एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #6 · 8 नवंबर 2022
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अमन शर्मा जी श्री हरिवंश परम पूज्य श्री सदगुरुदेव भगवान के चरण कमलों में अनंत कोटि दंडवत प्रणाम गुरुदेव व्यवहार जगत में अगर कोई हमारे साथ अधर्म आचरण करें स्पष्ट छल मिथ्या भाषण व मानसिक क्लेश ऐसी परिस्थिति में मुझे तत्काल क्रोध एवं बदला लेने की भावना स्फुरद होती है नहीं करी इसमें क्या है कि अगर आपके अंदर से ऐसी तमोगुण प्रतिक्रिया होगी तो आपका भजन भाव नष्ट हो जाएगा उसका क्या नष्ट होगा वो तो बाद की बात है आपकी हानि हो जाएगी क्रोध करने से ना सामने वाले का लाभ होता है ना आपका लाभ होता है क्रोध एक महान पुण्य नाशक शत्रु है परमार्थ संसारी आदमी तो नहीं समझता पर परमार्थ का साधक इस बात को समझता है जैसे कोई हमें कटु भाषण या हमारे साथ छल कर रहा है कपट कर रहा है वह हमको बराबर दबाए जा रहा है तो हम प्रभु से प्रार्थना करें प्रभु आप देख रहे हो यद आप ही इसके हृदय में बैठे हो और मेरी सामर्थ्य नहीं कि मैं सह सकू या तो इसको बदल दो या मेरे को सामर्थ्य दे दो कि मैं सह जाऊ प्रतिक्रिया करने से कोई लाभ नहीं
मिलता बहुत सी ऐसी घटनाएं होती हैं एक आदमी का खेत खेत की मेड़ होती है ना मेड़ को खुरपी से काटता जाता था अब हर बार हर जुताई में काटता ही जाता था इधर वाला सह रहा था अब एक सीमा होती व जब सीमा भी उल्लंघन कर दिया उसने उसको मारा मारने में व मर गया बहुत ज्यादा मार दिया वोह तो मर गया और यह जेल गए पूरे आजीवन की सजा हुई दोनों खेत पड़े बेवकूफी हो गई ना वह कितना काटता अगर वह आपकी मेड़ को काट के अंदर घुसता तो समाज है आप समाज व्यवस्था का प्रयोग कीजिए रिपोर्ट कीजिए मारने का मारने से क्या हुआ आप जेल गए और वह मर गया दोनों का अमंगल हो गया तो क्रोध ने कर दिया ना अमंगल क्रोध से आज तक किसी का भी हित नहीं हुआ ना क्रोध करने वाले का ना जिससे हम क्रोध करते हैं उसका इसलिए हमें चाहिए कि क्रोध कहां से आता है हमें देखना है क्रोध काम से आता है कामा संजय क्रोधा क्रोधा स्मति विभ्रम स्मृति भत बुद्धि नास बुद्धि नासा प्रणति अगर हम प्रतिक्रिया करते हैं तो द्वेष बन जाता है अगर हम सह जाते हैं तो हम पर प्रभु कृपालु होते हैं
जब प्रभु कृपा करेंगे तो सब अनुकूलता ही अनुकूलता रहेगी सिद्धांता में सहना चाहिए हमारा जो मार्ग है व और फिर जब आगे बात आती है तब आप अपने कंट्रोल में रहेंगे फिर जो होना हो जाएगा उसमें प्रश्न की जरूरत नहीं है भगवान आपके द्वारा फिर जो कराना चाहते हो जाएगा अपने को सहना है और भगवान फिर क्या कराते हैं व आपकी बस की बात नहीं होगी हो जाएगा जो होना होगा समझ रहे और जब आगे सीमा में बढ़ जाएगा तो आपके अंदर ही प्रभु बैठ कर के ऐसे बल पूर्वक कार्य करा लेंगे जो आपसे
होने वाला ही नहीं था वह स्वयं करवा लेंगे उसमें फिर और वो आगे सब बराबर कर देंगे निपटा देंगे ऐसा भी हो जाएगा इसलिए चाहिए तो य कि हम सहन करते रहे और फिर आगे प्रभु जैसा करवाना चाहेंगे वैसा हो जाएगा उसमें आपका ही नहीं है फ हो जाएगा जैसा ला हरप्रीत जी कनाडा से राधे राधे महाराज श्री महाराज श्री मन हमेशा उदास भयभीत और अशांत रहता है हा क्योंकि सही आश्रय नहीं है ना अब जिसका भी आश्रय लिया मरण धर्मा है जिसकी तरफ भी देखते हो सब काल के गाल में जाने वाला है उदास तो होही जाएगा मन निरास तो होही जाएगा अभी बाप आनंद में हो जाएंगे यदि श्री कृष्ण के चरणों का आश्रय ले ले प्रियाज के तो एक अविनाशी बल मिला ना या कुछ भी हो मेरे प्रभु तो है ही ना कहां कहीं भी हम जाए हमारे भगवान तो है ना पर यह बात तभी आएगी जब आप भजन करोगे भगवान के शरणागत हो ग भगवान के आश्रित हो ग तो आपको अनुभव होने लगे फिर नहीं बह रहता फ उदास नहीं रहता फिर चिंता नहीं रहती कि कैसे चलेगा हमारा जीवन अनंत ब्रह्मांड है ना सबका भरण पोषण हो रहा सबका जिन
पशुओं को कुंतल मास चाहिए पेट भरने के लिए उनको वो मिल रहा है चीटी को एक छोटा दन उसके लिए वो सबकी व्यवस्था भगवान कैसे कर रहे पशु पक्षी अनंत जीवों का भरण पोषण कर रहे हैं फिर ऐसे बलशाली प्रभु का जब आश्रय हो जाएगा तो हमें भय नहीं रहेगा और हमारी हर आशा पूर्ण करने में समर्थ है तो अगर कोई आशा नहीं पूर्ण हो रही तो उसको नहीं पूर्ण होने में ही हमारा मंगल है मंगल भ भगवान मंगल भवन वो अमंगल नहीं होने देंगे हम जानते हैं कि ये आशा हमारी पूरी हो जाए तो मंगल होगा लेकिन आपकी सोच थोड़ी है वो आगे की देख रहे हैं कि अगर ये आशा पूर्ण हो गई तो या मंगल हो जाएगा या फस जाएगा माया में तो कृपालु भगवान वही करेंगे जिससे हमारा मंगल हो थोड़ा देखने में जरूर लगता है कि इसमें क्या मंगल है है उसका अंतिम परिणाम बड़ा मंगलमय होगा पर भगवान पर भरोसा रख के अच्छे आचरण का सबको ई जानता है अच्छा ही फल होता है ये सबको ई जानता है अगर आप अच्छे आचरण करेंगे भजन करेंगे भगवत आश्रित रहेंगे तो पूर्व जो पाप है वो नष्ट होंगे और जो पाप के विधान
से शरीर बना है उसमें दुख आएगा कष्ट आएगा और उसको सहने की सामर्थ्य भी आप में आ जाएगी इसलिए ये जो निराशा है निर्बलता है उदासी है ये होनी ही चाहिए क्योंकि हमने सही जगह आश्रय नहीं लिया और जब सही आश्रय ले लोगे तो आनंदित हो जाओगे सही आश्रय है प्रभु के चरणारविंद का आश्रय उनके नाम का आश्रय इसी से आनंद की प्राप्ति होग नहीं तो बिल्कुल असहाय हो जाता है जी कई ऐसी परिस्थितियां आती हैं व फिर सोच कैसे होगा तो हम तो अपने जीवन के लिए केवल कैसे सोचते हो वो अनंत जीवों का भरण पोषण कर रहे हैं ऐसे प्रभु का हम है उनके भगवान का अंश है ना जी इतना तो पता होगा ही तो हम है ना उनके ना अंश का मतलब होता है जैसे पिता का अंश पुत्र होता है तो ऐसे ही हम भगवान के अंदर यार इतने बड़े घर के होकर हम फुटपाथ में दो दो रुपया मांगते घूमे बेज्जती बात है इतने बलशाली प्रभु क्योंकि हमें डर लग रहा है मतलब अपने प्रभु का भरोसा नहीं इसीलिए डर लग रहा है नहीं तो ऐसा नहीं हर समय भगवान उसकी रक्षा में अपनी शक्तियों को तैनात रखते हैं जो पूर्ण
रूप से भगवान के आश्रित हो गया इसलिए निराशा बलहीनता उदासीनता इनसे बचने के लिए भगवान का आश्रय लो उनके नाम का जप करो अच्छे आचरण करो गंदे आचरण मत शराब पीते हो क्या हां मांस नहीं खाते बस गंदे आ चरणों से बचो अच्छा तो ये जो उदासीनता है एक तरह से संकेत है कि आप अभी सही ठिकाने पे नहीं हो नहीं तो आ जाएगा बल आप खुद देखोगे दूसरों को समझाने लगोगे जब वो बल आ जाएगा ना अंदर तो आप ऐसे धन नहीं है व्यवस्था नहीं है कोई प्यार नहीं करता है शरीर रोग से ग्रसित पर आप मुस्कुराओ ग क्योंकि आपको कनेक्शन बहुत बड़े से है इसलिए आप आनंदित रहो यहां सब कुछ है फिर भी आप निराश रहोगे क्योंकि जो हमारी चाह है ना वो केवल भगवान के हम जान नहीं रहे जैसे मन कहता है कि ये भोग मिल जाए तो हम राजी हो जाएंगे वो भोग दूसरे के पास है वो राजी क्यों नहीं है वह किसी और बात के लिए वो किसी और बात या तुम्हें ही वो भोग मिल जाए तो फिर कोई और बात खड़ी हो जाएगी मतलब हमारी मांग अभी पूरी नहीं हुई और देखो केवट भगवान के चरण धो रहा है जब तो कह रहा अब
कछु नाथ चाहे हो गई मांग पूरी अब नहीं चाहिए भगवान क ले लो सिया जी की अंगूठी दे रहे कितनी बड़ी बात है प्राण प्रिया श्री जानकी जी की अंगूठी दे रहे हैं भगवान प्रसन्न होकर ले लो ले लो ना अब कछ बहुत मिल गया आपके चरण ये अब अति आनंद उ मग अनुरागा अब कछ ना अब नहीं चाए क्योंकि आनंद सिंधु प्रभु अपने हो गया प्रभु से कह रहे हम नहीं चाहिए कुछ नहीं चाहिए अब नहीं चाहिए हमारी चाह तभी पूर्ण होगी जब हम प्रभु के चरणों का आश्रय लेंगे राघव ठक्कर जी राधा बल श्री हरिवंश गुरुदेव गुरुदेव मेरा मन तबला बजाने और भजन गायन में लगता है आपके द्वारा दिए गए राधा नाम में मेरा मन चंचल हो जाता है और टिकता नहीं है तो कौन से भजन में तबला बजाने में तुम मन लगता है बताओ कौन सा भजन कौन सा भजन नहीं मता हमें एक लाइन बताओ कि ये भजन जैसे सावर दो सेवा सुपर सत्संग झोली में मेरे भर बस यही भजन है गाते रहो धीरे-धीरे जब ये मांग पूरी हो जाएगी ना सेवा सुमिरन सत्संग यह जब झोली में आ जाएगा तो राधा नाम प्राण प्रिय लगने लगेगा बजाओ ठीक है ऐसे सीखो
बजा कभी श्री जी के सामने भी आकर बजाओ श्री जी के सामने गाओ हम तुम्ह अवसर देंगे ठीक है ना तुम अच्छे से हा तो थोड़ा और सीख लो फ हम श्री जी के सामने बैठा लेंगे आप सुना देना श्री जी को ठीक है अच्छे बचे जय जय श्री करती है क्या भूल हुए हमारे केला नहीं है लगाया के लिए काट रहे थे ब कर चेकी पूछ लाल होती है हा होता हैना कट करके से करने लगा तब देखो इसमें एक बात अब अच्छे से समझ लीजिए कि आपका जीवन भगवान का समर्पित यंत्र है और भगवान के द्वारा तीन लीलाएं होती है
सृजन करना पालन करना और संघार करना तीनों लीलाओं में यदि कहीं भी आप अपने को कर्ता मानेंगे तो फस जाएंगे ना आप के द्वारा सृजन होता है ना आप के द्वारा पालन होता है और नाप के द्वारा संघार होता है अच्छा जानबूझ कर के अगर हम किसी जीव की हत्या करते हैं तो उसमें कर्ता भाव होता है हमारा उद्देश्य है कुछ और और क्रिया कुछ हो जाती है और उसके हम बिल्कुल कर्ता नहीं है ना चाहते थे ना चाहेंगे तो फिर उसका कोई दंड नहीं होता उसके लिए सोचना नहीं है और यह विनाश लीला भी भगवान की ही लीला है संपूर्ण जगत का संघार वही करते हैं सब संपूर्ण जगत की सृष्टि वही करते हैं तो पालन भी वही करते हैं तो आप अपने ऊपर कोई भार मत रखिए अब सब भार शरण प्रभु के चरणों में वह भजन करवावे वो जो करवावे बस ऐसे भाव से रहो ना हां शोक मत करो कि ऐसा कुछ होगा भक्त हृदय में ऐसा होता है ऐसा शोख होता है पर आपने कोई जानबूझ के थोड़ी किया है ना हां इसलिए आप आनंदित रहिए ठीक है आप प्र विशाल जी श्री हरिवंश गुरुदेव आपके श्री चरणों में कोटि कोटि नमन गुरुदेव
आपके एक सत्संग में सुना था कि ठाकुर जी हमसे मिलने दिन में एक बार जरूर आते हैं तो उन्हें कैसे पहचान दिन में एक बार क्या वो हर समय रहते हैं किसी सूझ वाली आंख ने पहचान की कण कण में झाकी भगवान की जब तक शरीर है शरीर के भोगों में सुख है तो आपको वस्तु व्यक्ति पदार्थ दिखाई देगा समझना और जहां शरीर राग और शरीर के भोगों का सुख भाव नष्ट हुआ और अंदर से भगवत जागृत हुआ तो आपको सिर्फ भगवान ही भगवान है ऐसा दिखाई देगा वह हमारे पास ही है हमारे समीप ही है और इतने समीप है कि कोई और उनसे ज्यादा हमारा समीपवर्ती कोई है नहीं बस हमारी दृष्टि अभी माया त्रिगुण के पदे से युक्त है ना इसीलिए हमको जड़ और चैतन्य दिखाई देता है नहीं तो भगवान को खोजने की जरूरत नहीं है जा को मनमोहन दृष्टि परे सोत भयो सावन को आंध्र सूझ रंग हरे ही हरे जैसे सावन में कोई अंधा हो जाए उ ब महीना हरा ही नजर आएगा ऐसे ही जड़ चैतन्य कछु नहीं दित जित देखत तित श्याम खड़े बहल बिकल संभार तन की घूमत नैना रूप भरे करनी अ करनी दो विधि भूले विधि निषेध सब रहे
धरे नर हरिदास ते भए बावरे े आप प्रेम प्रवाह करे सत्य वस्तु भगवान है है बसव जो है को हम नहीं देख पा रहे यही माया है और जो नहीं है वह सत्य दिखाई दे रहा है यही माया का चमत्कार है नहीं है पर दिखाई दे रहा है और है पर दिखाई नहीं दे रहा इसी माया को हटाने के लिए भक्ति है बहुत सामर्थ्य शली है अगर हम प्रभु का नाम जब प्रभु की सेवा प्रभु की आराधना और स्सुख वांछन जो हम भोगों में सुख लेने की वृति रखते हैं यही वृत्ति अंधकार है यही वृत्ति मल है यह वृत्ति जोही हटेगी तो निर्मल मन हो जाएगा मन का मल है वासना नाना प्रकार के भोगों में सुख खोजना यही मल है कामना ही मल है भोगों की सुख बुद्धि मल है और जब तक मल है तब तक फिर दर्शन नहीं होगा सब मल हटा ममता मर ममता मल मर जाए जर जाए जहा नष्ट हुई ममता कामना नष्ट हुई तो आपको फिर सोचना नहीं पड़ेगा कि प्रभु है क्या वही नजर आएंगे देखो गोपी जन को सोचना थोड़ी प जित देखो तित श्याम में अपने प्रीतम को ही देख रहे हैं वही है सत्य वही है गोस्वामी जी को दिखाई दिया जड़ चेतन जग जीव
जत सकल राम में जान हमें तो नहीं दिखाई दिया क्योंकि हम संसार में सुख भोग रहे हैं तो हमें जड़ चैतन्य दिखाई देगा अच्छा बुरा दिखाई देगा स्त्री पुरुष दिखाई देगा उत्तम अधम दिखाई देगा यह माया जहां भक्ति होती है भक्ति का चरम अवस्था का फल यही है सर्वत्र अपने प्रभु को भक्त देखता है तो खूब नाम जप करो श्री जी की सेवा करो और सत्संग सुनो और कोई भी गलत आचरण संसार में जो निषेध किए गए वो ना होने पावे गृहस्थ धर्म में वो गृहस्थ धर्म के अनुसार जो है भगवत प्रसाद स्वरूप मानकर भगवत सेवा मान कर के उन्ही विषयों का सेवन करो जिसे शास्त्र विधान करता है और जिसे निषेध करता है वह कभी नहीं करे तो धीरे धीरे हृदय निर्मल होगा निर्मल जन मन सो मोहि पावा प्राप्त हो जाएंगे भगवान दिखाई देंगे वही सब रूपों में ऐसा अनुभव में आ जाए कठिन इसलिए लगता है कि हम इतने देह अभिमानी है इतना हमारा भोगों में राग है किय सब बातें बातें केवल लगती है ऐसा लगता कैसे हट पाऊंगा शुरुआत तो कर दे जवान कभी थकने नहीं चाहिए राधा राधा राधा राधा हर कार्य
करते हुए राधा वल्लभ जैसे भौरा गुनगुनाता है ना ऐसे गुनगुनाते हो फ देखो आप क्या हो जाता है दो लकड़ियों के घर्षण से अग्नि पैदा हो जाती है अरण्य मंथन इसी से तो होता ऐसे ही हम अपनी जवान और नाम दोनों को रगड़े इससे वो ज्ञाना अगनि प्रकट हो गई कि सब का भस्म हो जाएंगे पर रगड़ना पड़ेगा नाम जीह जप जाग जोगी परमार्थी प्रपंच वियोगी नाम जप करके ही जोगी ज्ञान में जग जाते हैं और प्रपंच का त्याग कर देते हैं माया का त्याग कर देते हैं नाम जब तक नाम में निरंतरता नहीं तब तक माया मल फेंक रहेगी कामनाएं वासना हमारे हृदय को गंदा करती रहे और फिर लोग कहते वर्ष हो गए 20 वर्ष हो गए भजन करते कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि खिड़कियां खुली रखे हो पोछा जरूर लगाए और धूल आई एक क्षण में सब गंदा कर गया थोड़ा खिड़की बंद करो देखना इंद्रियों के ना घोड़े बगे रात दिन इनम संयम के कोड़े लगे नियम पूर्वक और बहुत समय तक अपने को पवित्र रखकर मतलब गंदे आचरण ना करके और नाम जप किया तो अनुभव में आ जाएगा क्योंकि भगवान सत्य है उनका मार्ग सत्य है और
समस्त महापुरुषों ने इसी मार्ग से भगवान को प्राप्त किया है रास रस दाहिनी सह चरी मेरे प्यारे गुरुदेव भगवान के चरणों में कोटि प्रणाम महाराज जी बहुत प्रयास करने पर भी जो आपने शरणागत मंत्र दिया उसमें मन नहीं बैठ रहा एक साल से वृंदावन वास भी कर रहे हैं प्रतिकूलता एं बीमारी रूप से आ रही हैं ऐसा कौन सा अपराध बन गया है कि बाहर से तो दैन्य होता दिखती है पर अंदर से नहीं संतों के प्रति भी कृपया करके मुझ दीन हिंद का मार्गदर्शन करें हां कोई बात नहीं है जब हम किसी के नाम में मकान करते हैं उसका जाला उसकी छिपकली उसका सब अच्छा बुरा सब उसके नाम हो जाता है यदि हम शरणागत है तो हमारी अच्छी बुरी वृत्तियां अच्छे बुरे भाव सब प्रभु के चरणों में समर्पित है अब निश्चिंत होकर के अगर शरणागत मंत्र में मन नहीं लगता तो राधा राधा राधा वल्लभ श्री हरिवंश चतुराश्रम हुआ मंत्र में मन लगना कठिन होता है क्योंकि मंत्र सीधे मन को मारता है मन मरना चाहता नहीं इसलिए मंत्र में जल्दी लगता नहीं चलो नाम में आओ हमारे पास तो बहुत से
अस्त्र हैं हर व्यवस्था फिट रखता है कि हम शत्रु को परास्त ही कर देंगे ऐसे हमारे पास राधा नाम है राधा वल्लभ श्री हरिवंश नाम है शरणागत मंत्र है निज मंत्र है चतुरा जी शुदा निधि ब ये सब अस्त्र है हम अपने मन की वासनाओं को मारने के लिए इनका प्रयोग मन क रहा हमें कहीं मन नहीं लगता है कीर्तन लगा दिया मोबाइल में चल रहा बैठे सुन रहे सुन कान से सुन एक किसी इंद्री से तो सुन लग अच्छा बिल्कुल नहीं लग रहा दरवाजा बंद किया सो गए कोई पाप कर्म नहीं करेंगे गंदे लोगों से नहीं मिलेंगे बस ठीक हो जाएगा ये और अहंकार बिना गुरु की आज्ञा पे रहे ये अहंकार नष्ट नहीं होता तपस्या करो तो तपस्या का अहंकार हो जाएगा व्रत रहो तो व्रत का अहंकार हो जाएगा दान करो तो दान का अहंकार हो जाएगा जप में बैठो तो कई घंटे मैं जप करता हूं देखो साधु हो के उतना जप नहीं करते मैं करता हूं इतने घंटे व अहंकार आ जाएगा और जब गुरु चरणों का आश्रय लेकर उनकी आज्ञा के अनुसार चला जाता है तो लगता है मैं तो नीच हूं अगर गुरु कृपा हम पर ना होती तो हमसे कुछ
हो ही नहीं सकता था ये जो कुछ हो रहा है गुरु कृपा से हो रहा अहंकार खत्म हो जाएगा अहंकार नष्ट तिनकी संगति रहत जाति कुल मद सबन जो रसिक महापुरुष है गुरुजन उनके आदेश के अनुसार चलने से अहंकार का नाश हो जाता है तो हम भजन में लगे यह हमारा मन शरणागत मंत्र में नहीं लगता तो क्यों नहीं लगता जबरदस्ती लगाएंगे इसको छूट थोड़ी देनी है कि तुम्हारा मन नहीं लगता तो नहीं लगता तो कोई बात नहीं हम बैठे हैं अंदर से जबान हिलाकर उपांशु जप कर रहे हैं क्या करेगा मन कहां जाएगा तो भाग मैं कहीं नहीं जा रहा भाग तू कहां भागेगा हमारे बिना उसकी कोई सत्ता नहीं है तो हमें डरना नहीं है बच्चों की तरह नहीं डर जाना कि अरे मन तो विषय मांग रहा है आप क्या करें मांग मांगने दो उसका बच्चा है वो कह दे कि हम आग से खेलेंगे जहर खाएंगे तो हम दे देंगे क्या ऐसे मन बच्चा है विषयों में घूमता रहा है डांट लगाओ उसको नहीं यह तुम्हारे योग्य बात नहीं नहीं देंगे यह तुम्हें खाना ही पड़ेगा तुम्हें करना ही पड़ेगा जैसे मां बच्चे को दूध पिलाती प
थप्पड़ भी मारती पी दूध उसमें मां का क्या है प्यार है उसको स्वस्थ रखना है ऐसे ही मन है जप नाम जप नाम जप नहीं जपेगा ठीक है आज भोजन बंद तेरा जब तू इतना नाम जप लेगा तभी तेरे को रोटी मिलेंगे आना पड़ेगा लाइन में आना पड़ेगा उसे अब जाएगा कहां हमारे पास गुरु कृपा है आराध्य देव की कृपा है धाम की कृपा है अब हमें परास्त नहीं कर सकता मन यह बात समझनी होगी लिता सखी प्यारे गुरुदेव के चरणों में कोटि नमन गुरुदेव मेरा भजन रुक रहा है कृपया मार्गदर्शन करें जो बुद्धि भजन को समझाए कि रुक रहा है उसी बुद्धि से कहो कि शुरू कर आगे बढ़ा कैसे रुक भजन कोई स्वाभाविक थोड़ी होता है भजन तो करना होता है साधक को स्वाभाविक तो सिद्धों का होता है जिनका स्वाभाविक होता है उनको कुछ कभी प्रश्न नहीं उठ सकता क्योंकि वह तो उसमें परिपक्व हो चुके हैं साधक को करना होता है सिद्ध का होता है तो आप मेरा भजन रुक रहा है साधक हो हो और उस पर जोर लगाओ मन नहीं लग रहा भजन में बिल्कुल अशांति है मंजीरा उठाया राधा राधा राधा राधा रा परम भजन हो रहा
मजीरा नहीं राधा राधा राधा राधा राधा राधा भजन हो रहा है अब उसमें मन की चक्कर में पड़ के तो फिर बकवास ही रह जाएगी बात तो बनेगी नहीं हमें लड़ना पड़ेगा जब किसी योद्धा को परास्त करना होता है तो सब दाव चलाए जाते हैं आखिरी दांव तक हमें लड़ना होता है मन रूपी योद्धा को परास्त करने के लिए हमें हर दाव चलाना है वो एकदम अशांत हो रहा है हम कीर्तन राधा वो कहेगा नहीं बोलना है हम राधा राधा और जोर से बोलेंगे राधा राधा उसको हारना पड़ेगा हमारे पास राधा नाम है अब देखो इसमें लगोगे नहीं तो ऐसा कोई जादू कोई नहीं कर देगा यह सब कहने सुनने की बातें हैं कि उन्होंने ऐसे कहा ऐसे कुछ नहीं होने वाला ऐसे वैसे कुछ नहीं सब नाटक है पक्की बात मान लो बात बनेगी तुम्हारे मन को भजन में लगना पड़ेगा गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं बार मथे ग्रत होय बरु सिकता ते बरु तेल बिनु हरि भजन न भव तरी यह सिद्धांत अपेल चाहे बालू के तुम पेरने से तेल निकाल लो पानी के मथने से चाहे तुम मक्खन निकाल लो निकलेगा क्या नहीं असंभव को तुम संभव कर लो मान
सकते हैं लेकिन लेकिन बिना भजन के इस संसार समुद्र से तुम पार नहीं हो सकते भजन करना पड़ेगा भजन होता सिद्धों का है जिन्होंने पूरे जीवन रगड़ की है अब अभ्यास हो गया है उठते बैठते चलते फिरते स्त हो रहा है अब उनको थोड़ी कि रुक गया अपने लोगों को करना पड़ेगा खूब रात दिन रगड़ करो प्रभु का आश्रय लेकर धीरे-धीरे भक्ति महारानी की कृपा से माया महारानी अपनी लीला समेट लेंगे हम आगे बढ़ जाएंगे प्रभु के मार्ग में नितिन कश्यप जी सदगुरुदेव भगवान के चरणों में कोटि कोटि
प्रणाम गुरुदेव मैं आपके चरणारविंद में अपना आत्म समर्पण करता हूं हे गुरुदेव यदि हम सभी जीव प्रभु के अंश है तो प्रभु ने पहले हमें इस संसार में भेजा और अभी अपनी माया में हमें फसाया फिर उपदेश कर रहे हैं कि निरंतर मेरा स्मरण कर मुझ मुझे ही प्राप्त होगा हे गुरुदेव इस रहस्य को समझाने की कृपा करें आशील बात बच्चा प्रभु ही अपने आप से अपने आप में खेल रहे हैं बात यह है दूसरा कोई नहीं है वही माया है वही जीव है वही बंधन है वही मोक्ष है उपनिषद कहता है भगवान ने ऐसा संकल्प किया एक को हम बहु श्याम बहुत रूपम हो गए 84 लाख योनियों का ये जड़ चैतन्य श वही एक को हम बहु श्यामा जैसे आपने श्रीमद् भागवत में ब्रह्मा जी जब बछड़ों का हरण करते हैं और फिर सखाव का भी हरण कर लेते हैं इस लीला को पढ़ा है भगवान बछड़े बन गए और भगवान सखा बन गए सखा की कुर्ता भी बन गए सखा का पैजामा भी बन गए धोती भी बन गए सखा जो जो छड़ी छका रस्सी सब बने ना भगवान भगवान बने ना ऐसे वो उस समय की बात नहीं यह पूरी बात है जड़ चैतन्य सब कुछ भगवान बने हुए
अब हम यह बात भूल गए कि हमारा स्वरूप क्या है एक चौपाई अगर सुनी हो स्वय जाने ज देव जनाई तो क्या लिखा है जानत तुम्ह जब आप जानोगे तो क्या जानोगे कि आप भी वही है समझ रहे हो ना रहस्य को समझना चाहिए किसी भी खेल के आंतरिक रास को समझ जाओगे तो खेल पर विजय प्राप्त कर लोगे जब कोई यहां जान पाता है तो यही जान पाता है वही मैं हूं जिसकी मैं खोज कर रहा था दूसरा कोई नहीं अभी हम मैं इसको मान रहे शरीर को इंद्रियों को मन को बुद्धि को और इनको मैं मानकर भोगों में उतर गए इसी गलती का दंड मिल रहा है और वो भी दंड भ्रम है सत्य नहीं है क्योंकि स सत्य तुम्हारे स्वरूप में कोई खरोच पैदा कर सके ऐसा आज तक अस्त्र ही नहीं पैदा हुआ नयनम छिंदंति शस्त्राणि नयनम ति पावक नचन क्ले देपन शोष मारुता फिर भी तुम मर रहे हो फिर भी तुम जल रहे हो फिर भी तुम क्लेश हो फिर भी तुम नाना प्रकार के दुख से दुखी हो यह तुम्हारा भ्रम है भगवान और तुम एक ही जाति के हो एक ही धातु के बने हो जैसे भगवान में खरोच नहीं पैदा हो सकती ऐसे तुम्हारे स्वरूप में
नहीं हो सकती जैसे भगवान सुख सिंधु है ना तो तुम क्या हो चेतन अमल सहज सुख राशि हो ना वो चैतन्य घन है तुम भी चैतन्य घन वो अमल है तुम भी तो अमल हो हो क्या गया अ मल को पकड़ लिया यह शरीर शरीर के भोग कामनाएं वासना यह सब मल है इसी से हम अपने स्वरूप को भूल गए नहीं तो सब भगवत स्वरूप ही है जहां ऐसी भावना सिद्ध हुई भगवान ने कि सा मात्मा सु दुर्लभा तम खत्म दूरे सृष्टि आदि वता खत्म उसके सामने सृष्टि नहीं है उसके सामने केवल जैसे कांच के महल में खड़े हो जाओ तो तुम ही तुम दिखाई दोगे ना तुम ही तुम दिखाई दोगे तो अब इस तुम को चाहे इधर रख लो चाहे इधर रख लो इधर रख लो तो भक्ति है सामने अंदर रख लो तो ज्ञान है ज्ञान में हम ब्रह्मास्मि और भक्ति में तू ही तू है ज्ञान में मैं और भक्ति में तू माया में मैं और तू फसे कहां हो ना मैं में हो ना त में हो मैं तु में हो मैं और मोर तोरत माया इसका नाम माया है और मैं ही मैं हूं अहम ब्रह्मा ये ज्ञान की चरम अवस्था और तू ही तू है जिधर देखता हूं तू ही रमा हो यह भक्ति की चरम
अवस्था है खेल है समझो यह दो का खेल नहीं है एक का है समिट जाओ एक में आ जाओ फिर दिखाई देगा हा एक ही है दूसरा नहीं ब्रह्मा जी ने देखा बछड़े और सखा को तो हमने सुला दिया अपनी माया के द्वारा यह कौन है उतने वैसे ही रंग के वैसे ही सखा उतनी अवस्था उतनी छड़ी छी का सब भगवान ने ज्ञान दृष्टि व श्री कृष्ण ही बने हुए वही बछड़े बने वही सब बने हुए बछड़ों के गले में घंटी तो घंटी भी श्री कृष्ण रस्सी भी श्री कृष्ण सब श्री कृष्ण साफ श्री कृष्ण और एक वर्ष तक प्रभ करके
दिखाई एक वर्ष तक यहां का एक वर्ष ब्रह्मलोक का कितना जैसे ऐसे कमल की पंखुड़ी ली और सुई से छेदा इतने समय वहां का ब्रह्म लोक का यहां के एक वर्ष हो गया भगवान ने किसी को फसाया नहीं है भगवान अपने आप में फस गए हैं इसीलिए आप अपने द्वारा अपना उद्धार कर लीजिए कोई कोई समस्या आ समुद्र के ऊपर जो तरंग डोल रही है वो और कुछ नहीं समुद्र ही है तरंग नाम केवल इसलिए पड़ा कि उसमें वायु घुस गया वायु शांत होगी तो शांत समुद्र य तरंग का कोई सत्ता नहीं रहेगी रहेगी कोई तरंग
की वायु खत्म तरंग नाम कुछ है नहीं केवल समुद्र समुद्र है माया का विकार खत्म तो केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है भगवान ही भगवान कोई दूसरा नहीं बस थोड़ा उपासना के उसमें आगे बढ़ो तब समझ में आ जाएगा वह अपने आप से अपने आप में खेल रहे हैं आप उनसे अलग अपने को मान गए इसीलिए दुखी हो रहे हो प्रभु से आप अलग मान अपनी सत्ता स्थापित की इसलिए तुम्हें दंड मिल रहा है इसलिए तुम दुखी हो रहे हो मान रहे हो ना अलग प्रभु से अपने को अगर कोई भी बात करे तो इसी पर होकर बात करेगा कि
मैं अंदर य बैठा हुआ है ज्ञान विज्ञान बगो चाहे जितना यह अंदर बैठा हुआ है मैं मतलब यह मैं यह मैं यह बात बड़ी कठिन है जदपि मशा पर छूटती कठिन इसलिए फिर मानी संख्या से सवाल हर कर लेते हैं ना प्रभु हमारे गुरुदेव है गुरुदेव हमारे प्रभु है और उनकी आज्ञा का पालन किया तो पहुंच गए कहां पहुंच गए जो वो है वही मैं जब पता चला तो कुछ और निकले ले वही अब वो जीवन मुक्त हो गया जीवन मुक्त कब हुआ उनको जान गया उनको किनको अपने को जान गया चाहे इधर जानोगे तो इधर का अनुभव हो जाएगा इधर जानोगे तो इधर का अनुभव हो जाएगा भगवान श्री राम क मम दर्शन फल परम अनूपा जीव पाव निज सह स्वरूपा जब कोई मरा दर्शन पाता है तो उसे स्वरूप बोध हो जाता है ज्ञान हो जाता है क्या कि अब मैं और तू नहीं रहा उधर भी वही एक बार श्री हनुमान जी महाराज राम जी के चरणों को ऐसे ऐसे सहला रहे थे तो वशिष्ठ जी और भी बड़े-बड़े ज्ञानी महात्मा बैठे थे तो हनुमान जी के श्री मुख से सुनने के लिए कहा हनुमान तुम कौन हो और इनसे क्या संबंध है मान जीने शरीर भाव से मैं
दास हूं और यह मेरे स्वामी है जीव भाव से मैं अंश हूं और यह मेरे अंसी हैं और स्वरूप भाव से जो सिंहासन में विराजमान है वही यहां विराजमान समझ पाए तो आप किस भाव में है स्वरूप भाव से जो सिंहासन में सियाराम विराजमान है फाड़ के भी दिखा दिया लो यहां भी विराजमान है खेल एक का ही हो रहा है बसंतर जैसे जानने वाला नथ कुंडल हार और भी श्रृंगार के आभूषण उसमें एक ही बात बोलेगा सोना है वैसे बहुत नाम रूप दे दिए गए नथ है कंकण है यह है यह बोलो कुछ भी है क्या सोना है बोलो कुछ भी है क्या श्री कृष्ण समझ में आ रहा है आ जाएगा तो महात्मा बन जाओगे अंदर से नहीं समझ में आएगा तो इसी में भटकन शुरू रहती है सारे शास्त्र ऋषि को समझा रहे संजय द्विवेदी जी ज्ञानेश्वरी द्विवेदी जी श्री हरिवंश साष्टांग नवत प्रणाम भगवन भगवन ब्राह्मण परिवार में जन्म होने से बचपन में ही जज्य पवित हुआ गायत्री संध्या और आदि करते रहे विगत डेढ़ वर्ष से भोलेनाथ जी का अभिषेक कर रहे थे ईस्ट को लेकर बड़े भ्रम थे फिर तीन चार माह से आपको सुना तब धीरे-धीरे
भ्रम जाते रहे और सरकार के श्री चरणों में प्रीति होने लगी 40 दिन से गायत्री अनुष्ठान कर रहे हैं और राधा नाम जप कर रहे हैं कि आपकी कृपा प्राप्त हो महाराज जी आपने शरणागति के लिए प्रार्थना किया भगवन संस्कृत में एमए पीएचडी और शास्त्रीय संगीत सीखा है संगीत में से आजीविका निर्वाह हो रही है 90 पर संत भक्तों के भक्ति पद भजन आदि गाते हैं परंतु कभी-कभी भजन के अतिरिक्त भी कुछ गीत गाने पड़ते हैं परंतु फिल्मी गान कभी नहीं गाते जी गा सकते हैं कह रहे कभी दूसरे गा पढ़ते हैं देखो जैसे इसको हम इस रूप में लेते हैं जैसे आप श्री जी के शरणागत हो और आपको श्री जी के परिवार का पालन पोषण करने के लिए फावड़ा चलाना पड़े व्यापार करना पड़े नौकरी करना पड़े तो आप उसे करोगे ना ऐसे ही अगर आप किसी समाज में जाते हैं और अर्थ प्राप्ति के लिए आपको ऐसे गाने पड़ते हैं तो कोई उसमें बात नहीं है उस अर्थ के द्वारा श्री जी की सेवा और जो श्री जी का परिवार उसका भरण पोषण हो रहा है तो उसको हम उपासना में नहीं लेते वो तो हमारे सेवा के लिए
अर्थ चाहने की जीविका है जब उपासना की बात आएगी तो फिर रसना कटो जन रटो निरन फटो नन श्रवण फटो जो अनसन श्री राधा जस यह हमारे पर्सनल हृदय की बात व्यवहार में उतरना पड़ेगा तो जो काम होगा वो हमें करना पड़ेगा मालो किसान आदमी है पूरा बोएगा फसल काटेगा और उससे जो पैदा हुआ श्री जी का परिवार अतिथि संत सेवा इससे होगी ऐसे ही अर्थ की प्राप्ति के लिए यदि आपने संगीत सीखा है और उसको गाते हैं अर्थ मिलता है तो यह आपके जीव का उपार्जन के लिए है य आपकी उपासना थोड़ी है उसमें आप जो भी गाना पड़े जैसे भी गाना पड़े पर अपनी आंतरिक स्थिति को श्री किशोरी किशोर जी के चरणों में रखना है कोई परेशानी नहीं
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- किसी को कोई बात समझाने पर वो न समझे तो क्रोध आ जाता है — शशांक वर्मा जी मुजफ्फरनगर से राधे-राधे श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी ऐसा कई बार होता है कि किसी को अपनी बात समझाते हुए…
- स्वर्ग में वो कौन-सा सुख है, जो धरती पर भी नहीं है? — पारस कोहली जी नई दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सुख और दुख एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। मेरा प्रश्न यह है कि वह कौन सा सुख स्वर्ग में है…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1401 — विक्रम पांडे जी मिर्जापुर से श्री हरिवंश महाराज जी राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी आपका सत्संग सुनता हूं और कृपा का अनुभव है महाराज जी…
- संत भगवान के प्रश्न पर महाराज जी ने साधना जीवन के लिए क्या उपदेश दिया? — महाराज जी कुछ हम लोगों को आप बता दें कि जैसे साधना जीवन में क्या कैसे कुछ भी आप अपने मुखारविंद से कुछ सब बातों की केवल एक ही बात है ना विषय चिंतन होने पावे ना विषय क्रिया बस…
- परिवार में नकारात्मकता व कलह हो तो क्या करें? — एसवी चतुर्वेदी जी दिल्ली से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी परिवार में नकारात्मकता हो घर में कलह हो रही हो गृह युद्ध जैसी परिस्थिति बन रही हो तो अध्यात्म के रास्ते पर…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1400 — संजीव मुखर्जी शेयर इवें राधे-राधे महाराज आईआईटी धनबाद से महाराज जी कृपया मुझे बताइए कि मैं कैसे कम बोलूं अधिक सुनूं बोलते समय नरम रहूं दूसरों को अपनी बात रखने का मौका दूं फिर…