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हिरण्याक्ष का वध कैसे हुआ? / कपिल भगवान के अवतरण का दिव्य रहस्य // 01/07/26

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमाइक मकरंद रसोग पूर्णम रदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माशयाम परम शीतल मायाम चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण बड़े-बड़े देवता भगवान ब्रह्मा जी के समीप गए और कहा सबका तेज अपहरण हो रहा है। सूर्य भी निश्तेज होते जा रहे हैं। हम देवताओं की शक्ति क्षीण होती जा रही है। महाराज मुझे पता नहीं कि इसका कारण क्या है। आप कृपा करें। तब ब्रह्मा जी ने बताया चिंता मत करो। यह द्वितीय के गर्भ में विराजमान भगवान के दिव्य पार्षद जय और विजय वही अमंगलकारी रूप आचरण करने वाले जब प्रकट होने की भावना कश्यप जी ने बताई तो दति ने रोक लिया।

100 वर्ष हो गए। प्रसव ही नहीं होने दिया। यह सनक सनंदन सनातन सनत कुमार के साप से जय विजय दति के गर्भ में विराजमान है। देख लो भगवत प्रेमी महात्माओं का अपराध करने पर वैकुंठ से भी नीचे पतन हो गया। जो कदापि ऐसा शास्त्रों में नहीं पाया गया। बैकुंठ में प्रवेश पाने के बाद फिर इस जगत में आना नहीं होता। यदत्वा न निवतते त धाम परम मम लेकिन धाम में भी भगवत प्रेमी महात्मा का अपराध बन गया तो जय विजय को तीन जन्म के लिए दैत्य भाव असुर भाव से इस भूतल पर आना पड़ा। जब ब्रह्मा जी ने समस्त देवताओं को समझाया कि आप शांत हो जाइए।

भगवान श्री हरि सबका मंगल करेंगे। यह और कोई अनिष्ट नहीं है। यह दति ने अपने गर्भ को अपने तपोबल से 100 वर्ष तक रोक रखा है। तो उन गर्भस्थ तेजो में भगवत पार्षदों के प्रभाव से सबका तेज क्षीण हो रहा है। आप शांत होकर के जाइए। कोई चिंता का विषय नहीं है। ब्रह्मा जी के कहने से अंधकार का कारण जानकर देवताओं की शंका निवृत्ति हुई और वो पुनः अपने अपने स्थान को लौट गए। इधर दति को अपने पतिदेव के कथना अनुसार पुत्रों की ओर से भारी अमंगल की आशंका थी। इस सृष्टि का मंगल कर देंगे।

यह भगवान के विमुख हैं। यह भगवान से वर करेंगे। ऐसी आशंका से 100 वर्ष हो गए। गर्भ को गंभीरता पूर्वक धारण किया। इनको हम आने ही नहीं देंगे बाहर। फिर जब कश्यप जी ने आदेश किया ऐसा उचित नहीं है। सब लोकों का वैसे ही अमंगल हो रहा है। पति की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने जो तपोबल से रोके हुए थे प्रसव किया यमज पुत्र उत्पन्न हुए जुड़वे ही उनका जन्म हुआ जन्म होते ही स्वर्ग पृथ्वी अंतरिक्ष में भारी उत्पात पैदा होने लगे पृथ्वी कंपायमान हो गई दिशाओं में आग लग गई।

बिजलियां तड़प कर गिरने लगी। आकाश में अनिष्ट सूचक धूमकेतु पुच्छल तारे प्रकट हो गए। बार-बार भारी तूफान उठने लगा। जो वृक्षों को उखाड़कर धूल भरी आंधी। बिजली जोर से चमक रही है। घटाएं सघन रूप धारण करके गर्जना कर रही। सूर्य चंद्र आदि का तेज लुप्त हो गया। कहीं कुछ दिखाई नहीं दे रहा। घोर अंधकार जन्म लेते ही जो द्वितीय के गर्भ में विराजमान है। महान तेजस्वी यशस्वी भगवान श्री हरि के पार्षद ही है। बड़ी खलबली मच गई। चंद्रमा के आसपास मंडल बैठने लगे। गीदड़ उल्लूओं की भयानक आवाज।

कुत्ते गर्दन उठाकर भूक रहे हैं। झुंड के झुंड गधे अपने कठोर खुरों से पृथ्वी को खोद रहे हैं। रेक रहे हैं। बड़ा अशुभ। गौएं डर गई। गौओं के दुग्ध की जगह रक्त निकलने लगा। देव मूर्तियां कंपायमान पसीना और आंसू निकलने लगे। शनि राहु आदि क्रूर ग्रह प्रबल होकर बृहस्पति आदि सौम्य ग्रहों को लांग कर वक्र गति से चलने लगे। ऐसा भयंकर उत्पाद देखकर केवल सनकाद भयभीत नहीं हुए क्योंकि उन्हें पता है उन्होंने ही तो श्राप दिया है। क्या सबको ऐसा लगने लगा मानो प्रलय का समय आ गया क्या?

सनकादि के सिवा एक बार सबको शंका हुई क्या सृष्टि के प्रलय का समय आ गया क्या ऐसा अनिष्ट सूचक उत्पात अब ये दोनों प्रकट होते ही इनका शरीर इतना बढ़ा कि पूरे आकाश को छू लिया प्रकट होते ही क्योंकि 100 वर्ष तो गर्भ में ही रहे भयंकर पराक्रम बलशाली आकाश को घेरे ऐसा शरीर वो इतने ऊंचे थे कि उनके मुकुट का अग्र भाग स्वर्ग को छू रहा था। मुकुट को आप नहीं देख सकते। इतने ऊंचे थे। उनके छाती और भुजाओं से दिशाएं आच्छादित हो गई। भुजाओं में ऐसी चमक की दिशाएं प्रकाशित हो रही थी।

अब जे उन्होंने पृथ्वी पर कदम रखा तो ऐसे भूकंप आ गया। पृथ्वी कांप गई। कश्यप जी ने मंगलाचरण किया। बड़े भारी तपस्वी कश्यप जी हैं। नामकरण संस्कार किया। उनमें से जो द्वितीय के गर्भ में पहले स्थापित हुआ उसका नाम हिरण्यकश्यप और जो द्वितीय के गर्भ से पहले निकला उसका नाम हिरणाक्ष स्थापित हुए हिरण्यकश्यप पहले और प्रकट हुए हिरणाक्ष इसलिए बड़े भाई हिरणाक्ष माने गए। हिरण्यकश्यप तो ऐसा मत वाला बलवान कि अपनी भुजाओं के बल से मारता पर्वतों को तो चकनाचूर हो जाते। लोकपाल थर्रा गए हिरण्यकश्यप का बल देखकर।

और हिरणाक्ष तो हाथ में गधा लेकर के हर लोक में जाकर गर्जना करता। कोई सामने नहीं आता हिरणाक्ष के पैरों की धमक अस थी वह पैरों में बड़े-बड़े नपुर पहने विजय सूचक माला धारण किए विशाल गदा लिए जिधर जाता कोई उससे लड़ने वाला ही नहीं हिरणाक्ष देवता तो ऐसे डर कर भागते जैसे छोटे बच्चे भेड़िए को देखकर डर के जैसे गरुड़ के डर से सांप ऐसे देवता भयभीत होकर भागते। हिरणाक्ष ने देखा कि उसके सामने कोई लड़ने वाला ही नहीं तो हर लोक में जाकर के गर्जना करता है। फिर वो गहरे समुद्र में घुस गया।

और अपनी गदा का प्रहार लहरों पर करता है। सब जलचर जीव घबरा गए। अनेक वर्षों तक समुद्र में घूमता रहा। कोई लड़ने वाला ही नहीं मिला हिरण्याक्ष को। बस वायु वेग से तरंग जो उठती उसी पर गदा का प्रहार करता। जल में घूमते घूमते लोकपाल वरुण जी की विभवा पूरी जो राजधानी है वरुण लोक की उसमें प्रवेश किया। जल के स्वामी वरुण जी ने देखा बड़ा मतवाला वीर आ रहा है। लड़ना संभव है। हिरणाक्ष हसी उड़ाते हुए कहा महाराज प्रणाम एक हाथ से संत भगवंत श्री विग्रह इनको निषेध किया गया प्रणाम करना।

ऐसे एक हाथ से नहीं हमारे यहां दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम यह उपहास कहा जाता है संत या भगवान का श्री विग्रह या जो अपने बड़े गुरुजन हैं उनको ऐसे नहीं किया जाता उनको हाथ जोड़कर प्रणाम किया उसने एक हाथ से ऐसे उपहास करते हुए प्रणाम मुद्रा में कहा महाराज मैं एक भिक्षा मांगता हूं क्या युद्ध की भिक्षा मिलेगी आपसे आप बड़े लोकपाल हो बड़े वीर हो कीर्त कीर्तिशाली हो तो आप अपनी मर्यादा रखने के लिए मुझे एक भिक्षा दोगे। आओ हमसे युद्ध करो। मधोम्मत हिरणाक्ष को देखकर वरुण जी को क्रोध तो बहुत आया और उन्होंने विचार किया जीता नहीं जा सकता क्योंकि यह भगवान का पार्षद है।

इसे तो केवल भगवान ही जीत सकते हैं दूसरा नहीं। तो उन्होंने कहा चिंता मत करो तुम्हारे जैसे रण कुशल वीरों को युद्ध में संतुष्ट करके सारी मनोकामना पूर्ण करने वाले एक महावीर हैं। तुम्हारे जैसे वीर वहां घुटने टेक देते हैं। तुम बड़े वीर हो पर तुम्हें ज्यादा देर नहीं लगेगी वीर सैया में शयन करने की। तुम जैसे दुष्टों को नियंत्रण करने के लिए वह विविध रूप धारण करते हैं। वरुण जी की बात सुनकर के बड़ा प्रसन्न हुआ। बोला बताओ तो जरा ऐसा वीर त्रिभुवन में कौन है जो मेरी भुजाओं को युद्ध में तृप्त कर सके?

उनका कहा तृप्त नहीं तो उनके हाथ मारा जाएगा। उसने कहा तुम बताओ तो फिर थोड़ी देर में सूचना तुम्हें मिलेगी कौन मारा गया इतने में देवर्षि नारद जी आ गए नारद जी ने कहा वीर का तो पता मैं जानता हूं नारद जी एक ऐसे महात्मा है चाहे जहां चले जाए चाहे जिससे मिले सब सम्मान करते हैं कंस से भी मिलते हैं कृष्ण से भी मिलते सब कहीं भी चले जाए नारद जी एक ऐसे विश्व पूज्य महात्मा है जहां असुरों के यहां भी इनकी पूजा होती है। कोई इनसे द्वेष नहीं करता। सब जानते हैं कि हित की बात बताएंगे।

नारद जी ने बड़े हित की बात बताई। विश्व विजय हिरणाक्ष तुम्हारी भुजाओं को तृप्त करने के लिए रसातल में एक वीर है जो वाराह रूप में विराजमान है। पृथ्वी लेने गया है। तुम जाओ पूर्ण तृप्त हो जाओगे। ऐसे वीर है जो युद्ध में तुम्हें पूर्ण तृप्त कर वो खिलखिला के हंसा और कहा जंगली पशु सूअर से मेरा युद्ध अरे क्या बात करते हो नारद जी नारद जी ने कहा नासमझ अभी तुम नहीं जानते हो एक बार जाओ तो रसातल पर पहुंचो जल को चीरता हुआ महावीर हिरण्याक्ष जब गया तो देखा श्याम वर्ण विशाल शरीर कोई साधारण सुकर थोड़ी थे।

वो तो भगवान ने वाराह रूप धारण किया था। जाकर के दहाड़ा हिरणाक्षर नासमझ छोड़ पृथ्वी को और मुझसे युद्ध कर सुराधम। मैं तुझे ही खोज रहा था। मैं देखकर तुझे समझ गया कि तू सुकर नहीं है। तू हरी है। भगवान का पार्षद है। ये माया से लुका छिपी तू दूसरों के सामने कर। ठीक बात कह रहे। ये लुका छुपी हम अज्ञानियों के सामने कर। वो ज्ञान शिरोमणि है। मेरे नेत्रों के सामने तेरा माया का जादू नहीं चलेगा। पर भगवान ने कहा था दृढ़ वर देख लो दृढ़ वर यह दिव्य पार्षद है। हम बहुत हृदय से प्रणाम करते हैं कि भगवान की आज्ञा पालन हम माता कैकई को बहुत प्रणाम करते हैं।

एकांत में भगवान राम जी ने कहा था माता यह बात ना कौशल्या जी पूर्ण कर सकती है और ना सुमित्रा जी पूर्ण कर सकती है। मां तो मुझे बहुत प्यार करती है। मेरा अवतार जगत कल्याण के लिए हुआ है। मां यदि कल प्रातः काल राज्या अभिषेक स्वीकार कर लिया तो जिस कार्य के लिए आया हूं वो कार्य नहीं हो पाया। इसलिए मां तू कृपा करके मेरा 14 वर्ष का वनवास ऐसा तू मांग। कैकई जी ने वो बात स्वीकार की। देखो अपने प्यारे राम जी की इच्छा के लिए अपनी निंदा सही। अपने प्यारे भरत का वियोगशा।

भरत ने कभी मां नहीं कहा और वैधव्य शाह जगत की निंदा सही। यह विशेष जो भगवान के प्रियजन होते हैं इनको समझ पाना बड़ा कठिन होता है। तेरी माया दूसरों के सामने चलेगी। मेरे सामने नहीं चलेगी। मैं तेरा नाश करने के लिए समर्थ हूं। हिरणाक्ष कह रहा है। मूढ़ तेरा जो बल है वो योग माया ही है ना। तुझ में कोई पुरुषार्थ नहीं। केवल योग माया से तू बली है। आज मैं तुम्हारी योग माया को चकनाचूर करूंगा। जब मेरे हाथ से छूटी हुई गदा तुम्हारे सर पर पड़ेगी तो तुम्हारी योग माया नहीं बचा पाएगी तुम्हें।

तब जितने तेरी आराधना करने वाले भक्त देवता ऋषि गण है ना यह तब समझ पाएंगे कि तेरे से भी बलवान हिरणक्ष है। हिरण्याक्ष भगवान को ऐसे दुर्वचन बोल रहा था। भगवान अपने दांत पर पूरी संपूर्ण पृथ्वी को पृथ्वी भयभीत हो गई। भगवान ने कहा तुम चिंता मत करो। बिल्कुल चिंता मत करो। तुम हिलोगे भी नहीं। तुम्हें थोड़ी भी कोई परेशानी नहीं होगी। भगवान वो बोलता गया, पीछे ललकारता गया। भगवान आए और पृथ्वी को स्थापित किया। तीखी दाड़ वाला वो हिरणाक्ष भगवान से कहता जाता है। बड़े वीर हो तुम्हें भागने में लज्जा नहीं आती।

लेकिन तुम कुछ भी कर सकते हो। तुम्हें संकोच शर्म तो है नहीं। अरे मैं ललकार रहा हूं मुझसे युद्ध करो। भगवान ने जब आधार शक्ति का प्रयोग करके पृथ्वी को स्थापित किया। ब्रह्मा जी फूलों की वर्षा कर रहे हैं। प्रभु कार्य संपन्न हुआ। मनुष्य शत्रूपा की संतान इसी में पलेंगे। आप पृथ्वी लाकर बड़ा जगत का उपकार किया, मंगल किया। फूल बरसते देखकर हिरणाक्ष बहुत अच्छा लग रहा होगा 12 भगवान से। अब मेरी गदा की भी बरसा हो। और उसने भगवान को कट वचन कहते हुए गदा का प्रहार किया।

भगवान ने सहज में उसकी गदा फेंकी हुई पकड़ ली। अरे दुष्ट तुझ जैसे मृत्यु पास में बंधे हुए अपनी आत्म प्रशंसा करने वालों पर महापुरुष जन ध्यान नहीं देते। आत्म प्रशंसा करना। अपने सारे पुण्यों का नाश कर लेना है। आत्म प्रशंसा का मतलब होता है अपने मुख से अपनी बाई करना। कभी नहीं करना चाहिए। इससे सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं। तुम क्या समझते हो? हमने ये किया, हमने ये किया। वो सब जा रहा है। सब खत्म हो रहा है। अगर कोई तुम्हारी प्रशंसा करने लगे राधा राधा राधा तुरंत काट दो।

राधा राधा राधा अरे भगवान की कृपा गुरु की कृपा से कुछ बन जाए तो बन जाए। मुझ जैसे अधम से क्या ऐसे अपनी प्रशंसा करना और दूसरे की निंदा करना। सारे पुण्यों का नाश कर लेना। भगवान कह रहे हैं तू अपने मुंह से आत्म स्लाघा कर रहा है। अरे अभागे तू मृत्यु के पास में बंधने वाला है। हां तुझ जैसे वीर से मैं भयभीत होकर भागूंगा। अरे भाई मेरी सामर्थ्य कहां है कि तुम्हारे सामने खड़ा हो जाऊं। भगवान वाराह देव निशंक होकर ऐसा उत्तर दे रहे हैं। अब जब दैत्य ने देखा कि भगवान उपहास कर रहे थे क्रोध से तिलमिला उठा और बड़े वेग से मुष्टिका का प्रहार किया।

घसे का प्रहार भगवान पर देखो भगवान के श्री अंग का स्पर्श प्राप्त कर रहे भगवान टेढ़े होकर के अपने को प्रवीणता पूर्वक बचा लिया है। जैसे योग सिद्ध पुरुष पर मृत्यु आक्रमण करती है तो वो परमात्म चिंतन में स्थित होने के कारण उस पर मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे बताया कि जब भक्त का शरीर छूटता है तो जैसे मत वाले गजराज हाथी से गले की माला टूट कर गिर जाए उसको पता भी नहीं चलता ऐसे जनमत मरत दुसाधु कोई वो योगी को जो जिसका चित्त परमात्मा में लगा हुआ है भक्त को जिसकी चित्तवृत्ति भगवान में लगी हुई है और ब्रह्म ज्ञानी को जो आत्म बोध प्राप्त है तीनों को मृत्यु का दुख नहीं होता अब तो वो क्रोध से ओठ चबाता हुआ हिरण राक्ष गधा लेकर बार-बार घुमाकर भगवान पर झपटा।

प्रभु वो गधा प्रहार कर ही पाता कि अपनी गदा से उसकी दाएं भव पर प्रहार किया। पर हिरणाक्ष ने अपनी गदा में वो प्रहार रोक लिया। अब भगवान और हिरणाक्ष का भयंकर युद्ध। देवता लोग तो फूल लिए खड़े हैं। भगवान इसको ज्यादा खिलाइए मत। यह बहुत बलवान है। ब्रह्मा जी भी कहने लगे देव यह दुष्ट दैत्य बड़ा प्रबल है। यह भक्त देवता, ब्राह्मण, गौ, निरपराध जीव इनका नाश करने वाला है। और जो इनका नाश सोचता है आप उसका विनाश जरूर कर देते हैं। इसलिए महाकंटक रूप है प्रभु इससे खिलवाड़ मत करो।

यह दुष्ट बड़ा मायावी घमंडी निरंकुश है। प्रभु आप ऐसे खिलवाड़ कर रहे हैं जैसे कोई गरुड़ सांप के बच्चे से खेले। प्रभु आप खिलवाड़ मत करो। हे देव यह महाबलवान है। ब्रह्मा जी के कपट रहित वचन सुनकर भगवान मुस्कुराते हुए कटाक्ष किया कि आप शांत रहिए। झपट के निर्भय विचरण करने वाले हिरणाक्ष की ठड्डी पर कोमुद की गदा से प्रहार किया। हिरणाक्ष ने ऐसी गदा मारी कि गदा भगवान की दूर गिरी जाकर चक्कर काटती हुई। पर हिरणाक्ष रुक गया और कहा और अस्त्र उठाओ हम युद्ध का धर्म जानने वाले हैं नियत्थे पर वार नहीं करते भगवान उसकी इस बात पर मुस्कुरा दिए और कहा बहुत धर्म बुद्धि रखते हो स्मरण किया अपने पार्षद सुदर्शन चक्र का गर्जना करते हुए सुदर्शन जी भगवान के हाथ में विराजमान हुए।

सुदर्शन चक्र उपस्थित हुआ। भगवान के हाथ में चक्कर लगाने लगा। किंतु फिर भगवान ने विचार किया कि अपने प्रिय पार्षद को अभी और खिलाया जाए। इसलिए सुदर्शन जी को फिर कहा अच्छा शांत हो जाओ। अंतर् ध्यान सुदर्शन अरे हम ऐसे भगवान के दास हैं। दिव्य भगवान के पार्षद सब दिव्यास्त्र किन के लिए है भक्तों की रक्षा भगवान को अपनी रक्षा करनी है क्या? अरे हम सब की रक्षा के लिए ही है तो हैं। हिरणाक्ष ने देखा कि कमल दल लोचन हरि ने सुदर्शन को बुलाया और फिर शांत कर दिया। तिलमिला उठा और दांतों से ऊंट चबाने लगा।

मानो भगवान को अब भस्म ही कर देगा और उछल कर बोला ले अब तू नहीं बच सकता। भगवान के ऊपर गदा का प्रहार किया। भगवान ने अपने हाथ से गधा को रोक ली। पुनः वापस फेंक दिया। भगवान सर्वशक्ति संपन्न है। महादैती हिरणाक्ष का घमंड बढ़ता जा रहा है। और भगवान पर विविध प्रहार कर रहा है। कभी त्रिशूल भगवान पर मारता है। कभी गधा कभी मुष्टिका का प्रहार घसे का प्रहार करता है। भगवान उसके इन प्रहारों को सह रहे हैं। खिलवाड़ कर रहे हैं। उसने आसुरी माया का जाल प्रकट किया मायापति भगवान पर।

भगवान ने सुदर्शन जी को आज्ञा की माया का नाश कर दो। माया का नाश कर दिया। दीति का हृदय कांप उठा। भगवान ने किसी अस्त्रशस्त्र से हिरणाक्ष को नहीं मारा। उल्टा हाथ ऐसे उपेक्षा करते उल्टा हाथ एक जेवी तमाचा मारा उल्टा चक्कर चक्कर खाता हुआ हिरणाक्ष खून उगलते हुए गिर पड़ा और निष्प्राण हो गया ब्रह्मा जी समस्त देवता श्री भगवान पर पुष्पों की वर्षा की देवता लोग कहने लगे प्रभु नमस्कार नमस्कार नमस्कार यह नमस्कार तभी करते हैं जब इनका विरोधी मारा जाता है। बड़े आनंद की बात प्रभु आपने हम लोगों को बड़ा सुख प्रदान किया हिरणाक्ष का उद्धार करके वारा भगवान पृथ्वी को स्थापित करके हिरणाक्ष का उद्धार करके सब देवताओं से विनती सुनते हुए अंतर्ध्य हो गए।

अब पृथ्वी पाकर के महाराज स्वयंभू मनु बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि इसी से अन्ना आदि जिससे हमारा मनुष्यों का जीवन पोषण होता है और यही संतति की वृद्धि आदि विदुर जी भगवान के बड़े भक्त हैं। भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त हैं। महर्षि द्वैपायन के पुत्र हैं। साक्षात धर्म है। कृष्ण भक्तों के अनुगामी हैं। तीर्थ सेवन से अंतःकरण पवित्र और हो गया है। अब वो तत्व ज्ञानियों में श्रेष्ठ मैत्रे जी से सर्व पाप नाशकारी भगवान की लीलाओं के विषय में प्रश्न करते हैं। विदुर जी ने कहा ब्रह्म आप परोक्ष विषयों को जानने वाले हैं।

अत बताइए कि ब्रह्मा जी ने जब मरीच आदि उन 10 ऋषियों को सनक सनंदन सनातन सनत कुमार चार ये ब्रह्म ऋषियों को और फिर मनु शत्रूपा को प्रकट किया तो इसके बाद सृष्टि आगे कैसे बढ़ी? तब मैत्री जी ने कहा विदुर जी ब्रह्मा जी ने तामिष्ट तामिष्ट तम मोह और महामोह ये पांच अविद्या उत्पन्न की। ब्रह्मा जी ने सोचा ये तो अज्ञान और अविद्या प्रकट कर दी तो बड़ा अच्छा नहीं लगा। बड़ा उनको शोक सा हुआ और उन्होंने अपने जिस शरीर से रचा था तम मोह महामोह तामिष्ट अंध तामिष्ट ये पांच प्रकार की अविद्या शरीर को छोड़ दिया ही शरीर को छोड़ा तो उससे यक्ष और राक्षस प्रकट हो गए छोड़े हुए शरीर से और वह ब्रह्मा जी को ही खाने के लिए दौड़ पड़े ब्रह्मा जी भागे आवाज आती जा रही खा जाओ रक्षा मत करो बड़े भूख से व्याकुल हो तो ब्रह्मा जी ने जिन्होंने कहा रक्षा मत करो उनको राक्षस खा जाओ असुर और यक्ष ये नाम दिए तो यक्षों की राक्षसों की असुरों की उत्पत्ति ऐसे कैसे हुई?

ब्रह्मा जी ने अब संकल्प करके दिव्य तेजोमय शरीर धारण किया। उससे सात देवताओं की उत्पत्ति हुई। और क्रीडा करते हुए ब्रह्मा जी ने जो शरीर त्यागा उससे दिन हुआ और जिससे राक्षसों की उत्पत्ति हुई थी उससे रात हुई। दिन रात की उत्पत्ति यक्ष असुर राक्षसों की उत्पत्ति और देवताओं की उत्पत्ति। फिर ब्रह्मा जी के जघन देश से अत्यंत अज्ञानी कामासक्त राक्षसी स्वभाव के लोगों की उत्पत्ति हुई। अब वो इतने कामी थे कि ब्रह्मा जी को दौड़ा लिया। यह देखकर ब्रह्मा जी हसे कि यह निर्लज हमारे पुत्र होकर हमारे पीछे दौड़ रहे हैं।

कामासक्त होकर उन्होंने भगवान का स्मरण किया। भगवान बचाओ। यह सृष्टि रचना है। इसीलिए भगवान का बगीचा है। इसमें हर प्रकार के फूल हैं। भगवान का स्मरण करना पड़ा। जो जघन देश से पैदा हुए वो ब्रह्मा जी के ऊपर काम भाव से भागे। ब्रह्मा जी भागे। देखा बच नहीं पाएंगे तो भगवान को पुकारा। प्रभु रक्षा करो। आपने कहा था सृष्टि रचना और ये ऐसी सृष्टि है कि हमारे को तंग करने चले त्राहिमाम त्राहिमाम ये हमारे ऊपर ही पाप दृष्टि कर लिए नाथ एकमात्र आप ही बचा सकते हो ब्रह्मा जी को आतुर देख के भगवान ने कहा संकल्प करो शरीर को छोड़ो ना संकल्प किया शरीर को जे छोड़ा तो शरीर एक दिव्य सुंदरी स्त्री के रूप में हो गया जिसका नाम हुआ संध्या देवी।

संध्या देवी बड़ा सुंदर रूप संध्या देवी का अलौकिक नवीन अवस्था उन काम पीड़ितों ने स्वीकार किया संध्या देवी को। कुबुद्धि दैत्यों ने स्त्री रूपणी संध्या के विषय में तरह-तरह के तर्क करके फिर आदर पूर्वक उनको स्वीकार किया। संध्या काल में बहुत सावधान नहीं तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी। खानपान भोग सामग्री ये दुनिया का उस समय नहीं भगवत चिंतन नहीं तो राक्षसी बुद्धि पैदा हो जाएगी। प्रातः कालीन संध्या सायं कालीन संध्या इन दो में तो बहुत सावधान होकर पांच मिनट ही सही नाम जप करें।

भगवान सूर्य को प्रणाम करें। उन मूढ़ों ने संध्या को स्त्री समझकर स्वीकार कर लिया। और वह पाप स्वभाव के हो गए। पापी ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य कांत पुनः प्रकट की और हंसे। जब हंसे तो अप्सराओं का प्रादुर्भाव हो गया। चंद्रिका ज्योतना का प्रादुर्भाव हो गया। और शरीर जब छोड़ा तो उससे विश्वासु और गंधर्वों का प्रादुर्भाव हो गया। इसके बाद ब्रह्मा जी ने दूसरा शरीर धारण किया। उससे भूत और पिशाचों को प्रकट किया। जो दिगंबर और दूसरों को कष्ट देने वाले और ये किसके ऊपर भूत पिशाच आक्रमण कर सकते हैं?

जमाई रूप शरीर छोड़ा भूत पिशा प्रकट करके तो जमाई रूप हो गया। झूठा मुंह और जमाई भगवत विमुख इनके ऊपर प्रेत का पिशाच का ये जितने भी अनिष्टकारी हैं इनका आवेश आ जाएगा। जब जमाई हो आज शिष्य तो राधा राधा राधा गोस्वामी जी कह रहे हैं राम राम कह जे जमही तिन न पाप पुंज समाई बोले जमहाई शरीर में भूत प्रेत आवेश का कारण जब जमवाई आए तो जरूर नाम वैसे तो नाम हर समय जब जमवाई आए तो राधा राधा राधा जय हो प्रभु आपकी जय श्यामा श्याम राधा राधा गोस्वामी जी कह रहे हैं राम राम कहो निद्रा के समय आचमन करके पवित्र होकर सोओ नहीं भूत प्रेत पिशाच इनके आगमन का हो सकता है झूठे मुंह कभी भी मत रहो कुछ भी खाओ आचमन करो पवित्र हो तब यात्रा करो या बैठो जो भी झूठा मुंह जमवाई अपवित्र दशा में नींद लेना इनहीं में प्रेतों का आक्रमण हो जाएगा पिशाच आदि करके उन्माद पैदा कर देते हैं।

पक्की बात है। सर्वत्र है भूत प्रेत पिशाच। झूठे मुंह मत रहो। जमवाई के समय नाम जप करो। जब नींद आवे तो पवित्र होकर के आचमन करके शयन करो। और भगवान का नाम स्मरण चल रहा है तो कोई भी जीते विनायक शुभ अशुभ विघ्न करे नहीं कोई विघ्न करे नहीं कोई डरे कलिकाल कष्ट भय ये भूत प्रेत उन्हीं के ऊपर आक्रमण करते हैं जो भूत प्रेत के आचरण और स्वभाव वाले होते हैं ऐसी क्षमता नहीं कि किसी को छू ले किसी को दंड दे दे किसी को पकड़ ले ऐसा नहीं जो भूत प्रेत आचरण वाले हैं ना जिन आचरणों से भूत प्रेत बने वही आचरण जो करता है झूठे मुंह रहता है भगवत विमुख रहता है अपवित्र रहता है उनहीं के ऊपर आक्रमण होता है।

फिर ब्रह्मा जी ने उस शरीर को छोड़ा। एक नया शरीर धारण किया तेजोमय। उससे साध्य गण और पितृ गणों की उत्पत्ति हुई। और उस शरीर को जब छोड़ा तो साध्य गणों ने क्रमशः काव्य और हाव्य पिंड दान आदि के रूप में स्वीकार किया। फिर ब्रह्मा जी ने नवीन शरीर धारण किया। उससे सिद्धों की उत्पत्ति की। विद्याधरों की उत्पत्ति की और अंतर्धान नामक तेजोमय एक स्थिति अंतर्ध्य हो जाना। फिर ब्रह्मा जी ने प्रतिबिंब देखा तो बड़ा सुंदर रूप लगा तो उससे किन्नरों की उत्पत्ति की। किम पुरुषों की उत्पत्ति की।

फिर ब्रह्मा जी उस शरीर को त्याग दिए तो उषा काल अपनी पत्नियों के साथ मिलकर के यह किम पुरुष और किन्नर ब्रह्मा जी के गुणगान करने लगे। फिर ब्रह्मा जी विचार करने लगे कि विशेष सृष्टि का विस्तार नहीं हो रहा तो क्रोधित होकर हाथ पैर ऐसे ऐसे तो उससे सर्पों की उत्पत्ति हो गई। ऐसे किया फण वाले सर्प बिना फण वाले सर्प बड़े भयंकर कुरु स्वभाव के नाग इनकी इनकी उत्पत्ति हो गई क्रोधित होकर हाथ पैर ऐसे अवयवों को फैलाकर हाथ पैरों को फैलाकर जब ऐसेसे किया तो उससे नाग उत्पन्न हो गए सर्प उत्पन्न हो गए फण रूप धारण किए हुए बड़े भयंकर विषधारी ब्रह्मा जी ने कहा यह भी एक भयानक सृष्टि ये सब ब्रह्मा जी के अंदर वही संकल्प होता जा रहा है जो भगवान कराना चाहते हैं।

फिर ब्रह्मा जी ने पवित्र होकर मनुओं की सृष्टि की जिससे सब प्रजा की वृद्धि हो। फिर उस अपने पुरुषाकार शरीर का त्याग कर दिया। देवता गंधर्व आदि मनुओं की सृष्टि देखकर बहुत प्रसन्न हुए। बोले विश्वकर्ता ब्रह्मा जी आपने मनुओं की सृष्टि की। इससे बहुत सुंदर सृष्टि प्रकट होगी। भगवान स्वयंभू मनु का वंश बड़ा आदरणीय माना गया है। इसी से मैथुन धर्म से प्रजा की उत्पत्ति हुई है। विदुर जी ने पूछा स्वयंभू मनु के पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद ये बड़े महान हुए हैं। फिर आपने बताया कि देहूती जी करदम जी को ब्याही गई थी तो देहूती जी तो बड़े योग लक्षण से संपन्न महापुरुष थी उनका करदम जी से कैसे ब्याह हुआ और देहुति और करदम जी से कौन-कौन सी संताने हुई?

विदुर जी ने प्रश्न किया। तब मैत्री जी ने कहा विदुर जी जब करदम जी प्रकट हुए तो भगवान ब्रह्मा ने आदेश किया जाओ सृष्टि का विस्तार करो तो सृष्टि के विस्तार के लिए तो ब्याह चाहिए तो 10,000 वर्ष तक सरस्वती नदी के तीर पर एकाग्र चित्त से शरणागत वरदायक भगवान श्री हरि की आराधना की पत्नी प्राप्त करने के लिए 10,000 वर्ष तक यह सतयुग के आरंभ में कमल नयन भगवान श्री हरि ने देखा कठोर तपस्या कर रहे मूर्तिमान ब्रह्ममय भगवान भव्य दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुए। गले में श्वेत कमल कुमुद के फूलों की माला धारण किए।

मुख कमल श्याम वर्ण का नीली नीली अलकावली निर्मल पीतांबर धारण किए झिलमिलाता हुआ स्वर्णमय मुकुट कानों में जगमगाते हुए कुंडल कर कमलों में शंख चक्र गदा पद्म और उनके एक हाथ में क्रीड़ा के लिए श्वेत कमल लिए हुए प्रभु मधुर मुस्कान भरी चितवन चित्त को जो चुराए लेती है श्री चरण कमल गरुण जी के कंधे पर विराजमान है वक्षा स्थल में श्रीवत्स चिन्ह और कौस्तुभ मणि है। प्रभु करदम जी के सामने आकाश स्थित गरुड़ पर विराजमान होकर दर्शन दिए और कहा आंख खोलो तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई।

ये भी देखा गरुड़ पर विराजमान भगवान श्री हरि साष्टांग प्रणाम किया और प्रेम पूर्ण चित्त से हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति की। करदम जी ने कहा स्तुति करने योग्य परमेश्वर आप संपूर्ण सतगुण के आधार हैं। योगी जन उत्तरोत्तर शुभ योनियों में जन्म लेकर अंत में योग के द्वारा आपके दर्शन से ही पूर्ण भगवत प्राप्ति होती है। उत्तरोत्तर जनोक महालोक तप लोक सत्य लोक लेकिन इसमें जीवन मुक्त या परबह्म प्राप्ति या भगवत दर्शन नहीं बोले उत्तरोत्तर शुभ लोकों को प्राप्त होकर फिर अंत में आपके दर्शन की आकांक्षा करते तो उनको दर्शन प्राप्ति होती फिर वो इस संसार समुद्र से पार जाने का एकमात्र उपाय आपके श्री चरण कमल रूपी जहाज है।

ये मायाते हत दस पादारविंदम भव सिंधु पोतम इस भव समुद्र का जहाज है भगवान के चरणारविंद उपासते कामते राशी काम निरय पिय शिव जिनकी बुद्धि मारी गई है वे आपके चरणों से विमुख होकर के नारकी पापाचरण करते हैं और नरक भोगते हैं। स्वामी जिसने आपके चरण कमलों का आश्रय ले लिया उसके संपूर्ण मनोरथ पूर्ण हो गए। प्रभु यद्यपि आपका दर्शन बड़ा दुर्लभ है। पर मुझे प्राप्त हुआ। पर प्रभु मैं कैसे कहूं कि आपसे क्या मांगना चाहता हूं। क्योंकि बड़ी हंसी की बात होगी। आपको प्राप्त करके आपको ना मांग करके मैं आपसे पत्नी मानता हूं।

क्योंकि मेरे पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा है सृष्टि विस्तार करो। आप स्वरूप से निष्क्रिय होने पर माया के द्वारा सारे संसार का व्यवहार चलाने वाले हैं। थोड़ी सी भी आपकी उपासना कर ले तो उसकी दुर्गति नहीं होगी। ये बातें पकड़ने वाली है। थोड़ी सी भी हरि की उपासना हो जाए तो दुर्गति नहीं होगी। ऐसे आपके श्री चरण कमल वंदनीय है। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूं। मैत्री जी कहते हैं भगवान प्रणय भरी मुस्कान से करुणामय चितवन से देख रहे थे। करदम जी की तरफ गरुण जी के कंधे पर विराजमान थे।

श्री भगवान ने कहा तुमने बड़ा आत्मसयम किया। 10,000 वर्ष तक जितेंद्र रहकर एकाग्र होकर मेरी आराधना की। मैं पहले से व्यवस्था कर दिया जो तुम चाह रहे हो। प्रजापति मेरी आराधना कभी निष्फल नहीं होती। एक एक बात पकड़ना। एक बार आपने कृष्ण कहा है, राधा कहा है, राम कहा है, हरि कहा है, एक बार आपने भगवान को प्रणाम किया, एक बार थोड़ी भी पत्र पुष्पाद से भगवान की सेवा की कभी निष्फल नहीं होगी। और जिनका चित्त निरंतर मेरे में लगा हुआ है उन महात्माओं का तो क्या कहना थोड़ी सी भी जिसकी आराधना हो गई वो निष्फल नहीं होगी वो दुर्गति को प्राप्त नहीं और जो रात दिन भजन कर रहे हैं उन महात्माओं का क्या कहना तुम्हें पत्नी चाहिए आदि सम्राट महा यशस्वी स्वयंभू मनु जो ब्रह्मावर्त में रहकर सात समुद्र वाली सारी पृथ्वी का शासन करते हैं।

परम धर्मज्ञ महाराज महारानी शतरूपा के साथ तुमसे मिलने परसों यहां आएंगे और उनके एक रूप यवन शील गुणों से संपन्न श्याम लोचना कन्या जो योग से संपन्न है वो विवाह के लिए स्वयं लेकर आपके पास आएंगे भगवान से मांगा पत्नी तो पत्नी कैसी मिल रही आदि सम्राट महाराज मनु की पुत्री योग संपन्न देवी देवती वह यहां आकर के तुम्हें कन्यादान करेंगे, अर्पण करेंगे। जैसा तुमने भावना में सोचा है वैसी ही वह पत्नी है। वो राज कन्या तुम्हारे योग्य है। तुम योगी वो योगी बड़ी सुंदर देहूति जी।

नौ कन्याएं तुम उत्पन्न करोगे। और उनके अनुसार मरीच आदि ऋषि गण स्वीकार करेंगे उसी से सृष्टि बढ़ेगी। तुमने मेरी आराधना की। सारे कर्म फल मेरे को समर्पित किए। इसलिए तुम्हें आत्मज्ञान प्रदान करने के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र रूप में प्रकट होऊंगा। ये अपनी तरफ से भगवान ने वरदान दिया। यही कृपा भगवान की होती है। जीव जब विषय मांगता है तो भगवान विषय के साथ अपनी कृपा दे देते हैं। जिससे उसका परम कल्याण हो जाता है। इसीलिए किसी और से मत मांगिए। मांगिए तो प्रभु से मांगिए और प्रभु के ऊपर छोड़ दीजिए।

पूरा करें या ना करें श्रद्धा पर फर्क ना पड़े तो महामंगल हो जाएगा। भगवान कह रहे हैं कि मैं स्वयं तुम्हारे यहां पुत्र रूप से अवतरित होऊंगा। विदुर जी करदम ऋषि से इस प्रकार कहकर भगवान श्री हरि सरस्वती नदी से अंतर्ध्य हो गए। गरुड़ जी पर तो विराजमान ही थे। भगवान बड़े करुणाम में है। हमें लगता है कि अगर विषय भी मांगे तो भगवान से ही मांगे। देखो विषय तो दिया ही और स्वयं कह रहे कि मैं स्वयं आऊंगा। पुत्र रूप में भगवान कपिल के रूप में आए और बहुत सुंदर ज्ञान का उपदेश करके दोनों को करदम जी को भी और देहती जी को भी परम पद प्रदान किया।

श्री हरि के चले जाने पर बताया था परसों आएंगे महाराज मनु शत्रुपा देवती को लेकर के इंतजार करने लगे। मनु जी भी महारानी शत्रूपा के साथ स्वर्ण जटित रथ पर सवार होकर अपनी कन्या को बिठा के विचरते हुए शांति प्राण महर्षि करदम जी के आश्रम पर पहुंचे। वही बिंदु सरोवर बन गया। कब? जब 10,000 वर्ष तपस्या का फल मांगा पत्नी तो भगवान के आंसू गिर पड़े कि गजब है मेरी प्रचंड माया की लीला कि मैं सामने हूं और मेरे 10,000 वर्ष मेरे को प्रसन्न करने के लिए तप किया और उसका फल मांगा पत्नी तो जो आंसू की बूंद गिरी उसी से बिंदुसर तीर्थ बन गया।

बिंदु सरोवर बड़ा पवित्र तीर्थ है। बड़ा ही सुंदर आश्रम जहां करदम जी विराजमान है। उन्मत्त मयूर पक्ष फैला फैलाकर जगह-जगह नृत्य कर रहे हैं। कोकिला कुक रही है। कदंब चंपक अशोक करंज बकुल असन कुंद मंदार कुटज इनके बड़े-बड़े वृक्ष हैं। जल काग बतख हंस कुर जलमुर्ग सारस चकवा चकोर चकवी ये सब कलरव कर रहे हैं और वहां जंगल में हरिन सूअर स्याही नीलगाय हाथी लंगूर सिंह वानर नेवला कस्तूरी मृग सर्प ये सब दिखाई दे रहे हैं। ऐसा घोर जंगल जहां करदम जी वास कर रहे हैं। मनु जी वहां पहुंचकर देखा तपस्या से अस्थ मात्र हो रहे शरीरा करदम जी का शरीर ऐसा एक वलखल की लंगोटी पूरा शरीर कृष गर्मी सर्दी बरसात सब सह रहे विशाल नेत्र सिर पर जटा सुशोभित वलकल का चीर धारण किए हुए प्रसन्न मुद्रा में स्वयंभू मनु पधार रहे देखकर के अर्घ दान किया।

राजा का भगवान का स्वरूप माना जाता है। अर्घ दान किया और प्रणाम मुद्रा में होकर के कहा अतिथ्य स्वीकार कीजिए। मनु जी ने करदम जी के द्वारा दी हुई पूजा स्वीकार करके फिर करदम जी की पूजा की। राजा ऋषि को भगवान का स्वरूप मान करके तो ऋषि राजा को भगवान का स्वरूप मानकर दोनों दोनों की आराधना करदम जी ने कहा देव आप भगवान श्री हरि की पालन शक्ति स्वरूपा है राजा है निसंदेह सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का संहार करने के लिए भगवान ही राजा रूप से विराजमान है। मैं आपसे जानना चाहता हूं कि आपकी क्या सेवा करूं।

आपका प्रयोजन क्या है? मेरे लिए आज्ञा क्या है? जो आज्ञा करोगे मैं निष्कपट भाव से उसे स्वीकार करूंगा। मनु जी ने कहा वेद मूर्ति भगवान ब्रह्मा ने वेदमय विग्रह की रक्षा के लिए तपस्या विद्या और योग इनकी रचना की है। जो तपस्या विद्या और योग से पुष्ट होता है उसी से हम सुरक्षित होते हैं। हम राजा लोग और हम राजाओं से पूरी प्रजा सुरक्षित होती है। मनु जी महाराज ने कहा इसीलिए हर राजा के ऊपर एक महाराजा विराजमान रहता है। देवराज इंद्र त्रिभुवन पति तो ऊपर बृहस्पति जी महाराज विदेहराज जनक तो सदानंद जी चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ तो वशिष्ठ जी हर जगह और जिस राजा का संबंध किसी महर्षि से नहीं है वो ठीक निर्णय करने वाला राजा नहीं होगा।

किसी राजा के ऊपर जब महाराजा का शासन होता है तो शास्त्र सम्मत प्रजा पालन रूपी परम धर्म का वह निर्वाह कर पाता है। जो तपस्वी है जो विद्या योग और गुणों से संपन्न ऐसे महापुरुष के द्वारा हम राजा लोग सुरक्षित होते हैं। हम राजाओं के द्वारा पूरी प्रजा सुरक्षित होती है। ऐसा महाराज मनु जी ने कहा। वैसे मुझे कोई संदेह नहीं क्योंकि आपके दर्शन मात्र से मेरे हृदय में अपार आनंद है। मनु जी महाराज ने कहा आपका दर्शन अितेंद्र पुरुष को हो ही नहीं सकता है। मेरा बड़ा भाग्य है जो आप जैसे महर्षि का दर्शन चरण स्पर्श और रज माथे पर चढ़ा सका।

मेरे भाग्योदय से ही आपका दर्शन हुआ है। प्रभु यह मेरी कन्या है और इसके वर के लिए मैं बहुत चिंताग्रस्त हो रहा था। भगवत इच्छा से मेरे हृदय में आया कि ये कन्या मैं आप ऋषि को प्रदान करूं। यह प्रियव्रत उत्तानपाद की बहन है। अवस्था शील गुण योग सब पूर्ण है। क्या आप इस कन्या रत्न को स्वीकार करते हैं? महाराज मनु जी ने प्रार्थना की करदम ऋषि से और यह भी आपको बहुत प्रेम करती है क्योंकि एक बार देवर्षि नारद जी ने आकर आपकी शील विद्या रूप आयु गुण तपस्या का वर्णन किया तब से इसने मन में आपको ही पति के रूप में वरण किया है।

मैं बड़ी श्रद्धा से अपने इस कन्या रत्न को समर्पित करता हूं। आप इसे स्वीकार करें और गृहस्तोचित कार्य के लिए आप सब प्रकार से समर्थ हैं। अर्थात योग संपन्न है। आप सब व्यवस्था कर सकते हैं। जो प्राप्त भोग का तिरस्कार करके फिर दूसरों के आगे हाथ फैलाता है तो उसका मान भंग होता है। प्राप्त भोग का तो जो भोगों का त्याग करता है उसी को तो विरक्त कहते हैं। मैंने सुना है देखो आगे जो बोल रहे मैंने सुना है आपकी विरक्ति एक सीमा तक है क्योंकि आप विवाह करना चाहते हैं।

अब ये बात समझ लीजिए क्योंकि आपका ब्रह्मचर्य एक सीमा तक है। यह बात नहीं मनु जी ऐसे कैसे बोल सकते हैं? आप नष्टिक ब्रह्मचर्य का नियम नहीं लिए हुए हैं। इसीलिए मैंने आपसे आप प्रार्थना की कि कन्या रत्न मैं आपको प्रदान करता हूं। करदम मुनि ने कहा ठीक है मैं भी विवाह करना ही चाहता हूं। और आपकी कन्या का अभी तक किसी पुरुष ने वागदान नहीं लिया। इसलिए हम ब्राह्म विधि से विवाह करेंगे। यह सर्वश्रेष्ठ विधि होती है। ब्रह्म विधि, द विधि, आर्ष विधि, प्रजापत्य, आसुर, गंधर्व, राक्षस और पैशाच ये आठ प्रकार की विवाह की विधियां हैं।

इसमें सबसे श्रेष्ठ विधि होती है ब्राह्म विधि। जिसमें मध्यस्थ ब्राह्मण होता है जो मंत्रों के द्वारा पानी ग्रहण संस्कार कराता है और पिता सम्मान के साथ कन्यादान करता है और वर पानी ग्रहण स्वीकार करता है। वह वैदिक सिद्धांत के अनुसार राजन हमारी कन्या आभूषण आदि शोभा को तिरस्कृत करने वाली सुंदरी है। आभूषणों से श्रृंगार करने पर सुंदरता बढ़ती है। लेकिन हमारी कन्या इतनी सुंदर है कि आभूषणों का तिरस्कार करती है। और वह आपके योग्य है। एक बार यह महल पर विराजमान छत में थी कि विश्वासु गंधर्व ऊपर से विमान से निकले और हमारी कन्या को देखा मूर्छित होकर छत पर गिर गए।

इतनी सुंदर देवूति जी है। और इस समय मैं स्वयं आकर प्रार्थना कर रहा हूं कि आप स्वीकार करें तो इसका मतलब आप स्वीकार करेंगे। यह हमारी बहुत दुलारी लाडली है। उत्तानपात की प्यारी बहन है। और यह आद्या शक्ति की बहुत बड़ी उपासना कर चुकी है। इसलिए आप इस साध्वी कन्या को स्वीकार करें। पर एक शर्त मैं आपके सामने रखता हूं। जब तक संतान नहीं होगी तब तक आपको गृहस्थ धर्म स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि आप बैरागी हो ऐसा नहीं कि दो चार 10 दिन के बाद भी वैराग ले लो। जब तक संतान समर्थ नहीं हो जाएगी तब तक आपको वैराग्य नहीं लेना है।

इसके साथ रहना होगा। यह शर्त स्वीकार करें। मैत्री जी कहते हैं परम धर्म का ज्ञान रखने वाले विदुर जी करदम जी से इतना कहकर महाराज मनु शांत हो गए। देवती जी ने दृष्टि डाली। करदम जी पर हड्डी हड्डी केवल शरीर में त्वचा अलग दिखाई दे रही। हड्डी नेत्र तेजो में जाजुल्यमान सूर्य के समान प्रणाम किया चरणों में मनु जी ने देखा पुत्री की स्वीकृति दी। फिर शत्रुपा जी की तरफ देखा उन्होंने स्वीकृति दी। ऐसे पिता की, माता की और जिसका पानी ग्रहण होना तीनों की सहमति बराबर होनी चाहिए।

देखो कलयुग का माता-पिता से कोई मतलब नहीं है। और एक और पापाचरण चल गया है। लिव इन रिलेशन भगवान बचावे। कैसा कलयुग का तूफान चल रहा है कि पवित्रता धर्म मर्यादा इसका कोई मतलब नहीं। कैसी सुंदर पवित्र पद्धति है। फिर उन्होंने करदम जी को भगवान को साक्षी करके गुणवती कन्या का कन्यादान किया। यह बहुत बड़ा दान माना जाता। महारानी शत्रूपा ने बेटी और दामाद के लिए जो बहुमूल्य वस्त्र आभूषण कुछ लाए हुए थे वो प्रदान किए। कुछ समय तक वहां रहे। फिर जब चले तो बेटी का वियोग ना सहकर सकने के कारण हृदय से लगा के अश्रु मोचन किया महाराज मनु ने।

आंसुओं की झड़ी लग गई। देहुति जी के सिर के बाल भींग गए। माता-पिता के आंसुओं से। फिर मुनिवर करदम जी से आज्ञा लेकर के रथ पर सवार होकर रानी और सेवकों सहित वो अपनी राजधानी में चले गए। ब्रह्मावर्त राजधानी है महाराज मनुकी। सब प्रकार की संपदाओं से भरी हुई ब्रह्मावर्त क्षेत्र में बरहस्मति बड़ी संपत्ति भगवान के भजन में मनु जी हर समय डूबे रहते थे। जे नगरी में प्रवेश हुए सब ने स्वागत किया महाराज मन शतरूपा का अब भगवान श्री हरि में जिनका चित्त लगा है करदम जी कोई वार्ता नहीं की देवकी जी से ध्यानस्थ और नशा चढ़ा हुआ है भजन का द हजार वर्ष तक भगवान के ध्यान और यह भी देखने के लिए इनका कितना पति प्रेम है।

साध्वी देवती जी करदम जी की सेवा में लग गए। काम वासना दम द्वेष लोभ पाप ये तो छू भी नहीं गया था। देहुती जी के अंदर पवित्र गौरव संयम सुसा प्रेम मधुर भाषण इनके द्वारा पतिदेव की और वो निरपेक्ष एकदम कोई मतलब नहीं देवती जी से देवती समझती थी कि मेरे पति कौन है योगी है इसलिए शांत कोई चाह नहीं कोई मांग नहीं बस सेवा ही सेवा बहुत समय तक अब कहां राजकुमारी और कहां ऋषि के पास तो उनका भी शरीर दुर्बल हो गया खानपान वहां हलवा पूरी थोड़ी रखे कंद मूल फल ऋषि के पास और सुना कैसा जंगल जहां सिंह भालू सांप सब करदम जी बहुत दिनों के बाद दृष्टि डाली देहुति जी पर जब उनका भी शरीर शरीर ऐसा सूख के हो गया।

तब करदम जी बोले मनु नंदिनी तुमने आज तक हमसे कुछ कहा नहीं। केवल सेवा ही करती रही। शरीर धारियों को शरीर बहुत प्रिय है। आपने सुखा दिया मेरी सेवा में। इतना सुंदर शरीर। तुमने कोई क्षीण होने की परवाह नहीं की। मैंने देख लिया कि तुम्हारे अंदर कोई कामना नहीं पर धर्म का पालन करना है। अब तुम देखो मेरी तपस्या समाधि और उपासना के प्राप्त हुए तेज का स्वरूप। मुझे जो विभूतियां प्राप्त हुई है उनका तुम तेज देखो। अब मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करूंगा कि मैं कौन हूं।

तुम मुझे जान जाओ। यह जब देख लिया सेवा में पूर्ण समर्पित कोई कामना नहीं तब कहा अभी तक तुम करदम को ऋषि स्वरूप में जो देखती रही हो अभी तो देखा नहीं मुझे जाना नहीं आज मैं दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूं देखो मैं कौन हूं त्रिभुवन में कोई ऐसा पद और कोई ऐसा भोग नहीं है जो मैं तुम्हें प्रदान ना कर सकूं। अब मैं तुम्हें वह सब भोग प्रदान करूंगा जो चक्रवर्ती सम्राट के पास भी नहीं है। करदम जी समस्त योग विद्याओं में कुशल प्रवीण सिद्ध महापुरुष देहु जी ने कहा स्वामीन मैं जानती हूं मेरे स्वामी कितने समर्थ हैं।

मुझे अपने स्वामी के सुख के अलावा कोई आकांक्षा नहीं। यह धर्मपत्नी का स्वरूप है। अपने प्रिय पति की प्रसन्नता के अलावा कोई आकांक्षा नहीं। आप जिसमें प्रसन्न है उसी में मैं प्रसन्न हूं। पर प्रभु मेरे पिताजी की बात याद कीजिए। आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं गृहस्थ धर्म का आदर करता हूं। उसे स्वीकार करता हूं। तो आज तक स्वीकार नहीं किया तो क्या प्रभु गृहस्थ धर्म की पूर्ति होगी जो हमारा गृहस्थ धर्म का लाभ है क्या हमें संतान प्राप्त होगी करदम जी ने कहा अवश्य तो बोले प्रभु शरीर तो योग्य ही नहीं है आपकी भी शरीर अस्थ मात्र और इधर भी शरीर सूख गया है ना भवन है वृक्ष के नीचे रह रहे प्रभु क्या ऐसे गृहस्ती होती है?

देवती जी ने प्रश्न किया। करदम मुनि ने मुस्कुरा के कहा अच्छा तो तुम हमारी गृहस्ती देखना चाहती हो। इशारा किया नौ खंड का विमान जैसे नौ लोक हो। ऐसे विमान की रचना हो गई। उड़ेगा जहां चाहेंगे। नौ लोक हो ऐसा विमान ऐसा नहीं कि कोई छोटा मोटा 10 पांच लोग बैठ जाए ऐसा विमान नौ खंड का विमान मानो नौ लोक हो और वो उड़ेगा और विश्व में कोई यहां से लेकर ब्रह्मलोक तक ऐसा भोग नहीं जो उन नौ खंडों में ना हो। अत्यंत सुंदर रत्न अत्यंत सुंदर वस्त्र धारण किए हुए लाखों करोड़ों दासियां मणि के खंभों से सुशोभित और हर खंड में हर ऋतु इतना बड़ा खंड कहीं वर्षा हो रही कहीं शरद कहीं शिर हर ये देखो करदम जी का जितनी दिव्य सामग्रियां वो सब सोचने मात्र से भोग प्रकट हो जाए।

रसगुल्ला बने तैयार हैं। बनाने की जरूरत नहीं। गैस सिलेंडर चूल्हा की जरूरत नहीं। योग सिद्धि सब रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित फूलों की माला पहने हुए सुगंध प्राण सेवक सेविकाएं प्रकट हो गई। लाखों की संख्या में सुंदर पलंग सया सब मूंगे की देहेलियां हीरे के किवाण इंद्र नीलमणि के शिखर स्वर्ण के कलश महाराज आंखें चकापकचौंध हो गई देवती जी के कि मेरे पति कितने सामर्थ्यशाली है। पर अपनी तरफ देखा तो उनका देवी यह बिंदु सरोवर है। इसमें स्नान करके आओ। जे देहुती जी उस सरोवर में प्रवेश किया तो उस समय उनके फटे पुराने वस्त्र जो पहना गए थे महाराज वही सिर के बाल चिपक कर जटा हो गए थे।

शरीर में मैल शरीर कांतहीन जे भी गोता लगाया तो 1000 दिव्य देवियां उनके साथ ऐसे करके उठी तो 1000 दिव्य देवियां और शरीर नौ किशोर अवस्था कमल की सी गंध तेजोमय का देवती जी देखकर के चकाचौद हो गई कि सरोवर में कौन सी जड़ी बूटी की एकदम और वो सब देवियां हाथ जोड़ कर खड़ी हुई और कहा हम आपकी दासी आप हमारी स्वामिनी आज्ञा कीजिए जो बाल जटाएं बन गए थे एकदम घुंघराले मुलायम केस सब चमत्कार हो गया संकल्प मात्र से अब दिव्य निर्मल वस्त्र धारण की हुई दमकती हुई देहूती जी ये भगवान का भजन करने से लोक परलोक समस्त सुख प्राप्त होते हैं।

पर एक बार तो डट के भजन करें। हरिवंश महाप्रभु कहते हैं इ परलोक सकल सुख पावत मेरी सो भैया कृष्ण गुण संो दिव्य भोजन सामग्रियां इतने प्रकार के अमृत इतने स्वादिष्ट आसव पीने वाले इतने पदार्थ पाने वाले बिना बनाए सब अब देवूति जी ने जे दर्पण दिखाया उन देवियों ने जे ही अपना स्वरूप देखा तो खुद लज्जा युक्त हो गई। इतना सुंदर स्वरूप देहूति जी कांतमान दिव्य आभूषणों से सुशोभित मुख सुंदर दंतावली शास्त्रों देवियां स्तुति कर रहे हैं। करदम जी ने अब देवती जी को देखा विवाह काल से अभी तक गृहस्थ धर्म की दृष्टि से नहीं देखा।

दृष्टि अलग-अलग बड़े प्रेम से हाथ पकड़ कर विमान पर चढ़ाया और करदम जी ने नौ रूप धारण किए अपने अगर भगवान की आराधना तो फिर संसार का भी जो सुख है ना हां वो सब प्रसादे सर्व दुख नाम हानि रस उपजते जैसे ऐसे बर्फी खाओ और राधा वल्लभ जी को भोग लगा के पा तो प्रसाद हो गई वो प्रसाद दुख का अब ये सब प्रसाद है। चढ़ गए विमान पर चल पड़ा विमान नौ खंड का कुबेर की घाटियां इंद्र की घाटियां कामदेव की शीतल मंद सुगंध वायु सब आकाश गंगा पाताल गंगा जहां मनावे वहां घाटियों पे विमान पे नौ रूप धारण करके बड़े-बड़े सिद्ध गणों के विमान आसपास विनय करते हुए जा रहे हैं।

करदम जी का विमान वैशंभक्षक सुरसन नंदन पुष्पभद्र चैत्र थे देवताओं के उद्यान में विदुर जी ये भगवान के भव भयारी पवित्र चरणों का आश्रय लेने का फल है कौन सी ऐसी त्रिभुवन में वस्तु है जो भगवान के भक्त को ना प्राप्त हो जाए महायोगी करदम जी ने सारे भूमंडल में सारे सारे दपों में सारे लोकों में अपनी प्रिया को घुमाया देती जी को कहा चलो आज ब्रह्मलोक चलते हैं आज मार लोक चलते हैं आज सुरसन वन आज नंदन वन आनंद मच रहा है भजन का फल है भजन नहीं करोगे तो लोक परलोक सब बिगड़ जाएगा भजन जरूरी है नौ रूपों में देहुति जी के साथ नौ खंड के विमान विमान में बहुत वर्षों तक भ्रमण करता रहा विमान।

पेट्रोल डीजल की जरूरत नहीं। संकल्प से चल रहा है। विमान में ना ड्राइवर है और ना पेट्रोल डीजल की जरूरत है। बोले चलो ब्रह्मलोक पहुंच गया ब्रह्मलोक। अमुक घाटी वहां पहुंच गया। ऐसे और खतरा कुछ है नहीं। कि अगर विमान बीच में फेल हो गया तो सब नष्ट हो जाएगा। नहीं बहुत सुंदर व्यवस्था भगवान की इसलिए भजन कर लो घाटा तो है ही नहीं भजन करने में भगवान ना प्राप्त हुए तो ऐसा वैभव प्राप्त होगा ऐसा भजन प्राप्त होगा कि अगले जन्म भगवान प्राप्त हो जाएंगे नामे भक्ता प्रणसति थोड़ा भी भजन करने वाले का नाश नहीं हो सकता इसलिए मान लो राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण कामदेव और रति भी ललचाए ऐसी व्यवस्था थी उन विमान में कामदेव और रति भी ललचाए।

ऐसी व्यवस्था थी। कितने वर्ष तक विहार हुआ? सैकड़ों वर्षों तक। 10,000 वर्ष तो तपस्या किए हैं। तो अगर 10,000 वर्ष विहार करें तो कौन सी बड़ी बात है? और यह सब समय ऐसा लगा मानो मिनट भर में निकल गया भोगों में। करदम जी ने विचार क्यों विचार भक्त होता है विचार इतना लंबा समय ऐसी ऐसी सुख सुविधाएं फिर भी मन में तृप्ति नहीं इंद्रियों में वही लालसा अब नौ कन्याएं प्रकट हुई श्री देवूती जी से जब नौ कन्याएं प्रकट हुई इसके इसके बाद कहा बस अब विमान भी अंतर्ध्य हो जाएगा।

सारी भोग सामग्री अंतर्ध्य हो जाएगी। गृहस्थ धर्म का लाभ मिल चुका और मैं अब कठोर सन्यास व्रत का पालन करते हुए भगवान की प्राप्ति करूंगा। देवती जी के आंसू आ गए और उन्होंने कहा भगवन अभी नहीं आपने जो प्रतिज्ञा की थी वह निर्वाह कर दी। लेकिन मेरे को अभयदान देने वाला भी कौन आया है? यह कन्याएं तो मैं दे दूंगी लेकिन मेरे को अभयदान फिर इनके लिए वर कन्याओं के लिए प्रभु नहीं अभी आप सन्यास नहीं ले सकते अभी आपके धर्म की पूर्ति नहीं हुई परमात्मा से विमुख रहकर के कोई अगर पुरुष ऐसा बोले तो बात अलग है आप तो परमात्मा के सम्मुख और आराधना कर चुके हैं।

पुत्रियों के लिए वर खोजिए और मेरे कल्याण की बात बता करके तब आप जा सकते हैं। ऐसे नहीं अज्ञानवश यदि आप जैसे महापुरुषों का संग हो जाए तो अमोगस वसंगता प्रदान करके भगवत प्राप्ति कराता है। प्रभु ना तो अभी हमारी पुत्रियों का ब्याह हुआ है और ना हमें अभी ज्ञान हुआ है भगवत प्राप्ति का। इसलिए मैं अभी आपको जाने के लिए अनुमति नहीं दी और बिना पत्नी की अनुमति के सन्यास लिया नहीं जाता। ये जो मनमानी करते हैं उनको भगवत प्राप्ति नहीं होती। देवूती जी ने जब ऐसी बात की तो करदम जी ने कहा एक बात याद आ रही है उस समय आप नहीं थी भगवान के जब हमें दर्शन हुए और उन्होंने आपका परिचय बताया कि आप पत्नी रूप में प्राप्त होंगी तब उन्होंने यह कहा था नौ कन्याएं होंगी और दव में मैं स्वयं आऊंगा तुम्हारा उद्धार करने के लिए दूसरे राजकुमारी तुम खेद मत करो तुम्हारे कल्याण और हमारे कल्याण के लिए अविनाश भगवान पधारने वाले हैं।

तुम व्रतों का पालन करो। संयम से रहो। निरंतर नाम जप करो, भजन करो। अब भगवान आने वाले हैं जो हमारे तुम्हारे अहंकार की देहाभिमान की ग्रंथि का भेदन करेंगे। बहुत प्रसन्न हुई देवभूति जी। पूर्ण विश्वास था कि मेरे प्रति साक्षात भगवान ही है। निर्विकार जगत गुरु भगवान श्री पुरुषोत्तम की आराधना में जो हर समय लगा हुआ है वो भगवान का ही स्वरूप तस्मित जने भेदा अभाव जैसे काष्ट से अग्नि प्रकाशित होती है। ऐसे ही देत जी से भगवान प्रकट हुए। मेघ गर्जना होने लगी। गंधर्व गण गान करने लगे।

अप्सराएं नृत्य करने लगी। आकाश में देवताओं के नगाड़े बजने लगे। दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई। सरस्वती नदी के तट पर करदम जी के आश्रम में स्वयं भगवान ब्रह्मा जी आए और साक्षात परम ब्रह्म परमात्मा भगवान श्री हरि सांख्य शास्त्र का उपदेश करने के लिए अपना अवतार धारण कर रहे हैं। इसलिए सब ने आकर के वहां वंदना की। ब्रह्मा जी ने कहा प्रिय करदम तुमने जो तपस्या की दूसरों का मान दिया उसका फल ये हुआ कि आज स्वयं भगवान तुम्हारे यहां पधार रहे वो कितना मंगलमय गृहस्थ जीवन जिसके घर में भगवान पधारे या भगवान का कोई प्रेमी भक्त पधारे सो कुल धन्य उमास सुन जगत पूज्य सुपनीत वो जगत पूज्य परम पावन कुल है जिसमें भगवान का कोई प्रेमी भक्त पधारे ये तो साक्षात भगवान पधार रहे हैं।

मैं जानता हूं संपूर्ण प्राणियों की निधि भगवान कपिल के रूप में अवतीर्ण हो रहे हैं। ये भगवान का अवतार कपिल देव जी के रूप में है। ब्रह्मा जी ने देवती से कहा राजकुमारी यह तुम्हारी पति भक्ति का फल है कि स्वयं भगवान तुम्हारे गर्भ से प्रकट हो रहे हैं और तुम्हारे अज्ञान की ग्रंथि का छेदन करेंगे। बड़े-बड़े सिद्धों को सांख्याचार्यों को उपदेश देंगे। इनका नाम कपिल भगवान होगा। ब्रह्मा जी इस प्रकार सब विनय करके देवताओं के साथ हंस पर आरूढ़ होकर ब्रह्मलोक चले गए।

करदम जी ने उनकी आज्ञा के अनुसार मरीच आद प्रजापतियों के साथ अपनी नौ कन्याओं का विवाह किया। कला नाम की कन्या मरीच को अनुसूया नाम की कन्या अत्री ऋषि को श्रद्धा नाम की कन्या अंगिरा ऋषि को हवीभ नाम की कन्या पुलस्त ऋषि को समर्पित की और पुल को उनके अनुरूप गति नाम की कन्या दी। कृतु के साथ परम साध्वी नाम की कन्या का विवाह किया। भृगु जी को ख्याति नाम की कन्या और वशिष्ठ जी को अरुंधति नाम की कन्या समर्पित की। अथर्व ऋषि को शांति नाम की कन्या जिससे यज्ञ कर्म का विस्तार किया जाता है।

करदम जी ने नौ कन्याओं का नौ महाऋषियों से विवाह करके खूब सत्कार किया। विवाह हो जाने पर सब ऋषि करदम जी की आज्ञा लेकर आनंद पूर्वक अपने अपने आश्रमों को चले गए। करदम जी ने देखा कि साक्षात देवाधिदेव भगवान श्री हरि ने ही अवतार लिया है। तो अपने पुत्र कपिल भगवान के पास एकांत में गए और एकांत में प्रणाम किया और कहा प्रभु अपने पापों के कर्मों के कारण दुख में संसार में नाना प्रकार से पीड़ित होते हुए इन मनुष्यों पर आप कृपा करके यह रूप धारण किया है। वैसे तो आप हमें सौभाग्य दिया कि मैं पिता हूं पर मैं जानता हूं आप कौन हो इसलिए एकांत में आपको मैं प्रणाम कर रहा हूं।

भक्तों की रक्षा करने वाले हम विषय लोपों के द्वारा होने वाली अपनी अवज्ञा का कुछ भी ना विचार करके क्या करदम जी कह रहे अवज्ञा क्योंकि आप प्रकट हुए थे। मैंने आपको ना मांगकर पत्नी मांगी थी। तो आपने हमारी रक्षा के लिए आज हमारे घर पर अवतीर्ण हुए। वास्तव में आप भक्तों का मान बढ़ाने वाले हैं। प्रभु प्राकृत रूप से रहित अलौकिक रूप भक्तों को प्रिय लगने वाला आप तत्व ज्ञान की इच्छा से प्रकट हुए हैं। आप में समग्र ज्ञान, समग्र वीर्य, समग्र यश, समग्र वैराग्य, समग्र ऐश्वर्य विराजमान है।

नाथ मैं आप भगवान कपिल की शरण ले रहा हूं। आज मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया। जिसे भगवत प्राप्ति हो जाती है वही तीनों ऋणों से मुक्त होता है। ध्यान रखना। क्या आपकी आज्ञा हो तो मैं सन्यास ग्रहण करूं। क्योंकि मैं सन्यास धारण करके कठोर व्रत के द्वारा आपकी आराधना करना चाहता हूं। श्री भगवान ने कहा मुन वैदिक लौकिक कर्मों में संसार के लिए मेरे वचन ही प्रमाण है। इसलिए मैंने तुमसे कहा था मैं तुम्हारे यहां जन्म लूंगा और मैंने सत्य किया मैं प्रकट हुआ हूं। इस बार मेरा जन्म हुआ है उपदेश देने के लिए।

मैं जीवन मुक्त स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीरों से रहित आत्मानुभव सांख्य शास्त्र आत्मज्ञान का सूक्ष्म मार्ग जो लुप्त हो गया है उसे वर्णन करने के लिए स्थापित करने के लिए मैं प्रकट हुआ हूं। जाओ मैं आज्ञा देता हूं। इच्छा अनुसार सन्यास धर्म स्वीकार करो और समस्त इच्छाओं का त्याग करके दुर्ज मृत्यु को जीतकर मेरे को प्राप्त हो सामने बैठे हैं कह रहे मेरे को प्राप्त हो यही अर्जुन जी से कह रहे भजन के बिना नहीं भगवान सामने बैठे कह रहे इच्छाओं का त्याग कर मेरा भजन करते हुए मेरे को प्राप्त हो इच्छा ही बंधन है मैं स्वयं प्रकाश संपूर्ण संपूर्ण जीवों के अंतःकरण में रहने वाला परमात्मा हूं।

जब तुम बुद्धि के द्वारा समस्त इंद्रिय और मन को समेट कर मेरे में लगा दोगे तो अंतःकरण में ही तुम्हें मेरा साक्षात्कार हो जाएगा। हृदय में ही उसी समय तुम मोक्ष पदवी को प्राप्त कर लोगे। मेरा साक्षात्कार करके और तुम आज से माता देवूती की चिंता मत करो। उनको तो मैं परम पद प्रदान करूंगा। उनके संसार रूप भय को पार करने के लिए मैं आया हूं। आप जाओ सन्यास ग्रहण करो। भगवान कपिल के इस प्रकार कहने पर प्रजापति करदम जी ने भगवान कपिल देव जी की चार परिक्रमा की। प्रणाम किया और उसी समय कठोर सन्यास का व्रत लेकर के निकल पड़े।

अहिंसा में सन्यास धर्म का पालन करते हुए एकमात्र भगवान की शरण में होकर मौन हो गए। समस्त अग्नियों का त्याग कर दिया। समस्त कर्म कर्म फलों का त्याग कर दिया। निसंग जड़वत जड़वत ये स्थिति जैसे भगवान ऋषभ देव कार्य कारण से अतीत सत आद गुणों के प्रकाशक निर्गुण अनन्य भक्ति से प्रत्यक्ष होने वाले परब्रह्म परमात्मा का कपिल भगवान के रूप में जो प्रकट हुए थे साक्षात्कार कर लिया। वाणी से मौन शरीर से निसंग कर्म और कर्म फल भगवत समर्पित जड़वत एकमात्र भगवान के चिंतन में तो जो भगवान पुत्र रूप में अवतरित हुए थे उन्हीं का साक्षात्कार कर लिया पर ब्रह्ममय स्थिति श्री करदम जी की अहंकार ममता सुख दुख आदि द्वंदों से छूटकर भेद का नाश करके अपने स्वरूप में अभेद स्थिति जो भगवान वही स्थिति अभेद स्थिति को प्राप्त होकर जैसे शांत लहरों वाला समुद्र ऐसे करदम जी भगवान को प्राप्त हुए।

परम पद की स्थिति में करदम जी महाराज स्थित ये भगवान की कृपा से भगवान अजन्मा है। अपने भक्तों के लिए वह जन्म लेते हैं। योगी प्रवर पुरुष श्रेष्ठ भगवान कपिल जी की अद्भुत कीर्ति है। विदुर जी जैसे आत्म ज्ञान विषयक आपने प्रश्न किया ऐसे ही माता देवती जी ने भगवान कपिल देव जी से प्रश्न किया जब देखा कि करदम जी तो सन्यास लेकर चले गए। उनका तो काम हो गया। अब मेरा काम बनाने के लिए तो प्रभु स्वयं आए हुए हैं। तो जिस दिन शांत मुद्रा में भगवान कपिल देव जी विराजमान थे उनके समीप पहुंच के देहुति जी ने कहा भूमन प्रभु मैं जानती हूं आप मेरे पुत्र नहीं हो पुत्र बनने की लीला किए हो आप जगत पिता हो स्वयं भगवान हो प्रभु मैं इन दुष्ट इंद्रियों से भोग भोग करके छक गई ऊब गई पर यह नहीं मान रही यही बात है निर्णा नित भूमन नस तरणा संभाव्य माने प्रपन तम प्रभु प्रभु ये दुष्ट इंद्रियां इतना भोग भोगी फिर भी मैं तो ऊब गई लेकिन ये इंद्रियां फिर भी नहीं उबी उनहीं भोगों में जा

रहे प्रभु अब इनकी इच्छा पूर्ति करना बंद ये घोर अंधकार में मुझे ले जा रहे हैं नाथ मेरे को अब चिंता तो है नहीं क्योंकि मेरे कल्याण के लिए आप मेरे पुत्र बने हो आकर के पर मैं अब जन्म परंपरा में नहीं जाना चाहती मेरा आखिरी जन्म हो प्रभु कृपा करो मैं अब इस अज्ञान अंधकार में नहीं डूबना चाहती मेरे नेत्र आप हो नाथ मुझे दिखाओ रास्ता अब मैं जन्म नहीं चाहती बहुत छक गई इन इंद्रियों से बड़ी दुष्ट है हे आदि पुरुष आप मेरे नेत्र हो जो सूर्य की भांति ज्ञान का मार्ग

दिखाओगे ये अज्ञान का नाश कर अज्ञान अंधकार का नाश करके ज्ञान रूपी प्रकाश करने वाले जो मैं देह गेह में फंस गई ये दुराग्रह कैसे मिटेगा मैं स्त्री हूं आप मेरे पुत्र हैं ये दुराग्रह ये मेरा महामोह कैसे दूर होगा नाथ ये जो देहाभिमान ये कैसे दूर होगा प्रभु मेरे तो आप ही हो संसार रूपी असत वृक्ष के काटने के लिए आप ही कुठार हो। मैं आपसे प्रकृति और पुरुष का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूं। मैं आपकी शरण में हूं। हे भक्तवत्सल मैं आपको प्रणाम करती हूं। आप ऐसे उपदेश कीजिए जिससे मेरा देहाभिमान नष्ट हो जाए।

अज्ञान अंधकार नष्ट हो जाए। जब माता देहुती ने ऐसा प्रश्न किया तो भगवान कपिल देव जी उन्हें उत्तर दे रहे हैं। सो शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की जय

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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