॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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सब सुखों का मूल क्या है? / शरणागति का वास्तविक स्वरूप // 30/08/26

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हदितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माया परम शीतल मा या श्री स्वामिनी जो हित सजनी जो से एकांत में जब प्रीतम प्रियाजू की वेणी गूथने के लिए समीपस्थ कुंज से पुष्प चयन कर रहे हैं। उसी समय हित सजनी जो से अपने हृदय की बात श्री प्रिया जो कह रही है जोई जोई प्यारो करे सोई [गाना गाने की आवाज़] मोहि भावे भावे मोहि [गाना गाने की आवाज़] जोई सोई सोई करे प्यारे [गाना गाने की आवाज़] मु को तो भावती [गाना गाने की आवाज़] ठोर प्यारे के नैनन में [गाना गाने की आवाज़] प्यारो भयो चाहे मेरे नैनन के तारे प्यारो भयो चाहे मेरे नैनन के तारे मेरे तन मन प्राण होते प्रीतम प्रिय अपने कोटि प्राण प्रीतम सो हारे जय श्री हित हरिवंशंस हंस हंसिनी सावल गौर [गाना गाने की आवाज़] हंस हंसिनी सावल गौर कहो कौन करे जल तरंग न्यारी जोई जो ही प्यारो करे सोई मोहि भावे भावे मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे प्यारी जो कहते हैं हे सजनी जोई जोई प्यारो करे मेरे प्यारे जो विधान रचते हैं जो करते हैं वही मुझे मुझे अच्छा लगता है।

प्रीति का यह स्वरूप ही है। तेरा किया मीठा लागे। अगर अपनी कोई चाहत, अपनी कोई मान्यता और उसके प्रतिकूल प्रीतम का व्यवहार है, निर्णय है तो मुझे अगर प्रतिकूल भासता है तो हमारी शरणागति ही नहीं। उपासक उपास्य देव में समर्पित है। उपास्य देव सर्वज्ञ हैं, सर्वत्र है, सर्वशक्तिमान है और हमें बहुत प्यार करते हैं। यह शरणागत को हृदय में धारण करना होगा। हमारे आराध्य देव जो भी हमारे लिए विधान करते हैं, वह परम मंगल के लिए करते हैं। पक्का। हम अल्प सोच वाले अपनी अनुकूलता को लेकर सोचते हैं कि इनका किया हुआ विधान हमारी अनुकूलता के प्रतिकूल है।

यह हमारी शरणागति में बहुत बड़ा कलंक है। प्यारी जी क्या कह रही है? जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे। मेरे प्यारे जो जो करते हैं प्रीतम वह मुझे अच्छा लगता है। यह पहली समर्पण वृत्ति अपने प्रीतम के प्रति जब इस कोटि का समर्पण उपासक का होता है तो उपास देव यथा माम प्रपद्यते ताथ भजाम्यम भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो गीता में कहते हैं जो मुझे जैसे भजता है मैं उसे वैसे ही भजता हूं। तो दूसरी पंक्ति में प्रीतम की बात कह रहे हैं कि भावे मोहे जोई सोई सोई करें प्यारे जो मुझे भाता है वही मेरे प्यारे करते हैं।

इसमें क्या हुआ? रुचि एक हो गई। प्रीतम की और प्यारी जो की एक रुचि है। ऐसे ही शरणागत की और शरण की एक रुचि। शरण जैसा विधान करता है शरणागत को वैसा ही रुचिकर होना चाहिए। और होता है। अगर नहीं होता है तो आप शरणागत नहीं स्वार्थ का व्यापार करते हैं। और जिस समय आप अपने शरण की रुचि में रुचि मिला दिए तो शरण्य आपकी रुचि के अनुसार चलने लगेगा। भावे मोह जोई सोई सोई करें। प्यारे यह सिद्धांत है। यहां तो प्यारी जो अपने हृदय की बात कह रही है कि मेरे प्रीतम जो जो करते हैं वही मुझे अच्छा लगता है।

जो विधान रचते हैं और मुझे जो अच्छा लगता है वही मेरे प्यारे करते हैं। हे हित सजनी जो मोको तो भावती ठोर प्यारे के नैनन में उपासक की एक एक वृत्ति अपने आराध्य देव की रुचि के अनुसार उनके रुख को देखते रहते हैं। हमारे प्रीतम की क्या इच्छा है? क्या रुचि है? प्रीतम के नेत्रों को, मुखारविंद को, प्रीतम के भाव को उपासक देखता रहता है तो बोले तो बहुत ऊंची स्थिति है। छोड़ो तो शास्त्र जो आज्ञा कर रहा है वो प्रीतम की ही आज्ञा है। तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित यदि आपको अपने आराध्य देव की अनुकूल चलना आ गया तो आप सदैव आराध्य देव में ही निवास करेंगे।

अगर ऐसी स्थिति हुई तो आप अपने नेत्रों से देखेंगे प्यारो भयो चाहे मेरे नैनन के तारे यहां प्यारी जो कह रहे मो को तो भावती ठोर प्यारे के नैनन मुझे रहना अच्छा कहां लगता है प्रीतम के नेत्रों में और प्यारो भयो चाहे मेरे नैनन के तारे वो तो मेरे नेत्रों की पुतली बने हुए हैं जब हम इसे सिद्धांत भाव में लेते तो जब उपासक सर्वत्र अपने प्रभु को देखता है योमाम पश्यति सर्वत्र सर्वम चम पश्यति तस्याह न प्रणस्यामि सच में न प्रणसति जो मुझे सर्वत्र देखता है सबको मेरे में देखता है मैं उसके नेत्रों से कभी ओझल नहीं होता मैं सदैव उसके नेत्रों में वास करता हूं अर्थात उसकी भगवदाकार वृत्ति हो जाती है।

यहां तो प्यारी जो कह रही मुझे रहना अच्छा लगता है प्रीतम के नेत्रों में और प्रीतम तो मेरे नेत्रों की पुतली ही बन गए। तीसरा पहले में एक रुचि दूसरे में एक दृष्टि तीसरे में एक प्राण। देखो प्यारी जो कह रही मेरे तन मन प्राण हु ते प्रीतम प्रिय यह स्थिति उपासक की प्रेमावस्था में होती है। शरणागति में इसे समर्पित किया जाता है। तन मन [गला साफ़ करने की आवाज़] और प्राण जीवन समर्पित कर दिया। बहुत कठिन है ये। केवल प्रवचन कर लेना और सुन लेना सरल है। लेकिन तन मन प्राण समर्पित करना बहुत लोग बोलते हैं ऐसे अपने से सब कुछ समर्पित है आपके चरणों में अनुकूलता में प्रतिकूलता में बिल्कुल नहीं पाया जाता।

100 में एक प्रतिशत नहीं पाया जाता। 100 में एक प्रतिशत नहीं पाया जाता। यह सत्संग है। इसे दिमाग में बैठा लो। ना तुम्हारा कोई पुत्र है, ना पुत्री, ना पत्नी, ना पिता, ना माता, ना वही एक सच्चिदानंद नाटक कर रहा है। उसी सच्चिदानंद के इस माया विलास से मुक्त होने के लिए गुरु का आश्रय लेकर तस शास्त्रम प्रमाणम इससे चला जाता है। तब माया मुक्त हो जाता है। खिलवाड़ समझते हो माया से मुक्त होना। हम तन में फंसे हैं। हम अपने मन में फंसे हैं। अपने प्राणों के पोषण के लिए मनमानी आचरण कर रहे हैं।

शरणागत होकर के शरणागत होकर के बिल्कुल शरणागति के विरुद्ध आचरण भगवत प्राप्ति करनी है। परमानंद में स्थित होना है। तो मेरे तन मन प्राण होते प्रीतम प्रिय यह शरणागत की स्थिति होनी चाहिए। जब आप परमार्थ में चलते हैं तो आपकी परमार्थ की परिपक्वता के लिए प्रश्न खड़ा होता है जीवन में। आपके नहीं हर परमार्थ के पथिक के जीवन में प्रश्न आता है। एक तरफ होता है संसार और एक तरफ होते हैं भगवान और सद्गुरु। अब तुम्हारे कदम किधर बढ़ते हैं? सद्गुरु की तरफ, ईश्वर की तरफ, इष्ट की तरफ या संसार की तरफ।

तो प्रायः 100 में 99 देखे गए वो संसार की तरफ खड़े हो जाते हैं और प्रश्न में हार जाते हैं। उत्तर नहीं दे पाते। और अगर प्रभु की तरफ खड़े हो जाओ तो संसार तुम्हारा उज्जवल हो जाएगा। बड़ा मंगलमय हो जाएगा। जो बंधन कारक है वही मोक्ष का कारण बन जाएगा। ऐसे वस्तु पाओ तो भगवान कहते हैं मेरे को अर्पित किए बिना जो पाता है वो पाप है। और प्रभु को अर्पित कर दिया तो प्रसाद है। प्रसाद सर्व दुख नाम हानि रसते। जब संसार की तरफ खड़े हुए तो अब पाप घेर लेगा और प्रभु की तरफ खड़े हुए तो प्रसाद हो जाएगा।

यह संसार ये परम मंगलकारी सुख प्रदान करने वाला हो जाएगा। पर बहुत कठिन है। फिर मैं कह रहा हूं हमारे मन के अनुकूल तो हमारा तन समर्पित मन समर्पित प्राण समर्पित ऐसा हम बोल देंगे और जब प्रश्न खड़ा हो जाएगा तो संसार की तरफ खड़े मिलेंगे। इष्ट गुरु के पास नहीं। यही धोखा होता है। यही धोखा होता है। समर्पित जनों का एक निष्ठ स्वभाव होता है। शरण के प्रति जो समर्पण हुआ उसकी याद भी ना आवे। समर्पण समर्पण की स्मृति का भी त्याग यंत्रवत। एक बार एकांत में मूरध्वज की चर्चा भगवान कर रहे थे कि ऐसे महान भागवत जो मुझे अधीन किए रहते हैं अर्जुन तुमसे सत्य कहता हूं त्रिभुवन में मूरध जैसे प्रेमी जन समर्पित जन बहुत कम होते हैं।

तो अर्जुन जी ने कहा प्रभु आपकी अक्षरसा बात सत्य है पर क्या मैं आपका समर्पित दास नहीं हूं क्या भगवान ने कहा हमने यह तो नहीं कहा पर यह कहा मोरध्वज जैसे बहुत कम होते हैं। बोले प्रभु क्या हम उस पंक्ति में नहीं है क्या? प्रभु ने कहा नहीं आप नहीं। कहा प्रभु मैं आपके साथ विनोद करता हूं, प्रसाद पाता हूं, खेलता हूं। आप हमारे प्राण प्रिय हैं। हमारा अस्तित्व ही आप हैं। और आप कह रहे हैं मोरध्वज की पंक्ति में नहीं। क्या हमारे समर्पण में कमी है? बोले चलो पहले तुम्हें मोरध्वज की महिमा दिखाते हैं।

फिर तुम्हें बताते हैं। गए संत भेष में भगवान और माया से सिंह रूप दिया भिक्षम दे कोई भगवान का रूप नहीं संत रूप वो निकले साष्टांग दंडवत किया अहो भाग्य हमारे बड़ा अनुग्रह हुआ आज मेरे हरि का कि आज हमारे यहां अतिथि रूप में संत भगवान पधारे जो प्रभु मोह अनुग्रह कीना तो तुम आई दरस हट दीना बड़ी कृपा बड़ी कृपा कृपा आओ प्रभु पधारो चरण प्रक्षालन किए चरणामृत लिया प्रभु बस कुछ क्षण विराजिए उत्तम उत्तम भोग लगाकर श्री भगवान को अभी प्रसाद पवाते हैं नहीं मुझे भूख नहीं लगी मेरे सिंह को

लगी प्रभु सिंह के लिए क्या क्या व्यवस्था कर सकते हैं सिंह तो कोई घास शिव संतरा या छप्पन भोग थोड़ी पाता है वो तो मांस खाता है प्रभु मांस की व्यवस्था हम वैष्णव है कहां से कर सकते हैं तो ना बोल दो नहीं ना भी नहीं बोल सकते आप अतिथि रूप में पधारे हैं अब हम पता लगाते हैं कहीं कोई कसाईवाड़ा होगा वहां से हम खरीद के लाएंगे आपके सिंह को जरूर पवाएंगे बोले नहीं आज मैं सिंह को कसाई वाड़े से पवाने के लिए आपके यहां भिक्षा नहीं करनी है तो किसी के यहां भी कर लेता

आप अपने घर से पवाइए बोले प्रभु हमारे घर में तो वैष्णवता है, सात्विक आहार है। बोले आपका पुत्र है ना? हां प्रभु तो फिर आप उसको काट के पवा दीजिए। हां प्रभु ऐसी तो हमारी स्मृति ही नहीं गई थी। बड़ी कृपा की आपने अवश्य अवश्य। तो कुछ क्षण रुके। [गला साफ़ करने की आवाज़] पुत्र से कहा बेटा आज तुम्हारा जीवन सफल हो गया और मेरा पिता होना सार्थक हो गया। संत आए हैं ऐसा ऐसा कह रहे हैं। क्या तुम इस विषय में स्वीकृति देते हो? तो उनका पुत्र का तन प्राण [गला साफ़ करने की आवाज़] सब पिता के लिए होता है।

और मेरे पिता धर्म के लिए मेरा जीवन दे रहे हैं। इसलिए मैं साहस स्वीकार करता हूं। आप अभी काटिए और सिंह के सामने साथ ले गए और कहा या तो सिंह ही आक्रमण करके पाले या फिर आदेश करूं मैं कैसे पवाऊं तो उनका कहा तुम और तुम्हारी पत्नी इसे खड़ा करे बीच में से आरे से चीर कर फिर पवाए ना तुम्हारे अश्रु ना पुत्र के अश्रु ऐसा सत्य मानिए ऐसा ही और बड़े ही वज्राद कठोराण भगवान कुष्मादप कोमलानी तो वज्राद कठोराण का स्वरूप दिखाया बिल्कुल निरपेक्ष बड़ा चरित्र है वो तो भगवान सर्वलोक महेश्वर ऐसा हुआ कि आर्य से चीरा ऐसा वो दिव्य तेजोमय बालक कहीं कोई

खरोच भी नहीं लीला थी बड़ा चरित्र है एकांत में अर्जुन को ले गए मेरे बोले मेरे भांजे हैं अभिमन्यु जी तुम्हारे पुत्र हैं और वीरगति को प्राप्त हुए मैं लाख बार समझा रहा था तुम्हारा मोह नहीं गया रोना नहीं गया और वो एक सिंह के लिए मुझे श्री कृष्ण जान के नहीं श्री कृष्ण का दास संत जान के मेरी आज्ञा के लिए आड़ा चला दिया इसलिए उसकी समानता तुम कदापि नहीं कर सकते अर्जुन जिसने तन मन प्राण समर्पित कर दिए इसे कहते कहते हैं समर्पण पक्का 100 शरणागतों में एक भले निकलना चाहे एक हो कोई बिरला नहीं ऐसा और चाहते हैं हम दिव्या दिव्य भगवनंद की प्राप्ति देखो किसी क्रिया या किसी तप के द्वारा भगवनंद की अनुभूति नहीं होती तन मन प्राणों से ममत्व हटाने से होती है।

सबकी ममता ताग बटोरी। इसी ममता रूपी अविद्या ने मुझे सच्चिदानंद सुख से वंचित रखा या मुझ सच्चिदानंद को माया में फंसा दिया। दोनों बातें मुझे सच्चिदानंद सुख से वंचित रखा या मुझ सच्चिदानंद को अविद्या में फंसा दिया। यहां तो प्रेम की बात हो रही है। पर शरणागत का स्वरूप है मेरे तन मन प्राण होते प्रीतम प्रिय? अब इसका प्रश्न आएगा अपने जीवन में। तुम्हें तन प्रिय है? तुम्हें प्राण प्रिय है या परिवार प्रिय है या धन प्रिय है? क्या प्रिय है? मन प्रिय है? मन प्रिय है?

मेरे मन को अच्छा नहीं लगा। खत्म। मेरे तन के प्रतिकूल हुआ खत्म मेरे प्राणों के प्रतिकूल विधान हुआ खत्म श्रद्धा बोले अब हमारी श्रद्धा नहीं रह गई थी अब श्रद्धा अपने स्वार्थ की अपनी वासना की अपनी अनुकूलता की वृत्ति को श्रद्धा श्रद्धा कहा जाता चलवा दिया फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा उनकी श्रद्धा में तन मन प्राण समर्पित कह दे यह तो कथा है तो फिर सब कथा ही है अगर श्रद्धा है तो आज भी ऐसे भक्त हैं जो अपना सर्वस्व समर्पित किए हुए आह नहीं निकाल रहे। भयानक से भयानक प्रतिकूल परिस्थिति में श्री कृष्ण अनुकूल ले।

हर उपासक के गौर से समझ ले। तुम्हारे जीवन में जब तक भगवत साक्षात्कार नहीं होता तब तक क्रम बाय क्रम प्रश्न आते रहेंगे। एक तरफ प्रभु गुरुदेव इष्ट गुरुदेव एक तरफ परिवार माया पद प्रतिष्ठा लोक लोकांतर की ये सब वैभव कीर्ति प्रश्न आएगा प्रिय कौन है प्रभु या ये तो आप लुढ़क के उसी में हो जाओगे संसार की तरफ यदि शरणागति की पुष्टता नहीं है शब्द स्थिति का बोध कराते हैं जो तुम्हारे मुख से शब्द शब्द निकलते तत्काल जो विज्ञ जन है वह जान जाते हैं कि किस स्थिति में है ये पूर्ण शरणागति का स्वरूप है मेरे तन मन प्राण होते ते प्रीतम प्रिय लिख लो कागज में मेरे तन मन प्राण हूं ते प्रीतम प्रिय ये शरणागति अब आपकी परीक्षा होगी तन मन प्राण तन रोग हो गया एक्सीडेंट हो गया परिवार के लोग छोड़ दिए कई तरह के उस समय जय प्रिया लाल की जय श्यामा जी की ये शरीर मेरा नहीं आपको समर्पित है जीत गए सही उत्तर दे दिया मन नाना प्रकार की वासनाएं नाना प्रकार की प्रतिकूलताएं अब आप मन के पक्ष में या प्रभु के पक्ष में?

मेरा मन नहीं लग रहा। तुम मन के पक्ष में। मेरा मन ऐसा तुम मन के पक्ष में। अरे मेरा मन क्या? वो तो प्रभु को दे दिया ना। वो गंदा सोचे तो प्रभु जाने। अच्छा सोचे तो प्रभु जाने। शांत है तो प्रभु जाने। अशांत है तो प्रभु जाने। आनंदित है तो प्रभु जाने। शोकित है तो प्रभु जाने। मेरा मन वो तो दे दिया। संतुष्ट है इनके नवा। हर परिस्थिति में वो प्रसन्न आत्मा रहेगा। यह है मन समर्पित। प्राण भूखे रहे, प्यासे रहे, चाहे जितनी विक्षिप्तता आ जाए, चाहे जैसी परेशानी हर परिल के अनुकूल भाव में कोई फर्क नहीं पड़ा।

तब मेरे तन मन प्राण हूं ते गाते तो अपने सब लोग हैं। मेरे तन मन प्राण हूं ते प्रीतम प्रिय तो अगर प्रीतम की प्रियता इतनी जोर की है तो अभी मृत्यु हो जाए तो मुझे क्या फर्क अभी गलित कुष्ट हो जाए तो क्या फर्क अभी नाना प्रकार की अपमान हो जाए तो क्या फर्क नहीं प्रीतम होते तन मन प्राण प्रिय यह मिलेंगे आपको 99 शरणागत में कोई बिरला कृपा पात्र जो मेरे तन मन प्राण हूं ते प्रीतम प्री तो परिणाम क्या होगा अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोस सो हारे अहम भक्त पराधीनो अस्वतंत्र इज मैं परम स्वतंत्र कहलाने वाला परमात्मा अस्वतंत्र हूं अपने भक्त के अधीन हूं हम भक्त पराधीन पर यहां तो प्रिया जो प्रेम की बात कहे कि मेरे सच्चिदानंद सुंदर वपू मेरे प्राण मेरे मन स्वयं प्रभु ही बने हुए हैं।

कोई दूसरा नहीं है। प्रियाजू का मन श्री कृष्ण प्रियाजू का तन श्री कृष्ण प्रियाजू के प्राण श्री कृष्ण लालजू का तन मन प्राण सब कुछ प्रिया जी श्याम रंग श्यामा रंगी श्यामा के रंग श्याम ये तो कहने को केवल दो है प्यारी जो अपनी प्राण प्यारी हित सजनी जो से कहती है मेरे तन मन प्राण होते प्रीतम प्रीत हमारे प्रीतम करोड़ों प्राण हम पर न्योछावर किए हुए हैं तो हित सजनी जो कहती जय हो जय हो युगल सरकार आप तो हंसनी की जोड़ी हो भला जल और तरंग कहीं न्यारे न्यारे किए जा सकते हैं भला शरण्य और शरणागत कभी अलग हो सकते हैं ये बहुत बड़ा सिद्धांत का स्वरूप है।

पहली पंक्ति से शुरू करो अपने जीवन की धारा को आराध्य देव में समर्पित करने के लिए। भगवत प्राप्ति केवल समर्पण से होती है। प्यारे अंदर की बात समझ लो। जितनी साधनाएं हैं वह अहम मिटाकर समर्पण के लिए है। खूब हजार बार याद हो गया होगा क्योंकि हमने लाखों बार ये चौपाई गाई है। सबको याद हो गया होगा। जो रोज प्रवचन सुनते हैं तो हम श्लोक शुरू करते हैं। उसके पहले वह बोल देते हैं। क्योंकि सिद्धांत के लाखों बार बोले जननी जनक बंधु सुतारा जननी जनक बंधु सुत दारा तन धन धाम सुहद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मन ही बांध बर डोरी सबकी ममता हटाकर मेरे चरणों में लगा दो ममता मेरे चरणों में तो बोले फिर अब सबको छोड़ दें इनका पालन पोषण कौन करेगा?

तो अभी जाना क्या अपने स्वामी को? तुमने स्वामी को क्या जाना? ये स्वामी केवल तुम्हारी शरणागति की उत्तरवत्ति देखने अब क्या तुम बोलोगे? अब क्या तुम सोचोगे? अब क्या तुम करोगे? यह प्रश्न देखो। जैसे वामन रूप से बलि जी से जाकर भिक्षा मांगते हैं। भला अखिल लोक दाता को मांगने की जरूरत है। हरि रूप में प्रकट होकर आदेश कर देते हैं। तो आज्ञा उल्लंघन करने की सामर्थ्य ना शुक्राचार्य जी में है। उनके गुरु में और ना चेला बलि में। लेकिन भगवान भिक्षुक रूप में जाते हैं।

भिक्षम दे क्या चाहते हो? अपने पग से तीन पग पृथ्वी दिया। सारांश ने शुक्राचार्य जी ने मना किया। जानते हो ये कौन है? यह कपट वपू धारण किए हुए बामन दिखाई दे रहे हैं। लेकिन यह सर्व लोक महेश्वर ईश्वरों के भी ईश्वर भगवान श्री हरि हैं। मैं कह रहा हूं फंस जाओगे मत दो। कहा अब नहीं यदि हरि भिक्षा मांगने आए तो इतना सौभाग्य जो हमें मिला वह हम चूकेंगे नहीं। दे दिया। गुरु जी ने श्राप दे दिया जा ऐश्वर्य भ्रष्ट हो जा। कोई डर नहीं, कोई चिंता नहीं। एक तरह से गुरु जी ने सर्वस्व नष्ट होने का साथ दे दिया।

ईश्वर भ्रष्ट हो जाता। कोई शिकन नहीं। संकल्प किया। समर्पित शरणागत भक्त की महिमा। क्यों? ऐसी शरणागति उच्च कोटि की बलि जी की क्यों है? क्योंकि प्रह्लाद जैसे महा भागवत के अंश हैं। विोचन पुत्र बलि प्रह्लाद पुत्र विोचन विोचन पुत्र बलि उनहीं के अंश है। प्रह्लाद जैसे महाभागवत का अंश इस कोटि की शरणागति कि भगवान ने एक में ब्रह्मलोक तक ऊपर नीचे दूसरे और कहा बांधो इसको वरुण पास में [गला साफ़ करने की आवाज़] बहुत ही चिंतनीय विषय है ये इस पर बड़ा आनंद आया सैकड़ों बार चिंतन करके अब आप सोचिए जरा इष्ट है प्रभु बांध इसको और वरुण पास में भयानक पीड़ा होती बांध दिया बोल बड़ा दानी बनता था गुरु ने मना किया उनकी बात नहीं मानी अब बोल तीसरा प कहां से पूरा करेगा बलि जी की जगह अगर कोई और होता तो बहुत नम्रता से बात करता भी तो कहता बहुत छलिया हो तुम सर्वस्व अपहरण करने के लिए ये लीला की और इसके बाद हम ही को डांट रहे हो सब कुछ दे दिया तो आपको तो नम्र होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं।

बलि जी ने आंखों में आश्रू भरकर और कहा प्रभु मैं हाथ भी नहीं जोड़ पा रहा हूं क्योंकि आपने ऐसी दशा में पहुंचा दिया। तो पहले तो मैं वचन से बोलता हूं कि मैं हाथ जोड़कर आपके चरणों में प्रणाम करता हूं। हमारा प्रणाम स्वीकार करो। मुस्कुराहट युक्त बोले और देखो जिस नपने से मांगने आए थे छोटे से वामन वो रूप धारण करो और मुझे नापो दो में संपत्ति नाप ली तीसरे में संपत्तिवान को नाथ अभी संपत्तिवान बकाया है मेरे माथे पर चरण रखो और ना निहाल कर दिया भगवान बिक गए आज भी द्वारपाल बने हुए वामन भगवान बलि जी के यहां रसातल में विराजमान है शास्त्र सा क्या हमारी शरणागति है क्या हमारा आराध्य देव के प्रति समर्पण हम आपको हृदय की बात कह रहे भगवान केवल अपनेपन से प्राप्त होते हैं भगवान केवल समर्पण से प्राप्त होते हैं।

ज्ञान से देख लो तो केवल अविद्या के त्याग से ही स्वरूप बोध होता है। ये अविद्या ही है। मैं मोर त इसी को तो माया कहते हैं। मैं और मोर तोर त माया जेह बस कीने जीव निकाया तो कैसे हम इस माया के प्रपंच से बचे तो बोले मामे प्रपद्यते माया में ताम तरतीते मेरी शरण में हो जा बोले शरणागति भी नहीं आती कैसे हो बोले मेरे संतों की शरण में हो जा उनके समीप जा प्रणपाते साष्टांग दंडवत कर नम्रता से प्रश्न कर उत्तर मिलेगा वैसा आचरण कर मेरी समर्पित वृत्ति आपके अंदर जागृत हो जाएगी बड़ा सूक्ष्म स्वरूप भगवत प्राप्ति के लिए यदि आपके हृदय में सत्संग प्राप्त विवेक के द्वारा उत्साह हो रहा है तो

यह जो पद लिखा हुआ है इसमें एक प्रेम का रहस्य प्रिया जो वर्णन कर रही है और दूसरा भारी सिद्धांत प्रेम का छुपा हुआ है जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे इतना तो याद ही हो गया होगा सबको तो जब विपरीतता आती है अपमान होता है प्रतिकूलता आती तिरस्कार होता है निष्कासन होता है तो यह बात सामने रखो जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे फिर जब आप ये सामने रखोगे तो तो तुम्हारे सामने का दृश्य बदल जाएगा जब प्रश्न का उत्तर दे दोगे तब आवेगा भावे मोह जोई सोई सोई करे प्यारे

भगवत [गला साफ़ करने की आवाज़] रसिक जी कहते हैं जो मैं चाहता हूं वैसे केली करते हैं एक क्षण के लिए नेत्रों से ओझल हो जाऊं तो भगवत भगवत भगवत ऐसे पुकार पड़ते हैं। हे चूको मत समर्पण नहीं करोगे तो छीन लेगा काल काल छीन लेगा काल के अधीन है देह ये प्राण काल के अधीन है नष्ट हो जाएंगे समर्पित कर दो नष्ट होने वाली चीज तो अविनाशी मिल जाएगा जन्म जन्मांतर से जिस महासुख के लिए भटक रहे हैं कहीं समर्पण जाकर लिखा पढ़ी नहीं करवानी है। बस आपको प्रश्न का उत्तर देना है।

और प्रश्न जब आता है तो प्रश्न के रूप में नहीं आता है। समस्या के रूप में आता है। ध्यान रखना हमारे अध्यात्म का प्रश्न ऐसे नहीं आता कि आओ बैठो उत्तर दीजिए। खड़े होइए। ये इतने प्रश्न का उत्तर मुख से दीजिए। इतने लिखित दीजिए। ऐसा नहीं होता कुछ। यहां घटना होती है। अब उस घटना में तुम्हारा ज्ञान विज्ञान खींच लिया जाएगा। अब तुम बोलो इसका उत्तर दो संसार की तरफ हो या हरी की तरफ और अगर उस समय नारद जी की तरह जैसे नारद जी का सब कुछ अपहरण हो गया तभी उनको वो राजकुमारी प्यारी लगी उस समय भी वो सोचते हैं कि हरि के समान हित करने वाला मेरा कोई नहीं और एकांत में हरि की शरण में होकर कहते हैं जेह विधि होय नाथ हित मुरा करहु सुबेगी [गाना गाने की आवाज़] दास मैं तोरा बलिहारी है आचार्य हैं भक्ति के प्रचंड माया की स्थिति में वो कह रहे हैं जे विधि होए नाथ हित मोरा करहु सुबेगी क्या बिगड़ा कुछ नहीं हे तिरस्कार अपमान निष्कासन नाना प्रकार की विपरीत परिस्थितियां उस समय तुम किस पक्ष में हो इष्ट और गुरु के पक्ष में हो या स्वजन संबंधी व्यवस्था बैंक बैलेंस अपनी संपत्ति अपनी नौकरी अपना वैभव क्या किधर हो ये उत्तर है उत्तर और एक सेकंड में कापी जांच जी जाती है आपका उत्तर आया उसी क्लास में रहोगे क्लास से तो नीचे नहीं जाओगे ना में भक्ता प्रणसति पर ऊपर भी नहीं उठ पाओगे।

अभी फिर पढ़ो फिर आएगी समस्या रूपी प्रश्न। इस मार्ग में प्रश्न के दो स्वरूप हैं। एक भयंकर लुभावना सुहावना दो। भयंकर एक प्रश्न एक लुभावना और सुहावना। इतना सुखद जो कभी सोचा था कल्पना में वह भोगने को मिलेगा। अब उस समय प्रश्न है वह भोग भोगोगे या प्रभु अगर आपको आया नहीं नाथ बचाओ बचाओ प्रभु करुणा में नहीं मैं फिसल सकता हूं प्रभु मुझे बचाओ सच्ची मानिए दृश्य ही गायब हो जाएगा वो दृश्य ही ले रहे भावना वहां हरी मिलेगी पक्का करो सदा तिन के रखवारी जिम बालक राखे महतारी पर हमें लगता है एकांत समय है भगवान की इच्छा से ही ये सब सुख सामग्री आई भोगो भाई सुख सामग्री स्वीकृति भगवान की स्वीकृति नहीं की तो गए लुभावना सुहावना प्रश्न और भयंकर प्रश्न यह दो जीवन में आते हैं।

हाथ जोड़कर प्रार्थना है सौदा बहुत सस्ता है भगवत प्राप्ति का। बस तुमको केवल उत्तर देना है और रोज ये पढ़ाई ही है। रोज पढ़ाई पढ़ाई जा रही है। जो सत्संग है ना सर्व संगोपो हेमाम समस्त आसक्तियों का त्याग कराकर भगवत आसक्ति प्रदान करने के लिए। इसलिए बहुत ध्यान में रहो। तुम भगवत प्राप्ति के लिए कदम बढ़ा रहे हो इसलिए सर्वस्व नाश हो जाए पर भगवत प्राप्ति नहीं छोड़ेंगे तो कुछ नाश ही नहीं हुआ क्योंकि जो नाशवान है वह तो केवल नाटक था माया का कुछ नष्ट थोड़ी होना है कुछ नष्ट नहीं होता कुछ भी केवल आकृति परिवर्तित होती है आग आग में जल जल में पृथ्वी पृथ्वी में वायु वायु में आकाश आकाश में भगवान का अंश भगवान स्वरूप है।

क्या नष्ट होगा? कुछ नहीं। आपका परम मंगल हो जाएगा। यदि आप प्रभु के पक्ष में रहेंगे। उपासक जीवन भर कदम अपने प्रभु के पाले में रखे उस पाले में ना रख दे पर चूक हो जाती है। अगर आप प्रभु के पाले से कदम ना हटाएं तो आपके लिए प्रभु सब कुछ बनने के लिए तैयार है। सच्ची मान लेना हमारी बात को हृदय से समझ लीजिए। आपको लग रहा है यदि मैं संसार के पक्ष में नहीं हुआ तो नष्ट हो जाऊंगा। और हम कह रहे हैं अगर प्रभु के पक्ष में हो गए तो तुम्हारा संसार भी शाश्वत हो जाएगा।

तुमको संसार में भी गोविंद ही नजर आएगा। वही शाश्वत सच्चिदानंद जैसे रस्सी में सांप भास रहा है तो ना पहले सांप था ना मध्य में सांप है ना आखरी में सांप रहेगा। सांप की जो भावना बनी वो मूल रस्सी में बनी। ऐसे ही ब्रह्म में ही यह संसार है। रस्सी में ही सांप भास रहा है। ऐसे श्री कृष्ण में ही नाना भास रहा है। म परतरम ना किंचित धनंजय मेरे सिवा हे अर्जुन कुछ नहीं है। ना पहले कुछ था ना अब कुछ है ना आगे कुछ है। तो पाला में पैर रख श्री कृष्ण के। मैं आपके पक्ष में हूं।

यह बिल्कुल सत्य समझ लीजिए। कभी भी प्रश्न आ सकता है। दिन रात कभी भी आ सकता है। आपको एक बात केवल पकड़नी हमारा पक्ष प्रभु से है। सब कुछ नष्ट हो जाए। प्रभु को नहीं छोड़ सकते। हम कैसे भी हैं कुछ नष्ट नहीं होगा। स्वयं प्रभु ही सब कुछ बने हैं। पक्का विश्वास हमारी चूक हो जाती है। भगवान को छोड़कर और मायाकृत वस्तु व्यक्ति स्थान का आश्रय ले लेते हैं। बहुत दूर हो जाते हैं इष्ट और गुरु से। प्यारी जु और प्यारे जु परस्पर एक ही तत्व है। आचार्य चरण इस पद की रचना करके एक रुचि एक दृष्टि एक प्राण एक स्वभाव वाले युगल किशोर की आंतरिक भावना का वर्णन कर रहे हैं।

और हमारे भाव में शरणागति के सिद्धांत की चरम सीमा सिद्धांत का भी वर्णन चरम सीमा जो अंदर भाव दिए अभी जिसकी चर्चा हुई और प्रेम का हमारे प्यारे जो प्यारे जो बोले प्रीतम किशोरी गोरी रसिक रंगीली जोरी प्रेम ही के रंग बोरी शोभा कही जात है प्यारी जो और प्यारे जो कहने को केवल दो है ये एक ही है। इनकी ऐसी शोभा है कि ध्रुवदास जी कहते हैं कि हमारी वाणी की सामर्थ्य नहीं कि मैं इनकी शोभा का वर्णन कर सकूं। युगल सरकार ऐसे अतुलनीय आनंद दाता ऐसा अद्भुत असीम सौंदर्य कह रहे प्रेम के ही रंग में डूबी हुई जुगल सरकार की प्रीतम और गोरी किशोरी की झोली वाणी की सामर्थ्य नहीं कि मैं इनकी शोभा इनकी महिमा इनके प्रेम का वर्णन कर सकूं।

एक प्राण एक वैश एक ही स्वभाव चाव एक बात दोहनी के मन ही सुहात है एक कुंज एक सेज एक पट ओढ़े बैठे एक एक बी दो खंडी खंडी खात है एक रस एक प्राण एक दृष्टि हित ध्रुव हेरी हेरी बढ़े चौ क्यों ना अघात है प्रीतम किशोरी गोरी ये रसिक रंगीली जोरी प्रेम ही के रंग बोरी शोभा कही जात है हमारी प्यारी जो प्यारी जो एक प्राण एक ही अवस्था एक ही स्वभाव एक ही भाव चाव एक ही बात दोनों को दोनों के मन में एक ही बात आती ऐसे हमारे युगल सरकार की जो सहज करुणामई स्वामिनी की कृपा से लीला स्थली का आश्रय और उपासना ना मिली।

अब हमको चूकना नहीं है। किसी से हम कह रहे थे भाई कुछ भी हो श्री जी को मत छोड़ना। श्री जी को छोड़ दिया तो फिर ये अथा समुद्र है। तुम निकल नहीं पाओगे। और अंदर से श्री जी को पकड़े रहे तो समुद्र ही नहीं रहेगा। सूखा ही जाएगा। बड़ी करुणामय श्री जी। श्रीपाद प्रबोधनंद जी महाराज कह रहे सर्व दुख दशा घरावरम वृंदावने प्राकृता अप्राकृता शेष विभूति रपन्यत दोनों बातें आ गई प्राकृत अप्राकृत कितना भी मुझे लुभायमान किया जाए मैं कभी प्रिया प्रीतम और वृंदावन को नहीं छोड़ सकता वही बात आ गई और सर्व दुखा दशा घोरा दे दो सारे दुख तुम्हारी सृष्टि में जितने हो ये भजन बल है भजन बल श्री जी का नाम जब जितना करोगे तो तुम भी गर्जना करने देव और दुख दो पूरी सृष्टि का दुख हमें दे दो सबको सुखी कर दो दती देव जी प्रभु

मुझे इतनी सामर्थ दो कि सबके हृदय में बैठकर दुख मैं भोगू और सब सुखी हो जाए ये भगवान के भक्त का विशाल हृदय सर्व दुख दशा घोरा प्रभु सब दशाएं दुख की हमें दे दो पर ना हम आपका चिंतन छोड़ने वाले ना आपका आश्रय छोड़ने ये पीस हड्डी नहीं होते भगवान के भक्त आजकल भक्ति जानते हो कैसे होती है ऐसे पैर रखा जाता है भक्ति मार्ग में आंच ना लगे हो अगर आंच लगी तो हटा लिया ऐसे कभी कोई परमार्थ में नहीं चलता नारायण अति कठिन हरि मिलन की बाट या में पीछे धरे प्रथम शीश दे काट ये वीरों का मार्ग है कायरों का नहीं इसलिए हिम्मत पक्की तलवार गले तक आएगी हार बन जाएगी वार नहीं कर पाएगी की तलवार और हमारे गले के बीच में नाम है।

विश्वास करो। विश्वास दुखों से डराकर माया आपको हटा देगी या भुलावे में फंसा कर हटा देगी। तो इस श्लोक में दोनों बातें कह रहे हैं श्रीपाद कि सर्व दुख दशा घोरा दे दो जितने दुख चाहो या प्राकृता अप्राकृता शेष विभूति रपना प्राकृत अपाकृत समस्त ऐश्वर्य देखो हमें लुभा कर नहीं लुभायमान होंगे चाहे दुख दे दो चाहे भोग सामग्री दे दो दोनों से मैं आपको भूलने वाला नहीं आपका आश्रय आपका चिंतन कुरत्या महारद्र उपद्रव मनुक्षणम ये देखो ये पढ़ाई है पढ़ लो फेल नहीं होगे प्रभु भेजो ऐसे उपद्रवी को भेजो जो रुद्र रूप रख के हमारा अपमान करे हमारी पिटाई करे हमें गाली दे कुरत्या महद्र मुपद्रो मनु क्षणम आप कहोगे काहे को झगड़ा विपत्ति मोल ले रहे हो नहीं नहीं पढ़ाकू जो होता है वह चाहता है कि हमसे कोई प्रश्न करे और मैं उसका उत्तर दूं।

जो पहलवान होता है वो चाहता है कोई मिले दोद हाथ करूं। उसकी भुजाओं में फड़कन होती है। ऐसे साधक ये चाहता है कि मेरा अपमान हो। मेरी निंदा हो फिर मुझे कैसा लगेगा? एक संत थे वो कभी पैसा नहीं लेते थे। पर साल में एक बार पैसा लेते थे। फिरोजाबाद जाते थे। पूज्यपाद उड़िया बाबा के वो संगी थे। काहे के लिए फिरोजाबाद जाते थे? चूड़ियां पहनने नहीं, चूड़ियां तोड़ने। चूड़ियों की दुकान लगी होती थी। इस एरिया में तो कोई उनको पीट नहीं सकता था क्योंकि पहचान वाले थे। फिरोजाबाद जाते और चूड़ियों की दुकान में खड़े होकर दो तीन लात मारते तो चूड़ियों के डेर ना और पैसा साथ रहते और जो बाबा जी देखा दो तीन चार लात मारे फिर अरे पागल आदमी चूड़ी तू डालना मार थप्पड़ मार थप्पड़ दो चार और दुकान वाले आते पीटते थोड़ी देर खड़े रहते पीटने के बाद गाली देते भगाते दूर तक भाग के जाते फिर पीटते शांत अंदर पूछते कैसे क्या हालचाल है?

बोले ठीक है कोई परेशानी नहीं। वह दुकान वाले के पास बोले भैया कितने की चूड़ी थी? बोले तुम तो पागल जैसे थे। बोले हमारा एक काम था वो हो गया। आपने बढ़िया काम किया। कितने की चूड़ी थी? बड़ी नम्रता और सभ्यता से महाराज गलती हो गई आपको। बोले नहीं नहीं आप चूड़ी के पैसे और जो एकत्रित करके गए थे तो अगर 100 500 की चूड़ी होंगी तो 10 5000 वही छोड़ के वो लोग देखते रहते कि बाबा जी है क्या चीज अपनी कसौटी के लिए स्वामी अनंग बोधा आश्रम स्वामी जी बचपन से दिगंबर और गंगा का सेवन करने वाले जहां भिक्षा होती वहां जाकर दंडता करते दो चार जब चपाटे उनके लगते तो अंदर पूछते क्या हालचाल है ठीक है यह सौभाग्य से मिलता है।

अपमान निंदा चाहिए आपको सौभाग्य सौभाग्य से मिलता है। अपमान, निंदा, तिरस्कार, विपत्ति, संकट क्यों? इसी में भगवत प्राप्ति होती है। इसी में आपकी भूमिका बदलती है। लेकिन हम ये देखते हैं जब भूमिका बदलने का अवसर आता है तो वो नीचे धम से गिर जाता है। सालों से सेवाएं होती हैं। गुरु सेवा से की, संतों की सेवा, ये सेवा, वो सेवा। अब आया नंबर उसका उत्थान के लिए फौरन जीरो नंबर में गिर गया जाके धाम में से चल फिर पढ़ाई कर फिर आना प्रश्न होगा फिर उत्तर आ गए हे भाई सबसे प्रार्थना है तुम्हें बहुत जल्दी भगवत प्राप्ति कराने के लिए सत्संग हो रहा है बस यही बात को तुम्हें पकड़ना है सच्चा साधु चाहता है कि हमारा अपमान हो हमारी निंदा हो तिरस्कार हो फिर हमें कैसा लगेगा अगर बुरा लगता है तो हमारी साधना बहुत कमजोर है और अगर मुस्कुरा के निकल जाते तो बहुत अच्छा कह रहे कुरत्या महारद्र उपद्रव

मनुक्षणम प्रतििक्षण हमारे साथ उपद्रव हो और कैसा महारद्र रूप घोर फिर भी भक्ति वृंदावी स तता मैं तत्व का चिंतन करते हुए कभी भी अपनी भक्ति को बाधित नहीं होने दूंगा तत्व क्या सर् तुम ही तो पीटने आए हो प्यारे पीट लो तुम ही गाली देने तो बिका हुआ आपका दे दो ना गाली तुम ही अपमान कर रहे हो तो आपका समर्पित तन मन प्राण है उत्तर सही तो आपका जो स्थिति है वो आगे वाले क्लास में पहुंच यहां क्लास में नहीं जाना चाहते यहां तो स्कूल से भागने के लिए हर समय पार्टी बस्ता लिए तैयार है बस तुम कहो कि हम भागे माया में सुख में जाएंगे हम कोई पढ़ाकू चाहता है हमारे प्रश्न का उत्तर हो सच्ची मानी आप भक्ति करोगे आपके जीवन में प्रश्न ही आएंगे और यही प्रश्न है जो रोज पढ़ाए जा रहे हैं बिना ऐसा नहीं कि कक्षा चार वाले को 101 का वाले क्लास का प्रश्न किया जाए नहीं रोज ये सत्संग पढ़ाया जा रहा है आप कुछ नहीं है ये स्वप्न है एक दीर्घ स्वप्न है बड़ा स्वप्न है बढ़िया दुल्हन बढ़िया लड़का बच्चा बढ़िया मकान फूले घूम रहे मारा चाटा

काल ने खत्म ना दुल्हन ना लड़का ना बच्चा अब चल आया था भगवत प्राप्ति के फस कर फिर जीवन नष्ट कर दिया तो क्या करें बाबा जी बन जाए तुम्हारी तरह नहीं हम नहीं कहते उनहीं में भगवत भावना करके सत भाव से भगवान को समर्पित हुई सात्व का मतलब होता है सात्विक निर्मल अंतकरण भगवान को समर्पित से एक एक शस भजन करते हुए अपना कोई संबंध किसी से ना मानते हुए अपना संबंध भगवत भाव से रखते हुए नाते नेह राम के मनत सुद सुश ज आनंद की अनुभूति हो जाएगी श्री राधा माधव के चरणारविंद

के आश्रित को ऐसी स्थिति प्राप्त होती कोई दुख शोक भय चिंता स्पर्श नहीं कर सकता संत वाणी जो महापुरुष सदैव भगवान के चिंतन में निमग्न है वो कह रहे हैं भयं भया नामह स्थित मनसते मम कुत्र तष् यस्मिन स्मते जन्म जराकाद भया सर्वा प्रया तात हे दोस्तों मित्रों तुम्हें कोई भी कष्ट नहीं होगा ना मृत्यु का ना रोग का ना अपमान का ना कोई भय छू सकेगा कौन सा ऐसा जादू है भाई बोले समस्त भयम भयाना हारणी स्थिति समस्त भय भय का अपहरण करने वाली एक स्थिति जागृत होती है। कैसे जागृत होती है?

अनंत महिमाशाली भगवान के नाम का जो स्मरण करता रहता है। हम अपनी कल्पना से भयभीत होते हैं। कहीं कोई भय नहीं है। जहां भय लगा है वहां हमने देखा है। हमारी कल्पना हमको भयभीत करती है। नाम जब चल रहा है तो तुम्हें भय कोई परास्त नहीं कर। भयं भया नाम हारिणी समस्त भयों का अपहरण करने के लिए नाम विराजमान है। चौथी स्टेज में कैंसर अब कभी भी शरीर छूट सकता है। पूरा तिलक लगाए मुस्कुराते हुए बात कर रहे थे। बोले बस बल है राधा नाम का। अभी कुछ दिनों से जुड़े थे। यही एकांतिक में उनका पड़ा भी है।

हे भयं भयानाहारण स्थित समस्त भयो का अपहरण हो जाएगा। विश्वास करो तुम कितने दिन पैसा कमा लोगे? कितने दिन भोग भोग लोगे? कितने दिन परिवार को संभाल लोगे? हरि गुरु का अंतर से भाव तुम्हारे नहीं जुड़ पा रहा है। तो क्या तुम अविनाशी हो? अगर आज मर गए तो तुम्हारी पत्नी तुम्हारे पुत्र तुम्हारा परिवार कौन चलाएगा? विश्वंभर भगवान। तो आज विश्वास क्यों नहीं करता भगवान पर? अपने पर क्यों ले रहा है कि अगर नहीं हुआ तो मैं बर्बाद हो गया हूं। बर्बाद तू तो है ही। आबाद कब तू हुआ था?

आबाद तो उस क्षण होता है जब उस ईश्वर का आश्रय ले लेता है और पूरा भरोसा ईश्वर पर छोड़ देता है। उसे कहते हैं आबाद होना। अहंकारी कभी अपने को कर्ता मानने वाला कभी आबाद नहीं होता। यही समय होता है उत्तर देने का। मैं आपका सर्वस्व नष्ट हो जाए तो भी स्वामी मैं आपका आपकी आज्ञा के अनुसार आपके विरुद्ध कभी नहीं चल सकता चाहे प्राण चले भगवत प्राप्ति ऐसे होती है नौकाएं कभी डूबती नहीं लड़खड़ाते नहीं छेद होती नहीं नाविक ने आज तक किसी को डूबने नहीं दिया पार कर दिया है चुपचाप बैठा रहे दौड़ क्यों मचा रहा है इधर से उधर पूरा बैलेंस बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है एक आदमी ट्रेन में दौड़ रहा था डिब्बे में ये साधु थे भाई मैं देख रहा हूं तू दौड़ रहा है क्यों दौड़ रहा है बोले

हमको बहुत जल्दी पहुंचना है अमुक स्टेशन पागल ट्रेन चल रही तू बैठ जा तू बैठ जा ट्रेन चल रही ऐसे ही तू सच्ची मान आध्यात्मिक की कोई दौड़ भाग नहीं होती आध्यात्म कोई किलोमीटरों वाली यात्रा नहीं कि बहुत भागना पसीना छुवाना है समझ समझ विवेक का मार्ग विवेक का आराम बैठ जा काू के बल भजन को काू के आचार व्यास भरोसे कुंवर के सोवत पाव प्रसाद अंतिम समय सूरदास जी का पद भरोसो दृढ़ इन चरणन केरो ये है पूरी जीवन की सा नाते नेह राम के मन जाके प्रिय राम वैदेही तज ता कोटि

बैम ज परम सनेही पुलापा नहीं चलता यहां ठोस चलेगा ठोस घनीभूत भक्ति और वो होती भक्तों के चरणों से हरि भक्तों के चरणों से जरा भी आप प्रश्नवाचक चिन्ह आपके सामने लग गया तो शरणागति में कलंक लग जाएगा नहीं भगवत प्राप्ति का माइक से ठेका लेते हैं शरणागति भगवत प्राप्ति बिल्कुल सहज सरल सब कुछ उनका था उनका है उनका ही रहेगा तुमने जो अपना मान लिया है बस वही समर्पित कराने के लिए रोज सत्संग हो रहा उसी को समझ लो। भगवान ही तुम्हारे पुत्र परिवार के रूप में है। वही ऐसा प्रश्न खड़ा करेंगे कि तुम भगवान को देखते हो या पुत्र को देखते हो।

हमें श्री भगवान की तरफ देखना है तो वह भी हो जाएगा। सब मंगल ही मंगल हो। अगर पक्ष ले लिया संसार का तो गए। नंबर से आप नीचे उतर जाएंगे। इसीलिए कह रहे अगर भय मुक्त होना सबसे बड़ा भय मृत्यु का है। जो बच नहीं सकते वह आने वाला है। तो बोले जब साधु भी मरता है, गृहस्थ भी मरता है तो भजन से क्या है? साधु मरता नहीं है। सांप जैसे अपनी केचुल छोड़ता है ऐसे साधु अपने शरीर को छोड़ता है और भगवत धाम जाता है। मरता है विषय पुरुष जन्मत मरत दुसा दुख होई इसलिए भयं भयानाप जो नाना प्रकार के भय नाना प्रकार के दुख आपको चिंता शोक उनसे मुक्त होने के लिए बार-बार कहते हैं राधा राधा राधा नाम जप करो प्रभु के आश्रित हो जाओ अपनी चिंता छोड़ो अपने परिवार की चिंता छोड़ो भगवत चिंतन करो बहुत बढ़िया जिम्मेवारी भगवान ले लेंगे सच्ची मानिए कर्तव्य छोड़ने की बात नहीं कह रहे चिंता छोड़ने की तुम्हारे चिंता करने से होगा ओवरथिंकिंग तुम्हारे सोचने से होगा कि हम ये ये महल बनेगा महल

के ऊपर अटारी चढ़े फिर ये होगा फिर वो होगा फिर होगा तो बोले हम कुछ सोचे ना नहीं राधा राधा राधा वर्तमान में राधा राधा जप जो आगे होता चला जाए उसको करता चला जा तो जीवन मुक्त हो जाएगा गृहस्थी में रहते हुए सोच हमको नहीं सोच हमारे प्रभु देंगे आगे क्या करना है वो करेंगे हम संकल्प विकल्प करके फस जाएंगे बाले क्रीदन का यवने विषय मुख अज्ञ नय शक्त च वधकम समस्थितम तस्मात बाल विवेकत्मा श्रेयसे सदा बाल यवन वृद्ध देह भाव रसता सांसारिक जन बाल्यावस्था खेल कूद में व्यतीत कर देते हैं।

हम प्रणाम करते हैं उन माता-पिता को जो अपने बच्चों को बाल्यावस्था से नाम जपना, समय से उठना, पृथ्वी माता के चरण छूना, सूर्य भगवान को नमस्कार करना, अच्छे-अच्छे आचरण सिखाते हैं। आजकल माते-पिता नहीं उठते प्रातः काल तो बच्चों को क्या उठाएं प्रातः काल? 11 बजे तक उठते हैं। बाल्य क्रीड का शक्त यवने विषय मुखा बाल्यावस्था तो खेल कूद में चली गई। जीवन वही धन्य जो भगवान से मिल जाए। वो जीवन किस काम का आजकल कह रहे हैं कि बाल्य क्रीडन का शक्त बालकों को तो क्रीडा अवस्था में ऐसा लगा दिया कि बाल्यावस्था कब निकल गई पता नहीं चला।

यौवने विषय मुखा यौवन अवस्था भोगों में फंसा दे। अरे भाई भगवान कृपा करें सबको अच्छे माता-पिता मिले। कैसे अच्छे माता-पिता जो भगवान में लगाते हैं जो सतधर्म में लगाते हैं जो सत कार्यों में लगाते बहुत बड़ा योगदान होता है माता का। फिर दूसरा पिता का सबसे बड़ा गुरु माता फिर पिता क्योंकि वही सतमार्ग में चला। गांव में एक बार नाटक आया था दिखाने के लिए वो क्या कहते हैं? नौटंकी वो सुल्ताना डाकू पूरा दिखाया गया रात भर देखा था बच्चे थे हम उस समय तो वो जब उसको फांसी की सजा दी गई तो उससे पूछा गया तुम्हारी अंतिम चाहत क्या है वो हम पूरी जिंदगी भर ध्यान रखा बोले हमारी माता को हमसे मिला दो माता को जो ही माता मिलने आई तो गले लगे और दांत से पूरी नाक काट ली माता की तो आप ईश्वर ने पूछा यह क्यों किया?

बोले मुझे आज फांसी के फंदे में चढ़ाने वाली यह है। पहली बार हमने पेंसिल चुराई थी और जब इसको कहा कि मां मैं पेंसिल चुरा के लाया तो इसने कहा बहुत अच्छा बेटा लिखने के काम आएगी। बस उसी दिन से मुझे लगा कि बहुत अच्छा कार्य है और आज मैं सुल्ताना डाकू बना और मुझे इसकी फांसी की सजा मिल रही। तो सबसे बड़ी अपराधनीय मेरी मां है जो मुझे इस्तेमाल। मां प्रथम गुरु है। आप अपने बच्चे को जैसे गर्भ से शिक्षा अगर हम प्रार्थना करते हैं गृहस्थ में वो बच्चा गर्भ में आ जाए तो सहवास बंद कर दो।

सात्विक भोजन पाओ भगवत नाम कीर्तन सुनो। भगवत कथा सुनो। महान तीर्थों का भ्रमण करो। अगर कर सकते हो। उससे तुम्हारे बालक के बहुत सात्विक संस्कार होंगे। यने विषय मुख जवानी भोगों में व्यतीत करने के लिए प्रेरणा दे दी गई और अंदर और बाहर दोनों से संयोग बने विषयों से हृदय मलन हो गया फिर कह रहे हैं आज्ञा नय असक्त्या जो अगली अवस्था आई बुढ़ापा वो तो असक्त इंद्रियां वैसे ही चंचल मन वैसे ही चंचल शरीर असक्त अब वो अंदर बैठे बैठे भोगों का चिंतन कर रहा है उसकी दुर्गति हो जाती दुर्गति इसलिए तस्मात बाल्य विवेकात्मा यतेत श्रेयसे सदा विवेकवान होकर बाल्यावस्था से वो माता-पिता धन्य है जो अपने बच्चे को शासन में लेकर ए बाल भोग बना रहे हैं पांच मिनट राधा राधा कीर्तन कर अभी तुझे पवाते हैं थोड़ा सा नाम संस्कार डालिए भगवत कीर्तन का भगवन नाम जप का बैठ पांच मिनट बैठ के कथा सुन देखो सत्संग सुन या स्वयं सुनाने लगे कोई ना कोई ग्रंथ ग्रंथ की बात संस्कार पढ़ते हैं।

गर्भ से संस्कार पढ़ते हैं। अभिमन्यु जी को गर्भ में ही चक्रव्यूह तोड़ना आ गया था। प्रह्लाद जी को गर्भ में ही परम महा भागवत बना दिया था नारद जी ने। अगर आप गर्भस्थ शिशु से शिक्षा प्रारंभ करेंगे तो कोई महान राष्ट्रभक्त महात्मा पैदा होगा। विवेक की पुरुष को चाहिए कि जिस समय बाल्यावस्था है वो पूरे जीवन की अद्भुत शैली बनाने के लिए उसको आप शिक्षा दीजिए। जितने गंदगी व्यसन है वह सब माता-पिता के आचरणों का प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। बहुत होश में माता-पिता अपना व्यवहार रखें।

नहीं बच्चे फिर वही जानते हो क्या करते हैं? बुढ़ापे में मार थप्पड़ घर के बाहर कर देते हैं कि तुमने हमको यही शिक्षा दी है आधुनिकता की भोगों की विषयों की तो उसी का सुख लो। इसलिए तदे तदो मयातम यदि जानतम तदस्मत प्रीत विष्णु स्मत्या बंद मुक्ति द मित्रों मैं तुम लोगों से प्रार्थना कह रहा हूं तुम झूठ मत समझना अगर समस्त दुख और बंधनों से छूटना है तो तुम केवल हरि स्मरण प्रारंभ कर दो उनका स्मरण करने के पश्चात कोई भी विपत्ति उसको परास्त नहीं कर सकती। हरि स्मृति समस्त विपद विमोक्षणम जितनी विपत्तियां है सबसे मुक्त करा देगी।

तुम मेरी बात मान लीजिए। तदस्मत प्रीत विष्णु स्मत्या बंध मुक्तिदा समस्त बंधनों से मुक्त हो जाओगे। मृत्यु का भय नष्ट हो जाएगा। केवल हरि स्मरण प्रयास स्मरण को स्मृतो यति शोभन पापक्षस भवती स्मरता तम अहरिशम स्मरण मात्र भगवान का परम मंगल परम कल्याण करता है क्या जाता है हरि शरणम हरि शरणम राम कृष्ण हरे राधा राधा हरे नमः जो पसंद आवे हमारे भगवान के तो अनंत नाम है। राधा वल्लभ श्री हरिवंत जो पसंद आवे खूब नाम कीर्तन खूब नाम स्मरण जो नाम स्मरण करता है समस्त मंगल समस्त कल्याण हो जाता है।

अब आप बहुत ध्यान यहां दीजिए। नाम स्मरण प्रारंभ करेंगे तो दो प्रक्रियाएं होंगी। यदि आपके पाप अधिक है तो तत्काल पाप नष्ट होना प्रारंभ हो जाएंगे। अब उसके लिए घटनाएं घटना प्रारंभ हो जाएंगी। विपत्ति दुख परेशानियां आप ऊब मत जाना और अगर आपके पुण्य अधिक है तो पुण्य शुरू हो जाएंगे। यह लाभ यह लाभ ये लाभ तो आप वो नाम जप का लाभ मत मान लेना। वो नाम जप से दुख आ रहा है ऐसा मत मान लेना। वो शुभ अशुभ दोनों को नष्ट करके आपको अखंड आनंद प्रसन्नता की तरफ ले जा रहा है।

इसलिए धैर्य चाहिए नाम जापक में। सुख दुख नाम का फल नहीं है। सुख दुख पाप और पुण्य का फल है। आनंद और प्रसन्नता ये नाम का फल है। प्रसन्नता ये ब्रह्म स्वरूप है। प्रसन्नता हर समय प्रसन्न रहना। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा जो रात दिन प्रभु का स्मरण करते हैं। उनके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रभु में अहरिश बुद्धि लगने के कारण प्रभु परम सुख समुद्र है इसलिए सुख समुद्र हो जाता है। हर समय सुख में डूबा रहता है। तापत्रयण भीतम यदे तदखिलम जगत तदा सोचे भूते द्वेषम प्राज्ञा करोत कहा ये संसार तीन तापों से जल रहा है।

तुम सोचनी पुरुषों जैसे जलने के लिए तैयार मत हो। अगर तुम बचना चाहते हो तो बच सकते हो। नाम जप के नहीं तो कैसे कैसे मृत्यु अपहरण कर रही है। बैठे हैं आराम से कुर्सी में पीछे से पूरी दीवार गिरी मर गई। एक एक क्षण में मृत्यु तो काल कवल कर रही है। और हम सोच रहे हैं सब कुछ काम हो जाए फिर एक बैठकर भजन करेंगे या तीर्थ याटन करेंगे। मृत्यु तुम्हें तीर्थ याटन और भजन के लिए समय नहीं देगी। आज अभी से भजन शुरू करो। बरा भूत द्वेष कुरती चेत सुशो मोहन व्याप्ता नीति मनीषणा यहां भजन तो करते नहीं एक दूसरे से वर कर रहे हैं एक दूसरे से छल कपट कर रहे हैं पापाचरण कर रहे हैं विचारवान कभी किसी से वर नहीं करता ये पापाचरण नहीं करता तुम महामोह से व्याप्त होकर किसी से यहां लेन देन मत कर लेना पाप का कोई ऐसा पाप कर लिया कोई वर कर लिया आना पड़ेगा त्रिभुवन में किसी से वर नहीं होना चाहिए तब तुम जीवन मुक्त होगे इसीलिए अजात शत्रु होता है भगवान का भक्त और किसी से कुछ लेना ना देना मगन रहना कर्जा ना रहे नहीं तो आकर देना पड़ेगा आना पड़ेगा कुछ ना कुछ ऐसा बन करके उसका हिसाब करके तुम्हें यहां से जाना पड़ेगा बोले जैसे हमारा जवान लड़का था।

बहुत मेहनत करके बहुत वो अपने में कम खर्चा करता था। सब हम ही को देता था क्योंकि कर्जा निपटाने आया था। और कर्जा निपटा चला गया। वो तुम्हारा लड़का थोड़ी था। वो अपना कर्जा देने आया था। और कर्जा लेने आया था। बोले बचपन से बीमार कुछ दिनों के बाद वो पधार गया तो अपने लेने आया था हिसाब किताब। बहुत होश में जीवन मुक्त होने के लिए किसी से लेना नहीं, किसी का देना नहीं। किसी से वर नहीं, किसी से मित्रता नहीं। सबसे भगवत भाव। मैं तुम सबसे आग्रह करता हूं। तुम इस असार संसार के विषयों में कभी संतुष्ट नहीं हो सकते।

मेरी बात समझ लो। चाहे जितना भोग भोग लो कभी ऐसा नहीं हो सकता। हां। अब आज के बाद मुझे नहीं चाहिए। ये ऐसे भूत के लड्डू हैं। खाओ तो परेशान, ना खाओ तो परेशान। जो नहीं भोग रहे हैं वह ललचा रहे हैं और जो भोग रहे हैं वो पछता रहे हैं। बड़ा विचित्र माया का खेल है। और जो संसार में है वो पछता रहे हैं कि हम सोचा था इसमें सुख है वो है नहीं। हमें लगता है कि सुख औरों में है। पूरा जीवन उनको पछताते चला जाता। ये भोगा ये भोगा ये भोगा। और अगर सही भजन नहीं हुआ तो पूरा जीवन इस भष में पछताते चला जाता है।

इधर उधर ताक झांक पूरा जीवन व्यर्थ चला जाता है। यह हम भ्रमण करते हुए जीवन में देखा कि अगर साधना नहीं है तो अवस्थागत इंद्रियां शांत नहीं होती। उपासक को चाहिए कि यह सोच ले कि विश्व के चाहे जितने भोग भोग लो कभी संतुष्ट नहीं होने वाली। अचित भगवान की आराधना कर लो। तो तृप्त हो जाओगे। फिर ऐसा हृदय की स्थिति हो जाएगी जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी कह पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाही को हृदय शांत हो जाएगा। अब कछु नाथ न चाह मोरे हृदय से आने लगेगा। सर्वशक्तिमान भगवान श्री हरि समस्त प्राणियों में विराजमान है।

ऐसे भावना करके जिससे मिलो पहले भगवत भाव करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन छह शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है। वही भगवान का दर्शन प्राप्त करता है। तब बड़ा आश्चर्य होता है जब एकांतिक में भगवत प्राप्त आते हैं और फिर कहते हैं मुझे भगवत साक्षात्कार हो गया। फिर कहते हैं मन में बड़ी परेशानी है। घर के लोग हमको बहुत विरोध करते हैं कि कौन सी भगवत प्राप्ति किए हैं जो शास्त्र में कहीं नहीं है। आजकल ऐसे भगवत प्राप्त हो रहे हैं ज्यादा शास्त्र में कहीं नहीं है।

बच्चों कहीं नहीं शास्त्र में ऐसी कोई शास्त्र में प्रपंच नहीं है। कोई प्रपंच नहीं। शास्त्र केवल भव बंधन के मुक्त करने के लिए यह साधनाएं बता रहा है। यह छोटी मोटी सिद्धियां घास फूस की तरह है। घास फूस की तरह है। तुम इसको बहुत बड़ा समझते हो। तुम्हारा ये नाम है। तुम वहां से आ रहे हो। तुम ये बहुत बड़ी बात थोड़ी है। दो चार छ महीने तुम्हें नियम से हम बता दें। वैसे रहो सात्विक आहार करके। अगर आपके अंदर ना आने लगे तो हमें बताना। जीवन में कभी मदिरा जबान में ना रखी हो।

मांस कभी खाया ना हो। ये अंडा मांस मछली। केवल यह तुम्हारे जीवन छ महीना में तुमको हम बता देंगे कि जिसके मन की बात चाहोगे उसके मन की जान लोगे। तुम खेल समझते हो। मंत्रों में इतनी सामर्थ पर पवित्रता पवित्रता आप अपवित्र हो रहे हैं तो इसलिए कुछ समझ में नहीं आ रहा है। अपवित्रता पर्दा डालती चली जाती है। ये ढूंढी आश्रम में शायद आप जानते हैं ढूंढी आश्रम है। बहुत सिद्ध महात्मा है। दर्शन के लिए भागे तो 9:30 बजे तक केवल दर्शन सुबह देते थे। अब गुरु आश्रम से चले तो पर विलंब हो गया।

10 बज गए हमें रास्ते में बस माता जी का मंत्र एकदम स्मरण किया हमारा जाना व्यर्थ नहीं होना चाहिए हमें दर्शन होने चाहिए आप सच्ची मानिए अकेले महाराज जी बैठे थे जे ही गए तो पहला शब्द था कि बोले आओ महात्मा इंतजार कर रहे हैं उनका कहा स्वामी जी बड़ी करुणा बोले करुणा नहीं तुम्हारी माता जी आकर के मुझे रोक लिया हमारी माता जी बोले हां हां जगदंबा जिनका तुम मंत्र पढ़ पढ़ रहे थे ऐसा मंत्रों में आप यह भव बंधन मुक्त करने तापत्रणाम यदे तदखिलम जगत तुम क्या समझते हो ये समझते हो कि ये छोटी मोटी बात अरे एक ही समय में कई जगह उपस्थित हो जाना पर्वत को भी छेद दे देना विविध प्रकार की सिद्धियां एक भी सिद्धि स्वीकार कर ले तो भगवत प्राप्ति नहीं होगी हमारे ब्रज में ऐसे ऐसे कि अखिल कोटि ब्रह ब्रह्मांड नायक पात पीछे घूमे दो चार लोगों ने मिलकर थप्पड़ दिया पीट गए रोटी मांगा खाया कोई जानता नहीं कि ये क्या है और यहां जो कोई सिद्ध दिखाने की कोशिश की तो सीमा के बाहर कर दिया गया है सीमा के बाहर यहां वो रहे जो प्रिया प्रीतम

की सिद्धि में डूबे हुए हैं और कोई चमत्कार नहीं सबसे बड़ा चमत्कार कि मन का परिवर्तन करके प्रिया प्रीतम में जिस दृष्टि गई तो श्यामा श्याम के प्रेम रंग में मतवाला कर दिया गया भूलो मत प्रिया प्रीतम की कृपा से ऐसे धाम में आए हो ऐसे सत्संग को सुन रहे हो जिससे केवल भव बंधन मुक्त होता है। ये केवल भ बंधन ये तापत्र विनाश आयए उन सच्चिदानंद प्रभु का यश है जो कानों में पहुंच जाएगा तो भगवत प्राप्ति निश्चित है। हे भाई चाहे देवता हो या दैत्य हो या मनुष्य हो या यक्ष हो या गंधर्व हो कोई भी हो मेरे प्रभु श्री हरि इतने कृपालु है कि उनके चरणों का जो आश्रय ले ले और नाम जप शुरू कर दे तो परम कल्याण हो जाता है।

भगवान को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण के कुल में जन्म लेना या देवता बनना या सदाचारी या विविध ज्ञानों से संपन्न होना या दान करना या यज्ञ करना शारीरिक मानसिक पवित्रता बड़े-बड़े व्रत ये सब पर्याप्त नहीं है। भगवान केवल प्रेम से प्राप्त होते हैं। प्रेम से वो कोई भी पुरुष नपुंसक नारवा जीव चराचर कोई अहो सुपचितो गरिया जिभ्या वर्तते नाम त्यम भले वो चांडाल है पर उसकी जिभ्या पर हरि नाम है तो त्रिभुवन वंदनीय है वो देख लो देख लो देवता दैत्य मनुष्य यक्ष गंधर्व कोई भी क्यों ना हो जो हमारे भगवान का आश्रय लेकर उनका नाम जप करता है उसका परम मंगल परम कल्याण हो जाता है प्रभु की प्राप्ति के लिए जरूरी नहीं है कि वह ब्राह्मण हो या देवता हो या वह सदाचारी हो या ज्ञान से संपन्न हो।

दानी, तपस्वी, यागिक, शारीरिक, मानसिक, पवित्रता, बड़े-बड़े व्रत इनके द्वारा भगवान मिल जाए ऐसी जरूरी बात नहीं है। भगवान सिर्फ मिलते हैं प्रेम से और प्रेम मूल या नाम है जो नाम जप करता है। उसके हृदय में प्रेम होता है। प्रेमी वो कोई भी हो भगवान उसको बहुत प्यार करते हैं। बहुत कृपा की। भगवान ने बहुत कृपा की। अगर कोई शर्त रख देते तो बड़ा कठिन होता। सिर्फ प्रेम और प्रेम सबके हृदय में है। उस प्रेम को आपने बांट दिया है संसार में उसी को समेट लो। भगवान की तरफ कर लो।

भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। इस संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु मनुष्य शरीर है। इस मनुष्य शरीर में सबसे दुर्लभ वस्तु सत्संग है। सत्संग में सबसे दुर्लभ बात भगवान की अनन्य भक्ति है। भक्ति का स्वरूप सदा सर्वत्र भगवान की भावना करते हुए निरंतर स्मरण करना। सब कुछ प्राप्त है। देख लो इस संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु मनुष्य शरीर है। मनुष्य शरीर में सबसे दुर्लभ वस्तु सत्संग है। सत्संग में दुर्लभ वस्तु श्री कृष्ण भक्ति है। भक्ति का स्वरूप सदा सर्वत्र भगवत भावना और नाम स्मरण [गला साफ़ करने की आवाज़] सब सुलभ है।

सब दुर्लभ सुलभ है। यदि अब भगवत प्राप्ति नहीं तो मतलब अभागी समझो अभाग्य जो न तरे भवसागर समाज नर पाए सुति निंदक मंदमति आत्म हनंद गति जाए तुम्हें जो लोग मारना चाहते हैं वो नहीं मार सकते तुम्हें विष देकर भी नहीं मारा जा सकता तुम्हें आग भी नहीं जला सकती तुम्हें बड़े-बड़े पर्वतों के नीचे दबाया जाए तो भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी सांप से डसाया जाए तो भी मृत्यु नहीं होगी यदि 100 100 रूप रख के मृत्यु आवे तो तो भी नहीं होगी। बस मेरी बात मान लीजिए। निरंतर नाम जप कीजिए।

भगवान ऐसी स्थिति दे देंगे कि मृत्यु तुम्हें छू नहीं पाएगी। हे भाई बस सार बाद भगवान की शरण में होकर अपने कर्तव्य का पालन करते हुए नाम जप करो। इसी जन्म में आनंद को प्राप्त हो जाओगे। प्रपंच में मत फसो। यह माया प्रपंच आपको फसाएगा। प्रश्न करेगा आप श्री जी की तरफ रहना हम बुरे हैं भले हैं जैसे अपने श्री जी के हैं पक्ष श्री जी का रखना जीत जाओगे माया घसीटेगी अपने पक्ष में आओ कबड्डी का खेल है कबड्डी का खेल ये हमको माया के पक्ष में जाना पड़ेगा जैसे पाला होता है ना तो उसमें दो शर्तें रहती है एक तो तुम्हारी सांस ना टूटने पावे स्कूल में सिखा दिखाया गया था नहीं कबड्डी कबड्डी राधा राधा राधा राधा सांस ना टूटने पावे निरंतरता नाम की बना और दूसरी बात तुम्हें पकड़ेंगे वो चार पांच मिलके पाले तक नहीं आने देंगे पाला कौन सा हमारे माई श्यामा जी को राज पकड़ेंगे कौन काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर आपको घसीटना है कैसे राधा राधा राधा राधा और आप पाले में आ जाओगे और अगर जो ही पकड़े तो खत्म राधा नाम तो आप हार गए।

जिस समय पकड़ेंगे तो आपका राधा नाम छूट जाएगा। देख लेना और अगर राधा नाम नहीं छूटा तो छयों को घसीट के पाला में ले आओगे। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर कबड्डी में जीत जाओगे। एक तरफ है माया अपने पार्षदों के साथ और एक तरफ है भक्ति भगवान के साथ। आपको अपने पक्ष से उस पक्ष में जाना है। उस पक्ष के आपके पक्ष में बोले यहां माया प्रवेश नहीं कर सकती। क्यों नहीं प्रवेश कर सकती? बोले हम भगवान के हैं। तो माया किसकी है? घास फूस की है। वो भी भगवान की है। मम माया दत्त और ममवा वंशो तुम और पाला बीच में रखा हुआ है।

दोनों भगवान के खिलाड़ी है। एक तरफ माया एक तरफ महा भागवत वो उधर भी जाएगा वह उधर भी आएगी। सांस ना टूटने पावे राधा राधा राधा खेल में जीत जाओगे जिसके मुख में नाम चल रहा है तो काम क्रोध लोभ उसको दबाएंगे गिरा देंगे फिर भी वो घसीटता चला है सांस ना तोड़े तो जीत जाएगा छयो शत्रु ऊपर लदे हैं गिर चुका है खुली सब बात समझो काम क्रोध ने गिरा दिया है कबड्डी वाला गिरता नहीं फिर भी वो घसीट रहा है राधा राधा राधा राधा बोले पाला बहुत दूर हो तो बोले इस कबड्डी में पाला ही चल के नजदीक आ जाता है पाले तक आपको नहीं पहुंचना छयो ने दाब लिया हाथ ऐसे करोगे बोलोगे राधा तो पाला ही चला आएगा और पाला समझ रहे ना वो माया भी सोचे कि बहुत बुरी जगह फंसा है हमारा पाला बोले नहीं अभी क्या जाना कैसे से पाला पड़ा तो पाला आके पड़ जाएगा आपके हाथ में।

ये हम प्रवचन नहीं कर रहे। ये हम अंदर की छाती की बात कर रहे। बस छोड़ना मत। राधा राधा नाम मत छोड़ना और अपना पाला समझना। रख पाला का है हमारे माई श्यामा को। ये अगर हम पकड़े तो हमारा काम हो गया। पक्की बात कह रहे हैं। हम ये सब सुलझ करके समझ करके कह रहे क्योंकि इस जन्म में यार भगवत प्राप्ति होनी। ऐसे साधन में लगो क्योंकि साधन के बिना तुम्हारा समर्पण पूर्ण नहीं होगा। ऐसे आज हम रोज एक नई युक्ति सोचते हैं और घुमा घुमा के उसी को समझाते हैं। हमारा कबड्डी का खेल है।

एक तरफ माया है। एक तरफ प्रभु है। हमको राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा बोलते रहना। ये हमको गिराएंगे। हम गिर जाएंगे। क्योंकि हम इतने बलवान नहीं कि छहों एक तो पूरे विश्व को नचाए हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह ये छहों जब हम पर आक्रमण करेंगे तो गिर जाएंगे नहीं। तो गिर जाएंगे तब भी ऐसे करेंगे राधा तो वो पाला जो है ना वो हमारे नजदीक आ जाएगा और हम जीत जाएंगे और हम जीत गए नहीं जीत गए तुम्हें ऐसा नहीं लगता तुम्हें भगवत प्राप्ति होगी सही बताओ हृदय से बताओ तुम्हें अच्छा नहीं ये ऐसा अनुभव होता है कि नहीं कि तुम्हें भगवत प्राप्ति हो जाएगी तुम्हें इस जन्म में श्री जी मिल जाएंगे होता है अरे जोर से बोलो यार हां ये श्री जी के बल से कहते हैं हम अंदर नहीं आता अपने तो हर समय ऐसे उत्साह रहते हैं जैसे किसी का विवाह होना

हो ना तो कैसे नहीं फुल फुल घूमता है कि ऐसे हमको लगता है कि हमारा श्री जी के पास जाना है श्री जी के पास जाना है श्री जी के पास जाना है कौन सी श्री जी जिनके पास है तन मन के बिछड़े वे चाह बढ़े दिन रहन वो आपको सच्ची कहते हैं जिनके मन में आने लगा मेरे को श्री जी के पास जाना है पास पक्का बना बनाया है तभी मन में आएगा नहीं तो प्रश्न आ जाएगा हम जैसे पापी कहां जाएंगे श्री जी के पास नहीं नहीं इस पाप को मत पकड़ना वो तो जल चुके जो गलती हो गई थी वो जल चुके क्योंकि इतना सत्संग सुन रहे हो तुम श्री जी का नाम सुन रहे हो अरे सत्संग एक बार जो सत्संग सुन लिया बहुत बड़ी बात हो गई ये सत्संग है ये भगवत आराधन है खूब हिम्मत करो अपने पाले में पहुंचना है इस बार इस बार सुकलाली अगली बार कबड्डी में पक्का हारोगे।

अगला जो आने वाला है, अब आगे समय नहीं रह गया। हम रोज इसी बात का ध्यान दिला रहे। बस भगवत प्राप्ति करनी है। भगवत आश्रित होकर निरंतर नाम जप करते हुए अपनी तरफ ना देखते हुए अपने इष्ट की तरफ देखना है। श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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