परीक्षा हो रही है। इस समय मुझे इससे निकलना है।

ना मुझे दुखी होना है ना इसको दुख देना है। शांत फिर आप देखना कितना अच्छा लगेगा। जब आप वहां से बच के निकल जाए हृदय में एक आनंद आएगा। हे बिल्कुल गुस्सा नहीं आया। बहुत कृपा हो। धीरे-धीरे हमको एक एक बात में निकलना है। हम लोग निकलने की जगह फंसते जाते हैं। एक एक बात में तो यंत्र है। उसमें तुम्हारा स्वामी बैठकर के जो तुम्हारे को परमार्थ में लगाया, परमार्थ का साधन बताया, परमार्थ में चला रहा है। वही तो उसके अंदर बैठकर तुम्हारी परीक्षा ले रहा है। तुम्हें सहनशीलता सिखा रहा है।

इतना विषय हो यह विषय जाओ। महात्मा बनाना है। महात्मा ऐसे थोड़ी होता है। जो ततीक्षा का धनी होता है वही महात्मा होता है। उसके पास सहनशीलता धैर्य रूपी धन बहुत बड़ा होता है। किसी भी स्थिति में विचलित ना होना साधन में पूर्ण श्रद्धा विश्वास सावधानी संलग्नता और नियम ये बहुत आवश्यक है। नियमावली ना टूटने पावे। बिल्कुल पक्का। आप कुछ वर्षों तक नियम आप पकड़े रहिए। फिर नियम आपको पकड़ लेगा। नियम किसे कहते हैं? सोच संतोष तप स्वाध्यायश्वर प्राणधाननी नियमा सोच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान आपका शरीर पवित्र रहना चाहिए, वस्त्र पवित्र रहने चाहिए।

तब हृदय के पहले बाहर की पवित्रता को संभालो। फिर हृदय की पवित्रता की तरफ जो अभी सत्संग में शुरुआत में कहा कि मन से निरपेक्ष होना। ये परम पवित्र होने वाली बात है। मन से निरपेक्ष तभी जब राधा राधा चल रहा है। नाम चल रहा है। ये आपको बहुत पवित्र कर देगा। हृदय जब आप उसमें रागात्मक भाव से मन में लग जाते हैं तो अपवित्र हो जाता है। जैसे स्वर्ण को तपाया जाता है तो मल छोड़ देता है। निर्मल हो जाता है। ऐसे मन में जब जलन होती है तो पवित्र हो रहा है। आप समझ नहीं पाते और विचलित हो जाते हैं।

वो मन ही की मलिनता नष्ट हो रही है। आप उसे अपने में लेकर के दुखी हो रहे हैं। उसको जलने दीजिए। वह निर्मल हो रहा है। तपने पर जैसे स्वर्ण चमकने लगता है। ऐसे जो ताप सह जाता है, मन निर्मल हो जाता है। तन को पवित्रता से युक्त रखें तो मंत्र और नाम आप देखिए स्वतः बहुत जल्दी-जल्दी आपकी उन्नति होगी। ये अपवित्रता रहे। नियम में सबसे पहला है सोच पवित्रता। आपका उठना, बैठना, खाना, पीना, देखना, सुनना, चलना, फिरना भगवत स्मरण करते हुए पवित्र भाव से और शरीर को भी पवित्र रखना।

देखो जिनको ऐसा सौभाग्य नहीं मिला है गृहस्ती में नाना प्रकार के कार्यों में रत हैं। तो अपवित्र पवित्रोवा सर्वावस्थांगत विवा जैसी भी स्थिति में हो तुम राधा राधा बोलो। पर आपको तो सौभाग्य मिला हुआ है कि आप हर समय असंग और पवित्र रह सकते। लाभ लीजिए और उस लाभ को जगत मंगल के लिए प्रभु के चरणों में अर्पित कीजिए। आपके लिए तो बहुत बढ़िया अवसर मिल गया है। आपका पवित्रता पर ध्यान होना चाहिए। आपका शरीर पवित्र होना चाहिए। आसन पवित्र होना चाहिए। शौचाचार के विषय में पीछे सत्संग में बताया गया है।

मिट्टी जल आदि से शरीर की और राग द्वेष आदि त्याग कर भगवत स्मरण करते हुए हृदय की पवित्रता [गला साफ़ करने की आवाज़] होती है। संतोष चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो भगवत प्राप्ति करना है तो यह लाना ही होगा हृदय में बिन संतोष न काम न साही अछत काम सुख सपने नाही यदि संतोष नहीं है तो कामनाओं की बाढ़ जहां कामनाएं हैं कोई कोई तो कहते कि मांस वगैरह खाते हैं पर आपके आदेश से हम ब्रह्मचर्य का निर्वाह करना चाहते चाहते त्रिकाल में नहीं कर सकते। राक्षसी भोजन पाओगे और तुम ब्रह्मचारी बनोगे।

तुम आसुरी प्रवृत्ति धारण करोगे और सच्चिदानंद में बिना चित्त जोड़े तुम इन दिव्य व्रतों का पालन कर सकते हो। कदापि नहीं। अरे यही तो दुष्टा रस्द्री यही तो भ्रष्ट करती है। इसी से सारे विकार शुरू हो जाते हैं। जिसकी रसेंद्र शासन में नहीं खाना पीना सही नहीं। परमार्थ की केवल बातें करें। क्या राक्षसों को ज्ञान नहीं था क्या? दैत्यों का ज्ञान नहीं था क्या? आप देखो जब वह अपने परिवार जनों को उपदेश करते हैं ना किसी संकट में तो पूरे ब्रह्म ऋषि जैसा बोलते हैं ज्ञान है ऐसा नहीं कि नहीं ज्ञान बहुत भूल रहे लेकिन आचरण में बिल्कुल ज्ञान नहीं है तो इसीलिए तुमको राक्षस कहा गया तुम्हारे आचरण राक्षसों जैसे हो कह रहे हो कि हम अमुक अमुक साधन व्यर्थ की बात नियम से चलो सोच संतोष भगवत कृपा से जैसी भी परिस्थिति तुम्हें दी गई है जो भी धन भोजन परिवार जैसा भी या विरक्त मार्ग जैसे संतुष्ट रहो यथा लाभ संतोष सदा काहु सो कछु बड़ा शांत मार्ग है बड़ा गंभीर मार्ग है ये बड़ा सहनशीलता की जरूरत है और सही पूछो तो आपको कोई दुख है ही नहीं आपको कुछ चाहिए ही नहीं आपके अंदर दुख और चाह जो आई वो शरीर को लेकर संसार को लेकर आई है इसीलिए इसलिए आपको संतोष अगर संतोष धारण करोगे तो आशाएं नष्ट हो जाएंगी।

आशाएं नष्ट होंगी तो दुख का नामोनिशान मिट जाएगा। आशा ही परम दुखम नराश्यम परम सुखम जैसी भी प्रभु ने परिस्थिति दी जो भी आपके पास वो भगवत कृपा से उसी में संतुष्ट रहना सीखो। तीसरा तपः तपस्या। अब भगवत मार्ग में जो आपको नियमावली दी गई है उसके पालन में प्रमाद नहीं होना चाहिए। ये भगवत कृपा से जो भी सच्चे मार्ग का पथिक है उसमें देखने को मिलेगा। कैसी भी दुखद परिस्थिति हो नियम इतना बड़ा बलवान होता है कि अपने आप उसे समय से ये पक्का आप पहले नियम पकड़ो फिर नियम आपको पकड़ लेगा।

भारी से भारी कठिन परिस्थिति में भी नियम में बड़ा बल है। अपने आप दिनचर्या को जिसकी आसक्ति हो गई दिनचर्या में वही इस उत्तम उपासक है। अगर तीन बजे से आपकी दिनचर्या है तो पौ:ने बजे आप आकर बैठ गए। 6 बजे जाना है तो 6 बजे के बाद प्रणाम करके सबसे नाम जप करती थी। ऐसा नहीं कि हम फिर 4:30 बजे आ जाते हैं। एक घंटा कि गए तो हम हैं ये दिनचर्या नहीं ये प्रमाद है। जिस समय जो आपकी दिनचर्या बन रही है। देखो आजीवन 2:00 बजे नींद त्यागने का गुरुदेव ने बचपन में अभ्यास बना दिया।

समीप ही वो आप तखत पर सहन करते समीप उठे उठ देख उठ दो बज गए माला ले बैठ जा जी महाराज जी वो आप बैठे ऐसे और नीचे गुरु कृपा से आज तक कष्ट हो या कुछ भी हो जो दिनचर्या है वो दिनचर्या है वही दिनचर्या हमारा भगवान है दिनचर्या ही हमारा स्वरूप है दिनचर्या ही हमारी तपश्चर्या है उसके लिए प्रमाद नहीं होता अगर शरीर में जान है तो दिनचर्या में बाधा नहीं। देखो बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुषों की देखो श्री सनातन गोस्वामी जी वृंदावन से गिरिराज जी की परिक्रमा रोज लगाने जाते हैं।

जब वयोवृद्ध हो गए तो गिरिराज जी लाल जी महाराज प्रकट हुए और कहा बाबा देखो हम तो हर समय आपके मानस पटल पर छाए रहते हैं। आपका शरीर वयोवृद्ध हो गया। आप काहे को आते हो? अब आपको परिक्रमा की क्या जरूरत? अब मत आया करो। जी दूसरे दिन फिर पहुंचो। लाल जी ने कहा कि कहा था बाबा क्यों आ गए आप? हमें पीड़ा होती है। आपका बहुत वृद्ध शरीर प्रभु रहा नहीं जा रहा है। उस शरीर का एक अभ्यास बन गया। रहा नहीं जा रहा है। तब वो आज भी श्री राधा दामोदर जी में चरण चिन्ह गौ का बंसी लकुट ये चिन्ह रख के दिए कि आप वही चार परिक्रमा कर लो।

पूरी गिरिराज जी की परिक्रमा का स्वरूप हो जाएगा। हमारी बात मान लो, हमारी प्रार्थना मान लो। प्रभु कह रहे हैं जब आप अपने समय तो जो आपको कष्ट मिल रहा है, तपश्चर्या किसे कहते हैं? जो आपको कष्ट सहन करना पड़ रहा है। मान लो 2:00 बजे किसी को नींद ना आती हो तो दो तीन बजे तो आ ही जाएगी। चार पांच छ आराम से ठंडा मौसम हो जाता है। बढ़िया यहां डे:30 बजे से शुरू हो गया। अब जो नींद का समय तो इसमें जा रहा है। अब यह जो कष्ट आपको सहना पड़ रहा है यह आपकी भारी तपस्या हो रही है।

आपके दुष्कृत नष्ट हो रहे हैं। रोज का रोज आप और हम सिद्ध महापुरुषों को देखा है। ये 2:00 बजे की दिनचर्या बड़े-बड़े सिद्धों में देखिए शैनपुर में तो स्वामी श्री मगनानंद 2:00 बजे पूरा परिकर सहित 2:00 बजे। अरे भगवत प्राप्ति के लिए जीवन मिला। सोने के लिए थोड़ी मिला है। थोड़ी देर विश्राम कर लिया। लग गए दिनचर्या में जब ज्यादा शिथिलता हुई तो दिन में एक आध घंटा विश्राम कर लिया भगवत प्राप्ति करनी है यहां सो के समय थोड़ी गवाना है यहां भोगों की भूल भुलैया में थोड़ी फसना है प्रभु के पास चलना है अपने स्वरूप में स्थित होना है तो जो आपको नियम मिला है उसमें वो नियम ही क्या जिसका निर्वाह ना करो और निर्वाह करने में तो कष्ट मिलता ही है नियम पूर्वक कोई कार्य किया जाए तो फिर कष्ट कोई परवाह नहीं की जाती है और कष्ट ना हो तो नियम कैसा नियम का वही मतलब है

कि कितना भी कष्ट आवे आपका नियम नहीं टूटना चाहिए साधक की ऐसी दिनचर्या होनी चाहिए इस समय हां इस समय तो सत्संग में होंगे इस समय इस समय तो श्रृंगार में होंगे पूरी जीवन की दिनचर्या होनी चाहिए आप पूज्य सदगुरुदेव भगवान 25 26 वर्ष से तो वही दिनचर्या देख उतनी दिनचर्या वही राइट टाइम कोई कोई उत्सव सेवा बधावा में समय का थोड़ा परिवर्तन दिनचर्या वही सहचर्य भाव के रस का रसास्वादन कराने वाले महापुरुष दिनचर्या वही अगर हमारी दिनचर्या ठीक नहीं तो ब्रह्मचर्य ठीक नहीं है।

दिनचर्या ठीक नहीं तो प्रमाद स्थिति है। दिनचर्या ठीक नहीं तो आपका भगवत प्राप्ति लक्ष्य नहीं बना है। नहीं तो दिनचर्या में आपका कोई भी गुंजाइश दिनचर्या पर बिल्कुल कृष्णा आश्रम स्वामी जी बड़े-बड़े महात्माओं को देखा सुई की घड़ी की सुई की नोक में दिनचर्या एक मिनट का अंतरराय वो मन को अपने वश में कर लिए इंद्रियों को वश में कर लिए अपने नियम पालन में धर्म पालन में साधन मार्ग में जो कष्ट मिलता है शीत उष्ण मान अपमान इन सबको सहना यही तपस्या है। अब आप ब्रह्मचारी हैं।

कभी-कभी काम की वृत्ति आती है। वो आपको जलाती है। प्रेरित करती है। शांत किसी से कहना नहीं कहने से सत्ता दृढ़ होती है कि आज हम बहुत विक्षिप है। शांत राधा राधा कैसे हो? मुस्कुरा हां बहुत कृपा है। नहीं कोई परेशान कोई परेशानी नहीं। जोई प्यारो करे सोई मु राधा राधा 27 ही खत्म स्वाध्याय आचार्य ग्रंथ का महापुरुषों की वाणियों का शास्त्रों का स्वाध्याय नियमित होना चाहिए जैसे अपने यहां वाणी गायन सब नियमित स्वाध्याय होना चाहिए और ईश्वर प्रणिधानानी अपने आराध्य देव जो गुरुदेव ने बताया है अपनापन तभी सिद्ध होता है जब गुरु प्रदत्त होता है।

अपनी मान्यताएं बदलती रहती है। लेकिन गुरु प्रदत्त जैसे अपने को गुरुदेव भगवान ने दिया कि हमारे आराध्य देव श्री श्यामा और श्यामाजू का सुख श्री लालजू महाराज लालजू के प्राण श्री लाडली तो लाडली के महा सुख वर्धन करने के लिए उनके प्राणनाथ से लाल जू में अद्भुत प्रीति अद्भुत प्रीति तद भावत्सवता परम भवत में तत प्राणनाथ हमारी युगल उपासना ऐसी है गोरे चरणारविंद की ठसक और युगल का उपास लालजू में अत्यंत प्रीति है और कैसे है मेरी प्यारी जो के प्राणनाथ है प्यारी जो के परम सुख है तद भावत्सवता परम भवत में तत प्राणनाथ ऐसे श्री श्यामा श्याम की ठसक में हर समय रहना उनके चिंतन में रहना अहम उनके दासत्व में समर्पित हो जाना अपना उनसे अलग कुछ भी ना रह पावे उसे ईश्वर प्रणधान कहते हैं।

सोच संतोष तपा स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधानान नियमा प्रिया प्रीतम से संबंधित सब कुछ है। कुछ भी ऐसा अलग नहीं होना चाहिए। अपने आप आप महात्मा हो गए। देख लो। कुछ भी ऐसा नहीं खाएंगे जो प्रियाजु को अर्पित ना करें। कुछ भी ऐसा नहीं पिएंगे जो प्रियाजु को अर्पित। कुछ भी जीवन में ऐसा नहीं होगा जिससे प्रियाजु का समर्पण ना हो। अभी सत्य मार्ग के पथिक बन जाओगे। कई लोग तो ऐसा करते हैं कि भोग लगाने के लिए अलग बनाते हो, अपने लिए अलग बनाते हैं। तो आपकी फिर बुद्धि कैसे प्रभु में तन्मय कैसे होगी?

तुम अपने रस इंद्री को तृप्ति करने के लिए अगर भाव रखते हो तो उपासना क्या यह थोड़ी कि प्रभु भूखे बैठे हैं उनको पवादा। है विश्वंभर सारे जगत का भरण पोषण करते हैं। वो आपका केवल भाव पाते हैं। बाहरी जो शरीर की पवित्रता रखता है उसका वैराग्य बढ़ता चला जाता है। ये जितना आप मलिन शरीर रखोगे उतना ही भोगा बढ़ेगी। शरीरासक्ति बढ़ेगी। बाहरी इस नियम सोच रूपी नियम का पालन करने से शरीर पर राग रहित वृत्ति हो जाती है। वैराग्य हो जाती है। शरीर का रहस्य प्रकट हो जाता है।

मैं नहीं हूं। पवित्र शरीर रखने से नहीं टिकाऊ नहीं इससे राग खत्म हो जाता है और अंतर से पवित्रता रखने से मन प्रसन्न रहता है। बुद्धि एकाग्र रहती है। इंद्रियां निर्विषय हो जाती है और उसे आत्म बोध प्राप्त करने की योग्यता आ जाती है। बहुत सुंदर बात है। और संतोष धारण करने से समस्त सुख सामग्रियां उसके अनुकूल हो जाती है। राह से देखो कामना करने से भटकना पड़ेगा और संतोष धारण कर लो तो सारे सुख वैभव आपके समीप आ जाएंगे। संतोष की सिद्धि यही है और जो अपने मार्ग में चलने वाले कष्ट को सहता रहता है तप उससे अणिमा लगिमा महिमा दूरदर्शन दूर श्रवण की सिद्धियां अपने आप प्राप्त हो जाती है ये कोई इस बात में नरे कि मैं इतना कष्ट सह रहा हूं इसका मतलब क्या वो बड़ा सुखी हो रहा है यह हम अंदर की बात बता रहे हैं बहुत ध्यान से समझना अगर आप कुछ मिनट भजन कर लिए, कुछ मिनट पाठ कर लिए, ठाकुर सेवा कर लिए, कोई परेशानी आपको नहीं।

और अगर आपने सोच लिया है कि निर्विषय होकर भगवत प्रेम में डूबेंगे या मोक्ष पद प्राप्त करेंगे, अब होश में रहना। भगवत प्राप्ति के लिए अभी सब दुश्मन बिल्कुल तैनात हो जाए। अच्छा निकलना चाहता है। अब एक एक आपके अपहनशील सहनशील आशय उदार धीरज सहित विवेकी अब युद्ध प्रारंभ होने जा रहा है। उनके लिए युद्ध थोड़ी होता है। दो चार माला की आरती पूजा काहे पे मौज मस्ती फिल्म देख रहे हैं। सब बैलेंस बन के चल रहा है। मन काहे को मन जान रहा है। तुम्हारे अंदर चाह ही नहीं पैदा हो सकती भगवत प्राप्ति की।

भोगेश्वर प्रसक्ता नाम जहां भोग में आ सकती है चित्त का अपहरण है भोगों में दो चार माला बढ़िया है प्राय ऐसा ही भजन अच्छा लगता है लेकिन निर्विषय होकर कष्ट सहते हुए नियमावली का पालन करते हुए भजन ये उसको कह ये भागवतिक सिद्धियां है अिमा लगिमा महिमा गरिमा दूरदर्शन दूर श्रवण इंद्री ये सब सिद्धियां उसका वर्णन कर लेती है जो अपने मार्ग में, अपनी दिनचर्या में बिल्कुल फर्क नहीं डालता और सहन करता हुआ किसी से कुछ नहीं कहता। आगे बढ़ता रहता है। भगवान बड़े कृपालु है।

अगर आप इन बातों को मान लेंगे तो कृपा करके आपकी जलन शांत कर देंगे। समय का इंतजार करो। बहुत आनंद देंगे। आप रोरो के कहोगे कि आप जैसा कृपालु कोई है नहीं। जो नित्य स्वाध्याय करता है तो इष्ट दर्शन की योग्यता उसके अंदर आ जाती है। चौरासी हरिवंश कृत पढ़े सुने निश भोर छूट चौरासी भ्रमते निरखय जुगल किशोर नियम पूर्वक नियम पूर्वक और जो ईश्वर प्रणिधान है वह आगे चलकर समाधि स्थिति प्रदान कर देता है। ईश्वर प्रणिधान कोई भी वस्तु व्यक्ति स्थान कोई भी वृत्ति प्रभु से अलग नहीं है।

सब प्रभु में समर्पित दृढ़ निष्ठा अपने आराध्य देव की तो चलते फिरते समाधि लगने लगती है। भाव में एकदम तन्मय है। शरीर से क्रियाएं हो रही है या निष्क्रिय उससे कोई मतलब नहीं। स्वामी जी महाराज इसी समाधि के लिए गए आओ समाधि भीतरित ना डुलाए अगरित डुलाए तो अगला जन्म हो जाएगा आओ श्यामा श्याम के चरणारविंद के चिंतन में उनके लीला गायन में उनके लीला चिंतन में ऐसा जहां सौंदर्य रूप ऐसा जहां प्रेम रस बरस रहा है वो कुंज निकुंज झलकने लगेगा भारी समाधि स्थिति है। उपासक को चाहिए जिसका शरीर रोगी है, वयो वृद्ध है, उनके लिए बात नहीं कह रहे।

यदि आप जवान है, आपका शरीर स्वस्थ है तो आसन पर बैठना सीखें। बहुत जरूरी है। इंद्रिय संयम के लिए, मनोनिग्रह के लिए और शरीर की जो वायु है उसको पचाने के लिए। अब नौजवान हैं। कोई रोग नहीं है। कुर्सी में बैठे भाई कैसे बनेगा? आपकी वृद्धावस्था है। आपकी टांगे दर्द कर रही हैं। घुटने दर्द कर रहे हैं। कमर दर्द कर रहे हैं। गृहस्ती से आए हो। बैठो। आप बाल ब्रह्मचारी हैं। भगवत मार्ग के पथिक हैं। या आप गृहस्थ से संयम पूर्वक रहकर आए तो कुर्सी सुख आसन पर बैठने की चेष्टा ना करें।

एक आसन पर बैठे एक आसन सुखासन ऐसे लगा लिया शांत बैठ उससे आपके शरीर में जो पीड़ा होगी वो वायु पचेगी जैसेजैसे वायु पचेगी शरीर हल्का होता चला जाएगा शरीर राग हल्का होता चला विस्मरण होने लगेगा शरीर का शांत जहां हाथ रख दिए रख दिए गंभीरता शांति स्थिर भाव तक कम से कम 48 मिनट 48 मिनट एक स्थिति में बैठ अरे कई कई घंटे का पद्मासन या सिद्धासन 30 मिनट के बाद कष्ट शुरू हुआ हर नस नाड़ी पीड़ा को मैं शरीर नहीं हूं ये भ्रम है ये कष्ट नहीं ये भ्रम है थोड़ी देर बाद शून्य शून्य के बाद शांत अब बैठे रहो आराम से पर वो समय क्रॉस करना जो बहुत कष्ट प्रद यही तो है सब इंद्रियों को अधीन कर लेना शांत हर नस नाड़ी शुद्ध वायु जो वायु दोष पैदा करने वाली वो भस्म हो जाती है उससे कब आपकी वृत्ति संभलेगी यही तो समय है अगर आप सत्संग में बैठे हो लगाया आसन और बैठ गए शाम या तो वक्ता की तरफ दृष्टि या नाशाग्र दृष्टि ये इस समय जो अपना सत्संग होता है यहां मूंद के सुनने वाला नहीं है।

आंख मूंद के तो फिर नींद आ सकती है। आलस्य आ या तो नाशाग्र दृष्टि और या तो वक्ता की तरफ एकाग्र दृष्टि शांत आपका शरीर स्वस्थ है। आप जवान है। आसन बहुत आवश्यक है। बहुत आवश्यक है। आपका शरीर स्वस्थ है। आपका भोजन कम हो जाएगा आसन में बैठने पर। क्योंकि डोगे अगर अधिक भोजन पा लिया तो आसन में नहीं बैठ पाओगे पेट बड़ा हो गया तो आसन में बैठ पाओगे नहीं उचित आहार अपने आप सब ठीक होने लगेगा आसन हम कहते हैं ना पद्मासन लगाओ ना सिद्धासन लगाओ तो ऐसे पलथी अलथी पलथी जैसे पलथी मार के ऐसे बस अब ऐसे रख दिया हाथ वैसे शांत बैठे सुन रहे अब दर्द हो रहा है तो चुपचाप नाम जप करते हुए अपने मन को लगाने की चेष्टा करो सत्संग में नाम को चुपचाप सा हो सहते सहते अभ्यास हो जाएगा।

अभ्यास हो गया तो भजन में डूबने का अवसर आने लगेगा। सिद्धासन, पद्मासन, सुखासन ये भजन के आसन होते हैं। हमें लगता है कोई विरल पद्मासन लगाता होगा। सिद्धासन का तो हो सकता है भाई प्रवचन में सुना है तो ज्ञान हो। यह बहुत आनंद प्रदान करने वाले हैं। सिद्धासन जैसे ना अब तो किडनी खराब है। शांत थोड़ी देर के बाद एक नशा सा दिमाग में और आधा पौन घंटा व्यतीत होने के बाद शून्याकार स्थिति कभी पंखा नहीं चला जब आसनों पे शांत पसीना से लथपत ठंडा शरीर थोड़ी देर शांत अब दो घंटे ढाई घंटे एक आसन पे फिर लघु शंका आदि से फिर लगाया दूसरा आसन मतलब सिद्धासन में ढाई घंटे पद्मासन शांत सा मच जाता उसके बाद घंटों मंत्र चलाना नहीं पड़ता चल रहा है अपने आप एक अद्भुत स्थिति आती है।

ये भागवती में आप दिन भर इधर उधर टहल रहे हैं। टांगे वेग इधर भजन में मन लगेगा। अरे समझो आप किस मार्ग के पति को जो दिनचर्या है वो दिनचर्या में मान लो वाणी पाठ हो रहा है। सामने वाणी रखी आसन में बैठे हैं। कभी कानों से सुन रहे कभी आंखों से देखते हुए इधर उधर उपासक तो वही कि आपके तीसरे नंबर में पीछे कौन बैठा था। आपको पता नहीं होना चाहिए। अगल-बगल उठे चल कुटिया में गए जो अपनी दिनचर्या बैठ के रात दिन भजन यहां तो थोड़ी शिथिलता एकांत में पहुंचते हैं एकदम सावधान पर वो लक्ष्य नहीं बन पा रहा है भगवत प्राप्ति इसलिए ऐसा प्राण वायु का संशोधन अत्यंत आवश्यक है।

बिल्कुल सहज आपको बता रहे हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] 10 बार खींचिए। [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोई ऐसे वैसे पकड़ने की जरूरत नहीं। आराम से ऐसे बैठे। आप देख लेना जय भारत आप आसन पे बैठिए। 10 बार खींचिए। पूरा खींचिए और फिर पूरा छोड़ दीजिए बिना रुके। दोनों सांसों से। ये हम महापुरुषों की बात बता रहे हैं। स्वयं अनुभूत बात बता रहे हैं। फिर आप भजन में बैठिए। देखिए आपकी कम से कम अगर तीन बार दिन में आप ऐसा करेंगे तो आपके प्राण बिना ये रेचक पूरा कुंभक इनके बिना किए अनुलोम विलोम इनको बिना [नाक से की जाने वाली आवाज़] ऐसे पूरा भर के वायु आराम से छोड़ दिया आराम से भरा 10 बार फिर आप देखो भजन में नाम जप करते हुए ऐसा किया फिर आप देखो एक शांति सी आएगी एक मन उसमें जिस नाम में लगाना चाहो लगेगा प्राण वायु का संशोधन अत्यंत आवश्यक है।

प्रत्याहार इंद्रियों के विषयों का जो अत्यंत जीवन के लिए आवश्यक है उनका प्रयोग जीवन यापन के लिए ना कि भोग के लिए। जब हम भोजन पाते हैं तो रसेंद्रिय और प्राणों के पोषण का विषय है। मेरा नहीं है। अगर मेरा मैं पाता हूं ऐसा मान के तो उसका आप भोग कर रहे हैं। आप फंस जाएंगे उसकी आसक्ति में। आपको स्वाद फसा लेगा। रसेंद्र बिगड़ जाएगी आपकी। प्रत्याहार कहते हैं अपने अपने विषयों के साथ संबंध ना रहने पर इंद्रियों का चित्त के अनुसार हो जाना। अर्थात हमारे चित्त में जो भगवत चिंतन चल रहा है वो चल रहा है और हमसे आहार विहार आद की जो क्रियाएं हैं हो रही उनके सुख स्वाद की तरफ हमारा आकर्षण नहीं।

यह प्रत्याहार है। अगर आपका भगवत विस्मरण हो रहा है तो आप जिस इंद्रिय की क्रिया में हैं आप उसका सुख भोग रहे हैं। ये आपकी साधना में बाधा पहुंचा देगी। पा रहे हैं प्रसाद जय लाडली झुकी और नाम चल रहा है। नाम के चिंतन में चित्त से नाम नहीं हट रहा है तो आपको कोई फंसा नहीं पाएगा। अगर इंद्रिय जो विषय का सहयोग कर रही है उसी में आप तन्मय हो रहे हैं तो आप फंस रहे हैं। आप साधना में बाधा खड़ी कर रहे हैं। धारणा हमारी पुष्ट होनी चाहिए। श्यामा श्याम के सिवा कोई मेरा नहीं।

मेरे चित्त की स्थिति एकमात्र श्यामा श्याम के भरोसे श्यामा श्याम के आश्रय में श्यामा श्याम की ही चिंतन में इसे कहते हैं धारणा। और यह धारणा जिसकी सिद्ध हो जाती है वो श्यामा श्याम में हो जाता है। मन बुद्धि चित्त हम सब श्यामा श्याम में धारणा बहुत उत्तम स्थिति है। स्वप्न में भी जागृत में भी हर समय अपने आराध्य देव छाए रहते हैं। महाप्रभु कह रहे जागृत स्वप्न सुशुप्त स्फुरत में राधा पद ये धारणा चित्तवृत्ति का आराध्य देव में तेल धारावत जाना उसे ध्यान कहते हैं।

जैसे आजकल ध्यान का मतलब ना समझने के कारण ऐसा कुछ देर आंख मूंद के बैठे एसी चल रही बड़े आनकूल शांत एकदम बैठे आप शांत रह ही नहीं सकते अंदर देखो आप बाहर से आंख मूंद ली ऐसे बैठ गए उसे शांति कहते हैं क्या आपका मन शांत आपकी चित्तवृत्ति शांत कोई संकल्प विकल्प नहीं हो रहा उसे शांत कहते हैं ये कब होगा जब तेल धारावतित की स्थिति चित्त चोर प्रभु में होगी। नाम जप करते करते रूप की झलक आ गई। संपूर्ण चित्त वृत्ति घसीट गई प्रभु की तरफ उसे ध्यान कहते हैं। इसीलिए हम प्रया ध्यान पर जोर ना देकर नाम ध्यान की बात कहते हैं।

राधा तो यही राधा नाम राधा रूप प्रकाशित करेगा। जब रूप तो फिर ध्यान धरना नहीं पड़ेगा। हर समय उठते बैठते चलते फिरते वो ध्यानस्थ रहेंगे प्रभु तो चित्त वृत्ति का धेय पदार्थ में तेल धारावत स्थिर रहने का नाम ध्यान है कुछ देर बैठ के आंख मूंद हो लेकिन ध्यान किस किसे कहते हैं तैल धारावत अखंड वृत्ति अपने आराध्य देव में लगी हुई यह ध्यान चलते फिरते उठते बैठते खाते पीते हर समय समाधि जब ध्यान परिपुष्ट हो जाता है तो ध्याता ध्यान और धेय की त्रिपुटी मिट जाती है। मैं ध्यान रूपी क्रिया धेय प्रभु उनमें कर रहा हूं।

अभी ध्यान नहीं होगा। मैं ध्याता जो ध्यान क्रिया धेय में कर रहा हूं। अभी ध्यान नहीं लगा। जब ध्यान लगेगा तो ध्याता और ध्यान दोनों लय हो गए। केवल धेय रह गया। धेय केवल प्रभु मैं प्रभु का ध्यान कर रहा हूं ऐसा नहीं। केवल प्रभु ही प्रभु उसी स्थिति को समाधि कहते हैं। उसे समाधि कहते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] जब मैं ध्यान कर रहा हूं। ध्याता ध्यान रूपी क्रिया धेय के प्रति तब तक जब मैं और ध्यान क्रिया दोनों का लय हो गया केवल ध्याता है उसे समाधि कहते हैं।

ये दो प्रकार की होती है। सज और निर्बीज सविज में त्रिपुटी के ना रहने पर सूक्ष्म संस्कार रहते हैं। हमें ध्यान हो रहा है सूक्ष्मता से। निर्बीज में बिल्कुल नहीं केवल वही ब्रह्माकार वृत्त या भगवदाकार वृत्त या श्यामा श्याम में जीवन का परम लाभ इसी जन्म में प्रिया प्रीतम के सानिध्य को प्राप्त करना शरीर रहते तो आपका ये जो सत्संग में श्रवण मनन है इसे निष्ठा पूर्वक अपने हृदय में उतारे और नाम ना छूटने पावे। नाम ही सब स्थितियां ला देगा। प्रमाद की कोई गुंजाइश ना रहने पावे।

हम लोग बहुत प्रमादी हैं। बड़ी छूट दे देते हैं मन बुद्धि को। इसलिए बड़ा अंतराय होता है। फिर ऐसा लगता है इस मार्ग में सुख ही नहीं है। फिर भाग पड़ते हैं संसार की तरफ। बहुत धोखा हो गया। बहुत बड़ी हम पराजय को प्राप्त हो गए। यदि प्रभु का मार्ग छूट गया तो पता नहीं किस जन्म में किस कल्प में मिलेगा। इसलिए सावधान होकर निरंतर एक एक क्षण प्रभु के चिंतन मनन में लगाएं। श्री राधा वल्लभ लाल की

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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