॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1399

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

जय प्रकाश प्रजापति जी गौरव जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी पिछले दो सालों से प्रतिदिन आपको सुन रहा हूं नाम जप भी कर रहा हूं परंतु कुछ महीनों से संसार की बनावटी व्यवहार से दूर रहने को मन कर रहा है और अंदर से चिड़चिड़ापन भी बना रहता है महाराज जी मेरा समाधान करें मैं अभी क्या करूं ऐसा पर उसको को छुपाए रखिए और व्यवहार सम्यक रूप से कीजिए। ऐसा आता है। इतना जोर का आगे जैसे हम भजन करते हैं तो ये असत संसार अच्छा नहीं लगता। नारायण हरि भजन में यह पांचों अनुसुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीति बहु बात यह अच्छा नहीं लगता है पर अच्छा ना लगते हुए भी गृहस्ती में है तो रिश्ते नाते संबंध सब निर्वाह करना होता है तो अंदर की बात छुपाकर बाहर व्यवहार मुस्कुरा के ही करें सम्मान पूर्वक सबसे वार्ता करें उचित वार्ता करें ऐसा ना दिखाई दे किसी को कि आप भजनानंदी या आपको यह बातें अच्छी नहीं लगती।

इससे आपका भजन बढ़ता रहेगा। व्यवहार में त्रुटि होने पर परमार्थ में बाधा पड़ जाती है। जैसे ये हमारे पास आए और हम इनसे ऐसी वार्ता की कि असंतुष्ट हो गए तो इनके हृदय में भगवान बैठे हैं। उसका प्रभाव पड़ेगा कि मेरे भजन में विक्षेप पड़ने लगेगा। तो अपने भजन को बचाने के लिए राधेश्याम आइए बैठिए। कोई बात कर रहे बहुत सुलझ कर उत्तर दिया। अच्छा बस एक मिनट में आप तो उससे ज्यादा आनंद रहेगा और यह दिखाना कि यह तो संसार की असदत बातें हैं। आप हमसे क्यों वो नहीं सच्चा भजन का स्वरूप है।

अपने आप को छुपाकर नाटक प्रयोग जैसे नाटक मंच में थोड़ी देर के लिए हमें स्वांग करना होता है। ऐसे में नाटक करना है। यह संसार एक नाटक है। कोई भाई रूप में आता है, कोई रिश्तेदार रूप में आता है, कोई पत्नी रूप में, कोई विभिन्न तो हमको उसको साथ वैसा ही व्यवहार करना है जो धर्म है। और अंदर से समझना सब झूठा है। सत्य तो एकमात्र भगवान है। चार दिन बाद ये सब छूट जाएगा। ये शरीर भी छूट जाएगा। रह जाएगा भगवान का भजन। यह अंदर की बात रखनी है। बाहर से ऐसे व्यवहार करना है।

क्योंकि गृहस्थ धर्म है ना। विरक्त धर्म हो तो भाई साफ-साफ बात कर दिया। लेकिन उसको भी अगर समाज सेवा का भगवान ने सौभाग्य दिया है तो करना पड़ेगा। जैसे अपने करना अपना मन कहता है कि क्यों बात करें पर करना पड़ता है क्योंकि भगवान ने सेवा दी है तो ऐसे आपको गृहस्थ सेवा दी तो आप अपनी सेवा को भगवान का चिंतन करते हुए अपने भजन और अपने स्वभाव को गुप्त रखते हुए अंदर स्वभाव वैरागी है पर बाहर से राग प्रस्तुत करते आओ आओ बहुत दिनों बाद आए कैसे हो आप अब इतने में खुश हो जाएगा वो और अगर हां बताओ तो यह स्वभाव भक्त का कभी नहीं होता कि नाक में गुस्सा रख के बात करें।

हंस बोले बहुमान दे। हंसी बोले बहुमान दे। जब हरिवंश नाम जान है तब सबते लघु मान है। हंसी बोले बहुमान दे। बहुत मान देते हुए मुस्कुराकर भाषण करें। यद्यपि इच्छा नहीं है। बिल्कुल इच्छा नहीं किससे बात करें। पर फिर भी शास्त्र आज्ञा करता है क्योंकि सब में भगवान है और व्यवहार में रहकर के व्यवहार निर्वाह करना पड़ता है। माधुरी कुलकर्णी जी महाराष्ट्र से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सत रजस रजस और तमस क्या इससे भी परे कोई गुण है जो अव्यक्त है या इसी गुण को माइक भाषा में प्रेम कहते हैं सतोगुण रजोगुण और तमोगुण प्रेम यह तो माया के बंधन के कारण है सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण ये तो त्रगुण माया का बंधन है।

यह प्रेम कहां हो सकता है? यह तो माया का बंधन है। त्रिगुणातीत प्रेम होता है। गुण रहितम कामना रहितम सूक्ष्म तरम अनुभव स्वरूपम प्रक्षण वर्धमानम ये प्रेम के लक्षण है। गुण रहितम तीनों गुणों से रहित जो होता है उसमें प्रेम जागृत होता है। जो सतोगुण रजोगुण तमोगुण को बाधित करके निरंतर भगवान का चिंतन करते हुए तन्मय रहता है। उसमें प्रेम की जागृति होती है। तीनों गुणों में प्रेम ये तीनों गुण तो बंधन के कारक है। इसी में तो सारा संसार भ्रमित हो रहा है। गुण के प्रवाह में सारा संसार बंधा हुआ है।

इसी से मुक्त होना है। कहां पढ़ लिया यह बात? कहां सुन ली यह बात? नहीं महाराज जी वो त्रिगुणातीत जैसे दत्त महाराज को बोलते हैं ना कह रहे कि जैसे संतों में समदर्शिता होती है। त्रिगुणातीत अवस्था होती है। वो अवस्था क्या होती है? पहले भजन करो तो पता चले ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति न का समा सर्वेश भूते सुमद भक्ति लते पराम जो ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष हो जाता है उसमें ना कोई शोक रहता है ना कोई चाह रहती है ना मान ना अपमान ना सुख ना दुख ना लाभ ना हान वो द्वंदातीत अवस्था होती है अवस्था अनिर्वचनी अवस्था है वाणी के द्वारा थोड़ी बताया जा सकता है जैसे आपको गुलाब जामुन पवे आपसे पूछे कैसा तो आप कहोगे मीठा तो कितना मीठा अब कहोगे बहुत मीठा इसके बाद पूछा बहुत मीठा कितना अब

उत्तर नहीं आपके पास अब आप कहोगे खा के देख लो तो अनुभव गम में भजे ज संता ये सच्चिदानंद रस है अनुभव का है ये वाणी के विषय नहीं वो कैसा रस होता है तो कैसे बता दे वो वाणी का विषय नहीं है वो तो भजन करो त्रिगुणातीत हो भजन के प्रताप से तब आपकी स्थिति आएगी प्रश्न आपका गलत था कि इसी त्रिगुण को प्रेम कहते हैं क्या नहीं त्रिगुण को नहीं मैंने बोला त्रिगुणा के वो ये तीन तीन गुण छोड़ के जो त्रिगुणा बोलते हैं वो कौन सा गुण है उसको कुछ नाम है या फिर वो गुण रहितम

है वही वो गुण रहितम है वो कामना रहितम है वो सूक्ष्म तरम है वो अनुभव स्वरूपम है वो प्रक्षण वर्धमानम है जिसे प्रेम कहते हैं खूब नाम जप करो पहले डट के नाम जप करते हो डट के करो नाम जप हट के करो और डट के करो माया आया प्रपंच से हटके और खूब तन्मयता पूर्वक करो। तो तमोगुण आया तो नाम जप चल रहा है। रजोगुण आया तो नाम जप चल रहा है। सतोगुण आया तो नाम जप चल रहा है। धीरे धीरे धीरे इन गुणों का प्रभाव शांत होता जाएगा। आप गुणातीत होती जाएंगे। भजन के प्रभाव से भजन नहीं तो फिर ये सब बातें केवल सभा में पांडित्य के लिए भले बोली जा सकती है इससे महाराज जी आपको हम शिव मानते हैं तो हम सोच हम गुरु शिष्य की बात नहीं कह रहे हम तो आनंद की बात कह रहे हैं आनंद भजन से आएगा बारी मथे ग्रत होए बरु सिकताते बरु तेल और बिनु हरि भजन भतरी या सिद्धांत पेल ऊंची ऊंची गुणातीत बात करने से किसी को भगवत आनंद नहीं मिल जाता ना आत्मा प्रवचने लभ्या ना बहुधा मेधाया ना बहुधा सुते बहुत बुद्धिमान हो या बहुत सुनने वाला हो

तो भी नहीं मिलता ये तो जो वर्ण कर लेता है निरंतर राधा राधा राधा राधा बुद्धिहीन बन जाए इसमें ज्यादा बुद्धि ना चलावे नाम को जैसे छोटा बच्चा मां की उंगली पकड़े चलता है ऐसे नाम रूपी मां की उंगली पकड़ ले राम राम हरे हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण जो है राम राम राम राम राम राम बस ज्यादा पढ़ने लिखने की जरूरत नहीं ज्यादा जानने की जरूरत नहीं दवाई खाओ परहेज से रहो ठीक हो जाओगे इसलिए नाम जप करो नाम ही त्रिगुणातीत है अभी आप राधा राधा कह रहे अभी त्रिगुणातीत है अभी आप राम राम कह रहे अभी त्रिगुणातीत है हरिवंश महाप्रभु कहते यही डर ही डरप हरिवंश हित जिनो भ्रमह गुण सलील पर जिमन मंगल लोक तों सु हरि पद भजन विलंब करे डरते रहो कहीं रजोगुण तमोगुण तुम्हें भ्रष्ट ना कर दे तो इसलिए जिनका नाम तीनों लोकों का मंगल करने वाला है उन भगवान के चरणों का आश्रय लेकर नाम जप करो ज्यादा बात करने का समय नहीं है मृत्यु कभी भी आ सकती है।

हमें हर समय मृत्यु की तैयारी करनी है। अभी हम राधा जप रहे हैं। अभी प्राण निकले अभी श्री जी को प्राप्त हो गए। राम प्राण निकले गए भगवान के धाम नारायण गए भगवान के धाम हमें ज्यादा माथा लड़ा के क्या करना है हमें आखिरी पॉइंट पर आना है तो हमारे कौन सी स्वास हमारी आखिरी पता नहीं इसलिए राम राम राम राधा राधा राधा राधा राधा कितना बढ़िया मार्ग है गुणातीत अवस्था क्या है ब्रह्म बोध क्या है अपने आप आ जाएगा जैसे अब छत में क्या हो रहा है हम तुम्हें कैसे बतावे चढ़ो सीढ़ियों से और एक बार झांकी करो तब तो तुम्हें अनुमान लग सकता है।

एक बार ऊंचाई पर चढ़ो तो पता चलेगा। तो वह चढ़ना है नाम जप जितना नाम जप करोगे उतने विनिश्चितम बदामते अन्यथा वच हरि भजंते जितना आप नाम जप करोगे उतने ऊंचाई पर चढ़ जाओगे। समझ रहे हो? डॉक्टर संध्या सक्सेना जी हरिद्वार से राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या मासिक धर्म अशुद्धता या सूतक में अपने इष्ट का नाम जप कर सकते हैं? नाम जप कर सकते हैं। आंतरिक पाठ कर सकते हैं। केवल ग्रंथ नहीं ले सकते हैं। माला नहीं ले सकते हैं। ठाकुर को स्पर्श नहीं कर सकते। खूब भावना में ठाकुर सेवा कर सकते हैं।

भावना में नाम मंत्र जप कर सकते हैं। नाम कीर्तन कर सकते हैं। भगवान की जो हमें पद याद है उनको गा सकते हैं। लेकिन हम ग्रंथ नहीं छू सकते। माला नहीं छू सकते। ठाकुर नहीं छू सकते। तीन दिन तक तीन दिन के बाद स्नान करके अपनी दिनचर्या में लग जाए। जैसे कि किन्ही-किन्ही माता बहनों को तो कई दिनों तक ऐसा आवेश रहता है 8-आ दिन सात-सात दिन तो तीन दिन तक निषेध किया गया है। तीन दिन तक अपने एकांतिक वृत्ति से रहे तीन दिन के बाद स्नान करके और फिर भगवान की सेवा में जा सकते हैं।

महाराज जी इन्होंने एक पॉइंट और रखा है कि ये कह रहे हैं कि ये ज्योतिष चाह रहे हैं 12 वर्ष से उसी उसमें काम कर रहे हैं। महाराज जी ये कह रहे हैं कि आजकल क्या हो रहा है कि महाराज जी बहुत सारी लड़कियां इनके पास आ रही हैं जो एक प्रेम विवाह पे मतलब उनके जो प्रेमी थे उन्होंने उनको छोड़ दिया। वो कह रहे हैं कि जी मेरा जो क्वेश्चन था ना वो ये है कि मैं 15 साल से इस फील्ड में काम कर रही हूं। मेरे पास बहुत ज्यादा लड़कियां आई है। आपसे कहती है कि मेरे बॉयफ्रेंड ने शादी कर ली है।

उसके बाद भी वो कहता है एक दिन मैं अपनी बीवी को तलाक देके तुझसे शादी करूंगा। इसलिए तू कहीं मत जा। मेरे से बात करती रह। ऐसी बच्चियां जो अपने जीवन को बर्बाद कर रही हैं। जो व्यक्ति हमारा नहीं हुआ दूसरे का पानी ग्रहण कर लिया और उसका भी नहीं होना चाहता। फिर मुझे प्रयोग करना चाहता है। ऐसे बहुत फ्रॉड लोग होते हैं। ऐसे लोगों की बातें ना माने वो प्रेमी लोग नहीं। प्रेमी तो वो होता है। एक बार हमने आपको स्वीकार कर लिया। अब चाहे विश्व सुंदरी आ जाए तो हम किसी की ओर नहीं देखेंगे।

उसे तो प्रेम कहते हैं। अब पानी ग्रहण भी कर लिया और कह रहा उसको भी छोड़ देंगे। जब उसका नहीं हुआ जिसका हाथ पकड़ रहा है तेरा नहीं हुआ जब उसका हाथ पकड़ लिया अब उसका हाथ पकड़ लिया तो फिर उसका नहीं हो रहा है तो ऐसा फ्राड आदमी किसी का नहीं हो सकता है बच्चियों को समझना चाहिए ऐसे लोगों से दूरी बना के रखना चाहिए हां ऐसे लोगों को बहुत अब तो हम आप सोच को सही कह रहे हैं अब जो रिवाज चल रहे ना बॉयफ्रेंड ब्रेकअप बॉयफ्रेंड ब्रेकअप तो यह क्या चल रहा है यह व्यभचार का तो खुला निमंत्रण है इस लड़के से बॉयफ्रेंड की मित्रता की फिर महीना दो महीना के बाद इससे ब्रेकअप हो गया अब इससे शुरू हो गया फिर इससे ब्रेकअप हुआ फिर इससे शुरू है क्या तो ये सब बातें बहुत गंदगी फैल रही है हमारी समाज में अब इसको कैसे रोका जा सकता है बच्चे समझते नहीं अपने जीवन को खिलवाड़ में अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं और एक इसको मनोरंजन समझ लिया गया व्यभिचार को मनोरंजन समझ लिया जिसे इज्जत मानी जाती थी धर्म मर्यादा माना जाता था मान लो हम कहते कहते दोस्ती पाप नहीं है।

किसी से भी कोई भी दोस्ती करो। लड़की लड़के से ही कर लो। लेकिन जब तक ब्याह ना हो तब तक पवित्र रहो। और ब्याह हो गया तो आजीवन उसी के होकर रहो। तब तो बढ़िया नियम है। लेकिन यह तो नहीं कि आज इसे दोस्त बनाया, कल उसे बनाया या कल उसे बनाया। ये ठीक नहीं है। इससे बहुत हानि होती है। इसलिए आध्यात्म की जरूरत है हर व्यक्ति को। अगर थोड़ा विचार पवित्र हो तो ऐसा कैसे कर सकते हो? मित्र सेन दयाल जी राधेधे राधेधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सीताराम चरण रति मोरे अनुदिन बहु अनुग्रह तोरे महाराज जी सीताराम जी के चरणों में प्रेम कैसे प्राप्त हो महाराज जी सीताराम सीताराम सीताराम नाम जप करो और हनुमान जी की महाराज की आराधना करो क्योंकि राम रसायन तुम्हारे पास आ भगवान सियाराम जी का प्रेम रस हनुमान हनुमान जी के पास है।

वह जिसको चाहे दे सकते हैं। इसलिए हनुमान जी की आराधना करो और सीताराम नाम का जप करो और रामचरितमानस का गायन करो। रामचरितमानस पढ़ते हो हैं। नहीं इतना पढ़ो कि नशा हो जाए। भगवान का चरित्र गायन और सुनने का नशा हो जाए। जब खाली बैठे हैं तो बस शुरू कर रहे हैं भगवान के चरित्र। भगवान के चरित्र में ही प्रेम छुपा हुआ है। भगवान के चरित्र में ही शरणागति है। भगवान के चरित्र से ही पूर्णता है। बड़े-बड़े दुखों का नाश हो जाता है। भगवान के रामचंद्र गुण वरन लागा सुनत सीता कर दुख भागा।

भगवान का जब हम चरित्र वर्णन करते हैं तो हमारा सब दुख नष्ट हो जाता है। सिया जी के दुख का कौन भगवान का यश वर्णन करने लगा? इस लंका में कौन आकर अमृत शब्द उच्चारण करने लगा रामचंद्र गुण वर लागा सुनते सीता कर दुख भागा तो भगवान के पावन चरित्रों का गायन रामचरितमानस तो सरल भाषा में वेद है हर सिद्धांत हर चाहे भक्ति सांख्य योग कर्म योग व्यवहार धर्म सब कुछ रामचरितमानस में विराजमान है और अपने हिंदुस्तान में तो हिंदी भाषा आती ही है तो इतनी सरल सरल भाषा में अवधी भाषा में है कि सबको समझ में आ जाता है तो हमें लगता है कि आप जो राम उपासक भगवान श्री राम से प्रेम प्राप्त करना चाहते हैं उनको सीताराम नाम का जप करना चाहिए रामचरितमानस का पाठ करना चाहिए गायन करना चाहिए श्रवण करना चाहिए मनन करना चाहिए और हनुमान जी महाराज के चरणों में आश्रय रखें क्योंकि हनुमान जी की कृपा से सियाराम के चरणों में प्रीति प्राप्त होती है।

गौरव कुशवाहा जी मेरठ से जय सिया राम जय श्री राम महाराज जी महाराज जी मैं बहुत संशय में हूं ना तो मैं आपको छोड़ सकता हूं और ना ही मैं राम नाम को मैं आपके अलावा कहीं और से दीक्षा भी नहीं परेशानी क्या है सियाराम सियाराम जपो सियाराम सियाराम जपो महाराज जी जैसा आप बोलते हो कि किसी राम नाम वाले वो लेनी पड़ी नहीं जब जब नहीं जब मंत्र की बात आती है ना तब हम कहते हैं अब जैसे भगवान के राम नाम में अपार सामर्थ है राम राम भी नहीं कह पाते थे। मरा मरा कहा तो ब्रह्म ऋषि हो गए तो तुम सियाराम सियाराम जपोगे तुम्हारा कल्याण नहीं हो जाएगा।

तो मान लो इसी को गुरु मंत्र मान लो और हमारे प्रति भाव रख लो कि गुरु है और सियाराम सियाराम जपो कोई संशय नहीं। ठीक है अभी अभी बताओ संशय रह गया नहीं महाराज बस फिर जपो आप ही हो सब कुछ नाम जप से सब ठीक हो जाएगा आप सियाराम सियाराम जपो ठीक है निशिका गुप्ता जी राधेधे महाराज महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी क्या स्नान के समय या स्नान के तुरंत बाद बाथरूम में यदि नाम लें जैसे राम नाम अंदर अंदर करें तो यह सही या गलत है नहीं ये तो बाथरूम में भी कीजिए शौचालय में बैठे तो भी कीजिए मंत्र निषेध है, नाम निषेध नहीं है।

जैसे हम नाम जप कर रहे हैं ना तो अब शौचालय में बैठ के ऐसे तो नहीं जपेंगे। राम राम राम राम ऐसे जपेंगे। अब अंदर जो हमारे चल रहा है उसके लिए निषेध अपवित्र पवित्रोवा सर्वावस्था यह स्मरे पुंडरी काक्षम सवायाभ्यांतर सूची अपवित्र हो या पवित्र हो किसी भी अवस्था में हो जो कमल नयन भगवान श्री हरि का स्मरण करता है वो अंदर और बाहर से परम पवित्र हो जाता है। शौचालय और बाथरूम में हम मंत्र नहीं जप सकते। कैसे भी लेकिन नाम जप कर सकते हैं। नाम हर समय हर मान लो शौचालय में दिल फेल हो गया हार्ट अटैक हो गया तो क्या करेंगे तो हम वहां भी राम राम हरि हरि राधा राधा नाम जप करते हुए शौच क्रिया आदि से निवृत्त स्नान आदि करके जब बाहर आए तब मंत्र जपने लगे बाथरूम में अंदर अपवित्र दशा में नाम और पवित्र अवस्था में मंत्र जपने लगे स्त्रोत आदि कुछ पाठ कर सकते हैं महाराज जी स्त्रोत आदि कुछ पाठ कर सकते हैं नहीं आवाज नहीं मौन स्नान करते समय स्नान करते समय यमुनाष्टक है, गंगाष्टक है।

ऐसे पवित्रष्टक का पाठ किया जा सकता है। राजेश कुमार जी चंडीगढ़ से राधे-राधे जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आप निराकार उपासना के पथक थे बट आपका सत्संग सुने तो नाम जप में रुचि बड़ी इनकी महाराज जी फंसे कहां हो साकार और निराकार में नहीं हम कह रहे हैं फंसे कहां हो आकार में फंसे हो ना आकार में ही तो फंसे हो तुम निराकार हो भैया तुम ही निराकार हो तुम्हारा स्वरूप ना अल्ट्रा अल्ट्रासाउंड में आ सकता है ना एक्सरा में ना सिटी स्कैन में आ सकता है मन नहीं आ सकता फिर स्वरूप तो बहुत बड़ी बात है आज तक कोई मशीन वैज्ञानिकों ने नहीं बनाई कि देखो यह मन बनी है अभी तक हमें तो पता नहीं लेकिन आप लोग तो संसार में आज तक कोई देश विदेश में ऐसी तैयार हुई हो मशीन ये मन देखो यह बुद्धि यह चित्त यह अहंकार क्योंकि अध्यात्म मशीनरी नहीं पकड़ सकती।

अध्यात्म दिव्य योग मार्ग है। दिव्य भाव के द्वारा जब हम अपने स्वरूप का चिंतन करते हैं तो हमारा स्वरूप निराकार है। कोई आकार नहीं है। पावर दिव्य पावर उसे जो यंत्र मिल जाता है वही वह रूप धारण कर लेता है। जैसे एसी तो पावर शीतलता फेंकने लगी। हीटर पावर गर्मी फेंकने लगा। पंखा पावर हवा फेंकने लगी। हाइलोजन पावर लाइट फेंकने लगा। लेकिन पावर है वो वो ना पंखा है ना एसी है ना हीटर है ना हाइलोजन है। वो पावर है। उसका जहां प्रयोग होता है उसके अनुसार यंत्र के अनुसार वो अपना स्वरूप प्रकाशित कर देता है।

ऐसे ही यह ब्रह्म पावर है। सूअर में गया तो अपने को सूअर देख रहा है। मनुष्य में आया तो अपने को मनुष्य देख रहा है। लेकिन यह आकार उसके तो नहीं है ना। यह बिजली का आकार थोड़ी है। बिजली जहां जाती है वैसे ही अपना स्वरूप प्रकाशित कर देती है। यंत्र के अनुसार लेकिन बिजली का कोई रूप नहीं है। वो एक पावर है। ऐसे ही ब्रह्म पावर है। भगवत पावर है जीव। उसका कोई रूप नहीं है। कहीं पढ़ा है आज तक कि जीव ऐसा है, काला है, गोरा है, लंबा है, चौड़ा है, छोटा है, बड़ा है। कोई रूप नहीं।

आप भी निराकार हो। लेकिन फंस गए आकार में। तो जैसे कांटा लग जाए तो कांटे से कांटा निकाला जाता है। तलवार से कांटा थोड़ी निकाला जाएगा या हवा से कांटा नहीं निकलेगा। वो कांटे जैसी आकृति वाले यंत्र से ही कांटा निकलेगा। तो हम आकृति से फंसे हैं। आकार में फंसे हैं। तो हम आकार से ही मुक्त हो गए हैं। हमारा स्वरूप तो निराकार है ही है। और भगवान का मान चाहे साकार चाहे निराकार पहले अपने स्वरूप को देख ले। निराकार होते हुए भी तुम आकार में फंस गए। तो अब आकार से ही निराकार की तरफ लौटो।

भगवान के नाम का जब भगवान के रूप की आराधना तो यह आकार यह वाला भूल जाओ जो शरीर आकार है इसको भूल जाओ और वो आकार सच्चिदानंदम में है तो उस आकार में तन्मय होते ही संसार का चिंतन छूटा तो असलियत जो भी हमारे भाव साकार या निराकार वो हमारे सामने प्रकाशित हो जाते हैं। समझ पा रहे हैं आप? तो खूब नाम जप करो। हमारी बात मान लो। इस चक्कर में ना फसो आप नाम जप कौन सा अब हमसे पूछोगे तो हम तो राधा नाम के आशिक हैं हम तो कहेंगे हां तो शिव शिव जपो सा सदा शिव जपो ठीक है सा सदा शिव सा सदा शिव ऐसा जपो और भागवत गीता इन शास्त्रों का स्वाध्याय करते रहो तो बुद्धि पवित्र होकर ज्ञानार्जन होगा ना तो आप सतमार्ग में आगे बढ़ जाओगे पाप आचरण से बचो अपवित्र भोजन से बचो।

अपवित्र वार्ता, अपवित्र विचार इनसे बचो। यदि भगवान को प्राप्त करना है तो कम सोना, कम बोलना, कम खाना ये तीन चीजें अपने संयम में कर ले। वाणी को संयम में कर ले, कम बोले। मौन आश्रय रखें। जब बोले तो उचित बोले और नींद चार घंटे पांच घंटे पर्याप्त समय सो के बर्बाद ना करें। और भोजन 400 ग्राम अन्न में 24 घंटे मनुष्य स्वस्थ होकर जी सकता है। तो हम कह रहे हैं एक किलो खा लो। 24 घंटे में एक किलो भोजन ले लो। लेकिन ये नहीं कि चिड़िया की तरह चुगते रहो। अब आंतों को चाहे जितना फैला लो।

आप दो रोटी से काम चलाने लगो। आपका अभ्यास दो रोटी में हो जाएगा। आप छह रोटी तो ये थैला है इसे बढ़ाते चले जाओ चाहे जितना और समेटते चले। तो भोजन कम, बोलना कम, सोना कम तो साधना प्रारंभ हो जाएगी। उचित भाषण, पवित्र भोजन, पवित्र विचार तो परम पवित्र भगवान की प्राप्ति की योग्यता आने लगती है और खूब नाम जप करो। ठीक है कैप्टन संजीव कुमार सरसत जी महाराज जी हम वृंदावन से बहुत दूर रहते हैं हम दुबई में रहते हैं तो महाराज जी हम लोग भक्ति में कैसे अग्रसर हो कि हमें क्या करना चाहिए कि हमें वृंदावन में रहकर भी भक्ति नहीं हो सकती यदि भक्ति ना करना चाहो तो और भक्ति करना चाहो तो लंका में भी विभीषण जी ने भक्ति कर ली दुबई तो लंका जैसा तो नहीं है घोर निशाचरी लंका निश्चर निकर निवासा यहां कहां सज्जन कर वासा तो हमें लगता है बहुत से भारतीय दुबई में भी वास करते हैं और भक्ति के लिए कोई दुबई में प्रतिकूलता नहीं है लेकिन लंका में तो भक्ति के लिए प्रतिकूलता थी गर्दन उड़ा दी जाए अगर पता चल जाए रावण को कि ये भगवान का भक्त है।

तो विभीषण जी ने जब वहां भक्ति कर ली तो इसका मतलब कहीं भी भक्ति की जा सकती है। अच्छा भक्ति एक हृदय का विषय है। भक्ति हृदय का भाव है। अब आप अंदर बैठे-बैठे राधा राधा जप रहे हैं। कौन जाने आपसे है नहीं? और हृदय से आप व्याकुल हैं। भगवान मैं तो ऐसे देश में रहता हूं जहां आपकी भक्ति का प्रकाश नहीं है। बड़े धन्य भाग हैं जो ब्रज में रहते हैं जो अवध में रहते हैं जो काशी में रहते हैं। प्रभु मेरी भक्ति कैसे बनेगी? तो यह दैन्यता और भगवान का स्मरण ये आपको भक्तिवान बना देगा।

महाराज जी घर बनाया तो मैं घर का वृंदावन जाऊंगा। हां ठीक है बहुत सुंदर है एन किन प्रकारण भगवान की स्मृति हमारे अंदर आनी चाहिए घर में ठाकुर जी विराजमान क्यों हो हां बहुत माता जी भी सेवा करती है और बच्चे वगैरह सब से जुड़े हुए हैं महाराज हां ठीक है खूब नाम जप करो और राधा कृष्ण की सेवा करो और भगवान के भाव में रहो सकल भूमि गोपाल की या में अटक कहा कोई जगह ऐसी नहीं जहां हमारे भगवान ना हो हरि व्यापक सर्वत्र समाना समाना जैसे वृंदावन में है ऐसे दुबई में भी है हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रगट होए मैं जाना भगवान शंकर कह रहे हैं यदि प्रेम हृदय में जागृत हो जाए तो दुबई में मुरली मनोहर दिखाई देने लगेंगे नहीं वही है भगवान और प्रेम ना हो तो वृंदावन में भी नहीं दिखाई देंगे आप जाओ बिहारी जी से आंख लड़ाओ राधा वल्लभ जी से आंख लड़ाओ अगर प्रेम नहीं है तो आपको थोड़ा भी सुख नहीं मिलेगा मिलेगा और प्रेम है तो सोचकर आपको आंसू आने लगेंगे।

सोचकर आपका हृदय आनंदित होने लगेगा। तो प्रेम ते प्रकट होए मैं जाना। और प्रेम प्रकट होता है भजन से और भजन होता है साधु संग से। भजन न होए संग बिन भजन बिना नहीं प्रेम छिनहु भजन न छाड़िए धरिए या ध्रु नेम। यह नियम ले लो कि एक क्षण भी भगवान का नाम नहीं भूलेंगे। तो दुबई में रहते हुए भी भगवत प्राप्ति हो जाएगी। ठीक है? और गंदे भोजन का त्याग हां किसी भी तरह जैसे गंदा भोजन का मतलब होता है आप मांस वगैरह तो खाते ही नहीं होंगे लेकिन जो मांस खाते हैं उनके संग में हम गए और उन्होंने कहा हम तुम्हें खीर पूरी बना के पवाते हैं तो उनके वो पात्र जिनमें मांस रंधा गया है अगर उसमें खीर पूरी तो वो हम नहीं पा सकते हैं।

नहीं प्रभु जी मेरी माता जी इस बारे में मैं नेवी में कैप्टन हूं तो मैं अगर यूरोप में भी या पूरी दुनिया में कहीं जाता हूं तो माता जी मुझे घर का प्रसाद बना के देती है। हां ठीक है पवित्र भोजन पाला जी ठीक है जी आप यहां से निखिल तिवारी जी कानपुर से मैडम महाराज जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपने हमेशा कहा है कि एक सैनिक और एक संत में कोई अंतर नहीं होता। दोनों ही अपने कर्तव्य पथ पर अिक रहकर राष्ट्र और मानवता की सेवा करते हैं। मेरा और मेरे सभी रक्षा क्षेत्र के अभी विद्यार्थी मित्रों ने आपसे विनम्र प्रश्न किया है कि हम अपने भीतर ऐसे कौन से गुण विकसित करें?

कौन से आदर्श अपनाएं जिससे एक उत्कृष्ट और कार्य कर्तव्यनिष्ठ सैन्य अधिकारी बन सकें। कृपया हमें दिव्य ज्ञान देखो जब तक हम अध्यात्म में नहीं होते तब तक हमारी स्वार्थ बुद्धि नष्ट नहीं होती और स्वार्थ बुद्धि कभी दिव्य नहीं होने देती। स्वार्थ बुद्धि नीचे पतन की ओर ले जाती है। जब परहित भावना जागृत हो जाती है तब हमारे अंदर दिव्यता आने लगती है। हमारे अंदर जो विशेष शक्ति जागृत होती है वो दूसरों के हित की भावना से जागृत होती है और दूसरों के हित की भावना अध्यात्म से आती है और अध्यात्म भगवान के नाम जप और सत्संग से जागृत होता है।

यदि हम नाम जप करें चाहे जहां हो चाहे जैसे हो और सत्संग सुने तो मानो आपको रोज सत्संग में जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। आप अपनी ड्यूटी पे हैं, अपने कार्यप्रणाली पे हैं तो मोबाइल से तो सुन सकते हैं। अगर आप रोज सत्संग सुनते हैं और रोज नाम जप करते हैं तो आप अध्यात्म को जागृत कर रहे हैं। आप पराई स्त्री से संभोग नहीं करते। आप मदिरा नहीं पीते, आप मांस नहीं खाते। तो अध्यात्म का जो अंकुर है वो वृक्ष बनने के लिए सहायता है आपकी। जैसे वृक्ष बनाना हो ना तो बाढ़ लगाई जाती है कि कोई बकरी आदि चुन ना जाए और उसकी सिंचाई की जाती है।

तो जो अध्यात्म का अंकुरण होता है वो सत्संग और नाम जप से होता है। और बाढ़ उसकी होती है। यही परहेज मांस ना खाएं, मदिरा ना पिए, दूसरे का मंगल ना करें तो हमारे अंदर दिव्यता आ जाएगी। आप इनको धारण करके देखो। नाम जप और सत्संग और पवित्र आहार और पवित्र आचरण तो आप में दिव्यता जागृत हो जाएगी। जितने भी महान हुए हैं वह सब अध्यात्म से जुड़कर ही हुए हैं। राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव अध्यात्म से ही आता है। नहीं तो आपको जलन हो जाएगी। जैसे आपका ममत्व परिवार में अधिक है।

होता है। सबका होता है। कई महीने से छुट्टी नहीं मिली। अधिकारी से प्रार्थना करते हैं। वह आपका अस्वीकार कर देता है। तो हमें लगता है अध्यात्मवान बनने से धैर्यवान चलो इस बार हमारी रिक्वेस्ट नहीं मानी। अगली बार मान लेंगे। अगली बार जाएंगे तो कभी तो छुट्टी मिलेगी ही परिवार जाएंगे। तो ये बुद्धि जो हमारी है ये शुद्ध हो जाए तो ये दिव्य हो जाए और बुद्धि अपवित्र है तो सब बेकार हो गया। अब जैसे राष्ट्र के प्रति प्रिय भाव आ गया, धर्म भाव आ गया तो आप कभी रुपया लेकर के गद्दारी नहीं करेंगे अपने राष्ट्र के प्रति।

आप कभी धोखा नहीं हमारे राष्ट्र को देंगे। लेकिन अगर आपकी बुद्धि आध्यात्मिक नहीं है तो आपको कोई करोड़ दो करोड़ दे रहा है तो आपको लगेगा ना। तो परहित की भावना ये अध्यात्म से जागृत होती है। और आध्यात्म नाम जप और सत्संग से और सत्संग और नाम जप हमारा बराबर चलता रहे। इसलिए हमें पराई स्त्री का संभोग, मदिरापान और मांस भक्षण इनका त्याग कर देना चाहिए। महाराज श्री महाराज जी मेरे मित्र हैं ब्रह्म ये भी आने वाले समय में पहुंच जाइन करने वाले हैं। मैम महाराज जी कई कई जगह ऐसी पोस्टिंग होती है जहां पे ना चाहते हुए भी आपके मुख से हमने सुना है कि अगर कभी किसी इंसान ने अगर शराब की बूंद भी जबान में लगा दी तो उसका भ्रमणत्व का नाम सुना जाता है।

महाराज जी कभी ऐसी जगह कहीं पे पोस्टिंग है जहां पे तामसिक आहार या जैसे सियाचिंग ग्लेशियर में वहां पे अगर गलती से भी अगर कभी ऐसा कुछ करने को रहा तो फिर उसके लिए जरूरी है कि वो करें नहीं महाराज जी ऐसा होता है तो संशय तक नहीं उसको ना करें भगवान में बहुत बल है बच्चा हर गर्मी सर्दी बरसात सब कुछ सहने क्या ऐसे महात्मा नहीं जो हिमालय में है क्या वह शराब पीते हैं? क्या वह मांस खाते हैं? अब विचार करो। कई कई दिन भूखे रहकर भी बर्फ में बैठकर साधना करते हैं। तो वही तो आप भी हो ना।

आप राष्ट्र के लिए साधना कर रहे हैं। भगवान के लिए साधना कर रहे हैं। तो आप राष्ट्र और भगवान दोनों को लेकर चल रहे हैं। तो मुझे लगता है यदि आप निष्ठावान हैं तो नहीं पीना चाहिए। आपको गर्मी भगवान देंगे। आंतरिक गर्मी भगवान देंगे। हर बात सहने की सामर्थ्य भगवान दे देते हैं। जरूरी थोड़ी है कि अशुद्ध पदार्थ पीने से ही आपका शरीर रक्षण होगा। नहीं है। ऐसे भी बहुत से आर्मी में हमारी जानकारी में लोग हैं जिन्होंने पूरा जीवन आर्मी में दे दिया लेकिन एक बूंद शराब नहीं पी।

तो क्या वो लोग ऐसी जगह तैनात नहीं हुए क्या? तैनात जरूर हुए होंगे लेकिन वह निष्ठावान है। बहुत से महाराज जी वेजिटेरियन रहते हैं जो मतलब शराब आदि का सेवन नहीं करते और वहां हां तो हमें लगता है कि ऐसी निष्ठा रखनी चाहिए क्योंकि अगर हम जरा भी छूट दे दिए तो हजारों लोग भ्रष्ट हो जाएंगे तो हमें लगता है कि ना को ही पकड़े रहे और चार दिन की जीवन है यार राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन भगवान को समर्पित जीवन उज्जवल भविष्य उज्जवल जीवन काहे को गंदा करें भाई राष्ट्र तो सब व्यवस्था आपकी करेगा लेकिन लेकिन नहीं आप धर्मात्मा है और राष्ट्र सेवक हैं तो आपको नहीं खाना चाहिए क्योंकि और भी सुविधा है ना बिना उसके भी तो जिया जा सकता है और शक्ति आती है धर्म में शक्ति धर्म में आती है कितनी बड़ी शक्ति हमारे देशवासियों में कि जय हिंद बोलकर फांसी के फंदे पर झूम गए नहीं झूम गए तो हम उन्हीं के वंशज हैं।

हम उन्हीं के अंश हैं। तो हम राष्ट्र के लिए उतना प्रयास करेंगे कि हमारा राष्ट्र विजय हो। राष्ट्र हमारा सुखी हो वही आपकी भावना आपका मंगल कर देगी। चिराग जी मथुरा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी नकारात्मक विचार मुझसे पाप करवा देते हैं महाराज जी ऐसे विचारों को मैं कैसे दूर करूं महाराज जी सत विचार असत विचार ये दो बुद्धियां हमारे अंदर है कुमति और सुमति जहां कुमति बढ़ती है तो फिर असत विचार बस नकारात्मक सोच जो नेगेटिव सोच है हां ये इसको हटाने के लिए पहले भोजन शुद्ध करो फिर नाम जप शास्त्र स्वाध्याय सत्संग सुनो इससे बड़ा लाभ मिलेगा भोजन शुद्ध करो कोई नशा तो कैसे कैसे बुद्धि शुद्ध कैसे होगी जब हम

अशुद्ध चीजों का सेवन करेंगे तो हमारी बुद्धि अशुद्ध होगी और शुद्ध चीजों का सेवन करेंगे तो जैसे जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन जैसा पियो पानी वैसी बने वाणी पहले मतलब बड़ा मतलब पता रहता था कि ये गलत है हम नहीं करते थे बट धीरे-धीरे पता नहीं या तो सांसारिक लोगों को देख के मतलब बुद्धि मलन हो जाते हैं तो आज हमारे पास आप आए हैं तो एक नियम लीजिए कि जो भी आप नशा करते हैं उसे छोड़ दीजिए अगर सुधरना चाहते नहीं सुधरना चाहते तो मत लीजिए क्योंकि हमारे पास आने का कुछ तो लाभ मिलना चाहिए।

हमारे संग का लाभ यही है कि आपका नाश करने वाली बात, आपका पतन करने वाली बात, आपको दुख देने वाली बातें खत्म हो जाए। तो आप पहले नशा छोड़िए। अब छोड़ दो। आज से छोड़ दो। कोई नशा नहीं करोगे। जिया जा सकता है। बिना नशे के जिया जा सकता है। लाखों लोग जीते हैं बिना नशे के। यह तो बुद्धि की मलिनता है जो लोग ऐसा कि मैं बिना नशे के जैसे मतलब उसमें यह लगता था कि इससे मैं तनाव मुक्त हो जाऊंगा बट उस वाह तनाव मुक्त होने के लिए शास्त्र में नहीं एक साइकिल नहीं चला सकता।

तनाव मुक्त हो रहा है। मोटरसाइकिल ले मुंह भरा के रथ शराब पीने वालों की दुर्दशा है। शराब शरीर के लिए हानिकारक है। धर्म नष्ट करती है। बुद्धि भ्रष्ट करती है। कौन शराब पीकर उन्नति को प्राप्त हुआ है। आध्यात्मिक या लौकिक विचार करके देखिए। ज्यादा पी लो तो पड़े पड़े लघु शंका करो। कहीं नाली में पड़े हो कहां पड़े हो? कोई होश नहीं। तनाव मुक्त होना है तो राधा नाम का ध्यान कीजिए। तनाव मुक्त हो जाएंगे। जन्मजन्म का तनाव नष्ट हो जाएगा। पहले व्यसन छोड़िए और भोजन शुद्ध भोजन में क्या शुद्ध है?

बाजार का बहुत खाता हूं। अब घर का शुरू कर हां भोजन शुद्ध कीजिए। तभी नेगेटिव बुद्धि को हम कंट्रोल कर पाएंगे। नहीं तो उसको जब रजोगुणी तमोगुणी भोजन मिलेगा तो नेगेटिव ही सोच फेंकेगी। और यह नेगेटिव बढ़ जाए तो डिप्रेशन में पहुंचा दे। थोड़ा सा थोड़ा सा अनुभव है। हां नहीं बहुत खतरनाक है। यह ज्यादा नेगेटिव हो जाए तो आपको आपके हाथ से आपकी हत्या करा देगा। बहुत खतरनाक है। नेगेटिव विचार। जब अपने को ऐसा महसूस कर लेते हैं कि अब जीना किस काम का? तो कितने लोग हैं जहर खा लेते हैं।

कितने लोग हैं सूट कर लेते हैं। कर लेते हैं। यह बहुत खतरनाक है। इसको सुधारो। भोजन सुधारो और नशा तो आज से करना मत क्योंकि आप हमारे सामने नियम ले रहे हैं। अब अगर तोड़ा फिर कैसे जहां से उठना है वहीं की बातें अगर छोड़ दी वहां का नियम छोड़ दिया तो फिर कहां उठोगे? मतलब गिरने के तो लाखों चांस है लेकिन उठने के चांस कम मिलते हैं। ये भगवान ने आपको चांस दिया है। आप उठ जाइए। आप गलत मत कीजिए और नाम जप कीजिए। ठीक है?

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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