यदि ये 3 बातें हैं तो आपकी साधना पूर्ण मानी जाएगी ! // 23/08/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
जय जय श्री राम मनुष्य जीवन केवल केवल जन्म मरण से मुक्त होने के लिए मिला है। अगर हम सावधान ना रहे तो यह अमूल्य जीवन नष्ट हो जाएगा। प्राय सबका मन पांच ज्ञानेंद्रियों के साथ बस भोगों में रत रहना ही जीवन माना गया है। प्राय खाना पीना [गला साफ़ करने की आवाज़] देखना सुनना भोगना अर्थ प्राप्त करना, सुंदर लौकिक विषयों का संग्रह करना इतना ही केवल जीवन माना गया। लेकिन जब मृत्यु होती है तो सब छूट जाता है। जीव अकेले किए हुए पाप कर्म या पुण्य कर्म को साथ लेकर जाता है।
हम क्या करें जिससे संसार में रहते हुए जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाए चिंता शोक भय दुख मृत्यु इससे हम मुक्त हो जाए जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी जो कहते हैं जरा मरण मोक्षाय मामा यत ते ब्रह्म तदु कृष्ण मध्यात्मम कर्म चाखिलम जरा बुढ़ापा बहुत दुखमय होता है। इंद्रियां भोगों की तरफ लालायित होती है और भोगने की सामर्थ्य नहीं होती। कि ये अवस्था से मन ठीक नहीं होता। मन भजन से ठीक होता है। अगर सोचा जाए कि बुढ़ापा आ जाएगा। हम निष्काम हो जाएंगे। हम निर्विकार हो जाएंगे।
ऐसा नहीं जरा मरण मोक्षाय मामासित बुढ़ापा और मृत्यु दुख और चिंता शोक और विषाद इनसे बचने का उपाय भगवान क्या कह रहे हैं? माम आश्रित मेरा आश्रय लो भगवान के आश्रय के बिना दुख की निवृत्ति नहीं हो सकती। मृत्यु बहुत दुखमय होती है। जन्मत मरत दुसा दुख होई। लेकिन जो भगवान का भजन करते हैं भगवान के आश्रित है। भगवान कह मामाशित बस केवल भगवान के आश्रय से बच सकते हो। तो क्या जो भगवान का आश्रय लिए हुए भजन करते हैं उनकी मृत्यु नहीं होती? होती है। लेकिन उनकी और सांसारिक पुरुष की मृत्यु में अंतर है।
जो भगवान के आश्रित होता है उनकी मृत्यु ऐसी होती है जैसे गजराज हाथी के गले से छोटी मल्ली की माला टूट के गिर जाए और उसे पता भी ना चले। ऐसे ही आनंदमय मृत्यु होती है। मृत्यु महोत्सव हो जाती है जब मामाशित्य भगवान के आश्रित हो जाता है। कोई रोग शोक बुढ़ापा ये शरीर के होते हैं। आत्मा के नहीं होते। जब आप भजन करेंगे तो भगवान के द्वारा आपको यह ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। मृत्यु महोत्सव हो जाती है जब हम किशोरी जी की शरण में होते हैं, लाडली जी की शरण में होते हैं।
हमारी सारी समस्याओं का समाधान एकमात्र भगवान की शरणागति है। अगर प्रियालाल की शरण में नहीं है तो आप रुपए से अपनी बल बुद्धि से समस्याओं का समाधान नहीं पा सकते। एक समस्या मिटेगी दूसरी खड़ी हो जाएगी। इसलिए भगवान कह रहे हैं मामा नृत्य। हम कब भजन करेंगे? कब आश्रित होंगे? बाल्यावस्था हमारी खेल में चली जाती है। हमें शुद्ध नहीं रहती कि हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। और जब जवानी की अवस्था आती है तो ऐसा तूफान आता है भोगों का। क्यों कब जवानी व्यतीत हो गई पता नहीं चलता।
जब बुढ़ापा आता है तो जो जीवन भर किया है उसी का चिंतन होता है। इसलिए प्रह्लाद जी ने कहा बाल्यावस्था से ही अभ्यास भगवान की शरण में होकर भजन करने का कर ले। अगर बाल्यावस्था से नहीं किया तो आज सुन रहे हो या जब से संतों का संग सुना उनके वचन सुने तो भगवान का आश्रय लेकर भजन शुरू कर दो। प्रया लोगों के मन में दो विभाग रहते हैं। एक सांसारिक कार्य और एक भजन। वो भजन को समझते हैं माला लेकर बैठना या ठाकुर सेवा करना प्रगट में या हम कोई ग्रंथ पढ़ रहे हैं। केवल इतना ही भजन समझते हैं।
इतना ही भजन नहीं है। भजन का तात्पर्य है भगवान के लिए जीवन अर्पित कर देना। अब चाहे आप किसानी करो, व्यापारी हो, आप नौकरी करते हो, आप कुछ भी करते हो, भगवान के लिए करो। भगवान के होके भगवान के लिए जो कुछ किया जाता है वह भगवत प्राप्ति करा देता है। इसमें यह क्रिया भगवत प्राप्ति करा देगी ऐसी बात नहीं है। अगर माला चल रहा है और आपका अहम नहीं मिटा तो आप भगवत प्राप्ति नहीं करेंगे। और एक किसानी कर रहा है और दन्य भाव में है। नाम जप करता है और भगवान को सब कुछ अर्पित करता है।
कृष्णपणमस्तु वो भगवान को प्राप्त हो जाता है। मामा नृत्य भगवान के आश्रय से ही जन्म मरण और नाना प्रकार के दुखों से हम मुक्त हो जाएंगे। जो नित्य निरंतर भगवान को साथ लिए रहता है। वही महात्मा है। चाहे गृहस्थ हो, चाहे विरक्त हो, चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो। भगवान को साथ लिए रहने का मतलब क्या है? जहां भगवान का नाम है वहां भगवान है। अनुभव कराएंगे आपको कि वह साथ है। पहली बात तो समझ लो कोई कण कोई क्षण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो। सर्वम खलदम ब्रह लेना नास्तिक किंचन सब जगह भगवान में सब भगवान में है सब में भगवान है ये बात बिल्कुल पक्की समझ लो सब में भगवान है विराजमान है और सब भगवान में भगवान इतने विराट महान है कि हम उनके रोम कूप में विराजमान है दिखरावा माते त अद्भुत रूप अखंड रोम [गला साफ़ करने की आवाज़] रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मांड भगवान के एक रोम कूप में करोड़ों ब्रह्मांड उड़ते रहते हैं जैसे त्रिशरेणु में आप देखो झरोखों से सूर्य की किरण आती है छोटे-छोटे कण उड़ते हैं ऐसे भगवान ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रतििवेद कहे तो एक ब्रह्मांड है।
उस ब्रह्मांड में ये भारत देश है। उस भारत देश के किसी कोने में हम है तो भगवान में ही है। सब भगवान में और भगवान सब में युमाम पश्यति सर्वत्र सर्वम चम पश्यति तस्या न प्रणस्यामि सच न में प्रणसति जो सब जगह मुझे देखता है और सबको मेरे में देखता है मैं उससे कभी अलग नहीं रहता तो पहली बात मुख में हो राम नाम राम तेरे हाथ में बंदे तू तू अकेला नहीं राम तेरे साथ में भगवान का नाम जप करने वाले के साथ भगवान है ऐसा अनुभव होने लगता है। अब भगवान को लेकर के उनकी स्मृति को लेकर के आप जो कर्म करेंगे वह भगवत अर्थ कर्म होगा और वह आपको दुखों से संकटों से विपत्ति से नाना प्रकार के शोक से और जड़ा मृत्यु से बुढ़ापा और मृत्यु से बचा लेगा।
इसलिए भगवान का स्मरण करते हुए भगवान के लिए कर्म किए जाए तो हम जन्म और मृत्यु से मोक्ष को प्राप्त हो जाए। भगवान कहते हैं कि मैं सबको स्वतः प्राप्त हूं। मेरे लिए कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं। प्रयास उसके लिए किया जाता है जो बहुत दूर हो। भगवान हमारे हृदय में ही बैठे हुए हैं। स्वता सिद्ध भगवान हमारे हृदय में है। बस स्मृति की आवश्यकता है। अगर हमारा कोई प्रयास है तो वह स्मृति है। हर समय भगवान के स्मरण में रहना। भगवान की याद में रहना। अगर हमारी स्मृति संसार में ही है तो ना हम साधक हैं ना हम भगवत प्राप्ति कर पाएंगे हमें उठते बैठते चलते फिरते राधा राधा राधा राधा स्मरण करना है तो जो स्वतः प्राप्त भगवान है वह हमारे हृदय में ही प्रकाशित हो जाएंगे।
सबसे पहला दर्शन हृदय में होता है। किसी को भी भगवत साक्षात्कार होता है तो बाहर नहीं पहले हृदय में होता है। फिर जो मानस नेत्र हैं इन नेत्रों से नहीं होता। मानस नेत्र उर के नयन निहार उन नेत्रों का प्रकाश जब इन नेत्रों में होता है तो चराचर जगत में भगवान दिखाई देते हैं। जड़ चैतन्य कछु नहीं दिखत जहां दिखत श्याम खड़े बिहल विकल संभार तन की नैना घूमत रूप भरे प्रभु बस जाते हैं। जिस व्यक्ति को जिस जड़ वस्तु को वो देखता है तो अपना श्याम सुंदर दिखाई देता है। दूसरा नहीं जित देखूं तित श्याममय यह स्मृति से प्राप्त होता है।
जो साधक चाहे वो गृहस्थ हो या विरक्त भगवान के लिए इसका कोई भेद नहीं है। पुरुष नपुंसक नारिवा जीव चराचर कोई सर्व भाव भज कपट तज मोहि परम प्रिय सोई परम प्रिय सोई वो परम प्रिय चाहे स्त्री हो पुरुष हो नपुंसक हो कोई भी हो पुरुष नपुंसक नारिवा जीव चराचर कोई चराचर जीव कोई भी हो जो भगवान का भजन करता है वो भगवान को प्रिय होता है और जिस पर भगवान की कृपा होती है तो संकट, विपत्ति, दुख यह आते नजर आएंगे पर प्रभाव नहीं दिखा पाएंगे। उसका हृदय निरंतर आनंद में बना रहेगा।
जब तक हमारे हृदय में दुख निवृत्ति की बात नहीं आती तब तक भगवान की शरणागति नहीं होती। मामा नृत्य भगवान का आश्रय नहीं होता। रुपए का आश्रय होता है। लोगों का आश्रय होता है। अपना आश्रय होता है। भगवान का आश्रय नहीं होता। सबसे कठिन बात है भगवान का आश्रय होना। महापुरुषों से प्रश्न किया गया कि भगवत प्राप्ति के लिए भगवान का आश्रय लेकर निरंतर भजन करना आवश्यक है। परंतु मेरी साधना में इतना दम नहीं कि मैं भगवत प्राप्ति कर सकूं। मुझे लगता है कि तीव्र योग जब होता है तभी भगवत प्राप्ति होती है।
पर हम लोगों की चाल से लगता है कि भगवत प्राप्ति नहीं होगी। तो उन्होंने जो खास उत्तर दिया कहा पहली बात भगवत प्राप्ति के लिए हम भगवान के हैं। इसमें कौन सा जप तप करने की बात है? जैसे गीता में भगवान ने कहा ममो जीव लोके जीव भूता सनातना मम तू मेरा है भगवान को हम अपना क्यों नहीं मान पा रहे हैं भगवान हमारे हैं श्री कृष्ण हमारे हैं। श्री लाडली जो हमारे हैं। हम क्यों नहीं मान पा रहे? क्योंकि हमारी मान्यता माता पिता पुत्र पत्नी परिवार रिश्तेदार नातेदार इनमें फंस गए।
इसीलिए हम अपने भगवान को अपने प्यारे को अपना नहीं मान पा रहे। कहने को है केवल अपना हृदय से नहीं मान पा रहे। जैसे हृदय से हम मां को मां मानते हैं। पिता को पिता मानते हैं। पुत्र को पुत्र मानते हैं। पत्नी को पत्नी मानते हैं। और हृदय से प्यार है। हम उनका स्मरण करते नहीं लेकिन वो कभी भूलते भी नहीं। यह है अपना मानने का फल कि हम पत्नी पुत्रा आदि को चिंतन करने नहीं बैठते। ऐसे ध्यान लेकिन कभी भूलते भी नहीं। ऐसे जब हम भगवान को अपना मान लेते हैं तो भगवान का भजन स्वत होने लगता है।
तो सबसे पहली बात है सबको ये मानना चाहिए भगवान मेरे और मैं भगवान का प्रियालाल मेरे और मैं प्रियालाल का। बिल्कुल पक्की बात समझ लीजिए। इतना मानना ही केवल आपका परम मंगल होना शुरू कर देगा। परम मंगल मैं प्रभु का हूं। प्रभु में ये गोस्वामी तुलसीदास जी ने बड़े अनुभव से कहा है। बिगड़ी जन्म अनेक की अब सुधरे आज हो राम को मैं भगवान का हूं। यह बात जब हृदय में बैठ जाएगी मैं भगवान का हूं तो धीरेधीरे ये ममता हट जाएगी निर्ममो ये जो संसार के रिश्ते नाते संबंधों में ममता है यही हमारी दुर्गति का कारण है मोह के कारण आप मान नहीं पा रहे इन्हीं में भगवत भाव करके नाते स्नेह राम के मन पत्नी में पुत्र में परिवार में अगर भगवत भाव हो जाए या ये सब प्रभु के हैं ऐसा मान लिया जाए नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी तो बंधन कट जाए लेकिन दो में एक बात नहीं मानने के लिए तैयार है हम जबान से केवल कह रहे हैं हृदय से हम नहीं मान पा रहे।
अगर ऐसा मान ले कि शरीर के सहित जितने रिश्ते नाते हैं वो सब भगवान के ही है। सब में भगवान है। तो ममता नष्ट हो जाए। यह ममता इतनी घातक है कि सब कुछ छोड़कर के राज्य परिवार सब कुछ छोड़कर के गंडकी नदी के किनारे भगवान का भजन करने का अनुष्ठान लिए हुए भरत जी के हृदय में मृग के बच्चे से ममता हो गई तो अगला शरीर मृग का मिला। इतनी खतरनाक है ममता और हम सबसे ममता की हुई है लेकिन भगवान से नहीं और भगवान की प्राप्ति के लिए दुखों की निवृत्ति के लिए भगवान से ममता करनी होगी ममता नित्य विहार में समता सब संसार में सब में समभाव भगवत भाव और प्यार तो केवल लाडली लाल से प्रियाल से ऐसा कैसे हो सकता है?
इसका उपाय क्या है? संत संग। क्योंकि बिना संत संग के हमारी मति प्रभु में नहीं लग सकती। यदि हमें संतों का संग मिले तो हमारी मति जो है वो प्रभु में लगने लगे। प्रभु में लगने का मतलब है सत्संग सुनने वाला नाम जापक होना चाहिए। नाम जप में लगे। सत्संग सुनने वाला भगवान की कथा सुने। सत्संग सुनने वाला अपने घर में चाहे वो विरक्त हो या गृहस्थ हो अपनी कुटिया में या अपने घर में ठाकुर जी विराजमान करके उनकी सेवा करने वाला होना चाहिए। जो भगवत कथा सुनता है, भगवत नाम जप करता है, भगवत सेवा करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।
मन निर्मल हो जाता है और निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा। तो हमें अगर लग रहा है कि हमारी साधना भगवत प्राप्ति नहीं करा पाएगी तो आस रहे मैं भगवान का हूं और सही बात यह है कि साधना से भगवत प्राप्ति हो भी नहीं पाती होती है भगवान के आश्रय से अंत में यह अनुभव में आता है जैसे हरिराम व्यास जी ने अनुभव किया काू के बल भजन को काू के आचार पर व्यास भरोसे कुंवर के सोवत पाव पसार भरोसा मानुषित मेरे आश्रित जो प्रियाल के आश्रित है उसका कल्याण निश्चित हो जाता है।
इसलिए आपको एक सरल बात बता रहे हैं। कुछ बने ना बने थोड़ी-थोड़ी देर में अगर यह याद करते रहो कि मैं प्रभु का और प्रभु मेरे तो फिर आप चमत्कार देख लो इस बात का इस बात का आप चमत्कार अपने जीवन में देख लो। थोड़ी-थोड़ी देर में याद करते रहो। मैं श्यामा श्याम का श्यामा श्याम मेरे मैं भगवान का भगवान मेरे जो भगवान के आश्रित होता है अगर उससे गलत कर्म भी हो जाते हैं पाप कर्म भी बन जाते हैं तो भगवान के आश्रय के संबंध के कारण भगवान उसके सारे पाप क्षमा कर देते हैं।
इसीलिए गीता जी में बड़े जोर की बात यह कही सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज अहम तम सर्व पापभ्य मोक्षस्याम मास यदि तुम समस्त धर्म का आश्रय छोड़कर केवल मेरा आश्रय लो भागवत धर्म मेरे आश्रित के सारे पाप मैं स्वयं नष्ट करता हूं हमारे द्वारा कुछ अच्छे कर्म होते हैं, कुछ बुरे कर्म होते हैं। हम इस प्रपंच से नहीं निकल पाएंगे। हमारी बुद्धि कभी भगवान की तरफ जाती है, कभी भोगों की तरफ जाती है। हमारा मन कभी थोड़ी देर भगवान में लगता है तो कभी संसार में लगता है।
ऐसे मन से ऐसी बुद्धि से भगवत प्राप्ति नहीं होती। पूर्ण रूप से भगवान में स्थित मन बुद्धि हो। मत बुद्धिम निवेश हमसे नहीं हो पाएगा क्या करें ऐसे हो जाओ किसी के तपस्या बल है किसी के भजन बल है आश्रय बल [गला साफ़ करने की आवाज़] जिसको भगवान के आश्रय का बल है लाडली जो के चरणों का आश्रय है वो इस संसार से निकल जाता है तो पहली बात मैं भगवान का हूं भगवान मेरे जरा मरण मोक्षाय इससे मुक्त होने के लिए माम आश्रित्य मेरे आश्रित ये बात बैठान लो इसमें बड़ी कृपा की बात कह रहा हूं ये संबंध मानने मात्र से माया अपने आप हट जाएगी भ्रम अपने आप हट जाएगा जा सु कृपा सब भ्रम मिट जाई गिरजा सोई कृपालु रघुराई भगवान का आश्रय लेते ही माया कांपने लगती है।
माया हट जाती है। माया गुप्त हो जाती है। माया लुप्त हो जाती है। इसीलिए भगवान ने कहा है देवी सा गुणम म माया दत्तया मामेव ये प्रपद्यते माया मेंता तरते जो केवल मेरी शरण में होते हैं वो माया से तर जाते हैं। भगवान का आश्रय और भगवान का नाम जप और संतों का संग। अगर ये तीन बातें हमारे जीवन में आ जाए तो हमारा कल्याण हो जाए। हमारा मंगल हो जाए। सब लोगों का स्वागत है। आप इतनी दूर यहां यमुना जी के पावन पुलि पर पधारे तो प्रार्थना है कोई नशा मत कीजिए। कोई गंदे आचरण मत कीजिए।
गंदा भोजन मांसा आदि मत खाइए। और भगवान को अपना मानकर नाम जप करते हुए जो जिसका कर्तव्य है अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने कर्मों को कृष्णारपणमस्तु करते हुए जीवन व्यतीत किया जाए तो जीवन बड़ा आनंदमय मंगलमय होगा। भले रोग हो, भले विपत्ति हो लेकिन वो आपको परास्त नहीं कर पाएगी। यदि भगवान का आश्रय सीम की चाप सके को तासु बल रखवार रमापति जासु जिसके रक्षक भगवान है उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। इसलिए नाम जप करो और भगवत आशित रहो। श्री राधा लाल की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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