दो बार नाम की कीमत क्या है? | यमुना तट सत्संग (28-06-26)
श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
श्री हरिवंश अभिरा नाम कीर्तितम विवसाव ते विध्वस्त अखिला या राधास पदम परम स्मरणे राधा नामस्तु न काल नियम स्मता भ्रमाचारणो सर्व दुख विनाशम अभिरा य नाम कीर्तितम विसाच यदि विवश होकर कोई बोल दे श्री राधा राधा तो बोले ते ध्वस्त अखिला होगा या आधा पदम पदम निश्चित उसके सारे पाप नष्ट हो जाएंगे और वो राधा पद को प्राप्त होगा कि सुधी के चरणारविंद की सेवा को प्राप्त करेगा। भ्रम से, विवश होकर, दुखी होकर, भाव से, कुभाव से, प्रेरणा से जैसे बने वैसे जो नाम जप करता है, उसका परम मंगल हो जाता है।
श्री जी पर विश्वास हमारे ऊपर बहुत कृपा है। यह बात हर क्षण अनुभव में आना। और निरंतर उनकी स्मृति बने रहना। बस यही सबका फल है। जितनी साधना है उसका फल है। ये बट विश्वास अचल निज धर्मा। अपने उपासना मार्ग में दृढ़ हो गया है। चित्त अब किसी प्रलोभन या किसी भयवश हम अपनी उपासना से बदल नहीं सकते। और यह हर क्षण हमारे अंदर है कि श्री जी की हमारे ऊपर अपार कृपा है। और ये केवल कोरी भावना नहीं उसे ये दिखाई दे रहा है कि श्री जी की हमारे ऊपर अपार कृपा है। दुख में भी कष्ट उस उस समय कृपा का अनुभव होता है कि श्री जी का चिंतन हो रहा।
श्री जी में तन्मयता है। प्राण तो सबके जाएंगे। अगर प्राण निकल जाए तो हमारा काम बन गया। तो क्या किया इसने? मुझे श्री जी में तन्मय कर दिया। तो कृपा की कि नहीं की? जो दुख श्री जी में तन्मय कर दे वो कृपा और जो सुख श्री जी से अलग कर दे वो पाप वो अकपा वो सुख का नाश हो जाए जो सुख हमारे श्री जी के चिंतन को भुलवा दे। श्री जी से अलग कर दे। तो कृपा पर विश्वास क्या कृपा पर विश्वास? आज हमारे अंदर बहुत दोष है। मन बड़ा चंचल है। कोई स्थिति नहीं है। पर हम राधा नाम शुरू कर दिया।
मंत्र शुरू कर दिया। अब हमें विश्वास करना चाहिए कि सब ठीक हो जाएगा। श्री जी की कृपा से सब ठीक हो जाएगा। आज ठीक नहीं है तो कल अवश्य ठीक हो जाएगा और नहीं ठीक होगा तो श्री जी करुणामई है। मुझे ऐसे ही स्वीकार किया है। ऐसे ही श्री जी मिल जाएंगे। हमें पूर्ण विश्वास श्री जी की कृपा पर होना चाहिए। पहला श्री जी पर भरोसा। यह भरोसा छोटी मोटी बात नहीं है। यह भजन के आगे की भी बात है। काू के बल भजन को काू के आचार और व्यास भरोसे कुंवर के सोवत पाव प्रसाद। किसी को भरोसा व्यक्ति का है, किसी को धन का है, किसी को विद्या का है।
कोई बिरला ऐसा होता है जिसको श्री जी का भरोसा होता है। प्रभु का भरोसा होता है। यह भरोसा बहुत बड़ी चीज है। जिस समय भरोसा हृदय में जागृत हो जाएगा तो आपके जीवन में चमत्कार प्रकट हो जाएंगे। मुझे भरोसा है कि मेरा जीवन कैसा भी हो मुझे श्री जी मिलेगी। तो आप ये बात यमुना के तट पर बैठे हुए हैं। आप ये लिख लो यदि यह भरोसा है तो श्री जी निश्चित मिलेंग। भरोसा बहुत बड़ी चीज। हम आज तक देखा प्रभु ने कभी भरोसा नहीं तोड़ा। तोड़ा मरोड़ा है। हमें तोड़ा मरोड़ा है लेकिन हमारे भरोसे को पुष्ट रखा है।
भरोसा नहीं तोड़ा है। भरोसा इष्ट पर भरोसा। श्री सूरदास जी महाराज जी का अंतिम समय था। तो सब रसिक महापुरुष जन बैठे हुए थे। कहा महाराज एक शंका हमारे अंदर है। आपने लाखों पद तो प्रिया प्रीतम के लिखे लेकिन गुरु का एक भी पद नहीं लिखा। गुरु के लिए एक पद भी नहीं लिखा। यह मुझे प्रश्न खड़ा होता है कि जिन गुरुदेव की कृपा से वल्लभाचार्य जी की कृपा से आपको यह सब प्राप्त हुआ। आप उन गुरुदेव के लिए एक भी पद नहीं लिखे और लाखों पद प्रिया प्रीतम के लिए लिखे। तो उन्होंने कहा मेरी दृष्टि में प्रिया प्रीतम और गुरुदेव दो है ही नहीं।
उन्होंने कहा फिर भी अब आपका अंतिम समय है। एक पद गुरुदेव के लिए तो जानते हो क्या शब्द निकला? भरोसों दृढ़ इन चरणन केरो। श्री वल्लभ नख चंद्र छटा बिन सब जग मा अंधेरो भरोसो दृढ़ इन चरणन केरो साधन नहीं इस कलिकाल में और कोई केवल भरोसा कर लो तुम्हारा मंगलमय कार्य हो जाएगा गुरु पर भरोसा इष्ट पर भरोसा वो तो बड़े भाग्यशाली हैं जो इष्ट को गुरु रूप में और गुरु को इष्ट रूप में देखते हैं। इष्ट और गुरु को जो अभेद देखते हैं, वह बड़े भाग्यशाली है। श्री जी पर भरोसा और जबान से नाम जप जबान से इसलिए कहा कि मानसिक नाम जप बड़े अच्छे साधकों का होता है।
सबका नहीं होता है। अगर आप मानसिक जप पर पहुंचेंगे तो दो-चार बार मानसिक जपेंगे और फिर मन भाग जाएगा। इसलिए जिभ्या से य जिज्ञ वर्तते नाम तभ्यम तो आप देखेंगे आप में एक निर्भयता आएगी। आप में एक साहस आएगा। आप में शोक नहीं होगा। आप में मोह नहीं होगा। आप में एक आनंद होगा, सबसे प्रेम होगा और एक मस्ती आएगी। कब? जब श्री जी पर दृढ़ भरोसा। विश्वास है कि श्री जी की हम पर बहुत कृपा है। और तीसरी बात निरंतर नाम जप करने का अभ्यास। श्री जी की हम पर बहुत कृपा है। श्री जी पर दृढ़ भरोसा।
श्री जी का निरंतर नाम जप ये तीन बात पकड़ लो इन तीन बातों से आपका परम कल्याण हो जाएगा ये कलयुग है इसमें ज्यादा साधनाएं नहीं बनती साधना का नाटक भले हो साधना नहीं बनती बड़ा मलिनता का साम्राज्य है कलयुग में [गहरी सांस लेने की आवाज़] नाम जप में प्रीति तभी होती है या तो बहुत बड़ी बढ़िया नाम जापक का संग हो जाए। भजन न होई संग बिनु भजन बिना नहीं प्रेम और यह सब उपायों से हार गया हो सुन री मैंने निर्बल के बलराम अपबल तप बल और बाहुबल चौथो बल है दाम सूर्य किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरि नाम हारे को हरि नाम जो अपने अह अहंकार को मिटा रहा है।
वही नाम में प्रीति कर रहा है। जो नाम जप कर रहा है उसका अहंकार गलित हो रहा है। हरि नाम पकड़ लिया आपका कल्याण हो गया। राधा नाम पकड़ लिया आपका कल्याण हो गया। प्रभु का आश्रय ग्रहण करो तो देखोगे कि धीरे-धीरे अशांति आपके पास से जा रही है। एक कैसी भी परिस्थिति हो मन घबराता नहीं है। अशांति नहीं होती। क्योंकि भरोसा भगवान का है और सुमिरन चल रहा है तो अशांति नहीं। देखो पांच वर्ष के बालक प्रहलाद पर त्रिभुवन पति हिरण्यकश्यप क्या क्या नहीं कर रहा है लेकिन ना अशांति है ना घबराहट है हर समय भगवान की स्मृति में तन्मय है इसलिए उन्हें परम शीतलता परम आनंद प्राप्त है हमें क्या चाहिए हम क्या करने आए हैं इन दो बातों का उत्तर आप ले लीजिए अपने अंदर से कोई बिरला ही इस बात को ईमानदारी से हृदय से कि मुझे आप चाहिए प्रभु चाहिए मुझे श्री जी चाहिए मुझे गुरु जी चाहिए दूसरी बात हम किसी भी परिस्थिति में यदि इस बात को ना भूले कि हमें क्या चाहिए तो भजन करना नहीं पड़ेगा होने लगेगा।
देखो हम शरीर को याद नहीं करते लेकिन भूलते भी नहीं। हम अपने रिश्ते नातेदारों को याद नहीं करते पर भूलते भी नहीं क्योंकि उनसे हमारा अपनापन हो गया है। ऐसे श्री जी से यदि अपनापन हो जाए और हमें श्री जी चाहिए तो हर समय श्री जी का सुमिरन होगा। हम लोग अज्ञानवश रुपए की चाह नाना प्रकार के भोगों की चाह पद प्रतिष्ठा की चाह करके ये मनुष्य जीवन व्यर्थ कर देते हैं। आखिरकार मरेंगे तो ना कोई पद जाएगा ना रुपया जाएगा ना जमीन जाएगा ना भाई बंधु जाएगा ना रिश्ते नातेदार जाएगा तो यदि भजन नहीं किया तो आपके साथ जाएगा क्या सब व्यर्थ हो गया हमें आवश्यकता है श्री जी की ना कि धन की।
पारस मणि मिल गई तो हमें सोने की जरूरत नहीं है। ऐसे सब लोकों के स्वामी प्रभु यदि हम पर प्रसन्न है और हमें मिल गए तो हमें सब कुछ मिल गया। भरोसा कर लो नहीं तो अशांति में जीवन व्यतीत होगा। चाहे जितना कमा लो रुपया कभी शांति नहीं होने वाली। रुपया वाला हमसे सब मिलते हैं। ऐसे लोग मिलते हैं जिनके आधार रुपया है। लेकिन वो भी अशांत है। वो भी सुखित हैं। वो भी ये प्रश्न करते हैं कि आज मैं खुश क्यों नहीं हूं? तो खुश का उपाय है ठाकुर जी जो आनंद सिंध सुख राशि आनंद समुद्र यदि ठाकुर जी से श्री जी से आपका अपनापन नहीं हुआ तो आप कभी खुश नहीं रह सकते हमको एक रट लग जानी चाहिए अंदर पता नहीं किस समय हमारी मृत्यु हो जाए कोई भरोसा नहीं एक कल सुबह मिले कि ना मिले कोई भरोसा नहीं तो हमारा एक भी मिनट खाली नहीं जाना चाहिए।
राधा राधा राधा हर समय नाम उच्चारण होना चाहिए। आगे की चिंता तुम छोड़ दो। भगवान ने कहा है योगक्षेम वाम्यम। तुम्हारे योगक्षेम का वाहन मैं करूंगा। तुम केवल मेरा चिंतन करो। भगवत प्राप्ति करना ही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है। और इसका सीधा रास्ता है सत्संग और नाम जप। भगवत प्राप्ति का सीधा रास्ता है साधन को हरि भजन है। के सत्संग सहाय। जिनको संतों का संग मिल गया और नाम जप चल रहा है। आप बिल्कुल बेफिक्र हो जाओ। आपको भगवत प्राप्ति होगी। पुत्र के बहाने से नारायण बोला तो नारायण की प्राप्ति हो गई।
हम जानबूझकर नारायण बोलेंगे तो हमें भगवत प्राप्ति नहीं होगी। भगवत प्राप्ति मनुष्य जन्म का सीधा लक्ष्य है और इसकी प्राप्ति होती है संत समागम और नाम जप से। जितनी भी सिद्धियां है, जितनी भी शक्तियां हैं यह सब भगवान के नाम में समाई हुई है। देखो राम राम कहना नहीं आता था। मरा मरा कहा तो वाल्मीकि रामायण की रचना कर [गला साफ़ करने की आवाज़] दी। इतने बड़े ज्ञानी महात्मा हो गए कि भगवान के अवतार के पहले भगवान की लीलाएं लिख दी। नाम में बड़ी सामर्थ है। ध्यान से सुनोगे तो बहुत प्रियता बढ़ेगी।
नाम में जितनी शक्तियां हैं और जितनी सिद्धियां हैं वो सब नाम में विराजमान है। एक बार विनोद में ज्ञानदेव जी और नामदेव जी ब्रज में आए हुए थे तो लीला की अपनी सिद्धि की। तो ज्ञानदेव जी छोटा रूप धारण करके कुएं में गए और पानी पीकर आ गए और नामदेव जी से कहा देखो हम तो जल पी आए अब आप तो उन्होंने कहा हमको कोई सिद्धि तो आती नहीं हमें तो केवल विट्ठल का नाम ही विट्ठल विट्ठल अब कुएं से पानी ऊपर उठने लगा विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल और पानी सामने से बहने लगा और वह जुली से पीने लगे।
बोले आपको तो छोटा रूप धारण करके कुएं में जाना पड़ा। लेकिन नाम का प्रभाव कुएं से पानी स्वयं सामने आ गया। नाम में इतनी सामर्थ है कि वो भगवान को जब अधीन कर सकता है तो और सिद्धियां और शक्तियों की तो बात जाने दो। और खास बात हमसे कितना भी पाप बन जाए अब हम नरक नहीं जाएंगे यदि नाम जप कर रहे हैं कितना भी [नाक से की जाने वाली आवाज़] हमारी कितनी भारी भूल हो जाए कितना बड़ा प्रमाद बन जाए कितना बड़ा पाप बन जाए नर्क तो हमें जाना नहीं हो सकता है कि हमको दंड मिले दंड मिले भगवान ऐसा विधान कर सकते हैं कि हमको उस अपराध का फल भोगना पड़े पर नर्क में नहीं भगवान की उसमें कोई चोट लग गई कोई ऐसा दुख आ गया कोई जलन पैदा हो गई अशांति नर्क नहीं जाना पड़ेगा जो नाम जप करता है उसे यदि भूल हो जाए प्रमाद हो जाए पाप बन जाए तो नर्क नहीं जाना पड़ेगा हमने कई बार ये सत्संग में सुनाया है कि एक दो भाई थे धर्मचंद और कर्मचंद।
तो जो धर्मचंद थे वो संतों से बड़ा प्यार करते थे और जो संतों से प्यार करेगा वो नाम जप करेगा, भगवत कथा सुनेगा, भगवान की आराधना करेगा। और वो संतों को देखते ही गाली देता था जो छोटा भाई था। तो घर में जब संत आते तो पहले विनय धर्मचंद यही कहते कि भगवान यदि हमारा छोटा भाई आ जाए और वो गाली देने लगे तो आप लोग नाराज मत होना। बड़ा धूर्त पापी है। वो शराब पीता है। नीच आचरण करता है। इस बात से वो दुखी रहता। एक दिन एक मंडली संतों की आई। तो विनय सब संतों से पहले यही कहते थे तो यही विनय की तो संतों ने कहा कोई बात नहीं अगर वह गाली भी देगा तो कोई बात तुम बड़े श्रद्धालु हो हम तुम्हारी श्रद्धा का भाव देखते हैं उसकी गाली वाली का भाव नहीं देखेंगे उसके आंसू आ गए और एक संत जो महंत थे उन्होंने उनसे कहा क्या हमारे भाई का कल्याण नहीं हो सकता शराब पीता है मांस खाता है गंदे आचरण करता है संतों को गाली देता क्या हमारे भाई का कल्याण नहीं हो सकता?
बोले क्यों नहीं हो सकता? बिल्कुल हो जाएगा। आज हम कल्याण का बीज बो देंगे। और वो अगर घर में सुन लेता संत है तो जाता नहीं था। तो संत मंडली थी। तो जब ये बात उनके भाई ने बताई खूब अच्छे से खवाया पिया और सब संतों को विदा किया। जो महंत जी थे वो लुक के चुप के घर में बैठ गए। जब देख लिया संत चले गए तो गाली देता हुआ अपने भाई को आया और उसका ऊपर कमरा था अपने कमरे में जाके सासु पीछे से संत जो महंत थे वो तगड़े तंदुरुस्त थे जाके उसके ऊपर लद गए और शराब के नशे में वैसे ही सामर्थन था और संत आवेश में थे उनका राम बोल कहा नहीं बोलेंगे बोले जान से मार डालेंगे वो गला दबाया छाती में चढ़ के बैठ गए छाती में चढ़ के बैठ गए बोले राम बोल नहीं मार डालेंगे उसने सोचा भाई तो खिलाफ भाई है और ये बाबा जी तगड़ा तंदुरुस्त है हो सकता है मार डाले तो उसने कहा राम राम हट गए और कहा बेटा मेरी बात ध्यान रखना इसको कभी बेचना नहीं इसकी कीमत बड़ी अमोल है इसकी की कीमत जान के तुम इसके कभी बेचना नहीं रहे।
अरे बोले जाओ जाओ बड़ी कीमत है। वो अवहेलना पूर्वक भयवश दो बार राम नाम बोला। कुछ दिन बाद कैंसर हुआ और मर गया। जब मर गया तो नरक गया क्योंकि पापी था। यमराज के दूत ले गए। वहां रजिस्टर खोला गया तो पूरा रजिस्टर गंदा। एक बात केवल अच्छी थी कि संत के द्वारा राम राम कहाया गया। अब यमराज चक्कर में पड़ गए कि इसको दंड कैसे दें? दो बार इसने राम राम बोला है। तो यमराज ने कहा भाई राम राम का क्या फल लोगे? दो बार तुमने राम राम बोला है। फिर तुम्हें घोर नरक प्राप्त होंगे।
तो उसने कहा कीमत बताओ क्या है दो बार की? दो बार राम राम की कीमत यमराज जी खोपड़ी खुजलाने लगे बोले कीमत तो नहीं बता सकता तो बोले जब तक कीमत नहीं पता चलेगी तब तक हम मांगे क्या हमें कीमत बताइए तो यमराज जी ने देवराज इंद्र के पास उसको ले गए कि त्रिभुवन पति है वो निर्णय करेंगे देवराज इंद्र से जो ही ये प्रश्न हुआ कि राम नाम की कीमत क्या है? दो बार राम नाम हाथ जोड़े उन्होंने कहा राम नाम की कीमत मैं नहीं बता सकता। ये तो भगवान का नाम है। असीम अपार अमित महिमामय बोले चलो फिर ब्रह्मा जी के पास चलते हैं।
क्योंकि सृष्टि के स्वामी ब्रह्मा जी अब उस जीवात्मा को भी साथ ले गए। उसको स्वर्ग में बड़ा आनंद मिला। स्वर्ग से ज्यादा आनंद ब्रह्मलोक में मिला। ब्रह्मा जी ने कहा ये क्या लीला है देवराज इंद्र यमराज और एक जीवात्मा बोले भगवान एक समस्या हो गई है ये जीवात्मा जीवन भर पाप किया है और दो बार राम राम बोला तो प्रभु इसको क्या कीमत दी जाए राम नाम की ब्रह्मा जी ने कहा राम नाम की कीमत मैं भी नहीं बता सकता मेरी भी सामर्थ्य नहीं है तो ब्रह्मा जी भी राम नाम की क्या कीमत है ये जानने के लिए साथ हो गए और बोले निरंतर भगवान शंकर नाम जप करते हैं उनके पास चला जाए तो भगवान शंकर के पास गए भगवान शंकर ने कहा महिमा तो बता सकता हूं लेकिन कीमत नहीं बता सकता रा कहा और जहर पी गए और मां कह दिया तो आज गले में रुका हुआ है अगर गले में एक बूंद पानी भी रुक जाए तो खोखौ करने लगोगे पूरा हलाहल विश्व भगवान के बड़ी महिमा वर्णन की पर कहा कि राम नाम की कीमत नहीं बता सकता।
बोले अब कीमत कैसे पता चले? बोले सब लोग चलते हैं स्वयं श्री राम के पास और वही अपने नाम की कीमत बताएंगे। अब वो जीवात्मा भगवान के इन विभूतियों के साथ साकेत धाम पहुंचा। भगवान राम जी ने देखा कहा स्वागत है ब्रह्मा जी शंकर जी देवराज इंद्र धर्मराज ये क्या लीला है उनका भगवान ये जीवात्मा महापापी जीवन भर पाप किया एक संत के कहने पर दो बार इसने राम नाम कहा अब दो बार राम नाम की कीमत क्या है तो भगवान ने कहा इसे बुलाओ बुलाया और गोद में बैठा लिया और दुलार किया और कहा महिमा तो बता सकता हूं लेकिन कीमत मैं भी नहीं बता सकता।
तुम महिमा देख लो कि बड़े-बड़े साधन करने वालों को मोक्ष मिलता है और इसलिए नाम लिया तो हमारी गोद में बैठा है लेकिन राम नाम की कीमत मैं नहीं बता। तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा कहूं कहां लगी नाम बढ़ाई राम न सक नाम गुण गाई भगवान [गला साफ़ करने की आवाज़] स्वयं श्री राम नाम की महिमा नहीं गा सकते। इतनी महिमा नाम की है तो यह विश्वास कर लो कि समस्त साधनों का शक्तियों का सिद्धियों का स्रोत है खजाना है भगवान का नाम तुम जितना नाम जप करोगे उतने सुखी हो जाओगे उतने ही शांति को प्राप्त होगे उतने ही आनंद की अनुभूति होगी शेष चर्चा आगे जी
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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