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सच्चा नाम जप किसे कहते हैं?

हम अक्सर यह मान बैठते हैं कि शास्त्रों को कंठस्थ कर लेना या शरीर को कष्ट देने वाली कठिन तपस्या ही आध्यात्मिक शिखर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है। किंतु क्या केवल सूचनाओं का संग्रह या इंद्रियों का दमन हमें उस आंतरिक शांति तक पहुँचा सकता है?

कथनी और करनी की खाई

अध्यात्म की सबसे बड़ी बाधा वह खाई है जो हमारे शब्दों और हमारे आचरण के बीच विद्यमान है। भगवत वाणी को केवल याद कर लेना या दूसरों को प्रभावशाली ढंग से सुना देना मात्र बौद्धिक कौशल है, आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं। दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत लोग निपुण हैं, लेकिन उस सत्य को अपने जीवन में उतारने वाले विरले ही हैं। “वाणी से कुछ बोला जाता है, हृदय में कुछ होता है और आचरण कुछ और ही होते हैं, यही संसारी पुरुष का लक्षण है… वाणी, मन और आचरण की एकता ही संत का लक्षण है और यह तभी हो सकता है जब हम भगवत वाणी को हृदय से स्वीकार करें।” जब तक हमारी वाणी, विचार और कर्म एक ही बिंदु पर केंद्रित नहीं होते, तब तक परमानंद का द्वार नहीं खुलता। केवल ‘जानना’ सूचना है, लेकिन उसे ‘जीना’ ही वास्तविक बोध है।

श्रद्धा: मानकर जानना

आमतौर पर संसार का नियम है ‘जानकर मानना’—पहले हम किसी चीज को परखते हैं, फिर विश्वास करते हैं। किंतु भक्ति मार्ग में यह क्रम उलट जाता है। यहाँ ‘मानकर जानना’ ही वह क्रांतिकारी मोड़ है जिसे ‘श्रद्धा’ कहा जाता है। श्रद्धा का अर्थ केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि जैसा प्रभु ने उपदेश दिया, उसे बिना किसी ‘क्यों’ या संशय के ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना है। ज्ञानी पहले विवेक से जानता है, फिर इंद्रिय संयम करता है। लेकिन भक्त पहले यह ‘मान’ लेता है कि “प्रभु ही मेरे हैं,” और इस एक स्वीकृति मात्र से उसके हृदय में विश्वास पुष्ट हो जाता है। यही प्रारंभिक श्रद्धा भक्त को अध्यात्म की उस ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ ज्ञान और वैराग्य उसके पीछे-पीछे सहज ही चले आते हैं।

सर्वश्रेष्ठ योगी: ‘अस्तित्व’ का दिव्य रूपांतरण

भगवान कृष्ण गीता में स्पष्ट करते हैं कि तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मकांडियों में भी सर्वश्रेष्ठ वह योगी है जो पूर्ण श्रद्धा के साथ “मुझमें (श्रीकृष्ण में) तल्लीन” है। यह विचार साधना की पूरी परिभाषा बदल देता है। यह साधना को कर्म से हटाकर ‘होने’ (state of being) पर ले आता है। यहाँ ‘पारस और लोहे’ का अद्भुत उदाहरण सार्थक है। जिस प्रकार लोहा कितना भी भारी या काला क्यों न हो, पारस का स्पर्श पाते ही वह स्वर्ण बन जाता है, वैसे ही यह शरीर भले ही ‘मरणधर्मा’ और पांच-भौतिक हो, लेकिन जैसे ही साधक यह स्वीकार कर लेता है कि “मैं केवल प्रभु का हूँ,” उसका अस्तित्व दिव्य (भगवत स्वरूप) होने लगता है। जब साधक का हृदय यह मान लेता है कि “प्रभु के सिवा मेरा कोई नहीं,” तब उसकी साधना ‘प्रयास’ न रहकर ‘अनन्य अपनापन’ बन जाती है।

सहज योग: जहाँ भक्ति ही श्वास बन जाए

भक्त के लिए योग कोई अलग से की जाने वाली शारीरिक क्रिया नहीं है। निरंतर ‘भजन’ की वृत्ति से उसके प्राण स्वतः ही सूक्ष्म और पवित्र हो जाते हैं। जहाँ संसार के भोगों में प्राण स्थूल होते हैं, वहीं प्रभु के अनुराग में वे इतने सूक्ष्म हो जाते हैं कि भक्त को अलग से प्राणायाम या ‘पद्मासन’ लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उपनिषदों का वह महान सत्य—’सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (सब कुछ ब्रह्म है)—जिसे ज्ञानी वर्षों के स्वाध्याय के बाद अनुभव करता है, एक भक्त उसे अनुराग की तरंगों में सहज ही पा लेता है। उसके लिए भक्ति ही उसकी श्वास और उसका संपूर्ण विज्ञान बन जाती है।

कृष्णमय दृष्टि: उद्धव और गोपियाँ

जब भक्ति परिपक्व होती है, तो भक्त की दृष्टि ‘कृष्णमय’ हो जाती है। इसका जीवंत प्रमाण उद्धव और गोपियों का प्रसंग है। उद्धव, जो ज्ञानियों के शिरोमणि और साक्षात् बृहस्पति के शिष्य थे, जब ब्रज आए तो गोपियों की अनन्य निष्ठा देखकर स्तब्ध रह गए। जो सान्निध्य उद्धव को साक्षात् कृष्ण के साथ रहकर भी नहीं मिला था, वह गोपियों को विरह में भी प्राप्त था। अंततः परम ज्ञानी उद्धव ने प्रार्थना की कि वे ब्रज की कोई ‘लता’ बन जाएं, ताकि उन प्रेम मगन गोपियों की चरण-रज उन्हें प्राप्त हो सके।

भक्त की यह अवस्था ऐसी होती है जहाँ शब्द-अर्थ, दिन-रात और जीवन-मरण का भेद मिट जाता है: “जड़ चैतन्य कछू नहीं दीखत, जहाँ दीखत तहाँ श्याम खड़े।” एक भक्त के लिए यमुना की लहरों से लेकर वन की लताओं तक, हर ओर केवल उसके प्रियतम की ही मुस्कान है। यहाँ तक कि उसका अपना शरीर भी अब उसका नहीं, बल्कि उसके प्रभु का क्रीड़ा-स्थल बन जाता है।

निष्कर्ष: एक अंतिम विचार

सच्चा नाम जप केवल माला के माला की गिनती पूरी करना नहीं है, बल्कि अपने अहंकार और अपनी समस्त कामनाओं को स्वामी की इच्छा में विलीन कर देना है। जब हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान को ‘साधन’ बनाना छोड़ देते हैं और भगवान को ही अपना ‘साध्य’ मान लेते हैं, तब हम उस ‘सर्वश्रेष्ठ योग’ की स्थिति में होते हैं।

आत्म-चिंतन के लिए एक प्रश्न: क्या हम इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को अपनी छोटी-छोटी और नश्वर कामनाओं की भेंट चढ़ा देंगे, या उस ‘अनन्य अपनेपन’ को स्वीकार करेंगे जिसे स्वयं प्रभु ने सर्वश्रेष्ठ मार्ग कहा है? जब तक ‘मैं’ और ‘मेरा’ बचा है, तब तक योग अधूरा है। जिस क्षण “मैं प्रभु का और प्रभु मेरे” का भाव जाग गया, उसी क्षण मोक्ष और परमानंद आपके चरणों के दास बन जाएंगे।

मूल लेख: bhajanmarg.com

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