Janmasthami Special - भगवान श्री कृष्ण के जन्म की अद्भुत कथा //05/09/26
पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
यह प्राचीन काल की बात है द्वापर की। अब चल रहा है कलयुग। यदुवंशी राजा थे उस समय सुरसेन। मथुरा पुरी में ही वास करते थे। मथुर मंडल मातुर मंडल समस्त ब्रज 84 कोष और सब जो मथुरा की सीमा के अंतर्गत आते हैं उनका राज्य शासन करते थे। मथुरा ही समस्त यवंशियों के नरपतियों की राजधानी हुआ करती थी। और उस समय के राजा थे सुरसे मथुरा में सर्वदा श्री हरि विराजमान है। सेवक जी महाराज ने कहा मथुरा नित्य कृष्ण को वास निश दिन श्याम न छा पास तास सकल लीला कही मथुरा में नित्य भगवान विराजमान है।
मथुरा भगवान यत्र नित्यम सनहितो हरि भगवान हरि मथुरा में नित्य विराजमान है। ऐसा शास्त्रों में वर्णन है। सेवक जी ने भी वर्णन किया है। मथुरा नित्य कृष्ण को वास श्री कृष्ण का नित्य सानिध्य माना गया है। [गला साफ़ करने की आवाज़] सूर्य के पुत्र वासुदेव जी बहुत ही सुंदर सुशील और भगवान के प्रेमी महात्मा थे। ऐसा सुंदर वर देख के अपनी पुत्री देवकी का विवाह वसुदेव जी के साथ किया। बहुत खूब आनंद पूर्वक हुआ क्योंकि पिता सर्व सामर्थ्यशाली है। खूब ऐश्वर्य दिया। हाथी, घोड़े, रथ, दिव्य दासियां और सब वैभव विवाह हुआ तो देवकी के साथ रथ पर सवार हुए वासुदेव जी और अपने निवास स्थान घर को जाने को उग्रसेन का पुत्र था कर।
इसने विचार किया मेरी छोटी बहन है। चचेरी है अभी तो क्या हुआ? इसको स्वयं हम विदा करें। बड़े भाव से उसने सारथी को उतार दिया। और रथ को स्वयं हाथ में लगा। रथ को स्वयं हाक रहा था। देवकी वसुदेव जी रथ पर विराजमान थे। सैकड़ों सोने के बने हुए रथ दहेज में दिए गए थे। सो साथ में चल रहे थे। देवकी के पिता थे देवक। उनका अपनी पुत्री पर बड़ा प्रेम था। तो कन्या को विदा करते समय उन्होंने सोने के हारों से अलंकृत 400 हाथी 15,000 घोड़े 1800 [गला साफ़ करने की आवाज़] सोने के रथ और सुंदर सुंदर वस्त्र आभूषणों से विभूषित 200 सुकुमारी दासियां दहेज में ली सुकुमारी वो जीवन में ब्याह नहीं करेगी केवल देवकी जी की सेवा में रहेंगे विदाई हो रही है वरधु के मंगल के लिए सात शंख तही मृदंग धुंधिया बजने लगी मार्ग में जिस समय घोड़ों की लगाम पकड़ कर कंस रथ आ रहा था उसी समय आकाशवाणी हुई अरे मूर्ख जिसको तू रथ में बैठाकर लिए जा रहा है उसकी आठव गर्भ की संतान तुझे मार डालेगी।
आकाशवाणी आकाशवाणी सुनते ही कंस बड़ा पापी था। वो तो न जाने कैसे भाव आ गया कि वो भाग रहा था। नहीं तो महाबली और पापी दिमाग का था। [गला साफ़ करने की आवाज़] जो पापी दिमाग होता है उसमें विचार नहीं होता। वो इतना दुष्ट था कि उसकी दुष्टता का वर्णन नहीं किया जा सकता। दुष्ट की दुष्टता की सीमा होती लेकिन कंस की दुष्टता की सीमा नहीं थी। भोजवंश का कलंक था। आकाशवाणी सुनते ही रथ से कूद पड़ा। तलवार खींच ली। और अपनी बहन देवकी के बाल पकड़ लिए और उसे घसीट करके मारने के लिए तैयार हुआ।
क्रूर तो था ही पाप कर्म करते कठोर और निर्लज भी हो गया था। वासुदेव जी ने देखा ये तो तुरंत मार देगा देवकी को। अभी ब्याह हुआ है तो वासुदेव जी ने कहा शलागनीय गुर भवान भोस कथ भग [गला साफ़ करने की आवाज़] स्त्री मुवा कर्मणी रुको रुको रुको राजकुमार कर आप भोज वंश के होनहार वंशधर है अपने कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले हैं। बड़े-बड़े शूरवीर आपके गुणों की सराहना करते हैं। इधर एक तो स्त्री, दूसरी बहन, तीसरी अभी विवाह का शुभ अवसर। ऐसी स्थिति में आप कैसे मार सकते हैं?
बीरबल भयभीत क्यों हो रहे हो? जो जन्म लेते हैं उनके शरीर के साथ मृत्यु होती है। शरीर के साथ ही मृत्यु लग जाती है। कब मार दे कोई भरोसा नहीं। आज हो या 100 वर्ष के बाद जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित होती है। जब शरीर का अंत होना ही है तो पाप कर्म क्यों करें? जब शरीर छूटता है तो फिर अपने कर्म के अनुसार दूसरी योनि में जाता है। पहले शरीर को छोड़कर के विवश होकर उसे दूसरी योनि में जाना पड़ता है। जैसे चलते समय मनुष्य एक पैर जमा कर ही दूसरा पैर उठाता है। जैसे जो किसी अगले तिनके को पकड़ लेती तब पिछला तिनका छोड़ती है।
ऐसे ही मनुष्य शरीर छोड़ते ही दूसरे शरीर को पकड़ लेता है। पहले दूसरा शरीर निर्माण होता है भाव में। जैसे उसे पक्षी बनना है तो पहले पक्षी का चिंतन होगा तभी शरीर छूटेगा। फिर वो पक्षी बनेगा। जैसे कोई पुरुष जागृत अवस्था में राजा केश्वर को देखकर इंद्रा आद केश्वर को देखकर उसकी अभिलाषा करने लगता है। उसका चिंतन करते करते उनहीं बातों में घुल मिलकर के एक हो जाता है और अपने को स्वप्न में राजा या इंद्र के रूप में अनुभव करता है। अपनी दरिद्रा अवस्था को भूल जाता है।
ऐसे ही वो जो चिंतन होता है अंतकाल में वो उसी स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। जीव का मन विकारों का पुंज है। देहांत के समय अनेक जन्मों के संचित प्रारब्ध कर्म और उसकी वासना उसके दिमाग में घूमती है और वो माया के द्वारा रचे हुए शरीरों में जिसमें आसक्त हो जाता है वही शरीर धारण कर लेता है। जैसे सूर्य, चंद्रमा चमकीली वस्तुएं जल से भरे हुए घड़ों में या तेल आदिल पदार्थों में प्रतिबिंबित होती है। हवा के धोखे से उनके जल आदि की डोलने पर सूर्य चंद्रमा का प्रतिबिंब भी हिलता डुलता जान पड़ता है।
ऐसे ही यह शरीर प्रतिबिंब है। जीवात्मा सूर्य चंद्रमा की तरह जैसे वो आकाश में ऐसे निर्मल रहता है। अपने स्वरूप के द्वारा स्वरूप को भूल करके अज्ञान रचित चिंतन करके जिन शरीरों का चिंतन किया उसी में अपना कर्म पन मोह कर लेने के कारण उसे बार-बार जन्मना पड़ता है। बार-बार मरना पड़ता है। इसलिए महाराज जो कल्याण चाहता है, पहली बात किसी से द्रोह ना करे। क्योंकि जीव कर्म के आधीन हो गया है। किसीसे भी द्रोह करेगा तो उसको इस जीवन में भय और मरने के बाद परलोक में भयभीत होना पड़ेगा।
जीते जी भयभीत और परलोक में भय। अगर किसी से दुश्मनी करेगा, किसी से द्रोह करेगा, किसी से वर करेगा तो इस जीवन में भय और परलोक में भय। कंश ये आपकी छोटी बहन अभी बच्ची और बहुत दिन है। ये तो आपकी कन्या के समान है। इस पर अभी अभी विवाह हुआ है। विवाह के मंगल चिन्ह इसके शरीर से नहीं उतरे। ऐसी दशा में आप धीर सर पुरुष को इस बेचारी का व हत्या नहीं करनी चाहिए और बाल पकड़े तलवार खींचे हुए खड़ा वासुदेव जी उसे उपदेश से शांत कर रहे हैं। श्री सुखदेव जी कहते हैं परीक्षित जिस प्रकार वासुदेव जी ने बड़ी प्रशंसा इसे साम नीति कहते हैं।
कि अपने दुश्मन को श्याम नीति के द्वारा वश में करना। [गला साफ़ करने की आवाज़] श्याम नीति माने मधुर वचनों के द्वारा प्रशंसा के द्वारा उसे राजी कर देना। कंस को बहुत समझाया। वो क्रूर राक्षसों का अनुयाई हो रहा था। इसलिए उसने घोर संकल्प नहीं छोड़ा और वैसे ही बाल पकड़े हुए देवकी को मारने के लिए उद्यत है। वसुदेव जी ने विकट हट देखकर कंस का ये विचार किया कि किसी प्रकार ये समय टाल देना चाहिए। तब वे इस निश्चय पर पहुंचे कि बुद्धिमान पुरुष को जहां तक उसकी बुद्धि और बल साथ दे मृत्यु को टालने का प्रयत्न करना चाहिए।
प्रयत्न करने पर वो ना टल सके तो फिर प्रयत्न करने वाले का कोई दोष नहीं जैसा प्रारब्ध ऐसा नहीं है कि कोई मारने आ रहा हो गला प्रयास करना चाहिए अपने को बचाने का। और जब ना बचा पावे तो फिर भगवान की जैसी इच्छा। इसलिए इस मृत्यु रूपी कंस को जो भय हुआ आकाशवाणी से कि आठवें पुत्र से तुम्हारी मृत्यु होगी तो मैं इसको वचन दे दूं कि जो जो पुत्र होगा वो मैं तुम्हें प्रदान करूंगा। मैं अपने पुत्रों को दे देने की प्रतिज्ञा करूं और इस दीन देवकी को बचा लूं। अब मेरा लड़का होगा तब वो कंस को मार देगा या ये कंस मर जाएगा उस समय क्या होगा इस समय हमें वचन दे देना चाहिए प्रतिज्ञा करनी चाहिए और देवकी को बचा लेना चाहिए ये तो पक्का है आकाशवाणी सत्य ज्योति उल्टा मेरा लड़का ही इसको मारेगा पर इस समय मैं वचन दे देता हूं विधाता के विधान को पार पाना बहुत कठिन है।
कभी-कभी मृत्यु सामने आकर टल जाती है और कभी-कभी दूर टली हुई मृत्यु भी आकर के मार देती है। जैसे भर में आग लगती है तो कहो आसपास की सब लकड़ी जल जाए। बीच की लकड़ी बची रहे। कुछ पता नहीं आसपास के सब नष्ट हो गए। एक बचा रह गया। क्योंकि मृत्यु जिसकी नहीं है उसे कोई मार नहीं सकता और जिसकी मृत्यु है उसे कोई बचा नहीं सकता। इस बातों को केवल अदृष्ट परमात्मा ही जानता है। वैसे ही किस प्राणी की कब मृत्यु हो जाएगी? कौन सा शरीर नष्ट हो जाएगा? किस हेतु से नष्ट होगा? इस बात का पता लगा लेना बहुत कठिन है।
अपनी बुद्धि के अनुसार ऐसा निश्चय करके वासुदेव जी बहुत सम्मान के साथ पापी कंस की बड़ी प्रशंसा करते हुए बात कही। यद्यपि वसुदेव जी को बहुत अंदर पीड़ा हो रही थी जैसे नीच पापी की प्रसन्नता पर इस समय देवकी की रक्षा करनी है। ऊपर ऊपर से मुख प्रसन्न करके हंसते हुए कहा वसुदेव जी ने कहा सौम्य कंश आपको देवकी से कोई भय है? देवकी से तो कोई भय है नहीं। क्योंकि आकाशवाणी ने कहा इसका आठवा पुत्र मारेगा। भय है पुत्रों से आठव की बात क्या? प्रथम से लेकर जितने पुत्र होंगे वो मैं सब आपको दे दूंगा।
प्रतिज्ञा करता हूं। आप देवकी को छोड़ दीजिए। परीक्षित कंस ये पक्का जानता था कि वासुदेव जी कभी झूठ नहीं बोलते। पापी पुरुष को भी विश्वास था। इतने बड़े महात्मा वसुदेव जी थे कि कंस को विश्वास था कि वसुदेव जी प्राण दे सकते हैं लेकिन झूठ नहीं बोल सकते। जो कुछ कहा वो बात की संगत है। मुझे देवकी से कोई वैर नहीं। मुझे तो आठव पुत्र से वर है और ये एक से लेकर आठव तक दे देंगे। इसलिए उसने अपनी बहन देवकी के केस छोड़ दिए। मारने का विचार छोड़ दिया। वसुदेव जी बहुत प्रसन्न हुए और कंस की वंदना करते हुए प्रशंसा करते हुए देवकी को साथ लिया और अपने घर चले आए।
देवकी जी बड़ी सार्थी थी। जो भगवान की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे। उनकी महिमा का क्या वर्णन करें? उनके शरीर में सारी देवी शक्तियां विराजमान थी। अब एक वर्ष होने पर गर्भ रहा और पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र का नाम था कीर्तिमान। वसुदेव जी ने उसे लाकर कंस को दे दिया। ऐसा करते समय वसुदेव जी को कष्ट तो बहुत हो रहा था कि प्रथम पुत्र है और वह भी इस राक्षस को अर्पित कर रहे हैं। लेकिन सत्यवान पुरुष अपने वचन से बढ़कर कुछ नहीं मानते। प्राण जाए पर वचन में जाए।
प्राण चाहे चले जाए अगर हमने वचन दे दिया तो फिर वैसे तो अपने पुत्र को लाके कंस को दे दिया। जो दुष्ट पुरुष है वो क्या नहीं कर सकते? सब कुछ बुरा कर सकते हैं। और जो संग्राम पुरुष है वो बड़े से बड़ा कष्ट सह भी सत्य नहीं छोड़ता। जो ज्ञानी पुरुष है उसको किसी की अपेक्षा नहीं होती। जो नीच पुरुष है वो कोई भी बुरा काम कर सकता है। जो जितेंद्र है भगवान का भक्त है वो सब कुछ त्याग सकता है। कंस ने देखा कि वासुदेव जी का अपने पुत्र के जीवन और मृत्यु में समान भाव है।
वासुदेव जी सत्य में पूर्ण निष्ठावान है। वो बहुत प्रसन्न हुआ। हंसकर बोला वसुदेव जी ले जाओ इस बालक को। भगवान की लीला बड़ी विचित्र होती। कहा ले जाओ इस बालक को। इससे कोई भय नहीं। क्योंकि आकाशवाणी ने ऐसा कहा था कि देवकी के आठव गर्भ से उत्पन्न संतान के द्वारा मेरी मृत्यु होगी। आठवां लाना इसे ले जा। वासुदेव जी ने कहा ठीक है उस बालक को लेकर लौट कर पर प्रसन्न नहीं है क्योंकि जानते दुष्ट है कभी बुद्धि बदल सकती इसकी उन्हें मालूम था कंस बड़ा पापी है उसका मन उसके हाथ में नहीं वो किसी क्षण बदल सकता है इसलिए कुछ नहीं हुए नारद जी ने देखा कि ये तो बड़ा दयावान बन रहा है और दया करेगा तो फिर भगवान के आने में विलंब होगा पापी का घड़ा भरे जल्दी तो भगवान का अवतार हो।
देवर्षि नारद जी आकर के बोले ये क्या कर रहे हो? तुम्हें पता है ब्रज में जितने भी नंदा आद गोप है उनकी स्त्रियां है वसुदेव आदि वृष्टिवशी यादव देवकी आदि यदुवंशी की स्त्रियां नंद वसुदेव सजाती बंधु सगे संबंधी ये सब बड़े बड़े देवता अवतार लिए हैं और ये सब दत्यों के कारण ढाल बढ़ गया है। इसलिए देवताओं को पहले भेजा गया है दैत्यों के वध की तैयारी के लिए। ये सब देवी देवता आए हैं और तुम्हारे वध की तैयारी की है। सब देवता जितने हैं वो सब तुम्हारे वध की तैयारी के लिए जन्म लिए हैं।
बड़े-बड़े पापियों का नाश करने के लिए स्वयं भगवान श्री हरि आ रहे हैं। देवर्षि नारद इतना कह के चले गए। कंस को निश्चय हो गया कि यदि वशी देवता है तो अवतार भगवान विष्णु लेंगे, हरि लेंगे और मुझे मारने के लिए पैदा होने वाले हैं। इसलिए उसने तुरंत आदेश किया देवकी वसुदेव को बंदी बना लिया जाए। घोर कारागार में हथकड़ी और बेड़ियों से जकड़ दिया गया और राक्षसों का पहरा लगा दिया गया। और जो प्रथम संतान वापस की थी उसे बुलाया और पैर पकड़ कर पत्थर में पटक कर उसे मार डाला।
अब जो जो वसुदेव जी के संतान होती हर बार उसे शंका होती कि कहीं भगवान ही तो नहीं आ गए इस रूप में और हर बच्चे को मार डालता। परीक्षित पृथ्वी में प्राय देखा जाता है कि अपने प्राणों का पोषण करने वाले जो राजा लोग होते हैं जो स्वार्थी लोग होते हैं अपने माता पिता भाई बंधु इष्ट हितषी मित्र सबकी हत्या करने में संकोच नहीं करते जो स्वार्थी लोग होते हैं कंस को याद आया कि मैं कालनेमी असुर था और मुझे श्री हरि ने ही मारा था अ उसने यदुवंशियों से घोर वैर ठान लिया। कंस बड़ा बलवान था।
उसने यदु भोज और अंधक वंश के अधिनायक अपने पिता उग्रसेन को अपने पिता को कैद कर लिया और जेल में डाल दिया और स्वयं राजा बन के वो राज्य करने लगा। परीक्षित एक तो कंस स्वयं बड़ा बलवान था। दूसरे मगध नरेश जरासंध की उसकी बड़ी सहायता थी। क्योंकि जरासंध उसकी पुत्रियों को कंस के साथ जो ब्याह हुआ तो ससुर हुआ। जरासंध ससुर था। बड़ा बलवान जरासंध था और बड़ा प्रताप था। जरासंध का बड़ा प्रताप था। और कंस वैसे ही पापी और उसको जरासंध का बड़ा सहयोग मिला। और उसके साथी थे प्रभासुर बकासुर चाणुवर दगासुर मुष्टिकासुर द पूतना केसी धेनुकासुर बाणासुर भमासुर जितने पृथ्वी के बड़े-बड़े राजा थे सब कंस के मित्र थे और सब राक्षस थे आसुरी स्वभाव के थे सबने मिलकर जहांजहां यदुवंशियों के डेरे थे या गांव थे नगर थे उनको नष्ट करना प्रारंभ कर दिया।
लोग भयभीत हो गए यदुवंशी और वो भाग पड़े हुए। कोई कुरु देश, कोई पांचाल देश, कोई कैकय, शाल्व, विदर्भ, निशद, विदेह, कौशल आदि देशों में जाकर के वास करने लगे। कुछ लोग जो बुद्धिमान ज्यादा थे। उन्होंने सोचा भाग के कहां जाएंगे? बहुत बड़ा इसका वैभव प्रताप है। तो मीठी मीठी बातें करके उसी की पक्ष की बात करके उसके साथ रहने लगे। मथुरा में ब्रज मंडल में जो वो कहता वो आज्ञा का पालन करते, कर देते, सेवा देते और उसकी प्रशंसा करते। जब कंस ने एक एक करके देवकी के छह बालक मार डाले।
तब देवकी के सातव गर्भ में भगवान अनंत जी पधारे। अनंत कहते भगवान शेषनाथ को। भगवान शेषनाथ स्वयं देवकी के गर्भ में पहले आए। सातव गर्भ के रूप में आनंद स्वरूप भगवान श्रेष्ठ जी के गर्भ में आने के कारण देव की को स्वाभाविक बड़ा हर्ष हुआ। पर फिर याद आई कि कंसी ने भी ना मार डाले। इसलिए बड़ा भय और शोक बढ़ गया। और वो भगवान से प्रार्थना करने लगी। प्रभु मेरे इस गर्भ की रक्षा हो क्योंकि आनंद स्वरूप शेष जी के गर्भ में आते ही देवकी को बड़ा आनंद हुआ। विश्वात्मा भगवान ने देखा कि मुझे ही अपना स्वामी और सर्वस्व मानने वाले यदुवंशी कंस के द्वारा बहुत सताए जा रहे हैं।
तो अपनी योग माया का चिंतन किया। तुरंत योग माया प्रकट हो गई। और कहा देवी कल्याणी तुम ब्रज में जाओ। वह प्रदेश ग्वालों और गओं से सुशोभित है। वहां नंद बाबा के गोकुल में वसुदेव की पत्नी रोहिणी निवास करती है। क्योंकि भयव सब भाग गई थी। तो रोहिणी जी नंद बाबा के यहां निवास करती थी। उनकी और भी पत्नियां कंस के डर कर कंस से डरकर गुप्त स्थानों में रह रही है। जाओ इस समय मेरा अंश जिसे शेष कहते हैं। देवकी के उदर में गर्भ रूप से स्थित है। तुम वहां से अंतर्ध्य करो।
उनको और रोहिणी के पेट में रख दो जाके। शेष भगवान जब जब भगवान अवतार लेते हैं तब तब शास्त्र रहते बहुत प्यार करते हैं। अगर विष्णु रूप से भगवान है तो वो सैया रूप बने रहते हैं। शेष रूप राम रूप से अवतार लिया तो लक्ष्मण रूप से अवतार लिया शेष भगवान ने। यहां विचार किया कि लक्ष्मण रूप छोटा भाई रहकर आज्ञा में रहना पड़ता था। तो सेवा में बड़ी हम जैसा चाहते हैं वैसी सेवा नहीं इसलिए बड़ा भाई बनकर चलूंगा जो आज्ञा करूंगा वही भगवान करेंगे इसलिए भगवान से पहले आए तो योग माया को आदेश दिया और कहा कि वो गर्भ तुम रोहिणी के गर्भ में रख लो जाके कल्याणी अब मैं अपने समस्त ज्ञान बलाशों के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा और तुम नंद बाबा की पत्नी यशोदा जी के गर्भ से कन्या के रूप में जन्म लो जाकर तुम लोगों को मुंह मांगे वरदान देने में समर्थ होगी।
मनुष्य तुम्हें अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली जानकर धूप दीप नैवेद्य और सब सामग्रियों से तुम्हारी पूजा करेंगे। पृथ्वी में तुम्हारे लिए लोग बहुत से स्थान बनाएंगे और तुम्हारा नाम होगा दुर्गा भद्रकाली विजया वैष्णवी कुमुदा चंडिका कृष्णा माधवी कन्या माया नारायणी ईशानी शारदा अंबिका आदि नामों से तुम पुकारी जाओगी भगवान की शक्ति है देवकी के गर्भ में खींचे जाने के कारण शेष जी का नाम होगा संकर्षण लोक रंग करने के कारण राम महाबली बलवारों में श्रेष्ठ होने के कारण बल इसलिए बलराम नाम पड़ेगा उनका [गला साफ़ करने की आवाज़] जब भगवान ने इस प्रकार आदेश दिया तब योग माया ने जो आज्ञा ऐसा कह करके भगवान को प्रणाम करके उनकी आज्ञा शोधार की और उनकी परिक्रमा की ये देवी शक्तियां सब भगवान के अधीन है और पृथ्वी लोक में आई और भगवान ने जैसा कहा था देवकी के गर्भ से योग माया ने वो गर्भ लेकर शेष जी को रोहिणी के उदर में विराजमान कर दिया।
अब देवकी को ऐसा महसूस हुआ कि मेरा गर्भ स्राव हो गया, नष्ट हो गया। जब यह खबर फैली तो पूर्ववासियों को बड़ा कष्ट हुआ कि वैसे ही भगवान विपत्ति विपत्ति छ तो कंस ने मार डाले और सातवा भगवान स्वयं गर्भ श्राव गर्भ नष्ट हो गया सबको ऐसा लगा और विलंब हो रहा था इसलिए भगवान ने ऐसा किया कि अब जल्दी से जल्दी मैं अवतार लूं भगवान भगवान विश्वात्मा भक्त नाम भयंकर आभा मन में भगवान भक्तों को अभय करने वाले हैं। भगवान सर्वत्र सब रूप में है। भगवान को कहीं आना जाना नहीं है।
पहले भगवान वासुदेव जी के मन में प्रकट हुए। वासुदेव जी के मन में विद्यमान भगवान सबके मन में है पर वासुदेव जी के मन में अपने को प्रकट कर दिया। ही भगवान वासुदेव जी के हृदय में प्रकट हुए। जैसे सूर्य ऐसे तेजस्वी हो गए वासुदेव जी। लोगों की आंखें चौधिया जाती वसुदेव जी को देख नहीं पाते इतने तेजस्वी हो गए ऐसा प्रभाव कि कोई दबा नहीं सकता क्योंकि भगवान प्रकट हो गए। भगवान के उस ज्योतिर्मय स्वरूप को जो जगत का परम मंगल करने वाला वसुदेव जी के द्वारा धार किए जाने पर देवकी जी ने उसे ग्रहण किया जिससे पूर्व दिशा चंद्र देव को धारण करती है वैसे शुद्ध शत्रु से संपन्न देवी देवकी ने विशुद्ध मन से सर्वात्मा स्वरूप भगवान को धारण किया आश्चर्य की बात है भक्ति का प्रभाव देखो वो भगवान सारे जगत के निवास स्थान है।
देवकी उनका भी निवास स्थान बन गई। परंतु जैसे घड़े आदि के भीतर बंद किए हुए दीपक का प्रकाश बाहर नहीं जाता। वैसे ही कंस के कारागार में बंद देवकी की भी उतनी शोभा नहीं हुई जितनी होनी चाहिए। देवकी के गर्भ में भगवान विराजमान हो गए। उनके मुख पर पवित्र मुस्कान थी। उनके शरीर की कांत से बंदी ग्रह जगमगा रहा था। जब कंस ने देखा तो मन में कहने लगा अबकी बार मेरे प्राणों का हरण करने वाले भगवान ही पधारे हैं। क्योंकि पहले कभी देवकी ऐसी नहीं थी जैसी अब है। उसे विश्वास हो गया।
पर देखो अब उसको चाहिए था कि देवकी के प्राण ले ले तो खत्म हो जाए सब जो लेकिन भगवान बैठे तो बुद्धि काम नहीं की उसने कहा नहीं नहीं जब संतान होगी तो मारेंगे एक तो स्त्री है दूसरे गर्भवती है और तीसरे इससे हमारा क्या बै तो पुत्र से है तो पुत्र होने दो उसे मारेंगे नहीं तो जैसे जैसे देवकी को रथ से खींच कर मारने लगा था। ऐसे मार देता लेकिन भगवान गर्भ में विराजमान है तो बुद्धि उसकी काम नहीं की। बुद्धि सात्विक हो गई। पलट गई। उसने विचार किया कि इसके मारने से तो तत्काल मेरी कीर्ति, लक्ष्मी, आयु सब नष्ट हो जाएगी।
लोग हमें गाली देंगे, निंदा करेंगे। इतना ही नहीं और मुझे नरक की प्राप्ति होगी। ये सब ज्ञान कहां से आ रहा है? क्योंकि भगवान है इस समय देवकी के गर्भ में। [गला साफ़ करने की आवाज़] यद्यपि कंस देवकी को मार सकता था किंतु स्वयं अत्यंत तुरता के विचार से निवत्त हो गया और प्रतिदिन भगवान का इंतजार करने लगा जन्म लेने का। बैर की गांठ बांध ली। जब वो भगवान के प्रति वैर किया तो ऐसा बैर किया। प्रशंसनीय वैर किया। प्रशंसनीय क्या उठते बैठते खाते पीते सोते जागते चलते फिरते केवल कृष्ण ये ये वै बहुत सुंदर वै आसीना समस पर्यटन चिंतन रस के पश्च करता कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण उसके दिमाग में छा गए।
इतना बैर कि उठते बैठते खाते पीते चलते फिरते हर समय वो कृष्णाकार हो गया। उसे जहां कुछ दिखता रहता कृष्ण है। ये सारा जगत कृष्ण में दिखने लगा कंस को। ये बड़े-बड़े महात्माओं की स्थिति नहीं होती। कोई होता है वासुदेव दुर्लभा लेकिन कंस को भगवान से द होने के कारण ये स्थिति प्राप्त हो गई। अब भगवान शंकर और ब्रह्मा जी कंस के कैद खाने में आए। और अपने अनुचरों के सहित समस्त देवता और नारदा ऋषि भी आए। सब लोग सुमधुर वचन से सबकी अभिलाषा पूर्ण करने वाले गर्भ में विराजमान देवकी के भगवान की स्तुति करने लगे।
सब ने कहा सत्यम सत्य परम त्रि सत्यम सत्यस निहितम सत्य सत्यस सत्य सत्य नेत्रम स्यात्मकम तम शरणम प्रपना समस्त देवता भगवान शंकर ब्रह्मा जी प्रार्थना करते हैं प्रभु आप सत्य संकल्प सत्य ही आपकी प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है। सृष्टि के पूर्व प्रलय के पश्चात संसार की स्थिति के समय इन असत्य अवस्थाओं में भी आप सत्य है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इन पांच दृश्यमान सत्यों के आप ही कारण है और उनमें अंतर्यामी रूप से आप ही विराजमान है। पृथ्वी में, जल में, अग्नि में, वायु में, आकाश में स्वयं भगवान विराजमान है।
इस तरह से समस्त देवताओं ने स्तुति की। भगवान की। भगवान की स्तुति कर रहे हैं। ब्रह्मा जी, शंकर जी, नारद आदि बड़े-बड़े देवता ये देख के वासुदेव जी को पक्का हो गया कि जैसे भगवान ने हग कश्यप सिंह वरा हंस राम परशुराम वामन अवतार धारण किए ऐसे ही भगवान अवतार धारण कर रहे हैं। भगवान स्वयं पधार रहे क्योंकि इतने बड़े-बड़े देवता आए हैं और स्तुति कर रहे हैं। परीक्षित समस्त शुभ गुणों से युक्त सुहावना समय आया। जब देवता लोग सब वंदना करके चले गए। देवकी वसुदेव जी को ये बोध हो गया कि साक्षात परम ब्रह्म परमात्मा भगवान हमारे यहां प्रकट हो रहे हैं।
भगवान ने चतुर्भुज रूप धारण करके पहले उनको ये अनुभव कराया देवकी वसुदेव जी को। समस्त शुभ गुणों से युक्त सुहाना समय रोहिणी नक्षत्र आकाश के सभी नक्षत्र ग्रह तारे शांत सौम्य हो रहे थे दिशाएं स्वच्छ प्रसन्न थी निर्मल आकाश में तारे जगमगा रहे थे पृथ्वी के बड़े-बड़े नगर छोटे-छोटे गांव अहीरों की बस्तियां हीरे आदि खानों से प्रकट हो गए हीरे जवाहरात की खाने प्रकट हो गई थी। भगवान के प्रकट होने के पहले समस्त ब्रज मंडल में नदियों का जल निर्मल हो रहा था। यद्यपि वर्षा ऋतु में मलन हो जाता है।
पर भगवान अवतार ले रहे हैं। देखो दोनों बातें यहां वर्णन की गई। आकाश में तारे जगमगा रहे हैं। घोर वर्षा हो रही है। क्योंकि भगवान का जब अवतार हुआ तो उस समय खूब वर्षा हो रही थी। चकाचक अंधियारी राज दूर दूर देखो अंधियारी छा रही। ऐसे अंधकार छाया हुआ था। नदियों का जल निर्मल हो गया। रात्रि का समय था पर फिर भी कमल खिल गए। वन में वृक्षों की पंक्तियां रंग बिरंगे पुष्पों के गुच्छों से लग गई। पक्षी चहचहा उठे। भरे गुनगुनाने लगे। उस समय परम पवित्र शीतल मंद सुगंध वायु अपने स्पर्श से लोगों को सुखदान करती हुई बह रही थी।
ब्राह्मणों की अग्निहोत्री की कभी ना बुझने वाली अग्नियां जो कंस के अत्याचार से बुझ गई थी वो अपने आप प्रज्वलित हो गई क्योंकि भगवान का अवतार हो रहा है। संत पुरुष सब पहले से ही इंतजार कर रहे थे भगवान के अवतार होने का। सहसा सबका हृदय प्रसन्नता से भर गया। जिस समय भगवान का आविर्भाव का अवसर आया देवताओं की दुदबिया बजने लगी किन्नर गंधर्व मधुर स्वर में गाने लगे सिद्ध चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे विद्याधर और अप्सराएं नाचने लगी बड़े बड़े देवता ऋषि मुनि सब कंस के कारागार में पुष्प की वर्षा कर रहे हैं अब जल से भरे हुए बादल गर्जना करते हुए आए और भारी वर्षा कर रहे हैं।
जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले जनार्दन के अवतार का समय था निद कहते 12 12:00 बजे ठीक 12:00 बजे रात्रि के भगवान का अवतार हुआ। भागव का महीना अष्टमी तिथि कृष्ण पक्ष अभिया 12 बजे की रात उस समय भगवान प्रकट हुए। उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान श्री हरि देव रूपणी देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। जैसे पूर्व दिशा में 16 कलाओं से पूर्ण चंद्रमा का उदय होता है। वासुदेव जी ने देखा कि उनके सामने एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमल के समान कोमल विशाल है और भगवान पहले चतुर्भुज रूप से प्रकट हुए।
देवकी के गर्भ से शंख, चक्र, गदा और पद्म माने कमल ये चार भुजाओं से बालक के रूप में प्रकट हुए। वक्षा स्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह अत्यंत सुंदर स्वर्णमय रेखा बहुमूल्य वैदुमणि के किरीट और कुंडल की कांत से सुंदर घुंघराले बाल सूर्य की किरणों के समान चमक रहे हैं। भगवान की बड़ी सुंदर शोभा। देवकी और वसुदेव जी ने देखा कि पुत्र के रूप में स्वयं भगवान पधारे हैं। असीम आश्चर्य हुआ। बड़े आनंद से हृदय नाश पड़ा। परमानंद रोम रोम खिल उठा। सामने भगवान विराजमान है। अब तो सारा भय जाता रहा कंस का और वासुदेव जी ने भगवान की स्तुति की।
फिर देवकी जी ने भगवान की स्तुति की। देवकी और वासुदेव जी की जो इस समय बुद्धि है वो परम ब्रह्म परमात्मा स्वरूप भगवान के सुंदर ज्ञान से युक्त है। भगवान ने चतुर्भुज रूप धारण किया था। इसलिए देवकी जी ने कहा प्रभु जब आप हमें सुख देने के लिए आए ही है तो जैसे रामायण में कौशल्या जी के सामने भगवान पहले चतुर्भुज रूप प्रकट हुए ऐसे देवकी जी के भी सामने वहां माता पुन बोली सोमति डोली तजता रूपा की जय शिलीला अति शीला जो सुख परम अनूपा तो सुन वचन सुजाना रोदन थाना वही बालक सुरभूपा ऐसे देवकी जी ने प्रार्थना की कि प्रभु आप चतुर तो भगवान उसी समय सुंदर नीलमणि बालक के रूप में ऐसे नील का जो सुंदर बालक दो भुजाएं कमल जैसे नेत्र देवकी जी रो पड़ी कि प्रभु यद्यपि [गला साफ़ करने की आवाज़] आपकी महिमा जानती हूं फिर भी कंस बड़ा दुष्ट है वो आए और आपको कुछ कष्ट पहुंचावे।
इस बात से मैं भयभीत हूं। तो भगवान ने कहा वसुदेव जी से कि आप हमें गोकुल में छोड़ आइए। नंद बाबा के यहां और जो कन्या वहां प्रकट हुई उसको उठा लाइए। वर्षा का समय हाथों में हथकड़ी पैरों में बेड़ियां जो ही भगवान ने आदेश किया फटाफट हथकड़ी बेड़ी खुल गई वसुदेव जी ने भगवान को तल पर विराजमान किया ऐसे रूप में लेके और जो ही चले बड़े-बड़े दरवाजे खुल गए जितने राक्षस पहरेदार थे तब सो गए अंधेरी रात एक एक कदम रखना मुश्किल जैसे अंधेरी रात है किधर जाए कैसे जाए और तो भगवान शेष पीछे चलने लगे वर्षा हो रही थी तो भगवान पर फ का छाता लगाए हुए उनकी मणियों से रास्ता दिखाई देने लगा पता नहीं बस जी को कि रास्ता कैसे दिखाई दे रहा पीछे भगवान शेष जी भगवान पर छत्र किए हुए चल रहे धीरेधी जब यमुना जी के पास आए।
मथुरा के पास पास ही गोकुल है। मथुरा के पास बीच में यमुना जी है। अब यमुना जी उफान में थी। वैसे ही आनंद में थी कि हमारे स्वामी पधार रहे हैं। बाढ़ का समय और उफान। वसुदेव जी ने एक क्षण खड़े होकर विचार किया कि खड़े रहने से क्या होगा? अब जो होगा सो देखा जाएगा। भगवान ने आदेश किया है तो बालक को तो नंदालय पहुंचाना ही है। जे चले तो यमुना जी और उठा भगवान के चरण स्पर्श करने के लिए तो पीछे से भगवान ने अपने चरण तो जे ही यमुना जी ने चरण स्पर्श किया वो छाती से आ गई।
बड़े आराम से पूरी यमुना जी को पार करके गए। आश्चर्य की बात वहां भी सब सो रहे थे। कोई जगा हुआ नहीं था। ऐसी योग माया का प्रभाव यशोदा जी को केवल इतना महसूस हुआ था कि हमारी संतान हुई और वो मूर्छित थी। उनको पता नहीं था क्या हुआ किसी को भी नहीं पता था। भगवान को वहां विराजमान किया और उस योग माया कन्या को लेकर के आए। जे कन्या को लेकर आए कैद खाने में घुसे दरवाजे बंद पहरेदार जग गए। हथकड़ी बेिया जकड़ गए। कन्या रोने लगी। कंस को पता चला आठवा गर्भ हुआ भागता हुआ रात्रि में आया और जबरदस्ती देवकी की गोद से उस योग माया कन्या को छिराओ देवकी जी ने कहा भैया आप तो बड़े दयालु है हमारे सात पुत्र मर गए तो आप कृपा करो आठवीं कन्या है कन्या को क्यों मारोगे आकाशवाणी ने तो पुत्र कहा था आप उसको भी बड़ा संशय हुआ कि आकाश वाणी कभी झूठी नहीं हो सकती।
कहा था आठवीं संतान तो ये कन्या कची फिर भी मेरी शत्रु मैं मारूंगा और जबरदस्ती पैर पकड़ के उसने रात्रि में ही पत्थर पर प्रहार किया तो हाथ से छूट कर बिजली की तरह चमकी और अनंत शक्तिशाली मां भगवती दुर्गा के रूप में प्रकट हुई और कहा दुष्ट तेरे मारने वाला कहीं पैदा हो गया और वो अंतर्ध्य हो गई बस भगवान श्री कृष्ण के अवतार का प्रसंग यहां तक और फिर सुबह इस समय तब फिर योग माया के द्वारा सुशुप्त को प्राप्त हो जाते हैं। जब सुबह होता है तब नंद ग्रह में नंद उत्सव मनाया जाता है।
श्री राधा वल्लभ लाल की जय।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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