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प्रिया-लाल हमें दर्शन क्यों नहीं देते?

यदि प्रभु सर्वव्यापी और परम दयालु हैं, तो वे सम्मुख क्यों नहीं आते? क्या वे हमारी करुण पुकार नहीं सुनते, या वे हमसे मिलना ही नहीं चाहते?” अक्सर हम उनकी इस अनुपस्थिति को उनकी निष्ठुरता या अपनी उपेक्षा मान लेते हैं। प्रभु का दर्शन न देना उनकी क्रूरता नहीं, बल्कि उनकी अतिशय करुणा है। वे सामने इसलिए नहीं आते क्योंकि अभी हम उस ‘महा-सुख’ को झेलने के लिए तैयार ही नहीं हैं।

प्रभु का साक्षात् सौंदर्य

हम अक्सर प्रभु के दर्शन की मांग तो करते हैं, लेकिन हमें इसका आभास नहीं होता कि उस दर्शन का प्रभाव हमारे स्थूल शरीर पर क्या होगा। जब हम तुच्छ सांसारिक सुख-दुख को ही सहन नहीं कर पाते और छोटी सी प्रतिकूलता में अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं, तो उस ‘महा प्रेम सुख’ के प्रचंड वेग को हमारा हृदय कैसे संभाल पाएगा? प्रभु का दर्शन मात्र एक दृश्य नहीं है; वह अनंत ऊर्जा, असीम सौंदर्य और अलौकिक प्रेम का एक ऐसा विस्फोट है जो शरीर के कण-कण को झंकृत कर देता है।

क्यों शुरुआती आनंद अब फीका लगने लगा है?

अनेक साधक इस बात से निराश हो जाते हैं कि “जब हमने भक्ति शुरू की थी, तब जो रोमांच और आनंद मिलता था, वह अब क्यों नहीं मिलता?” आनंद का कम होना वास्तव में आपकी क्षमता का बढ़ना है।

  • जब कोई व्यक्ति पहली बार नशा (जैसे भांग) करता है, तो उसे एक छोटी सी गोली से ही गहरा असर महसूस होता है।
  • लेकिन जैसे-जैसे वह उसका अभ्यस्त होता जाता है, वही पुरानी मात्रा उसके लिए ‘सामान्य’ (Baseline) हो जाती है। अब उसे और ऊँचे नशे का अनुभव करने के लिए बड़ी खुराक चाहिए होती है।

ठीक इसी तरह, जब कोई नया साधक नाम-जप शुरू करता है या पहली बार वृंदावन की रज में आता है, तो उसे बहुत सुख मिलता है। धीरे-धीरे वह सुख ‘सामान्य’ लगने लगता है। यह आनंद की कमी नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि पिछला आनंद आपके भीतर ‘पच’ गया है। आपका हृदय अब विस्तृत हो चुका है और वह और भी अधिक गहरे अतीन्द्रिय आनंद को संभालने के लिए तैयार हो रहा है।

सहत-सहत बाढ़े भक्ति

प्रभु और गुरु कभी साधक को अगाध आनंद देते हैं और कभी ‘जलन’ (विरह की तड़प)। यह जलन कोई सजा नहीं, बल्कि हृदय को ‘तपाने’ की प्रक्रिया है। जैसे धातु को आग में तपाकर उसे मजबूत बनाया जाता है, वैसे ही यह विरह की अग्नि साधक के हृदय को परिपक्व करती है। गुरु धीरे-धीरे कृपा करके भक्त को उस परम सुख को सहने का अभ्यास कराते हैं। इस क्रमिक विकास का अंतिम लक्ष्य यह है कि भक्त अपनी खुली आँखों से ‘नित्य विहार’ (प्रभु की दिव्य लीला) का दर्शन करे और उस समय न तो उसका हृदय फटे, न ही वह मूर्छित होकर गिरे। जब हृदय पूरी तरह परिपक्व हो जाता है, तब वह साक्षात् प्रभु के सौंदर्य और प्रेम के महासागर को सामने पाकर भी स्थिर रह पाता है।

निष्कर्ष

साधना का वास्तविक उद्देश्य केवल ‘दर्शन पाना’ नहीं, बल्कि स्वयं को उस ‘दर्शन के योग्य’ बनाना है। प्रभु का अभी न मिलना वास्तव में उनकी सुरक्षात्मक करुणा है, ताकि जब वे मिलें, तो हम उस सुख को स्थायी रूप से जी सकें, न कि उससे नष्ट हो जाएं। भक्ति का मार्ग केवल उत्साह का नहीं, बल्कि धैर्यपूर्वक अपनी सहनशक्ति और पात्रता विकसित करने का मार्ग है।

अंत में, स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछें: “क्या हम अपनी भक्ति में केवल तात्कालिक उत्साह खोज रहे हैं, या हम उस सामर्थ्य को विकसित करने का धैर्य रखते हैं जो साक्षात् परम सौंदर्य को सहन कर सके?”

मूल लेख: bhajanmarg.com

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