॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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वर्षा ऋतु की अद्भुत शोभा / ऋषभदेव जी का अपने पुत्रों को अमूल्य उपदेश और अवधूत वृत्ति ग्रहण करना

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

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वृंदावनेश्वरी तवै पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हदितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माशयाम निर्वापयत परम शीतल माश्रया परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप नवनि निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले प्राणाराध्य श्री प्रिया प्रिया प्रीतम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी लता रज रानी यमुना रस रानी समस्त ब्रजवासी परिणामय श्री लाडली जी की कृपा से अपने लोगों को नित्य भाव उत्सव में डूबने का अवसर मिला है। देखो सालों में कभी-कभी कोई वर्षों में या जीवन में एक दो बार वृंदावन आने का आपको नित्य निरंतर रज का सेवन करने का सौभाग्य [गला साफ़ करने की आवाज़] जो देव दुर्लभ विषय है वह हमें प्राप्त है।

श्री धाम वृंदावन का सानिध्य वास रजरानी में बैठकर के नाम जपने का मंत्र जपने का सौभाग्य श्री प्रिया प्रीतम की रसमय चर्चा महापुरुषों की चर्चा सिद्धांत सुनने का सौभाग्य प्रिया प्रीतम की सेवा प्रिया प्रीतम के जनों की सेवा का सौभाग्य किसे भगवत प्राप्ति कहते हैं? इसे ही भगवत प्राप्ति कहते हैं। हम भगवत प्राप्ति में बिल्कुल विराजमान है। बस जो हमें मिला है उसमें हमारी रति हो जाए। अभी हम इसे महत्व बुद्धि वैसी नहीं जागृत कर पाए। में श्री धाम में नाम में प्रभु के लीला चरित्र गायन श्रवण में प्रभु की सेवा में प्रभु के जनों की सेवा में ऐसा लगता है साधन है।

यह साधन नहीं है। यह साधन का फल है। धाम साधन नहीं है। साधन का फल है। साधु समागम साधन नहीं है। यह साधन का फल है। समस्त साधनों का फल है प्रभु का प्रसन्न हो जाना और जब द्रव दीन दयालु राघव तो साधु संगति पाइए जब भगवान प्रसन्न होकर द्रवित होते तब साधु समागम मिलता है तो हमें जो कुछ मिला वह सब फल मिला है बस इसका रसास्वादन करना है अभी हम इस फल से अनभिज्ञ हैं। रसास्वादन विषयों का करना चाहते हैं। इसीलिए प्रेममय धाम में रहते हुए, प्रेममय उपासना करते हुए भी प्रेम का स्पर्श नहीं हो रहा।

क्योंकि विषयनंद की चाट लगी है बहुत जन्मों से। तो इस जन्म में भी जो हमें परम लाभ कृपा से मिला इसको हम गौड देख रहे हैं। मुख्य देख रहे हैं विषय सेवन और जिस दिन मुख्य बात आ गई प्रिया प्रीतम बहुत साधन नहीं करने पड़ते। चित्त कब समर्पित होना है। जहांित समर्पित हुआ अपनापन हुआ मेरी श्री जी मेरे लाल जो बस हो गया काम यह मेरापन अपनापन इतना गाढ़ हो जाए कि इसके अलावा और कोई रह ना जाए। सिद्धावस्था है। ज्ञान में स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों का साक्षी भाव जब स्वीकृत होता है और वह सिद्ध हो जाता है तब चित्त की वृत्तियों में कोई स्मरण ही नहीं रहता है।

कोई भी वृत्ति नहीं रहती। वृत्ति का लय हो जाना ही मोक्ष कहा जाता है। कोई चिंतन ही नहीं। सत ना सत चिंतन जैसे गाढ़ सुशुप्त अवस्था ऐसे जगे हुए ज्ञानी पुरुष की समाधि अवस्था तब वो जीवन मुक्त माना जाता है। कोई इस पुराण ही नहीं बिना संकल्प के चेष्टाएं हो रही बिना कर्ता के चेष्टाएं हो रही। जैसे ढलान में गाड़ी को बंद करके छोड़ दो। तो ना तेल खर्चा होगा ना उसको स्टार्ट किया गया पर वह यात्रा चल रही है। ऐसे ब्रह्म ज्ञानी की यात्रा होती है। बिना संकल्प के बिना चिंतन के हम महत्व बुद्धि नहीं रख पाते अपने साधन की जो हमें फल वृत्ति मिली उस पर महत्व बुद्धि नहीं यदि धाम में महत्व बुद्धि नाम में महत्व बुद्धि प्रियाल में महत्व बुद्धि तो और कछु न सुहाए तिनको जुगल सेवा सुख पगी रात दिन केवल प्रिया प्रीतम श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी कह रहे हैं श्री गंधवा पद कमल यो दास लासलमे तज साधन उपदो मादोत्र [गाना गाने की आवाज़] तस्मात पापो यदि च सुकृति निंदितो वंदितोितोवा वृंदारण्यम सुशरणमय कुंठ राधा प्रकाशम बहुत बढ़िया निष्ठा का वर्णन कर रहे हैं।

ध्यान से सुनो। कह रहे श्री गंधवा पद कमल दास लासल तज य साधन उपरो मादोत्र गांधवा हमारी लाडली जो को कहते हैं। प्रियाजू का एक नाम गांधवा है। यदि श्री प्रियाजु के चरण कमलों के दास्य का स्वाधी नहीं है। प्रियाजु के दास रस से सेवा सुख का स्वाद नहीं लिया है। राधा तत्व का अनभिज्ञ है तो कितना भी बड़ा विद्वान हो उसके उपदेश पर हम ध्यान नहीं देते हैं। क्योंकि हमें चाहिए जो राधा दास राधा रूप राधा रस हम वृंदावन वासी प्रेम उपासी यदि श्री जी के दास्य सुख का स्वाद नहीं लिया है उसने कभी श्री जी के तत्व से अनभिज्ञ राधा तत्व से तो कितना भी बड़ा विद्वान हो हम उसके उपदेश पर ध्यान नहीं देते उसके उपदेश िष्ट साधन को कभी स्वीकार नहीं करते।

यह बात समझना उस विद्वान से उस ज्ञानी से जो हमें फल मिलता है हमें वह नहीं चाहिए। अत पापी हो या पुण्यत्मा निंदनी हो या बंदनी यदि वह राधा जी के चरणों का आश्रय लिए हैं। प्रियाजु के चरणों का आश्रय लेकर प्रिया चर्चा करने वाला है तो मैं अति उत्तम भाव से उसकी शरण लेता हूं। समझो यदि प्रियाजु के चरण दास्य सुख से अनभिज्ञ है। राधा तत्व से अनभिज्ञ है तो कोई कितना भी बड़ा महापुरुष बोल रहा हो हम सुनेंगे। पर हमें उसके उपदेश और साधन से कोई मतलब नहीं। उसके द्वारा जो मिलने वाला फल है उससे मेरा कोई संबंध नहीं।

मोक्षा आदि अन्य लोक आदि अगर वह प्रियाजु का जस वर्णन करने वाला है प्रिया चरणों का आश्रय लिए पापी हो पुण्य आत्मा हो निंदनी हो या बंदनी हो मुझे इससे मतलब नहीं राधा किशोरी के जस का गायन करने वाला राधा चरणारविंद का आश्रय लेने वाला मैं उसकी अतत्तम भाव से शरण लेता हूं। जो वृंदावन का आश्रित राधा उपासी है वो कैसा भी हो मैं उसकी शरण लेता हूं। भाव यहां है किसी प्रियाल की उपासना वाले उपासक को अपनी निष्ठा परिपक्व रखने के लिए अन्य साधन का उपदेश और अन्य साधन उपदेशा उससे भी हमारा कोई संबंध नहीं।

इसीलिए महाप्रभु श्रीमद् राधा सुदानिधि में कहते हैं वृंदान सर्व महता अपाय दूराद वृंदावी मनुसरो प्रणय चेता बड़े-बड़े साधन और साध्यों का महापुरुषों का आश्रय भी छोड़कर तुम वृंदावन का आश्रय लो क्योंकि वृंदावन में जिनका स्वभाव ही है सतारणी कृत स्वभाव सुधार सौगम सज्जन पुरुषों को तार देने का स्वभाव ही है जिनका का ऐसे श्री राधा किशोरी जी विराजमान है। ऐसे वृंदावन का आश्रय लो। समस्त साधन और साध्यों का और साधन का उपदेश करने वाले महापुरुषों का भी आश्रय छोड़कर वृंदावन का आश्रय वृंदावन के प्रेमी जनों का आश्रय तो उससे जो सज्जनता आएगी, विनय आएगा, दैन्यता आएगी, उससे प्रियाजु की कृपा प्राप्त होगी।

इसी जन्म में वो निकुंज रस को प्राप्त होगा। य सौंदर्यम यदयो ये भावा या वैद या गौरांग भंग या द्राक्षा वर्ण वन्यास्ता नो भावे राधिकायांतु मेरे हृदय में और कोई भावुरित ना हो केवल राधा किशोरी जो यत सौंदर्यम यद वयो ये च भावा या वैद्या या गौरांग भंग्या जिनका अद्भुत सौंदर्य जिनकी अद्भुत अवस्था जिनके अद्भुत भाव जिनकी अद्भुत प्रवीणता चातुर्यता और जिनके श्री अंग की अद्भुत गौरांग शोभा उनकी भाव भंगिया बस यही मेरे हृदय मेंित हो और कोई भाव और कोई विचार मेरे हृदय में स्फुरित ही ना हो।

कुंजे कुंजे तिरंगा विहरतो यत्र राधा ब्रजु वृक्षे वृक्षे च यत्र प्रविलसत महा दिव्य गंध प्रसम पुष्पे पुष्पे मद कृत मधुपकुलम शमा नामघम मोघम जन्मा सर्वम तव यदि भजसे न वृंदावनम तत जहां कुंज कुंज में गलवया दिए हुए श्री राधा और ब्रज श्री लाल जो महाराज अति आनंद में विभल होकर के विचरण कर रहे हैं। वृक्ष वृक्ष से अद्भुत सुगंध आ रही है। खिले हुए पुष्पों के गुच्छे उन पुष्पों पर पुष्पे पुष्पे मदंधीकृत मधुबकुलम भवरे गुंजार कर रहे हैं और अमृतमई बूंदे गिर रहे सघन कुंजे बड़ी अद्भुत शोभा कुंज की रिमझिम रिमझिम वर्षा हो रही एकदम तेजोमय कांतिमय पत्ते सब झुके हुए फूल खिले हुए कभी बिजली तड़क रही है कभी मेघ बरस रहे हैं भवरे गुंजार कर रहे हैं मयूर कोकिला और प्रिया प्रीतम भावना करो अद्भुत जननी घन अरुदामिनी [गाना गाने की आवाज़] चातिक पिक सुख बोलति मुरनी चातिक पिक सुख बोलति मोरनी श्याम घटा काजर हूं ते कारी उमड़ी उमड़ी आई चहुनी गरजनी घन अरुदामिनी मेघ गरज रहे बिजली चमक रही चारक पिक शुक और मोर इनकी आवाज गूंज रही है श्याम घटा काजल हु तेरी रिमझिम रिमझिम बूंदे मोरों की आवाज भावना करो आसपास मयूर के झुंड के झुंड आ गए।

डालों पर बैठे हुए सुख सारिका कोकिला ये या [चीखने की आवाज़] आ [चीखने की आवाज़] बहुत प्रिय [चीखने की आवाज़] वर्षा ऋतु है प्रिया प्रीतम को बहुत प्रिय दोनों के श्री अंगों में बहुत छोटी छोटी बूंदे नानी नानी बूंदनी बरसनी लाग्यो तैसी ये रोचक पवन झकोरनी हित ध्रु प्यारी प्यार सो झूलत पीह झुलावत नैननी कोरनी एक दूसरे के नेत्रों में नेत्र डाले ऐसे विलोक रहे हैं एक दूसरे के नेत्रों में जैसे बहुत समय की प्यारी चकोरी चंद्रमा को देख रही हो या चकोर दो चकोर दो चंद्रमा नागर नव किशोर मिथुन मनस चोर दोनों एक दूसरे के चित्त को चुरा रहे हैं।

नेत्रों में नेत्र एक तक अपलक नानी नानी बूंदे हो रही। चातक पक्षुक मोर बोल रहे अद्भुत लताएं हैं झूम झूम करके सुगंध शीतल मंद वायु भवनों का गुंजार चारों ओर से घटाएं उमड़ कर के आ रही है। बिजली चमक रही है। और छोटी छोटी बूंदे श्यामा श्याम एकटक नेत्रों पर नेत्र मिलाए हुए ललित लता तर नानी नानी बूंदे पर भजत रंग ले दो प्रीतम प्यारी ललित लता नित तरे ऐसी लताएं ललित हैं सुंदर है प्यारी है कि करोड़ों कल्प तरु मिलकर के वृंदावन की एक लता की समानता नहीं कर सकती वृंदावन की लता सम कोटि कल्प तरुणा ऐसे पत्तों की कांत है वृंदावन द्विती पत्र की उपमा को कछु ना कोटि कोटि बैकुंठ तेम कहे जाए यह वृंदावन है ललित लता नितरे सुंदर लता है प्रिया जी तब एक दूसरे के नेत्र में

नेत्र मिलाए नानी नानी बूंदे परे सुखद बूंदे बड़ी बड़ी दुख देने वाली नहीं चोट लग जाए अति सुकुमारी लाडली पी किशोर सुकुमार ऐसा नहीं छोटी छोटी फहिया बरस रही नानी नानी बूंदे पर भजत रंगीले दो प्रीतम प्यारी दो भदे हैं दोनों प्रकार की वर्षा में एक तो मेघ की वर्षा और एक प्रेम वर्षा एक दूसरे के नेत्रों में जो प्रेम बरस रहा है उसमें दोनों भी रहे और ऊपर से जो मेघ बरस रहा है उसमें भीज रहे हसी हसी बातें करे भज मूल अंश धरे पत पट पीत तन सुरंग कसुमभी सारी रिमझिम रिमझिम धीमी धीमी बूंदे जो गिरी उनसे वस्त्र श्री अंग में स्पर्श कर रहे श्री अंगों का दर्शन हो रहा है और हंस हंस कर प्रिया प्रीतम बात कर रहे हैं भुज मूल अंश धरे मनो मनाल भूषण भूषित भुज श्याम अंश पर डारी और लाल प्रियाजु के गले में दोनों गलवहिया दिए हुए लता के नीचे खड़े हैं।

नानी नानी बूंदे बरस रही जिनसे नीलांबर और पीतांबर कुछ गीला हो गया जो श्री अंगों की शोभा को और प्रकाशित कर रहा है। और हंस हंसकर प्रिया प्रीतम बात कर रहे हैं बीवी बदन छवि रही कछु फवी उपमा ना जात कछु मन में बिचारी युगल सरकार के मुखारविंद पर छोटी छोटी नानी नानी बूंदे ऐसे इतनी सुंदर शोभा हो रही कि उपमा कहते नहीं बनती कैसे उपमा देवलोक भूलोक रसातल सुन कवि कुल मत डरिए सहज माधुरी अंग अंग की कह कास पटरिए कैसे उपमा दे त्रिभुवन में कोई उपमा है ही नहीं रसिक उभय उदार गावत राग मल्हार हित ध्रुव सुनी तान देत प्राण वारी ललित लता नित नानी नानी बूंद परे भजत रंगीले दो प्रीतम प्यारी अब युगल सरकार मल्हार राग गा रहे है ऐसी अद्भुत गायन शैली प्रिया प्रीतम की हित ध्रुवदास जी कहते सब सखिया प्राण न्योछावर कर रही दोनों युगल सरकार कभी गान करते हैं कभी हंसी हंसी बातें करें कभी बातें करने लगते हैं।

दो जल भीत अटके बात सघन कुंज के द्वारे ठाड़े अंबर लपटे गातन लताओं के नीचे से बात करते हुए युगल सरकार कुंज द्वार पर आए। श्री ललिताजु ने देखा इनके वस्त्र तो नानी नानी बूंदों से भी गए हैं और इनको शुद्ध भी नहीं है। यह बात में मगन है। एक दूसरे की रूप माधुरी पान करते हुए हंस हंस कर बात कर रहे हैं। तो ललिता ललित रूप रस भीनी बूंद बचावत पातन वृक्षों के बड़े बड़े पत्ते ऐसे प्रिया प्रीतम के ऊपर करके बूंदों से रक्षा कर रही ललिता जो श्री लाडली लाल की बूंदों से रक्षा कर रही बचा रही पत्तों के द्वारा वृंदावन के बड़े पत्ते लेकर ऐसे ललिता ललित रूप रस भीजी युगल सरकार की वो परस्पर चितवन और हंस हंस कर बातें करना इस पर भीजी हुई इसमें डूबी हुई इसका रसास्वादन करती हुई श्री ललिता जो पत्तों से बूंदे की ओ बता रही जय श्री हित हरिवंश परस पर प्रीतम मिलवत रति रस घातन परस्पर प्रीतम मिलवत रति रस घातन श्री हित सजनी जो कह रही है कि एक दूसरे से प्रिया प्रीतम श्यामा श्याम प्रेम केल के नेत्रों से जो दाव पेच हो रहे हैं वो सखियां ही जानती है।

एक दूसरे से प्रेम केल के दाव पेच लगा रहे हैं। ललिता जी रूप रस में भीजी हुई पत्तों से बूंदों की रक्षा कर प्रिया प्रीतम को बचा रही और लाडली लाल परस्पर बात किए हुए रस में भी हुई है। श्रीपाद कह रहे हैं कुंजे कुंजे तिरंगा दहा विहरतो यत्र राधा ब्रजेंदु कुंज कुंज में नवीन नवीन रंग कभी झूला हो रही और ऋतुएं ऐसा नहीं कि समय वर्षा चल रही तो वर्षा ही चलेगी। जिस समय जिस कुंज में जैसी प्रिया प्रीतम के सुख की वृद्धि करने की भावना सखियां करती वैसे ही कुंज ऋतु को धारण कर लेता है।

वृक्षे वृक्षे चयत्र प्रविलसत महा दिव्य गंध प्रसूनम वृक्ष वृक्ष के नीचे अलौकिक लीला मानो प्रिया प्रीतम की आंतरिक इच्छा है कि हम दोनों एकांत में बात करें तो वही लता एकदम ऐसे छा गई कि वहां किसी की दृष्टि ही नहीं जा सकती। और ऐसी लता के अंदर तत्काल भावना हुई कि रास करे तो ऐसा विशाल स्वरूप हो गया। उसी के नीचे रास प्रारंभ हुआ। वृक्ष वृक्ष चत्र प्रसति जहां जैसी भावना वैसे ही लता रूप धारण कर लेती है। ये दिव्य चिदानंदमय लताएं हैं। शीतल मंद सुगंध प्रवाहित हो रही है।

पुष्प पुष्प के पराग को पान करके भरे मतवाले हो रहे हैं। मोघम जन सर्वम तव यदि भजसे न वृंदावनम तत तुम्हारा जीवन व्यर्थ है यदि तुमने ऐसे प्रिया प्रीतम का भजन नहीं किया ऐसे प्रिया प्रीतम का आश्रय नहीं लिया ऐसे प्रिया प्रीतम की सेवा नहीं की रात दिन हम अपने श्यामा श्याम में आसक्त चित्त वाले बने नाम कीर्तन नाम जप मंत्र जप वाणी गायन सेवा वा इसी से हम आसक्तित हो जाएंगे। धाम में हो तो फिर कहना ही क्या है? अगर धाम में नहीं तो धाम का आश्रय लेकर पर नाम वाणी सेवा ही हमारा जीवन हो जाए।

नाम वाणी सेवा जिसके ये तीन बातें जीवन में है वह त्रिगुणातीत होकर प्रिया प्रीतम के निकुंज में निश्चित प्रवेश करेगा। चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण भगवान ऋषभ देव जी जिनके 100 पुत्र सबसे बड़े महाराज भरत जी जिनके नाम से इस अजनाब वर्ष अजनाब खंड को भारत देश कहा गया। भरत जी से सब जो छोटे पुत्र हैं सब महापुरुष हैं। नौ तो नौ खंड के राजा हुए और एक नौ नौ योगेश्वर हुए और 81 याज्ञिक ब्रह्म ऋषि हुए भगवान ऋषभदेव जी के पुत्र समस्त प्रजा को और अपने पुत्रों को भगवान ऋषभदेव जी उपदेश कर रहे हैं।

बहुत ध्यान से सुनना चाहिए। परम मंगलमय उपदेश है ऋषभ उवाच नायम देो देह भाजा त्रिलोके कष्टान काम नरहते विभुजा ये तपो दिव्यम पुत्रकाय सतम शुद्ध धस्मात ब्रह्म शौख्यम त्वंतम महत सेवा द्वार माहुर विमुक्त तमो द्वारम योिताम संग संगम महंतस्ते समिति प्रशाता विमन्यवा सुदा साधवो भगवान ऋषभदेव जी ने पुत्रों से कहा इस मृत लोक में मनुष्य शरीर दुखमय विषय भोग प्राप्त करने के लिए नहीं मिला है। यह विषय भोग तो कुत्ता सूअर आदि को भी प्राप्त है। पक्का समझिए। जैसे आप स्त्री सहवास कर सुख लेते हैं।

ऐसे हर पशु पक्षी को सुख प्राप्त होता है। जैसे आप नींद का भोजन का ऐसे सबको मिलता है। निद्रा भय आहार मैथुन ये सबको समान सुख प्राप्त है। ये मृत्य लोक में मनुष्य शरीर दुख में विषय भोग भोगने के लिए नहीं है। [गला साफ़ करने की आवाज़] यह विषय भोग तो सुकर कुकर को भी प्राप्त है। सूअर कुत्ता को भी प्राप्त है। इस शरीर से दिव्य तप करके परमात्म प्राप्ति करने के लिए हमको भेजा गया है। तपस्या तपस्या क्या? काम का वेग, क्रोध का वेग, भूख का वेग, वाणी का वेग, वर्षा, गर्मी, सर्दी सब कुछ सहना।

भजन ना छोड़ना किसी भी परिस्थिति में मान अपमान निंदा स्तुति सब वेगों को सहना द्वंदों को सहना यही तपस्या है ततीक्षा सहनशील स्वभाव यही तपस्या है किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं जैसी परिस्थिति हम उसमें राजी हैं। हर कष्ट को सह रहे हैं। इस शरीर से दिव्य तप ही करना चाहिए क्योंकि बिना तपस्या के अंतःकरण पावन नहीं होता। बात समझ लो बिना तप के श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझे ना अलप तप समझो श्री हरिवंश कृपा सेवो धर्म जप सेवक जी महाराज कह रहे यह निकुंज रस छोटी मोटी तपस्या वाले को प्राप्त नहीं होता बड़ी तपस्या जिसकी हो श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझ ना अलप तप थोड़े तप वाला हरिवंश धर्म को नहीं समझ सकता यद्यपि ये प्रसिद्ध धर्म है प्रेम धर्म समझो श्री हरिवंश कृपा हरिवंश कृपा से समझ सकते हो क्या हरिवंश चंद्र जो ने कहा श्याम श्यामा पद कमल संग सिर नायो तेन वचन मानत गुरु द्रोही निश दिन करत आपनो भयो तो इत व्यवहार नत परमार्थ बीच ही बीच जो जन्म गवायो जो धर्म सो प्रीति करत नहीं कहा भयो धर्मी जो कहा करो श्री हरिवंश उपासक संग जो प्रीति तरंग सुरंग भयो सेवक जी महाराज कह रहे हरिवंश धर्म को छोटे तप वाला नहीं समझ सकता महान तपस्वी समझ सकता तो महान तप क्या है?

भगवत प्रेमी महात्माओं का संग, उनकी सेवा, उनकी आज्ञा में चलना, उनका सुमिरन करना। श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझ ना अलप तप समझो श्री हरिवंश कृपा क्या सेवहु धर्मन जप जो रसिक जन है भगवत प्रेमी महात्मा है उनकी सेवा उनका सुमिरन उनकी आज्ञा पालन इसी परम तप के द्वारा आप प्रेम धर्म को समझ पाएंगे भगवत प्राप्ति कर पाएंगे तो इस शरीर से दिव्य तप करना चाहिए क्योंकि बिना तप के अंत अंतःकरण पवित्र नहीं होता और बिना अंतःकरण पवित्र हुए ब्रह्मानंद या भगवनंद की प्राप्ति नहीं होती।

शुद्धस्मात ब्रह्म सौख्यम तंतम जहां अंतःकरण शुद्ध हुआ अनंत सुख प्रदान करने वाले श्री भगवान का साक्षात्कार या ब्रह्मानंद दोनों जो चाहे वो प्राप्त कर सकता है। महत सेवा द्वार माहुर मुक्त स्तमो द्वारम योतािम संग संगम महापुरुषों का संग ही सेवा आज्ञा पालन भगवत सुमिरन इसमें रति प्रदान करता है और इसी से मोक्ष या प्रेम की प्राप्ति होती है और जो विषय पुरुषों कामी पुरुषों का संग है उससे नरक की प्राप्ति होती है महात सेवा द्वार माहुर विमुक्त तमो द्वारम योताम संग संगम जो योषित जो स्त्रण है जो कामी पुरुष हैं ऐसे कामी और कामिनी का संग करने से नरक की प्राप्ति होती है और भगवत प्रेमी महात्माओं का संग करने से सेवा सुमिरन स्वाध्याय भगवत आराधना में रति होती है जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है या प्रेम की प्राप्ति होती है महंतस्ते समचित प्रशामन्य सुदा साधो महा महापुरुष कौन है?

जिनके संग से भगवत प्राप्ति हो जाती है। जिनके संग से मोक्ष प्राप्त हो जाता है। उन महापुरुष के लक्षण क्या है? बोले महंत तस्ते समचित जिनकाित समता को प्राप्त हो गया है। मान अपमान में दुख सुख में अपने यहां तो तीसरी भूमिका में ही समता आ जाती है। शत्रु मित्र समजानी मान अपमान सम दुख सुख लाभ नहान यह जो कृपा हरिवंश की कृपा की तीसरी भूमिका में स्थिति आ जाती है प्रथम भूमिका में मुख वर्णत हरिवंश चित्त नाम हरिवंश रति मन सुमिरन हरिवंश यह जो कृपा हरिवंश की हरिवंश शरणागत होकर निरंतर सुमिरन में मगन ये प्रथम भूमिका का फिर व्यवहार में सब जीवन सो प्रीति रीति निवा अपनी श्रवण कथन प्रतीति यह जो कृपा हरिवंश की दूसरी भूमिका व्यवहार में सबसे प्रेम का व्यवहार किसी से कोई बदले में चाह नहीं और अपने वाणी जी के

श्रवण कथन में दृढ़ विश्वास दृढ़ प्रतीति दृढ़ विश्वास तीसरी भूमिका सत्रमित्र समजानी दुश्मन में और मित्र में समान भाव मान अपमान सम मान में और अपमान में समभाव लाभ हानि में समभाव सुखदख में संभाव ये तीसरी स्थिति तीसरी भूमिका जागृत हो गई चौथी भूमिका भगवत प्रेम में डूबे हुए रसिक महापुरुषों का निरंतर सानिध्य प्राप्त होना नितिक धर्मन संग रंग बढ़त नित नित सरस तो नित नित प्रेम अभंग यह जो कृपा हरिवंश की और पांचवी भूमिका में निरखत नित्य विहार पुलकित तन लीला में प्रवेश महापुरुष कौन है जो कृपा प्रकरण में तीसरी भूमिका है वो समचित नाम किंचिन मात्र किसी में कभी भी विषमता ता नहीं ना किसी से राग ना किसी से द्वेष सब में एक अपने आराध्य देव को देखना यही क्षमता है सर्वान वस्तुत निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्ध मम मेरे राधा वल्लभ लाल सब में विराजमान है तो समचित प्रशांतता कैसी भी स्थिति आवे हृदय में हलचल नहीं होनी चाहिए चाहे जितनी सुखद स्थिति हो या दुखद वही शांत शांति स्थिति वही भजन परायण स्थिति ये महापुरुषों के लक्षण

है। सबके प्रति समान भाव किसी भी परिस्थिति में उद्वगिन या शोभ ग्रसित ना होना भगवत विस्मरण ना होना हर समय भगवत स्मृति में डूबा हुआ शांत स्थिति चाहे जितनी भयाव स्थिति हो चाहे जितनी सुखद हो ना सुखद में हर्ष है ना भयावा में उद्विग्नता है एकमात्र शांत स्थिति शाकारकारम तो प्रशांत ता परम शांत फिर आगे विमन्यवा विमन्यवा क्रोधहीन कितना भी कोई गुस्सा दिलाए कभी गुस्सा ना जब प्रशांत है तो उसमें गुस्सा आ ही कैसे सकता है जो समचित प्रशांतता तो अपने आप स्थिति आ जाएगी विमन गोस्वामी जी मानो इसी की टीका कर रहे हैं।

उमा राम चरण रत बिग काम मद को निज प्रभु में देखह जगत तो के सन करह विरोध सर्वत्र जब अपने भगवान को देख रहे तो किससे विरोध करेगा किससे क्रोध करेगा तो प्रशांता समचित जो सर्वत्र अपने प्रभु को देखता है। हर परिस्थिति में भगवत स्मरण परायण शांत रहता है और क्रोधहीन है। क्रोध कामना से आता है। जब हमारी कामना में बाधा पड़ती है तो क्रोध जागृत हो जाता है। और जब कामना की पूर्ति होती है तो लोभ जागृत हो जाता है। विमन्यवा क्रोधहीन शदा साधो ये जो सबका मंगल कैसे हो ऐसे स्वभाव वाला है जिसका सदैव यही चिंतन रहता है कि सबका मंगल कैसे हो वो महापुरुष है जो समचित जो प्रशाता जो क्रोध रे विमन्यवा और जो सुदा सबका सुहद है सर्वभूत हते ता सबका मंगल चाहता है।

सबका हित चाहता है। सबका कल्याण चाहता है। सबका हित चिंतक साधो सदाचार परायण चरित्र जिसका पवित्र है। ऐसे महापुरुषों का संग मोक्ष का खुला हुआ द्वार है। ऐसे महापुरुषों का संग निश्चित भगवत प्राप्ति करा देता है। जो समचित है, जो प्रशांत है, जो क्रोध रहित है, जो सबका हित मंगल सोचते रहते हैं और जिनका चरित्र पवित्र है, निष्कलंक चरित्र है, येवा मई से कृत शदार्थ जनेु देहम भरतिकेशु गहे सुजायात्मज रात मत्सु न प्रीत युक्त यावद लोके जो केवल मुझ परमात्मा में ही प्रेम करना मेरा ही चिंतन करना एकमात्र जिनका पुरुषार्थ है उन्हें महापुरुष कहते हैं।

महापुरुष किसे कहते हैं? पीछे बताया जो समचित हैं, प्रशांत है, क्रोध रहित है, सबका हित चिंतक करते हैं और जिनका चरित्र पवित्र है। और जिनकी एकमात्र भगवान में स्थिति है। हर समय भगवान के चिंतन में जिनकी स्थिति है। विषयों की ही चर्चा करने वाले लोगों में स्त्री में आसक्त, पुत्र में आसक्त, धन में आसक्त और सब सामग्रियों से भरे हुए घरों में जो आसक्त है ऐसे लोगों का संग नरकगामी बनाता है। और जो एकमात्र भगवान में आसक्त है। वही भगवत प्राप्ति करा सकते हैं। ऐसे ही महापुरुषों का संग करना चाहिए।

अगर ऐसे महापुरुष गृहस्थ हुए गृहस्थ में भी तो वह विषय चर्चा करने वाले स्वभाव वाले नहीं होंगे। वो स्त्री पुत्र धन आदि में आसक्त नहीं होंगे। वो भोग संपन्न घरों में अरुचि मानने वाले होंगे। वो केवल शरीर निर्वाह के लिए धर्म पूर्वक कर्म में प्रवत्त होते हैं। उनकी कोई फलाकांक्षा कोई कामना नहीं होती। ग जाया जरा मत न प्रीति युक्त याद लोके ना उनकी स्त्री में आसक्ति है ना पुत्र में ना धन में ना घर में ना परिवार में फिर भी वह घर परिवार में रहते हुए धर्म पूर्वक आचरण करते हैं फल की आकांक्षा रहित स्थिति नूनम प्रमत्त कुरते विकर्म यदि इंद्रिय प्रीत प्रणोती न साधु मनने यत आत्मनो मसपी क्लेश दयास देहा ये जो मनुष्य भगवत प्रेमी महात्माओं का संग नहीं करते उनकी बुद्धि कुमति हो जाती है।

उसे होती सबके अंदर दो बुद्धि होती है। कुमति और सुमति। पर जब हम साधु संग करेंगे तो कुमति को दबाकर नष्ट करके सुमति जागृत हो जाती है। और जब हम सांसारिक पुरुष का संग करेंगे तो सुमति को दबाकर कुमति बढ़ जाती है। तो जब कुमति बढ़ जाती है कुसंग से तो मनुष्य प्रमादवश प्रमाद कहते हैं ना करने योग्य कार्य को करना और करने योग्य कार्य को ना करना। प्रमाद वश वो कुकर्म करने लगता है और जब उसकी कुकर्म में प्रवृत्ति होती है शास्त्र विरुद्ध पापाचरण को कुकर्म कहते हैं।

उसकी यह प्रवृत्ति इंद्रियों के तृप्त करने के लिए होती है। पर तृप्ति जब कुछ हो तब ना हो। तृप्ति होती नहीं। अब वो पाप पे पाप कर्म करता चला जाता है। भगवान ऋषभदेव जी कहते हैं पुत्रों मैं इसे अच्छा नहीं समझता क्योंकि आत्मा को यह असत दुखदायक बंधन इनहीं कर्मों से प्राप्त हुआ है। इस शरीर को मैं मान करके इंद्रियों को तृप्त करने के लिए शास्त्र विरुद्ध कुकर्म पापाचरण करने से जीव की दुर्गति हो जाती है। जब जीव को आत्म तत्व की जिज्ञासा नहीं होती तब वह देहाभिमान वश रहता है।

देह को ही अपना स्वरूप मानता है। मैं मानता है और देह को जब तक मैं मानता है तब तक वो लौकिक कर्मों में और विषयों में फंसा रहता है। बिल्कुल सीधी बात है। और उसके मन में कर्म की वासनाओं की बाढ़ रहती है। यह कर लिया, वह कर लेंगे, यह भोग लिया, वह भोग लेंगे। ऐसा इतना जमा कर लिया, इतना हो जाए, इतना और मर गया और सब ऐसे ही पड़ा रहा। इसी से इसको जन्म मरण की प्राप्ति होती है। फिर समझिए जिसको आत्म तत्व की जिज्ञासा नहीं होती, मैं कौन हूं? मेरा लक्ष्य क्या है? मैं यहां क्यों आया हूं?

कब तक यह भटकता रहूंगा? तो उसे शरीर में मैं बुद्धि रहती है। आत्म जिज्ञासा ना होने के कारण। और शरीर में मैं बुद्धि होने के कारण वो इंद्रियों के भोगों में और कर्मों में फंसा रहता है। और उसके हृदय में बहुत सी कर्म वासनाएं, भोग वासनाएं जिसके कारण बार-बार देह, बंधन, जन्म, मृत्यु उसे प्राप्त होता है। इस प्रकार अज्ञान अविद्या के द्वारा अपने आत्म स्वरूप के ढक जाने से कर्म वासनाओं के वशीभूत हुआित वो कर्मों में ही घूमता रहता है। जब तक मुझ परमात्मा में मुझ भगवान में निरंतर चिंतन करके प्रीति नहीं होगी तब तक ये देह बंधन छूट नहीं सकता।

एवं मन कर्म वसम प्रते अविद्या माने प्रीति नयावन म वासुदेव न मुचते देह योगे न तावत इस अविद्या के द्वारा अज्ञान के द्वारा आत्मज्ञान ना होने पर उसे यह महसूस होता है मैं स्त्री हूं मैं पुरुष हूं और इसी इसी से कर्म वासनाओं से उसका चित्त भटकता रहता है। जब तक मुझ वासुदेव भगवान में प्रीति नहीं होगी तब तक ये आवागमन का बंधन नहीं छूटेगा। यह जीव पागलों की तरह चेष्टा किए जा रहा है। किए जा ये पता नहीं हर चेष्टा का फल है। तुम्हें भोगना पड़ेगा। बस किए जा रहा है।

जब तक विवेक दृष्टि का आश्रय लेकर इंद्रियों को भोगों से नहीं हटाएगा। इंद्रियों की मांग को मिथ्या नहीं मानेगा। इंद्रियों की मांग को हम सत्य मानते हैं। सुखमय मानते हैं। तभी हमारे आचरण बिगड़ जाते हैं। जब हम इंद्रियों की मांग को मिथ्या माने। यह व्यर्थ फसाने वाली मांग कर रहे हैं। जब तक विवेक दृष्टि का आश्रय लेकर इंद्रियों की चेष्टाओं को मिथ्या नहीं देखा मिथ्या नहीं माना तब तक उसे आत्मज्ञान की स्मृति नहीं होती और वो अज्ञान वश विषय प्रधान शरीर में घर में स्त्री में पुत्र में आसक्त होकर तरहतरह के क्लेश उठाता रहता है।

वैसे ही भगवान की माया का बड़ा विचित्र बंधन है। फिर स्त्री और पुरुष इनका जो दांपत्य सुख बंधन है ये तो बहुत विचित्र है। पंडित जन कहते हैं ज्ञानी जन कि जड़ चेतन की एक ग्रंथि तो बंधी है ही है जो ना होने पर भी बहुत जोर की बंधी है। और ऊपर से और दांपत्य सुख की स्त्री पुरुष की ऐसी आसक्ति प्रकट होती है भगवान की माया की उसको पता नहीं मिनट का और वादा करते हैं बोले सात जन्म तक हमारा आप कहो फिर कहते हैं सात जन्म नहीं जन्मजन्म तक मतलब पूरा काल पूरा सिस्टम इनके अधीन हो गया पूरा सिस्टम अधीन है वो कह रहे कि हम अब तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे एक जन्म नहीं और सात जन्म जन्म तक और सात जन्म नहीं जन्म जन्म तक हम तुम्हारा निर्वाह करें।

मतलब इतना बड़ा वो महापुरुष हो गया कि पूरे सिस्टम को रोक करके जन्मजनम उसी के साथ रहेगा। एक जगह साथ रह सकते हो। दोनों मिलकर भजन करो और भगवान का चिंतन करते हुए दोनों शरीर छोड़ो तो एक ही जगह पहुंच जाओगे। तो एक ही जगह पहुंच जाओगे। यह दांपत्य भाव स्त्री पुरुष की आसक्ति बड़ा अभेद बंधन अभेद बंधन देहाभिमान रूपी एक एक सूक्ष्म ग्रंथि तो पहले से ही है इसी कारण जीव को देह में इंद्रियों में घर में खेती में पुत्र में स्वजन में धन में मैं मेरापन हो गया यही बंधन है कुछ नहीं अभी शरीर छूट जाए कुछ नहीं तुम्हारा कुछ नहीं।

जिस समय भगवान का विस्मरण करके जीव देह में आसक्त हो जाता है तो घर में आसक्त, खेत में आसक्त, पुत्र में आसक्त, स्वजन में आसक्त, धन में आसक्त। ऐसी आसक्तियां पैदा होती है मैं मेरे की। भगवत प्राप्ति की तो बात जाने दो। गांव गली में तुम देखो बैठे। यहां तो वृंदावन में ये तो भगवत धाम है। गांव गली में कहीं भगवत चर्चा नहीं। कोई भगवत प्राप्ति का लक्ष्य नहीं। बस वही रुपया पैसा बेटा बेटी वही बस यही भगवान की प्रचंड माया। जिस समय सत्संग मिलता है तब यह ग्रंथियां ढीली होने लगती है तब ग्रंथियां ढीली जब सत्संग मिलता है अगर तभी कहा गया है कि सुत दाराधन लक्ष्मी पापियों के घर हो संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दो तब ये हृदय ग्रंथि ढीली होती है उसी समय ये जितने बंधन है सब काटने को दौड़ने लगते हैं कहां कहां भाग के जाऊं?

कैसे क्या करूं? कैसे हमें पिंड छूटे और भगवत प्राप्ति हो। यह अंदर भाव। संसार के भूत ये अहंकार को त्याग कर जो भगवान के भजन में लग गया वही चतुर सुजान है। वही मुक्त हो जाता है। वही परम पद प्राप्त करता है। हंसे गुरु मक्तान वि कृष्णया द्वंद तितयाच सर्वत्र जंतु व्यसनागत जिज्ञासया तपसे निवत्या इस संसार सागर से जो पार कराने में कुशल हैं धैर्यवान है जो उद्यम परायण है ऐसे संतों का संग करना चाहिए संसार सागर सागर से पार कराने में कुशल कौन सा अनुष्ठान कौन सी सेवा कौन सा पाठ कौन सा भजन ऐसे चलो ऐसे चलो ऐसे महापुरुष को अपनी आत्मा गुरु स्वरूप से वरण करना चाहिए हंसे गुरु म भक्तनवत्या सबके आत्म स्वरूप भगवान ही गुरुदेव है गुरुदेव ही भगवान है जो संसार सागर से पार करने में कुशल धैर्यवान उद्यम ऐसे सबके आत्मस्वूप गुरु स्वरूप से वरण करें।

भगवत प्राप्ति के लिए गुरुदेव का वर्णन करना बहुत सोच समझ के। किसी के प्रवचन सुनकर प्रभावित होकर गुरु नहीं बनाना चाहिए। बहुत समय तक इंतजार करना चाहिए। मिलना जुलना दर्शन संभाषण और जब यह लगने लगे कि यह मेरे भगवान हैं बस जब गुरु बना ले फिर दोष दर्शन ना करे फिर वहां अपने दुर्गति का कारण उपस्थित ना करे द्रोह ना करे सहसा किसी को गुरु बनावे नहीं और गुरु बनावे तो गुरु और भगवान भगवान और गुरु में तनिक भी भेद नहीं तो वहां दोष दर्शन की संभावना ही नहीं हंसे गुरु मई भक्त विष्णया द्वंदया मुझ गुरु स्वरूप में सदैव भक्ति भाव भक्तवत्त एक एक वृत्त श्री सद्गुरु स्वरूप भगवान में अर्पित करनी चाहिए।

उनकी आज्ञा में सोने से जागने तक जागने से सोने तक प्रत्येक चेष्टाएं गुरु आज्ञा में होनी चाहिए। भगवान की प्राप्ति गुरुदेव की कृपा से है। गुरु कृपा ही केवलम गुरुदेव ही भगवान है। भगवान ही गुरुदेव है। उनकी आज्ञा में जीवन समर्पित कर दे। वो धन्य भाव कोई बिरला ही होता। मनमानी तो मनमानी तो पूरा सृष्टि चल रही। गुरु मानी कोई बिरला ही होगा। और जो गुरु मानी होगा वो भगवत परायण होगा। सर्वत्र जंतु विषनावगत्या जिज्ञासया तप सेहा निवत्या मत कर्मभ मत कथया च नित्यम मत देव संद गुण कीर्तन में निर साम्य सम पुत्रा जिहा सया दे गात्म बुद्धि मेरे पराय हो जाए और भोगों की तृष्णा का त्याग कर दे।

भोगे हुए भोगों का जो स्मरण होता है और फिर भोगने की इच्छा होती है उसी का नाम तृष्णा है। मेरे परायण रहे। तृष्णा का त्याग कर दे। सुख और दुख में समान भाव रहे। हर योनि में दुख उठाना पड़ता है। तो यह जो हमें मनुष्य देह मिली इसमें हम दुख भोग कर पवित्र हो रहे हैं। भोगना चाहिए। घबराना नहीं चाहिए दुख से। जितना दुख मिलेगा उतना ही हम पवित्र होकर भगवान की तरफ बढ़ रहे हैं। तत्व जिज्ञासा से तपस्या से सकाम कर्मों के त्याग से मेरे लिए ही कर्म करने से मेरी कथाओं को रोज सुनने से मेरे भक्तों के संग मेरा नाम कीर्तन करने से किसी से भी सृष्टि में वैर ना करने से समता से शांति से शरीर घर आदि में मैं मेरे पन भाव को त्यागने की इच्छा से रोज शास्त्र स्वाध्याय से कुछ समय एकांत सेवन से प्राण इंद्रिय और मन के संयम से शास्त्र और संत पुरुषों के वचन सुनकर उनमें यथार्थ बुद्धि रखने से पूर्ण ब्रह्मचर्य से कर्तव्य कर्मों को निरंतर सावधान होकर करने से मौन से मेरी ही सत्ता देखने से, अनुभव ज्ञान सहित तत्व विचार से, योग साधना से इन सब साधनों से जो वर्णन किए गए अहंकार का नाश हो जाता है और लिंग शरीर लीन हो जाता है।

वो मोक्ष पद भी प्राप्त कर लेता है। कोई साधन पकड़ लो। इतने साधन बताए भगवान ऋषभ देव जी ने। पहली बात संत महापुरुषों का संग मोक्ष प्रदान करने वाला कामिनी कामी विषय पुरुषों का संग नरक प्रदान करने वाला कैसे संत महापुरुष होते हैं तो बोले समचित प्रशांत क्रोध रहित सबका कल्याण चाहने वाले और सदाचार परायण अर्थात पावन चरित्र ऐसे संतों का जब संग किया जाता है तो हमारे हृदय में भागवतिक साधन उदय हो जाते हैं। हम सदगुरुदेव का वर्णन करें। आत्म स्वरूप सदगुरुदेव मेरी आत्मा सदगुरुदेव भगवान सदगुरुदेव भगवान मेरी आत्मा है और अनन्य भाव से उनकी भक्ति करने से भगवान के परायण से भोगे हुए भोगों का त्याग करने से सुख दुख में समान भाव हर योनि में दुख भोगना है तो मनुष्य योनि में दुख भोग करके भगवान को प्राप्त कर लेंगे अन्य योनियों में जाना ही नहीं पड़ेगा इस विचार से तत्व जिज्ञासा से तपस्या से सकाम कर्म के त्याग से भगवान के लिए ही कर्म करने से भगवान की रोज कथाएं सुनने से भक्तों के संग नाम कीर्तन करने से बैर त्याग से क्षमता से शांति से शरीर घर आदि में मैं मेरेपन के भाव का त्याग करने से अध्यात्म शास्त शास्त्रों का स्वाध्याय करने से कुछ समय एकांत सेवन का स्वभाव बनाने से प्राण इंद्रिय और मन के संयम से संत पुरुषों के वचन पर बिल्कुल सत्य बुद्धि रखने से पूर्ण ब्रह्मचर्य से मौन से सर्वत्र भगवान की सत्ता देखने से यह योग साधना से अहंकार नष्ट हो जाता है।

लिंग शरीर लीन हो जाता है। और वह परम पद का अधिकारी होता है। मनुष्य को चाहिए सावधान रहकर अविद्या के द्वारा बंधे हुए हृदय ग्रंथि को गुरुजनों के उपदेश से शास्त्र ज्ञान से काट डालो। इसी जन्म में काट डालो। क्या हृदय ग्रंथि है? मैं स्त्री हूं, मैं पुरुष हूं। वैसे मैं अविनाशी चैतन्य परमात्मा का अंश हूं। पर अज्ञान के कारण मैं अपने को स्त्री पुरुष मान रहा हूं। यह हृदय में ग्रंथि जो पड़ गई है इसे गुरुदेव के द्वारा दी हुई उपासना से काट डालो। शास्त्र के वचनों का मनन करके इसे मिटा दो।

मैं ना स्त्री हूं ना पुरुष हूं। मैं भगवान का अंश भगवत स्वरूप हूं। क्योंकि यही ग्रंथि जड़ चेतन ग्रंथि इसी में सारे कर्म करने का उत्साह कर्म संस्कार वासनाएं भोग वासनाएं इसी में रहती है। इसी में अहंकार रूपी देहाभिमान रूपी महल में ये कर्म रहते हैं। कर्म संस्कार रहते हैं। भोग वासनाएं रहती है। यही और जब देहाभिमान नष्ट हो जाए तो सब साधनों को छोड़ दे। अब कर्ता भाव भी गया साधन का। अब जो हो रहा है वह गुणानुगुण वर्तते और वो अपने स्वरूप में है। जिसको हो अथवा मेरे अनुग्रह प्राप्ति को परम पुरुषार्थ मानता हो तो मेरी इस आज्ञा का पालन करें।

ऋषभदेव भगवान आज्ञा कर रहे हैं कि मेरे परम पद को प्राप्त करना, मेरी कृपा को प्राप्त करना तो मेरी आज्ञा का पालन करना। वही राजा राजा है जो अपनी प्रजा को भगवान के भजन में लगा दे। यह बात समझना है। पुत्रा शिष्यास नपो गुरुरवा मलोक कामो मनोग्रह इम विमन रन शिष्य दत्त ज्ञान न योत [गाना गाने की आवाज़] कर्मसुकर्म मूढा यदि राजा हो तो अपनी प्रजा को यही उपदेश करें कि भगवान का भजन करते हुए अपने कर्तव्य कर्म का पालन करो। इसी जन्म में भगवत प्राप्ति कर लो। यदि गुरु हो तो अपने शिष्य को यही शिक्षा दे कि अपने कर्तव्य का पालन करते हुए निरंतर भगवान का भजन करो।

नहीं तो इस जीवन का कोई लाभ नहीं है। यदि पिता हो तो अपने पुत्रों को यही शिक्षा दे। अज्ञान के कारण यदि शिष्य अपने गुरु के अनुसार ना चलकर कर्मों को परम पुरुषार्थ माने तो उन पर ज्यादा क्रोध ना करें समझा बुझाकर फिर उनको लावे और संसार के अंधकूप में ना गिरने दे उन्हें भगवान तक पहुंचावे गुरु वही है जो भगवत प्राप्ति करा दे पिता वही है जो भजन में लगावे राजा वही है जो अपनी प्रजा का कल्याण कर दे उन्हें विषय शक्ति युक्त काम कर्मों में फसने ना दे डाट के फटकार के दुलार के जैसे माने वैसे जैसे कोई अंधा पुरुष किसी अंधे कुएं के मार्ग में गिरने जा रहा हो तो नेत्र वाला उसे कैसे गिरने देगा आगे जाकर दौड़ के बचाएगा ऐसे गुरु अपने शिष्य को पिता अपने पुत्र को राजा राजा अपनी प्रजा को बचाए।

संसार रूपी अंधे कुएं में ना गिरने दे। उन्हें भगवान के भजन में लगाकर उनका कल्याण करें। ये संसारी लोग नहीं जानते कि अपना सच्चा कल्याण किस बात में है। ये लोग तो इतना जानते हैं कि यह भोग मिल जाए, यह रुपया मिल जाए, यह पद मिल जाए, ये जमीन मिल जाए। बस इतना इनको पता नहीं है कि सच्चा कल्याण किस बात में है। यह लोग तो क्षणिक सुखों में कुछ चंद रुपयों में भारी बैर ठान लेते हैं। एक दूसरे की हत्या कर देते हैं। ये विषय भोगों के लिए प्रयत्न करने वाले मूर्ख लोग हैं।

इनको नरक ना जाने दे। इनको दुखों की प्राप्ति के मार्ग में ना जाने दे। घेरे इनको प्यार से दुलार से डाट फटकार के जैसे बने इन्हें भगवान के मार्ग में लगावे और जो मूर्ख बिल्कुल ही बात नहीं मानते तो फिर अन्योन्य वैरा सुख लेस हेत रन दुखम च वेद मूढ़ा इन मूर्खों को मूढ़ों को बोले जहां सुख का लेस भी नहीं ऐसे घोर दुख में नरक की प्राप्ति होती है। बचा ले इन प्राणियों को बचा ले। भगवान ऋषभ देव जी उपदेश करते हैं कस्तम स्वयं तदभ विपश्चित अविद्याया मंतरे वर्तमानम दृष्टवा पुनस्तम सघना कुम प्रयोज यथाम गुरु नस्यात स्वजनो नस्यात पिता न सस्या जननी न सास्या दम न तत्स्या न पति सस्या नमो च समप मृत्यु इदम शरीरम मम दुभा्यम सतम हृदयम यत्र धर्म पष् कृतो में यद धर्म अतो माभम प्राहुरा्या तस्मात भवंतो हृदय न जाता सर्वे महया समम सनाभम अक्स्टष्ट बुद्ध्या भरतम भजम सुशम त भरणम प्रजा जैसे गड्ढे में दलदल में कोई गिरने जा रहा हो तो आंख वाला पुरुष उसे गिरने नहीं देगा।

उसे बचा लेगा। वैसे ही यह अज्ञानी जन अविद्या में फंसकर पाप कर्म की ओर दुख की ओर जा रहे हैं। कौन ऐसा दयालु संत होगा जो इनको बचाए ना जानबूझकर उसे कौन गिरने वाले मार्ग में जाने देगा या जाने की प्रेरणा करेगा। इसलिए वही गुरु गुरु है जो अपने शिष्य को भगवत संबंधी उपदेश करके मृत्यु की फांसी से बचा ले। वही स्वजन स्वजन है जो अपने स्वजन को भगवान के भजन में लगा दे। वही पिता पिता है जो अपने पुत्र को भगवान के भजन में लगा दे। वही माता माता है जो अपने पुत्र को भगवान के भजन में लगा दे।

वही देव देव है जो परम देव प्रभु में लगा दे। वही पति पति है जो अपनी पत्नी को भगवान के भजन में लगा दे। अगर नहीं तो गुरु गुरु नहीं। वो स्वजन स्वजन नहीं। वो पिता पिता नहीं। वो माता माता नहीं। वो देव देव नहीं वो पति पति नहीं। मैंने जो यह अवतार धारण किया है, यह बुद्धि गम्य नहीं है। यह बुद्धि से अतीत है। शुद्ध सत्य ही मेरा हृदय है। मैं सदैव परम धर्म में स्थित हूं। मैंने अधर्म को बहुत पीछे धकेल दिया है। इसीलिए मुझे ऋषभ कहते हैं। महान बलशाली। पुत्रों तुम सब मेरे अंश हो।

यह अपने 100 पुत्रों को नहीं कह रहे। हम सब उन्हीं के पुत्र हैं। पुत्रों तुम सब मेरे अंश से प्रकट हुए हो। मम वो गीता में भगवान श्री कृष्ण मानो ना हम गृहस्थ हैं हम स्त्री है हम पुरुष है यह वो पापाचरण करके दुर्गति ममो तुम मेरा अंश भगवान कह रहे हैं यहां भगवान ऋषभ जी कह रहे हैं तुम मेरे अंश हो मेरे से प्रकट हुए हो इसलिए ईर्ष्या मत्सर छोड़ो महा भागवतों की सेवा करो पुत्रों तुमसे सबसे बड़े जो भरत हैं ये महा भागवत है। इनकी सेवा करो। इनकी आज्ञा में रहो। यही तुम्हारा प्रजापालन कार्य भी करेंगे।

अन्य सब भूतों की अपेक्षा वृक्ष श्रेष्ठ है। 84 लाख योनियों में अन्य सब योनियों की अपेक्षा वृक्ष श्रेष्ठ है। वृक्ष में भी चलने वाले जीव श्रेष्ठ है। उनमें भी कीटाद श्रेष्ठ है। कीटाद से भी पशु श्रेष्ठ है। पशुओं में फिर मनुष्य श्रेष्ठ मनुष्यों में भी प्रमथ गण श्रेष्ठ प्रमथों में भी गंधर्व श्रेष्ठ गंधर्वों में भी सिद्ध श्रेष्ठ सिद्धों में भी देवता श्रेष्ठ देवताओं में किन्नर श्रेष्ठ उनसे असुर असुर से जो आदि देवता उन देवताओं से इंद्र देवता इंद्र देवता से ब्रह्मा जी ऐसे ब्रह्मा ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति आदि सर्व श्रेष्ठ पद पर जो ब्रह्मा जी भगवान शंकर और भगवत प्रेमी महात्मा मुझसे भी श्रेष्ठ है।

भगवान ने ये बात कही मेरे पूज्य कौन? बोले ब्रह्म ऋषि भगवत प्रेमी महात्मा सब भूतों में वृक्ष श्रेष्ठ उनमें चलने वाले जीव श्रेष्ठ उसमें कीटाद श्रेष्ठ उसमें पशु श्रेष्ठ पशुओं से भी मनुष्य श्रेष्ठ मनुष्यों से प्रमथ गण प्रमथों से गंधर्व गंधर्व से सिद्ध सिद्धों से देवता देवता के अनुयाय किन्नर आदि असुर असुरों से फिर श्रेष्ठ देवता जो आदि देवता आदि देवताओं से इंद्र देवता इंद्र देवता से दक्ष प्रजापति आदि ब्रह्मा जी ब्रह्मा जी से भगवान शंकर भगवान शंकर से श्री हरि परंतु मेरे से श्रेष्ठ है भगवत प्रेमी महात्मा जन जो ब्रह्म ऋषि जन है क्योंकि मैं उनको अपना पूज्य मानता हूं।

इसलिए इन ब्रह्म ऋषियों से बढ़कर के त्रिभुवन में कोई नहीं है। इन महाभागवतों से बढ़कर त्रिभुवन में कोई नहीं है। इसीलिए मैं सबसे ज्यादा प्रसन्न होता हूं। जब ब्रह्म ऋषि संत वैष्णवों के मुख में अच्छे-अच्छे पदार्थ पवाए जाते हैं। जैसा मैं वैसे प्रसन्न होता हूं वैसा अग्निहोत्र और यज्ञों से प्रसन्न नहीं होता। भगवान बहुत सुंदर बात कह रहे हैं। अपनी प्रजा को अपने पुत्रों को उपदेश कर रहे और मेरे से श्रेष्ठ वैष्णव संत जन भगवत प्रेमी ब्रह्म ऋषि जन तो जो अच्छे अच्छे पदार्थ भोग बना के संतों को वैष्णव जनों को ब्रह्म ऋषियों को पवाया जाता है।

भगवान कहते हैं उससे मैं बहुत जल्दी प्रसन्न होता हूं। मैं वैसा भोग अग्निहोत्र या यज्ञ में वैसा तृप्त नहीं होता जैसा भक्तों के मुख से तृप्त होता हूं। जिन्होंने इस लोक में अध्ययन आदि के द्वारा मेरी मेरी वेद रूपा सुंदर पुरातन मूर्ति को धारण कर रखा। जो हर समय क्षम दम सत्य दया तपस्या ततीक्षा ज्ञान आदि गुणों से संपन्न है। भजन परायण है। उन ब्रह्म ऋषियों से बढ़कर त्रिभुवन में कोई नहीं है। मैं ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ ये सब स्वर्ग मोक्ष देने में सामर्थ किंतु मेरे अकिंचन भक्त ऐसे निष्क्रिय होते हैं कि मुझसे भी कुछ नहीं चाहते।

राज्य आदि वस्तुओं की तो बात क्या वे स्वर्ग मोक्ष कुछ नहीं चाहते इसलिए इन भक्तों से बढ़कर के कोई नहीं मतता परत परस्मात स्वर्ग पवर्गा न कििंचित एम किस तरे ते मंच नाम भक्ति भाजा भगवान कहते हैं मैं स्वर्ग मोक्ष सब कुछ देने में समर्थ हूं। पर मेरे अकिंचल भक्त मेरे से भी कोई चाह नहीं रखते। ये राज आदि भोगों की तो बात जाने दो। इसलिए सर्वश्रेष्ठ त्रिभुवन में मेरे अकिंचन भक्त है। जो अकिंचन भक्तों की सेवा करता है। मैं बहुत जल्दी अकिंचन उसे ही कहते हैं जिनकी जीवन में प्रभु के सिवा और कोई नहीं।

अकिंचन में कोई गरीबी या ऐसे फटे पुराने कपड़े ऐसी पहचान नहीं। अकिंचन अमरीश जी को भी कहते हैं चक्रवर्ती सम्राट लेकिन जो प्रभु के सिवा जिनका कोई नहीं आंतरिक वही अकिंचन पूरा भला परिवार है। अकिंचन हृदय का विषय है। तुम संपूर्ण चराचर भूतों को मेरा इस शरीर समझकर शुद्ध बुद्धि से पद पद पर उनकी सेवा करो। मेरे भक्तों की सेवा करो। यही मेरी सच्ची पूजा है। मैं इससे बहुत जल्दी प्रसन्न होता हूं। यह बात समझनी होगी। मन, वचन और दृष्टि और इंद्रियों की चेष्टाओं से साक्षात मेरी समस्त साधना का फल होगा।

मेरे भक्तों का पूजन, चराचर जगत का पूजन। अगर मुझे नहीं प्रसन्न कर पाया तो इस महामोहम में काल पास से अपने को छुड़ा नहीं सकता। चाहे जितना साधन कर ले मेरी प्रसन्नता से ही वो खुला कह दिया है। भगवान ने खुला कहा देवी हसा गुणमई मम माया दुतया मामेव प्रपदते माया मेंता तरते ये गुणमय माया को पार करना बड़ा कठिन है मेरी शरण में हो जाओ मैं पार कर दूंगा यहां भगवान ऋषभ देव जी कहते हैं कि यदि आप मेरी शरण में होकर मेरी बात मान लो कि भक्तों का पूजन करो भक्तों का सेवन करो भक्तों का संग करो चराचर जगत को मेरा साक्षात स्वरूप समझो तो मैं प्रसन्न हो जाऊंगा।

मैं प्रसन्न हो गया तो तुम्हें इस मृत्यु पाप से मुक्त कर दूंगा। और अगर मैं प्रसन्न नहीं हुआ तो बिना पानी महा विमोहात कृतंत पास विमुक्त मी जब तक मैं प्रसन्न नहीं होता तब तक तुम्हें कोई महा विमोह से इस महा मोोह से कालमय पास से तुम्हें कोई छुड़ा नहीं सकता। श्री सुखदेव जी कहते हैं हे राजन परीक्षित भगवान ऋषभदेव जी के पुत्र यद्यम स्वयं भगवदाकार स्थिति को प्राप्त महापुरुष थे तो भी लोगों की शिक्षा देने की उद्देश्य वृत्ति से महा प्रभावशाली परम श्रवत भगवान ऋषभदेव जी ने ऐसा उपदेश किया।

भगवान ऋषभदेव जी के 100 पुत्रों में भरत सबसे बड़े थे। वे भगवान के परम भक्त और भगवत भक्तों की भी सेवा करने वाले थे। ऋषभदेव जी ने पृथ्वी का पालन करने के लिए महाराज भरत जी का राज्या अभिषेक किया और उपशमशील निवृत्ति परायण महामुनियों की भक्ति ज्ञान और वैराग्य रूप परम हंसोचित धर्मों की शिक्षा देने के लिए आप विरक्त हो गए। केवल शरीर मात्र परिग्रह सब कुछ छोड़ दिया। केवल शरीर दिगंबर हो गए। नंग धड़ंग सब छोड़ दिया। वस्त्रों का त्याग करके सर्वथा दिगंबर हो गए। बाल बिखेर लिए।

पागलों का सा वेश कर लिया। और अपने में स्थित अग्निहोत्र की अग्नियों को लीन करके परम सन्यासी हो गए। और ब्रह्मावर्त देश से पागलों जैसा बाल बिखेर लेना दिगंबर होकर के मौन ब्रह्मावर्त देश से बाहर निकल गए। वो सर्वथा मौन जंध मूक बर पिशाचो मादक व अवधूत वेशो भी भाषणो जना नाम गित मौन वत बव वह पूरे मौन पूरे मौन का मतलब किसी भी तरह बात ना करना ना अच्छी ना बुरी ना भागवतिक ना प्रापंचिक जड़ जड़ पुरुष अंधे पुरुष बहरे पुरुष गूंगे पुरुष पिशाचवत पागलों की सी स्थिति ऐसे अवधूत शिरोमणि अपने को बनाकर विचरने लगे भगवान ऋषभदेव महाराज भरत को राजगद्दी पर बिठा दिया अब वो कभी नगरों से निकलते गांवों से कभी किसानों की बस्तियों से बगीचों से पहाड़ों से जहां जैसे शरीर चल रहा है बस चल रहा है रास्ते से निकलते तो जैसे हाथ हाथी को मक्खियां सताती है।

ऐसे ही मूर्ख लोग जान नहीं पाए कौन है? कोई ईंट मारता, कोई गाली देता, कोई जैसे पागल अब नंग धड़ंग दिगंबर भेष ऐसे लोग बहुत तंग करते हैं। देखो कोई धमकी देता कोई मारता कोई पेशाब करता कोई थूक देता कोई ईंट मारता कोई धूल फेंकता कोई पकड़ कर के उनके मुख के सामने अधोवायु छोड़ता कोई बड़ी गालियां देता कोई मार मार करके तिरस्कार करता ये है ये विचरण में सब मिलता है अकेले गंगा किनारे जैसे विचरण किए तो यह जीवन में काफी सामग्री मिली है। मिलती है। भगवान देते हैं परिपक्व करने के लिए देते हैं।

तभी स्थिति परिपक्व होती है। भगवान ऋषभदेव इन बातों पर बिल्कुल ध्यान ना देते। बस यही कि ये भ्रम है। यह भ्रम है। मैं शरीर नहीं हूं। यह सब भ्रम है। यह एक स्वप्न है। यह सत्य नहीं है। मिथ्या शरीर में उनकी अहमता ममता तनिक भी नहीं थी। इसीलिए धूल फेंकना पेशाब कर देना मारना पीटना ये सब सब शांत भाव से सह शांत बड़ा कठिन है। बड़ा कठिन है। सहना कहना बात अलग है। जब चार थप्पड़ और गालियां पड़ती हो। कोई कारण नहीं। अकारण ऐसे मार रहा है कोई तो उस समय आपका विचार क्या चल रहा है?

क्या विचार चल रहा है भगवान ने सब यह सब भ्रम है यह सब असत्य है यह सब मिथ्या है वे कार्य कारण रूप संपूर्ण प्रपंच के साक्षी होकर परमात्म स्वरूप में स्थित इसलिए अखंड चित्त वृत्ति से बिना कोई बचाव पक्ष किए सबके बीच से निकलते कभी गांव से निकल ले कभी पहाड़ से कभी जंगलों से शरीर की कोई रक्षा नहीं जो जैसा प्रहार हुआ उसे सह लिया गर्मी सर्दी भूख प्यास सब यद्यपि अभी तक तो बहुत सुकुमार स्थिति में रहे चक्रवर्ती सम्राट बड़ा तो रूप तो छिपता नहीं बड़ा सुंदर रूप चौड़ी छाती लंबी लंबी बाहें मुख की बनावट बड़ी सुकुमार पर अवधूत वेश और नेत्र तो कमल दल जैसे कुछ लालिमा लिए हुए संताप हारणी दृष्टि बड़े सुंदर कान कपोल नासिका तो कभी-कभी इस रूप को देखकर कोई कई लोग मोहित भी हो जाते हैं।

पीछे चलते हैं कहते हैं कि हमें तो लगता है पागल नहीं पर बिल्कुल मौन किसी की तरफ देखना नहीं। कोई बोल रहा है तो सुनना नहीं। तभी ऊपर लिखा जू बर पिशाचो मादक व अवधूत वेशो विभासमानो जन नाम गित मत बभव गंगा किनारे ऐसे संतों के दर्शन हुए ऐसे संतों के दर्शन बहुत कृपा एक से एक महापुरुष एक से एक महापुरुष घुंघराली जो लटे थी अब वो जटा के रूप में हो गई। अवधूतों के शिरोमणि भगवान ऋषभदेव जी धूल धरित मलिन देह विचरण कर रहे। भगवान ने फिर विभत्स वृत्ति धारण की। घृणास्पद घृणास्पद वृत्ति विभत्स वृत्ति लोग नजदीक ही ना जाए ऐसा रूप भयावना घृणास्पद फिर इसके बाद अजगर वृत्ति लेट गए चलना ही अब जो आ जाए सो आ जाए खाने को ना मिले तो ये वृत्ति है परमहंसों की महापुरुषों की एक महापुरुष अगर अगर पुराने इनमें से हो तो यहां चौराहे पर पड़े रहते थे भगवान दास जी महाराज उनको पागल से ज्यादा किसी ने कुछ नहीं समझा और वो सिद्ध महापुरुष अवधूत वृत्ति को प्राप्त महापुरुष थे पूरे लक्षण उनमें थे पूरे लक्षण फटा पुराना कपड़ा कभी पहने कभी पूरे दिगंबर चौराहे पर पड़े पूरी वर्षा हो रही ऐसे ही पड़े सर्दी के समय ऐसे पड़े कोई कंबल उड़ा गया कोई कंबल उठा ले गया बड़ी अच्छी स्थिति थी इनमें से किसी ने देखा भगवान दास जी को पागल से ज्यादा उनको कोई नहीं समझता था और यह सिद्ध बिल्कुल सिद्ध बात के वो सिद्ध महापुरुष है एक पहली पहली बार जब हम सन्यास वेश में थे तो इनको देखा क्योंकि काशी और गंगा किनारे प्रया तो हमारे मन में आया कि लक्षणों से तो पूरे लग रहे हैं कि ये अवधूत महापुरुष हैं।

तो राधा रमण जी से हमें कुलिया मिली। बस उसको कमंडल रखते कमंडल में रखा और मन में आया कि हे राधा रमण जी यदि ये सत्य सिद्ध महापुरुष स्थिति को प्राप्त है तो हमारे कमंडल को खोले और ये कुलिया से आपका प्रसाद ले बस हम हमारा संशय नहीं था पर लोगों के कहने से ऐसा लगता था कि नहीं नहीं पागल तो नहीं ये तो सिद्ध पुरुष है आपसे सत्य कह रहे बीच रमण रीति में एक पेड़ था चबूतरा था जो पूर्व के जन है वो जानते हैं वो रोड बनने पर हट गया उसी पे उस दिन बैठे मानो इंतजार कर रहे नंग धड़ंग ऐसे बिल्कुल सरल भाव से

आए गले में हाथ डाला और बंगाली भाषा में कुछ बोले बंगाली शरीर था अब हमें बंगाली आती नहीं क्या बोले हमें पता नहीं और हमारा कमंडल खोला कुलिया निकाली ऐसे दो बार चाटा उसमें रखा ढक्कन बंद किया बस उसी समय साष्टांग दंडवत की किसी से प्रमाण की जरूरत नहीं राधा रमण जी ने प्रमाण दिया वो सिद्ध महापुरुष थे ऐसी अवधूत च्या बिल्कुल यथावत बिल्कुल यथावत महापुरुष के बिना ऐसा पूरी वर्षा हो रही दिगंबर ऐसे पूरे ऐसे सर्दी में कंबल ओढ़ा गए एक दो कुत्ते भी आसपास सो रहे कंबल

में वो भी सो रहे वैसे कुछ दिन तो यहां लिखा भी रहा है भगवान दास चौराहा फिर तो इसके बाद भगवान ऋषभदेव जी ने अजगर वृत्ति धारण की सोष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की जय है।

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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