॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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भगवत् मार्ग पर चलना चाहते हैं, पर हर दिन असफल हो रहे हैं।

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

आस्था बोरा जी जयपुर से श्री हरिवंश महाराज राधे-राधे महाराज जी 2 साल पहले जब आपको सुनना शुरू किया तो जानना हुआ कि हम कितना अज्ञानता और अंधकार में जीवन जी रहे हैं। आपको सुनने से यह समझ आया कि हम जैसे अविवेकी लोगों के लिए भी है भगवत मार्ग। अब जब भगवत मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हैं तो हर दिन असफल से हो रहे हैं। मन विकल्पित हो रहा है। कृपया कर दर्शन कीजिए कि हम आपको बताएं हमने अपने अपने जीवन में असफलता को सफलता का योग माना। जहां हम असफल हुए वहां हमें सफलता का मार्ग प्रकट दिखाई दिया।

हे भगवान मेरी रक्षा कीजिए। क्रोध आया हे भगवान मेरी रक्षा कीजिए। मुझे संभालिए तो असफल असरण हो जाना ही शरणागति की पुष्टता है। जब तक अपने में बल होता है कोई तब तक शुद्ध शरणागति नहीं होती। जब अपने को सुनहरी मैंने निर्बल के बलराम। जिस समय हमें लगता है कि मैं पूर्ण सफल हूं। मेरे में कोई सामर्थ्य नहीं तो रोना आता है और रोकर हम भगवान को पुकारते हैं। हे करुणा सिंधु भगवान मैं तो असफल हूं। अगर आप कृपा करो तो मैं इन विकारों से मुक्त होकर आपकी शुद्ध भक्ति को प्राप्त कर सकूं।

नाथ मेरे में सामर्थ्य नहीं कि मैं इन विकारों पर विजय प्राप्त करके आपकी तरफ चल सकूं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं हो हारो कर जतन विविध विधि अतिशय प्रबल अजय तुलसीदास बस होए तब जब प्रभु प्रेरक बर जाए हे प्रभु आप काम क्रोध को प्रेरणा देते हैं हमारे मन को प्रेरणा देते हैं सारी लीला आपकी चल रही आप इनको रोक दो और हमें अपने चरणों की तरफ आने दो असफलता में निराशा नहीं आनी चाहिए असफलता में आशा जुड़नी चाहिए और भगवान से मैं तो किसी योग्य नहीं लेकिन आप सर्व सामर्थ्यशाली हैं।

आपकी एक कृपा कोर से मेरा सब कुछ बन जाएगा। मेरे बनाए ना बनेगी कोटि कलपों आपके बनाए बनेगी पल पाव में। पल के चौथाई हिस्से में आपकी कृपा कोर से बन जाएगा। नाथ आपने बहुत पतितों को पावन किया है। मुझ जैसे अधम को भी पावन कीजिए। ये अंदर से भावना आ जाती है तो हमारी सफलता का योग बन जाता है। हमें निराश नहीं होना। हमें उदास नहीं होना। हमें हताश नहीं होना। अपने कर्तव्य पर कदम आगे बढ़ाते रहना है। फिसल जाए तो फिर खड़े होकर के चल। ये परमार्थ का मार्ग है। इसमें हारना नहीं।

इसमें निराश नहीं होना। हम अविनाशी के बच्चा हैं। एक ना एक दिन परम पद को प्राप्त करके रहेंगे। आज अगर हम परास्त हो रहे हैं तो हम रुकेंगे नहीं। हम 100 बार गिरेंगे तो 101 बार खड़े होकर फिर परमार्थ पे चलेंगे। तो कभी ना कभी भगवान हमें विजय दिला ही देंगे। संसार में मोह माया का बहुत जाल है। हमारी कमजोरियां हमें गिराती रहती हैं महाराज जी। हमारी कमजोरियां है लेकिन हमारे प्रभु तो बहुत बलशाली है ना। तो उधर दृष्टि रखो। अपनी तरफ दृष्टि क्यों रखो? जब अपने को पता है अपने से नहीं संभलने वाला तो ऐसे चलो गिरोगे नहीं।

ऐसे चलोगे कभी नहीं गिरोगे। आज तक जितने भी ऊंचाई पर चढ़े वो ऐसे चढ़े हैं जो भगवान की शरण में हुए सनकाद ब्रह्म ज्ञानी है लेकिन हर समय हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम जपते रहते हैं जो भगवान का नाम जप करता है भगवान का स्मरण करता है अपने को असमर्थ देखता है वही तो परम पद का अधिकारी होता है वही तो भगवान का कृपा पात्र बनता है यही दरबार दीन को आदर रीत सदा चली आई जो अपने को किसी योग्य नहीं समझते वही सर्व योग्य हो जाते हैं जो अपने को कुछ योग्य समझते हैं वो भ्रष्ट हो जाते क्योंकि अभिमान नाश का कारण बनता है।

पतन का कारण बनता है।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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