॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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भगवान मिलेंगे या नहीं कैसे पता चलेगा?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

भगवत दर्शन का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवान के दर्शन करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवत दर्शन का सरल और सर्वोत्तम उपाय दिन रात उनके नाम का जप करो और एकांत में रो भगवान मिल जाओ। दिन रात नाम जप करो और भगवान के लिए रुद सुरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा बिन रोए किन पया प्रेम पियारा में लाडली जी ने राधा माधव चिंतन में लिखा हुआ है कि एक गोपी ने पूछा श्री कृष्ण प्राप्ति का उपाय किशोरी जी क्या है तो किशोरी जी ने कहा हमने तो केवल आंसुओं को ही समझा है केवल आंसुओं को ही समझा है प्रीतम की प्राप्ति का उपाय जो रो के नाम जप करता है, पुकारता है, रोता है, भगवान उसको दर्शन देते हैं।

दूसरे नंबर की बात है कि तुम दर्शन के लिए व्याकुल कितना हो। जब तुम्हें ना खानपान अच्छा लगे, ना सोना अच्छा लगे, कुछ अच्छा ही ना लगे। इतनी व्याकुलता कि जीना भी अच्छा नहीं लग रहा। ये जब मृत्यु प्रिय लगने लगे और जीना प्रिय लगने लगे। इतना विरह हृदय में आ जाए, इतनी व्याकुलता हृदय में आ जाए, उसी समय भगवान दर्शन दे देते हैं। पर पहला उपाय दूसरे उपाय की अपेक्षा ठीक है कि हमारे अंदर विरह भी नहीं है, व्याकुलता भी नहीं, जलन भी नहीं है। पर हम रात दिन नाम जप करते हैं तो अपने आप भगवान आकर दर्शन देंगे।

पक्का। ना चाह हो तो भी आकर मिल जाएंगे। देखो मार्कंडेय जी भजन कर रहे हैं। चाह नहीं थी भगवान शंकर और पार्वती जी की। पढ़ के देख लो भागवत में। अपने आप आकर के दर्शन दिए। नर नारायण भगवान दर्शन दिए। सब दर्शन दे देंगे। खूब भजन करो। कहते हैं कलयुग में भगवान के दर्शन नहीं हो सकते। कलयुग है। इसमें साक्षात भगवान के दर्शन नहीं हो सकते। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस युग में भगवान के दर्शन पहले युगों से सरलता से होते हैं। द हजार वर्ष एक पैर के अंगूठे के बल खड़े होकर दोनों हाथ उठा के जो हम लोग एक मिनट नहीं कर सकते।

पैर के अंगूठे के बल खड़े होके दोनों हाथ उठा एक मिनट नहीं कर सकते। वो द हजार वर्ष मंत्र जपते हुए तब कहे करदम जी को भगवान का दर्शन हुआ था। यहां द हजार वर्ष है ही नहीं जिंदगी में। 70 80 वर्ष के खेल है हमारा। इसमें अगर हम निरंतर नाम जप कर ले तो बिना किसी तपस्या के भगवान के दर्शन हो जाएंगे। कह रहे मेरा विश्वास है कि इस कलयुग में भगवान के दर्शन बहुत सरल है, सहज है। पहले युगों से भी अन्य युगों के महापुरुष चाहते हैं कि कलयुग में मेरा जन्म हो जाए। थोड़े प्रयास से भगवान के दर्शन रात दिन नाम थोड़ा प्रयास 10,000 वर्ष वाला प्रयास और 80 साल के हैं 80 में 20 30 वर्ष तो सोने के रख लो क्योंकि अधिकतर बाल्यावस्था ऐसी चली गई अब जवानी में अगर होश आ जाए नाम जप कर ले तो इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी ऐसा रोज आने लगता है कि आज भगवान मिलेंगे आज भगवान मिलेंगे जब भजन परिपूर्ण होने लगता है भगवान को मिलना होता है तो हृदय से लगता है आज भगवान मिलेंगे आज भगवान आज तो पक्का मिलेंगे भगवान मिल जाते हैं भगवान फिर कोई

ना कोई रूप रख के आते हैं और वो अनुभव कराते हैं मैं हूं देखो मैं हूं अपने को तो अन्य रूपों की बात क्या साक्षात रूप में भगवान शंकर काशी के घाटों में आए पर ये बस था भूख प्यास रहते हुए आज भगवान मिलेंगे आज भगवान मिलेंगे आज पक्का मिलेंगे दोपहर की तपती हुई भूमि में जो पूरे घाटों में कोई व्यक्ति ना दिखाई दे नंगे पैर हाथ में त्रिशूल लिए हुए जटाओं का दौड़ पड़े साष्टांग दंडवत अब उस आनंद का क्या वर्णन बस उन्होंने भी एक उंगली उठाई थी बस हमने सत्संग में पीछे भी बताया एक उंगली उठाई थी बोले कुछ नहीं थे वो एक है बस एक है अनेक कोई नहीं अन्य कोई नहीं जो किसी की निंदा करता है वह अभी अज्ञानी है अन्य की निंदा नहीं यहां तो पापी की भी निंदा नहीं की गई है।

ये क्रूर पापिनो न सभास द्या सर् परम स्वराध्य बुद्धिमम मेरा दृढ़ विश्वास है कलयुग में थोड़े ही भजन से भगवान का साक्षात्कार हो जाता है। क्योंकि अल्प आयु है हम लोगों की। भगवान के दर्शन कैसे होते हैं? कैसे कैसे भगवान के दर्शन होते हैं? जप से तप से बड़ी-बड़ी साधनाओं से भगवान के दर्शन नहीं होते। कैसे होते हैं? भगवान मेरे हैं और अब बस मुझे मिलना है। मुझे प्रियाजु से मिलना है। मुझे प्रभु से मिलना है। बस बहुत सरलता की बात है। भगवान मेरे हैं। जितना मां से प्यार है, जितना बहन से प्यार है, जितना शरीर से प्यार है, जितना पुत्र से प्यार है, उतना भगवान से प्यार हो जाए, भगवान मिल जाएंगे।

उनको तो थोड़ा भी प्यार दे दो तो मिल जाएंगे। पर थोड़ा भी प्यार नहीं है। कैसे भगवान मिले? कौन भगवान से मिलना चाहता है? किसको व्याकुलता हुई? कौन रात भर जगा भगवान से मिलने के लिए? कौन कई दिन भूखा रहा भगवान से मिलने के लिए? ये बातें हैं। सबकी ममता ताग बटोरी। मम पद मन बांध भर डोरी। अब प्रभु के सिवा मेरा कोई नहीं। मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई हृदय व्याकुल है प्रभु के मिलने। इतने तक तो पहुंचना ही नहीं पड़ता। इसके पहले ही वह हृदय और मानस में छाने लगते हैं।

फिर साक्षात्कार तो अपने आप हो जाता। इतना नहीं पहुंचना पड़ता। मार रूप नहीं सहज सरल आनंद व्याकुलता आनंद भरी और उतने में आप थोड़ा करके देखो आपकी भावना में आते हैं कि नहीं? प्रभु अभी देखो आप जितना भजन करते हो उतनी भावना में आते हैं कि नहीं। देखो आप तो वैसे आपकी भावना के सामने है और जब गाढ़ भावना हो जाएगी तो ये आपसे बात करने लगेंगे वो है कोई कण ऐसा नहीं जाना हो तो जब आप भावना कर रहे हैं तो आपकी भावना में जो झांकी आई वो आए हैं प्रभु वो केवल कोरी भावना नहीं है क्या साधना करते करते साधन के बल से भगवान मिल सकते हैं नहीं कि आप कुछ साधना कर रहे हो साधना का आपको बल है उससे भगवान मिल जाएंगे नहीं उसका फल मिलेगा आपको तप लोक महा लोक जनक ब्रह्मलोक और भी लेकिन भगवान नहीं मिलेंगे।

भगवान का मिलने का एक ही उपाय है कि वो कृपा कर दे। वो कृपा कर दे। कोई साधक चाहे कि अपने तपोबल से अपने साधना के बल से भगवान को बांध के सामने खींच के लाए। ऐसा कोई तपस्वी नहीं पैदा हुआ। ऐसा कोई साधक नहीं पैदा हुआ। कितना भी साधन किया जाए, कितना भी योग किया जाए, परंतु भगवान के दर्शन सिर्फ भगवान की कृपा से होते हैं। वो देखकर द्रवित हो जाए कि बहुत तप कर रहा है, बहुत साधन कर रहा है, थक गया है। अब द्रवित होकर भगवान दर्शन दे लेकिन कोई अपने तपोबल से कोई कि मैं साधना कर रहा हूं, भजन बल से भगवान को अधीन कर ऐसा नहीं कर सकता।

वो जब भजन करते हुए दैन्य भाव तो भगवान द्रवित हो गए और वो दर्शन दे दिए। क्या जैसे हम दो मित्र मिलते हैं ऐसे भगवान से मिलकर वार्तालाप कर सकते हैं? हां अवश्य। यदि आपके अंदर भगवान से प्रेम उदय हो चुका है तो भगवान आपसे दो मित्रों की तरह एकांत में मिलकर परस्पर वार्तालाप कर सकते हैं। बिल्कुल इच्छा जगाओ। मिलने की इच्छा जगाओ। जब एकांत में भक्त और भगवान बातें कर रहे हैं तो दूसरा देख सकता है। दूसरा सुन सकता है। नहीं मान लो यही बैठकर भगवान से बातचीत हो रही हो तो जैसे नारायण स्वामी थे कहते भाग तू भाग कितना भागेगा और कपड़ा समेट के पीछे भागते तो लोग देखते कोई नहीं सामने बाबा पागल हो गया कुसुम सरोवर तक दौड़ के आते फिर लौटते फिर मुखारविंद तक दौड़ के जाते फिर वहां जब प्रेमी जनों ने पूछा तो बोले हमारी उसकी छुआछुई हो रही वो देखो सामने दौड़ रहा है मैं उसे पकड़ रहा हूं लेकिन सबको लगता कि पागल हो गए हैं क्या दौड़ रहे हो कहते भाग तू कितना भागेगा आज मैं पकड़ के छोडूंगा और सामने कोई है नहीं तो लोग पागल ही तो समझते थे तभी भक्त को एक पागल संज्ञा दे दी जाती है श्री भगवान यदि भक्त से मिलकर बातचीत कर रहे हैं और भगवान चाह ले कि हमारे और भक्त के दर्शन करके हमारे और भक्त की बात सुन ले तो सुन लेगा अन्यथा समाज में भगवान मिलकर चले जाएंगे और वह नहीं जान पाएगा।

भगवान कृपा कर दे कि इसको मेरे दर्शन हो जाए। मेरी भक्त की बातचीत सुनाई दे तो वो सुनने में दूसरा सामर्थ्य नहीं है कि वो भगवान और भक्त की वार्ता को सुन सके या देख सके। जबकि प्रगट में होगी पर वो सुन नहीं पाएगा। देख नहीं पाएगा। भगवान मिलने वाले हैं। कैसे पता चलेगा? उसकी पूर्व की स्थिति क्या होती कि अब भगवान मिल जाएंगे। बस अब पक्का भगवान के साक्षात्कार के पहले उसे स्वप्न में भगवान मिलेंगे। स्वप्न में भगवान का आना होगा। फिर वो बैठे-बैठे दिव्य प्रकाश उसके झलकने लगेगा।

वो प्रकाश में भगवान की झांकी करेगा। जिसको साक्षात्कार होना साक्षात स्वप्न में भगवान के दर्शन होना। ऐसे नहीं कि कोई फोटो के दर्शन हो। स्वप्न में ऐसा कि हम देख रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं भगवान से। जागृत में बैठे-बैठे दिव्य प्रकाश उसी में भगवान दिखाई दे रहे हैं। वो भगवान से बातचीत कर रहा है। यह पहली स्थिति होगी। फिर साक्षात भगवान प्रकट होकर उसे दर्शन देंगे। प्रकाश के अगर दर्शन नहीं हुए तो भगवत दर्शन का भी अधिकारी नहीं। स्वप्न दर्शन के बाद भी दिव्य प्रकाश उसके नेत्रों के सामने छाया रहे।

हर समय ललित त्रिभंगी मूर्ति सामने विराजमान है। भगवान की दिव्यता को सहन करने के लिए वो प्रकाश दर्शन आवश्यक है। इसलिए पहले भगवान प्रकाश दर्शन देते हैं। स्वप्न दर्शन स्वप्न दर्शन ऐसे नहीं कि कोई चित्रपट के दर्शन किए या तीर्थ स्नान स्थान के दर्शन किए या कोई श्री विग्रह के आप मान लीजिए भगवत दर्शन नहीं साक्षात जैसा जागृत जैसा स्वप्न में दर्शन फिर जागृत अवस्था में प्रकाश दिव्य तेजो पुण्य में भगवान का भाव क्योंकि भगवान के दर्शन की दिव्यता को सहने की सामर्थ आनी चाहिए नहीं तो वो तेज सहन नहीं कर पाएगा उसको ऐसा धक्का लगेगा कि एक साथ जैसे बड़ा पावर बिजली का करंट तो मर जाएगा।

ऐसे एक साथ धक्का लगेगा उसके हृदय में झेल नहीं पाएगा। इसलिए पहले स्वप्न दर्शन फिर भावना फिर दिव्य प्रकाश फिर साक्षात दर्शन साक्षात दर्शन ऐसे भगवान के ऐसे कोई जिसको समझाने के लिए बिजली का भारी करंट मार दिया जाए। झटके में बस ऐसे भगवान अनंत सामर्थ्यशाली कहते हैं तुम घर सजाओ भगवान आएंगे हां तो मन का घर ये बाहर वाला घर सजा ले बाहर आप खूब सजा दो लीप पोत के भगवान यहां मन रूपी घर को मन से संसार रूपी कूड़ा निकल जाए देवी संपदा आ जाए मन मंदिर बना लो मन सजा लो मन मन के दुर्गुण हटा लो।

मन को संसार से खाली कर दो। भगवान आ जाएंगे। मन रूपी घर को सजाना। क्या भगवत प्राप्ति प्रारब्ध में लिखी है कि तुम्हें जाओ इस जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी। नहीं। भगवान का भजन संत समागम के द्वारा प्रारंभ होता है। और भजन के द्वारा हमारा भाग्य नया निर्माण होता है। भगवत प्राप्ति का। वो पूर्व जन्म से नहीं होता कि अगला जन्म तुम्हें भगवत प्राप्ति हो जाएगी। वो भजन से होता है। क्या प्रारब्ध बाधा पहुंचा सकता है? इच्छा प्रबल हो भजन कस के हो भगवान की अनन्यता हो तो प्रारब्ध बाधा नहीं पहुंचा सकता।

नहीं पहुंचा देगा। प्रारब्ध बहुत बुरा होता है। जैसे मान लो दोनों किडनी फेल डायलेस और बड़ी समस्या बड़ा परेशान पर भगवान की कृपा से चल रहा है। साधन भी चल रहा है जो भगवान चला रहे हैं। जैसे अगर बताओ प्रारंभ में ये हो जाता भजन शुरू किया प्रारंभ हो गया। मार दिया ना प्रारब्ध ने तो प्रारब्ध बाधा पहुंचा सकता है भगवत प्राप्ति में यदि भगवान की अनन्यता ना हो भगवान की शरणागति ना हो भगवान का भजन ना हो भगवान की अप्राप्ति के संताप का क्या स्वरूप है जिया ना जाए भगवान के अमिलन में भगवान के बिछो में एक एक निमेश युग के समान लगने लगे ऐसा नहीं लगता इसलिए भगवान नहीं मिलते अभी खाना पीना अच्छा नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है भगवान की लीलाओं में प्रवेश कब होता है ये तो भगवत दर्शन की बात रही भगवान की लीलाओं में कब प्रवेश होता है जब भगवान की अखंड स्मृति जागृत हो जाती है हर समय भगवन नाम चल रहा है और वो श्रद्धा भगवान की लीलाओं का चिंतन करता रहता है।

अपने इष्ट की लीलाओं अखंड स्मृति और लीलाओं का चिंतन और उसके अनुसार अपने स्वरूप को देखता रहता है। जैसे अपने लोग सहचरी भाव भगवान सत्य है, सदा है, सर्वत्र है। इसलिए जैसी मन में वह लीला चिंतन करता है, जैसे ही भावना उसकी पुष्ट होती है, भगवान उसे अपने लीला का द्वार खोलते हैं कि अब तुम्हें कल्पना करने की जरूरत नहीं। भावना करने की जरूरत आओ देखो ये लीला दर्शन करो। वो लीला में प्रवेश कर जाता है और प्रत्यक्ष की तरह सब लीला प्रसंगों में स्वयं सम्मिलित रहता है।

जैसे हम ऐसे देख रहे हैं ऐसे प्रत्यक्ष की तरह भावना नहीं केवल वो तब होता है अखंड स्मृति लीलाओं का चिंतन और स्वरूप का बोध अपने स्वरूप का बोध सहचर स्वरूप गोपी स्वरूप सखा स्वरूप ये परमधाम क्या है? वैुंठ लोक गोलोक साकेत कैलाश ये परमधाम है। एक है या अलग है? एक ही है और भावना के अनुसार अलग वैभव प्रकाशित हो जाएगा। धाम नित्य चिदानंद एक है। आपने भगवान शिव की उपासना की तो आपको पूरा कैलाश रूप में भगवान शिव परिकर सहित अनुभव कराएगा। राम जी की उपासना की वही धाम साकेत बनकर अनुभव कराएगा।

श्याम जी की उपासना की वही धाम गोलोक बनकर अनुभव कराएगा। धाम एक है वो चिदानंदमय है तो भक्त जैसी भावना करता है वैसा अनुभव कराता है। शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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