श्रीजी के प्रति अनन्य निष्ठा – इसका क्या मतलब है?
‘अनन्य निष्ठा’ —एक ऐसी अवस्था जहाँ हृदय केवल और केवल अपनी स्वामिनी श्री लाडिली जू (श्री श्यामा) के अधिकार में होता है। यहाँ भक्त का अस्तित्व केवल श्री श्यामा के चरणों की दासी बनने में है। क्या कोई अनुराग इतना गहरा हो सकता है कि वह मोक्ष की मुक्ति को भी तुच्छ समझने लगे?
मर्यादाओं का त्याग
वृंदावन का ‘नित्य विहार रस’ कोई सामान्य धार्मिक विधि नहीं है; यह एक ऐसी महाशक्ति है जो स्थापित मर्यादाओं और सीमाओं को मिटा देती है। जो लोग विभिन्न अवतारों की उपासना बड़े धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ करते आए हैं, वे भी जब वृंदावन की इस रस-धारा के संपर्क में आते हैं, तो स्वयं को रोक नहीं पाते। इस रस की एक दिव्य किरण हृदय को स्पर्श करते ही उनकी पुरानी गुरु परंपराएं और उपासना की मर्यादाएं स्वतः छूट जाती हैं। यहाँ रस ही एकमात्र सत्य है, जो बताता है कि प्रेम की पराकाष्ठा में शास्त्र और लोक की मर्यादाएं छोटी पड़ जाती हैं। यह रस सीमाओं को स्वीकार नहीं करता, बल्कि भक्त को एक अनंत प्रेम प्रवाह में विलीन कर देता है।
नंददास जी का हृदय परिवर्तन
अनन्य निष्ठा का सबसे सुंदर उदाहरण श्री नंददास जी महाराज हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरुभाई और परम राम भक्त होने के बावजूद, जब वे ब्रज मंडल आए, तो नंदनंदन (श्री कृष्ण) की ‘रूप माधुरी’ ने उन्हें पूरी तरह अपना गुलाम बना लिया। वे अपनी पुरानी उपासना को सादर प्रणाम कर श्रीनाथ जी के अष्टसखाओं में शामिल हो गए।
जब गोस्वामी जी ने उनसे पूछा कि राम जी के स्वरूप में क्या कमी थी, तो नंददास जी का उत्तर किसी तर्क पर नहीं, बल्कि ‘अनुभूति’ पर आधारित था। यह किसी को कम या ज्यादा आंकने की बात नहीं है, बल्कि ‘चित्त’ के वश में न होने की बात है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान की उस ‘बंक कटाक्ष’ (तिरछी चितवन) और ‘बंशी के नाद’ ने उनके हृदय को बरबस खींच लिया है। यह एक ऐसी प्रेम-विवशता है जहाँ भक्त का चित्त ‘चोरी’ हो जाता है और वह बिना किसी दबाव के, केवल उनके सौंदर्य के वशीभूत होकर उनके चरणों की गुलामी स्वीकार कर लेता है।
घर में रखे ‘अमोलक रतन’ को छोड़कर बाहर भटकने का दुर्भाग्य
जब हमारे पास श्री श्यामा की शरणागति के रूप में अनमोल रत्न हमारे अपने घर (हृदय और रसिक मार्ग) में सुरक्षित है, तो हम बाहर दर-दर क्यों भटक रहे हैं? जिस मन और बुद्धि के सहारे हम शांति खोज रहे हैं, उसी मन-बुद्धि ने हमें अनंत जन्मों से केवल भटकाया ही है। “तुम्हारा जीना व्यर्थ है” यदि तुम इस रत्न को नहीं पहचान पा रहे। वास्तविक बुद्धिमानी अपनी चतुरता त्यागकर रसिकों के चरणों में समर्पित हो जाने में है। स्वयं को एक ‘यंत्र’ (instrument) बना दो और अपनी लगाम रसिक गुरुदेव को सौंप दो, क्योंकि मन के भरोसे तो हम युगों से केवल भटकते ही आए हैं।
रसिकों का संग और वृंदावन रज की महिमा
वृंदावन का यह नित्य विहार रस ब्रह्मांड में अन्यत्र कहीं सुलभ नहीं है। इसे प्राप्त करने का एकमात्र द्वार ‘रसिकों का संग’ है। रसिकों की संगति ही हमारे भीतर वृंदावन की रज के प्रति वह अनुराग जगाती है, जिसके बिना यह रस प्राप्त होना असंभव है। बिना वृंदावन की रज का सेवन किए, यह नित्य विहार किसी अन्य धाम में प्राप्त नहीं हो सकता। इस रस की विलक्षणता का प्रमाण स्वयं जगन्नाथ जी हैं। ब्रजलीला की रसभरी बातें सुनकर भगवान जगन्नाथ जी का स्वरूप ‘प्रेम विकृत’ हो जाता है—उनकी आँखें फैल जाती हैं और हाथ-पाँव भाव के अतिरेक में सिमट जाते हैं। जब स्वयं साक्षात ईश्वर प्रेम की इस विह्वलता में ‘विकृत’ हो सकते हैं, तो सोचिए वह रस कितना गहरा होगा। यह केवल वृंदावन की कुंजों और लाडिली जू की कृपा में ही निहित है।
निष्कर्ष
मानव जीवन की वास्तविक सफलता रसिक गुरुदेव के चरणों में अपनी मन-बुद्धि को समर्पित कर देने में है। जब हम स्वयं को अहंकार मुक्त कर एक ‘यंत्र’ की भांति उनके अधीन कर देते हैं, तभी वह नित्य विहार का अद्भुत रस हमारे हृदय में प्रवाहित होता है।
आज स्वयं से एक प्रश्न पूछें: “क्या हम वास्तव में उस ‘अमोलक रत्न’ की कीमत समझ पा रहे हैं जो हमें गुरुदेव ने इतनी आसानी से दे दिया है, या आज भी अपनी पुरानी धारणाओं और मन के छलावे में आकर बाहर ही सुख की तलाश कर रहे हैं?”
मूल लेख: bhajanmarg.com
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