हमें जीवन में मुश्किलें कब तक सहनी पड़ेंगी ? //25/09/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
कोई ना कोई सा किसी ना किसी सेवा सेवा में पांच 10 15 20 का एक होता है आमच राग द्वेष बनने से बहुत ज्यादा दुभावना रहती है उसके कारण क्या विक्षेप होता रहता है और एक दूसरे की ये मतलब बहुत ज्यादा सर पे बढ़ जाता है महाराज एक स्तर ऐसा आता है कि बहुत ज्यादा वेश हो जाता है आप जिस गुरु सेवा में है उसी किसी गुरु सेवा में वो है जिसकी आप निंदा कर रहे हो जिसकी आप अवहेलना कर रहे हो या जिसके आचरण से असंतुष्ट हो ये तुम्हारा विषय नहीं है कि वो कैसा आचरण करता है ये इष्ट और गुरु का विषय कि कैसा आचरण करता है हमको उस आचरण करने वाले से कैसा व्यवहार करना है हमको यह देखना है अगर आप साधना करना चाहते हैं तो आपके पास ही विरोधी रखा जाएगा जैसे मीरा जी का देवर, नरसी मेहता जी की भाभी, विभीषण जी का भाई, प्रह्लाद जी का पिता, भरत जी की माता बड़ा नजदीक रखा गया था।
क्यों? क्योंकि इसी से परम ब्रह्म की प्राप्ति की योग्यता आएगी। जवाब सही जवाब यदि हम द्वेष करते हैं तो राग और द्वेष ये दोनों भगवत प्राप्ति नहीं। इसलिए द्वेष का त्याग करने के लिए जिस पर द्वेष हो उसे भगवत स्वरूप मानकर प्रणाम करना। अगर प्रणाम नहीं करते हो तो तुम द्वेष से बच नहीं सकते हो। और द्वेष से बचना है तो आप 10 दिन ये काम करके देखो। हे प्रिया प्रीतम आप इसके अंदर हो प्रणाम उसके सामने प्रणाम करो वो तुम्हारा अवहेलना करे भास्कर जब मिले जब मिले तब से कभी उसकी चर्चा मत करो कभी उससे द्वेष अंदर से मत रखो निर्मल हो जाएगा भागवतिक उपाय है सांसारिक उपाय नहीं सांसारिक उपाय में होता है कि कमरा बदल दे स्थान बदल दे तो तुमको दूसरा उससे बढ़कर के ठाकुर जी मिलवा देना ये ले फिर लगेगा ये तो तो सहत सहित बाड़े भगति गृह तन गुरु हितकार गृह तन गुरु हितकार हार अपनी करत हार अपनी करमानत चार वेद सुष्मत
चार कुल कर्म न जानत हमें शास्त्र गुरु से मतलब नहीं है चार वेद और जो और भी आगम निगम पुराण है हमें अपने गुरु से मतलब हार अपनी गुरुदेव के सामने हार मतलब अपने को बेच दिया दास बना दिया अगर हम अपनी भावना सब में भगवत भावना करें आए तो इसीलिए है ना हमें कोई कष्ट दे हम सह लेंगे लेकिन पलट कर जवाब नहीं देंगे तो यही है उमा संत कह यही बाई करत मंद जो करे भलाई अगर आप द्वेष करने वाले से द्वेष करेंगे राग करने वाले से राग करेंगे तो बाबा जी का ये तो संसारी पुरुष है बाबा जी उमा संत क है मंद करत जो करे भलाई वो मंद कर रहा हम उसकी भलाई कर रहे आखिरकार भलाई की एक दिन जीत होती है और वो भगवान को प्राप्त होता है वो जो है वो अपनी स्थिति में रहेगा क्योंकि वो राग द्वेष युक्त है हमें राग द्वेष युक्त राग द्वेष दोनों खोइए और खोजी पद निर्वा कहे नानक यह कोई कोई गुरुख जान गुरुख जान कोई कोई कोई गुरु कृपा पात्र ही ये बात जान पाता है कि ये राग है ये द्वेष है और दोनों को खोजिए खोजिए पद निर्वा ये आज पहली बार नहीं सुन रहे हैं आपसे
पर परिवर्तन जब मानोगे नहीं तो परिवर्तन किस बात का अगर मानो तो जिससे द्वेष हो रहा है उसको ऐसे हाथ जोड़ो और अंदर पतित नाम पावनभ्य वैष्णव्य नमो नमः नहीं कुछ आता है तो वैष्णव्य नमो नमः मान लो पूरा श्लोक नहीं आता है तो वैष्णव्य नमो नमः हे प्रभु आपको ये क्र अप पापो नसता सम दृश्य सर् परम स्वराम सब में मेरे राधा वल्लभ लाल विराजमान है हे प्रभु आप कृपा करो कभी आपके प्रति द्वेष ना हो और उनको रोज प्रणाम करो अगर ठीक ना हो जाए तो मैं बता और इतनी हिम्मत है एक क्रूरा आचार्य का आदेश है एक क्रूरा क्रूर स्वभाव वाला एकरा अप पापिनो पापी जो संतों के संभाषण योग्य भी नहीं राधा वल्लभ लाल की उसमें भी राधा वल्लभ लाल अब आचार्यों की बात नहीं मानोगे तो गुरुजनों की बात नहीं मानोगे तो माया प्रपंच से अलग होगी पाओगे कोई उपाय नहीं महाराज जी आप देखते तो सामने वाला हम में भी नहीं देखते नहीं सामने वाले में हमें देखना है वो हम में देख यही उल्टा है सत्संग अपने लिए दूसरे के लिए नहीं है अपने को तो तणाद ही सुनीचे अपने को तण से
नीच देखना अधम मानना है सामने वाले पर भगवत बुद्धि करनी बच जाओगे बच जाओगे नहीं राग द्वेष तो चपेट में ले ही लेते हैं मतलब अब आप समझिए वहां भंडारा हो रहा है। हमारा रोगी शरीर भंडारा खा नहीं सकते। भूखे दिन में रहते रात में जाकर के गोस्वामी पर के यहां मांगते तो एक परेठा एक पूरी एक रोटी तो केवल एक रोटी खा लेते पूरी परेठा का खा सकते थे। जीवन भर प्रतिकूलता तब जाकर बात समझ में आती है कि भगवान क्या है और उनकी लीला क्या है वो जितना समझा देते हैं अगर परमार्थ में बढ़ना चाहते हो तो पर दुख को गले लगाओ प्रतिकूलता का आदर करो अपमान निंदा से प्रसन्न होना चाहिए हो अगर आगे बढ़ना चाहते हो तो यह बात गांठ बांध अपमान और निंदा प्रतिकूलता और दुख ये भगवान से जोड़ के भगवान से मिला देते हैं।
लिख लो और जब तक ये जीवन में नहीं होंगे तब तक आप आगे ले किसी भी महाभागवत के चरित्र को आप पढ़ के भारी कष्ट से कष्ट था। प्रतिकूलता तुकाराम जी महाराज एक गांव में कीर्तन करने गए थे। वो एक आदमी बड़ा नास्तिक था। चरित्र में पढ़ा है वो। तो कुछ भक्तों ने उसको प्रेरित किया कि भैया इतने बड़े महापुरुष आए हैं। तुकाराम जी कीर्तन करते हैं तो कुछ मिनट ले जाया कर। वो गया तो ऐसी श्रद्धा बनी कि उसने दीक्षा ले ली कुछ समय बाद और भगवान मानने लगा। अब सत्संग में प्राय पवित्र आचरण ब्रह्मचर्य आदि की तो पत्नी से वो जो पति पत्नी का संबंध होता है वो बंद हो गया अब पत्नी परेशान तो उसने विचार किया कि हमारे जीवन के सुख को नष्ट करने वाला ये तुकाराम कैसे दंड दे तुकाराम तो अपने पति के पैर पड़कर कहा आपका तो कल्याण हो गया हमारा तो कहा चलो गुरु जी के सत्संग बोले नहीं एक बार गुरु जी को घर लाओ बोले प्रयास करते हैं अगर आपका परिवर्तन घर जाने से हो जाता है तो प्रयास करते तुकाराम जी से पूरी बात बताई कि वो सहज
में चल उसने आसन ही ऐसे लगाया कि रसोई की तरफ पीठ और ऐसे और पहले से पांच घंटा खौलता हुआ पानी भगौना को उठाया और तुकाराम विट्ठल विट्ठल विट्ठल पूरा शरीर चमड़ा और उन्होंने लिखा है कि हां विट्ठल बहुत परेशानी हो रही हां विट्ठल बहुत आग लग रही ऐसे महापुरुष जिनके लिए विमान आया था अंतिम अंतिम में विमान आया था सबको नमस्कार करके विमान पे चढ़ के फिर भगवत धाम गए ऐसे महापुरुष के साथ ऐसी ऐसी प्रतिकूलताएं घर में खाने को नहीं था और शिवाजी जैसे राजा उनके चरणों में लौटते थे।
घर में खाने को नहीं था। पत्नी जो थी वो थोड़ा संकट स्वभाव की थी। सब कुछ भक्तों ने सहा है। जो सहा है वही महा भागवत बना है और जो कि हम किसी से कम नहीं तो भगवान के दरबार में आदर नहीं। यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चले आए। हमें ऐसे होना पड़ेगा। नहीं होगे तो तुम्हारे ऊपर भगवान की कृपा होगी। तो तुमको जबरदस्ती पिटवा के पुजवा के जैसे बनेगा वैसे अपना बना तुम्हें सहना ही पड़ेगा जिसके जीवन में ही देख ऐसा क्यों देखा जाता है क्योंकि उनका अंतिम जन्म होता है अनेक जन्मों के पापों का नाश करके भगवत प्राप्ति होती है थोड़ा थोड़ा भोगाकर थोड़ा थोड़ा प्रतिकूलता दिखाकर अनेक जन्मों के दोष और अनेक जन्मों के पापों का नाश होता है छोटी सी बात प्रतिकूलता हमें भगवान से मिलाती है पक्का सोचो अपमान मान निंदा ये भगवान का भजन कराते जिसे भजन कहते हैं।
अगर आप लोग इससे डरोगे तो फिर चलने सम्मानम कल्यात भोर गण श्रीपाद प्रभु सम्मानम कल्या भोर गणम नीचा अपमानम सुधा श्री राधा मुरली धरो सखी वृंदावन माध्य ऐ मित्र वृंदावन को मत छोड़ो सम्मान को घोर विष समझो और नीच पुरुषों द्वारा किए हुए अपमान को अमृत समझकर राधा मुरलीधर का भजन करो बिल्कुल आपकी बात ठीक है। हम सहन नहीं करेंगे। कब तक यानी कोई जब तक शस है जब तक शस है तब तक बड़े-बड़े महापुरुषों की ऐसा नहीं कि वृद्धावस्था में आप देखो चरित्र खोल करके देखो जब तक स्वास है यहां तक कि गड़ासा चला दिया गया खोपड़ी बाबा का ऐसे ब्रह्म मूर्ति महापुरुष से किसका द्वेष लेकिन भरी सभा में बड़ा सा भरी सभा में नाक काटने का प्रयास किया गया भरी सभा में भयंकर निंदा हुई उड़िया बाबा को भयंकर भरी सभा में एक से विद्वान शिष्य थे धनवान शिष्य थे तब ऐसे हम देख लेंगे ऐसे ही हां शास्त्री उससे देख लेंगे
मतलब मतलब विधान से बाबा को कुटिया में जब गए तो फड़फड़ा बोले बाबा आपने रोक दिया नहीं तो ऐसा बोले यही सत्संगत करते हो हमारे राधा राधा वो देह की निंदा करते हैं हम भी निंदा करते हैं देह की अगर वो आत्मा की निंदा करते तो फिर वो अज्ञान की बात थी क्योंकि हमारी और उनकी आत्मा एक है और देह पांच भौतिक इसकी निंदा हम भी करते हो तुम लोग यही सत्संग करते हो सबको एक मिनट में शांत करते हो ये मूर्खों का काम है ये विद्वानों या ज्ञानियों का काम नहीं है ज्ञानी विवेकी वही है जो धैर्य पूर्वक सह करके निकल जाए सुधार भगवान ने सहने के लिए सब कुछ कहा और किसके साथ प्रतिकूलता नहीं हुई आप किसी भक्ति के साथ बता दो पांडव घर में भाई चचेरे भाई घर में रखा है सामने रखा है भगवान ने दूर नहीं प्रतिकूलता रखी सामने रखी है घर में घुसकर प्रतिकूलता करेगा घर में घुसकर प्रतिकूलता करेगा आप बताओ अब गुरु वो जगत गुरु है तब जाकर के भगवान अधीन हो जाते तब वो भक्ति की जय जयकार कराने के लिए वो महिमा प्रकट करते हैं पूरा पृष्ठ झुका देते हैं उसके
साथ नपति द्वारे जिनके दर्शन के लिए खड़े रहे ऐसा बना देते हैं नरपति द्वार ठाड़े रात प्रतिपल प्रतिकूलता ऐसे चुपचाप सहो अगर इस मार्ग में आए हो और उन्नति चाहते हो तो प्रतिकूलता को सहो शारीरिक कष्ट को सहो काम आदि विकारों को सहो तो भगवान के लाडले बन जाओ भगवान के प्यारे भक्त बन जाओगे महान वही बनता है जो सह देना अंदर से भगवत भाव करना बट बाहरी व्यवहार कैसा मित्रवत हर चीज आप ऐसे वो हमसे श्री हरिवंश से नहीं बोलेगा हम अपनी तरफ से बोलेंगे श्री हरिवंत और ज्यादा चढ़ता है और ज्यादा तो हम भी पैर छ लेंगे उसके अगर वो हमें मार रहा है तो हम मानसिक उसको प्रणाम कर रहे हैं कि हमारा मार्ग परमार्थ संत संत और महात्मा ये ऐसी थोड़ी पदवी मिलती है।
कैलाश से बोल पड़े एक लात रावण ने मारी और विभीषण जी ने हाथ जोड़ा और कहा तुम पितु सरिस भले मोह मारा राम भजे तो कैलाशपति भगवान से उमा संत ये देखो संत उमा संत कहे की बाई मंद करत जो करे संत ऐसे थोड़ी हो जाते भष मात्र रखने से संत थोड़ी हो जाते कब को हो यह रहा नहीं रहो श्री रघुनाथ कृपालु कृपा बातें साधु स्वभाव का स्वभाव हां साध स्वभाव होना बड़ा कठिन बात है बहुत ही गुरु कृपा से आता है ये गुरु कृपा से आता है अभी आपकी बात सुनी और हमने भगवत भाव पे और मित्र पर व्यवहार करने का प्रयास करने का अंदर ठान लिया पर महाराज जी भूल गए और प्रतिक्रिया हो और उसके बाद फिर 10 आधा घंटा एक घंटे बाद फिर से फिर उससे मानसिक प्रणाम करो मानसिक हां मानसिक प्रणाम करो क्षमा मांगो उसी दृष्ट में प्रणाम करो और उसको क्षमा मांगो क्योंकि हे भगवान आप ही स्वरूप में हो।
अब हम सामने आने की तो हिम्मत नहीं कि आपके पैर छू ले। तो प्रभु मैं आपको प्रणाम करता हूं। आप मुझे क्षमा कीजिए। मैंने आपसे प्रतिकूल व्यवहार किया। आगे से कभी नहीं करूंगा। इससे क्या हुआ? हृदय शीतल हो गया। आपका हृदय। हां। तो पर सामने वाला फिर भी द्वेष रखने लग गया। उस बात से तो आपका हृदय इतना शीतल हो जाएगा कि आपके ऊपर मृत्यु का भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। तभी तो मृत्यु महोत्सव हो जाती है भक्तों के लिए। सबसे बड़ी प्रतिकूलता मृत्यु है। देखो एक शीशा ऐसा है जिसमें कंकड़ मारो चूरचूर हो जाएगा।
और एक शीशा है जिसमें गोली मारो कोई असर नहीं होगा। मैं हां उलटपुट क्यों हुआ? गरम ठंडा गरम ठंडा गरम ठंडा गरम ठंडा इतना मजबूत कर दिया कि गोली पार नहीं होगी। गोली वही शीशा जिसमें छोटा सा कंकड़ मार दो पूरा शीशा बैठ जाएगा और वही शीशा गोली मार दो तो नहीं टूटेगा बुलेट प्रूफ ठाकुर जी अपने साधक को अपने शरणागत को बुलेट प्रूफ बना प्रतिकूलता अनुकूलता ऐसा नहीं कि केवल प्रतिकूलता ही दे भारी अनुकूलता भारी अनुकूलता राधा से पुजवा दिया और साधारण से पिटवा दिया राधा चरित्र पढ़ के देख बाददास देखो बड़े बड़ों का इतना सारा तो इसलिए हमारा लक्ष्य है भगवत प्राप्ति हमारा कर्तव्य है सहन करना भूख प्यास सर्दी गर्मी मान अपमान निंदा स्थिति तब आप उस परम पद के अधिकारी राष्ट्रपति के लिए उसे योग्यता चाहिए पहले एमएलए फिर सांसद फिर मुख्यमंत्री हां फिर अगर अगर मुख्यमंत्री पद सही समाज में संभाला और सवासरी बने तो आप प्रधानमंत्री के अधिकारी हो गए।
तो ऐसे ही ये परम पद है। परमेष्ठी पद ब्रह्मा का जो पद है उस वो जहां झुकता है वो ये परम पद है। सबसे बड़ा पद परमेष्ठी पद जहां झुकता है। इसीलिए जो भक्त परम पद को प्राप्त हो गए हैं। उन्होंने कहा पार सार्वभमधिपत्यम योग सिद्ध ना पुन भव क्यों सबसे श्रेष्ठ पद को प्राप्त कर लिया भगवान की प्रेम पदवी भगवान के चरणों के समीपता जो प्राप्त की अब ये सब नहीं चाहिए तो आप कोई साधारण नहीं है आप परम पद के चयन वाले हैं। जैसे मिलिट्री में हजारों जाते हैं लड़के तो चयन किसका होता है?
200 300 ऐसे 700 तो रिजेक्ट ही होते हैं। तो चयन के लिए सब आए तो इसमें रिजेक्ट भी होते हैं। चलते चलो चलते चलो चलते चलो सहन करते चलो पास हो जाओ और पास हो गए तो फिर क्या है सत सत सा लोक तारत वो महात्मा स्वयं तर जाता है स्वयं तर जाता है वो लोकों को तार देता है ये पक्ष हो गया प्रतिकूलता वाला दूसरे जो एक महाराज जी साधक का दूसरे साधक के प्रति व्यवहार कैसा होना चाहिए ऐसा भी हो जाता है कि वो इतने अच्छे दोस्त बन जाते हैं राग बन जाता है फिर वो फिर फसाफ का कारण बन जाता विपरीत शरीर हो जाए ना कबीरा खड़ा बाजार में सबसे पूछे खैर ना काू से दोस्ती और
ना काू से हमारे जीवन में एक भी हमें दोस्त बताओ जो आज तक की हमारे एक भी दोस्त नहीं तो दुश्मन का तो सवाल ही नहीं कोई अपने मन में द्वेष माने तो माने हम अपनी तरफ से तो कभी ऐसा अब भगवान देख रहे हैं वो सब संभालेंगे उनका सारा खेलेंगे लेकिन विरोध करना हमारा कार्य नहीं विरोध आप हमसे करोगे हम हाथ जोड़ेंगे हम पैर छुएंगे आपके हम गले ही लगाने की कोशिश करेंगे आपका कार्य अपना हमारा कार्य अपना आप उसकी सीमा रखी जाए महाराज जी मित्रता मित्रता नहीं होनी चाहिए शत्रुता अगर किसी से हो रही है तो उसमें बचने के चांस रहते हैं क्योंकि कड़वापन होता है मित्रता और खतरनाक है क्योंकि उसमें मीठा इसलिए सम्मानम घोर गणम सम्मान को विष कहा है और अपमान को अमृत कहा है तो यदि आप हमसे शत्रुता करोगे तो हमारा राग नहीं होगा आपसे मतलब हम द्वेष से तो बच सकते हैं लेकिन राग से नहीं बच सकते राग बड़ा सत्यता से भी बढ़कर भयानक राग है इसीलिए एक संत कह रहे थे कि हमारा जो अपमान करता है हमें बहुत अच्छा लगता है जो हमसे प्यार करता है मुझे
डर लगता है। मुझे जो प्यार करता है मुझे डर लगता है। इससे बचो ये मारेगा वो तो नहीं मार पाएगा। जो शत्रुता का बर्ताव करता है वो नहीं मार पाएगा। मित्रता का व्यवहार करने वाला मार डालेगा। जैसे कुछ समय तक हम एक मौनी महात्मा के संग रहे। तो वो वृंदावन जब आए मतलब सत्ता है कि 28 वर्ष की 27 हमारे सामने भी आते आते थे हां पर वो पहली जो पहली बार काशी से हम आए ही थे तो वो उनको पता लगा होगा तो आए होंगे तो आए ढूंढ लिए राधा वल्लभ जी के मंदिर में फिर वो कुछ तक आए फिर अपने मित्र क्या यार तुम भी तुम भी समझो आप अपने माल सर्वत्र क्या सर्वत्र भगवान नहीं है वृंदावन में अकेले क्या भीड़ गंगा जी का किनारा है चल दिया सब दो वर्ष दो वर्ष फिर एक दिन रात्रि में 2 बजे बैठे हुए थे सांप आकर के पुरस्कार
मारी जहां टॉर्च रखी थी व मारी और इतना पावर रहता था तखत का कि अकेले उठा के रख लो वहां हम ही और पंजीरी बाबा रहते थे केवल पहले तो हिम्मत की क्योंकि बहुत बार पुकारे सुन चुके थे आठ 10 पुरस्कार बिल्कुल जो है हम कहा अब भागो कूद के और भागे पंजीरी बाबा जहां पड़े थे गर्मी का समय था तखत में तो चढ़ गए बोले अरे मोरे भाई कौन आया बढ़ा गए एकदम हम कहा हम है चिंता ना करो बोले क्या है हम कहा सांप पीछा किए वो बड़ी चार्ज महाराज पीछे खड़ा था हम कहा हम समझ गए सुबह वृंदावन चले जाएंगे तो रात तुरंत फड़ नीचे किए वापस सुबह डोला उठाया वृंदावन फिर अखंड वृंदावन वास का नियम तो फिर कहीं नहीं जाना आना लेकिन आप इसे सत्संग कहेंगे या कुसंग कहेंगे मैत्री का भार डाल के और मुझे धाम से बाहर कर दिया।
प्रारंभ की बात कह रहा हूं जब काशी से आए और दो वर्ष धाम से बात इसलिए मित्रता जो है वो शत्रुता से भी खतरनाक है सम्मान जो है वो अपमान से भी दुखदायक है इसलिए साला से समझो हमें ना किसी से मित्रता है ना शत्रुता है अपना अपना काम किया अपनीप आप बताओ सब हो किससे मित्रता है और किससे शत्रुता है सब हो आप कोई हमारा विशेष प्रिय कोई नहीं विशेष प्रिय है। ये मत समझो कि कोई विशेष प्रिय हमारा कोई नहीं। हम अंदर की बात कह रहे हैं। पाई भर कोई विशेष प्रिय नहीं है। और भगवान की कृपा से किसी के प्रति जलन नहीं है।
भगवान की कृपा से किसी के प्रति जलन नहीं है। हम वृंदावन में बैठकर बात कर रहे हैं। किसी के प्रति जलन नहीं है कि ऐसा आगे भगवान जाने। अभी तक किसी के प्रति हमारी जलन नहीं है। यह कि हमारे ऊपर भगवान की कृपा है। भगवान की कृपा है। हर जगह हमें कृपा दिखाई दे रही है। प्रतिकूलता होती तो कृपा नजर आती है कि हम विषय पंख में गिरने वाले कीड़े और भगवान ने अमृत पंख में ले जाने के लिए सब लीला की है। उनकी अमृतमय लीला है। आप अभी कह रहे हैं ये सब देखते आ रहे हैं। सब देखते आ रहे हैं।
हां कोई ऐसा दृश्य नहीं था जो हां पर किसी के लिए नहीं इसलिए प्रत्येक साधक कमल का स्लोप जैसे आर्मी में पता है गोली लग जाएगी तो सब हरकतें बताई जाती है फिर भी प्राण चले जाते हैं और वो शहीद माने जाते हैं उनकी फोटो लगती है और प्रधानमंत्री राष्ट्रपति भी उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं तो हमें इस मार्ग में पहला नियम लेना है कि छोड़ना नहीं है इस मार्ग मार्ग को पहला नियम लो कि मैं जिंदगी में चाहे जो कुछ हो जाए भगवत मार्ग नहीं छोडूंगा। कुछ भी हो जाए वो सब ठीक है।
भगवत मार्ग नहीं छोड़ूंगा। दूसरा बात कुछ भी अनुभव ना हो तो भी इस मार्ग को नहीं छोड़ूंगा। तीसरी बात हर कदम बढ़ाते चलूंगा और हर दुख को सहूंगा। अगर आप भगवान ना मिल जाए तो हमें बता दे तीन बातें पकड़ ले इस मार्ग को नहीं छोडूंगा और चाहे कुछ अनुभव ना हो इस मार्ग को कभी नहीं छोडूंगा और सब कुछ सहूंगा भगवान ना मिल जाए तो हमसे बता जैसे लोग कहते हैं चार साल हो गए हमें कुछ अनुभव नहीं हुआ समझ रहे हो नहीं चार साल हो गए अनंत जन्मों के पाप तुम्हारे नष्ट हो रहे हैं और तुम चार साल से भगवान के शरणागत हो ये बहुत बड़ी बात है।
ये चार साल में तुम्हारी दुर्गति हो जाती है। विषयों की विषय भोग जो नित्य निरंतर चिंतन और सब ये सब जीवन को नष्ट कर रहा है। खोखला कर रहा है। अंतिम समय यही दृश्य आएगा। और चार साल से तुमको कोई अनुभव नहीं। शरीर छूटेगा भगवान की प्राप्ति होगी। क्योंकि तुम भगवान की शरण में है। इसलिए बहुत होश में सावधान होकर किसी से ना मित्रता ना शत्रुता सबको प्रणाम है। सबको नमस्ते। एक तो हम यह कहते हैं कि हम अपने को संत मानते हैं। दूसरे को संत नहीं मानते। यह सबसे बड़ी बात है।
साधकों में आप देखो क्या एक दूसरे को संत मानकर उनकी पादुका को नमस्कार करते हैं। उनके चरण को नमस्कार करते। हम सत्संग के बाद जब लौट के सबको देखते हैं तो ये सबके चरणों में प्रणाम करते। हमारे गुरु जी पंचांग प्रणाम करते हैं सबको। आपने देखा होगा क्योंकि सब में हम जैसे माला पहना रहे तो ऐसे हाथ जोड़े ऐसे सब में भगवान विराजमान है। ये गुरु शिष्य का नाटक हो रहा है। परमात्मा सब में जो हमारे अंदर वही आपके अंदर विराजमान है। फिर ये सब वैष्णव संत है। आप एक दूसरे को संत मानोगे तो आपकी महानता होती चली जाएगी।
हम अपने शिष्यों को संत मानते हैं। संत भगवान पा रहे हैं। हमारे शिष्य हैं लेकिन हमारे भगवान है। तब तक हाथ जोड़े बैठे रहे जब तक वो आचमन करके उठे। अरे भगवान पा रहे हैं। अब हम अपने शिष्यों पर भगवान आप अपने गुरु भाई पर भगवत भाव नहीं करते। शिष्यों पर गुरु बनने की योग्यता कैसे आएगी? गुरु बनने की योग्यता कैसे आएगी? शिष्य आप छोटे बनोगे तो महान बन जाओगे। जो सच्चा शिष्य है वही गुरु बन सकता है। जो शिष्य नहीं बना वो गुरु कैसे बन सकता है? इसलिए प्रणाद करो अमान ना मान दे कीर्तन आपके कमरे में कोई आता है वैष्णो गुरु भाई है कोई भगवत चर्चा अगर नहीं कर रहा कुछ तो चर्चा है मतलब यह प्यार की भाषा और अगर सीधे कटिंग करनी है देखो हम तो आपको बैठा लेते लेकिन गुरु जी ने मना किया है कोई सिखों को आप अपने कमरे में आप भी भजन कीजिए हम भी भजन बहुत मृदु व्यवहार कटु व्यवहार नहीं ईर्ष्या द्वेष नहीं अगर ईर्ष्या द्वेष और कटु व्यवहार है तो साधुता किस बात की हमें बताओ किस बात की साधुता आप किस बात में महान
है सहनशीलता में महान वही महान है जो सहन कर बड़े-बड़े कष्टों को सहन करना ये संतों का सहज स्वभाव भूख प्यास गर्मी सर्दी मार मार अपमान सब सब संतों के जीवन में ये सब आया है और उसे खूब आनंद पूर्वक सहा है भगवान की कृपा ने उनको वो परम पद दिया है और जो उनसे द्वेष करते रहे दुर्गति को प्राप्त वो परम पद को प्राप्त तो अगर आप लोग चयन किए गए आप रिजेक्ट नहीं हो महाराज जी आप चयन किए गए हो ऐसे आचरण मत कर देना जिससे रिजेक्ट हो जाए होता है ना निकाल दिए गए और उसमें सरकारी भाषा में सस्पेंड सस्पेंड बोले वो गलती में पाए गए और यहां का सस्पेंड फिर माया ऐसा रौंदती होती है कि फिर दोबारा इसमें कदम रखने लायक नहीं रहता।
पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है। इसलिए अपने जीवन को सार्थक करने के लिए सहो। फिर हम चार बातें बता रहे हैं। नाम जप, मंत्र जप, वाणी पाठ और सेवा। सेवा में हम ये नहीं लगा रहे श्री जी की। संत सेवा, ठाकुर सेवा, श्री जी की सेवा, पशु पक्षी की सेवा, चराचर की सेवा। अगर ये चार बातें हैं तो आपको कभी कोई परास्त ही नहीं कर सकता। कभी कोई प्रार्थ नहीं कर सकता या नाम में या मंत्र में या वाणी में और या सेवा में चार बातें हैं जीवन में तो बिल्कुल आप भगवान को प्राप्त होंगे और ये बातें जो है व्यवहार की है सहन करना क्षमा याचना ये व्यवहार है ये व्यवहार है और ये परमार्थ जो चार बातें हैं ये परमार्थ आपको व्यवहार से बचा लेगा और अगर ये नहीं है चार बातें तो तो सहन नहीं कर पाओगे एक दो तीसरी बार टूट पड़ोगे तीसरी बार लड़ जाओगे 100 बार थूका एकनाथ जी ने हेरा भी नहीं उस एक संतों की बात आप संतों के चरित्र पढ़ के देखो प्रति कील देव जी के माथे पर कील ठोक दी क्या ध्यान करते हैं देखो ऐसे कील ठोक दी और वो भगवान के ध्यान में मस्त रहे नाम जप करो और परमार्थ में चलो जो सत्संग सुनो उसे अपने आचरण में उतारो तभी लाभ मिलेगा।
नहीं हमारा बोलना आपका बैठना सुनना सब व्यर्थ हो जाएगा। श्री राधा लाल की जय
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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