बड़ी से बड़ी पीड़ा में भी आनंद चाहिए तो यह सुनें / मोहिनी रूप में महादेव जी की आसक्ति // 29/08/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल मायाम परम शीतल माया परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नवनि निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडले युगल सरकार प्राणाराध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता यमुना रस रानी रज रानी समस्त समस्त ब्रजवासी पर प्रतिपल प्रभु की अहेतु की कृपा हमारे ऊपर बरस रही है। यह हमें अनुभव करना है। भयंकर पीड़ा भी हमारे प्रभु का प्रसाद है और अपार सुख समृद्धि भी हमारे प्रभु का प्रसाद है।
प्रसाद में कड़वा या मीठा नहीं देखा जाता। प्रसाद देखा जाता है। और प्रसाद का परिणाम होता है प्रसादे सर्व दुख नाम हानि रसते वो समस्त दुखों का नाश करके प्रसन्नता प्रदान करता है जो प्रतिपल अपने प्रभु की कृपा का आदर करते हुए निरंतर नाम जप का प्रयास करते हुए जीवन व्यतीत करता है। वह प्रभु को ऐसे प्राप्त हो जाता है जैसे पिता की संपत्ति पर पुत्र का अधिकार हो जाता है। जहां तक बने तहां तक इंद्रियों को कुमार्ग मार्ग से हटाएं। मन को प्रियाल की तरफ लगाएं। जितना प्रयास आप में है शेष तो शरणागत वत्सल युगल सरकार अपने आप देख लेंगे।
हमको जितनी बुद्धि दी है, जितना बल दिया है, उसका हम दुरुपयोग ना करें तो आगे का जो मार्ग है, आगे की जो चढ़ाई है, वो हम सहज में चढ़ जाएंगे। जैसे कोई आगे से पकड़ कर घसीट रहा हो और पीछे से ठेल रहा हो तो चढ़ने वाले को कोई प्रयास नहीं रखता। ऐसे ही गुरु कृपा इष्ट कृपा गुरु कृपा आगे आगे घसीटती जा रही है। इष्ट कृपा हमको पीछे से वो बल दे रहे हैं जिससे हम गुरु आज्ञा पर चल पा रहे हैं। बस अगर इस जन्म में प्रियालाल तक पहुंच गए जीवन की शाम होते होते तो असली घर मिल जाएगा।
अनंत जन्मों से भटक रहे हैं। इन शरीरों का कोई विश्वास नहीं। किस मिनट, किस सेकंड में, किस दिन, किस महीने, किस वर्ष में इसका अंत हो जाए। इसका अंत होने के पहले ही अनंत से हमारा संबंध हो जाए। प्रियालाल से हमारा संबंध हो जाए जो है। और उसी दृढ़ता में हम किस कैसी भी परिस्थिति हो, उसी दृढ़ता में रहे। हम प्रियाल के हैं। हर समय प्रयासरत भीषण कष्ट में भी नाम का स्मरण उस कष्ट की वेदना में भी प्रियाल के प्रति प्रेम भाव ये नहीं कि हाय हाय आप हमको इतना कष्ट दे रहे हैं।
कुछ तो करो ना खेलो आप मुस्कुराओ। हां इतनी सामर्थ्य दे दो कि आपका स्मरण ना छूटे बस क्योंकि यह जीवन है ही संघर्ष में किसी का भी जीवन हो कोई ऐसा नहीं किसी एक व्यक्ति का है ये संपूर्ण शरीर धारियों का है कभी सुख कभी दुख कभी अच्छा कभी बुरा कभी मान कभी अपमान कभी निंदा कभी स्थिति ये द्वंद घेरते रहते हैं लेकिन द्वंदातीत स्थिति भगवान का स्मरण है जितना हम नाम जप करेंगे, नाम स्मरण करेंगे, उतना ही हम द्वंदातीत हो जाएंगे। श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं जो पे जिनकी नाथ ना जाने यदि तुम्हें प्रिया प्रीतम से परिचय नहीं हुआ तो तुम्हारी जिंदगी किस काम की सच्ची मानिए पानी का बुलबुला कभी भी फूट सकता है अंजुलि को कितना कसकर पकड़ो पानी निकल ही जाएगा।
पत्ते में लटकी हुई बूंद गिर ही जाएगी। यह कच्ची मटकी का घड़ा कभी भी फूट जाएगा। इस जीवन का परम फल है प्रभु से परिचय हो जाना। प्रभु को जानना। प्रभु को कैसे जानोगे? वही जान सकता है जिसे वह जना दे स्वई जाने जे देव जनाए अब वो कैसे जनाएंगे जब आप निरंतर पुकार करोगे राधा राधा वल्लभ राधा वल्लभ राधा वल्लभ हर समय नाम जप करोगे नाम कीर्तन करोगे वाणी पाठ करो लगे रहोगे वो देख रहे हैं कि ये हमें पाना चाहता है ये हमें जानना चाहता है तो जना देंगे यदि आप प्रिया प्रीतम का नाम, प्रिया प्रीतम की शरणागति, प्रिया प्रीतम की सेवा यह सब छोड़कर के और कोई अनुष्ठान करें तो सब कर्म धर्म श्रमदायक ऐसे ही कहत सयाने जो पै जिथ न जाने जो
विवेकी पुरुष ज्ञानी जन है सयाने महापुरुष जन है उन्होंने बताया कि वह धर्म कर्म सब बेकार यदि प्रभु से परिचय ना हो प्रभु से अपनापन ना हो यह ठसक ना आवे कि हमारे माई श्यामा जी को राज तो तुम्हारे सब श्रम ही हुए कोई हाथ नहीं लगा इनका फल तो सब कर्म धर्म श्रमदायक ऐसे ही कहत सयाने जो पे जिए जानकी नाथ न जाने यदि प्रिया प्रीतम को नहीं जाना तो सारे कर्म धर्म सब श्रम ही हुए बहुत पुण्य प्रभाव से स्वर्ग जाओगे भोग भोगोगे फिर पुण्य छण मृत्यु लोक विषती मृत्यु लोक आना पड़ेगा जे सुर सिद्ध मुनि सज जोग विद वेद पुराण बखाने पूजा लेत देत पलटे सुख हानि लाभ अनुमाने जो पै जिथ न जाने वेद पुराण कहते हैं कि जितने देवता हैं, सिद्ध है, मुनश्वर हैं, योगी हैं, यह सब आपके पहले पुण्यों को लेते हैं, पूजा को लेते हैं।
इसके बाद वो आपको नाशवान सांसारिक पदार्थ देते हैं। धोखा हमारे साथ। वह नाशवान सांसारिक सुख देते हैं। सांसारिक उन्नति देते हैं। पर उसके बदले में हमारा पुण्य, हमारा अनुष्ठान, हमारा साधन वो लेते हैं। ऐसे फ्री नहीं दे देते। कोई भी देवता, कोई भी मुनश्वर, कोई भी योगी और वो देते समय यह विचार नहीं करते कि इसका लाभ होगा कि हानि नहीं होगा। जो मांगा सो दे दिया। लेकिन हमारे प्रभु हैं ऐसे कि 100 बार मांगो तो भी नहीं देंगे यदि उससे हानि होने वाली है और वो तुम्हारे पुण्य नहीं तुमसे कुछ नहीं लेंगे।
अपनी तरफ से देंगे पर शर्त है जो पे जी जानकीनाथ न जाने यदि अपने जानकीनाथ मान लिए अपने प्रियालाल मान लिए अब वो देख लेंगे। अब आपके पुण्यों की, आपके सत्कर्मों की, आपके अनुष्ठान की जरूरत नहीं है। लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो हमारे प्रभु ऐसे पूरा जगत मांगता रहता है। ऐसे नहीं देते। भगवान के दो सिद्धांत समझने होंगे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक सिद्धांत है प्रभु से अपनापन करके मांगना। वह भी आर है, अर्थार्थी है, जिज्ञासु है। भगवान ने ज्ञानी को भी भक्त कहा। चार प्रकार के मेरे भक्त है।
यदि हम प्रियालाल को अपना मानते हैं और फिर कोई बात मानते हैं तो उसमें हमारे अनुष्ठान का खर्चा नहीं होगा। हमारे पुण्य खर्चा नहीं होंगे। हमारे मालिक हैं। हम उनके नौकर हैं। हमारे स्वामी हैं। हम उनके सेवक हैं। अगर वह देने लायक वस्तु है तो देंगे नहीं तो नहीं देंगे। चाहे हजार बार मांगो। ऐसा कृपालु कौन होगा? हम लोग अज्ञानी जीव यही सोचते हैं अगर यह काम बन जाता तो सब बन जाता। भगवान ने हमारी एक नहीं सुनी। नहीं सुनी इसलिए कि काम नहीं बनता। उसके बड़े माया के विचित्र दाव हैं।
भगवान ने देखा कि ना देने में ही इसका हित है। और एक है कि भगवान से अपनापन नहीं किए। मंदिर गए भगवान से मांगे तब आपको उतना अनुष्ठान करना पड़ेगा। तपस्या करनी पड़ेगी। उतना अनुष्ठान और तपस्या के बल से जब मांगोगे तब तुम्हें वरदान मिलेगा। एक है अपनेपन का और एक है जैसे दुकान में जाकर खरीदना। तो प्रभु आप ही एक ऐसे स्वभाव वाले हैं जो अहेतु की कृपाल और इसका हित होगा कि नहीं तभी देंगे नहीं देंगे चाहे जितना नारद जी ने श्राप दे दिया लेकिन ब्याह नहीं होने दिया लेकिन जितने देवता सिद्ध मुनीश्वर और योग के ज्ञाता हैं वे सब लेकर ही बदले में कुछ देते हैं।
बाप के सिवा ऐसा किसका नाम है जो धोखे से बोल दे राधा राधा राधा अगर ऐसे ही चिल्ला पड़े राधा राधा राधा तो पाप के समूह के समूह भस्म हो जाते हैं। करोड़ों दुष्टों ने इस नाम के प्रभाव से स्थिति प्राप्त की है। करोड़ों दुष्टों ने अजामिल ब्राह्मण व्यभचारी वैश्यागामी पुत्र के बहाने नारायण बुलाया परम पद का अधिकारी हो गया व्याध हिंसक स्वभाव वाले जो राम नहीं कह सकते थे मरा मरा कहकर ब्रह्म ऋषि हो गए गजेंद्र जो मूढ़ योनि को प्राप्त था पूर्व जन्म के भजन का स्मरण आया और भगवत प्राप्त चतुर्भुज नारायण स्वरूप हो गया।
जटायु भगवान के स्मरण के प्रभाव से गीध देह तज धरी हरि रूपा हरि रूप होकर वैुंठ धाम को गया। पर उसका चिंतन बहुत गाढ़ था। जब भगवान ने देखा तो आगे पड़ा जटायु देखा सुमिरत राम चरण की रेखा भगवान के चरण चिन्हों का चिंतन कर रहा है। आ अंतिम समय है। पूरा काट दिया है दशानंद ने। पंख काट दिए। बहुत तरह से घायल कर दिया। समझ रहे हैं प्राण निकलने वाले हैं। तो जटायु जी क्या कर रहे हैं? सुमिरत राम चरण की रेखा। भगवान के चरण चिन्हों का चिंतन कर रहे हैं। ये भगवान ने देखा।
आगे बढ़ा जटायु देखा सुमिरत राम चरण की रेखा। भगवान ने दौड़ के गोद में उठा लिया। और जो अंत्यष्टि क्रिया दशरथ जी को सौभाग्य नहीं मिला वो जटायु जी को सौभाग्य मिला। अंत्यष्टि क्रिया भगवान ने की अपने शरणागत नाम जापक जटायु की करोड़ों दुष्टों का उद्धार भगवान ने किया काको नाम धोखे सुमिरत पातक पुंज पराने विप्र बध गज गीध कोटि खल कौन के पेट समाने कौन ऐसा है जो नीच पतितों को दुष्टों को उद्धार करे अपने गले से लगाए ऐसा कोई नहीं है आप हो प्रभु धोखे से भी आपका नाम निकल जाए तो आप परम मंगल करने वाले हो हे प्रभु मे से दोष दूर कर जन के आ रेनु से गुण उर आने सुमेरु पर्वत सबसे बड़ा पर्वत है सुमेरु पर्वत के समान पाप हो दोष हो अवगुण हो प्रभु मानते नहीं क्योंकि वो शरणागत है।
और कह रहे हैं रेनुक छोटा थोड़ा सा भी गुण थोड़ा सा भी भजन थोड़ा भगवान की सेवा भगवान उसे बहुत करके मांगते हैं। मेरु से दोष दूर करी जन के रेनु से गुण उानी तुलसीदास तेह सकल आस तजी भजह ना अजहु अयानी अरे अज्ञानी अभी समय है सारी आशाओं की पूर्ति हो जाएगी। तुम छोड़ो अन्य से आशा करना। एकमात्र प्रभु के दास बन जाओ। बस हो जाएगा सब कुछ। प्रभु की शरण में आ जाओ। अरे अयाने अरे मूर्ख समय क्यों नष्ट कर रहा है? कोई ऐसा त्रिभुवन में प्रभु जैसा नहीं है। प्रभु के समान नहीं।
फिर प्रभु से बढ़कर कौन होगा? एक नियम ले लो जबान से व्यर्थ बकवाद ना करके नाम जप करें। नाम का ऐसा अभ्यास कि जितना कष्ट हो उसमें और नाम चले। जब विशेष कष्ट होता है तब कष्ट की स्मृति होने लगती है। अभ्यास पुष्ट ना होने के कारण। और जब भीषण कष्ट होता है तो भगवान की विस्मृति नहीं होती। अभ्यास पुष्ट होने के कारण अभ्यास पुष्ट कर लो काहे न रसना राम ही गावह निश दिन पर अपवाद वृथाकत रट रट राग बढ़ावही काहे न रसना राम ही गावह अरे जीव तुझे बोलना ही तो है तो बोलना भगवन नाम क्यों व्यर्थ का बकवाद बोलती है रात दिन दूसरे की वार्ता दूसरे की निंदा दूसरे की चुगली क्यों पाप कमा रहे हो यह तो बहुत घातक वस्तु है उपासक को बंद कर देना चाहिए या तो प्रभु की चर्चा बोले या फिर मौन रहे किसी के विषय की चर्चा ना अच्छा ना बुरा कोई तुमसे कह रहा हो बहुत अच्छा
है भगवान की कृपा है वो बहुत बुरा है क्या लेना देना है श्री हरिवंश चल दे कुछ नहीं उसके विषय में ना अच्छा बोले ना बुरा तात सुनो मायाकृत गुण दोष अनेक गुणया उभय न देखी देखी स्व विवेक हे तात ये गुण दोष मायाकृत है उत्तम बात यह है कि ना किसी के गुण देखे ना किसी के दोष देखे क्योंकि गुण दोष देखना अज्ञान है उसमें श्री भगवान को देखे भगवान बैठे हैं तो निश दिन पर अपवाद वृथाकत रति रति राग बढ़ावह काहे ना रसना राम ही गावह हे जिभ्या तू व्यर्थ में चुगली निंदा स्तुति ये क्यों किसी की करते हो प्रभु की तरफ अपनी वाणी को लगाओ उनके चरित्र गाओ उनके नाम गाओ उनका नाम का कीर्तन करो खूब बड़ा आनंद भगवान में चित्त जुड़ जाए तो चाहे जितने कष्ट में हो बड़ा आनंद भगवान में चित्त ना जुड़ा हो तो राग द्वेष का ही चिंतन होता नर मुख सुंदर मंदिर पावन बसी जनता ही लजावह सश समीप रही त्याग सुधाकत रवि जल कहां धाव गोस्वामी जी कह रहे हैं यदि तुम अपनी जिभ्या से नाम रटने का भगवत लीला चरित्र गाने का नियम ले तो ये मुख रूपी सुंदर घर
पवित्र हो जाए। यह घर ना रह जाएगा। फिर मंदिर बन जाएगा। क्यों लज्जा वाली बातें करते हो? विषय की बातें छोड़ो। भगवान का नाम रटो जिससे तुम्हारा मुख मंदिर हो गया। चंद्रमा के पास रहते हुए भी अमृत को छोड़कर क्यों मृग तृष्णा जल के लिए दौड़ लगा रहे हो कभी प्यास नहीं बुझेगी अमृत है नाम अमृत राधा नाम सुधारम ये नाम अमृत रस इसे पियो तृप्त हो जाओगे सारी कामनाएं पूर्ण हो जाएंगी शांत हो जाएंगी और इसे छोड़कर मृग तृष्णा जल कहते जहां बूंद भर पानी नहीं केवल दूर से दिखाई देता है वो रेत में ऐसा वहां तुम दौड़ो पानी एक बूंद नहीं मिलेगा संसार के भोगों की बातें ये कलयुगी हृदय को ऐसा लगता है हर्ष होता है कि बहुत बढ़िया बातें हो रही दूसरे की निंदा दूसरे की चुगली ऐसी बातें काम कथा कल कवच चंदिनी सुनत श्रवण दे भाव ही कभी सत्संग ऐसे भाव से नहीं सुनते दो घंटा पराई निंदा पराई चर्चा व्यर्थ की बातें एक बार भी नींद नहीं आएगी और एक घंटा सत्संग में नींद आ जाएगी ये काम की कथा अश्लील बातें गंदी बातें कल कलयुग की कुचाल बड़ी विचित्र है इसमें कलयुगी जीवों का मन रूपी कुमुदनी खिलता है।
कलयुगी जीवों का वो बहुत श्रवण देकर के मन लगाकर के दूसरे की निंदा दूसरे की बातें सुनते हैं। तिनही हटक कह हरि कल की रति करन कलंक नशा सावही डांटो अपने मन को इंद्रियों को डांटो भगवन नाम रूपी अमृत ना पान करके इधरउधर की काम कथा लोक कथा व्यर्थ कथा यह कहती हैं सुनती है इनको डांटो अरे जीव विषय चर्चा करते हुए तो अनंत जन्म व्यतीत हो गए। एक बार यह जीवन हरि चर्चा में तो लगा दे। हरि यश श्रवण में लगा दे कान और हरि यस गाने में लगा दे जिभ्या को खूब नाम जप कर जिससे कानों का कलंक दूर हो जाए।
गंदी बातें सुनते हुए अपवित्र हो गए कान। जब हम भगवत चर्चा सुनते हैं तो हमारे कान पवित्र हो जाते हैं। जब हम नाम जप करते हैं, नाम कीर्तन करते हैं तो हमारा मुख मंदिर हो जाता है। जात रूप मति जुगति रुचर मणि रच रचहार बनावह शरण सुखद रवि कुल सरोज रवि राम नप राव हे बुद्धि तू युक्ति रूपी सुंदर मणियों की स्वर्णमय माला रच खूब नाम जप करने की युक्ति, भगवान की लीला कथा सुनने की युक्ति, भगवत पूजा की युक्ति, भगवत भक्तों के चरित्र सुनने की आसक्ति ये सब मणिया है। इनको पो और अपने प्राणाराध्य महाराजा अधिराज अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक परात्पर इस प्रभु श्री हरि को पहनाओ।
रोज यही पूजा करो। खूब नाम जप खूब कथा खूब कीर्तन भगवत सेवा यह सब पुष्प है ये सब मणिया है इनको पिरोया दिन भर यही करते रहे और इनको फिर प्रभु के गले में पहना तदय वस्तु गोविंदम त में समर्प कोई कामना नहीं कोई चाह नहीं बाद विवाद स्वाद तज भज हरि सरस चरित चित लावह तुलसीदास भव तरह तहु पुर तू पुनीत जस गावह तू पुनीत जस पाव यदि वाद विवाद छोड़ दे किसी से कोई वार्ता मत करो भगवत वार्ता के सिवा और कोई स्वाद के चक्कर में मत पड़ो खानपान कितने कितने दिन का मरोगे तो है ही है जाना तो
है ही है यार कब जाना है पता नहीं पर जाना है यहां सब वैसे ही पड़ा रहेगा बैंक बैलेंस रुपया पैसा पत्नी पुत्र परिवार सब ये मायाकृत है मान लो बात भजन कर लो तो कल्याण नहीं तो सब ऐसे रह जाओगे भजन मेंित अभी कहने पर नहीं लगा फिर कोई कहने वाला नहीं मिलेगा कौन कहने वाला है आप देख लो कोई तुम्हें डांटने करने वाला हो कोई तुम्हें कहने वाला हो कोई तुम पर अंकुश रखने वाला हो ना ना आप मनमानी करो इसके बाद जेल जाओ कोई बोलने वाला नहीं कोई पुचकारने वाला नहीं कोई शरण में लेने वाला नहीं कोई दुलार करने वाला नहीं अभी अवसर है निकल चलो अपनी निष्ठा बना लो शरीर स्वस्थ है तो हर समय राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री ये अमृतमय है श्री हरिवंश चंद्र शुभ नाम सब सुख सिंधु प्रेम रस धाम जाम घटी बिसरे नहीं सेवक जी कह रहे हैं मेरे को जो वृंदावन नित्य विहार रस सब कुछ प्राप्त हुआ इसी नाम से प्राप्त हुआ यदि आप घर से निकलते समय श्री हरिवंश श्री हरिवंश श्री हरिवंश श्री हरिवंश सब विंड नष्ट हो जाएंगे प्रभाव देखिए आप कैसे ये
दिव्य नाम है ये दिव्य नाम अपने आप प्रकट होकर श्रद्धा विश्वास दृढ़ता खरीद लिया खरीद लिया अब जो कुछ है वो श्री हरिवंश है। यह कृपा है इस समय वाद विवाद स्वाद तज भज हरि सरस चरित चित लाव। प्रभु के ऐसे मंगलमय पावन चरित्र है जिनको सुनकर हमारा चित्त प्रभु में आसक्त हो जाए। इसलिए स्वादिष्ट भोजन का त्याग वाद विवाद का त्याग किसी से भी हम किसी भी तरह कोई संभाषण ना करके नाम जप अधिक से अधिक बढ़ाएं जैसे हमको कल यहां से जाना है तो जल्दी से जल्दी समेट ले कीमती चीजें क्योंकि जाना है तो कीमती चीजें हैं भगवान का नाम भगवान की कथा दूसरे को सुख पहुंचाना भगवत सेवा करना ये कीमती है ये नष्ट नहीं होंगी किसी काल में नष्ट नहीं होंगी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं संसार सागर से तू मुक्त हो जाएगा।
तीनों लोकों में तेरा यश हो जाएगा। तेरी पावन कीर्ति फैल जाएगी। यदि तू वाद विवाद काम कथा लोक कथा व्यवहार कथा राज कथा त्याग करके भगवान की चर्चा भगवान की चर्चा सिर्फ भगवत प्राप्ति के लिए है। उसका उद्देश्य यदि और हुआ तो हम भगवत प्राप्ति होगी। ये बात नहीं कह सकते भगवान की कथा देखो इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा चौथ भगति मम गुणगन करे कपट तज गान कपट मतलब अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए भगवत कथा कहना ये अलग हो गया और भगवत प्राप्ति के लिए भगवत चर्चा करना भगवत चर्चा सुनना ये अलग हो गया तू तीनों लोकों को पावन करने वाला बन जाएगा।
इसलिए जीवन का परम लाभ भगवान के आश्रित होकर यह जान लेना कि हमारे स्वामी हैं श्यामा श्याम और रात दिन उनकी सेवा में उनके सुमिरन में रहना। चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण जिसमें भगवान ने समुद्र मंथन करा के दिव्य रत्नों को प्रकट किया। 14 रत्न जो कुछ दैत्यों को मिले, कुछ देवताओं को मिले और कुछ स्वयं श्री भगवान ने स्वीकार किए। आखरी में भगवत अवतार धनवंतरी जी अमृत का कलश लेकर तो अमृत का कलश देखते ही दैत्यों ने बल पूर्वक छीन लिया। भगवान सर्व सामर्थ्यशाली है।
देवता बड़े चिंतित हो गए कि जिसके लिए हम इतना प्रयास कर रहे हैं वो प्रयास तो निष्फल हो गया। भगवान तो अमृत कलश देखते ही रह गए। धनवंतरी जी और दैत्य छीन ले गए। भगवान ने कहा तुम चिंता मत करो। मैं अभी अमृत तुम्हें पान कराता हूं। इससे एक बल मिलता है। साधक जब साधना करता है तो उसकी साधना को बाधा पहुंचाने के लिए माया उसकी पहुंचते पहुंचते हटा देती है। जैसे सब कुछ हो गया। अमृत निकल आया पर पीने को नहीं मिला। दैत्य ले गए। तो भगवान की यदि आश्रित है तो कोई भी बाधा उसे परास्त नहीं कर सकती।
सीम की चाप स को तासु बल रखवार रमापति जासु भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया और स्पष्ट भगवान ने कहा कि देखो हम कुल्टा है स्वच्छंद चारणी है हम पर विश्वास ना करना और मुस्कुराकर स्त्री इतने सुलभ कटाक्ष ऐसे सुंदर ऐसे सुंदर कि भगवान शंकर मोहित हो गए थे। सोचो पास में त्रिपुर सुंदरी अंबा रहती हैं। त्रिपुर सुंदरी है। त्रिभुवन में कोई सुंदर अंबा जैसा नहीं है। अंबा पास में रहती हैं। तो भला वो सुंदरता से मोहित क्या होने वाले? पर भगवान की ऐसी सुंदरता थी कि भगवान शिव मोहित हो गए।
तो ये दैत्य बेचारे कैसे नहीं मोहित हो जाते? इन्होंने अमृत कलश हाथ में दे दिया। भगवान ने कहा उचित और अनुचित जो भी हम करें तुम हमें दोष नहीं दोगे तो हम अमृत कलश में अमृत बांटने के लिए तैयार हैं। दैत्यों ने कहा नहीं टोकेंगे। पहले भगवान दैत्यों की तरफ से गए पर नेत्रों के कटाक्ष से बांधते हुए अमृत किसी को नहीं पिलाया। पर जब देवताओं की तरफ पंक्ति में गए दोनों पीठ की पंक्तियां बैठा ली थी कि एक दूसरे को देख ना सके। बड़ी रफ्तार से भगवान पिलाते चले जा रहे तो दृष्टि दैत्यों की तरफ थी।
इतने में राहु नाम का एक दैत्य ने सोचा कि आखिरकार हो क्या रहा है? उसने देखा तुरंत मुड़ना ही था। ऐसे किया। सो सूर्य चंद्रमा के बीच में था। सूर्य चंद्रमा ने कहा प्रभु ये राहु दैत्य भगवान ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया जिससे अमृत अभी नीचे नहीं उतर पाया था तो नीचे तो मृत हो गया। ऊपर का दिव्य हो गया। अमृत पान करके वो आज भी सूर्य और चंद्रमा को पूर्णिमा और अमावस्या को ग्रहण लगते हैं। पूरा अमृत पिला दिया। देवताओं को कलश सामने फेंका दैत्यों के और अपने स्वरूप में आ गए।
अरे उनका ये तो हरि है। हमारे साथ तो बड़ा धोखा हुआ। भगवान गरुड़ को बुलाया। गरुड़ पर बैठे उड़ गए। अब देवता और दैत्यों में भारी युद्ध प्रारंभ हो गया। परम पुरुष भगवान की अहेतु की कृपा से देवताओं में कोई घबराहट नहीं थी क्योंकि अमृतपान कर चुके थे। नवीन उत्साह का संचार विविध प्रकार से दैत्यों और देवताओं का युद्ध हुआ। बलि ने कहा इंद्र जो लोग काल शक्ति की प्रेरणा से अपने कर्म के अनुसार युद्ध करते हैं वो जीत और हार यश और अपयश और मृत्यु इनकी परवाह नहीं करते।
इसी से ज्ञानी जन इस जगत को काल के अधीन समझकर ना तो विजय होने पर हर्ष से फूल उठते हैं और ना तो अबकीर्तिहार और मृत्यु होने से शोक के वशीभूत होते हैं। तुम लोग तत्व ज्ञानी नहीं हो इसलिए फूल रहे हो कि अमृत पी लिया है। तुम लोग अपने को जय पराजय आदि का कारण करता मानते हो। इसलिए महात्माओं की दृष्टि से तुम सोचनी हो। हम तुम्हारे मर्म स्पर्शी वचन स्वीकार ही नहीं करते। फिर हमें दुख क्यों होगा? प्रह्लाद पुत्र विोचन पुत्र बलि इतने महाभागवत है। सुखदेव जी कहते हैं वीरवर बलि ने इंद्र को फटकारा।
बलि की फटकार से इंद्र कुछ झेप गए। फिर वीरों का मान मर्दन करने वाले बलि धनुष को कान तक खींच खींच कर बहुत से बाण इंद्र को मारे। इंद्र का अत्यंत तिरस्कार किया। पर इंद्र मरने वाले तो है नहीं क्योंकि अमृत पी चुके हैं। भगवान ने दैत्यों को अमृत क्यों नहीं पिलाया? मेहनत करवाई। क्योंकि उनको पता है कि इनके पक्ष में मृत संजीवनी विद्या जानने वाले शुक्राचार्य हैं। एक भी दैत्य मरा नहीं रहेगा। जहां मरता है मृत संजीवनी डाल देते। देवताओं के पास ये थी नहीं क्योंकि दैत्य गुरु शुक्राचार्य जी को ये पता थे।
दूसरे को पता नहीं है। इसीलिए भगवान ने विचार पूर्वक कि इनके पास मृत संजीवनी विद्या है और इनको अमृत पिला देते हैं। दोनों समान हो जाएंगे। देवराज इंद्र और बलि का बहुत समय तक युद्ध हुआ। तष्टा की तपस्या का सार जो वृत्रासुर प्रकट हुआ था। इंद्र ने कहा मैंने वज्र के द्वारा उसको मार डाला। अनेक दैत्य जो बहुत बलवान थे किसी अस्त्र शस्त्र से नहीं मरते थे उनको मृत्यु के घाट इसी वज्र से उतार दिया वही मेरा वज्र ये नमुच नाम के दैत्य को क्यों नहीं मार पा रहा यह ब्रह्म तेज से बना हुआ वज्र इसके गले में खरोच भी नहीं कर पा रहा इंद्र बहुत विषाद करने लगे नमुच आक्रमण पर आक्रमण कर रहा है पर देवराज इंद्र का वज्र काम नहीं कर रहा तो आकाशवाणी हुई कि ये दानव ना सूखी वस्तु से मरेगा ना गीली वस्तु से इसे वर मिल चुका है।
सूखी या गीली वस्तु जो ना होगी उससे मर जाएगा। इसलिए इंद्र इस शत्रु को मारने के लिए विचार करो जो सूखी और गीली वस्तु ना हो। आकाशवाणी सुनकर के बड़ी एकाग्रता से विचार करने लगे कि कौन सी ऐसी वस्तु है जो सूखी या गीली नहीं है उससे मारा जा सके। तो ध्यान में आया भगवत प्रेरणा से फैन। फैन ना सूखा है और ना गीला है। इसलिए उन्होंने समुद्र का फेन लिया और फेन फेंका तो फेन से उसकी गर्दन कट गई जो वज्र से नहीं कटी थी। गंधर्व शिरोमणि विश्वावसु तथा परावशु गान करने लगे।
देवताओं की धुंधभिया बजने लगी। नर्तकियां आनंद से नाचने लगी। इस प्रकार वायु, अग्नि, वरुण आदि दूसरे देवताओं ने भी अपने शत्रुओं को परास्त किया। ये भगवान की लीला होती रहती है। कभी दैत्य परास्त करते, देवताओं को, कभी देवता दैत्यों को, कभी साधु जनों की विजय होती, कभी असाधु जनों की विजय होती है। पर जो भगवान की छत्र छाया में रहते हैं उनका सदा मंगल ही होता है। नारद जी आए और कहा देवता और दैत्यों आप लोग अपने अपने बल को लगाकर देख चुके हो। अब हमारी आज्ञा है कि दोनों सुख समृद्धि को प्राप्त हो और युद्ध बंद करो।
सुखदेव जी कहते हैं देवताओं ने देवर्षि नारद की बात मानकर अपने क्रोध के वेग को शांत किया और फिर दैत्यों भी दैत्यों ने भी वही बात मानी और युद्ध बंद हुआ। नारद जी एक ऐसे महात्मा हैं कि देवता मतलब कंस के पास जाते हैं तो वैसे सम्मान वसुदेव जी के पास तो कहीं भी जाए इनका कहीं तिरस्कार नहीं और सबको ऐसा लगता है मेरे हित की ही बात कहते हैं। जो मरे हुए दैत्य थे। देखो शुक्राचार्य जी ने अपनी मृत संजीवनी विद्या से उनको जीवित कर दिया। किसी के कोई घाव नहीं, कोई कटे अंग नहीं, सब स्वस्थ।
इसीलिए भगवान ने देवताओं को अमृत पिलाया। बलि जी भगवान का चिंतन करते हुए ना दुख ना सुख। जब यह सुना कि भगवान ने मोहिनी अवतार धारण किया है। असुरों को मोहित करके देवताओं को अमृत पिला दिया। तो सती से कहा देखो हम जा रहे हैं भगवान के जहां जहां अवतार होते हैं वह अवतारों के दर्शन करते हैं। अब हम इस मोहिनी अवतार के दर्शन के लिए जा रहे हैं। देवी ने कहा कि हम भी साथ चलेंगे माता जी ने तो कुछ गणों ने नित्य पार्षद जो हैं उन्होंने कहा हम भी साथ चलेंगे भगवान के दर्शन करेंगे।
भगवान गौरी शंकर और उनके पार्षद यह सब भगवान के धाम पहुंचे। भगवान मुस्कुराए सर्वांतर्यामी हैं। खड़े होकर प्रणाम किया भगवान श्री हरि ने। विराजो महाराज। आज ये शिव परिकर कैसे पूरा आगमन हुआ? कारण क्या है? महादेव जी ने कहा समस्त देवताओं के आराध्य देव आप विश्व विजय जगदीश्वर जगत स्वरूप हैं। समस्त चराचर पदार्थों के मूल कारण ईश्वर और आत्मा भी आप ही हैं। इस जगत का आदि अर्थात प्रकट करने वाले मध्य अर्थात पालन करने वाले अंत अर्थात प्रलय करने वाले आप ही हैं। आप अविनाशी हैं।
आप हमारे स्वरूप हैं। आप दृष्टादृश्य भोगता भोग भाव से रहित है। वास्तव में आप चिदानंद मात्र ब्रह्म है। प्रभु यह हमने आपका अवतार सुना है। मोहिनी अवतार। बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को सुख देने वाले अवतार तो हमने प्रभु देखे लेकिन दैत्यों को मोहित करने वाला यह अवतार श्री सुखदेव जी कहते हैं जब भगवान शंकर ने ऐसा कहा तो भगवान श्री हरि हंस दिए और बोले रहने दो इस चक्कर में मत पड़ो और अवतार अलग बात है यह हमने मोहित करने वाला अवतार लिया था। शंकर जी अमृत का कलश दैत्यों के हाथ में चला गया था।
दूसरा कोई उपाय नहीं था। देवताओं का काम बनाने के लिए कौतहलवश वो महा सुंदर रूप मैंने धारण किया कि वो अपने आप कलश हमारे हाथ में दे दिए। देव शिरोमणि वैसे योगी पुरुष को इस रूप को नहीं देखना चाहे। पर आप देखना चाहते हैं। मैं दिखाऊंगा। परंतु यह आप में भी उत्तेजना पैदा कर सकता है। पहले बता दिया आप में भी उत्तेजना पैदा कर सकता है। संकल्प प्रभुदयम काम संकल्प आपके अंदर उदय हो सकता है। भगवान शंकर ने कहा प्रभु आप ही तो है ना कोई और तो नहीं है ना हम देखना चाहते हैं बस जहां भगवान विराजमान थे वहां से अंतर्ध्य तो जब कोई सामने हो और आंखों से ओझल हो जाए तो इधर उधर दृष्टि जाती है तो देखा कि एक गेंद उछालते हुए वही 141 वर्ष की अवस्था की नव किशोरी होती बड़ा सुंदर रूपवन भात भांत के ऐसी लताएं वृक्ष फूले हुए झूम रहे हैं।
लालाल कोपले और गेंद उछाल रहे हैं भगवान और गेंद उछालते समय वस्त्र इधरउधर हो रहे हैं। कमर की कर ध्वनि कर की चूड़ी और श्री चरणों के नपुर ये ध्वनि भी कर रहे हैं। अब महायोगी भगवान शिव को मोहित करना चाहते हैं तो फिर श्री चरण एकदम लाला लाल सुकुमार नवीन पल्लो की तरह और वो ठुमुक ठुमक कर चाल बड़े लीला बिहारी धीरे से गेंद ऐसी मारी जो महादेव जी के नजदीक जाए उठाने के लिए गए वो और ये भूल गए महादेव जी के अभी हरि से कहा था मोहिनी रूप दिखा देना उनको यह नहीं पता ये मोहिनी रूप भगवान का गेंद उठाया और भाग पड़े।
[खांसने की आवाज़] महादेव जी की तरफ तिरछी नजर से देखा मानो बुला रहे हैं। देख लो शब्द स्पर्श रूप रस गंध विजय होते हैं जो महादेव की उपासना करते हैं। अरे ये तो योगेंद्र मुनिंद्रों के गुरु हैं। इतने आसक्त हो गए मोहिनी में कि त्रिपुर सुंदरी गौरी भगवती पास में विराजमान है। देखा भी नहीं भाग पड़े। और विभल हो गए। गण भी आश्चर्यचकित हो गए कि क्या लीला कर रहे हैं महादेव। बस महादेव जी के लगा कि एक बार गले से लगा ले। एक बार गले से लगा ले। मोहिनी उतना ही भागती थी जिसमें महादेव जी को लगे कि मैं अभी पकड़ लिया।
अब धीरे-धीरे वायु ऐसी जोर की आई कि साड़ी उड़ गई। क्योंकि योगेंद्र मुनिंद्रों के गुरु अगर थोड़ा भी अवसर मिला तो तुरंत ज्ञान जागृत हो जाएगा। करधनी खुल गई और साड़ी उड़ गई। अब तो मोहिनी भगवान का एक एक अंग इतना सुंदर जहां आंखें जाती वही मन रम जाता। भगवान शंकर अत्यंत आकृष्ट हो गए और मोहिनी भी ऐसी हावभाव प्रीति दिखाने लगी कि वह भगवान शंकर पर आसक्त हैं। वो भगवान मोहिनी पर आसक्त हैं तो मोहिनी भगवान शंकर जी पर आसक्त हैं। महाज्ञान समुद्र भगवान शंकर मोहिनी के हाव भाव से लज्जा छोड़कर के दौड़ पड़े।
मोहिनी का आलिंगन करने के लिए ऐसे भाग रहे हैं जैसे कुलवती कोई स्त्री लज्जावान भाग रही हो। ऐसे भगवान भाग रहे हैं। छूना मत ऐसे चेष्टा करते हुए और एक दौड़ती है एक वृक्ष की आड़ में होकर फिर महादेव की स्थिति देखती है। और हंसने लगती है। फिर इशारा करती है। भगवान शंकर बार-बार सावधान होना चाहते हैं। लेकिन देख लो अत्यंत वेग से दौड़ के मोहिनी का जोड़ा पकड़ा और हृदय से लगा लिया। जे भी हृदय से लगाया तो शांति हो गई क्योंकि भगवान ही तो है ना परम शांत। अब वो बाल खुल गए थे।
जब भुज पास हटाया तो देखा हरी जब भुज पास किया तो मोहिनी और जब भुज पास हटाया बोले प्रभु गजब का रूप गजब का रूप ऐसा अवतार तो हमने कभी बोले मना कर रहे थे ना कि योगियों के लिए नहीं है ये तो भोगियों को आकर्षित करने वाला है भगवान श्री हरि उन्होंने कहा देव शिरोमणि भगवान ही तो है ना कोई दूसरी स्त्री थोड़ी है कि वो कामसक्त हो गए। भगवान ने कहा श्री हरि ने देव शिरोमणि मैं यह देख रहा हूं कि यह सब हुआ पर आपकी निष्ठा में कोई फर्क नहीं है। यह बड़े आनंद की बात है कि मेरी अपार माया का प्रयोग आपके ऊपर हुआ।
ऐसे हावभाव किए पर आपकी स्थिति वही रही। स्थिति में आप यह तो भगवान ही देख सकते हैं ना स्थिति नहीं बिगड़ी लीला बाहरी हुई पर स्थिति लीला बाहरी इसीलिए हुई कि हरि ही है वो जान रहे हैं शिव जी कि हरि है तो हरि और हर में कोई अंतर थोड़ी है। यद्यपि मेरी ये गुणमय माया बड़ों बड़ों को मोहित कर देती है। फिर भी अब ये आपको कभी मोहित नहीं करेगी। क्योंकि सृष्टि आदि के लिए समयसमय पर उसे शोभित करने वाला काल मैं ही हूं। इसलिए मेरी इच्छा के विपरीत यह रजोगुण आदि की सृष्टि माया नहीं कर सकती।
जिस पर मैं कृपा करता हूं उसे माया परास्त नहीं कर सकती। श्री सुखदेव जी कहते हैं परीक्षित इस प्रकार भगवान श्री हरि ने भगवान शंकर का सत्कार किया। तब उनसे विदा लेकर के एवं उनकी परिक्रमा करके वे अपने गणों के साथ कैलाश को चले गए। भरतवंश शिरोमणि भगवान शंकर ने बड़े-बड़े ऋषियों की सभा में अपनी अर्धांगिनी सती देवी से अपने हरि रूप की अंशभूता मायामई मोहिनी का इस प्रकार प्रेम से वर्णन किया था कि देवी तुमने देखा परम पुरुष परमेश्वर भगवान श्री हरि की माया देखो यूं तो मैं समस्त कला कौशल विद्या आदि का स्वामी और स्वतंत्र भगवान हूं हूं।
फिर भी उस माया से विवश होकर मोहित हो गया। फिर दूसरे जीव परतंत्र हैं। वह मोहित हो जाए। तो इसमें कौन से आश्चर्य की बात है? जब मैं 1000 वर्ष की समाधि से उठा था तब तुमने मेरे पास आकर यह प्रश्न किया था कि तुम किसकी समाधि लगाते हो? तो यह वही साक्षात आत्म स्वरूप सनातन श्री हरि हैं जिनको मैं समाधि में ध्यान के द्वारा उनके रूपानंद का पान करता रहता हूं। ना तो श्री हरि को काल ही सीमा में बांध सकते हैं और ना वेद ही वर्णन कर सकते हैं। इनका वास्तविक स्वरूप अनंत और अनिर्वचनी है।
श्री सुखदेव जी कहते हैं परीक्षित मैंने विष्णु भगवान के ऐश्वर्य पूर्ण लीला तुमको सुनाई जिसमें समुद्र मंथन के समय अपनी पीठ पर मंदराचल धारण करने वाले भगवान का वर्णन हुआ। जो पुरुष भगवान का ये समुद्र मंथन मोहिनी अवतार धारण करना भगवान शंकर का मोहिनी रूप में आसक्त हो जाना ये चरित्र सुनेगा वो भगवान की माया से मोहित नहीं होगा। यह लीला संसार के समस्त क्लेश मिटाकर बिना परिश्रम के भगवत प्राप्ति कराने वाली है। यह जो लीला सुनी आपने चाहे भगवान के चरणों की शरण ग्रहण करें या ना किए हो कोई भी सुने चरित्र भगवान के तो भगवान के प्रति शरणागति का भाव आ जाएगा और बिना परिश्रम के उसका भजन बनने लगेगा और भगवान की उसको प्राप्ति होगी।
आज यही विश्राम करते
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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