वृन्दावन धाम की महिमा / गर्भस्थ प्रह्लाद जी को नारद जी ने क्या उपदेश दिया? // 11/08/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माशयाम परम शीतल मा श्रया परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप नवनित निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले प्राणाराध्य प्राणप्रिय युगल सरकार श्री प्रिया प्रिया प्रीतम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता यमुना रस रानी रजरानी समस्त ब्रजवासी परिकर उपासक में जब तक कर्तत्व भाव दृढ़ रहता है तब तक उसे इष्ट की कृपा बल का अनुभव नहीं होता और और जब गुरुजनों की चरण सेवा से, शास्त्र स्वाध्याय से, महापुरुषों के वचनों का मनन करने से और खूब डट के नाम जपने से अंतःकरण पवित्र होता है, देहाभिमान गलित होता है तब कृपा बल उदय होता है।
जहां कृपा बल का अनुभव हुआ तो उसे प्रतिफल यह अनुभव में आता है कि हमारे मन चित्त को वृंदावन मोहित कर रहा है। हमारे संपूर्ण अंतःकरण पर प्रिया प्रीतम का मोहन अधिकार है। वो जबरदस्ती हृदय को अपने अधीन किए हुए हैं। वह अनुभव करता है कि उनकी कृपा से उनकी खेल उनका रूप, उनकी लीला यह छाई है हमारे हृदय में। जब यह स्थिति आती है कि वो कृपा बल का दर्शन करता है, चिंतन करता है, मनन करता है, तब वह अनंत जन्मों के संचित कर्मों को भस्म करके प्रियाल की दिव्य लीलाओं में प्रवेश पा जाता है।
यह भूमि मोहन भूमि है। प्रिया प्रीतम मोहन है। उनकी केली मोहन है और उनके भक्त जन भी मोहन है। मोहना और मोहन मोहित कर ले। स्वयं मोहित ना हो। यह भूमि यहां के आराध्य देव यहां की लीला यहां के रसिक जन इसी महामोहन प्रेम से युक्त है। श्रीपाद कह रहे हैं मोहन वृंदाने मोहन कुंजेशु मोहन कृत्या मोहन राधा कृष्ण मोहन के सदा भजत मोहन वृंदाण्य संपूर्ण ब्रजभूमि में एक मोहिनी शक्ति है। एक आसक्ति पैदा हो जाती है। यह ब्रजभूमि की ब्रजर की मोहिनी शक्ति जिसके हृदय पर उतरी वो ब्रज के बिना जी नहीं सकता।
वृंदावन के बिना जी नहीं सकता। श्री भट्ट देवाचार्य जी कह रहे हैं मोहन ब्रज वन भूमि सब मोहन सहज समाज मोहन जमुना कुंज जहां बिहरत है जुबराज ब्रजभूमि मोहिनी मैं जानी ब्रजभूमि मोहिनी मैं जानी मोहिनी कुंज मोहन वृंदावन मोहन जमुना पानी ब्रज भूमि मोहिनी मैं जानी मोहिनी नारी सकल ब्रज की बोलत मोहिनी बानी श्री भट के प्रभु मोहन नागर मोहन राधा रानी मोहन राधा रानी ब्रजभूमि मोहिनी मैं जानी ये संपूर्ण ब्रजभूमि यह मोहिनी है। चित्त को चुरा लेती है। जिसका चित्त ब्रज रज ने चुरा लिया वह इस ब्रज रज के बिना जीवित नहीं रह सकता।
उसके प्राण विरहाकुल व्याकुल हो जाए। जैसे मछली को जल से अलग करे तो जी नहीं सकती। ऐसे ब्रजर सेवन करने वाला ब्रजर के बिना रह नहीं सकता। इसमें मोहिनी शक्ति है। वृंदावन मोहन संपूर्ण ब्रज 84 कोश यह दिव्य चिदानंद भूमि है। यह तो मोहिनी है ही पर संपूर्ण ब्रज का शिरोमणि श्री वृंदावन धाम है। बोले जाको मन वृंदा विपिन हर श्यामा श्याम स्वरूप सरोवर परिस्वारथ बसो परिस्वारथ बिर्यो जाको मन वृंदा विपिन हर ब्रज 84 कोष मोहिनी भूमि है इसमें जो वृंदावन है मुकुट मणि है और वृंदावन जिसका चित अपहरण कर लिया वह श्यामा श्याम के प्रेम स्वरूप में ऐसा डूबा कि फिर स्वसुख वांछा जागृत नहीं हुई स्वार्थ सब विसर स्वसख वांछा देह सुख इंद्रिय सुख मन सुख लोक लोकों के भोग सुख और मोक्ष सुख इसका भी त्याग कराने की सामर्थ्य श्री धाम वृंदावन में है।
जो वृंदावन का आश्रित है, वृंदावन का वासी है तो वृंदावन उसके मन का अपहरण करके श्यामा श्याम के प्रेम रूपी सरोवर में डुबो देता है। निरख निकुंज [उबासी लेने की आवाज़] निकुंजे भी मोहित कर लेती है। ऐसी कुंज निकुंजे हैं। जो प्रिया प्रीतम आनंद समुद्र है वह भी देखकर के आनंद में उमगते हैं। तो निरख निकुंज पुंज छवि राधे कृष्ण नाम उ धर्यो जाको मन वृंदा विपिन हर जय श्री भट राधे रस कराई जय श्री भट्ट राधे रस कराई ताह सर्वस दे निबर जाको मन वृंदा विपिन हर श्यामा श्याम स्वरूप सर परिस्वारथ बसो जु जाको मन आनंद घन वृंदा विपिन हर जु नव निव निकुंज की नवीन नवीन कुंज निकुंजों का दर्शन छवि पुंज श्री किशोरी किशोर जी का दर्शन हृदय में श्यामा श्याम का नाम श्री भट्ट देवाचार्य जी कह रहे हैं जिसको वृंदावन ने अपना लिया जिसने वृंदावन की शरण ली तो श्री किशोरी जो और किशोर जो राधे रसिक राय जो अपना सर्वस्व श्री अंग की सेवा प्रेम रसकेली यह सब प्रदान कर देते हैं।
श्रीपाद कह रहे हैं मोहिनी संपूर्ण ब्रजभूमि मोहिनी सामर्थ्य ऐसी वृंदावन की कि एक बार मोहन कर ले मन का तो जीवन समर्पित हो जाए। फिर नर्क स्वर्ग अपवर्ग आस नहीं त्रास है ना कोई आशा है ना कोई भय है बस वृंदावन के सिवा वो जी नहीं सकता ऐसी आसक्ति प्रदान कर देते हैं और श्रीपाद कह रहे हैं मोहन राधा कृष्ण ये जुगल जोड़ी भी मोहिनी है ये हमारे जो सेव्य हैं सेव्य हमारे हैं सदा [चीखने की आवाज़] वृंदा विपिन विलास नंद नंदन वृषभानुजा चरण अनन्य उपास अनन्य उपासना जब ब्रजभूमि की कृपा हुई तो वृंदावन धाम प्राणों से प्यारा लगने लगा और जब वृंदावन धाम की कृपा हुई तो श्री श्यामा श्याम ने उसकेित का अपहरण कर लिया।
वो श्री श्यामा श्याम के चरणों का अनन्य उपासी हो गया। संतो से हमारे शिव पिय प्यारे वृंदा विपिन विलासी नंद नंदन वृषभानु नंदिनी चरण अनन्य उपासी अनन्य उपासना बाहरी व्यवहार में अन्य की उपासना तो बात जाने दो कहीं किसी भी तरह से ना अंतर में अन्य का चिंतन है और ना बाहर से कोई अन्य क्रिया उन्हीं के सुख के लिए जो क्रियाएं सब उनहीं के सुख के लिए प्रतिकूलता तो स्वप्न में नहीं हो सकती जो अनन्य चरण उपासी है वो प्रतिकूलस विसर्जनम श्री कृष्ण अनुकूलन अपने आराध्य देव के अनुकूल ही आचरण प्रतिकूल का पूर्णत त्याग यह अनन्य उपासना संतो सेव्य हमारे सी प्रिय प्यारे वृंदा विपिन विलासी नंद नंदन वृषभानु नंदिनी चरण अनन्य उपासी तो इसका लाभ क्या मिला बोले मस्त प्रणय बस सदा एक रस सदैव प्रेम में डूबे हुए ऐसा नहीं कि प्रेम अभी फिर कम हो गया या फिर बढ़ गया ऐसा नहीं छिनय घटे छिन बढ़े सो तो प्रेम न होए अघट प्रेम पिंजर बसे प्रीति कहावे सोए एक रस एक रस होते हुए भी प्रतििक्षण वर्धमान पर कभी कम नहीं हो सकता।
पर उपासक को हर समय अपने में प्रेम की कमी का अनुभव होता रहता है। नहीं तो अहंकार आ जाए। इसलिए प्रभु ऐसा अनुभव कराते रहते हैं कि हमारे हृदय में ऐसा प्रेम कहां? मत प्रणय बस सदा एक रस विविध निकुंज निवासी श्री भट जुगल बंसी बट सेवत मूरति सब सुख रासी शिव प्रिया प्रीतम समस्त सहचर्या कभी बंसीवट पर अद्भुत रास विलास कभी नवीन नवीन कुंज निकुंजों में इन सब को देखकर के श्यामा श्याम का अनन्य उपासक प्रेम में उन्मत्त रहता है। यदि कोई इस रस को प्राप्त करना चाहता है तो अनन्यता अत्यंत आवश्यक है।
आन कहे आनैन उर हरि गुरु सो रति होई सुख निधि श्यामा श्याम के पद पावे भल सोई श्री भट्ट देवाचार्य जी कह रहे हैं ना तो वाणी से अन्य कोई चर्चा करें और ना अन्य कोई व्यक्ति वस्तु स्थान सुख आदि की हृदय से इच्छा करें एकमात्र श्यामा श्याम का चिंतन श्यामा श्यामा श्याम के गुणों का गायन श्यामा श्याम की सेवा तो बोले सुख निधि श्यामा श्याम के हरि गुरु प्रताप से वो लीला में प्रवेश पाकर श्री अंग सेवा का अधिकार प्राप्त करता है। श्यामा श्याम पद पावे सोई मन वच क्रम कर सदा निरंतर हरि गुरु पद पंकज रति होई श्यामा श्याम पद पावे सोई श्री श्यामा श्याम के चरणों की सेवा श्री श्यामा श्याम के श्री अंग की सेवा उनकी की आज्ञा में रहना।
यह सौभाग्य उसी को मिलता है जिस पर हरि कृपा से गुरु चरणों में रति हो जाए। गुरु आज्ञा से उपासना में रति हो जाए। उपासना से उपास देव में अनन्यता आ जाए। हो गया काम। हरि की कृपा से हरि गुरु में अभेद भाव रखते हुए गुरु आज्ञा का पालन गुरु आज्ञा से उपासना में रति उपासना से उपास्य देव में अनन्यता उपास्य देव की अनन्यता ही परम पद है नंद नंदन वृषभानुसता पद भजे तजे मन आ जोई श्री भट अटक रहे स्वामी पन आन कहे माने सब छोई श्री भट्ट देवाचार्य जी कह रहे हैं जो रसिक गुरुदेव की ही आज्ञा के अनुसार उपासना करें अपनी मनमानी शास्त्रों के बताए हुए सिद्धांतों पे ना चलकर गुरुदेव की आज्ञा पे क्योंकि रेमन रसिकन संग बिन रंच न उपजे प्रेम बिना प्रिया प्रीतम के प्रेमी रसिक महापुरुषों का संग किए हृदय में प्रेम नहीं आ सकता और भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोई समझ सके ना चाहे जितना कोई ज्ञानी विज्ञानी हो जब तक प्रिया प्रीतम के प्रेमी रसिकों का संग नहीं होगा तब तक रस की बात समझ में नहीं आएगी यहां वेद रसिकन की वाणी रसिकों की वाणी ही यहां वेद जैसे प्रमाणित जगत में है ऐसे यहां रसिक की वाणी प्रमाणित है।
तो रसिक गुरुदेव के अनुसार उपासना की जाए तो आन का त्याग होकर शिव प्रिया प्रीतम में अनुराग हो जाता है। वो मन उसका अटक जाता है। प्रिया प्रीतम में उठते बैठते चलते फिरते सोते जागते हर समय प्रिया प्रीतम का चिंतन होने का मतलब है मोहिनी जोड़ी जुगल जोड़ी ने हमारे मन को चुरा लिया चंचल चित आकर्षणी हमारे चंचल चित्त का आकर्षण करके अपने चिंतन में लगा लिया फिर अनुभव होता है कि अरे तो हम तो इनके जन्म जन्म के थे यही हमारे हैं। श्री भट्ट देवाचार्य जी कह रहे हैं तब अनुभव होता है जन्म जन्म जिनके सदा हम चाकर निभोर त्रिभुवन पोषण सुधाकर ठाकुर जुगल किशोर जन्म जन्मांतर से हम इनहीं के थे भूल गए माया में अन्य संबंधों को स्वीकार करके हम भूल भूल गए अपने प्रभु को।
आज ब्रजभूमि की कृपा से, वृंदावन रजरानी की कृपा से, रसिकों की कृपा से, गुरुदेव की कृपा से हमारी भूल मिट गई और यह अनुभव हुआ कि जुगल किशोर हमारे ठाकुर हमारे स्वामी हमारे प्राण प्रीतम प्रिया प्रीतम जुगल किशोर हमारे ठाकुर सदा सर्वदा हम जिनके हैं जन्मजनम घर जाए चाकर घर जाए चाकर घर जाए चाकर ये पेमेंट वाले नौकर नहीं है मुझे ये चाहिए ये नहीं ये जा ही ना चाहिए कबहु कछु ये घर जाए चाकर का लक्षण है सुख सुख देवे को चावचित सबसोहित निष्काम या सुधर्म हरिवंश को नाम गिरा विश्राम नाम वाणी में हर समय लगे हुए हैं।
सुसुख वांछा का त्याग है। सबको प्रिया प्रीतम से लेकर चराचर जगत को सुख देने की भावना है। स्वयं में निष्काम मति है। यही हित धर्म है। सुख देवे को चावचित सब सोहित निष्काम या सुधर्म हरिवंश को नाम गिरा विश्राम नाम में और वाणी जी में बहुत रति कभी नाम चल रहा है कभी वाणी जी चल रहे कभी मंत्र चल रहा है प्रिया प्रीतम का कभी सेवा सुख का चिंतन चल रहा है अनन्य भाव घर जाएकर एक होते हैं आए काम किए पैसा लिए उनका घर अलग अलग होता है। उनका सुख अलग होता है। वह पैसे की चाकरी करते हैं।
तो जो सकाम भक्त हैं वह पैसे के द्वारा जैसे लाया गया सेवक ऐसी उनकी सेवा है। लेकिन जो निष्काम भक्त है वो घर जाए चाकर है। कुछ नहीं चाहिए। आपको सुख पहुंचाना। हम आपको देख रहे हैं। आपकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं। आपकी सेवा का अधिकार मिला। इससे बड़ा सुख और कोई नहीं है। सदा सर्वदा हम जिनके हैं जन्म जन्म घर जाए चाकर जुगल किशोर हमारे ठाकुर कैसे करुणामय है चूक परे परिहर न कबहु सब ही भांति दया के आगर चाहे जितनी अपराध हो वृत्ति वाला हो प्रिया प्रीतम कह दिया आश्रय ले लिया और इन्हें अपना मान लिया तो अवगुण करे समुद्र समम गनत ना अपनो जानी राई के सम भजन को मानत मेरु समान समुद्र के समान पाप कर दे तो प्रिया प्रीतम मानते ही नहीं किसने अपराध किया और राई के समान भजन कर ले तो सुमेरु पर्वत के समान भजन मानते।
इतने कृपालु है हमारे जुगल किशोर ठाकुर। चूक परे परिहर न कबहु चाहे जितनी बड़ी गलती हो जाए कभी त्याग नहीं सकते। प्रिया प्रीतम ऐसे अति उदार वि सुंदर सूरत सुर सुकुमार ऐसे उदार प्रिया प्रीतम है चाहे जितनी चूक पड़ जाए वो कभी छोड़ नहीं सकते कभी त्याग नहीं सकते सब ही भांति दया के आग वो दया के घर दया के समुद्र है कभी चूक पड़ जाए अपराध बन जाए गलती हो जाए तो कभी नाराज नहीं विमुख भय निमशो ना कृपा ना अकपा जब चित तब वैसे वैसे ही मुस्कुराते हुए दिखाई चूक परे परिहरे न कबहु स्वभाव ऐसा है इनका यही स्वभाव जो जान गया तो इनको कभी छोड़ नहीं सकता बहुत करुणा समुद्र है जब कह
रहे हैं ध्रुवदास जी कि अवगुण करे समुद्र सम गणत ना अपनो जान अवगुण किया अपराध किया गलती करी समुद्र के समान वो मानते नहीं किसने गलती की और छोटी सी सेवा राई के समान भजन को वो सुमेरु पर्वत के समान मानते ऐसे उदार कृपालु हमारे ठाकुर जुगर किशोर जी है जय श्री भट्ट प्रगट त्रिभुवन में प्रणतन पोषण परम सुधाकर प्रणतन पोषण जो शरणागत हो गया हृदय से मान लिया मैं प्रिया प्रीतम को सारी जिम्मेवारी प्रिया प्रीतम ले लेते सारा भार ले लेते योगक्षेमम भाव में हम जय श्री भट्ट प्रगट त्रिभुवन में त्रिभुवन में वो प्रकाशित है वृंदावन में यही खेल रहे हैं बस शरण हो जाओ नाम जप करो नेत्रों का दोष हटे त्रिगुणमय माया का तो आपको प्रगट दिखाई देंगे प्रण तन पोषण परम सुधा कर परम अमृत से तृप्त कर देंगे लीलामृत रूपा आदि से आप केवल इनके चरणों का आश्रय ले कभी गुस्सा नहीं होते हमारे प्रिया प्रीतम स्वभाव ही नहीं है बहुत लाडले हैं राधा मोहन बहुत शांत गंभीर दुलारे क्या क्या वर्णन करें सब अधूरा वर्णन ही है पूरा तो जाने मोरी छाती शब्द ही
नहीं है कि वर्णन किया जा सके। [नाक से की जाने वाली आवाज़] निश दिन लगी रहो यह लालस ये लालसा ये इच्छा रात दिन लगी रहे। श्यामा श्याम चरण की सेवा बिना आनसो उपजो आलस। कभी हमारे हृदय में सेवा में आलस्य ना हो। अरे फिर कर लेंगे। नहीं हे गुरुदेव हे वृंदावन धाम हे रसिक जन कृपा करो हमारे अंदर सेवा की लालसा जागृत हो जाए और सेवा में तत्परता विलंब नहीं याम अवसर के अनुसार जो सेवा है उसमें विलंब नहीं अरे फिर थोड़ी देर में कर ले कभी आलस्य ना उपजे प्रतिपल तत्परता पूर्वक श्यामा श्याम की सेवा कहत सुनाए सुम मन वच क्रम कर उज रहो जी जुग जस जालस जय श्री भट्ट अघट घटना में धरो सदा मन मोर सुलस श्री प्रिया प्रीतम की जो प्रेम लीला है सूरत लीला है इसी में हमारा मन लगा रहे आठों पैर इनकी सेवा में रहे तो अनायास ही वो गति प्राप्त हो जाएगी जो बड़े-बड़े योगी मुनियों के लिए भी वांछनी है।
अनायास सहजह जुतिह पाई सुकृत सुमाल लगए जग जीह जपे मन बच राधा लाल राधा लाल श्री प्रिया प्रीतम का खूब नाम जप खूब सेवा खूब लीला गायन इनहीं के प्रति अनन्यता अब हमको चिंता नहीं है क्योंकि मोहन ब्रजभूमि मोहन वृंदावन मोहन श्री प्रिया प्रीतम और मोहन उनकी केली वाणी के द्वारा हम के गायन करें तो हमारे चित्त का मोहन हो जाएगा। हमारा चित्त मोहित हो जाएगा प्रिया प्रीतम के नाम रूप लीला धाम में तो वह स्थिति प्राप्त होगी जिस स्थिति की बड़े-बड़े योगी मुनि जन आकांक्षा करते रहते हैं।
मोहन वृंदाने मोहन कुंजे मोहन कृत्या मोहन राधा कृष्ण मोहन के सदा भजत राधा दास लसद वपुरिशम राधा पद सेवी अंतोषित राधा रसिक को राधा बने सदा निवास जो राधावन श्री वृंदावन में कुछ ही क्षण वास कर ले कुछ ही दिन वास कर ले धन्यति धन्य और मनुष्य शरीर मिलकर कुछ ही समय प्रिया प्रीतम की सेवा में कोई सेवा मिल जाए बड़े सौभाग्यशाली थोड़ी सोहनी लगा दी पोछा लगा दिया चार पुष्प एकत्रित कर दिए कोई सेवा बन जाए प्रिया प्रीतम की सेवा राधा दास्य राधा पद सेवन राधा वनवास तो राधा रसिकों के संग से निश्चित राधा लाल की प्राप्ति हो जाएगी।
प्रिया प्रीतम ऐसे दर्शन देते हैं जैसे हम आपको देख रहे हैं। आप हमें देख रहे हैं। ऐसी ये बातें नहीं कि कोई भावना में देखा मान लिया कि भगवत साक्षात्कार हो गया। प्रगट वपू प्रगट वार्ता प्रगट इशारे प्रगट सेवा प्रत्यक्ष अनुभव होता है उपासक को जब इनके सिवा कोई अन्य नहीं होता अनन्य भाव और पूर्ण समर्पण तो प्रकट स्पर्श संभाषण दर्शन ये सब प्रकट प्राप्त होता है। इसलिए धन्य है उनका जीवन जो राधा वन में वास करते हैं। राधा चरणों की उपासना करते हैं। राधा सेवा सुख में निमग्न रहते हैं तो उनको राधा लाल की निश्चित प्राप्ति होती है।
चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण प्रसंग चल रहा है। प्रह्लाद जी ने अपने मित्रों को बुलाया। गुरु जी कहीं बाहर गए संडामर्क जी एकांत में बैठाकर उपदेश दिया कि भाइयों कुमार अवस्था से श्री भगवान का भजन करना चाहिए। ये जिन लोगों की यह मति है कि जवानी कोई भजन के लिए है। बुढ़ापा भजन के लिए है। तो बुढ़ापे में प्रपंच होता है। भजन नहीं होता। ध्यान रखना। जिसने कुमार अवस्था में यवन अवस्था में भजन का अभ्यास नहीं किया बुढ़ापे में भजन नहीं कर सकता केवल प्रपंच होता है।
हे मित्रों जैसे कोई दुख नहीं चाहता पर उसे प्रारब्ध के अनुसार जबरदस्ती दुख भोगना पड़ता है। ऐसे ही तुम सुख भी ना चाहो तो अन मांगे आगे आवेगो जो पल लागे पल को बिना मांगे बिना चाहे जैसे दुख आता है ऐसे सुख आएगा तो तुम सुख दुख की वृत्तियों से ऊपर उठो जो प्रारब्ध से नहीं मिलता वो है भजन श्री भगवान का आश्रय लेकर श्री हरि का भजन कर लो क्योंकि सारी विपत्तियों से सारे संकटों से सारे आक्रमणों से अगर कोई बचा सकता है तो हरि हरि स्मृति सर्व विपद विमोक्षणम भगवान की याद भगवान का नाम जप ये समस्त विपत्तियों से बचा लेता है हे असुर बालकों तुम अपने असुर स्वभाव को छोड़ो और भगवान श्री हरि का निरंतर भजन करो कल आपने सुना प्रह्हाद जी ने उपदेश किया प्रह्लाद जी के मित्रों ने कहा कि यह उपदेश तो कभी संडामर्क जी ने दिया नहीं।
तो आपको यह उपदेश कहां से पता चला? तो उनका हमारे गुरुदेव देवर्षि नारद जी ने दिया। तो उन्होंने कहा बचपन से तो आप हमारे साथ हो। कभी देवर्षि नारद जी से आपका समागम हमने सुना नहीं। तो आपको कब देवर्षि नारद जी गुरु रूप से मिले और ऐसा उपदेश किया। दैत्य बालकों ने ऐसा प्रश्न किया तो भगवान के परम प्रेमी महा भागवत प्रह्लाद जी मुस्कुराते हुए उनसे कहा प्रह्लाद जी ने कहा यह उस समय की बात है जब हमारे पिताजी तपस्या करने के लिए मंदराचल पर्वत पर चले गए तब बड़े-बड़े लोकपालों सहित इंद्र ने दानवों से युद्ध किया क्योंकि हिरण्यकश्यप जब तपस्या में था और परास्त कर दिया दानवों को।
देवराज इंद्र और लोकपाल सब ऐसा सोच रहे थे कि अब हिरण्यकश्यप कभी लौट कर नहीं आएगा क्योंकि वो तो इतना तप परायण हो गया कि चींटियां उसे चाट गई है। दीमक लग गई है। वह नहीं आएगा। वो अपने पाप के कारण ही मानो नष्ट हो गया। ऐसा देवराज इंद्र मान रहे थे। देवताओं की बढ़ती हुई शक्ति देखकर के दैत्य लोग भाग पड़े। अपने अपने सब निवास स्थान छोड़कर के छुप गए जाकर। अपनी जीत चाहने वाले देवता आक्रमण करके हिरण्यकश्यप देवराज इंद्र के महल में रहता था। भगा दिया था देवराज इंद्र को।
वहां आक्रमण करके घेर लिया गया कि जो भी हो परिवार का नष्ट कर दिया जाए। वहां जो सेवक गण थे सबको बंधन में डाल दिया। किसी को मारा। बहुत से तो भाग गए थे। और प्रह्लाद जी उस समय गर्भ में थे और कयाधु गर्भवती थी। वो भाग भी नहीं सकती थी। बंधन में उनको भी डाल दिया गया। कयाधु को बांध लिया गया। देवराज इंद्र का मारना नहीं। क्योंकि इसका क्या अपराध है? एक तो स्त्री दूसरे गर्भवती। हम देवता हैं। ऐसा अपराध नहीं कर सकते। बांध लो इसको और ले चलो इसे। इसके गर्भ में हिरण्यकश्यप का अत्यंत प्रभावशाली वीर्य है।
जब यह गर्भ प्रकट होगा तब इसे मार देंगे और कयाधु को छोड़ देंगे। बंधन में डाल दिया गया। कयाधु जी को बांधकर देवराज इंद्र ले जा रहा है। रास्ते में देवर्षि नारद जी मिल गए और देवराज इंद्र से कहा रुको। तुम्हें पता है तुम जिस गर्भ को मारने की बात कहते हो काल की भी सामर्थ्य नहीं कि मार सके क्योंकि इसके गर्भ में भगवान का साक्षात परम प्रेमी महा भागवत प्रहल्लाद है। देवराज इंद्र इस निष्पाप महात्मा का तुम बाल बांका भी नहीं कर सकते। तुम्हारे में किसी भी लोकपाल की सामर्थ्य नहीं कि इस बालक की हानि पहुंचा सके।
क्यों? क्योंकि भगवान का महान भक्त है। देवर्षि नारद जी की बात सुनकर के प्रणाम किया कयाधु को देवराज इंद्र ने। और कहा कि मैं इस गर्भस्थ भगवत भक्ति की महिमा को नहीं जानता था। हम तो यह समझ रहे थे कि पापी हिरणकश्यप का यह वीर है। कोई पापात्मा ही होगा तो जन्म लेते ही इसे मार डालेंगे। लेकिन यह भगवान का भक्त है। इसलिए मैं गर्भस्थ भक्त को प्रणाम करता हूं। और चार प्रदक्षिणा की कयाधो को जहां बंधन में डाले था बंधन मुक्त किया प्रणाम किया। चार प्रदक्षिणा की फिर प्रणाम किया।
क्यों? क्योंकि इसके गर्भ में भगवान का भक्त है। ऐसा मानकर छोड़ दिया। देवता लोग चले गए। देवर्षि नारद जी कयाधु जी को अपने आश्रम पर लेवा लाए और कहा बेटा तुम बिल्कुल निर्भय होकर इस आश्रम में रहो। जब तुम्हारा पति लौट आएगा तपस्या से तब हम तुम्हें पुनः उसके समीप पहुंचा देंगे। जैसे अपने पिता के यहां आ जाता है। ऐसे कयाधु जी निर्भय होकर देवर्षि नारद जी के आश्रम पर रहे। मैं गर्भ में था। प्रह्लाद जी अपने मित्रों से बता रहे हैं। देवर्षि नारद जी बैठकर के भागवती को उपदेश करते और लक्ष्य रखते मेरा तो मैं गर्भ में ही सीख गया था।
देखो गर्भस्थ शिशु पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। यदि आप सांसारिक बातें गंदा भोजन अपवित्र पाएंगे, अपवित्र बातें करेंगे, अपवित्र क्रियाएं करेंगे तो सब बालक पर प्रभाव पड़ता है। जिस दिन से गर्भस्थ शिशु हो जाए उस दिन से माता-पिता को ब्रह्मचर्य रहना चाहिए। सात्विक भोजन पाना चाहिए। नाम कीर्तन, नाम जप और भगवत कथा वार्ता करनी चाहिए। यह जो व्यभचार प्रवृत्ति से युक्त जन है तो बालक में गंदे संस्कार और उनके शरीर के अंगों पर गलत प्रभाव पड़ता है। जब बालक गर्भ में आ जाए तो माता-पिता को उसी दिन से ब्रह्मचर्य धारण करना चाहिए।
और ये चरफरे खट्टे तमोगुणी बासी भोजन अपवित्र भोजन इसका त्याग कर देना चाहिए। ब्रह्मचर्य से रहे पवित्र भोजन पावे और रोज कथा सुने भगवान की चाहे रामचरितमानस श्रीमद् भागवत महापुराण या और भी ग्रंथों की चर्चा तो बालक बड़ा संस्कारी राष्ट्रभक्त होगा। देखो गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव पड़ा अभिमन्यु जी उत्तरा के गर्भ में थे। अर्जुन जी उपदेश करते तो छह द्वार भेदन चक्रव्यूह की गर्भ में ही सीख गए थे। यहां गर्भस्थ शिशु प्रह्लाद जी पर प्रभाव पड़ा। रोज नारद जी भगवान की महिमा भगवान की भक्ति भगवान की कृपा की चर्चा करते।
ऐसा लगता कयाधु को सुना रहे हैं। पर लक्ष्य था प्रह्लाद जी तो गर्भ में ही प्रह्लाद जी भगवान की महा प्रेममय भक्ति से युक्त हो गए थे। देवर्षि नारद जी बड़े दयालु सर्व समर्थ महात्मा हैं। प्रह्लाद जी कह रहे हैं उन्होंने मेरी मां को भागवत धर्म का रहस्य विशुद्ध ज्ञान दोनों का उपदेश किया और दृष्टि मेरे पर थी इसलिए गर्भ में ही महा भागवत बन गए प्रह्लाद जी भागवत धर्म का और तत्व ज्ञान दोनों गर्भ में महा भागवत बन गए बोले बहुत समय बीत जाने के कारण मेरी माता को तो कुछ स्मृति नहीं रही पर गुरुदेव नारद जी की कृपा के प्रसाद से मेरे में कभी विस्मृति ही नहीं हुई।
तत्व ज्ञान और भागवत धर्म दोनों रहस्य हैं। और इन दोनों के ज्ञाता है श्री प्रह्लाद जी क्योंकि देवर्षि नारद जी ने गर्भ में ही उपदेश दे दिया। हे दैत्य बालकों यदि तुम लोग मेरी इस बात पर श्रद्धा करो तो वह ज्ञान तुमको भी हो सकता है। जिस भक्ति ज्ञान के प्रभाव से मुझे बार-बार मारा जाता है लेकिन मेरा एक बाल भी बांका नहीं होता वही तुमको भी प्राप्त हो सकता है। क्योंकि चाहे स्त्री हो या पुरुष हो बालक हो या वृद्ध हो जो भगवान श्री हरि का आश्रय लेकर भजन करेगा वो निर्भय निश्चिंत निशोक संशय रहित विपरीत भावना का त्याग ये हो जाएगा।
जैसे वृक्षों में फूल लगते हैं, फिर फल लगते हैं, फिर वह बढ़ते हैं। फिर वो पकते हैं। फिर वो नष्ट हो जाते हैं। वैसे ही जन्म गर्भ में फिर गर्भ की अस्तित्व की वृद्धि होना फिर शरीर रूप धारण करना फिर मां के गर्भ से बाहर निकलना फिर बाल्यावस्था फिर यौवन अवस्था वृद्धावस्था फिर मृत्यु ये बार-बार चक्र चलता रहता है। हे मित्रों जिसे आत्मज्ञान नहीं है वह इस चक्र में बार-बार जन्मता मरता रहेगा। यह शरीर का है जन्मना मरना। जैसे फूल लगना, फल बनना, फिर बढ़ना, फिर पकना, फिर नष्ट हो जाना।
ऐसे ही ये गर्भ रहना, गर्भ से बाहर आना, बालक, जवानी, बुढ़ापा, मृत्यु यह शरीर के लक्षण है। आत्मा के नहीं है। आत्मा नित्य है। शरीर अनित्य है। आत्मा अविनाशी है। शरीर विनाशी है। आत्मा शुद्ध है। शरीर अशुद्ध है। आत्मा एक है। शरीर अनेक है। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर। आत्मा आश्रय है। शरीर आश्रित है। आत्मा निर्विकार है। शरीर विकारी है। आत्मा स्वयं प्रकाश है। शरीर उससे प्रकाशित है। आत्मा सबका कारण है। सबका कारण है। शरीर क्रिया है। आत्मा व्यापक है। शरीर प्रकट दिखाई देता है।
आत्मा असंग है। शरीर आसक्त है। आत्मा आवरण रहित है। शरीर मल विक्षेप आवरण से युक्त है। इस आत्म स्वरूप को समझो। जो आत्म तत्व को जान जाता है, वह जन्म मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जाता है। यह जो हमारा जन्म मरण हो रहा है, इसका कारण है आत्म स्वरूप को भूलकर शरीर को मैं मान लेना और शरीर के संबंधियों को मेरे मान लेना। यही हमारे जन्म मरण का हेतु है। हे मित्रों जिस प्रकार स्वर्ण की खान में पत्थर आदि मिले होते हैं पर पद्धति से वो पत्थरों में से स्वर्ण निकाल लेता है।
जिस प्रकार दूध में घी है पद्धति से दूध में से घी निकाल लिया जाता है। वैसे ही पद्धति से आत्म बोध होता है। आत्म बोध प्राप्त करने के लिए साधन चतुष्टय अत्यंत आवश्यक है। विवेक शत असत का निर्णय करने वाले को विवेक कहते हैं। वैराग्य लोक परलोक के भोगों से वैराग्य शम इंद्रिय विजयी दम मन का दमन करने वाला ततीक्षा हर कष्ट हर अपमान हर द्वंद सहने वाला उपतिति लोक परलोक के भोगों में बिल्कुल कोई भी रुचि नहीं भोग बुद्धि ही नहीं सम दम तितक्षा उपति श्रद्धा शास्त्र और गुरु के वचनों में यथावत श्रद्धा समाधान चित्त का अपने लक्ष्य में स्थित हो जाना मुमुक्षता मैं मुक्त होना चाहता हूं ये साधन चतुष्टय सट संपत्ति जिसके जीवन में होती है वही आत्मज्ञान प्राप्त करता है और कुछ समझ में ना आवे राधा राधा राधा राधा राधा सब कुछ प्राप्त हो जाएगा देख लेना निरंतर नाम जप करो सब कुछ प्राप्त हो जाएगा।
अरे राम राम नहीं कह पाए मरा मरा शुरू किया तो ब्रह्म ऋषि हो गए। भाई तुम राधा राधा जानबूझकर के भाव से जपोगे तुम्हें ब्रह्म ज्ञान नहीं हो जाएगा। तुम्हें संसार से वैराग्य नहीं हो जाएगा। तुम सहनशील नहीं बनोगे। तुम में ततीक्षा नहीं आ जाएगी। तुम्हारेित का समाधान नहीं सब हो जाएगा। जो आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह ब्रह्म पदवी को प्राप्त हो जाता है। आचार्यों ने मूल प्रकृति, महातत्व, अहंकार और पंच तन मात्राएं, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन आठ तत्वों को माया बताया है।
प्रकृति बताया है। तीन गुण प्रकृति के हैं। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण और 16, पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और एक मन और पंच महाभूत यह सब समुदाय माया का है। मूल प्रकृति, महातत्व, अहंकार शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये आठ सतोगुण रजोगुण तमोगुण त्रिगुणात्मिका माया और उसके 16 विकार पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां पंच महाभूत और एक मन यह है पूरा समुदाय जिसमें हम फंस गए इन सबको प्रकाशित करने वाला आपका स्वरूप है आत्मा आपका स्वरूप है आप है वह इस माया के समुदाय से तीन देह बन गए।
स्थूल देह, सूक्ष्म देह और कारण देह। और इसी देह में अपनापन हो गया। यही हमारी दुर्गति का कारण हो गया। चाहे वो स्थावर हो, चाहे जंगम हो। इसी में ममता होने के कारण दुर्गति हो गई। अंतःकरण इंद्रियां यह अनात्म वस्तु है। आत्मा नहीं है। जब गुरु कृपा से भजन करोगे और विवेक ज्ञान जागृत होगा तब अनुभव होता है मैं आत्म स्वरूप हूं। मैं देह नहीं हूं। आत्मा सब में विराजमान है। वह इन शरीरों से बिल्कुल अलग है। पृथक है। इसीलिए कोई वैज्ञानिक अल्ट्रासाउंड सिटी स्कैन इरा आदि से नहीं निकाल सकता कि अरे सूक्ष्म शरीर को नहीं निकाल सकता।
मन बुद्धि चित्त अहंकार को फिर कारण स्वभाव और फिर सबसे पहले आत्म तत्व एक आए थे साधक को पूछ रहे थे कि जब इस शरीर में आत्मा है तो कहां है? बस इतना ही जान गए तो जीवन मुक्त हो गए ना। आत्मा है तो कहां है? मैं ढूंढना चाहता हूं। मैं पाना चाहता हूं। किसको? बोले आत्मा को। कभी नहीं मिलेगी। क्यों? क्योंकि वो तुम हो। वो तुम हो। जिसे खोजना चाहते हो वो तुम हो। तो तुम जो नहीं हो उससे पहले अलग हो। तुम शरीर नहीं हो, इंद्रियां नहीं हो, इंद्रियों का विलास नहीं हो, मन नहीं हो, मन का विलास नहीं हो।
हटो इससे। इसी से हटने की वृत्ति को तो साधना कहते हैं। और जब आप हटोगे तो अपने आप से अपने आप का अनुभव हो जाता है। प्रह्लाद जी कह रहे हे मित्रों शुद्ध बुद्धि से धीरे-धीरे इन शरीरों से राग हटावे और इन शरीरों की उत्पत्ति स्थिति और विनाश का चिंतन करें कि मरेगा शरीर नष्ट होगा। इस उतावली ना करें तो इससे क्या होगा? धीरे-धीरे तुम्हारा शरीर राग नष्ट होगा। कोई भी कार्य करें धीरे-धीरे आराम से करें। उतावलापन कर आज ही हम कसम खाते हैं ऐसा नहीं करेंगे तो कोई तुम भीष्म प्रतिज्ञा निर्वाह करने वाले थोड़ी हो।
महीना 15 दिन दो दिन चार दिन 10 दिन फिर फिसल जाओगे। धीरे-धीरे क्रमश धीरे-धीरे विषयों का त्याग करें और जिनका त्याग कर दे दोबारा जीवन में उनका कभी प्रयोग ना करें। यह जागृत, स्वप्न और सुशुप्त ये तीन बुद्धि की वृत्तियां है। हमारी नहीं नाम जागृत नाम स्वप्न नाम सुशुप्ति। कल एक पूछ रहे थे कि स्वप्न में ऐसा ऐसा उसका मतलब क्या होता है? स्वप्न में ये आता है वो आता है। तो ये स्वप्न विचारों वालों के पास जाओ तो तुम्हें कुछ मिल जाएगा समझने को। हमारे पास तो नहीं मिलेगा।
क्योंकि हम जागृत की ही सत्ता नहीं मानते तो स्वप्न की क्या सत्ता माने? जागृत, स्वप्न, सुशुप्त ये तीनों बुद्धि की अवस्थाएं आत्मा की नहीं। बोले स्वप्न में वो ऐसा ऐसा अरे सब मन का नाटक है। वही महात्मा बन जाएगा, वही गुरु बन जाएगा, वही भगवान बन जाएगा। मन के सिवा स्वप्न में कुछ नहीं है। कभी-कभी पवित्र अंतःकरण में भागवतिक संकेत उसी मन अरे मन इंद्रिय मनस्व मन कौन है? बोले इंद्रियों में मन मैं हूं। भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं। अपवित्र है इसलिए समझ नहीं पा रहे।
पवित्र हो गए तो भगवत स्वरूप हो गया। बोले स्वप्न में हमारे अमुक महात्मा है। वही मन है। बोले वो महात्मा नहीं था। अरे मन ही तो परमात्मा है। इंद्रियाणा मनस्म कोई भी रूप धारण कर सकता है। जागृत स्वप्न सुशुप्त ये मेरी अवस्थाएं नहीं है। यह बुद्धि की अवस्था है। और बुद्धि से अनुभव में आने वाला जो तत्व नहीं है वही परमात्मा वही मेरा स्वरूप है। जैसे गंध से उसके आश्रय वायु का ज्ञान होता है। वायु गंध का वाहन करती है लेकिन गंध वायु का गुण नहीं है। गंध पृथ्वी का गुण है और वायु वहन करती है।
वैसे ही ये तीन अवस्थाएं जागृत स्वप्न सुशुप्त ये बुद्धि की है। ये बदलने वाली बुद्धि की है। आत्मा इनका साक्षी है। यह आत्मा की नहीं ना जागृत ना स्वप्न ना सुशुप्ति जो तीनों में समान साक्षी भाव से रहता है वही ज्ञानी है। जागृत में जितनी भी चेष्टाएं हो रही स्थूल शरीर से हो रही और चेष्टाएं कराने वाला सतोगुण रजोगुण तमोगुण है। गुणानुगुण वर्तते मनुष्य पार्थ सर्वसा और जो स्वप्न है वो एक मन जो निद्रा में नहीं डूबा वो प्रपंच रच देता है। अच्छा बुरा जैसा सुखद दुखद और जो सुशुप्त है उसमें बुद्धि भी लीन हो जाती है ग सुशुप्त में बुद्धि भी लीन लेकिन मैं सोया यह बोध किसको रहा वो आत्मा साक्षी ये अनुभव कराता है आज मैंने ये किया आज मैंने ये खाया पिया आज मैं सोया आज मैंने स्वप्न देखा तो यह भ्रम से वो मान रहा है लेकिन यहां संकेत मिलता है कि वो साक्षी तीनों में जग रहा था जागृत में भी, स्वप्न में भी और सुशुप्त में भी।
गुणों और कर्मों के कारण होने वाले जन्म मृत्यु का यह चक्र आत्मा को शरीर आसक्ति के कारण प्राप्त होता है। खास बात ये शरीरासक्ति के कारण दुर्गति हो रही है। ये अज्ञान मूलक बिल्कुल मिथ्या है। जैसे स्वप्न का शरीर मिथ्या है। पर स्वप्न में चाकू मारी जा रही तो दुख का अनुभव होगा। कब तक? जब तक जगोगे नहीं। जग जाओगे ना चाकू ना मारने वाला ना कहीं कटने वाला कोई शरीर का अंग। बढ़िया सैया में सोया हुआ है। पर स्वप्न में उसे दिखाई दे रहा है कि हमारे शरीर को कोई काट रहा है।
ना शरीर कट रहा है, ना कोई काटने वाला है, ना कोई पीड़ा है। पर पूरी पीड़ा हो रही है। यह जब तक जगेगा नहीं तब तक पीड़ा नहीं मिटेगी। ऐसे इस जागृत अवस्था में देहाभिमान के कारण ये सुखद दुख मान अपमान जब तक ज्ञान में जगोगे नहीं तब तक ये दुख दूर होने वाला नहीं। इसलिए मित्रों प्रह्लाद जी कह रहे हैं तुम लोगों को सबसे पहले इन गुणों के अनुसार होने वाले कर्मों के बीज को नष्ट कर देना चाहिए। यह शरीर तुम नहीं हो। तुम्हारे द्वारा कर्म नहीं हो रहे। केवल तुम अहंकार करते हो इसलिए तुम्हें भोगना पड़ता है।
ये यंत्र मम माया सतोगुण रजोगुण तमोगुण से गुण प्रेरित करते हुए अंतःकरण में कर्म करवा रहे हैं। पर आप कर्ता भाव से हो गए इसलिए आपको अवश्य में भोक्तव्यम कर्मथम कर्म शुभ शुभम फिर आपको भोगना पड़ेगा। जो शरीर राग मिटा देता है, कर्मों का कर्ता भाव मिटा देता है, भोगता भाव मिटा देता है, तो इसे ही योग कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे ही भगवत प्राप्ति कहते हैं। इसे ही परमात्मा से मिलन कहते हैं। यूं तो इन त्रिगुणात्मक कर्मों की जड़ उखाड़ फेंकने के लिए बुद्धि वृत्तियों का प्रवाह बंद कर देने के लिए वेदों में शास्त्रों में पुराणों में बहुत से साधन बताए गए हैं।
पर सर्वश्रेष्ठ साधन है भगवान श्री हरि का स्मरण नाम जप उनकी सेवा पकड़ लो। प्रह्लाद जी कह रहे हैं यू तो माया से मुक्त होने के लिए शास्त्रों साधन बताए गए पर बहुत सरल सर्वश्रेष्ठ निर्भय भय शून्य मार्ग है भय शून्य इसलिए कि इसमें कर सदा तिन के रखवारी जिन बालक राखे महतारी इसमें भगवान का पूर्ण सहारा है और वो रक्षा करते हैं क्या खूब नाम जप करो और सर्वशक्तिमान भगवान की सेवा उनका आश्रय उनके लीला गुणों का श्रवण इससे शुद्ध होकर बुद्धि आत्म स्वरूप का बोध हो जाता है।
बुद्धि शुद्ध हुई तो जैसे दर्पण साफ हुआ तो अपना प्रतिबिंब दिखने लगा। ऐसे अनुभव होता है आत्म स्वरूप का। बुद्धि वो ऐसी प्रवीण ज्ञानमय हो जाती है। ज्ञान नेत्र प्रकाशित हो जाते हैं। उनहीं नेत्रों से आत्म स्वरूप का बोध होता है। यह कैसे किया जाए? कि हमारा निरंतर भजन बने हरि चरण आश्रय दृढ़ हो जाए बुद्धि शुद्ध हो जाए तो कह रहे गुरु सुशया भक्त सर्वपण चंगे साधु भक्त नामधने च श्रद्धया तत कथाया कीर्तन गुण कर्मणा तत ध्याना तंगारणा श्री सदगुरुदेव भगवान का वरण करके उनकी प्रेम पूर्वक सेवा में रहना उनकी आज्ञा में रहना जीवन मुक्त होने के लिए आत्म बोध प्राप्त करने के लिए भगवत मिलन के लिए क्या करना चाहिए तो बोले गुरु का वरण करके गुरुदेव का आश्रय लेकर प्रेम पूर्वक उनकी सेवा गुरुदेव की सेवा गुरु आज्ञा पालन अपने को जो कुछ प्रारब्ध अनुसार मिल जाए भगवान को समर्पित करके उसका प्रयोग करना प्रसादी करके ही चाहे जल पीना हो चाहे वस्त्र चाहे भोजन कुछ भी प्रसादी ही होना चाहिए भगवत प्रेमी महात्माओं का सत्संग नित्य सुनना चाहिए नित्य सत्संग और भगवान की आराधना में भगवान की कथा वार्ता सुनना भगवान के गुणों का गायन करना भगवान के नाम कीर्तन करना भगवान का नाम जप करना इस साधनों का अनुष्ठान करते करते हृदय पवित्र हो जाता है।
भगवान में प्रीति हो जाती है और भगवान की कृपा से तत्व ज्ञान हो जाता है। सर्वशक्तिमान भगवान श्री हरि समस्त प्राणियों में विराजमान है। ऐसे साधन करते करते तुम्हें अनुभव होने लगेगा सब में भगवान विराजमान है। सबका सम्मान करो। किसी का भी अपमान मत करो। सब में भगवान विराजमान है। उपासक एव निर्जित सड वर्ग क्रियते भक्तिश्वरे वासुदेव भगवती यया सल्लभते रति काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ये छह भारी शत्रु हैं। एवं निर्जित सडवरर्ग क्रियते भक्तश्वरे छह शत्रुओं पर विजय प्राप्त जब तक नहीं होती तब तक ना वो ज्ञानी है और ना भक्त है।
सड विकार जित अनघ अकामा निष्कामता आ गई निष्पाप हो गया छह शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली भगवान हृदय में प्रकाशित हो गए काम क्रोध मदमान न मोहा लोभ नोभ राग नहीं द्रोहा जिनके के कपट दंभ नहीं माया तिनके हृदय बसहु रघुराया श्री प्रह्लाद जी महाराज कहे हरि सर्वेशु भूतेशु भगस्त ईश्वर इति भूतान मनसा काम साधु जो सब में भगवान विराजमान देख रहा है वही साधु है जो काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर इन पर विजय प्राप्त कर लिया वही साधु है जो भगवान की भक्ति में मगन रहता है खूब नाम जप करता है वो इन दोषों पर विजय प्राप्त कर लेता है उसे वासुदेव भगवती यया सलभते रति भगवान श्री कृष्ण में अनन्य भक्ति, प्रेममय भक्ति, प्रेममय अवस्था प्राप्त हो जाती है।
किनको? जो गुरु का आश्रय लेकर उनकी प्रेम पूर्वक सेवा करते हैं। अपने को जो कुछ मिल जाए सब भगवत प्रसादी करके भगवान को अर्पित करके प्रयोग करते हैं। भगवत प्रेमी महात्माओं का रोज सत्संग करते हैं। भगवान की आराधना में भगवान की लीला कथा सुनना गुण कीर्तन करना नाम कीर्तन करना नाम जप करना सब में भगवान का दर्शन करना और छह विकारों पर विजय प्राप्त कर लेना इससे भगवान के चरणों में अनन्य प्रेममय स्थिति प्राप्त होती है। जब भगवान के लीला चरित्रों का गायन करते हुए ऐसा उद्रेक हो कि आंखों में आंसू आ जाए कंठ अवरुद्ध हो जाए रोम रोम पुलकित हो जाए संकोच छोड़कर जोरजोर से भगवान के नाम को चिल्ला चिल्लाकर गाना नाचने लगना वो गृहग्रस्त पागल की तरह कभी हंसता है कभी रोता कभी नाचता है, कभी भगवान के भावना में लोगों के चरणों की वंदना करता है।
भगवान में तन्मय हो जाता है। बार-बार लंबी सांस खींचता हुआ हे हरि हे गोविंद हे जगत पते हे नारायण ऐसा पुकारने लगता है। तो भक्ति योग के महान प्रभाव से उसके सारे कर्म बंधन छिन्न भिन्न हो जाते हैं और वह भगवत स्वरूप हो जाता है। जन्म मृत्यु कराने वाले कर्म बीज भस्म हो जाते हैं। वो जीवन मुक्त हो गया। भगवान को प्राप्त कर लिया। निशम्य करण गुण तुल्या वीर लीला तनुभानी यदा हर्ष पुलका सुगदम क्रोत कंठ उदगा रो नृत्य यदा ग्रस्त कच सत्य क्रते धति वंदते जनम मुसक्ति हरे जगत नारायण मतिगतप तदा मुक्त समस्त बंधन तद भाव भावुकता सया कृति निर्दग बी जानो महसा भक्ति प्रयोग समेत धोजम आहा कभी-कभी भाव में भरकर वो रोरो कर पुकार हे गोविंद हे कृष्ण हे जगतपते हे हरि ऐसे महान भक्ति योग के प्रभाव से उसके जन्म मृत्यु कराने वाले सारे कर्म बीज भस्म हो जाते हैं और वो जीवन मुक्त महापुरुष भगवत प्राप्त हो जाता है।
हे मित्रों प्रह्लाद जी कह रहे हे मित्रों अधोक्ष जालम सुभत्मन शरीर संसति चक्र सातनम तद ब्रह्म निर्वाण सुखम विदुर बुधा ततो भजम हृदय हदीश्वरम कोटि प्रियासो सुर बालका हरे रूपासने स्वसत्म स नाम सामान्यता किम विषयोपा रा कलत्र पव सुतायो गहा मह कुंज को भूतया सर्वे छ भंगुरा कुर मसत प्रियम चला भाइयों ये संसार एक अशुभ दलदल है यहां जो फंस गया उसे केवल भगवान निकाल सकते हैं बस लेकिन मरा बार-बार जन्मा मरा यहां से बचने का एकमात्र उपाय भगवान स्वयं कह रहे हैं देवी हे गुणमई मम माया मामे प्रपदते माया मेंता तरते जो मेरी शरण में आ गया बच गया भगवान एकमात्र भगवान बचा सकते हैं इस माया दलदल से एकमात्र भगवान बचा इसीलिए हमारी प्रार्थना है जिस सभा में जिस संगोष्ठी में जिस उपदेश में जिस संग में भगवान के नाम रूप लीला धाम की चर्चा ना हो भगवान के आत्म स्वरूप की चर्चा ना हो कभी मत सुनो कभी मत संग करो साहब ये मायाकृत है बिना भगवान के नाम के कोई नहीं तर सकता विनिश्चितम बदामते अन्यथा वच में हरि भजनते जब तक भजन नहीं
करोगे ये सब बड़े बड़े ऋषि मुनि भगवान का भजन कर छू छा इधर उधर ये सब प्रपंच है सब माया का नाटक है किसकी सामर्थ है किसकी सामर्थ है जब वशिष्ठ जैसे महापुरुष भी कह रहे हैं सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधान ये आज संसार के कर्म चक्र को बदलने का ठेका लेते हैं लोग एकमात्र इस दलदल से केवल श्री भगवान निकाल सकते हैं। केवल श्री भगवान अगर भक्त जनों की महिमा गाई गई तो इसी बात की वो भगवान के नाम में, रूप में, लीला में, चरणों में रति प्रदान करते हैं।
निकालने वाले श्री भगवान ही है। कोई दूसरा ऐसा नहीं कि निकाल सके। जिन्होंने फसाया वही छुड़ा सकते हैं। किसी की सामर्थ्य नहीं। इसलिए हे मित्रों प्रहलाद जी कह रहे हैं इस संसार चक्र को मिटा देने वाले श्री भगवान का आश्रय लो और उनका भजन करो। तुम लोग अपने हृदय में ही देखो हृदयश्वर भगवान बैठे हुए हैं। उन्हीं का भजन करो। असुर कुमारों अपने हृदय में ही आकाश के समान नित्य विराजमान भगवान का भजन करने में कौन सा परिश्रम की बात है? कौन सा रुपया खर्चा हो रहा है? राधा राधा कृष्ण कृष्ण हरि हरि कहने में क्या परेशानी हो रही?
लेकिन पापवंत कर सहज सुभाव भजन मोर ते भाव न काऊ जो पे दुष्ट हृदय सोई होई मोरे सनुख आओ की सोई ये पाप आचरण बन गए भजन में रुचि नहीं होती। नाम जप नहीं कर सकते। नौटंकी नाटक में बड़ा विश्वास है। अरे विश्वास कीजिए आप धैर्य पूर्वक समझिए। भगवान धनवंतरी रूप लेकर के आयुर्वेद का प्रकाश किया। रोगों की निवृत्ति के लिए औषधि रूपी प्रायश्चित है। बड़े-बड़े रोग हैं तो डॉक्टर हैं। औषधियां है। मंत्रुष्ठान स्वयं करके सकामता पूर्वक मंत्रुष्ठान करके कुछ मात्रा में अपने प्रारब्ध को वो भी जो हल्का है उसे दबाया जा सकता है।
प्रबल प्रारब्ध को कोई तपस्या के द्वारा भी नहीं रोक सकता। नहीं तितली की गुदा में कांटा डालने के कर्म का प्रारब्ध जब बना तो सूली पड़ी थी मांडव्य ऋषि के और वहां जैसे छोड़ दिया था वैसे काटी गई निकली नहीं इतने बड़े महान तपस्वी बाल ब्रह्मचारी पूरे जीवन भगवान के भजन में मस्त रहने वाले भीष्म पितामह छ महीना बाणों की सैया अभी आज छा में पता नहीं कौन सा सिद्धि इनको प्राप्त हो गई है बड़े-बड़े महात्मा बड़े-बड़े ऋषि जन बड़े-बड़े बड़े सिद्ध जन प्रारब्ध शरीर का भोगे हे प्रह्लाद जी कह रहे हैं हे भाई इस दलदल से निकलने के लिए एकमात्र उपाय भगवान का भजन करो भगवान का आश्रय ले लो भगवान को रिझाने में कौन से तुम्हारे पैसा लग रहे हैं कौन सा परिश्रम राधा राधा राधा राधा प्रह्लाद जी कह रहे हैं भगवान की प्राप्ति का उपाय ना करके भोगों को इकट्ठा करना राम राम राम कितनी बड़ी बड़ी मूर्खता है।
कितनी बड़ी मूर्खता है कि इस अमूल्य जीवन में भगवान नाम तो इकट्ठा नहीं किया और जो इकट्ठा किया मर के जब जाओगे तो पाई भर तुम्हारे साथ नहीं जाएगा। ये धन ये स्त्री ये पशु ये पुत्र पुत्री महल पृथ्वी घोड़ा गाड़ी खजाना भातिभांति की सामग्रियां ये सब यही रह जाएंगे। तुम्हारे साथ कुछ नहीं जाएगा। जाएगा तो तुम्हारा शुभ कर्म अशुभ कर्म या इन दोनों से परे भगवान का भजन। अरे इस क्षण भंगुर देह में भगवत प्राप्ति कर लो। इस लोक की संपत्ति जैसे नाशवान है ऐसे ब्रह्मलोक तक सब नाशवान है।
माया में है। भगवान का नाम जप करो। नाम जप से ही परम कल्याण है। अप्सराओं से कल्याण नहीं है। कितने अप्सराओं को भोगे हाय हाय करके फिर दुर्गति को प्राप्त हुए। लोक के भोग एक स्वप्निक भोग है। इसलिए हे निर्दोष मित्रों असुर बालको निर्दोष इसलिए कि इतने बड़े महात्मा का संग है तो निर्दोष तो है ही और विषम नवीन अवस्था के तुम सब केवल परमात्म प्राप्ति का उपाय करो। अनन्य भक्ति से भगवान श्री हरि का भजन करोगे वह तुम्हारी रक्षा करेंगे। अपने को जो बड़ा विद्वान मानता है और भगवान के भजन से विमुख है वह मूर्ख ही है।
प्रह्लाद जी महाराज कह रहे हैं उसकी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। उल्टा वो विपरीत फल में बंध जाएगा। जन्म मरण के चक्र में छूटवे के जतन विशेष बांधे यदि भजन नहीं कर रहे हो बहुत विद्वान हो तो तुम्हारी विद्वता माया का पर विजय नहीं प्राप्त कराएगी माया पर विजय भजन कराएगी भजन कर्म में प्रवत्त होने का उद्देश्य होता है सुख पाना दुख मिटना किसका दुख मिटा सब कर्म में लगे हुए हैं उद्देश्य होता है सुख पाना दुख मिटना लेकिन सबको दुख भोगना पड़ रहा है। इसका मतलब वो कर्म पता ही नहीं जिससे सुख मिलता है।
वो है राधा राधा राधा राधा। हे मित्रों यहां कामना और कर्म कर्म कृत कामना कामना कृत कर्म बार-बार इसी में जीव फंसा हुआ है। ये मनुष्य लोक में कामना कृत कर्म कर्म कृत कामनाएं जिस शरीर से की जाती है। यह शरीर कीड़ों का भोजन है। जला दिया जाएगा तो राख गाड़ दिया जाएगा तो कीड़े खा जाएंगे। बाहर फेंक दिया गया तो और दुर्दशा यह स्थाई नहीं है। यह मिला है और छूट जाएगा। छूटने के पहले भगवत प्राप्ति कर लो। प्रह्लाद जी कह रहे शरीर छूटने के पहले भगवत प्राप्ति कर लो। ये महल धन संपत्ति राज्य खजाना ये नौकर चाकर ये सब मायाकृत है कोई तुम्हारा नहीं है ये तुच्छ शरीर तुम्हारा नष्ट हो जाएगा तो फिर और कौन इसलिए असुर मित्रों वास्तव में तुम्हारे केवल श्री भगवान ही है श्री हरि ही है गर्भ से लेकर मृत्यु पर्यंत जितनी अवस्थाएं शरीर की बदलती हैं उनको तुम जानते हो तो तुम नहीं बदले शरीर बदला है यह जीव अपने स्वरूप को भूलकर शरीर को अपना मैं मानकर नाना प्रकार के कर्म और भोग वासनाएं ये फंस गया ये कर्म परंपरा में फंस गया अज्ञान में फंस गया इसलिए भगवान श्री हरि का भजन करके अपना उद्धार कर लो अर्थ धर्म काम मोक्ष सब भगवान के आश्रित है भगवान श्री हरि समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं, आत्मा है, परम प्रीतम है।
हम उनको भूलकर पंचभूत सूक्ष्म आद शरीरों में इतना फंस गए कि ऐसा लगता है मैं यह हूं और भगवान पराए हैं। इसलिए कोई भी हो चाहे देवता हो, दैत्य हो, मनुष्य हो, यक्ष हो, गंधर्व हो, कोई भी हो जो मेरे भगवान श्री हरि के चरणों का आश्रय लेकर भजन करता है। सा तरति सा तरति सा लोका तारति वो अपने को भी तार लेता है लोक के लोक को तार देता है दैत्य बाल को बहुत सुंदर बात कह रहे हैं भगवान को प्रसन्न करने के लिए भगवत प्राप्ति के लिए ऐसा नहीं है नालम द्वजत्वम देवत्व मितम वाजा प्रणनाय मुकुंद ना बहुता ना दानम ना तपोज्या ना सोचम न प्रियतेमलया भक्त हरि विडंबनम ततो हरो भगवती भक्तिम कुर दानवा आत्मन सर्वत्र सर्वभात्मनीश्वरे भगवान को प्रसन्न करने के लिए जरूरी नहीं।
ब्राह्मण होना, देवता होना, ऋषि होना, सदाचार, ज्ञान संपन्न, दान, तपस्या, यज्ञ, शारीरिक सोच, बड़े-बड़े व्रत यह भगवान को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं। केवल भगवान का होकर भगवान का भजन करें तो अहो घर य्या वर्तते नाम त्यम वो चांडाल जगत पूज्य हो गया जिसकी जिभ्या पे हरी हरि ऐसा नाम विराजमान भगवान को प्रसन्न करने के लिए क्या चाहिए भगवान का होके उनका नाम जप करना सीधी बात कोई हो पुरुष नपुंसक नारिवा जीव चराचर कोई सर्व भाव भज कपट तजी मोहि परम प्रिय सोई भगवान बहुत सुंदर बात प्रह्लाद जी कह रहे हैं बड़े-बड़े देवता होना ब्राह्मण होना ऋषि होना सदाचार संपन्न होना ज्ञान संपन्न होना दानी तपस्वी याज्ञ ये सब
बड़े-बड़ी पवित्रताएं व्रतों के अनुष्ठान ये पर्याप्त नहीं भगवान के लिए भगवान तो सिर्फ उससे प्रसन्न होते प्रियते अमल भक्त हरिद विडंबनम और तो सब विडंबना है भगवान अगर प्रसन्न होते हैं तो प्रियते अमलया भक्त हे भगवान मैं जैसा हूं आपका हूं प्रभु नीच हूं पतित हूं पामर हूं पर आपका हूं और नाम जप कर रहे बस इसी से भगवत प्राप्ति नालम द्वजत्वम देवत्व मितम वासुरात्मजा बहुत प्राण प्रिय बात है ये प्रणनाय मुकुंदस न वत्तम ना बहुता न दानम न तपो निज्या न सोचम ना वतानच प्रियते अमलया भक्त हरि विडंबनम भगवान केवल मैं भगवान का हूं ये खास बात है भगवान को प्रसन्न करने की मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई यह अनन्यता और नाम जप प्रीते अमल भक्त हर विडंबनम भगवान केवल प्रेम भक्ति से निष्काम भक्ति से अपनेपन से प्रसन्न हो जाते हैं।
भगवान से अपनापन करो। निरंतर नाम जप करो। दीन बंधु प्रभु बड़े कृपालु सारे अपराधों को क्षमा करके यह जन्म हमारा आखिरी जन्म हो जाएगा। अब हम कर्म बंधन से नहीं जन्मेंगे। अगर जन्म भी होगा तो भगवान की तरफ से आएंगे। भगवान का यश गाएंगे भगवान की भक्ति में उन्मत्त रहेंगे और लोक के लोक को भक्ति में युक्त कर देंगे मम भक्ति युक्तो भवनम पुन शेष चर्चा आ गई श्री राधा वल्लभ लाल की
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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- यदि साधक स्वयं पर कृपा करे, तो यह लाभ मिल सकता है/ काकासुर, शकटासुर एवं तृणावर्त का उद्धार — वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता निर्वापय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माश्रया [नाक से की जाने वाली आवाज़] परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप…