वृन्दावन ऐसे जीव को भी आश्रय देता है / प्रचेताओं को भगवान शंकर का उपदेश / पुरंजनोपाख्यान // 17/07/26
श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
वृंदावननेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हद पितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माया परम सच्चिदानंद घन प्रेम आनंद स्वरूप श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल सरकार श्री श्यामा श्याम समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी यमुना रस रानी रजरानी समस्त ब्रजवासी गण अहेतु की कृपा अहेतु की कृपा श्री श्यामा जी की अहेतु की कृपा मानो देह श्री श्यामा जी की अहेतु की कृपा परमार्थ में यत किंचित रुचि श्री श्यामा जी की हेतु की कृपा श्री धाम वृंदावन वास प्रिया प्रीतम के प्रेम रंग की उपासना अब हमें अपने में दीन भाव रखकर बहुत छोटे बनकर इस माया के जाल से निकल जाना है।
जो बड़ा बनता है या तो इतना बड़ा बन जाए कि माया के जाल को लांग जाए वह ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष होता है और या इतना छोटा बन जाए कि जाल स्पर्श ही ना कर पावे और निकल जाए वह दैन्य भक्त होता है। ज्ञानी सर्वात्म भाव में स्थित हो जाता है। इसलिए माया नाम की वस्तु नहीं रहती। भक्त दयन्य होकर निकल जाता है। इसलिए उसके सामने कोई प्रश्न नहीं होता। बीच वाले सब फंस जाते हैं। यह जो माया का जाल है अहमता ममता ये सबको फंसा लेता है। अति छोटे को और बहुत बड़े को इन दो को नहीं।
बहुत बड़ा ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष और अति छोटा दन्य तणाद सुनीचे यह भक्त श्रीपाद परम प्रेम रसमय भक्ति को प्राप्त महापुरुष है। बड़ी दन्यता है। कह रहे हैं पतित मनाथम मूढ़म दीनम दुष्टित करतम मा राधा ही कमल दूरम नवे वृंदावनम कथम कुरते से मैं बहुत मूढ़ हूं, अनाथ भी हूं, पतित भी हूं, और बहुत दीन भी हूं। देखो महापुरुषों का हृदय कैसा है। जहां किंचिन मात्र दोष नहीं है। कैसा निर्मल भक्त का हृदय होता है। पतित मनाथम मूढ़म दीनम और दुष्टित रतम माम जितनी भी दुष्ट चेष्टाएं हैं उनमें मैं संलग्न हूं।
गजब की दन्यता है। भला ऐसे दैन्य में दोष कहां हो सकते हैं? दोस्तों अहंकार में होते हैं। ऐसे दैन्य महापुरुष तभी तो हमारी प्यारी जो अपनी सेवा में रखती है। यह दैन्यता बहुत दुर्लभ है। जगत में अहंकार का राज्य चलता है। और भगत में दैन्य का और दैन्य ही एक ऐसी वस्तु है जो हमें भगवान को बहुत प्यारी लगती है। भगवान बहुत प्यारे लगने लगते हैं और भगवान को बहुत प्यारी लगती है। प्रिया प्रीतम प्राण हो जाते हैं और प्रिया प्रीतम का प्राण हो जाता है। दैन्य बनावटी दैन्यता नहीं हृदय से दन्यता सबसे लघु।
एक बार पूज्यपाद श्री उड़िया बाबा जी महाराज से पूज्य स्वामी श्री अखंडानंद जी महाराज ने पूछा स्वामी जी आप साक्षात ब्रह्म है। उन्होंने कहा क्यों दृष्टि से ब्रह्म को देख सकते हो क्या? चुप हो गए। क्या इन नेत्र से ब्रह्म को देख सकते हो? अगर देख सकते हो तो ब्रह्म दृश्य हुआ। तो क्या ब्रह्म दृश्य है? चुप हो गए स्वामी श्री अखंडानंद जी महाराज। वह तो बाबा से भाव जानना चाहते थे। बाबा फिर आप ही बता दो कि आप कौन है? तो उन्होंने कहा चराचर का सेवक हूं। वाणी जी में लिखा है बाबा की चराचर का मैं सेवक हूं।
मूर्तिमान चलते फिरते ब्रह्म कह रहे थे चराचर का सेवक हूं। बोले गोस्वामी जी की यह चौपाई हमारा जीवन है। सियाराम मैं सब जग जानी करो प्रणाम जो पानी सब मेरे प्रभु हैं और मैं चराचर जगत का सेवक यह बहुत प्रिय भगवत भाव है। प्रभु को बहुत प्रिय है। बस समझना है। सो अनन्य गति जाके अस मत ना टरे हनुमंत मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत मैं सेवक हूं चराचर जगत मेरे स्वामी का रूप है जिसकी एक क्षण भी कभी ऐसी मति इस स्थिति से हटती नहीं वही अनन्य भक्त है सो अनन्य गति जाके अस मति न टरे हनुमंत एक क्षण के लिए भी इस स्थिति से मति नहीं हटती मैं सेवक चरा चराचर जगत मेरे स्वामी का स्वरूप और है यह मानने का विषय है।
मान लो तो जान जाओगे और जान गए तो वही हो जाओगे। चराचर में आप भी तो हैं। आप भी भगवत स्वरूप है। पर यह बात आएगी जब अति दैन्यता आ जाएगी। चराचर जगत हमारा स्वामी का रूप हम सबके सेवक कहां गुण दोष की बात रह गई। कहां किसी द्वंद माया की बात रह गई? मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत ये स्थिति तो हम इसको अभ्यास में लावे अगर हमारे स्वामी हमसे कट व्यवहार करें तो हम कैसा व्यवहार करेंगे? नम्र। तो चराचर जगत हमारा स्वामी का स्वरूप है। यदि प्रतिकूलता देता है, निंदा करता है, अपमान करता है तो हमें नम्र व्यवहार करना है।
जैसे स्वामी से किया जाता है तो हमारा यह भाव सिद्ध होगा सचराचर कि हम सेवक हैं। यह भाव सिद्ध होगा। अगर यह भाव सिद्ध हो गया तो मुक्त हो गए। एक भी व्यक्ति से यदि राग रह गया या द्वेष रह गया तो फिर आना पड़ेगा। एक भी व्यक्ति से पूरी सृष्टि में ना राग हो ना द्वेष हो। ऐसा हृदय निर्मल निर्विकार निष्प्रिय किसी की प्रति कोई भी अपेक्षा ना रखने वाला हृदय ये भगवत स्वरूप ये सब स्थितियां तभी आ जाती है जब हम भगवान की शरण में होकर खूब नाम जप करते हैं। जो नाम जप नहीं करते नहीं वो केवल बातें रहती है स्थिति नहीं आती यदि ज्ञानी हो तो सर्वम खलमिदम ब्रह्म यदि भक्त हो तो मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत फिर और चर्चा कहां रह गई उमा जी राम चरण रत विगत काम मद को तो निज प्रभु मैं देख जगत के कैसेन करें विरोध हमें स्थिति प्राप्त करनी बातें नहीं देखो स्थिति प्राप्त महापुरुष कैसे कह रहे हैं कह रहे हैं पतित मनाथम मूढ़म दीनम दुष्टित [गाना गाने की आवाज़] करतम मा राधा कमल दूरम नवे वृंदावनम कथम कुरते हे वृंदावन मेरा क्या होगा मैं तो पतित हूं अनाथ हूं मूढ़ हूं दीन हूं और एकमात्र दुष्ट चेष्टाओं में संलग्न हूं और राधा चरणारविंद की प्रीति से बहुत दूर हूं ना वेद में मैंने नहीं जानता कि मेरा क्या होगा।
पर हे वृंदावन मैंने आपको पकड़ लिया है। आपका आश्रय ले लिया है। अर्थात जो नीच है, पतित है, अनाथ है, मूढ़ है, गंदी चेष्टाओं में संलग्न है, प्रियाजु के चरणों में बिल्कुल प्रीति नहीं है, वह भी यदि वृंदावन का वास स्वीकार कर ले तो वृंदावन उसे श्री जी के चरणों की प्राप्ति करा देगा। भाव यह है कि कितना भी नीच पुरुष हो यदि धाम का आश्रय और वास स्वीकार कर ले तो जिस माया से पार होना बहुत कठिन है उस माया से पार करके वृंदावन भगवत प्रेम प्रदान कर देगा अत्यंत कुमति मत श्रंखल मति सोच सोचम मा श्री वृंदावन में स्वादभुत कृपयात्म सा कुरताम श्रीपाद कह रहे हैं जिसकी अत्यंत कुमति है बिल्कुल बुद्धि भ्रष्ट है अति उच्च श्रंखल है और अति सोचनीयों से भी सोचनीय है मति सोच सोच्यम माम ऐसे का कल्याण कैसे हो सकता है?
जो कुमति उंखल स्वभाव सोचनीयों में अत्यंत सोचनी ये अस्पताल है वृंदावन सीरियस से सीरियस मरीज को स्वस्थ कर दे। स्वस्थ [नाक से की जाने वाली आवाज़] स्वरूप में स्थित कर दे। विश्वास करो। बहुत कृपा है धाम की। जब आप अपने अहम को श्री धाम वृंदावन में अर्पित कर देंगे तो अहम का कनेक्शन है। फिर आपको पता चलने लगेगा वृंदावन की महिमा क्या है? प्रकाशित होने लगेगी। पारश्व में प्रियाल खड़े हैं। ऐसा अनुभव होता है। यह थोड़ी कि अपवित्रता या पवित्रता का कहीं भेद रह गया हो।
सवायाभ्यांतर सूची बाह और अभ्यंतर परम पवित्र जिस समय श्री धाम की कृपा से हर समय स्मृति जागृत हो जाती है। मोह का नाश हुआ, ज्ञान का नाश हुआ, हर समय भगवत सानिध्य श्री धाम वृंदावन साक्षात वरदान है जो अत्यंत सोचनी से भी सोचनीय है उच्च श्रंखल है जिनकी कुमति है ऐसे जन भी वृंदावन का यदि वास स्वीकार कर ले आश्रय ले ले तो कह रहे हैं श्री वृंदावन मेव स्वा अद्भुत कृपया आत्म सात कुरताम वृंदावन अपनी कृपा से उसे आत्मसात कर लेगा। प्रिया प्रीतम की सहचरी मंडली में मिला देगा।
बस निश्चिंत हो जाओ। अपने में श्रंखलता तो है। सोचनीय भी है लेकिन अति सोचनीय नहीं है। 24 घंटे में कुछ मिनट ऐसे हैं जिनमें हमें मन परेशान करता है। नहीं ऐसी दिनचर्या है कि उसको अवसर ही नहीं मिलता। जहां कह रहे हैं अति कुमति है, उंखलता है, सोचनी से सोचनी है। उसको भी वृंदावन अपनी कृपा से आत्मसात कर लेता है। तो अपने लोग तो पंक्ति में खड़े ही हैं। काहे को चिंता करते हो? अब एक बात ध्यान देनी है। आगे के श्लोक की जो बात कह रहे हैं। वृंदावनने प्रजलपन गच्छ तन स्वपन शसनवा स्मर तरल गौर नील ज्योतिर द्वंदम कदा पुर कलय अगर आपको वृंदावन वास मिल गया है आश्रय मिल गया है तो कह रहे हैं प्रजलपन गाओ बोलो वृंदावन वृंदावन वृंदावन वृंदावन [चीखने की आवाज़] वृंदावन वृंदावन वृंदावन [हौसला बढ़ाने की आवाज़] वृंदावन जय जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जयवन [हौसला बढ़ाने की आवाज़][चीखने की आवाज़] जय प्राण वृंदावन जीवन वृंदावन सर्वस्व वृंदावन जय [चीखने की आवाज़]
वृंदावन प्राण जीवन सर्व जय [चीखने की आवाज़] वृंदावन जय वृंदावन [चीखने की आवाज़] जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय हो जय [चीखने की आवाज़] वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन प्रजलपन गायन करो हे यहां का यही भजन है गुनगुनाते हुए प्रभु के लीला नाम रूप धाम से भरे हुए पदों को या कभी नाम कीर्तन जय जयकार उनकी कर रहे पड़े हैं उष्ट पा रहे हैं वहीं पहुंचना है ज्यादा यहां दिमाग लड़ाने की जरूरत नहीं है ये प्रेम प्रेम ये हृदय का विषय होता है ये दिमाग का
विषय नहीं होता प्रजलपन अर्थात गायन करना बार-बार पुकारना गच्छ चलते हुए भी हम नाम उच्चारण कर रहे हैं। जब हम वृंदावन बोलते हैं ना तो प्रिया प्रीतम सहचरी गण खग मृग पशु पंछी लता रज रानी सबकी कृपा मिलती है। क्योंकि सब वृंदावन को प्राण प्यारे हैं और ये सब वृंदावन के प्राण प्यारे हैं। सबकी कृपा मिलती है। तभी अत्यंत उत्तम सबसे दुर्लभ पद सहचरी पद की प्राप्ति होती है। श्री स्वामिनी जो लाल जी के संग रहने को मिलता है। अनादि काल से अनंत काल तक ये दिव्य वृंदावन ये कोई माया रचित धाम थोड़ी है कि जब ब्रह्मा की आयु पूरी हुई तो फिर ये प्रलय को प्राप्त हो जाए।
नहीं महाप्रलय भी यहां प्रवेश नहीं पाता। चलते हुए गच्छ तष्ठन बैठे हैं वृंदावन के ही चिंतन में प्रिया प्रीतम के ही चिंतन में स्वपन श्वास ले रहे हैं एक एक शस में कई कई बार नाम श्वास नीचे उतरी तो नाम श्वास ऊपर श्रीपाद कह रहे स्वपन शसन वापी हम सो रहे हैं तो एकाग्रता पूर्वक प्रिया प्रीतम का वृंदावन का चिंतन करते हुए सो रहे हैं। पूरा भजन माना जाएगा आपका सोना। अगर सोते समय आप प्रिया प्रीतम का चिंतन करते हुए सो रहे हैं। जरूर ध्यान देना चाहिए। शयन के समय सब बातें हटा देनी चाहिए।
एकमात्र प्रभु का चिंतन करते हुए शयन करना निद्रा समाधि स्थिति उसका सोना भी भजन हो जाता है। वो शयन भी श्री जी में ही कर रहा है। जागृत स्वप्न सुशुप्त ये श्री जी के चरणों में जागृत में तो हम उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते गान कर रहे हैं। लेकिन स्वप्न हमारे बस का नहीं है। तो जब हम हर समय श्री जी में लगे रहते हैं तो स्वप्न भी श्री जी का आता है और जब हम शयन के समय श्री जी का चिंतन करते शयन करते हैं तो हमारी सुशुप्ति भी श्री जी के चरणों में भजन ही माना जाएगा निद्रा समाधि स्थिति शयन भी समाधि मानी जाएगी जो उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते हर स्वास में श्री धाम वृंदावन का नाम युगल किशोर श्यामा श्याम का नाम मंत्र पद इसी में चल रहा है।
निश्चिंत हो जाओ। सबसे बड़ी बात आ गई है। सेवक शरण सदा रहे अनत नहीं विश्राम। कह वाणी हरिवंश की कह हरिवंश नाम। ये सिद्धावस्था है। हर समय वाणी जी में या नाम मंत्र में निश्चिंत हो जाओ परम पावन श्री धाम वृंदावन का आश्रय और वास अब दुर्लभ नहीं है भगवत प्रेम या भगवत प्राप्ति हां थोड़ी सावधानी इतनी कर ली जाए कि यदि श्रंखलता बनी रही तो अंत तो बढ़िया होगा इसमें तो कोई संशय नहीं पर वर्तमान में आपको भगवत आनंद का अनुभव नहीं होगा वर्तमान में प्रेम आनंद का अनुभव करने के लिए हमको हर इंद्री के द्वार बंद करने होंगे।
अगर इंद्रियों के द्वार स्वच्छंद खुले रहे तो वर्तमान में आनंद नहीं होगा। यह तो पक्का समझ लीजिए कि श्री वृंदावन में स्व अद्भुत कृपया आत्मसात कुरताम आपका अंतिम वृंदावन में व्यतीत हुआ शरीर छूटा तो स्व अद्भुत कृपया आत्मसात कर लेगा। पर वर्तमान में हम खाली डोल रहे हैं। परमानंद का अनुभव नहीं हो रहा। प्रेम का अनुभव नहीं हो रहा। उसके लिए हमको सावधानी रखनी। कोई पापाचरण ना हो। चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण जिसमें महाराज प्रथु परमधाम को प्राप्त हुए और उन्हीं के शरीर को लेकर महारानी अर्च चिता में प्रवेश कर गई और वह भी परम पद को प्राप्त हुई।
महाराज प्रथु के बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजताश्व ये महाराज प्रथु के सिंहासन पर विराजमान हुए। अपने भाइयों से बड़ा प्रेम था। ये पांच भाई थे। तो आप तो महाराज पृथ्वी के सिंहासन पर विराजमान हुए और अपने चार भाइयों को चार दिशाओं का राजा बना दिया। हरक्ष को पूर्व दिशा का ध्रुमकेश को दक्षिण दिशा का वृक को पश्चिम का द्रविण को उत्तर दिशा का इनमें अंतर्धान होने की शक्ति थी इसलिए इनका एक नाम अंतर्धान भी हुआ। इनकी पत्नी का नाम शिखंडनी था। उनसे तीन पुत्र हुए जो साक्षात अग्नि थे।
भगवान वशिष्ठ जी के शाप से अग्नि पावक, पवमान और सुची इनके पुत्र रूप में प्रकट हुए। और यह बाल्यावस्था से ही योग में युक्त होकर अपने अग्नि स्वरूप को प्राप्त हो गए। अंतर्धान महाराज विजितास की नसती नाम की पत्नी से हवीरधान नाम का एक पुत्र हुआ। यह बड़े उदार और बड़े भागवतिक स्वभाव के। इन्होंने विचार किया दंड लेना, प्रजा से जुड़वाना, कठोर व्यवहार करना, शासन करना यह सब मायाकृत है। इसलिए दीर्घकालीन यज्ञ में दीक्षित होकर के निरंतर भगवान के भजन में राज काज सब छोड़ दिया।
जिसे भगवान से थोड़ा भी लगाव होता है उसे संसार प्रिय नहीं लगता। ये झूठा माया का खेल नाटक दिखाई देता है। यह नाटक उसे अच्छा नहीं लगता। यज्ञ कार्य में लगे रहना। और भगवान की आराधना निरंतर भगवान के सुमिरन में मगन रहना हवीरधाम की पत्नी हवीरधानी से बरिषद गय शुक्ल कृष्ण सत्य जितवत नाम के छह पुत्र हुए यह बरिषद बहुत याज्ञ स्वभाव के थे इनका एक तरह से व्यसन था यज्ञ करना इतनी यज्ञ की कि पूरे भारत में कोई जगह ही नहीं बची जहां यज्ञ ना की हो। कुशों से पाट दिया। अग्रभाग योग फैलाए हुए कुशों से पूरी भूमि नप गई।
इतनी यज्ञ की इनका नाम पड़ा प्राचीन बरह बरषद को ही प्राचीन बरही कहते हैं। प्राचीन बरही जी ने ब्रह्मा जी के कहने से समुद्र की कन्या सतद से विवाह किया। ये सर्वांग सुंदरी थी। इतनी सुंदर थी कि जब ये भावने देने के लिए आई तो अग्नि प्रज्वलित की जाती तो अग्नि देवता मोहित हो गए। और प्रगट में जैसे जैसे भाववरे घूमती वैसे दर्शन करते। इतनी सुंदर थी। सतद के गर्भ से प्राचीन बर के प्रचेता नाम के 10 पुत्र प्रकट हुए। ये बड़े महाभागवत हुए। ये दसों का नाम एक ही रखा गया।
प्रचेता और दसों एक ही स्वभाव एक ही आचरण वाले थे। इनको पिता ने आदेश किया कि संतान उत्पन्न करना है। पर उसके पहले तपस्या के द्वारा ब्रह्म बोध प्राप्त करना है। पहले भगवत प्राप्ति फिर संतान उत्पन्न करना। यहां पूरा जीवन व्यतीत हो जाता है। भगवत प्राप्ति का लक्ष्य ही नहीं बन पाता। पिता ने क्या आदेश किया कि तुम्हें संतान उत्पन्न करना अर्थात गृहस्ती में जाना है। पर पहले जाओ तपस्या करो और भगवत प्राप्त हो। फिर संतान 10,000 वर्ष तक उन्होंने तपस्या की भगवान श्री हरि की।
जब ये तपस्या के लिए जा रहे थे तो देवाधिदेव महादेव भगवान शंकर का दर्शन और उपदेश प्राप्त हुआ। तो विदुर जी ने पूछा ब्राह्मण देवाधिदेव महादेव भगवान शंकर का दर्शन तो बड़ा दुर्लभ है। यह जा रहे थे तपस्या के लिए तो इनको रास्ते में कैसे दर्शन दे दिया? और भगवान शिव ने उपदेश किया हो तो बड़ा गढ़ होगा। भगवान शंकर आत्माराम है। कैसे उनका दर्शन हुआ प्रचेताओं को और क्या उपदेश यह मैं सुनना चाहता हूं। श्री मैत्री जी कहते हैं विदुर जी जब पिता ने आज्ञा करी 10 प्रचेता गण कि जाओ पहले तपस्या के द्वारा भगवान की प्राप्ति करो।
तो पिता को प्रणाम किया और तपस्या के लिए पश्चिम की ओर चल दिए। जब कोई भगवान श्री हरि की प्राप्ति के लिए चलता है तो महादेव जी उस पर दृष्टि रखते हैं। ध्यान रखना बहुत कृपालु भगवान शिव है। परम वैष्णवाचार्य हैं। और बिना भगवान शंकर की कृपा के श्री हरि का प्रेम प्राप्त नहीं होता। किसी ना किसी जन्म में अगर इस जन्म में आपने शंकर आराधना नहीं की और हरि के भक्त हो तो किसी न किसी जन्म में शिव आराधना बनी है। यह तपस्या के लिए जा रहे थे तो रास्ते में देखा एक विशाल सरोवर बड़ा निर्मल और बड़े रंग बिरंगे जलजीव मत्स्य आदि नीलकमल लाल कमल रात दिन में सायंक काल में खिलने वाले कमल इंदीवर बहुत सुंदर सरोवर और उसके तट पर हंस सारस चकवा कारंडो जल पक्षी चहक रहे झूमझूम कर लताएं जल को स्पर्श कर रही बड़ी मधुर ध्वनि वायु कमल कोश से पराग की खुशबू लेकर घणेंद्र को मधोम्मत कर रही और आश्चर्य की बात यह कि सरोवर के जल से मृदंग पण आदि अनेक वाद्य बज रहे हैं और राग रागनिया प्रकट हो रही है।
प्रचेता गणों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसा सरोवर तो आज तक हमने नहीं देखा। जहां से राग रागनिया और पड़ो मृदंग आज बज रहे थे। उस ध्वनि की तरफ लक्ष्य किया तो देखा देवाधिदेव भगवान शंकर अपने अनुचरों के सहित सरोवर से बाहर आ रहे हैं। त हे मनिकाया शित कंठम त्रिलोचनम प्रसाद सुखम विक्ष प्रणम जात कोतका शतान प्रपन हरो भगवान धर्म व्सला धर्म ज्ञान शील संपन्न प्रीत प्रीतावाच प्रचेता गणों ने देखा भगवान शंकर का गौर वर्ण श स्वर्ण कांत प्रकाशित हो रही गौर में भी स्वर्ण कांत तप्त हेम निकायाभम श्री जी के श्री अंग की कांत को जब महाप्रभु वर्णन करते हैं तो कह रहे हैं कि सात कुंभ तनु गोरी तप्त हेम निकाय आभम भगवान शिव के श्रींग की आभा कैसी एकदम गोरे और स्वर्णिम आभा प्रकट हो रही है स्वर्ण राशि
के समान कांत तप्त हेम निकायाभम शित कंठम त्रिलोचनम जो समुद्र मंथन के समय विष निकला था उसे कंठ में तो नीलकंठ त्रिलोचनम तीन नेत्र प्रसाद सुमुखम विक्ष प्रणयमर जात कौतुका अपने भक्तों पर कृपा वर्ष कर रहे हैं ऐसा स्वरूप बड़ा आश्चर्य हुआ प्रचेताओं को भगवान शंकर का सहसा दर्शन पाकर दसों ने साष्टांग दंडवत की शरणागत भयारी देवाधिदेव महादेव भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में उन राजकुमारों से प्रसन्न होकर बोले तुम लोग राजा प्राचीन वर के पुत्र हो तुम्हारा कल्याण हो जो भगवान श्री हरि की आरा आराधना करना चाहता है या करने के लिए चलता है।
मैं उसकी एक एक वृत्ति को देखता हूं। तुम जो कुछ भी करना चाहते हो मुझे पहले से पता है और इस समय तुम लोगों पर कृपा करने के लिए मैंने तुम्हें अपने दर्शन दिए हैं। जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण की शरण लेता है वो मुझे प्राण प्यारा है। ओ हो युम वेद सदा पुत्रा विितम व कीितम अनुग्रह भद्रम वा एवं दर्शनम कृतम यह परम रंगसा साक्षात त्रिगुणा जीव संगीतात भगवंतम वासुदेवम प्रपन प्रियो में जो भगवान वासुदेव श्री कृष्ण की शरण लेता है वो मुझे प्राण प्रिय है। महादेव जी कहते हैं और इसका उल्टा बोल दे जो भगवान महादेव जी का प्राण प्रिय हो जाता है उसे भगवान श्री कृष्ण के चरणों की विशुद्ध भक्ति प्राप्त हो जाती है।
जा पर कृपा न करह पुरारी सो न पाव मुनि भगती हमारी शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहीं भावा भगवान शंकर कह रहे हैं जो भगवान श्री कृष्ण की शरण लेता है मुझे प्राण प्रिय हो जाता है। ध्यान से सुनो। भगवान शिव कह रहे स्वधर्म निष्ठा सत जन्म भीमान वििचता त परम अव्याम भागवतो वैष्णवम पदम यथा विधा कलात जो 100 जन्म तक अपने वर्णाश्रम धर्म का भलीभांति पालन करता है। 100 जन्म तक धर्म का भलीभांति पालन करता है। वो ब्रह्मा का साक्षात्कार करने की योग्यता रखता है।
और उससे भी अधिक जो तपस्वी भजनानंदी है वह मुझे प्राप्त करता है। परंतु जो भगवान श्री कृष्ण का शरणागत है वो इसी जन्म में सीधे परम पद को प्राप्त होगा जिसको ब्रह्मा भी नमस्कार करते हैं। सर्व प्रपंचातीत परम पद को प्राप्त होगा। जिसे रुद्र रूप में स्थित मैं तथा अन्य अधिकारिक देवता ब्रह्मा ये सब नमस्कार करते हैं और अंत में जब सृष्टि का लय होता है तो उस परम पद को हम प्राप्त होते हैं। वह परम पद श्री कृष्ण शरणागत को इसी जन्म में सीधे प्राप्त होता है। अथ भागवतायम प्रियास्त भगवान यथा नम भगवता नाम च प्रया अनन्यस्त करित इदम विविक्तम जपव्यम पवित्रम मंगलम परम निश्रेकरम चापयता तदम भगवान श्री कृष्ण से जुड़ने के नाते से हम तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।
कितने प्यार करते हैं। महादेव जी कह रहे इष्ट भगवान यथा अथ भागवताय प्रिया तो इस भगवान यथा मैं जितना श्री कृष्ण को प्यार करता हूं उतना श्री कृष्ण भक्त को प्यार करता हूं। तुम भगवत भक्त हो इस नाते से भगवान के समान मुझे प्यारे हो। महादेव जी कह रहे हैं इस प्रकार भगवान के भक्तों को मैं बहुत प्यार करता हूं। भगवान शिव कह रहे अपने आप अहेतु की कृपा से प्यार करते हैं। तुम्हारे बिना पूछे तुम्हें जहां जाना है और जो सिद्धि प्राप्त करनी है उसके लिए मैं एक तुम्हें परम पवित्र मंगलमय कल्याणकारी स्त्रोत इसे शुद्ध भाव से जप करना।
बहुत जल्दी भगवत साक्षात्कार हो जाएगा। गंगा किनारे इसका अनुष्ठान किया था। बहुत भगवान शिव का दिया हुआ स्तत्र सामर्थ्यशाली है। अब एक कि लगो जब तक लगोगे नहीं तब तक अनुभूतियां थोड़ी होती है। श्री रुद्रवाच जितम तम आत्म विधुर्य स्वस्त स्वस्तमे भतारा साराम सर्वस् आत्मने नमः नमः पंकज नाय भूत सूक्ष्मेंद्रियत्मने वासुदेवाय शताय कूटस्थाय सुरोचसे भगवान शिव ने ये स्तोत्र बताया और स्तोत्र का फल है भगवत साक्षात साक्षात्कार भगवान रुद्र बोले स्तोत्र हे भगवन आपका उत्कर्ष उच्च कोटि के आत्मज्ञानियों के कल्याण के लिए निजानंद लाभ के लिए है।
आपका उत्कर्ष मेरा कल्याण करे। हे प्रभु आप सर्वदा अपने निरतशय परमानंद स्वरूप में स्थित रहते हैं। ऐसे सर्वात्मक आत्म स्वरूप भगवान आपको नमस्कार है। हे पद्मनाभ आपको नमस्कार है। हे भूत सूक्ष्म और इंद्रियों के नियंता शांत स्वयं प्रकाश श्री कृष्ण आपको नमस्कार है। संकर्षणाय सूक्ष्माय दुरतायांतकाय च नमो विश्व प्रबोधाय प्रद्युमनायांतरात्मने नमो नमो अनिरुद्धाय हसी केेश्रियत्मने नमः परम हंसाय पूर्णाय निवतात्मने स्वर्गवर्ग द्वारा नित्यम सुचदे नमः नमो हिरण्य वीरय चातुर तवे नम उत्रया पत यज्ञ रेसे तप्ता जी नाम नम सर्व रसत्मने हे प्रभु आप सबसे सूक्ष्म है अनुयान छोटे से छोटे सबसे छोटे कौन बोले भगवान और सबसे बड़े कौन बोले भगवान अनुयान महतो तो महान तो बीच में कौन बोले श्री भगवान आप ही सूक्ष्म है आप ही अनंत है और आपके द्वारा ही संपूर्ण लोकों का संहार होता है।
ध्यान से सुनो तो अज्ञान खत्म हो जाएगा। सूक्ष्म से सूक्ष्म छोटे से छोटे भगवान बड़े से बड़े श्री भगवान और आप ही संसार का संहार करते हैं। और इस संसार का संघार करने वाले अहंकार संकर्षण उद्गम बुद्धि के अधिष्ठाता प्रद्युम्न आपको नमस्कार। इंद्रियों के स्वामी मन तत्व के अधिष्ठाता भगवान अनिरुद्ध आपको बार-बार नमस्कार। आप अपने तेज से जगत को व्याप्त करने वाले सूर्य देव हैं। आपको नमस्कार। सीधे भगवान हैं सूर्य देव। सीधे भगवान के दर्शन होते हैं। कहां ज्ञान है? पूर्ण होने के कारण आप में ना वृद्धि है, ना क्षय है, ना आप में बढ़ना है, ना विनाश है।
ये लीला है। आपको नमस्कार है। आप स्वर्ग और मोक्ष के द्वार हैं जो निरंतर पवित्र हृदय से आपका चिंतन करते हैं। जो चाहे प्राप्त हो जाए। स्वर्ग मोक्ष प्रेम आपको नमस्कार है। आप ही स्वर्ण रूप वीर से युक्त चातुर होत्र कर्म के साधन विस्तार करने वाले भगवान अग्नि देव हैं। हे अग्नि देव स्वरूप श्री कृष्ण आपको नमस्कार। आप ही पितर और देवताओं के पोषक सोम है। चंद्र देव आपको नमस्कार। तीनों वेदों के अधिष्ठाता वेद स्वरूप आपको नमस्कार। समस्त प्राणियों को तृप्त करने वाले जल स्वरूप आपको नमस्कार।
समस्त प्राणियों के देह आप हैं। पृथ्वी आप हैं। ये विराट संसार आप हैं। इसी त्रिलोकी को पालन करने वाले आप हैं। आप ही सबकी स्वासों में वायु रूप से प्राण वायु रूप से आपको नमस्कार। भगवान ही भगवान। आप अपने गुण शब्द के द्वारा समस्त पदार्थों का ज्ञान कराने वाले बाहर भीतर आकाश रूप से इसलिए हे आकाश स्वरूप श्री कृष्ण आपको नमस्कार आप ही वैुंठ लोक हैं। आपको बार-बार नमस्कार। आप ही पितृ लोक की प्राप्ति कराने वाले प्रवृत्ति कर्म रूप देवलोक की प्राप्ति कराने वाले निवृत्ति कर्म रूप और अधर्म का फल रूप नरक दुख मृत्यु ये आप ये आपको नमस्कार।
आप ही दुख रूप भी हैं। आप ही मृत्यु भी हैं। आप ही नरक भी हैं। इसलिए बहुत होश से आपका कौन स्वरूप पसंद है आपको? मोक्ष स्वरूप, प्रेम स्वरूप, धर्म स्वरूप, सुख स्वरूप तो वो स्वीकार करो। भगवान ही सब कुछ बने हुए हैं। नाथ आप पुराण पुरुष सांख्य और युग के अधीश्वर भगवान श्री कृष्ण हैं। आप सब प्रकार की कामनाओं की पूर्ति करने वाले मंत्र मूर्ति महान धर्म स्वरूप हैं। आप मंत्रमय हैं। ये जो आप मंत्र ध्यान करते हो साक्षात भगवान है। साक्षात प्रभु हैं। करो ना ध्यान। ध्यान करते हुए मंत्र जपो।
देखो अभी कैसी शक्ति जागृत होती है। आप ज्ञान शक्ति हैं और आप जिसके हृदय में ज्ञान शक्ति रूप से प्रकट होते हैं उसको माया कुंठित नहीं कर सकती। वो ज्ञान शक्ति कुंठित नहीं कर सकती। पढ़ लिख के जो ज्ञान है उसे माया अपहरण कर लेगी। लेकिन भजन से जो ज्ञान होगा उसे माया कुंठित नहीं कर सकती। आपको नमस्कार है। नमस्कार है। प्रभु आप ही कर्ता करण कर्म तीनों को शक्ति प्रदान करने वाले हैं। आप ही भगवान रुद्र हैं। आप ही ज्ञान है। आप ही क्रिया रूप हैं। आप ही चार वाणी है।
परा पश्यती मध्यमा वैकरी ये चार प्रकार की वाणी आप ही है। प्रभु यह हम आपकी विनय कर रहे हैं क्योंकि आपके दर्शन करना चाहते हैं। अतः आपके भक्त जन जिनका पूजन करते हैं। आप अपने निज जनों को प्राण प्यारे हैं। मैं उस रूप को देखना चाहता हूं। आप वो रूप हमें दिखाइए। आप हमें अपने दर्शन दीजिए। आपका वह रूप समस्त इंद्रियों को तृप्त करने वाला है। सुना है कि वह वर्षा कालीन मेघ के समान स्निग्ध श्याम संपूर्ण सौंदर्यों का सार सर्वस्व है। सुंदर चार विशाल भुजाएं मनोहर मुखारविंद कमल दल के समान नेत्र सुंदर भहे सुघ नासिका मनमोहिनी दंत पंक्ति बहुत चिकरे कपोल मनोहर मुख मंडल शोभाशाली समान कर्ण युगल प्रभु तिरछी चितवन श्याम वर्ण घुंघराली अलके कमल कुसुम के केसर के समान फहराता हुआ पीतांबर झिलमिलाते हुए कुंडल चमचमाते हुए मुकुट कंकण हार नपुर मेखला वनवाला कौस्तुभ मणि अपूर्व शोभा ऐसा सुना है आपका रूप और वो मैं देखना चाहता हूं हे भक्तों के भय का अपहरण करने वाले हे जगतगुरु अज्ञानव्रत प्राणियों को अपनी प्राप्ति का मार्ग बताने वाले आप हमारा भाव स्वीकार करें और हमें साक्षात दर्शन दें।
प्रभु जो अपनी चित्त की शुद्धि की अभिलाषा करने वाले पुरुष हैं उनको चाहिए कि आपके इसी रूप का ध्यान करें। इसी रूप का आश्रय ले। इसी रूप की भक्ति करें। अर्थात श्री कृष्ण श्री हरि रूप बहुत जल्दी चित्त शुद्ध हो जाएगा और प्रभु आप अभय करने वाले उसको अपना दर्शन देंगे भूल मत करना आप जैसा सोचोगे वैसा ही आपको अनुभव होगा यथाम प्रपद्यते तास तथ भजाम्यम और शास्त्र कहता है जब आप भक्ति करोगे देखो थोड़ा भाव से देखना आप जितनी भक्ति करते हो क्या आपके भाव देश में वैसे भगवान दिखाई देते हैं?
हम जो पूछ रहे हैं उसको आप समझ रहे हैं। आप देखो आंख बंद करो या आंख खोल के आप जितनी सामर्थ्य रखते हैं भाव की आपको वैसे प्रभु झलकते नजर आते हैं कि नहीं? आते हैं कि नहीं? आप देख लो। पता नहीं देख लो आप। अगर विषय चिंतन बहुत होता है तो फिर यह नहीं आएगा जो हम कह रहे हैं और अगर बहुत गाढ़ चिंतन करते हो तो आपके सामने अभी दिखाई देंगे। यत किंचित जैसा आप भाव करते हैं वैसे ऐसे ही सामने प्रकट हो जाते हैं। जब गाढ़ चिंतन प्रभु का होता है। संसार शरीर का चिंतन भूलने लगते हैं।
वैसे ही भगवान छाने लगते हैं। भगवान का यह रूप अभय कर देने वाला है। सदा सदा के लिए मन चोर रूप है। यह मन को चुरा लेते हैं। प्रभु बड़े-बड़े देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। आपकी भक्ति आपका भजन देवता नहीं कर सकते। यह मानव देह से ही हो सकता है। सत्पुरुषों के लिए भी दुर्लभ अनन्य भक्ति से भगवान को प्रसन्न करके जिनकी प्रसन्नता किसी अन्य साधन से नहीं अनन्य भक्ति से होती है। ऐसा कौन होगा जो भगवान का प्रेम छोड़कर उससे विषय मांगे। अनन्य भक्ति के बदले में प्रेम छोड़कर के और कोई विषय मांगे।
कितना दुर्भाग्य होगा जो भगवान से विषय मांगे। प्रभु यह त्रिभुवन के विषय तो जिस समय आपकी भ्रकुटी टेढ़ी होती है उसी समय काल संहार कर डालता है। आपके चरणों की शरण में गए हुए प्राणी पर काल का अधिकार नहीं होता। समझ जाए शरण ते डरत ना काल डर। प्रभु आपके प्रेमी भक्तों का यदि आधे क्षण के लिए समागम हो जाए क्षणारध ना पित तुले ना स्वर्गम ना पुनरभवम भगवत संग संगस मरता नाम किमताष यदि आपके प्रेमी जनों का आधे क्षण के लिए भी समागम हो जाए तो उसके सामने मैं स्वर्ग और मोक्ष को कुछ नहीं समझता कि मृत्यु लोक के तुच्छ भोगों की तो बात ही क्या है प्रभु जो आपके चरणों का भरोसा रखते करते हैं।
उनके सारे पाप आप नष्ट कर देते हैं। सर्व धर्म परित्यज मामेकम शरणम ब्रज यह बहुत मीठी बात है। अहम तम सर्व पापभ मोक्ष्याम मासचा जो आपके केवल चरणों का भरोसा रखते हैं। यहां भरोसे की बात कही। सारे पाप राशि के राशि नष्ट हो जाते हैं। प्रभु जो आपके चरणामृत का और आपके कथामृत का चरणामृत और कथामृत इनका जो पान करते रहते हैं वो राग द्वेष रहित सरलता पूर्वक सतोगुण रजोगुण तमोगुण पर विजय प्राप्त करके वो आपकी प्राप्ति कर लेते हैं। आपका चरणामृत और आपका कथामृत खूब लीला कथा सुनना और चरणामृत भगवान का पान करना।
जिन साधक का चित्त भक्ति योग से अनुग्रहित एवं विशुद्ध होकर यह भगवत प्राप्त होने की स्थिति का वर्णन है। इसमें ना यसितम बहिरर्थ विभ्रमम तमो गुहायाम च विशुद्ध मा विषत य भक्ति योगानुग्रही मंजसा मुनर विचष्ट नन तत्रते गतिम ऐसी स्थिति में भगवत साक्षात्कार होता है सरल भाषा में उड़िया बाबा ने इसी को कहा जिसका किसी भी नवीन विषय भोग भोगने की इच्छा का भाव खत्म हो गया है जो पूरे विश्व में राग द्वेष से रहित है वह भगवत प्राप्त है या भगवत प्राप्ति होने वाली है। यहां वर्णन करते हैं ना यसितम बहिरर्थ विभ्रमम जिस साधक का चित्त किसी भी विषय में नहीं जा रहा है।
ना अच्छा ना बुरा ना सत ना असत जिसे कहा गया न सोचति ना काति ना यसितम बहिरर्थ विभ्रमम डूबा है नाम में मंत्र में रूप में लीला में ना कोई बाहर विषय ना कोई अंदर विषय चिंतन तमोग गुहायाम जो अज्ञान रूपी अंधकार में प्रकृति में आकर्षित होकर जाना यह सब खत्म हो चुका है। इतना भजन में स्थिति है कि जो अज्ञान के कारण मना खष्टान इंद्रण प्रकृति स्थान करति वो खत्म हो चुका है। ना अंदर विषय चिंतन ना बाहर कोई लुभायमान विषय ना बाहर भटकना ना अंदर से किसी गुण का प्रवाह बोले वो अनायास ही आपका दर्शन पा जाता है।
अनायासी भगवान का किसी भी क्षण दर्शन हो सकता है। अब जिसके अंदर किसी भी भोग की इच्छा नहीं। मंत्र नाम में इतना डूबा हुआ है कि भटक ही नहीं रहा मन जा ही नहीं रहा। अब वो किसी क्षण भगवत साक्षात्कार कर सकता है। कितना विजय में सुख होता है वह वही जानते हैं जो विजय को प्राप्त होते हैं। सोचो जब साधारण खेलों में विजय होती है तो पूरा भारत उत्साह मनाता है। नहीं बोले अमुक खेल में वो विजय प्राप्त किए तो पूरा भारत आनंदित। सोचो जो इस माया खेल में संपूर्ण त्रिभुवन पर विजय प्राप्त कर लिया।
संपूर्ण त्रिभुवन को पराजित करने वाली माया पर विजय प्राप्त करके मायाधीश भगवान का साक्षात्कार कर लिया। क्या आनंद हो? उसका आनंद का कैसे वर्णन करें? किसको होता है? बोले नाितम बहि विभ्रमम तमो गुहाया विशुद्ध मा य भक्ति योगानुग्रहित मंजसा मुनर विच न तत्रते गतिम जिसकाित भक्ति योग अर्थात भगवान में इतना तन्मय है कि बाहर के विषय का कोई भी आकर्षण नहीं वो अंदर जो मन विषय देता रहता है वो भटकना बंद कर दिया सतोगुण रजोगुण तमोगुण का कोई प्रभाव उसके के ऊपर नहीं पड़ रहा।
हर समय भजन में डूबा हुआ बोले वो अनायास ही आपके स्वरूप का दर्शन पा जाता है। किसी क्षण भगवत साक्षात्कार हो सकता है। भगवन आपकी माया अनेक रूप धारण करती है। कोई यह नहीं कह सकता कि यह माया है। ऐसी प्रवीण है। वो अनेक रूप धारण करके छल करती है। रचना पालन संघार यह सब इसी के रूप है। परंतु आप में कोई विकार माया पैदा कर दे जैसे संभव नहीं। ऐसे उस भक्त में माया विकार पैदा कर दे संभव नहीं जो आप में चित्त जुड़े हुए हैं। माया जो आपसे विमुख लोग हैं उनमें भेद बुद्धि पैदा करती है।
जो आपके सम्मुख भक्त जन है उनमें नहीं। जैसे आप परमात्मा पर माया कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। ऐसे जिनका चित्त हर समय प्रभु में जुड़ा है उस पर माया कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। जैसे आप परम स्वतंत्र हैं वैसे वह भी भक्त परम स्वतंत्र हो जाता है। जो आपका पूजन करते हैं। आपकी उपासना करते हैं। आपका नाम जप करते हैं। आपकी शरण में हैं। उन्होंने ही वेद और शास्त्रों का सच्चा ज्ञान प्राप्त किया है। वही कोविदा है। वही सच्चे शास्त्र के ज्ञानी हैं जो आपका पूजन करते हैं। इसी को पकड़ लो।
भगवत सेवा करना। अब हम तुम्हें कैसे बताएं? ठाकुर जी जरूर विराजमान कर लो। सेवा में यह पकड़ लेते हैं। यह खेलने लगते हैं। यह चित्त चुराते हैं। मतलब शब्द हमारे पास नहीं है। हम इस बात से अनविज्ञ थे। हम तो इतना ही जानते थे। अपनी इंद्रिय और मन को अधीन करके अपने स्वरूप में स्थित हो जाना। ये तो वृंदावन की लीला कहते हैं ना वृंदावन की लीला मत समझो गुरु को चीरा। यहां ऋषि मुनि गए हार जपे जा राधे राधे। अरे गजब की गजब की ठाकुर की लीलाएं हैं। गजब की आश्चर्यमई लीलाएं हैं।
हम ये कहते सबसे प्रार्थना करते हैं कि जरूर चाहे छोटे ही श्री विग्रह युगल सरकार के जरूर विराजमान करो। जरूर उनको श्रृंगारित करो। जरूर उनको दुलार करो। हे अगर ऐसे चार पत्ते की टहनी भी लेकर ऐसे उनको श्रृंगारित कर दोगे ना वो रीझ जाएंगे। बहुत रिझवार ठाकुर सेवा जरूर करो। देखो यहां जो पुरुष शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना चाहता है। सिद्धि का तात्पर्य होता है भगवत प्राप्ति। वह भगवान के श्री अंग का पूजन सेवा नाम जप भगवान की शरण तो वेदे च तंत्रे चत एव कोविदा बोले शास्त्र में तंत्र शास्त्र में वेद में जो रहस्य है वो सच्चा ज्ञानी है वो जान गया यही रहस्य है भगवान का पूजन करना भगवान की आराधना करना नाम जप करना उनको पद सुनाना उनको को दुलार करना।
अरे पूछो मत। बस शब्द नहीं है। हम इतना कहते हैं कि सेवा जरूर करो। जरूर सेवा करो। जरूर सेवा करो। छोटी सी छोटी सेवा को बहुत करके मानते हैं और फिर ये चित्त में सवार हो जाते हैं। फिर ये जो कितना दुलार होता है जब वो कहते हैं कि हमें ये दो। कैसा लगेगा? जब प्रभु आपसे कहे हमें ये पहनाओ। हमें पवाओ हमको वहां घुमाओ कैसा लगेगा आपको रोना आएगा रोना रोना आएगा आप जब आपसे बात करेंगे तो आपको पता चलेगा और बात तब करेंगे जब आप किसी से बात नहीं करोगे केवल उन्हीं से बात करोगे उन्हीं का श्रृंगार करोगे उन्हीं को देखोगे तो बात करने लगेंगे अनन्य भक्ति प्रभु इस सृष्टि की पूर्व माया आपकी ही शक्ति से सोई रहती है।
आपकी ही शक्ति से जगती है और आपकी शक्ति से ही सब कुछ रच देती है। यह आपकी शक्ति है। प्रभु आप अपनी माया को स्वीकार करके ही जरायु दंडत श्वद उभित चार प्रकार के 84 लाख योनियों के रूप में आप ही प्रकट होते हैं। खुला लिखा हुआ है हमारे दिखाई नहीं दे रहा वही है प्रभु इन शरीर और इंद्रियों में रहकर तुच्छ विषय को जो भोगता है वो अंश या पुरुष जो जीव कहलाता है वो आप ही है। बस यही समझना है। यही समझना है। भूल गए हम प्रभु को दोष देने के लिए बहुत जन आते हैं। भगवान ने ऐसा क्यों किया?
भगवान ने ऐसा क्यों रचा? अरे बावर रे तू कौन है? देख तू कौन है? जब देखेगा तो सारे प्रश्न समाप्त हो जाएंगे। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति न काति प्रभु जैसे वायु अपने असहनीय प्रचंड झोंकों से मेघों को तितर विितर करके नष्ट कर डालती है। ऐसे ही माया का प्रबल वेग मोह ग्रस्त करके जीव को प्रमाद व दौड़ाए हैं। यह कार्य करना ये करना ये कर लिया ये करूंगा ऐसा हो जाएगा। प्रचंड झोंका माया का चैन नहीं लेने देता और जब भगवान की कृपा हो जाती है माया हटती तो गोस्वामी जी कह रहे जाकी कृपा लवलेशते मति मंद तुलसी दास पायो परम विश्राम काम मिट गया कामना मिट गई वासना मिट गई कितनी अपार शांति जब तक आपका भजन नहीं तब तक लोभ और विषय भोगने की लालसा ये मिट मिट नहीं सकती।
लोभ भोग भोगने का वस्तुओं का संग्रह करने का रुपया पैसा मान प्रतिष्ठा नाम कीर्ति विषयों की लालसा और लोभ ये मिट नहीं सकता। और वो पूरा जीवन विषय पुरुष इसी में व्यतीत करता है और आप काल रूप से उसको नष्ट कर देते हैं। वो जान नहीं पाता। जो आपकी अवहेलना करते हैं, वह अपनी आयु को व्यर्थ नष्ट करते हैं। व्यर्थ नष्ट करते हैं। ये नाम जप ना छूटे नाम पकड़ लो नहीं तो पूरा जीवन व्यर्थ चला जाएगा। प्रभु यह काल आपका अंश है। किसी को नहीं बखशता। हमारे पिता ब्रह्मा को भी नहीं।
स्वयंभू को नहीं कोई भी ऐसा नहीं जिसको काल चाट ना जाए। एक बात है बस श्रद्धा से जितना जीवन अब बचा है नाम जप भगवत कथा सुनो भगवत सेवा करो। अगर शरीर में थोड़ी भी सामर्थ हो तो ठाकुर सेवा जरूर विराजमान कर लो। जिसके कोई नहीं होंगे उनकी ये सेवा स्वयं करने लगते हैं। स्वयं सेवा करने लगते हैं। ये विराजमान करो। ठाकुर सेवा जरूर सब विराजमान करो। ठाकुर सेवा कुछ ना होए तो एक तुलसी दल चरणों में चढ़ा दो वृंदावन का कोई पत्ता लाके ऐसे दो चार पत्ते ऐसे उसी में हमारे ठाकुर वृंदावन के ठाकुर बहुत जल्दी रिझवार ठाकुर है और जो आप पाओ भोग लगा दो बहुत सरल सेवा है अच्छा यहां कोई मंत्रों वाली है नहीं सेवा कि हमें तो मंत्र नहीं आते हमें भोग लगाने के मंत्र कुछ नहीं राधा राधा राधा पूरी सेवा इसी से कर लो यहां भाव की भावोत्सवेन भजता रस कामधेनु कर्माबाई पद्धति से खिचड़ी पवाती थी क्या सब पद्धति अलग भाव की पद्धति अलग हे ब्राह्मण ये सारा जगत काल से भयभीत है हे परमात्मन जो आपकी शरण में आ गए वही भय शून्य हो जाते हैं।
भगवान शिव कह रहे हे राजकुमारों यह जो मैंने स्तोत्र कहा तुम परम पवित्र होकर स्तोत्र का जप करो बहुत जल्दी भगवत साक्षात्कार हो जाएगा। बार-बार जब श्री हरि को पुकारा जाता है, उनका चिंतन किया जाता है, उनकी सेवा की जाती है तो हरि विवश होकर आ जाते हैं। विवश होकर आ जाते हैं। मैंने तुम्हें यह योगादेश नाम का स्तोत्र सुनाया। इसे तुम मनन करना। मुनिव्रत आचरण करते हुए एकाग्रता पूर्वक आदर पूर्वक इस स्तत्र का गायन करना। यह महामहिम स्तोत्र है। यह पूर्व काल में जगत विस्तार के इच्छुक प्रजापतियों के पति भगवान ब्रह्मा जी ने प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा वाले हम भृगु आदि अपने पुत्रों को सुनाया था।
फिर इसका विस्तार होते हुए आगे बढ़ा। जो इस ये हमने गुरु कृपा से इसका अनुष्ठान किया। गंगा किनारे अनुष्ठान किया। बड़े दिव्य अनुभव बहुत गंगा के किनारे बहुत आनंद आता था क्योंकि किसी से मिलना जुलना नहीं था। वह रात दिन वो तो जैसे आश्रमों में रुकते थे तो ग्रंथ होते थे और अगर भ्रमण में चल दिए तो भी कोई ग्रंथ पास नहीं होते। यह तो मंत्रकार वृत्त देवी जी की जब जिस समय क्योंकि स उपासना उस दुर्गा सरस्वती का जब अनुष्ठान तो ये सब दिव्य है दिव्य अब अपने लोग समय खानपान व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं।
अगर अनुष्ठानों में लगे तो अभी दिव्यता तुम्हें जैसेजैसे योग्यता बढ़ती जाएगी वैसे वैसे आपको दर्शन होने लगेंगे। संत महापुरुषों के दर्शन, दैवी शक्तियों के दर्शन, भगवत दर्शन ये सब होने लगेंगे। भगवान की आराधना बहुत कठिन है क्योंकि मन लगता नहीं है। परंतु जो इस स्तोत्र का पाठ करेगा सुनेगा तो सुगमता पूर्वक उसका मन भगवान की आराधना में लगने लगेगा। भगवान शिव कह रहे हैं मेरे द्वारा गाए हुए स्तोत्र का जो गान करेगा श्रवण करेगा वो जो चाहे प्राप्त कर ले इस स्तत्र के गायन श्रवण से जो पुरुष उषा काल प्रातः काल उठकर श्रद्धा पूर्वक हाथ जोड़कर गाता है या सुनता है वो इस स्तोत्र के प्रभाव से कर्म बंधन से मुक्त होकर भगवान को प्राप्त करता है।
हे राजकुमारों मैंने तुम्हें परम पुरुष परमात्मा का स्तोत्र सुनाया। एकाग्रित से तुम तपस्या करो। तप पूर्वक इस स्तोत्र का गायन करो। भगवान शंकर प्रचेताओं को उपदेश अभी दिए और तत्काल अंतर्धान हो गए। ना वह सरोवर ना वह कोई पशु वहां पक्षी ना कोई संगीत ना रागराग कुछ नहीं सब खत्म वो भगवान शिव ने प्रकट किया था प्रणाम किए उस दिशा को और समुद्र में जाकर के भगवान रुद्र के बताए हुए इस स्तोत्र का 10 हजार वर्ष तक जप करते रहे कलयुग भगवान की जय 10,000 100 वर्ष की आयु अगर पूरी आयु और उसमें बच्चापन तो ऐसे ही चला गया।
सोने वाला समय ऐसे चला गया। 10,000 वर्ष तक ना सोना ना कोई खाना ना पीना समुद्र के जल में खड़े होकर तब हरि की जय हो कलयुग की। हम तो कहते जय हो कलयुग की जो बहुत जल्दी भगवत प्राप्ति कराता है। 10,000 वर्ष तक तपस्या में और इधर उनके पिता जो प्राचीन बर थे वो यज्ञ में जब कोई किसी भी तरह से भगवत आराधना करता है तो उसको पूर्ण करने के लिए महापुरुषों का सानिध्य मिलता है। आत्म विद्या विशारत परम कृपालु नारद जी ने देखा कि यह तो केवल यज्ञ स्वाहा स्वाहा राजन इतनी यज्ञ कर डाली कि कोई भारत में भूमि ही नहीं बकाया रह गई क्या फल चाहते हो दुख के आत्यांतिक नाश और परमानंद की प्राप्ति कर्मों से नहीं मिलती राजा ने कहा प्राचीन बरी जिनके पुत्र पुत्र अभी तपस्या में 10,000 वर्ष तक यह यज्ञ में उन्होंने कहा मेरी बुद्धि तो कर्म में ऐसी फंस गई है कि मुझे लगता है इसके सिवा और मैं कुछ कर नहीं सकता यज्ञ के सिवा और आप कहते कर्मों से दुख के आंतिक नाश और परमानंद की प्राप्ति नहीं होती तो कैसे होती परमानंद की प्राप्ति क्योंकि हम तो गृहस्थ में पुत्र स्त्री धन यज्ञ आदि करके यही परम पुरुषार्थ मानते हैं।
देवर्षि नारद जी के चरण पकड़ के प्राचीन बरही ने कहा मेरा परम कल्याण कैसे हो? आप उपदेश कीजिए। देवर्षि नारद ने कहा उपदेश तो बाद के पहले आकाश में देखो। देखो तुमने इन जो यज्ञों में बलि दी है वह सब आकाश में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं और ये भी तुम्हारा शरीर छूटा यह सब तुम्हारी दुर्गति के कारण बने ये सब तुम्हें भयानक पीड़ा देंगे ये मत समझो कि तुम्हें भगवान की प्राप्ति हो जाएगी जो तुमने इन जीवों को कष्ट दिया है यह सब लोहे के सींगों से युक्त तुम्हें छेद छेद कर मारेंगे।
यह तुम्हें बहुत कष्ट देंगे। सुनो यहां जो भी कर्म किया जाता है उसका दंड मिलता है। फल मिलता है। तुमने इन जीवों को मारा। शिकार में जीवों को मारा। ये सब तुम्हें मारेंगे। आकाश में देखो। सुनो मैं एक तुम्हें चरित्र सुनाता हूं। जिस चरित्र का नाम है पुरंजन उपाख्यान पुरंजन चरित्र सावधान होकर सुनो पूर्व काल में एक पुरंजन नाम का बड़ा यशस्वी राजा था और उसका अविज्ञात नामक एक मित्र था अविज्ञात जिसका पता नहीं है पुरंजन यह देखो पुर है और इस पुर में जो आनंद मनाने लगा उसे पुरंजन कहते हैं।
पुरंजन हुआ जीव और अविज्ञात सखा हमारे अभिज्ञात सखा है भगवान बहुत सुंदर उपाख्यान है अगर समझ में आ जाए पर जब तक पवित्र बुद्धि नहीं होगी तब तक पुरंजन नाम का एक बड़ा यशस्वी राजा था और उसका अविज्ञात नामक एक सखा था। सबके सखा भगवान है। पुकार के देख लो। अगर आप केवल भगवान को अपना मित्र मानते हैं तो आपको उत्तर मिलने लगेंगे। क्योंकि अविज्ञात सखा अपनी अहतुकी कृपा से सबसे प्रेम करते हैं। सममम प्रिय सम्मम उपजाए। अविज्ञात नामक सखा की चेष्टाओं को कोई समझ नहीं सकता था।
वह ऐसा मित्र था। सहयोग करता है पर कोई जान नहीं पाता कि भगवान मेरा सहयोग कर गए। किस रूप में आकर के आपका सहयोग करेंगे। अब राजन वो जो पुरंजन नाम का राजा था वो घूम रहा था। क्योंकि उसे भोगों की लालसा थी। भोग भोगने के लिए उसने जितने नगर देखे उनमें से कोई पसंद नहीं आया। 8399 नगर देखे लेकिन कोई पसंद नहीं आया। एक दिन उसने हिमालय के दक्षिण तटवर्ती शिखरों पर कर्मभूमि भारत खंड में नौ द्वारों का एक महल देखा। नगर देखा। सब प्रकार से सुलक्षण संपन्न नगर था। नौ द्वारों का कितने द्वार है इसमें?
नौ। यह पसंद आया पुरंजन को। जीव को यह शरीर पसंद आया। बड़ा सुंदर अब वो तो रूपक में वर्णन कर रहे। बड़ा सुंदर नगर। ऐसा लग रहा था उसको कि अभी तक जितनी मेहनत की उसका मुझे फल मिल गया। खोज करने का फल मिल गया। जिधर देखो उधर आकर्षण ही आकर्षण। अब पुरंजन ने सोचा बहुत सुंदर महल बहुत सुंदर हमें विश्राम स्थल मिल गया। स्वीकार कर लिया। लेकिन जो ही उसमें प्रवेश किया तो एक सुंदरी आती दिखाई दी। और वह अकस्मात उधर से आ रही थी और उस सुंदरी के साथ 10 सेवक थे जो प्रत्येक 100 100 नायिकाओं का पति था और पांच फण वाला सांप उस नौ द्वार वाले नगर की रक्षा कर रहा था।
एक सुंदरी आती दिखाई दी। जिसके साथ 10 बलवान सेवक थे। उन बलवान सेवकों में एक एक के पास 100 100 पत्नियां। पांच फण वाला सर्प उस नगर की रक्षा करता था। वह सुंदरी नव युवती मानो विवाह के लिए श्रेष्ठ पुरुष को खोज रही थी। बड़ी ही सुंदर मानो कोई देवी हो साक्षात। नासिका दंत पंक्ति कपोल मुख सब सुंदर और किशोरावस्था लज्जावश अपने अंचलों को ढकते हुए आगे बढ़ रही थी। पांच फड़ वाला सर्प रक्षा कर रहा था। 10 महान सेवक उसके साथ थे। अब वह जे भी प्रेम पूर्ण तिरछी चितवन से पुरंजन को देखा तो पुरंजन घायल हो गया नारी नयन सर जाह न लागा चाहे जितना वीर हो मुस्कुरा के तिरछी चितवन तो सीधे हृदय पर प्रहार होता है बोल भी ना पावे पुरंजन एकदम आसक्त हो गया और कहा कमल दल लोचने तुम कौन हो?
किसकी कन्या हो? कहां से आ रही हो? तुम इस पूरी में हो। क्या करना चाहती हो? ये 10 सेवक कौन है? और ये बहुत सी सहेलियां तुम्हारे सामने कौन है? और ये पांच फण वाला सर्प कौन है? सुंदरी तुम कौन सी देवी हो? कमला हो तो तुम्हारा क्रीड़ा कमल कहां गया? लज्जा देवी हो। कौन देवी हो? नहीं नहीं तुम कोई देवी तो हो नहीं क्योंकि तुम्हारे चरण पृथ्वी का स्पर्श करते हैं और देवियों के चरण पृथ्वी का स्पर्श नहीं करते। यदि तुम मानवी हो तो मैं तुम्हें देखकर आसक्त हो गया हूं।
मैं बहुत वीर हूं, पराक्रमी हूं। पर तुम्हारे कटाक्ष ने मेरे मन को बेकाबू कर दिया है। इसलिए क्या तुम मुझ पर अपनी कृपा करोगी? सुचिस्मते मैं तुम्हारे दर्शन से बिक चुका हूं। नारद जी कहते हैं वीरवर जब राजा पुरंजन ने अधीर होकर दैन्य होकर याचना की यह कामदेव ऐसा विचित्र धनुर्धर है कि कोई कितना भी बलवान हो जब यह बाण संधान कर देता है तो घुटने के बल हो जाता है। वो पैर छुएगा हाथ जोड़ेगा विनय करेगा जैसा चाहे वैसा अधीनता पुरंजन अधीन हो गया उस नवयुवती को देखकर उस नवयुवती ने कहा नर श्रेष्ठ मुझे पता नहीं कि मैं कौन हूं।
बहुत सुंदर उपाख्यान है। मुझे पता नहीं उत्पन्न करने वाला कौन है। मैं ना अपने को जानती हूं ना दूसरे को जानती हूं। मेरा गोत्र क्या है? कुल क्या है? नाम क्या है? मैं कौन हूं? कहां उत्पन्न हूं? मुझे कुछ पता नहीं। बस इतना देख रही हूं कि मैं इस पूरी में हूं। सामने तुम हो। यह भी मुझे पता नहीं कि पूरी किसने बनाई प्रियवर यह मेरे सखा और मेरी सहेलियां हैं और यह सर्प इस पूरी की रक्षा करता है। आप यहां पधारो आपका मंगल हो और मैं आपको विषय भोगों की इच्छा पूर्ति करती रहूंगी।
अपने साथियों के साथ जो भोग कहोगे वह भोग प्रस्तुत करती रहूंगी। अब वह पुरंजन नौ द्वार वाली इस नगरी में बहुत आनंदित हो गया। पुरंजनी ने कहा कि मैं अनन्य हूं। आपको छोड़कर किसी के साथ में रमण नहीं करूंगी। और मैं बहुत प्रवीण हूं। हर भोग को परोसूंगी आपके पास। जो चाहोगे अब क्या था पुरंजन वैसे ही पहली दृष्टि में आसक्त हो गया था अब तो और आसक्त हो गया संसार त्यागी यतिजन जिस महा सुख को प्राप्त होते हैं उस सुख को भुलाने वाली पुरंजनी के चक्कर में पड़ के राजा राजा पुरंजन अपना अस्तित्व ही समर्पित कर दिए।
पुरंजनी ने कहा कि वीरवर लोक में मेरी जैसी स्त्री जिसको प्राप्त हो जाए फिर उसे कोई ठुकरा सके ऐसा कोई पुरुष नहीं। और आप जैसा पुरुष मिल जाए मैं ठुकरा दूं ऐसा हो नहीं सकता। अब उन दोनों ने बात पक्की कर ली और 100 वर्ष तक उस नौ द्वार की पूरी में रहकर आनंद भोगना प्रारंभ किया। विषय आनंद उस नगर में जो नौ द्वार थे उनमें सात नगरी के ऊपर थे। नगरी के ऊपर एक दो तीन चार पांच छ सात और दो नीचे के द्वार जब जब इस नगरी का जो राजा हुआ तो इनहीं द्वारों से आया इनहीं द्वारों से निकला पांच पूर्व की ओर एक दो तीन चार पांच एक दक्षिण की ओर एक उत्तर की ओर दो नीचे पश्चिम की ओर द्वार पूर्व की ओर पहला द्वारक खदता आवि मुखी नाम के दो द्वार एक जगह राजा पुरंजन अपने मित्र दमान के साथ विभ्राजित नगर देश को जाता है।
अभी तो कथानक रूप में नलिनी नालिनी नाम के दो द्वार ये अवधूत सौरभ के साथ और पूर्व दिशा की ओर मुख्या नाम का पांचवा द्वार उनसे होकर रसग विपण के साथ बहुदन आप देश को जाता है। पुरंजन इनहीं द्वारों में जो पश्चिम दिशा की ओर आसुरी नामक द्वार है वह दुर्मत के साथ ग्रामक देश को जाता है। नैरति नाम का जो दूसरा पश्चिम द्वार है वो लुब्धक के साथ वैस नामक देश को जाता है। पुरंजन इन्हीं द्वारों में घूमता रहा। इस नगर के निवासियों में निर्वाक और पेशकृत यह दो नागरिक अंधे थे।
इनका आश्रय लेकर के जाता है। अब वो पुरंजनी को प्रसन्न करने के लिए ही पूरा जीवन लगा दिया। कैसे? ठगा गया। रमणी के हाथ ठगा गया। ठगा गया रमणी के द्वारा अधीनता पर अधीनता अधीनता पर अधीनता अब वो मध्यपान करती इसको भी मध्यपान कराती यह मद से उन्मत्त होकर के अगर पुरंजनी गाती तो यह गाता पुरंजनी हंसती तो पुरंजन हंसता वो रोती तो यह रोता जो करे बस वैसे ही वो दौड़ती तो आप दौड़ दौड़ता वो खड़ी हो जाती तो आप खड़े जो वो कहती वही ठगा गया सुंदरी पुरंजनी के द्वारा राजा पुरंजन ठगा गया पूरा का पूरा पुरंजनी का जो परिकर था इस राजा को रौंद दिया अपने अधीन कर लिया वो मूर्ख अपने को घर पाले हुए बंदर के समान बना लिया इसका रूपक आगे आगे वर्णन करेगी।
अब एक दिन राजा पुरंजन अपना विशाल धनुष सोने का कवच अक्षय तरकस धारण करके 11व सेनापति के साथ पांच गुणों के शीघ्रगामी रथ में बैठकर पंचप्रस्थ नाम के वन में गया। दो पहहिए, एक ध्वरी, तीन ध्वजा, पांच डोरी, एक लगाम, एक सारथी, एक रथी बैठने का स्थान जहां पुरंजन बैठा। बहुत सुंदर नारद जी रूपक दे रहे हैं। अब वो शिकार खेलने के शौक में कौन परवाह करता है? क्या कर मतलब किसको मारना चाहिए, किसको नहीं मारना चाहिए? शिकार के शौक में बड़े अपराध किए। अर्थात भोग वासना के शौक में मनमानी आसुरी प्रवृत्ति से जो इस पुरंजनी को प्रसन्न करने के चक्कर में फंसा हुआ पुरंजन है वह नहीं जान रहा मैं ऐसे आचरण कर रहा हूं जिनके कारण मुझे अधम योनियों में नरक में जाना पड़ेगा।
गंध चंदन माला यह सब भोजन सामग्री जुटाना पुरंजनी को बस प्रसन्न रखना कैसे पुरंजनी मुस्कुरा दे पुरंजनी मुस्कुराती तो है पर अधीन करके जैसे जैसे जीव अधीन हो जाता है वैसे वैसे बुद्धि उसको आसक्त करती चली जाती है अरे बहुत दुर्दशा है इस खेल को जान जाए तो जीवन मुक्त अभी हो जाए भाग पड़ो। यह पुरंजन का नाटक है। इसमें पुरंजन भोग इच्छा से फंस गया। इच्छा छोड़ दो। पुरंजन कौन है? अभिज्ञात सखा और पुरंजन दोनों एक हो जाएंगे। जैसे दर्पण हटाओ तो प्रतिबिंब खत्म। अब जो ही वो शिकार खेल के आया तो पुरंजनी बोली नहीं।
वो दासियों से हाथ जोड़ के पूछा पुरंजन की मेरा तो सर्वस्व लुट गया। क्या अपराध बन गया मुझसे? दासियों ने कहा नरनाथ मुझे मालूम नहीं तुम्हारी प्रिय पत्नी ने क्या ठाना है वो आज तो बोलेगी ही नहीं नाराज है। पुरंजन आसक्त हो चुका था। अस्तव्यस्त होकर चरणों में गिर गया। पुरंजनी आसक्ति को तो कोई आसक्तिवान पुरुष ही समझ सकता है। भोगी और आसक्ति थोड़ा हट करके है। भोगी को कहीं भी भोग मिले उससे कोई मतलब नहीं। आसक्तिवान भी भोगी होता है। पर आसक्ति प्रदान होने पर वो जिस पर आसक्त हुआ उसी पर आसक्त रहेगा।
दूसरे की तरफ नहीं आंख उठा के देख सकता। ये पुरंजन पुरंजनी से आसक्त था। बहुत व्याकुल होकर चरणों में गिरा और बोला सुंदरी वे सेवक तो बड़े अभागे होते हैं जो अपने स्वामी को प्रसन्न ना कर पावे और मेरे से यदि अपराध बना तो उचित दंड दीजिए क्योंकि अपने प्यारे के द्वारा दिया हुआ दंड बहुत मीठा होता है पर आप ना बोले ऐसा ठीक ये दंड मत दीजिए अब जो जो विनय स्त्रण पुरुष करता है वो सब पुरंजन ने विनय की। बड़े नखरे दिखाए। लिखा है नखरा। बड़े नखरे दिखाए। और जब देखा कि पुरंजन पूरे अधीन हो चुका है।
तब फिर मुस्कुरा दिया। अब उस कामिनी में आसक्त चित्त को पता ही नहीं चला कि आयु व्यतीत हो गई। उस रमणी ने ऐसा आसक्त किया पुरंजन को कि जिस कार्य के लिए वह आया था वह भूल गया और पुरंजनी में आसक्त होकर पूरा जीवन व्यतीत कर दिया। पूरी जवानी पुरंजन की ऐसे बीत गई मानो अभी आधा क्षण ही बीता हो। पुरंजनी से 1100 पुत्र और 110 कन्याएं हुई। सब वृत्तियां है। वृत्तियां यह पूरा परिवार पौरंजनी नाम से विख्यात हुआ है। सब एक दूसरे के ब्याह पुत्र का किसी वधू से पुत्री का पूरा जीवन स्त्री लंपट वृद्धावस्था को प्राप्त फिर भी पुरंजनी से दूरी नहीं इतने में चंडवेग नाम का एक गंधर्व रहा 360 महाबलवान गंधर्व उसके अंदर में रहते हैं 365 दिन होते हैं।
360 महाबलवान गंधर्व और इनके साथ मिथुन भाव से उतनी ही गंधर्वियां मिथुन भाव कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष बारी-बारी से चक्कर लगाकर भोग विलास सामग्रियों की भरी पूरी इस नौ द्वारों वाली नगरी को यह नष्ट करती रहती है। चंडवेग अपने अनुचरों के साथ राजा पुरंजन के नगर को विध्वंस करना प्रारंभ किया तो पांच खण वाले सर्प ने रोका। ये पुरंजन पूरी की चौकसी करने वाला 100 वर्ष तक अकेला लड़ता रहा। 720 गंधर्व गंधर्वियों से युद्ध करता रहा। बहुत से वीरों के साथ युद्ध करने के कारण वो बलहीन हो गया।
अब स्त्री के वशीभूत महल में पड़ा हुआ पुरंजन बूढ़ा स्त्री के समीप ही उसे पता चला कि अब तो आसपास शत्रुओं ने घेर लिया। एक दिन काल की एक कन्या वर की खोज में त्रिलोकी में भटक रही थी। किसी ने स्वीकार नहीं किया। काल की कन्या वृद्धावस्था जरा उसे दुर्भगा कहता थे तो इसलिए कोई उसे स्वीकार नहीं किया। उसने जबरदस्ती आकर के पूरंजन को स्वीकार किया। बूढ़ी अवस्था वृद्धा अवस्था [गला साफ़ करने की आवाज़] बहुत हम लोगों की हम यही दुर्दशा है। इसी पुरंजन पूरा इसी में आगे चलकर इसका व्याख्या भी करते हैं।
यवनराज अपने श्रेष्ठ वीरों के साथ ऊपर से चढ़ाई कर दी पुरंजन के ऊपर। और यह गुप्त रूप से पता ही नहीं चल पाया पुरंजन को। यह काल कन्या जिसके यहां जाती जिसके समीप जाती जजर कर देती है। और यमनराज मृत्यु फिर उसे नष्ट कर देता है। प्रज्वल नामक उसका भाई है। यह भयंकर गति से त्रिभुवन में विचरते रहते हैं। अब बलात इतना आक्रमण हुआ उसकी नगरी में सब नष्ट भ्रष्ट हो गई पूरी नगरी आंखों से दिखता नहीं है। कान से सुनता नहीं है। दांत भी काम नहीं कर रहे। ये सब वृद्धावस्था यवनों ने बलात उसका ऐश्वर्य लूट लिया।
अब जब पुरंजन ने देखा कि सब कुछ नष्ट भ्रष्ट हो गया तो पुरंजनी का आलिंगन किए हुए पड़ा है। अब भी अगर छोड़ दे तो बच जाए पर वो भोगों की लालसा अब भी है। वो अपनी स्त्री में अब भी वैसे ही आ सकते हैं जैसे पहले दिन मिला था वैसे से। अब जब बिछड़ने का समय आया काल मृत्यु जरा इन सब का आक्रमण प्रज्वल ने आग लगा दी पूरी पूरी में नगरी जलने लगी पुरंजन बड़ा व्याकुल हुआ काल कन्या ने सर्प को पीड़ा पहुंचाकर उसको अध अधीन कर लिया। प्रज्वार ने आक्रमण कर दिया। अब जैसे कोटर में रहने वाला सर्प आग लगने पर भाग जाता है।
ऐसे पांच फण वाला सर्प बड़े कष्ट से इस पूरी से निकला। वो पंच प्राण पुरंजन अब भी बुद्धिहीन है। अब भी अपनी स्त्री के प्रेम पास में पुरंजनी के प्रेम पास में ऐसा फंसा हुआ गले से लगाए है। मरने जा रहा है। फिर भी उसका वो बस यही सोच रहा है। इतनी सुंदर भार्या मेरी इतना समर्पण इतना प्रेम इसी का चिंतन ज्ञान दृष्टि बिल्कुल नष्ट हो चुकी है अज्ञानवश इतना शोकाकुल होकर के अपनी पुरंजनी का चिंतन किया कि ये उसी में तन्मय हो गया। अब अज्ञानवश इस स्थिति में उसने अपने अविज्ञात सखा का स्मरण नहीं किया नहीं वो बचा सकता था।
अब निर्दयी यमनराज ने उसको बल पूर्वक मार डाला। बलपूक मार डाले। जबरदस्ती प्राणों को खींच कर बात और अंतिम समय वह अपनी पुरंजनी को देख रहा है। इसीलिए गोस्वामी जी ने मांगा है कामी नारी पिया जिम लोभी जिम प्रियदाम तिम रघुनाथ निरंतर प्रिय लागो मोहे बहुत सुंदर स्थिति अगर वही इधर आ जाए तो बहुत सुंदर स्थिति स्त्री की आसक्ति में दुर्गति हो गई उसकी अब वो अपनी पुरंजनी के गले लगा उसी का चिंतन करते हुए तो अगला जन्म उसको विदर्भ राज के यहां सुंदरी राजकुमारी के रूप में विदर्भ राज पुरंजन से पुरंजनी की आसक्ति के कारण राजकुमारी बना।
स्त्री चिंतन तो स्त्री बना। फिर जब वो सयानी हुई पुरंजन राजकुमारी रूप तो विदर्भ नंदनी विवाह योग के हुई तो फिर विदर्भ राज ने घोषित कर दिया कि सर्वश्रेष्ठ पराक्रमी वीर इससे ब्याह करेगा। तो मलय ध्वज ने सब राजाओं को जीतकर उस राजकुमारी से विवाह किया। फिर उससे सात पुत्र उत्पन्न किए। सात पुत्र कौन है? पुरंजन राजकुमारी बना। बड़ा। अब जब मलयध्वज अवस्था आगे बढ़ी तो तो भजनानंदी थे भगवान श्री कृष्ण के भजन के लिए मलय पर्वत पर तो वो राजकुमारी जो रानी थी पुरंजन जो बना था वो पीछे पीछे उनके महाराज मैं आपके वो आसक्त चेत पुरुष में ये ऐसे चल रहा चक्र और किसी की कथा नहीं हमारी तुम्हारी कथा है अभी जब आगे चल के बताएंगे कौन है पुरंजनी यही बुद्धि यही बुद्धि जो बुद्धि कहे वही वही दुर्गति कराती चली जा रही अब वो बड़े तपस्या पूर्वक भजन करके मलध्वज ने अपने शरीर को छोड़ दिया।
अब यह शरीर को पकड़े रो रहे हां मेरे प्रीतम हां मेरे प्रीतम आप मुझे छोड़कर चले गए। भगवान ने उस समय कृपा की। तू कौन है? किसकी पुत्री है? किसके लिए शोक कर रही है? ब्राह्मण के रूप में भगवान प्रश्न कर रहे हैं। यह सोया हुआ पुरुष कौन है? बता सकते हो और मेरी तरफ देखो। मैं तुम्हारा अविज्ञात मित्र हूं। हम तुम एक साथ खेलते हैं। लेकिन तुम हमें भूल गए हो। हम तुम्हें नहीं भूले। सखा मेरी याद कर। मैं तुम्हारा अभिज्ञात नामक सखा हूं। तू भोगों में भूल करके मेरा विस्मरण कर दिया।
लेकिन मैंने तेरा विस्मरण नहीं किया। मैं आज भी तुझे याद कराने के लिए तेरे पीछे खड़ा हूं। देख तू हम दोनों हंस हैं। यही बात है। शास्त्रों वर्ष हम दोनों एक ही होकर रहे हैं। बड़ा गढ़ वचन है। किंतु मित्र तुम विषय भोगों की इच्छा से हमें भूलकर इस लोक में रमण करने लगे। तुमने घूमते घूमते एक स्त्री में आसक्त हो गए। पांच बगीचे, नौ दरवाजे, एक द्वारपाल, तीन परकोटे, छह वैश्य कुल, पांच बाजार, पांच उपादान कारणों से बना हुआ उसकी स्वामिनी, एक स्त्री और इस स्त्री के चक्कर में तो मारा गया।
स्त्री बुद्धि। इंद्रियों के पांच विषय शब्द स्पर्श रूप रस गंध यह बगीचा है और ये नौ द्वार इस नगरी के तेज जल अन्न ये परकोटे मन और पांच ज्ञानेंद्रियां छह वैश्य कुल और क्रिया शक्ति ये कर्मेंद्र बाजार पंच महाभूत कभी ना क्षीण होने वाले उपादान कारण और बुद्धि ही पुरंजनी है। इसी में फंस गया बुद्धि में बुद्धि से हटना है। इस बुद्धि से साक्षी भाव रखना है। इसका निर्णय नहीं मानना। दृष्टा भाव नहीं जब तक आएगा तब तक बुद्धि में आसक्त है। जो कहेगी वही अभी बुद्धि ठान ले मन के साथ कि ये करना है तो तुम्हें घुटने टेकना पड़ेगा।
वही करवा देती है जो चाहेगी। यह है हम पुरंजन। पुरंजन जीव आसक्त हो गया बुद्धि पर। आगे बढ़िया निर्णय है। हे मित्र तू स्त्री नहीं है। देख तू स्त्री नहीं है। खड़ा हो। अब अपने पति का शव पकड़ कर रो रही विदर्भ। तू पहले पुरंजन था। पुरंजनी के चक्कर में अब तू स्त्री बना। कितनी बार तेरी दुर्दशा हो चुकी। तू स्त्री नहीं खड़ा हो जा। और देख अपने स्वरूप को मैं तेरा सखा हूं। जिनके संग से तेरी दुर्दशा हुई उसके लिए तू रो रहा है। अपने स्वरूप में यही गुरु है। यही अविज्ञात सखा अपने स्वरूप में कहां भूल गया ना तू स्त्री ना पुरुष।
अरे देख ना तू विदर्भ राज की पुत्री ना मलध्वज तेरा पति है। तू सावधान। पिछले जन्म में तू पूरंजन था। पुरंजनी के चक्कर में पड़ा। इस जन्म में तू राजकुमारी हुआ। मलयध्वज के चक्कर में पड़ा। अरे तू उठ मेरा सखा है। कहां फंस गया? पहले जन्म में तू पुरुष समझता था। इस जन्म में अपने को स्त्री मानता है। देख देख मेरी तरफ देख मेरा और तेरा स्वरूप एक है। मैं हंस हूं। अब वो जो रो रही थी हां पति हापति अब तो सावधान हुई और प्रभु की तरफ देखा। प्रभु ने कहा बहुत सुंदर अहम भवान चम तमेवा विक्ष देख देख तू मेरी तरफ मेरे और तेरे में कोई भेद नहीं जो तेरा स्वरूप मेरा स्वरूप मैं और तू एक है अहम भवान चारस्तम तू अन्य नहीं है मैं ही तू है तू ही मैं है विचार कर विचार कर तू वही है जो मैं हूं जो मैं हूं वही तू है देख तेरे मेरे में थोड़ा भी अंतर नहीं।
एक पुरुष अपने शरीर की परछाई को शीशे में किसी व्यक्ति के नेत्र में अलग-अलग देखता है। पर वो केवल शीशे और नेत्रों में ऐसे दिखाई देती है। वो एक ही होता है। इसलिए मैं आत्म तत्व हूं। वही तू है। मेरे में तेरे में भेद नहीं। जो तू जीव है वो मैं ईश्वर ही हूं जो मैं ईश्वर हूं वही भूल के इस नौ द्वार की देह में फंस गया तू जाग ए हंस तू जाग ए मानस सरोवर हंस तू जाग भगवान जिसे जगाए वो जग ना पावे भला ऐसा कैसे तत्काल जो राजकुमारी रानी बनी हुई रो रहे थे ना पुरंजन तत्काल काल से आत्मज्ञान हुआ और वो भगवत स्वरूप हो गया।
तत्काल सब राग मोह नष्ट हुआ। भगवत स्वरूप अर्थात अभिज्ञात सखा में लीन हो गया। प्राचीन बरही तुम वही पुरंजन हो। जिसका मैंने कथा सुनाई परोक्ष रूप से वर्णन किया। उसका स्पष्ट रूप से वर्णन सुनो। पुरंजन उपाख्यान का तात्पर्य देवर्षि नारद जी आगे सार बात है भैया हम सब बुद्धि और मन के चक्कर में फंस गए और फंस के बार-बार जन्म मरण का चक्कर भोग रहे हैं। कुछ नहीं करना है। एक मिनट में हिसाब हो गया। पूर्ण सदगुरुदेव मिल जाए और के इतना कि उठ तू और कोई यह साधना केवल असाधनों के त्याग के लिए एक को चले बस जागना है जैसे जगाया नहीं उठ उठ वो रो रहे हैं ये क्रम पुनरप मरणम पुनरप जननम पुनरप ये कब तक चलता है ए जागो कैसे जागे जागे तो है अगर नाम जप चल रहा है और सावधानी से देखो कि बुद्धि अगर हमको को भोगों की तरफ ले जा रही है तो हमारी दुर्गति कराने वाली है।
हम दृष्टा भाव से रहे साक्षी भाव से रहे। इससे लड़े इसके अनुकूल ना बन जाए। घुटने ना टेक दें। और इतना जलाता है हृदय ये अंतकरण। देखो ना आप जब ना कर दो तो कितना जलाता है। जो आप भोग भोग रहे हैं जो भी उसको ना केवल करो आप। फिर इनका तांडव देखो। मन और जब बुद्धि खिलाफ हो जाए ना तुम्हारी फिर देखो तुम बार-बार समझ में नहीं आता करें तो क्या तो समझ में क्या फिर आता है फिर घुटने टेकने पड़ते हैं हां बताओ बोले हमको ये खाना है लाते हैं अभी लाते हैं ये दिखाओ ये दिखा देते हैं यही तो चल रहा है पूरा इसी पुर के अंदर सारा खेल हो रहा है देख लो ना इसी पुर के अंदर सारा खेल हो रहा है पात फण वाला सर्प प्राण है पुरंजनी बुद्धि है जैसा बुद्धि निर्णय करे वैसे बुद्धि कहे ये राक्षस तो हम चाहे जितना बड़ा महात्मा हो हमारी बुद्धि दी कह दी तो मान लिया और है कौन साक्षात परमात्मा का अंश है परमात्म स्वरूप है और भगवान हमारे साथ हैं हर समय साथ है भगवान अभी ज्ञात सखा को बुलाया थोड़ी विदर्भ राजकुमारी के रूप में जब हुआ भगवान ने कहा लाश पकड़े उठ देख हम तुम दोनों एक हंस है ना तू स्त्री है ना कोई पुरुष है परमात्म स्वरूप है भाई यही जानना है यही जानकर व्यवहार करो इसीलिए पहले गुरु गुरुकुल में शास्त्र पढ़ाए जाते थे।
संयम, नियम, तपस्या, आराधना, भगवत साक्षात्कार और फिर गृहस्थ माया में जाओ बाजार में अब कोई तुम्हें नहीं पकड़ सकता। और यहां जन्म से मात पिता बालक बुलावे, उधर भरे सो जतन सिखावे समाधान है भगवान की प्राप्ति। इसलिए खूब सत्संग ध्यान से सुनो और सावधान होकर यह जन्म अविज्ञात सखा भगवान की प्राप्ति के लिए खूब नाम जप करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करो। विशेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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