किसी को कोई बात समझाने पर वो न समझे तो क्रोध आ जाता है
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
शशांक वर्मा जी मुजफ्फरनगर से राधे-राधे श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी ऐसा कई बार होता है कि किसी को अपनी बात समझाते हुए अगर उन्हें वह बात समझ ना आए या वह लोग अपनी ही बात पर अड़े रहे तो क्रोध आ जाता है और क्रोध करके खुद को फिर बाद में बुरा लगता है। काम संजयते क्रोधा कामना की पूर्ति ना होने पर क्रोध हो जाता है। तो हमें लगता है कि कहीं ना कहीं हम अपनी स्वार्थ बुद्धि की प्रधानता रखते हैं तब क्रोध आता है।
अगर परमार्थ बुद्धि की प्रधानता रखकर आपको उपदेश करते हैं आप नहीं मानते हैं तो उत्तर अंदर से ही निकलेगा। जैसी भगवान की इच्छा। हमने तो प्रयास किया कि आपका अहित ना हो। आपका मंगल हो लेकिन आप नहीं मान रहे हैं। तो जैसी भगवान की इच्छा। आपको मानना ही चाहिए। यह हमारी तब क्रोधात्मक वृत्ति आएगी जब हम किसी स्वार्थ से जुड़े हुए हैं। अंदर हमारे स्वार्थ में बाधा पड़ रही तो लग रहा है यह बात नहीं मानेगा तो उसकी पूर्ति नहीं होगी स्वार्थ की। वो कोई भी हो परिवार का हो चाहे बाहर का हो जहां हमारी कामना की पूर्ति में बाधा पड़ेगी वहां क्रोध आ जाएगा।
तो हमें चाहिए कि अगर हम दूसरे के सुख के लिए कामना करें तो क्रोध नहीं आएगा। जहां अपने सुख की कामना में बाधा पड़ेगी वहां क्रोध आ जाएगा। लेकिन हम जैसे आपको उपदेश कर रहे हैं आपके मंगल के लिए कर रहे हैं और आप फिर नहीं मान रहे तो हम हंसकर कह देंगे जैसी भगवान की इच्छा क्योंकि हमने तो प्रयास किया आपको बचा दें लेकिन आप नहीं बचना चाहते तो भगवान का विधान जैसा क्रोध नहीं आएगा क्रोध तब आएगा जब हम किसी स्वार्थ से लिप्त होकर आपको उपदेश कर रहे हैं आप उसमें बाधा पड़ रहे फिर वो एक क्रोध आ जाएगा क्योंकि वो अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए कर रहा चाहे वो परिवार से हो चाहे बाहर हो तो हमें चाहिए कि स्वार्थ स्वार्थ को परमार्थ में बदलें।
अगर हम स्वार्थ बुद्धि का त्याग कर दे तो बहुत मंगलमय हो जाए। और क्रोध से हानि अपनी ही होती है। अपना हृदय जलता है। और अगर कोई क्रोध से क्रिया हो गई तब तो बड़ी अपराधिक क्रिया भी हो सकती है। मान लो माता-पिता के ऊपर हाथ छूट सकता है। पूज्य जनों को हम अशुद्ध शब्द बोल सकते हैं या हम हिंसात्मक भाव में उतर सकते हैं। तो इसलिए क्रोध को तो पीना चाहिए। अंदर ही अंदर शांत एकदम गुस्सा नहीं है। जी अगर हम किसी अधिकार क्षेत्र में हैं तो अपने जो हां अगर उस अधिकार क्षेत्र में हमें जो अधिकार सरकारी मिला हुआ है तो उसे क्रोध नहीं उसे अपने पदाधिकार का प्रयोग कहते हैं।
कि अब जैसे दुष्ट स्वभाव वाला एक है सज्जन को सता रहा है। हमें अधिकार मिला है कि सज्जन को बचाना और दुष्ट को दंड देना। तो हम उस अधिकार का प्रयोग करके उसको दंडित करते हैं और उसको बचा लेते हैं। उसे क्रोध नहीं कहते हैं। वो क्रोध की लीला भले वहां दिखाई जाए वो अपने अधिकार का प्रयोग करके समाज सुधार व्यवस्था है। वो डंडा चलाना पड़े तो वो भी व्यवस्था है। अगर गोली भी चलाना पड़े तो वो भी व्यवस्था है। उसमें क्रोध नहीं है। वो हमारे सरकारी व्यवस्था है। कि आप अगर कानून के खिलाफ ऐसे चलते हो तो ये तुम्हें डंडा पड़ेंगे।
इससे अगर इतना हो जाते हो तो फिर फांसी की भी सजा है। हमारे यहां तो सब विधान है। तो वो पद के अनुसार जो चलना है वह बात अलग है। लेकिन हम घर गृहस्ती के व्यवहार में कह रहे हैं कि घर गृहस्ती के व्यवहार में हमें क्रोध से बचना चाहिए। और जो पदाधिकार का प्रयोग है तो उसमें को क्रोध नहीं। उसमें तो तुम्हें शांत भी रह के वही करना पड़ेगा। करना पड़ेगा क्योंकि आपका अधिकार है निर्दोष को मुक्त करना और दोषी को दंड देना एवं जो अधिकार सरकारी अधिकार हैं और अगर उल्टा कर बैठा और धन ले लिया घस ले लिया तो अपने परिवार को भी अशांत करेगा और खुद अशांत हो जाएगा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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