स्वर्ग में वो कौन-सा सुख है, जो धरती पर भी नहीं है?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
पारस कोहली जी नई दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सुख और दुख एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। मेरा प्रश्न यह है कि वह कौन सा सुख स्वर्ग में है जो धरती पर नहीं है और वो कौन सा दुख नर्क में मिलता है जो धरती पर नहीं है स्वर्ग कोई खास चीज थोड़ी है स्वर्ग के देवराज इंद्र है ना मालिक त्रिभुवन पति है गौतम ऋषि महात्मा की पत्नी के साथ गंदा आचरण करने के लिए व्याकुल हो गए और किया तो कोई खास बात स्वर्ग है क्या? अगर उन अप्सराओं का भोक्ता इंद्र मृत्यु लोक की किसी ऋषि की पत्नी के साथ गलत करने का विचार करके गलत कर दिया तो इसका मतलब स्वर्ग में वो सुख नहीं है।
जिस सुख की प्राप्ति के बाद कोई चाह नहीं रह जाती वो भगवान है। स्वर्ग भी एक नकली है। असली है। स्वर्ग का सुख भी नकली है। यहां तक कि आप ब्रह्म स्तंभ पर्यंतम सर्वम मायामयं जगत सत्यम सत्यम पुन सत्यम हरे नाम केवलम जिनके से लेकर ब्रह्म लोक तक सब माया में है भया माने झूठा माने दिखावटी दिखावा कुछ और है और अंदर में अब जैसे पूरा जीवन हो गया हर सुख भोगते हुए अब आपके पास क्या है आपसे पूछा जाए कि आपके पास क्या है तो फिर वही लालसा है वही कामना है भोगने की और कुछ चलाइए तो ये झूठा ही खेल चल रहा है माया तो ना स्वर्ग में कोई सुख है और ना मृत्यु लोक में कोई सुख है।
अगर वास्तविक सुख है जिसे कहते हैं वह परमात्मा में है। जैसे केवट भगवान के चरण धो रहा है। बाद में भगवान ने अंगूठी दी सीता जी की तो क्या कह रहा है? अब कछु नाथ न चाहे मोरे। जब यह निकल जाए हृदय में कि जो मैं चाहता था वो मिल गया। अब कुछ नहीं चाहिए। वो केवल भगवान में ही निकलेगा और कहीं नहीं निकलेगा। लाखों कामनाएं और उत्पन्न हो जाएंगी। कोई कभी तृप्त नहीं होता तो ना स्वर्ग में सुख है ना पृथ्वी में सुख है सुख है तो भगवान में है जो आनंद सिंधु सुख राशि ये पक्की बात समझ लो हम इसीलिए पहला उदाहरण दिया त्रिभुवन पति देवराज का कि सब पूरे स्वर्ग का मालिक होकर एक मृत्यु लोक के गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ गलत आचरण किया कितना निंदनीय विषय तभी सांप भी मिला था हजार भगधारी हो जा [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसीलिए कहीं सुख नहीं सुख है तो भगवान भगवान के नाम में है, भगवान के रूप में, भगवान के चरणों में आप सभी ओम प्रकाश गर्ग जी मध्य प्रदेश से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
महाराज जी क्या पूर्ण रूप से मृत्यु का भय खत्म हो जाना, किसी चीज को पाने की इच्छा अर्थात संसार की भौतिक सुविधाओं की चाह मिट जाना और श्री जी से मिलने की व्याकुलता का तीव्र गति से बढ़ना यही शरणागति का उच्चतम स्तर है क्या? महाराज जी संशय निवृत्ति कीजिए। जीव के बंधन की श्रंखला है देहा अभिमान जो अपने स्वरूप का विस्मरण होकर हम देह भाव में स्थित हो गए हैं। स्त्री या पुरुष ये अभिमान जो जागृत हो चुका है। मैं ये हूं। यही जीव की पुनरप जननम पुनरप मरणम पुन जननी जठरे शयनम इससे बहुत बड़ा दोष हो गया।
जीव चैतन्य घन सुख स्वरूप आनंद समुद्र है। स्वयं परमात्म स्वरूप है। पर वो सुख की खोज करने के लिए शरीरों की तरफ बढ़ गया। इंद्रियों की विलासिता की तरफ बढ़ गया। अपने स्वरूप को भूल गया। भोगेश्वर प्रसक्त नाम तत चेत व्यवसायात्मिका बुद्धि समाध विधते जो भोग और ऐश्वर्य में सुख कर लिया जिसका चित्त अपरहित हो गया चाहे शरीर का भोग हो चाहे वस्तु का भोग हो और धन वैभव मान प्रतिष्ठा अच्छा लगने लगा मारा गया वो मारा गया माया के प्रवाह में वो बह गया और ये प्रवाह ऐसा कि बिना गुरु कृपा के रुकता नहीं है।
गुरु कृपा ही केवलम जिसने गुरुदेव की शरण ले ली और गुरुदेव के द्वारा अज्ञानस ज्ञानजन सलाकया चक्षुर मिलितम तस्मै श्री गुरुवे नमः जो अज्ञान का नाश करके ज्ञान का प्रकाश कर देते हैं तब हमारा माया का प्रवाह रुकता है। तो हमारी चित्त वृत्ति भोगों में आसक्त हो गई है। हमारा ज्ञान मलिन होकर के इस बात का हो गया कि मैं स्त्री हूं, मैं पुरुष हूं। यही हमारी दुर्गति का कारण है। मुख्य मूल कारण जो है ना संस्कृति मूल सू प्रद नाना सकल शोकदा दायक अभिमाना संस्कृति का मूल और समस्त दुखों को देने वाला ये देहाभिमान है जो हम अपने चैतन्य घन स्वरूप को भूलकर पांच भौतिक देह में अपनापन इतना कर लिए कि मैं पुरुष हूं मैं स्त्री हूं।
यही हमारी दुर्गति का कारण है। और जब हम गुरुदेव की शरण में होते हैं और जब उनके द्वारा नाम उपासना हमें प्राप्त होती है तो इसी जड़ता का नाश होता है। जो आपने बोला ना यही उसके अंदर लक्षण प्रकट होने लगते हैं कि नहीं खानपान ते भावे हैं। नहीं कोमल वसंत सुहावे हैं। सब विषय लगे ते खारा है। हर आशिक का मग न्यारा है। ना काू सो बोलबो ना कोई व्यवहार अपनी कुंवर किशोरी को जयत निहार निहार शरणागत का लक्षण किसी भोगों में सुख ना मिलना भगवान के नाम रूप लीला गुण धाम में चित्त का रमण करना किसी भी तरह किसी भी द्वंद से पराजित ना होना सुख दुख मान अपमान लाभ हानि तो ये शरणागति उसकी पक्की वो भगवत प्राप्त हो जाएगा और जो नाम जप नहीं करता भगवान की लीला कथा में अनुराग नहीं रखता श्रवण कथन में वो चाहे जो साधना कर ले दे अभिमान पुष्ट होता ही रहेगा तो क्या हो रहा है इसमें अहंकार पुष्ट हो रहा है और हमारा आवागमन चक्र रुकेगा अहंकार रहित होने पर तो चाहे सत क्रिया का अहंकार हो चाहे असत क्रिया का अहंकार हो अहंकार तो बना ही हुआ है तो अहंकार का नष्ट हो जाना ही शरणागति का लक्षण है।
अहंकार गुरुदेव की कृपा से नष्ट होता है। जो गुरुदेव ने उपासना दी उससे अहंकार गलित हो जाता है। फिर दिखाई देता है गुरु कृपा से साधना चल रही। गुरु कृपा से भजन हो रहा है। गुरु कृपा से हमारी अध्यात्म उन्नति हो रही। वो कहीं अहंकार का उसमें उन्मेश नहीं होता कि मैंने ये किया। नहीं गुरु कृपा से ऐसा हुआ। तो गुरु कृपा का जिसको आश्रय मिल गया है प्रिया प्रीतम की शरणागति हो गई है उसमें लक्षण होते हैं। क्या बोला था लक्षण महारा जी ये कह रहे हैं कि ये महाराज जी व्याकुलता श्री जी से मिलने की तीव्र इच्छा संसार की भौतिक सुविधाओं की चाव मिट जाना पूर्ण रूप से मृत्यु का भय खत्म हो जाता है।
हां बिल्कुल बहुत सुंदर बहुत शोध करके वाक्य लिखे आप मैं पृथ्वी का सबसे पापी आदमी हूं। मेरा क्या होगा बाबा नहीं इसमें अब अपने पूर्व को नहीं सोचते अपने अग्रिम को सोचते हैं। हम प्रिया प्रीतम नहीं इसमें यह सोचना है अब हम प्रिया प्रीतम की शरण में हैं। अब लो नशानी अब नाश हो अब तक जो हुआ वो भगवान की माया के प्रभाव से हमसे गलतियां हो गई। अब हम भगवान की शरण में है। अब हम खूब नाम जप करें। नाम जप करते हो? खूब नाम जप करो। हां खूब नाम जप करो। नाम जप से ही परमानंद की अनुभूति
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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