॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

कैसे प्राप्त होता है राधा दासी भाव ? // 25/08/26

▶ YouTube

पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

जय जय श्री [चीखने की आवाज़] जी की अपार कृपा से ही संत समागम प्राप्त होता है। लेकिन संत समागम में भी रसिकों का संग अति दुर्लभ का है। नेही दुर्लभ पावनो जैसे गीता जी में कहा वासुदेवा सर्वसा महात्मा सु दुर्लभा जो सब जगह भगवान को देखता है सर्वत्र भगवान का दर्शन करता है चर में अचर में स्त्री में पुरुष में पापी में पुण्य आत्मा में ऐसा महात्मा दुर्लभ है लेकिन उससे भी दुर्लभ बात है जो केवल श्री जी की चरणों की दासता में मगन है। ऐसा प्रेमी शब्द मिलना दुर्लभ है।

हमारी श्री जी सबसे दुर्लभ तत्व है। राधा तत्व जो है ये सबसे दुर्लभ तत्व है। श्री कृष्ण तत्व को जानने वाले भी बिना प्रिया जी की दासी भावना से युक्त हुए महापुरुष के कृपा प्रसाद के बिना वो राधा तत्व को नहीं समझ सकते निकुंज विलासिनी श्री श्यामा जो कितनी दुर्लभ है हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कहते हैं लक्ष्म य गोचरी भवतयम ना सखाया प्रभु तो नौ निवत्त निकुंज ये सबसे दुर्लभ है। ये एकांत है। गोष्ठ वृंदावन गोपी वृंदावन यहां तक तो पहुंच भी हुई लेकिन नौ निवृत निकुंज वृंदावन यहां य नारदा जे सुख रगम्यम गोष् वृंदावन में जैसे ब्रह्मा जी ने साक्षात्कार किया भगवान का गाय और बछड़े चराते हुए गोपी वृंदावन में जैसे भगवान शंकर ने रास में साक्षात्कार कार किया प्रिया प्रीतम का राधा कृष्ण का लेकिन नौ निव निकुंज विलासिनी जहां से अवतार लेती है वो मूल अंशी राेश्वरी श्री प्रियाजु इनको सखाओं ने भी नहीं देखा कह रहे यमना सखाया प्रभु सखाओं ने जिन श्री जी को देखा वो अंश श्री जी को देखा श्री लाडली जो बरसाने में जो प्रकट हुई लेकिन जहां से प्रकट हुई वो मूल श्री राेश्वरी नौ निवृत्त निकुंज विलासिनी श्री प्रिया जिनकी अगवानी स्वयं लाल जो प्रतिपल करते रहते हैं जहां जहां प्रियाजु चरण रखती वहां अपने नयन कमल रूपी पावड़े बिछा देते हैं।

उन प्रियाजु की हम बात कर रहे हैं। जहां प्रियाजु के पद संचालन पर उनके चरणों में पराग लगता है तो अपने पीतांबर से झालते हैं। और बोल मुकुट सहित अपने मस्तक को जिनके चरणों में रखते हैं। हम उन प्रियाजु की बात कर रहे हैं। अपने घर के हैं इसलिए चर्चा कर रहे हैं। बिहरत कुसुम पराग लगत जब पीत वसन ले झारत। लुटत मयूर चंद्रिका तिनतर अद्भुत छवि निहारत। जिन चरणों की महावर की रचना करने के लिए स्वयं ब्रह्मा शिव नारदा आदि वंदित चरण वाले प्रभु श्री कृष्ण लालू महाराज चाहते हैं और करते हैं जावक चित्र बनाई सवारत करन सफल तब मानत धदास जी वर्णन किया है हित ध्रुते सबते दुर्लभ ये सबसे दुर्लभ चरणारविंद है रसिक मरम जानते इन श्री चरणों का मर्म केवल रसिक जन जानते हैं अवतार लीला में राधा कृष्ण की लीला में देखा होगा लेकिन हरिवंश दुलारी नवनि निकुंज राेश्वरी वृंदावनाधीश्वरी इनको सखाओं ने भी नहीं देखा एक श्लोक में वर्णन किया ना देवा न ब्रह्माद न खलहारी भक्त न सुदा भगवान के सुहद जनों ने भी नहीं देखा देवताओं ने भी नहीं देखा।

ब्रह्मा आदि ने भी नहीं देखा। बड़ी दुर्लभ तत्व है हमारी राेश्वरी राधा तत्व। न देव ब्रह्मा खल हरि नदा इन्होंने आज तक हमारी श्री जी को नहीं देखा। संभाव्य विंच नारद शिव स्वयंभया संभव ही नहीं है। इन महापुरुषों के लिए श्री जी का दर्शन कितने सौभाग्यशाली हम सब हैं कि मुनि श्री जी के शरणागत है। वो हमारी स्वामिनी है। हम ठसक से कहते हैं कि हम जैसे भी अपनी लाडली झुके हैं। ब्रह्मा संपूर्ण चराचर जगत के रचयिता हैं। कौन सी ऐसी जगह है जो उन्होंने रची ना हो। लेकिन यह वृंदावन यह ब्रह्मा के द्वारा रचित नहीं है।

हरि राम व्यास जी ने वर्णन किया है। ये शेष के फण में रखी हुई भूमि पर विराजमान नहीं है। ये सूर्य और चंद्र से प्रकाशित नहीं है। ये अलौकिक है। स्वयंभू है। स्वयं प्रकट हुआ वृंदावन है। इसलिए स्वयंभू ब्रह्मा जी का भी अभी तक दिव्य वृंदावन जो प्रियाजु की निकुंज वाटी है उसका साक्षात्कार नहीं हुआ संभाव्योप विरंच ये संभावना भी नहीं कर सकते संभावना का मतलब होता है लौकिक शब्द में कल्पना जैसे ग्राम ग्रामीण आदमी हवाई जहाज खरीदने की संभावना भी नहीं कर सकता। ऐसे ब्रह्मा जी नवनि निकुंज में श्री जी के दर्शन करने की संभावना भी नहीं कर सकते।

नहीं कर सकते। नहीं प्रवेश है। संभाव्य विरंच नारद नारद रूप में नारद जी का प्रवेश कहीं भी वाणी जी में नहीं लिखा। संभाव्य विंच नारद शिव राधा कृष्ण की लीला में शिव जी का प्रवेश है। जन्म में रास में अन्य नवनि निकुंज में कहीं भी नहीं आप वाणी जी में पढ़ेंगे। यो वृंदावन नागरी पशुपति स्त्री भाव्या कथम राधा माधव योर मस्त सर दास्याधिकारोत्सवा कह रहे जो श्री वृंदावन की प्रियाजु है श्री वृंदावन की प्रियाजु केवल वृंदावन की यदि वृंदावन मात्र गोचरम हो और ब्रज में लाडली जो प्रकट हुई वो सब कोई गोचर लेकिन हम उन किशोरी जी की बात कर रहे हैं जहां से किशोरी जो प्रकट हुई य वृंदावन मात्र गोचर हो य श्रुति को पर जो वेद है उनका जो ऊपरी भाग उपनिषद है वहां भी उनको भी जानकारी नहीं है जिन श्री जी की बोले यो वृंदावन नागरी जो वृंदावन की श्री प्रिया जो है जो केवल ललितादिक भाव के द्वारा ही अर्थात सखी भाव के द्वारा ही जिनका दर्शन और जिनकी सेवा संभव है दूसरा कोई भाव नहीं अलग-अलग भाव है।

बरसाने लाडली जो भाव करोगे वह पूर्ति करेंग कोई बहन मानता है ऐसे हमने संत देखे जो लाडली जी को बहन मानते हैं कोई पुत्री मानता है लेकिन हमारी श्री जी हरिवंश दुलारी ये केवल ललितादिक भाव के द्वारा ललितादिक भाव सहचरी भाव दासी भाव यो वृंदावन नागरी पशुपति स्त्री भाव लभ्या कथम जो केवल ललितादिक भाव सहचरी भाव स्त्री भाव लभ्या कथम सहचरी भाव अगर सहचरी भाव नहीं है तो न निव निकुंज विलासिनी के दर्शन या उनकी सेवा या वहां प्रवेश बिल्कुल नहीं हो सकता। पलिता पुरुष भाव मिट जाए सेव ललितादिक के भा स्त्री पुरुष भाव मिट जाए और ललितादिक भाव अर्थात सहचरी भाव दासी भाव आ जाए तो हमारी श्री जी का दर्शन और सेवन प्राप्त हो।

श्री राधा माधव का ऐसा दास्य भाव मुझे कैसे प्राप्त हो महाप्रभु ने इसी श्लोक में प्रश्न किया राधा माधव योर ममास्त सर दास्यादोत्सव ये दासोत्सव श्री जी का दासी भाव जो इतनी दुर्लभ श्री जी है उनका मुझे कैसे प्राप्त हो जुगल सरकार नौ निव निकुंज विलासी राधा माधव का ये दास्य अधिकार मुझे कैसे प्राप्त हो पूछ प्रश्न है राधा माधव योर मस्त सर दास्याधिकारोत्सव ये एकांतिक दास्य उत्सव है श्री जी का जो सेवा भाव है ये उत्सव है। उत्सव में उत्साह होता है। यहां भावोत्साह है।

फूल चैन कर रहे अपनी श्री जी के लिए भाव में डूबे हुए हैं। भाव है ये श्री जी। ये पुष्प कर कमल में लगेगा। ये पुष्पा अमुक जगह श्रृंगार होगा। ये वेणी में श्रृंगार होगा। इसकी बाजू बंद बन सकती है कलियों की। ऐसा ऐसा ये हार बनेगा। वो पुष्प चयन करते हुए श्री जी में डूबा हुआ भावत सवेन चंदन चंदन घर्षण कर रहा है। पंखा कर रहा है। पान की बिल्ली की रचना कर रहा है। भोग बना रहा है। विविध प्रकार के पकवान विविध प्रकार के भोग भाव में भरा हुआ भावोत्सव ये उत्सव उत्साह उत्सव का मतलब क्या होता है?

उत्साह बोले आज उत्सव है तो फूले फूले घूमते हैं ये श्रृंगार श्रृंगार हमारा प्रतिपल उत्सव है कौन सा उत्सव दास्याधिकारोत्सवा श्री जी के दास्य के अधिकार का उत्साह मैं श्री जी की दासी हूं और हर समय उनकी सेवा में उत्तर महाप्रभु अगले श्लोक में दे देते हैं कैसे प्राप्त होगा राधा राधा माधव य ममास्तु सरहु दास्याधिकारोत्सवा ऐसी श्री किशोरी जो और ऐसे श्री लाल जो महाराज इन दोनों का मंगला से ले सयन तक शयन से ले मंगला तक सेवा का अधिकार मुझे एकांतिक कैसे प्राप्त होगा अब वर्णन कर रहे हैं उत्तर महाप्रभु कह रहे इस श्लोक के एक एक शब्द हमारी पूरी उपासना भरी हुई है।

उच्चिष्टा भक्तव चरितम शणवस्तव विस्मरण पादा भो रजव विचन कुंजावया गायन दिव्य गुणा पश्य वाम श्री राधे तन मनो भरमल सोहम तव वासित तव वासिता रसदे तव वासित महाप्रभु ने श्लोक के रूप में पूरी उपासना रख दी है। कैसे प्राप्त होगा राधा माधव का दास्य इस श्लोक में पूरा लिखा हुआ है। हे श्री राधे रस दे रस दान करने वाली मैं तन से मन से वाणी से और स्वयं से ये अलग है चीजें स्वयं और तन मन वाणी ये अलग चीज है। ये प्राकृतिक है और हम चिदानंद है। इसीलिए महाप्रभु ने कहा श्री राधे तनु वांग मनो अमल निष्काप निर्विकार भाव से सोहम मैं स्वयं मैं स्वयं मेरी वाणी मेरा शरीर मेरा मन निर्विकार भाव से अर्थात बिना किसी कामना के आपकी शरण में है।

अब ये कैसे हो कि हम स्वयं शरीर वाणी मन से निष्काम होकर श्री जी की दासी भावना से युक्त हो जाए। उसका उपाय बताया उष्टा अमृत भो तव तव उिष्टा अमृत भोगता केवल आपकी जूठन खाएंगे बस तवत हे रस दान करने वाली श्री राधे केवल आपका उच्चिष्ट ये नियमावली में है। ये अनन्य रसिकों का निज धर्म है। उनकी परिपाटी रही है कि श्री जी के जूठन के सिवा उन्होंने और कोई जूठन नहीं पाई। उच्चिष्टा भोग तव केवल श्री जी को अर्पित किया हुआ ही प्रसाद पाएंगे और नािया पाएंगे। जो पाएंगे वो श्री जी को पवा के पाएंगे।

श्री जी को पवा के चाहे प्रगट सेवा में और अगर ऐसी जगह है कि प्रकट सेवा नहीं तो यहां भी श्री जी है। मानसिक भावना करते हैं और श्री जी को अर्पित करते हैं और फिर उसे पाते हैं। बिना उच्चिष्ट के हम कुछ पा नहीं सकते। अपने आप सब कुछ दूर हो गया। जो श्री जी को भोग नहीं लगा सकते वो हम पा ही नहीं सकते। श्री जी का प्रसाद ही हमारा जीवन है। हमारे आचार्य की महिमा का गात करते हुए नाभा गोस्वामी जी ने कहा है सर्वस्व महाप्रसाद प्रसिद्ध ता के अधिकारी महाप्रभु ने सर्वस्व श्री जी की झूठन मानी है इसलिए इस श्लोक में सबसे पहले उिष्टामृत तव तव उिष्टामृत आपको पवाया हुआ प्रसाद पाएंगे हम सब हित धर्मी है, हरिवंश धर्मी है।

तो बिना श्री जी को पवाए या बिना श्री जी का भोग लगे हम कुछ पाए ना ये नियम होना चाहिए। उच्चिष्टामृत भोग तव चरितम श्रवस तव केवल आपके ही चरित्र सुनेंगे अन्यथा और नहीं सुनेंगे। और सही बात यह है कि जब हमें यह मार्ग जाना है तो अन्य मार्गों के किलोमीटर गिनकर हमको क्या मतलब? अन्य मार्गों के सिद्धांत अन्य मार्गों की बातें अन्य मार्गों हम सुनकर क्या करेंगे? क्योंकि उधर हमें जाना है नहीं। हमें जाना तो वृंदावन नवनि निकुंज राेश्वरी श्री लाडली जी के चरणों में है तो हमें चरितम शवस्त तव हम केवल आपके ही चरित्र सुनेंगे श्री जी के चरित्र कैसे हैं दिव्य गुणा दिव्य गुण है आप गाओगे तो गातेगाते आप श्री जी के हो जाओगे ऐसे दिव्य है गायन दिव्य गुणास्तव तो कैसे गुण है दिव्य दिव्य देवी संपदा को प्रकट करके हृदय में दासी भाव श्री जी के प्रति अपना भाव ये दिव्य गुण है चरितम शरण आपकी ही चर्चा सुनेंगे।

आपकी ही कथा सुनेंगे और दुर्लभ है। पाद भोज स्मरण आपकी चर्चा सुनेंगे स्मरण करेंगे। आपके श्री चरणों का हमारी स्मृति जो है पादा भोज स्मरण रजस तव आपके श्री चरणों का श्री चरण रज का इसी का हम स्मरण करेंगे एक श्लोक में इसी में महाप्रभु ने कहा जागृत स्वप्न सुशुप्त स्फूरत में राधा पदा छटा चाहे हम जाग रहे हो या सो रहे हो या स्वप्न में हो राधा पदा छटा बड़ी ऊंची स्थिति है। जागृत में तो राधा पदा छटा में टिक नहीं पाते। फिर सुशुप्ति तो हमारे बस की है नहीं और स्वप्न भी हमारे बस का नहीं।

कौन सा स्वप्न आ जाए? गाढ़ नींद में क्या श्री जी का स्मरण? लेकिन अभ्यास के द्वारा आश्रय के द्वारा भजन का जब निरंतर अभ्यास किया जाता है तो क्या प्रभाव बड़ा दिव्य कि जागृत स्वप्न सुशुप्त इस सूरत में राधा पदा छटा जैसे राधा कुंड निवासी श्री पूज्यपाद रघुनाथ दास गोस्वामी निरंतर नाम जप करते उसका प्रभाव यह पड़ा कि ध्रुवदास जी ने लिखा सोवत हो रसना रट राधा कृष्ण सुनाम वो सो रहे हैं लेकिन उनकी जबान से निकल राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा कृष्ण हरिवंश महाप्रभु क्या कह रहे सोते हुए भी श्री जी के चरणों का ध्यान हो रहा है स्वप्न में श्री जी के ही स्वप्न आ रहे हैं जागृत में श्री जी की ही केवल छटा छाई हुई है।

श्री जी के भाव में भरा हुआ है और कुछ नहीं। स्मरण पादा भोज रजसव। क्यों? क्योंकि हमारे धर्म की स्थिति सेवक जी ने कहा श्री राधा जुग चरण निवास। हम लोगों की स्थिति श्री किशोरी जी के चरण में ही है श्री राधा जुग चरण निवास भगवत ऋषिक जी कहते हैं कि ये जो महावत रचे हुए लाडली जो के दोनों चरणारविंद हैं यही हमारे सुर कामधेन चिंतामणि भगवत रसिक अनन्य लेके जो अनन्य रसिक हैं अली माने सहचर्य होता है। जो अनन्य सहचर्या है उनके लिए सुरतर कल्पवक्ष कामधेनु और चिंतामणि चिंतित पदार्थों को प्रदान करने वाली चिंतामणि समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु और कल्पवक्ष जो चाहो जो सोचो वैसा ही प्राप्त हो जाए।

यह श्री लाडली जो के चरणारविंद है जावक जुत जुग चरण लली के हम सखियों की स्थिति श्री राधा चरणारविंद में है श्री राधा चरण निवास तो हमारे स्मरण में कहां अन्य स्थान होना चाहिए केवल राधा चरणारविण गोरे चरणारविंद श्यामा श्याम के गौर श्याम चरणारविंद इसके अलावा और हमारा चिंतन नहीं होना चाहिए। अब यहां देखो हमारा कितना चिंतन बिखरा हुआ है। बिखर पर मन सिमटत नाही इंद्र लीन चीत। इंद्रियों ने मुझे परास्त कर दिया। मन भोगों में बिखर गया। कैसे श्री जी का राधा चरणारविंद का निरंतर ध्यान हो।

इसीलिए साधक शरणागति पर रहता है। श्री जी आप देख लो। श्री जी आप संभाल लो। श्री जी आप ही संभालेगी तो संभल पाएगा। मेरे संभाले तो संभलेगा नहीं। इंद्रियां बड़ी बलवान है। विषयों का संसर्ग होने पर मरे हुए मन में भी अनंग जाग उठता है। जिसका मन मर चुका है उसमें भी विषयों का संयोग होने पर कामना जागृत हो जाती है। इसलिए जब भगवान ऋषभदेव जी के पास समस्त सिद्धियां आई तो उन्होंने स्वीकार नहीं किया तो परीक्षित जी ने कहा कि इनकी तो ऐसी स्थिति है इनको क्या परेशानी है?

क्यों स्वीकार नहीं किया भगवान ऋषभदेव जी ने? तब श्री सुखदेव जी ने कहा जैसे चतुर बहेलिया अपने पकड़े हुए हिरण पर कभी विश्वास नहीं करता। कभी भी भाग सकता है। ऐसे सिद्ध पुरुष भी अपने मन पर विश्वास नहीं करते। वह कभी भी भाग सकता है। हम लोग तो उस अवस्था को प्राप्त ही नहीं है जिसको सिद्धावस्था कहते हैं। ये रोग ये परेशानी ये चाहिए वो चाहिए। यह जब मिट जाए तब बोले स्मरण पादा भोज रज हर समय श्री जी के चिंतन में प्रसन्नता का विषय क्या होता है? ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा ब्रह्म भूत माने भगवत चरणारविंद का साक्षात्कार किए हुए हर समय प्रसन्नता हमको उनसे दूर रहना है जो हमारे दिमाग में श्री जी के चरणों के सिवा और कुछ भरे उन व्यक्ति से उस समाज से उस सत्संग से उस व्यवहार से रिश्ते से नाते से हमें दूर रहना है जो हमारी श्री जी के सिवा कुछ भरे हम श्री जी के चिंतन को करते हुए पांच मिनट में भी शरीर छूट जाए तो राजी हैं।

हमारा लक्ष्य चिंतन है ना शरीर और सबसे बड़ी औषधि धनवंतरी जी ने आयुर्वेद का पूरा मंथन करने पर अचित गोविंद कृष्ण नाम इसमें जो रोग निवारण की सामर्थ्य है वो किसी औषधि में नहीं तो दिव्य औषधि का सेवन हो रहा है दिव्य चिंतन ये सांसारिक क्या जाने तो अपने को स्मरण पादा भोज रजस तव आपकी चरण रज का स्मरण आपके चरणों का हमको हर समय यह सावधानी बरतनी है कि प्रियाजु का चिंतन ना छूटे जिस व्यक्ति से जिस वस्तु से जिस घटना परिस्थिति जो भी हमारा चिंतन छूट जाए वही विपत्ति है।

आ हरिवंश के नाम पड़े। हमने जीवन में देखा है चिंतन नहीं छोड़ने हैं। प्रारब्ध वसा इंद्रियां प्रबल है। हमें कहीं बैठा लो कुछ भी। लेकिन हम चिंतन आपका नहीं छोड़ेंगे। आपको साथ रहेंगे। चाहे नरक भेजो यत्र यत्र जन्म कर्म नारके परमे पदे थवा राधिका निकुंज मंडली तत्र तत्र हृद में विराजता ये श्री जी जानती है दूसरा नहीं जानता चिंतन चिंतन को जिसने महत्व दिया वो जीत गया चिंतन को महत्व दीजिए हर समय भजन को [गला साफ़ करने की आवाज़] महत्व दीजिए विचरण कुंजास्त वालयान आपकी कुंजों में विचरण करो।

20 कोस वृंदावन का प्रमाण है। 42 लीला में वर्णन है। पंच जोजन विस्तारा ऐसा वर्णन किया। एक योजन चार को पांच चौको 20 आप जैसे ये अपना बंसीव है यही तक मानसरोवर बंसीव सब ये सब वृंदावन के अंतर्गत है ध्रुवदास जी ने 20 कोस कहा है वृंदावन पंच जोजन विस्तारा हम आपकी ही कुंजों में विचरण करें वृंदावन जिनको सौभाग्य प्राप्त है अखंड वृंदावन वास का क्या कहना है मैं आपकी ही लीला स्थल थली में विचरण करूं। बोले अमुक धाम चलते हैं, अमुक तीर्थ चलते हैं, अमुक पूरी चलते हैं।

वृंदावन को छोड़ के और तीर्थ दे दे जात विमल चिंतामणि कौड़ी को ललच। विमल चिंतामणि वृंदावन को छोड़कर कौड़ी उठाने के लिए जा रहे हो। महाप्रभु कह रहे विचरण कुंजाव वालयान बस आपकी ही कुंजों में विचरण करूंगा वृंदावन की गलियों में वृंदावन के क्षेत्र में ही विचरण करूंगा अन्य नहीं क्योंकि आपका कुंज कुटीर है आपकी निकुंज वाटी है आपका निकुंज वन है वृंदावन गायन दिव्य गु आपके ही दिव्य गुणों का गायन करेंगे। नियम है महाप्रभु तो श्री जी की सहचरी है। रसना कटो जो अन रटो निरख अन फूटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो श्री राधा जस बैन यह शरण तव आपकी ही बात केवल सुननी है।

गुणा दिव्य आपके दिव्य गुणों का ही केवल श्रवण करना है। और गायन आपके ही गुणों का करना है। रसना कटो श्रवण फूटो और रसदे पसवा कृतिम हे रस दान करने वाली प्रियाजु केवल आपके ही रूप का ध्यान हो बस और कोई ध्यान ना हो पूरी उपासना इसी में एक श्लोक में उत्तर दे दिया पहले में प्रश्न किया कि ऐसी श्री जी की दासता कैसे प्राप्त हो तो दूसरे में उत्तर दिया कि आपका उिष्टामृत प्रसाद पाए। आपके सुंदर चरित्रों का गायन करे। आपके चरणों का स्मरण करें। चरण रज का स्मरण करें। आपकी ही कुंज विधती वृंदावन वास करें।

और आपके ही गुणों का गायन करें। 42 लीला श्रीमद् चतुरासी जी ये सब दिव्य प्रियाल की लीला से भरे हुए हैं। और आपका ही ध्यान करें। अब ध्यान के विषय में राधा रूप ऐसा है जो अगोचर है। बड़ा गुप्त है। कहीं भी अगर कुछ वर्णन होता है तो ध्रुवदास जी ने कहा कि जिसने देखा उसके वाणी नहीं और जो बोल सकता है उसने देखा नहीं। नेत्रों ने देखा तो तेरो रूप कहत नहीं आवे रूप कैसे तो राधा नाम मंत्र इसका ध्यान करो इसी में आ जाएगा देखी रूप नाम आदिना अगर नाम का मंत्र का ध्यान करोगे तो श्री जी का रूप झलकने लगेगा गोरे चरणारविंद कैसे महावचित है कैसे सुंदर पायल है कैसी सुंदर शोभा वो सुहाग उनकी कृपा से उनका रूप प्रकाशित होगा किसी की सामर्थ्य नहीं कि ध्यान कर सके ध्यान तो उनके प्रीतम का भी मुनि मन ध्यान धरत नहीं पावत फिर जिनका ध्यान स्वयं लाल जी करते हैं जपत हरि विवस तब नाम प्रतिपद

विमल मनस त ध्यान ते निमिश नहीं तरबो एक निमष के लिए भी श्री जी का ध्यान लाल जी नहीं छोड़ते उन श्री जी का ध्यान हमारी सामर्थ्य कहा है कि हम कर सके हरिवंश महाप्रभु ने जो मंत्र दिया जो नाम दिया हरिवंश महाप्रभु ने नाम दिया राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुख नाम हरिवंश महाप्रभु ने जो मंत्र दिया इसकी सामर्थ्य है कि राधा रूप का ध्यान करा सके नहीं तो ब्रह्मेश्वर आदि सुदू पदारविंद श्री जी के चरणारविंद इस ध्यान में नहीं आते बड़े-बड़े महापुरुषों के भी तो हम तन

से मन से वचन से और स्वयं से श्री जी की शरण में होकर कर जैसा महाप्रभु बोले वैसे आचरण करें तो हमें श्री जी का दासी भाव प्राप्त हो जाए सहचरी भाव प्राप्त हो जाए और हम सब श्री जी के चरणों में समर्पित हैं तो यह सब मिल ही जाएगा पर हमको थोड़ा सा अनन्य भाव लाना होगा जैसा कि तव तव तव आपकी केवल आपकी आपकी [गला साफ़ करने की आवाज़] आपका झूठन आपकी कथा आपकी आपकी वार्ता, आपका वृंदावन, आपके रसिकों का संग बस जब अनन्य हो जाएंगे तो यह भाव हमें प्राप्त हो जाएगा। श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

संबंधित