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पुरूरवा और उर्वशी का विचित्र प्रसंग / परशुराम जी द्वारा शत्रुओं का संहार // 11/09/26

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माशयाम परम शीतल माशयाम [कराहने की आवाज़] परम सच्चिदानंद ंद प्रेमानंद स्वरूप नव निवत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल सरकार प्राणाराध्य प्राण प्रिय श्री श्यामा श्याम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरुलता यमुना रस रानी रजरानी समस्त ब्रजवासी परि हे प्रभु हम आपकी शरण में हैं। हे नाथ इस महा भुलावा रूपी प्रपंच से आप ही बचा सकते हैं।

नहीं बार-बार निश्चय करने पर भी हम हार गए। जहांजहां हम उठना चाहते हैं वहीं वहीं माया ऐसा भ्रम पैदा कर देती है। विवश होकर हमें विषयों का आकर्षण गिरा देता है। हे नाथ आपके ही बल से हम निकल सकते हैं। पूरे जीवन हम यही गाथा गाते रहेंगे। आपसे ही घगियाते रहेंगे। कभी तो कृपा करके आप हमारी तरफ देखेंगे नाथ आपके ही देखने से अब हमारा मंगल हो सकता है और कोई उपाय नहीं है। हे करुणामय कहा ना कियो कहां ना गयो शीश का ही नयो राम रावरे बिन भ जन जनम जनम जग दुख दसहु द पायो आ अक्षरशा सत्य है जो भ्रम के भुलावे में है उनको भले समझ में ना आवे नहीं अक्षरशा सत्य है गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कह रहे हैं कहा ना कियो कहां ना गयो शीश का नायो राम रावरे बिन भए जन राम रावरेरे बिन भय जनमी जनम जग दुख दसहु द पायो आस [चीखने की आवाज़] विवस खास दास होए नीच प्रभु नी जनायो हाहा करी दीनता कही द्वार द्वार बार-बार परी ना छार मुंह बायो हे नाथ कहा ना कियो मैंने क्या नहीं किया शुभ अशुभ सब कुछ किया कुछ हाथ नहीं लगा।

कोई हमारा मंगल विश्राम नहीं हुआ। बहुत जन्म हो गए सब करते करते। कहा ना कि कोई ऐसा भोग नहीं, कोई ऐसा कर्म नहीं जो हमने ना किया हो। कहां ना गयो हरि योनि में गया। किस-किस के पैर पकड़े? किसी ने सहयोग नहीं दिया। शीश का ही ना नवायो। कोई नहीं बचा जिसको झुकाया ना हो गर्दन किसी ने साथ नहीं दिया क्यों सब असमर्थ है माया के वशीभूत है माया के द्वंदों से मुक्त करने की सामर्थ्य तो सिर्फ आप में है ना किसी क्रिया में है सच्ची मानना ये जो साधना अभिमान है छोटी मोटी साधना कर रहे हो अभी माया पर विजय प्राप्त करने वाली साधना नहीं हो रही नहीं पता चल जाएगा कि आप कुछ नहीं है।

जब शुद्ध साधना होगी तो पता चल जाएगा आप कुछ नहीं है। यंत्रवत भगवत कृपा आपसे साधना करा रही है। ऐसा अनुभव होगा। जब तक यह अनुभव हो रहा है कि मैं कुछ चतुराई पूर्वक कर रहा हूं तो अपनी प्रकृति जनित बुद्धि जनित ही क्रिया हो रही है। वह परमात्मा प्राप्ति में समर्थ नहीं है। हे नाथ कहां न किियो कहां न गयो शीश का नायो सबके आगे झुके लेकिन राम रावरे बिन भए जन्म जनम जग दुख दसहु द पायो हे प्रभु जब तक आपका दास नहीं बना था तब तक की दुर्दशा हमने देखी है राम रावरे बिन भए हे जन जब तक आपका जन नहीं कहलाया आपका दास नहीं हुआ तब तक जगत में बार-बार जन्म लेकर मैंने दसों दिशाओं में केवल दुख ही दुख पाया।

क्या सुख है? किस द्वार में सुख है? विचार करके देखो। जिन शरीरों की तरफ आकर्षण होते हो घणित मल मूत्र के द्वार। जिन भोगों की तरफ आकर्षित होते हो खानपान छ घंटे में दुर्गंध युक्त मल मूत्र क्या ये सच्चिदानंद सुख प्राप्त करने के लिए जो हमें मानव देह मिला है हमारे साथ धोखा नहीं हो रहा हमारी इंद्रियां हमारा मन हमारी बुद्धि हमको धोखे में फंसा के पूरा समय नष्ट नहीं कर रहे एक मिनट अमूल्य है ये तब पता चलेगा जब ऑक्सीजन लगने योग्य हो जाओगे कि एक श्वास लेना कितनी कीमती है।

एक श्वास बढ़ा नहीं सकते। चाहे जितनी संपत्ति लगा दो उन श्वासों को भगवान का दास हुए बिना भगवान का सुमिरन किए बिना चाहे जहां खर्चा कर दो कुछ हाथ नहीं आने वाला। जनम जग दुख दसों द पायो जहां जहां जन्मा दसों दिशाओं में भटका दुख ही मिला कभी विश्राम नहीं। हा करी दीनता कही द्वार द्वार बार-बार परी ना छार मुंह बायो आस विवस खास दास है नीच प्रभु नी जनायो प्रभु आपका खास दास होने पर भी मैं भ्रमवश विषयों में सुख मिलने की आशा से इन धनी पुरुषों की चाटुकारिता की इनको स्वामी कहा इनको अपना माना मालिक खास दास मैं आपका हूं पर माया से भूल करके आपको अपना स्वामी ना मान के विषय पुरुषों को स्वामी माना अशुद्ध हृदय वालों को मालिक माना और अपने को बार-बार उनके चरणों में गिराया बार-बार उनके द्वार पर गए गरीबी सुनाकर मुंह बाया पर खाक ही मुंह में पड़ी।

जिस लालसा से गए वह लालसा पूर्ण नहीं हुई। चाहे वह कोई भोग हो, चाहे कोई वो विकार की वृत्ति हो, चाहे कोई वो व्यक्ति हो, आज तक हमें शांति नहीं मिली। देखो हृदय में देखो जो गोस्वामी जी कह रहे जब तक आपका दास नहीं कहाया तब तक बार-बार मुंह बाए घूमते रहे। कभी भी हमें शांति नहीं मिली। उनके द्वार द्वार पर जाकर के अपनी गरीबी सुनाई, अपनी हालत सुनाई। पर मुंह में खाक छार ही पड़ी। कोई सहयोगी नहीं मिला। प्रभु असन बसन बिनु बावररो जहां तहां उठ धायो महिमा मान प्रिय प्राण ते तजी खोल खलन आगे खिन खिन पेट खलाायो कोई हमें उत्तम भोजन करा दे कोई हमें उत्तम वस्त्र दे दे कोई हमें भोग दे दे पागल की तरह भागता रहा संसार में दौड़ता रहा ना तो मान की परवाह ना प्रतिष्ठा की परवाह बस रस्द जनेंद्र के भोग कितना नीचे गिराएंगे गिरा दिया प्रभु यह रस्द भोजन स्वाद जनेंद्रिय भोग पेट खाली किए घूम घूम ता रहा कैसे भर जाए कैसे इंद्रियों को कभी शांति नहीं मिली हे नाथ विषय लोभ के कारण नाथ हाथ कछु नहीं लाग्यो लालच ललचायो सांच कहो नाच कौन सो जनो मोह लोभ लगो निर्लज नचायो हे नाथ इन विषयों के लोभ ने बहुत ही नाच नचाया।

अरे बहुत विचित्र दुर्दशा। इन विषयों के लोभ ने बहुत नाच नचाया। सच कहता हूं। मुझे निर्लज्ज बना के बिल्कुल इज्जत नहीं, मर्यादा नहीं। सब भूल करके विषयों के दरवाजे घुटने टेके। यही दुर्दशा है। ज्ञान ना होने के कारण आप अपनी दुर्दशा नहीं देख पा रहे। महापुरुष बता रहे हैं इस नीच भोगों के लोभ ने कहां-कहां नहीं घुटने टिकवाए। क्या क्या नहीं कौन सा ऐसा नाच जो ना नचाया हो। प्रभु श्रवण नयन मग मन लगे सब थल पततायो मूल मारीह हार के हित हे हारी अबव चरण शरण तक आयो महाराज ये कान ये आंखें ये मन भटकाती रहे भटकाती कान कभी आपकी चर्चा सुनने में एकाग्र होकर नहीं लगे।

मन कभी आपके भजन में नहीं लगा। आंखें सब में भगवत दर्शन की भावना से नहीं लगी। बड़ा भटकाया। मैं सच कहता हूं प्रभु। जितना उन्नति की तरफ चला उतना अवनति को प्राप्त हो गया। पतित होता गया। सब बड़े बड़ों को देख लिया। कहीं किसी विषय में किसी के द्वारा मुझे शांति नहीं दी गई। सिर पीट पीट कर हृदय हार कर फिर उनहीं विषयों में फिर वही गंदे व्यक्तियों में बस यही जन्मजनम से चला आ रहा है। नाथ अब की बार रास्ता मिला है। जब मैं बहुत घबरा गया तो आपने हृदय से रास्ता दे दिया अपने चरणों का।

अब आपके चरणों की शरण तक कर आया हूं महाराज। बस अब तो हमारा हित केवल आपकी कृपा कोर से हमारा हित आप में ही है। हे प्रभु हे श्री हरि आप समर्थ हैं। दशरथ के समर्थ तुम्ही त्रिभुवन जस गायो तुलसी नमत अवलोकिए बाह बोल बलिद वृदावली बुलायो हे भगवान श्री हरि आप सर्व समर्थ हैं। तीनों लोकों में आपका यश है और अब तुलसी आपके चरणों का आश्रय ले लिया है। अर्थात आप अपनी महिमा की तरफ देखिए हमारी तरफ नहीं वह आपका प्रण है जो सभी आवा शरणाई रखो ताह प्राण की नाई मैं भयभीत होकर संसार से भोगों से माया के इस आकर्षण से हे समर्थ प्रभु श्री हरि आपके चरणों की शरण ली है और आपकी बलैया लेता हूं आपको प्रणाम करता हूं।

बंदी जन की तरह आपका यश गाता हूं। और आपके वचन ही मुझे लाए हैं कि कैसा भी हो जो नर होए चराचर द्रोही आवे सब शरण तक मोहि तज छल कपट मोह मद माना करो श ते साधु समाना ये आपके करुणा में वचन सुनकर ही विश्वास हुआ कि चलो बहुत जन्म इधरउधर भटके अब एक जन्म हम हरि को देते हैं तो आपकी वचन प्रण बाना स्वभाव यही मुझ पतित को पावन करने के लिए समर्थ है। शरणागत वत्सल जो आपकी शरण में आया उसका मंगल हुआ। आपने सदैव उसकी देखरेख की। तो अब हमें विश्वास हो गया कि हमारा भी कल्याण हमारी परम शांति आपके श्री चरणों में है।

पूरी विनय पत्रिका में गोस्वामी जी ने अपने हृदय के एक एक उद्गार एक एक वृत्त रखी प्रभु के चरणों में सत्य मानिए आप जो साधक जन है देख लीजिए कभी तो इतनी वृत्ति चढ़ती नजर आती है भजन में और कभी एक क्षण में उतर कर भोगों में खड़ी हो जाती है। क्या विश्वास हमारे अंतःकरण का और क्या विश्वास हमारी साधना का इस पर विश्वास करें। पूरा जीवन यही देखते आए हैं। और कुछ देखा नहीं। यही देखा है। मन की गति को देखा है। बुद्धि के चरित्र को देखा है। तब हंसी आती थी। क्या विश्वास करें ऐसी बुद्धि पर, ऐसे मन पर।

तो उस समय भी हमारी जो रक्षा करते हैं वह शरणागत वत्सल भगवान है। इसलिए हम मन वचन कर्म से एकमात्र प्रभु की शरण में रहे और तीन बहुत जोर के हैं। कान को जबान को और नेत्रों को संभाले। गोस्वामी जी ने कहा है यह श्रवण नयन मग मन लय सब थल पतितो यह गिराते रहे। देखना सुनना और बोलना इस पर साधक बहुत सावधान रहे। संभल के देखे संभल के बोले और संभल के सुने सावधान होकर बहुत प्रभाव पड़ता है सुनने का देखने का बोलने का। इस पर निष्ठावान हो जाए। रसना कटो जो अन रटो निरख अन फटो नैन श्रवण फटो जो अन सुनो श्री राधा जस बैन परम सुख की प्राप्ति के लिए अपने इन तीन अंगों पर विशेष ध्यान दें वाणी से मौन भगवत नाम भगवत कीर्तन भगवत कथा वार्ता नेत्रों से बिल्कुल सावधान सब में भगवत भाव करके देखना अपने आराध्य देव की उपस्थिति का अनुभव करना करना नहीं तो नेत्र झुकाए हुए शांत श्रवण इंद्री से भगवत चर्चा भगवन नाम भगवत गुणानुवाद सुनना नहीं तो कान होते हुए भी बहरे की तरह रहे ना रहना आता हो तो रुई को गोली करके कड़ी और ऐसे कान में ठास लो सुनाई ना दे वैसे अभ्यास ऐसा बना ले तो फिर बन जाता है चाहे जितना ढोल नगाड़े बजे अपना ही चिंतन चलता है यदि आप में ऐसा अभ्यास कमजोरी हो, सामर्थ्य ना हो तो यह उपाय कर लेना चाहिए।

एक साधक को देखा था कि वो कान में ऐसे बटन जैसे बिल्कुल फिट बंद कर दिखाइए। लगाया तो बाहर की आवाजें नहीं आ रही थी। ऐसा कर लेना चाहिए। अंदर की आवाज हर समय नाम सुने, मंत्र सुने, भगवत चर्चा बाहर सुने नहीं तो कान, जबान और आंख इन तीन के द्वारा साधना बढ़ती है और तीन के द्वारा नष्ट हो जाती है। मछली को देखा नेत्रों ने ही तो देखा मार दिया सोभरी जी खुद पश्चाताप करके कह रहे थे कहां मैं एकांत सेवन और कहां 50 से 5000 और बढ़ गया है प्रपंच श्रवणेंद्र वाकेंद्र नेत्रेंद्र इनका साधना में बहुत बड़ा सहयोग और बहुत बड़ी बाधा है यदि साधक इन पर शिथिल रहा जो मन आया सो देखा जो मनाया सो बोला जो मन आया सुना वो ब्रस्ट हो जाएगा।

जब आप अंदर नाम चलाएंगे तो सच्ची मानिए जहर जैसा लगता है जब कोई बात करता है। जहर जैसे क्या बात करना है? हमको क्या जानना है? क्या पाना है? जो हमें जानना है पाना है वो हम समझ गए हैं। हर समय भगवान का भजन ही जीवन का सार है। क्या बात करनी है? एकदम चिड़चिड़ापन आता है। फिर वो बोलेगा क्या? देखेगा क्या? सुनेगा क्या? क्योंकि अंदर जब प्रीति हो रही भजन में तब वो अपने ये कान, जबान, नेत्र इनको संभाल सकता है। बहुत कम शब्द से काम चलाकर भजन नेत्र से देखने की इच्छा मत करो।

सब प्रपंच है। क्या देखना है? देखतेदेखते आंखें फूट गई। मर गए। कितने जन्म हो क्या देख पाए? जिनको देखना है उनके लिए नेत्र संभालना है। खाते खाते मर रहे जा रहे हैं। अवस्था नष्ट होती जा रही है। फिर भी वही रसेंद्र खाने के लिए मांग रही। क्या देखना है? झूठे पे झूठा संसार का नौटंकी नाटक अगर साधक होकर देखता है तो धिक्कार है। फिर वैसे ही संसार झूठा ऊपर से इसमें झूठे नाटक सीरियल नौटंकी टीवी यह सब क्या देखना है? हमें देखना प्रिया प्रीतम को किसके लिए आए हो? कभी भी साधक को झूठ से बचने के लिए तो भगवान के मार्ग में आए हैं।

यह झूठा संसार उसमें भी झूठे सीरियल सिनेमा और यह देखने की चाह इसलिए नेत्र वाणी और कान बिल्कुल सावधान तो साधना उत्तम बनती जाएगी और अगर चूक कर दिया तो भ्रष्ट हो जाओगे। चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण परीक्षित जी को रघुवंश का पूर्ण वर्णन करके भगवान सुखदेव जी ने सुनाया और कहा कि इस वंश के जो आखिरी राजा हुए उनका नाम सुमित्र था। कुश का पुत्र जो भगवान के पुत्र थे लवकुश उनमें कुश का पुत्र हुआ अतिथित और उसी वंश की पूर्णता महाराज सुमित्र से हुई और कलयुग के प्रारंभ में इस वंश का पूर्ण विश्राम हो गया।

रघुवंश का सुमित्र के आगे कोई राजा नहीं हुआ। यहीं से इच्छवाकु वंश सुमित्र तक चला। कलयुग के प्रारंभ में इसका विश्राम हो गया। इच्छवाकु के पुत्र थे महाराज निमी। इन्होंने यज्ञ आरंभ किया। महर्षि वशिष्ठ जी को आचार्य के रूप में वरण किया। वशिष्ठ जी ने कहा राजन इंद्र अपने यज्ञ के लिए मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं। उनका यज्ञ पूरा कराकर मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊंगा। तब तक मेरी प्रतीक्षा करो। यह बात सुनकर राजा नेमी बड़े ज्ञानी महात्मा थे। उन्होंने विचार किया कि कल का क्या भरोसा प्राण रहे कि ना रहे।

और वशिष्ठ जी इंद्र का यज्ञ कराने चले गए। परम ज्ञानी महात्मा निमी ने कि यह जीवन तो क्षणभंगुर है। कल के लिए भगवत कार्य नहीं रोकना चाहिए। काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी। बोरी करोगे कब? पता नहीं शाम मिले कि ना मिले इसलिए हमें हर समय भजन परायण रहना है। तो मुझे विलंब करना उचित नहीं है। ऐसा ज्ञान उनके हृदय में स्फुरित हुआ। महाराज निमी के और उन्होंने दूसरे विद्वान महापुरुषों से कहा जब तक हमारे गुरुदेव वशिष्ठ जी नहीं आते तब तक आप आचार्य रूप में कार्य करें और जहां वो आ जाएंगे तो पूरा कार्य वो संभालेंगे।

गुरु जी जो वशिष्ठ जी थे इंद्र का यज्ञ संपन्न कराने के लिए गए और उनके शिष्यों से निममी ने यज्ञ प्रारंभ करा दिया। गुरु वशिष्ठ जी इंद्र का यज्ञ संपन्न करके जब लौटे तो देखा हमारे शिष्यों को आचार्य बनाकर यज्ञ। तो उन्होंने कहा तुम बड़े ज्ञानी बनते हो। हमारा इंतजार नहीं कर सके। मैं श्राप देता हूं तुम्हें अपनी विचारशीलता और ज्ञान और पांडित्य का घमंड है। इसलिए अभी तुम्हारा शरीर पात हो जाए। शरीर छूट जाए। निमि गुरुदेव आपने श्राप दिया क्या यह धर्म के अनुकूल है?

मेरा अपराध क्या? आपने व्यर्थ में श्राप दिया। इसलिए लोभवश धर्म का आदर ना करके और गुरु होकर के व्यर्थ में श्राप दे दिया। इसलिए आपका भी शरीर पात हो जाए। आपका भी शरीर छूट जाए। निमि महाराज तप और ज्ञान से संपन्न विदेह राज निमी तत्काल लागू हुआ गुरुदेव का भी शरीर पात हो गया और गुरु वशिष्ठ जी भगवान के स्वरूप तत्काल लागू हुआ शिष्य का भी शरीर छूट गया वशिष्ठ जी ने अपना शरीर त्याग कर मित्रा वरुण के द्वारा उर्वशी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया। राजा निमी के यज्ञ में आए हुए श्रेष्ठ मुनियों ने राजा के शरीर को औषधियों के द्वारा सुरक्षित रख दिया।

जब शत्रयाग की समाप्ति हुई तो देवता लोग आए तब उन लोगों ने प्रार्थना की कि बिना अपराध के वशिष्ठ जी ने श्राप दे दिया। इनका शरीर पूरा हो गया तो जीवित होना चाहिए महाराज निममी को। तो उस समय देवताओं ने महाराज निमी की आत्मा से बात की तो उन्होंने कहा नहीं मुझे अब देह बंधन स्वीकार नहीं गुरु जी ने मुझे देह मुक्त कर दिया तो अब देह नहीं धारण करूंगा विचारशील शरीर से प्यार नहीं करते भगवान में प्यार करते हैं आत्म स्वरूप भगवान में आगे चलकर शरीर छूटना ही था गुरु जी जी ने श्राप दे दिया।

जल्दी छूट गया। बड़ी कृपा हुई। अब मैं कभी शरीर धारण नहीं करूंगा। इस शरीर को कभी नहीं धारण करूंगा। जैसे जल में मछली के लिए सर्वत्र ही मृत्यु का अवसर है। ऐसे शरीर धारी को दुख ही दुख समस्या ही समस्या। इसलिए मैं शरीर धारण नहीं करूंगा। देवताओं ने कहा तो आप कहां निवास करेंगे? तो कहा हर प्राणी के नेत्र में वहां मैं विराजमान होकर भगवान का चिंतन करता रहूंगा और मैं विराजमान हूं इसका परिचय है अपने आप पलक झपकना ये इसे निमिश कहते हैं महाराज निमियावास करने लगे पलक उठने और गिरने के अस्तित्व से मेरा पता चलेगा कि मैं विराजमान हूं।

सबके नेत्रों में ज्ञान शिरोमणि विदेहराज निममी विराजमान है। इसके बाद उन महर्षियों ने सोचा कि बिना राजा के तो आरजिकता फैल जाएगी। तो निमिरी का मंत्रों के द्वारा मंथन किया। तो एक कुमार उत्पन्न हुआ मुर्दे से। जैसे वेन के शरीर से भगवान पृथ्वी का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसे ही महाराज निमी के शरीर का जब मंत्रों के द्वारा मंथन हुआ तो जो पुत्र पैदा हुआ वो महाराज जनक थे। जनक जी निमि के मृत शरीर से जिन्हें वैदेह विदेह कहा गया है। वैदेह जनक और मिथिल क्योंकि मंथन से हुए उन्हीं के द्वारा बसाई हुई मिथिलापुरी है।

जनक जी बड़े महान हुए हैं। उन्हीं से भगवत लीला का प्रकाश करने वाली वैदेही जानकी जी प्रकट हुई। उन्हीं के भाव से उन्हीं के तप से उन्हीं के भजन से जब यज्ञ के लिए हल जोत रहे थे तो शीर हल के अग्र भाग से एक घड़े में चोट लगी और उससे सीता जी का प्रादुर्भाव हुआ। इसी से जनक जी का नाम शीरध्वज हुआ। शीरध्वज के कुषध्वज, कुशध्वज के धर्मध्वज, धर्मध्वज के कृतध्वज और मितध्वज कृतध्वज के केस ध्वज और मितध्वज के खांडिक हुए। परीक्षित ये जितने महापुरुष सब ब्रह्म बोध संपन्न ज्ञानी महात्मा सब आत्म विद्या में बड़े प्रवीण आत्मज्ञानी मिथिला पुरी में निवास करने वाले मैथिल कहलाने वाले इन नरपतियों का आपको परिचय दिया ये सब के सब गृहस्थ में होते हुए सिद्ध ज्ञानी महात्मा हुए द्वंदों से मुक्त हुए याज्ञवलका आदि बड़े-बड़े योगेश्वर पर इन पर महान कृपा करके सत्संग करने जाते थे।

यही जनक जी भगवान सुखदेव जी के भी गुरु जी कहे गए। परीक्षित अब मैं तुम्हें अभी तक सूर्य वंश सुनाता रहा। अब चंद्रमा के पावन वंश का वर्णन करता हूं। इस वंश में महाराज पुरवाद बड़े-बड़े पवित्र कीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता। इसी में भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो का अवतार होता है। सूर्यवंश में भगवान श्री रामचंद्र जो और चंद्र वंश में भगवान कृष्ण चंद्र जो शास्त्र सिर वाले विराट पुरुष भगवान नारायण के नाभि सरोवर के कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र हुए अत्री।

वे अपने गुणों के कारण ब्रह्मा जी के समान ही थे। उनहीं अत्री के नेत्रों से अमृतमय चंद्रमा का प्रादुर्भाव हुआ। चंद्रमा अत्री ऋषि के नेत्रों से प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने चंद्रमा को ब्राह्मण, औषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। तीनों लोकों पर चंद्रमा ने विजय प्राप्त की और राजस्व यज्ञ किया। पर बड़ा विचित्र है। अत्री जैसे महापुरुष के नेत्रों से प्रकट होने वाले चंद्रमा जो ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करके राजस्व यज्ञ की सफलता प्राप्त हुई तो घमंड बढ़ गया।

चंद्रमा को घमंड बढ़ गया। को रस जनमा जग माही प्रभुता पाह जा मद भारी अपराध हो जाता है घमंड से अभिमान से बृहस्पति जी की पत्नी तारा बहुत सुंदर थी देवुरु बृहस्पति बिल्कुल ऐसा नहीं करना चाहिए लेकिन घमंडी चंद्रमा ने भारी अपराध कर दिया बृहस्पत की पत्नी को लुभायमान करके और जो नहीं सोचा जा सकता वो कर दिया। बृहस्पति जी ने बहुत समझाया कि ये भारी महापाप है। अधर्म है। पर जब घमंड अभिमान हो जाता है तो उन्होंने गुरु की बात नहीं सुनी। किसी भी तरह से किसी के भी समझाने से ना तारा चंद्रमा को छोड़ सके ना चंद्रमा तारा को बड़ी विचित्र बात है।

बृहस्पति जी जैसे ज्ञानी की पत्नी होकर के चंद्रमा से आसक्त हो गई और चंद्रमा इतना सब सुख व्यवस्था है जब त्रिभुवन पति पद प्राप्त हुआ तो फिर गुरु की पत्नी गुरु पत्नी गामी जैसा महत अपराध मतलब यह बड़ों में ऐसी गलती पाई गई इससे पता चलता है कि ये पद ये प्रतिष्ठा ऐश्वर्य ये रूप ये सब नरकगामी बनाने वाला है। चंद्रमा देवताओं में श्रेष्ठ है। परम पवित्र है। शुक्राचार्य जी ने अवसर देखा और बृहस्पति जी से आंतरिक द्वेष था ही तो चंद्रमा का पक्ष ले लिया। जब शुक्राचार्य जी ने चंद्रमा का पक्ष लिया तो सारे असुर गण चंद्रमा के पक्ष में और महादेव जी भी बहुत प्यार करते थे चंद्रमा से।

विद्या गुरु अंगरा जी के पुत्र बृहस्पति जी का विरोध करने वाले सब चंद्रमा के साथ महादेव जी ने कहा चंद्रमा तुम बहुत गलत किए बहुत गलत है। वापस कर दो तारा को नहीं तो हम बृहस्पति जी का पक्ष ले जब खड़े होंगे चंद्रमा को प्यार करते हैं। द्वितीया का चंद्रमा भगवान शिव मस्तक पर मुकुट में धारण करते हैं। देवराज इंद्र समस्त देवताओं के साथ गुरु बृहस्पति के साथ अब तारा को निमित्त बनाकर भारी महासंग्राम की स्थिति आ गई। तारा जी को समझ में नहीं आया कि हमारे प्रीतम इसके गुरु हैं और हम गुरु माता है और इसके और उसकी समझ में नहीं आया।

अहंकार क्योंकि चंद्रमा बहुत रूपवान ऐसे ही तारा जी बहुत रूपवान बृहस्पति जी की पत्नी इतनी बड़ी जगह से फिसल गए बृहस्पति जी की पत्नी तारा जी अच्छा भगवान चंद्रमा भगवान ही कहे जाते सूर्य चंद्र भगवान बिना भगवान का भजन किए बुद्धि किसी की शुद्ध नहीं रह सकती अंगीराज जी ब्रह्मा जी के पास गए महाराज घोर महासंग्राम शुरू शुरू हो जाएगा। ब्रह्मा जी आए और चंद्रमा को बहुत डांटा फटकारा। कहा छोड़ तारा को दो बृहस्पति जी के हाथ में तारा को जब बृहस्पति जी के हाथ में तारा जी को दे दिया तो उन्होंने देखा ये तो गर्भवती है मेरे क्षेत्र में दूसरे का गर्भ तू अभी त्याग तुरंत त्याग क्योंकि तारा देवी है डर मत मैं तुझे भस्म नहीं करूंगा लेकिन गर्भ त्याग अभी इतनी सुंदर थी कि बृहस्पति जी इतने पर भी तारा से कहा कि तुम गर्भ त्याग दो हम स्वीकार किए और तुम मेरी पत्नी देवी हो इसलिए कोई दोष तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकता।

तुम निर्दोष हो। अपने पति की बात सुनकर तारा जी ने अत्यंत लज्जित होकर गर्भ का त्याग किया। देवी है। सोने जैसा चमकता हुआ बालक। अब जब बालक प्रकट हुआ तो बृहस्पति जी लुभामान हो गए और चंद्रमा ये मेरा पुत्र है तुम्हारा अधिकार नहीं बृहस्पति जी से कहा है तो अरे अब तो घुटने टेक दे ले चाहे कि सब कुछ प्रभु आपका गलती क्षमा करो चंद्रमा ने कहा ये तेजस्वी पुत्र मेरा है आपका नहीं और आप ध्यानस्थ होकर देख लो कि मेरा है कि नहीं समस्त ऋषियों ने तारा से कहा तुम ही बता दो किसका है?

तो लज्जावश वो कैसे बोले कि चंद्रमा का है? तो वो तेजस्वी बालक जो प्रकट हुआ था उसने कहा झूठी लज्जा करने वाली तू अपने कुकर्म को क्यों नहीं बोल रही है? उस बालक ने डांटा तारा को। ब्रह्मा जी ने कहा तारा से कि हमको बता दो क्योंकि मां ही जानती है असली पुत्र का धाता कौन है? तब तारा ने धीरे से कहा ये चंद्रमा का पुत्र है। न्याय हो गया। बृहस्पति जी ललचा गए थे। चंद्रमा ने उस बालक को ले लिया ब्रह्मा जी के द्वारा। बड़ी अदालत है ब्रह्मा जी। ब्रह्मा जी ने उस बालक का नाम रखा बुद्ध।

क्योंकि बड़ी धीर गंभीर बुद्धि। अब चंद्रमा को बहुत आनंद हुआ बुद्ध को प्राप्त करके। बुद्ध के द्वारा इला के गर्भ से पुरवा का जन्म हुआ। एक दिन इंद्र की सभा में देवर्षि नारद जी पुरवा के रूपशील गुण उदार संपत्ति वैभव का वर्णन किए तो उर्वशी के हृदय में भाव आ गया और देवांगना सर्वश्रेष्ठ अप्सरा महाराज पुरवा को पति रूप में वरण करने के लिए भूतल पर आ गए। पुरुष शिरोमणि पुरवा मूर्तिमान कामदेव जैसे सुंदर थे। सुंदरी उर्वशी ने धैर्य धारण करके पुरवा को पति रूप में वरण किया।

पहले जब उर्वशी पुरवा के पास गई तो पुरवा ने कहा सुंदरी तुम तो परम वंदनीय हो। देवलोक की विभूति हो। भगवान नारायण से की जंघा से प्रकट हुई उर्वशी जी हैं। यह दास तुम्हारे स्वागत के लिए क्या सेवा करें? उर्वशी ने कहा राजन तुम्हारा सौंदर्य और महिमा सुनकर के मैं स्वर्ग लोक से आई हूं। कौन ऐसी कामनी है जो आप जैसे दिव्य पुरुष पर दृष्टि और मन नोछावर ना कर दे। मैं आपके समीप आपकी पत्नी बनने के लिए आई हूं। राजन हम अप्सरा हैं। जब हम किसी का रूप सौंदर्य गुण देखते हैं वह प्रशंसनीय होता है तो हमारा मन आकृष्ट हो जाता है।

अन्यथा बिना तप के कोई हमें देख भी नहीं सकता। स्पर्श और आगे की बात आप तपस्वी हैं। तप के धनी हैं। मैं आपको पति रूप में स्वीकार करती हूं। परंतु महाराज मेरी एक शर्त है। यह दो भेड़ के बच्चे सौंपती हूं। इनकी रक्षा होनी चाहिए। जिस दिन इनका अपहरण हो जाएगा उस दिन आप हमें पकड़ नहीं पाओगे। अंतर्ध्य हो जाऊंगी। और मैं देवी हूं इसलिए कभी अन्न नहीं खाती। केवल घी शुद्ध गाय का क्योंकि भविष्य और एक सहवास के सिवा मैं कभी आपको वस्त्रहीन नहीं देखूंगी। तीन बातें हैं। सदैव घी खाऊंगी और आपको सहवास के सिवा वस्त्रहीन नहीं देखूंगी और मेरे दो भड़ के बच्चे रक्षा करना।

पूर्वा ने हर शर्त स्वीकार कर ली। फिर उर्वशी से कहा कि तुम मनुष्य के लायक तो नहीं हो। क्योंकि तुम देवी हो। तुम्हारा सौंदर्य अद्भुत है। पर तुमने कृपा करके मुझे स्वीकार किया है। इसलिए मैं तुम्हारी सेवा में दास की तरह रहूंगा। जब जो आज्ञा होगी वैसा पालन करूंगा। सम्राट पुरवा अब तो उर्वशी काम शास्त्र की पद्धति से पुरवा के साथ पति पत्नी का संबंध वो अंतर्ध्य पद्धति से देवताओं की विहार स्थली चैत्रथ नंदन वन स्वच्छंद विहार देवी उर्वशी के शरीर से हर समय कमल केसर की सुगंध निकलती रहती थी।

राजा पुरवा को कितने वर्ष व्यतीत हो गए पता ही नहीं चला। जब इंद्र ने देखा कि तप क्षीण हुआ तो इशारा किया उर्वशी को। गंधर्वों को उर्वशी ने इशारा किया। गंधर्व दो भेड़ के बच्चे थे। उनको उठा लिए और उस समय महाराज पुरवा उर्वशी के समीप थे। आधी रात का समय था। उर्वशी ने कहा महाराज देखो हमारे बच्चों को लिए जा रहा है। दो भेड़ के बच्चों को कोई। अरे तू कायर की तरह मेरे पास पड़ा है और मेरी जान बचती बच्चों में। अपने को बड़ा वीर मानने वाला तू मेरे बच्चों को नहीं बचा सका।

और लुटेरे ले गए। यह स्त्रियों के सामने वीरों की सी बात करने वाले बहुत पाए जाते हैं। लेकिन वीरता दिखाने वाले कम होते हैं। जैसे किसी हाथी को अंकुश से भेद दिया हो। अब महाराज को ध्यान नहीं रहा। सहवास के सिवा वस्त्रहीन नहीं और वो एकदम तलवार लेकर रक्षा के लिए बड़े वस्त्रहीन अवस्था उर्वशी अंतर्ध्य। अब जो पागलपन महाराज का चढ़ा वैसे ही वस्त्रहीन वस्त्र नहीं धारण किए जो देखा उर्वशी अंतर ध्यान अब उनको ध्यान आया कि मेरी गलती हो गई अब हा उर्वशी हा उर्वशी विहल उन्मत्त पागल की तरह [नाक से की जाने वाली आवाज़] कभी सरस्वती नदी के तट पर कभी कहीं विकल बस एक लगन थी एक बार पुनः देख लूं उर्वशी जी तो देवी हैं।

उर्वशी जी ने दया की। ये सरस्वती नदी के तट पर पागलों की तरह हां उर्वशी हा पांच अपनी सखियों के साथ प्रकट हुई। जे ही उर्वशी जी को देखा तो जैसे प्राण आ गए हो। कहा निष्ठुर एक बार तू एक क्षण मेरे से बात कर ले। नहीं मेरे प्राण व्याकुल। और कहा जाओ महाराज मैं किसी की नहीं हूं। मैं किसी की नहीं हूं। जब तप बढ़ता है तो उस तप को क्षीण करने के लिए मुझे भेजा जाता है। मेरा कोई पति नहीं। मेरा कोई मित्र नहीं। कोई मेरा कुछ अपना नहीं लगता है। महाराज कह देवी यह शरीर यह चक्रवर्ती सम्राट तुम्हारा दास है।

ऐसा मत कहो नहीं अभी यह मर जाएगा। और देखते देखते इसे भेड़िए और गीत खा जाएंगे। स्त्रियों करुणा क्रूरा दुर् सा सुनो महाराज हम वो स्त्री हैं जो बड़ी निर्दई है केवल प्यार का नाटक करती है कितनों को तपस्वीयों को कितनों को जो तप के धनी थे उनसे मिली किसी की हुई क्या क्रूरता मेरे स्वभाव में है अगर मैं चिढ़ जाऊं तो अपने सुख के लिए बहुत से बड़ा साहस का काम कर सकती हूं। जो मैं स्वार्थ के वशीभूत होकर प्यार की बातें करती हूं, वही मैं उसकी हत्या भी कर सकती हूं। मुझ स्त्रियों के हृदय का सौहार्द तो केवल लुभाने मात्र का होता है।

हे तुम्हारे जैसे भोले लोग झूठमूठ हमारी मीठी मीठी बातों में फंसकर अपना दिल दे बैठते हैं। और हम तप क्षीण होने पर तुरंत उसको लात मार के त्याग दिया और नए पुरुष को स्वीकार किया। यहां तो तप है, देवी हैं। मृत्यु लोक में अगर अपने सुख से बढ़कर सुख मिलने वाला है। ये सुंदरता का घमंड ये भोगेश्वर की लालसा बहुत बड़े-बड़े तक है। इसीलिए ब्रह्मा भी नमस्कार करते हैं जो भगवान का भजन करने वाले शरणागत भक्त हैं। फिर भी तुम धीरज धरो। राजराजेश्वर हो। घबराओ मत। तुम्हारी ऐसी ही लालसा है तो तुम्हारा विशुद्ध प्रेम देखकर हम तुम्हें एक वरदान देते हैं।

साल में एक बार आएंगी और तुम्हें दर्शन देकर चली जाएंगी। साल में एक बार राजा पुरवा से और उर्वशी से जो संतान हुई वो आगे इस चंद्र वंश को बढ़ाने वाली हुई। एकादशी स्कंध में पुरवा को जब उर्वशी से वैराग्य हुआ तब जो वचन आगे आएंगे महाराज पुरवा सिर्फ उर्वशी का ध्यान करते थे। उर्वशी के ध्यान में थे। सोचो अगर भगवान की एक झलक हो जाए तो फिर कैसे कोई छोड़ सकता है? यह तो मायाकृत शरीर है। महाराज पुरवा बहुत सी यज्ञ की अग्नि देवता को रिझाया और उर्वशी लोक की इच्छा की बहु उर्वशी से मिलूंगा।

यज्ञों के द्वारा यजन करके त्रेता के पूर्व सतयुग में एकमात्र प्रणव ही मंत्र था। ओम इसी में वेद समाहित थे। सारे वेद इसी के अंतर्भूत थे। देवता एकमात्र भगवान नारायण। अग्नि भी तीन नहीं केवल एक ही और वर्ण भी केवल एक हंस। त्रेता के प्रारंभ में पुरवा से ही वेदत्रय और अग्नत्रय का आविर्भाव हुआ। राजा पुरवा ने अग्नि को संतान रूप में स्वीकार करके उर्वशी लोक की प्राप्ति की। तपस्या साधना पूरे जीवन केवल उर्वशी के लिए छह पुत्र उर्वशी से प्रकट हुए महाराज पुरवा से आयुष श्रुतायु सत्ययु रय विजय और जय श्रुतायु का पुत्र था वसुमान सत्ययु का श्रुतंजय रय का एक और जय का अमित विजय का भीम भीम का कांचन कांचन का होत्र होत्र का पुत्र जनु यह वही जनु थे यह तप परायण थे और भगीरथ जी गंगा जी ले जा रहे थे।

तो जे इनके आश्रम तो मंजुली बांधी और गंगा जी को पी गए। अब भगीरथ ने कहा महाराज हमारे पुरखे तो वैसे ही रह गए। आप तो पूरी गंगा जी पी गए। पूरी गंगा जी पी गए। तो बड़ी प्रार्थना की। तब जन ऋषि ने गंगा जी को तो उनका जानवी नाम पड़ा इसी से। अंजलि में लेकर के जैसे अगस्त जी समुद्र पी गए थे ऐसे जनु जी गंगा जी पी गए थे जनु का पुत्र था पुरु पुरु का बलाक बलाक का अजक अजक का कुश कुश के चार पुत्र कुशांबु तनयवश और कुशनाब इनमें से कुशांबुद के पुत्र हुए महात्मा गांधी विश्वामित्र जी के वंश की गाधी की कन्या का नाम था सत्यवती बहुत ही सुंदर पवित्र स्वभाव वाली तो ऋषि ऋषि ने देखा गादी की कन्या सत्यवती को तो जाकर के गादी जी से कहा कि अब मेरे मन में इच्छा हुई कि मैं गृहस्ती बनू तो आपकी पुत्री को देखकर मेरे मन में आया तो आप मुझे दान कीजिए ऋषि श्री महात्मा ऐसी अब वो ना तो नहीं कर सकते थे सांप का भय है तो उन्होंने कहा महाराज हमारी कन्या की एक शर्त है 1000 ऐसे घोड़े लाके आप भेंट में दीजिए जिनका सारा शरीर श्वेत का हो एक कान केवल श्याम वर्ण हो 1000 घोड़े क्योंकि उन्होंने सोचा कहां से लाएंगे ऋषि मुनि गादी जी की ये बात सुनी ऋचिक मुनि ने ध्यान किया ऐसे घोड़े कहां है?

तो पता चला वरुण जी के पास तो सीधे वरुण जी के पास गए और आदेश किया 1000 घोड़े दे दो। उन्होंने तुरंत दे दिया। ऋषियों में बड़ी सामर्थ्य अब तो कोई प्रश्न नहीं रह गया महाराज गाधिक। अब तो देना पड़ेगा। तो सत्यवती जी को ऋचिक मुनि के हाथ पानी ग्रहण कराया। काफी समय हो गया। वो अपने ब्रह्म ध्यान में ही रहते कभी वार्ता ही नहीं करते सत्यवती से केवल मन आया था गृहस्थ धर्म में जाएंगे पर इन महान सती साध्वियों की भी कि कभी उनकी साधना में कोई विघ्न नहीं एक दिन गांधी जी की पत्नी ने कहा तुझे पता नहीं तेरे पति कितने सामर्थ्यवान तपस्वी हैं।

बात कर मेरे भी कोई संतान नहीं तेरे सिवा और तेरे भी कोई संतान नहीं दोनों ऋषि ऋषि एक दिन जब ध्यान से उठे तो चरणों में गिर के सत्यवती जी ने कहा कि हमें और हमारी मां को संतान की इच्छा है। महर्षि ऋषिक ने कहा ठीक है। एक चू पकाया। और चरू पका के दो भागों में अलग-अलग किया। एक चू अपनी पत्नी के लिए और एक सास के लिए और दोनों को अलग-अलग बताया। सास को बट वृक्ष का आलिंगन करना और पत्नी को कहा पीपल वृक्ष का आलिंगन करना। सत्यवती की मां ने समझ लिया कि बाबा बहुत जोर का तपस्वी है।

अपना संतान वाला चर जरूर खास बनाया होगा। तो बेटी से कहा कि तुम हमारा चर ले लो। हम तुम्हारा चर लेते हैं। वो मोह वश ऐसा नहीं करना चाहिए था। पति का आज्ञा पालन करना चाहिए था। पर वो मोह वश ऐसा जब खा पी के आलिंगन हो गया तो गर्व ऋषिक मुनि ने कहा जैसा हमने कहा था वैसा ही किया तो उन्होंने सत्यवती जी ने हाथ जोड़कर कहा नहीं त्रुटि हो गई झूठ नहीं बोली मां ने कहा कि आपने जो हमारे लिए चरू पकाया वो हमें दे दो तो हमने मोह वसाद दे दिया उन्होंने कहा अनर्थ कर डाला। जानते हो तुम्हारा जो पुत्र होगा वो घोर लोगों को दंड देने में समर्थ और घोर स्वभाव का क्रोधी होगा।

और तुम्हारा जो भाई होगा एक ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ऋषि होगा। तुम्हारी मां क्षत्रिय कुल से गांधी और हम ब्रह्म ऋषि हैं। हमने अपनी संतान ब्रह्म ऋषि वो वहां होगी और तुम्हारे घोर क्षत्रिय स्वभाव का दंड देने वाला नाक में घुसा। सत्यवती जी ने समझा था हमारे पति सर्व सामर्थ्यशाली है तो ठीक समझती चरण पकड़ लिए। एक ब्रह्म ऋषि की पत्नी के गर्भ से घोर क्षत्रिय स्वभाव वाला प्रकट होना निंदनीय है। भगवन भूल हो गई। आप कृपा करो। तब उन्होंने कहा चलो पुत्र तो सौम्य ब्रह्म ऋषि होगा लेकिन तुम्हारा पौत्र जो होगा वो घोर स्वभाव का होगा।

सत्यवती के गर्भ से जो ब्रह्म ऋषि प्रकट हुए वह जमदग्न जी नाम हुआ और जो पौत्र रूप में प्रकट हुए भगवान परशुराम प्रकट हुए। सत्यवती जी जमदग्न जी को प्रकट करके तपमय शरीर इतना पति का प्रभाव कि उनका शरीर नदी रूप हो गया। कौशिक नदी बन गया। रेणु ऋषि की कन्या रेणुका से जमदग्न जी का पानी ग्रहण संस्कार हुआ और रेणुका के गर्भ से जमदग्नि जी के वशुमान आदि कई पुत्र हुए और सबसे छोटे पुत्र भगवान परशुराम जी और उधर गाध तने भगवान विश्वामित्र जी जो चर सासु ने पाया था उससे विश्वामित्र जी प्रकट हुए।

महान ब्रह्म ऋषि महान तपस्या से युक्त परीक्षित कहते हैं कि है वंश का अंत करने के लिए स्वयं भगवान ने परशुराम के रूप में अवतार ग्रहण किया। 21 बार क्षत्रियों का विनाश किया पूरे विश्व के। राजा परीक्षित ने पूछा प्रभु क्या अपराध हो गया क्षत्रियों से कि भगवान परशुराम जी ने 21 बार घूम घूम के पूरे भूमंडल से क्षत्रियों का विनाश किया। श्री सुखदेव जी महाराज के कि परीक्षित यह उन दिनों की बात है जिस समय है वंश का अधिपति शास्त्राबा अर्जुन वो एक महान बलवान श्रेष्ठ राजा था और खास बात उसने दत्राते जी को प्रसन्न कर लिया था अवधूत शिरोमणि दत्तात्राते जी और उनसे 1000 भुजाएं कभी शत्रु से युद्ध में पराजित ना होना कभी कोई ऐश्वर्य की कमी ना होना जो इच्छा करे वह प्राप्त हो जाना यह सब वरदान प्राप्त किए थे भगवान दत्तात्रेय जी से अब अबाद बल अतुल संपत्ति तेजस्वीता वीर कीर्ति शारीरिक बल सब कुछ दत्तात्रेय जी से प्राप्त हो गया था एक तरह से महायोगेश्वर खुद बन गया था दत्तात्रय जी की कृपा से शास्त्रभाव अर्जुन वह ऐसी सिद्धियां जान गया था कि सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थूल से स्थूल वो शरीर धारण कर लेता।

बड़ी सिद्धियां उसकी वो वायु की तरह कहीं भी पहुंच जाता। ऐसी सिद्धियां दत्तात्रेय जी से प्राप्त की। एक बार एक गले में वैजंती माला डालकर और बहुत सी सुंदर स्त्रियों के साथ नर्मदा जी में जल विहार कर रहे थे। और उधर रावण नर्मदा के किनारे दिग्विजय करते हुए अपने तंबू लगाए हुए था। तो 500 भुजाएं इधर 500 भुजाएं इधर पूरी नर्मदा के जल को रोक दिया शास्त्राव अर्जुन ने रावण का शिविर डूबने लगा उधर। तो रावण ने पूछा बिना बरसा के कैसे बाढ़ आ गई उल्टा? बोले महाराज एक वीर है जो स्त्रियों के साथ जल में खेल रहा है।

खेलते खेलते नर्मदा को उल्टा प्रवाहित कर तो उन्होंने कहा हमसे बड़ा वीर कौन है? रावण बड़े घमंड में गया। अपने को बड़ा वीर मानता था। और जाके शास्त्रा अर्जुन से अब वीरता की बातें करने लगा। तो उन स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिए खिलवाड़ में तो ऐसे रावण को पकड़ लिया। शास्त्रा अर्जुन ने बंदर के समान एक पिंजरे में बंद करके और अपनी राजधानी माहिष्मती ले जाकर के जहां घोड़े थे वहां पिंजरा रख दिया। पिंजरे में 10 खोपड़ी वाले रावण को 20 भुजा हजार भुजा वाला शास्त्र अर्जुन और सब सिद्धियां प्राप्त किए।

तब महाराज पुलस्त जी को पता चला कि दिग्विजय रावण घोरसार में एक पिंजरे में बंद है। तब जाकर शास्त्राबा अर्जुन के सामने गए तो शास्त्रा अर्जुन ने पूजन किया क्योंकि पुलस्त ऋषि तो उन्होंने आज्ञा करी कि छोड़ दो हमारा नाती है। छोड़ दिया रावण को। अब शास्त्राव अर्जुन का अभिमान बढ़ता चला गया। क्योंकि दिग्विजय रावण जैसे को बंदी बना लिया। अब वह एक दिन शिकार खेलने के लिए अपने परिकर के साथ जंगल में गया तो प्यास लगी तो पास में जमदग्न जी का आश्रम था। तो जमदग्न ऋषि के आश्रम में पहुंचे।

मुनि ने देखा कि बहुत बड़ा राजा आया हुआ है तो इसका स्वागत राजा भगवान का स्वरूप है। अब जंगल में वही कंदमूल फल तो कामधेनु जमदग्न जी की गाय का नाम था। जो इच्छा करो वो प्रकट कर दे। अब मंत्री सेना और राजा का स्वागत करना है तो वैसे ही सेवक वैसे ही सामग्री सब व्यवस्था शास्त्रा अर्जुन ने कहा कि बाबा जी के पास ऐसी व्यवस्था कहां से हो सकती है कि इतने सैनिक इतने सेवक इतनी धातुओं के पात्र और भोजन सब बोले कहीं कोई रसोइया नहीं सब एक गाय का चमत्कार है बोले ऐसी गाय तो हमारे पास होनी चाहिए संत के पास क्या अब जमदग्नि मुनि का ऐश्वर्य कामधेनु से था तो चिढ़ गया शास्त्रभाव जबकि प्रसन्न होना चाहिए कि इतना बढ़िया स्वागत किया और उसने आदेश किया जमदन ऋषि से कि कामधेनु हमारे सैनिकों को दे दो जमदंड जी ने कहा नहीं यह तो यज्ञ के भविष्य के लिए अतीत सेवा के लिए है तो कहा मैं एक बार केवल कहता हूं दोबारा छीन लेता हूं।

शास्त्र बाबा अर्जुन ने आदेश किया कामधेनु को बंदी बनाकर ले चलो। अब कामधेनु डकराती हुई बल पूर्वक शास्त्रभाव अर्जुन महिष्मती पुरी ले गए। जब शाम के परशुराम जी आए तो आश्रम सब उजड़ा हुआ। मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि सारा का सारा दुष्टता का वृतांत शास्त्रा अर्जुन है हे वंशी भयंकर फरसात हाथ में लिए हुए परशुराम जी जैसे किसी महामत वाले सिंह को कोई दबा नहीं सकता। ऐसे गरजते हुए महिष्मती पुरी गए। अभी वह मस्ती में था कि प्रवेश ही नहीं कर पाया था कि भगवान परशुराम जी पहुंच गए।

परशुराम जी की बड़ी विलक्षण झांकी थी। हाथ में परशुराम मस्तक पर जटा का मुकुट त्रिपुंड लगा हुआ। जे भी शास्त्रा अर्जुन झपटा भगवान परशुराम जी ने जो जटाएं सूर्य की तरह चमक रही थी खोल लिया और हाथ में फरसा धारण करके बात की बात में सारी सेना को विध्वंस करके और उसके हजार भुजाएं जो भगवान अवधूत शिरोमणि दत्तात्रेय जी के द्वारा दिए थे सब काट के गिरा दी फरसे का ऐसा प्रहार कि कोई सामने नहीं बचा। बाहें जा सब काट काट के परशुराम जी के बाणों से जब है पति का सर्वनाश हो गया तो 10,000 लड़के थे शास्त्र अर्जुन के 10,000 भगवान परशुराम जी तो 10,000 लड़के तो अभी नहीं थे इनके साथ ये अलग थे सब पूरे परिकर सहित शास्त्राव अर्जुन को मार डाला।

भगवान परशुराम जी ने। कामधेनु छुड़ाकर आश्रम में ले आए। माहिष्मती पूरी के शास्त्रा अर्जुन का विनाश बड़ा आश्चर्यमय जमदंड जी ने कहा हाय हाय परशुराम तुम क्या उपद्रव करते हो? अरे राम राम वो राजा था गाय ले जा रहा था ले जाने देते। तुमने हत्या क्यों कर दी? राजा सर्वदेवमय होता है। तुमने अपराध किया। अरे हम लोग ब्रह्म ऋषि हैं। क्षमा हमारा बल है। संसार हमको इसीलिए पूजता है क्योंकि हम क्षमावान हैं। तुम्हारे ब्रह्मा जी भी क्षमा के बल से ही ब्रह्म पद पर स्थित है।

ऋषियों की शोभा क्षमा होती है। ये सर्वशक्ति प्रदर्शन नहीं। भगवान तुम पर प्रसन्न हो। अब तुम तप परायण हो। तुमने अपराध किया, राजा का वध किया। यह ब्रह्म हत्या से भी बढ़कर है। जाओ तीर्थों का सेवन करते हुए तप करो और इसका प्रायश्चित कर डालो। भगवान परशुराम जी घुटने टेक कर जमदग्न जी के आगे जो आज्ञा। [गला साफ़ करने की आवाज़] अब एक वर्ष तीर्थ यात्रा करके अपने आश्रम पर आए। परशुराम जी की माता रेणुका गंगा तट पर संध्या के लिए गंगाजल आदि लेने गई थी। वहां एक गलती हो गई माता जी से।

आज सत्संग में कहा नेत्र वाणी कान संभाल के नहीं अपराध बन सकता किसी से भी। तो वहां गंधर्वराज चित्र अप्सराओं के साथ जल विहार कर रहा था। गंधर्वराज के जल विहार करते समय अंग प्रत्यंग और श्रावों की वह क्रीड़ा माता जी कुछ क्षण देखती रही अच्छा लगा बस कोई कामना नहीं हुई कोई मलिनता नहीं आई बस देखती रही अच्छा लगा और भूल गई कि संध्या का समय पतिदेव तर्पण आदि के लिए इसमें लिखा हुआ कि उनका मन गंधर्व राजम क्रीडंतम मत्सरोभी पश्चत अच्छा लगा विलोकती क्रीडंत मुदम नदीम गता उनका मन खींच गया चित्ररथ की इस अप्सराओं से के कहां जमदग्न जी का एकांतिक भजनमय स्वभाव और माता जी ने जब चित्ररथ गंधर्व की केली देखी अप्सरा से तो अच्छा लगा बस ये संध्या का समय बीत गया भगवान जमदग्नि जी इंतजार कर रहे ऐसा कैसे हो गया कि संध्या की अवहेलना हो गई और अभी तक रेणुका जल लेकर नहीं आई।

अब जे भी होश आया जमदन ऋषि को भयभीत हो गई कि अब तो भारी अपराध बन गया। वो महर्षि के सामने आई है। गंगाजल का कलश रखा। हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। जमदग्नि मुनि ने कहा मैं देख रहा था। तुम्हारा मन चित्रदत गंधर्व की केली देखने में खींच गया। तुम अपराधी हो। पापिनी हो। तुम एक ब्रह्म ऋषि की पत्नी होकर ऐसा कैसे देखा? इसका दंड है मृत्यु। ऐसा कठोर शासन अन्य पुत्रों से कहा मार डालो इसको रेणुका को किसी भी पुत्र की हिम्मत नहीं रही। इतने में तीर्थ यात्रा करके भगवान परशुराम जी आए प्रणाम किया।

उन्होंने कहा बेटा मां और भाइयों को मार डालो। परशुराम जी ने कोई विचार नहीं किया। तत्काल मां और भाइयों के फरसे से गले उड़ा दिए। सत्यवती नंदन महर्षि जमदग्न जी बहुत प्रसन्न हुए और कहा बेटा तुम्हारी जो इच्छा हो वरदान मांगो। परशुराम जी ने कहा मेरी मां मेरे भाई जीवित हो जाए। उनको यह पता भी ना रहे कि मैंने वध किया है। तत्काल जीवित हो गए। भगवान परशुराम जी के ऐसा कहते हुए ऐसे उठ के बैठ गए जैसे सो के पूरे सकुशल परशुराम जी को पता था हमारे पिता जमदन जी कितने महान पवित्र ऋषि और तपोबल संपन्न है।

शास्त्राव अर्जुन के वध का प्रायश्चित कर लिया था। परशुराम जी एकांत आश्रम के कोने में बैठकर ध्यानस्थ थे। बहुत दिनों के बाद शास्त्राबा अर्जुन के लड़कों के हृदय की जलन वो आए और देखा महर्षि जमदन अग्निशाला में ध्यानस्थ बैठे हैं। उनको बाहर की कोई सुध नहीं। वो सब प्लान बना के आए थे। पूरे आश्रम को उजाड़ दिया। और माता रेणुका बड़ी दीनता से प्रार्थना कर रही थी। एक भी बात ना मानी और जमदग्न जी का सिर काट ले गए। जमदग्न जी ध्यानस्थ थे। बड़े नीच कार्य किए आश्रम में।

रेणुका जी चीख पड़ी। बेटा परशुराम ध्यानस्थ थे भगवान परशुराम जी। उनका मां का करुण क्रंदन भागे फरसा लेकर। जब नजदीक आए तो देखा जमदग्न जी का सर काट ले गए। परशुराम जी को अत्यंत अत्यंत क्रोध माता से कहा कि विलाप मत करो। वीर पुत्रों की मां विलाप नहीं करती। आज मैं प्रण करता हूं कि विश्व में क्षत्रियों का संहार कर डालूंगा। एक भी क्षत्रिय विश्व में नहीं रहेगा। अभी पीछे जो आप चरित्र सुन रहे थे उनमें एक घाघरा के नीचे माई के बालक क्षत्रिय छुपा लिया गया था जांग ताल वो क्या उनका नाम विस्मरण हो रहा जंघा में के पास छुपा लिया था वही केवल बचा था उसी से क्षत्रिय वंश चला पीछे चर्चा में भी आया था भगवान परशुराम जी ने भगवान शंकर का स्मरण करके संकल्प लिया कि विश्व में क्षत्रिय नहीं रहने देंगे।

परशुराम जी माहिष्मती पुरी में गए और 10,000 पुत्रों के अलग-अलग सर काट के रख दिए और पूरे नगर का विनाश कर दिया। भारी पर्वत ऐसे सिर का मुंड ऐसे इकट्ठा कर दिए काट काट के और कहते जाते ब्रह्मघाती तुम्हारा विनाश परशुराम करेगा। रक्त की नदी बहा दी इतने कांटे जो राजा थे क्षत्रिय थे ब्राह्मण द्रोही क्षत्रियों का हृदय कांप उठा भगवान वर्तमान में जो क्षत्रिय असुर स्वभाव वाले हो गए थे उनके विनाश के लिए ही प्रकट हुए थे इसलिए अपने पिता जमदग्नि के वध का निमित्त बनाकर 21 बार एक बार घूम के काट डाला फिर दो बार घूम के 21 बार पूरे विश्व में घूम के पांच तालाब समंत पंचक में रक्त के बना दिए काट काट के और फिर अपने पिता का सर जो सुरक्षित रखा हुआ था माता के पास जोड़ा और पुनः जीवित कर दिया।

पहले 21 बार क्षत्रियों का विनाश किया। फिर अपने पिता का सर ला के जोड़ा और फिर बाद में सबके प्रायश्चित के लिए यज्ञ की और सात दिशाएं जीत के ब्रह्म ऋषियों को दान कर दी। इसके बाद यज्ञांत स्नान किया और समस्त पापों से मुक्त होकर मेघ रेत सूर्य के समान तेजस्वी परशुराम जी जमदग्नि जी को स्मृति रूप संकल्प में शरीर की प्राप्ति हुई। भगवान परशुराम जी से सम्मानित होकर सप्त ऋषियों के मंडल में सातव ऋषि होकर आज भी विराजमान है। परीक्षित कमल लोचन जमदग्न नंदन भगवान श्री हरि परशुराम बनकर के आए और क्षत्रियों का विनाश करके जगत का मंगल किया।

आज भी भगवान परशुराम जी विराजमान है महेंद्रचल पर्वत पर पर बड़े शांत स्वरूप सिद्ध गंधर्व चारण उनके चरित्रों का गान करते हैं। सर्वशक्तिमान विश्वात्मा भगवान श्री हरि जब राम रूप में अवतार लिए और जब धनुष भंग हुआ तो अजगो का खंडन सुनकर परशुराम जी के हृदय में शोभ हुआ कि फिर कोई क्षत्रिय ऐसा पैदा हुआ क्योंकि वो सब विनाश लीला करके शांत कौन ऐसा पैदा हो गया जो हमारे गुरु काज को खंडन कर दिया अब ध्यान के द्वारा फोन से तो मतलब मतलब ध्यान के द्वारा देखा बोले विदेहराज जनक की नगरी मिथिला पहुंच गए इनके चलने से ही पृथ्वी कांपती थी देख ले कि परशुराम जी आ रहे तो मतलब जितने भाग पाए भाग पाए

नहीं चरणों में लौट जाते थे अपने बाप बाबा का नाम लेते हुए भाई साह ऐसा सहज चित मन रिसाने ऐसे देख लिए तो समझ गए हमारी आयु पूरी हो गई कोई भी हो ऐसा रुद्र रूप भगवान परशुराम का पिता सहित नाम लेकर सब दंडवत प्रणाम महाराज जनक भी सब सीता जी को लाके विश्वामित्र जी राम लक्ष्मण को लाकर दंडवत कराई भगवान परशुराम ने कहा जनक इस सभा में कौन ऐसा है जो हमारे गुरु भगवान शंकर के अजगोव का खंडन करने वाला है सारी सभा उसको छोड़कर अलग हो जाए या वो सभा को छोड़कर अलग अलग हो जाए नहीं अब सारी सब हमारी जाएगी।

अब तो कोई उनके ये थोड़ी था कि केवल भाषण दे रहे हैं। उन्होंने 21 बार क्षत्रियों का पूरी जनकपुर में हाहाकार मच गया। जानकी जी को एकांत लेकर उनकी माता रोने लगी। सब बन गया था। बिगड़ गया। नहीं तो बढ़िया बन गया सब। अजगो खंडन हो गया। राम जी के साथ सिया जी का ब्याह हुआ। बाहर उलरे चलाए दे रहे थे। परशुराम जी। लक्ष्मण जी ने कहा महाराज महाराज थोड़ा शांति धारण करो शांति ऋषि का स्वरूप शांत घोर वेश धारण किए हुए हो कैसे बार-बार ये ऋषियों की मर्यादा अरे ये किसका लड़का है हमको समझा रहा है परशुराम जी हमको समझा रहा है हमारा गीत विश्वामित्र से कहा बता दे हम कौन है लक्ष्मण जी ने कहा गुरु जी के बताने की जरूरत नहीं आप कई बार बता चुके हो आपने तो अपने मुख से कई बार बताया कि आपने फरसा से क्षत्रियों को काटा ये वो खूब बता चुके हो महाराज यहां कुम बतिया को नाही जे तर्जनी देख मर जाही ये बार-बार उलरो मत गुस्सा मत दिखाओ यहां कुमड़ा की बतिया नहीं कि तुम्हारी तर्जनी उंगली देखने से हम महाराज हम रघुवंशी हैं।

जहां परशुराम जी का क्रोध बढ़ता वहां राम जी आगे आ जाते। हाथ जोड़कर विनय करने लगते हैं। तब उन्होंने कहा पहला फरसा तुम्हारे चलेगा। राम जी से कहा कि पहला क्योंकि जब हमको क्रोध आता है यह छोटा राजकुमार क्रोध दिलाता है इसको तो समझाते नहीं और हमसे विनय करते हो और हमें लगता है कि तुम ही ने खंडन किया है। राम जी ने कहा हां आपका कोई दास निज दास वही ऐसा करने के साहस कर सकता है। अरे दास तो सेवा करता है। स्वामी के प्रति अपराध नहीं करता है। बहुत क्रोधित होकर के तब उन्होंने कहा परशुराम जी से सावधान अभय होए जो तुम्हें डराइए।

पहली बात तो जो आपसे डर जाता है वो अभय हो जाता है क्योंकि आपका स्वरूप ऐसा है और दूसरी बात हम आपको बता रहे हैं। हम रघुवंशी हैं। काल भी सामने ललकार दे तो कदम पीछे नहीं हटाते। भगवान श्री राम के गंभीर वचन जे भी कान में पड़े आंख में आंख मिलाई तो थर्रा गए परशुराम जी और कहा एक हमारा संशय निवृत्त करो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दो बस मेरे हृदय में कुछ संशय हो गया ऐसे ही जे लेने को हुए से धनुष आ गया खिलवाड़ में चाप चढ़ा दी उनका भगवान श्री हरि के सारंग धनुष पर चाप केवल श्री हरि चढ़ा सकते हैं।

आप श्री हरि हैं। आप हमारे भगवान हैं और भगवान के चरणों में झुके और उस दिन जो चाप चढ़ा तो भगवान श्री राम ने कहा आपकी आयु को नष्ट कर दे या आपके तप को नष्ट कर दे क्योंकि बाण व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्होंने कहा प्रभु हम तो आपके आश्रित हैं। तप को नष्ट कर दीजिए। जिसे हम पुनः कर सकते हैं। लेकिन आयु और अंतर्ध्य शक्ति आदि को नाश मत कीजिए। भगवान ने परशुराम जी के तप को लक्ष्य बनाकर बेधा। उस दिन से आज भी शांत स्वभाव से बिना किसी को मारे काटे भगवान महेंद्राचल पर्वत पर विराजमान है।

बड़े-बड़े सिद्ध गंधर्व भगवान के चरित्र का गान करते हैं। महाराज गाधि के पुत्र हुए प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी विश्वामित्र जी यह होने थे जमदग्नि जी के जगह लेकिन उल्टा हो गया था तो विश्वामित्र जी ये जन्मे तो क्षत्रिय कुल में लेकिन तपोबल और ब्रह्म तेज संपन्न होकर ब्रह्म ऋषि बने। विश्वामित्र जी के 100 पुत्र हुए। उनमें पिछले पुत्र का नाम था मधुछंदा। इसलिए सभी पुत्र मधु छंदा के नाम से विख्यात हुए। विश्वामित्र जी ने भृघुवंशी अजीगत के पुत्र अपने भांजे सुना सेब को जिसका एक नाम देवराज था।

पुत्र रूप में स्वीकार कर लिया और पुत्रों से कहा तुम लोग इसे अपना बड़ा भाई मानो। यह वही प्रसिद्ध भृघुवंशी सुना से था जिसे हरिश्चंद्र के यज्ञ में यज्ञ पशु के रूप में मोल लेकर लाया गया था। विश्वामित्र जी ने प्रजापति वरुण आदि देवताओं की स्तुति करके उसे पास बंधन से छुड़ा लिया। देवताओं के यज्ञ में यही सुना से देवताओं द्वारा विश्वामित्र जी को दिया गया। इसलिए देवात देवहाता तो देवरात गादी वंश में महान तपस्वी देवात के नाम से विख्यात हुए। जिन विश्वामित्र जी के पुत्रों ने सुना सेब को बड़ा भाई मानने से इंकार कर दिया तो विश्वामित्र जी ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया जाओ तुम सब म्लेक्ष हो जाओ तो वही उन्हीं से म्लेक्षों की उत्पत्ति हुई 49 भाई अलग-अलग म्लेक्ष हो गए तब विश्वामित्र जी ने बिछले पुत्र मधु छंदसा से अपने से छोटे 50 भाइयों के लिए आज्ञा की कि इनको धर्म पूर्वक चलाओ।

सुना सेब को बड़ा भाई स्वीकार करो। विश्वामित्र जी की आज्ञा का पुत्रों ने जो पालन किया वो उनके कुल में बड़े प्रशंसनीय और धन्य हुए। सुना से अन्य गोत्र का तो भी आदेश किया विश्वामित्र जी ने कि मेरे ही गोत्र का माना जाएगा। विश्वामित्र जी के अष्टक हारित जय कृतमान आदि भी पुत्र हुए। इस प्रकार विश्वामित्र जी की संतानों में कौशिक गोत्र में कई भेद हो गए। छत्रवृत रजि ये भगवान श्री कृष्ण जिस वंश में अवतार लेते हैं इन्हीं राजाओं का वर्णन हो रहा है पूर्व में शेष चर्चा आगे।

श्री राधा वल्लभ लाल की जय।

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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