संत भगवान के प्रश्न पर महाराज जी ने साधना जीवन के लिए क्या उपदेश दिया?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
महाराज जी कुछ हम लोगों को आप बता दें कि जैसे साधना जीवन में क्या कैसे कुछ भी आप अपने मुखारविंद से कुछ सब बातों की केवल एक ही बात है ना विषय चिंतन होने पावे ना विषय क्रिया बस इसलिए आराध्य देव का निरंतर चिंतन चाहिए अभ्यास योग युक्तन चेतसा ना निगामिना हमारा चित्त अपने आराध्य देव से कभी एक क्षण के लिए भी ना हटे का हनुमंत विपत्ति प्रोई जो तो सुमिरन भजन न होई वो वही विपत्ति कि अगर विषय चिंतन हो गया और विषय क्रिया हो गई तो हमारे पतन होने में देर नहीं लगेगा बालू का बांध टूट जाए तो फिर बंधना बड़ा मुश्किल होता है इसलिए धतु विषयान पुशास संगासु पजायते संगात संजायते काम क्रोधो विजायते क्रोधा भवती समोहा समोहात स्मृति विभ्रमा स्मृति भ्रसा बुद्धि ना बुद्धि नाशात प्रसति मूल आया विषय चिंतन अगर विषय चिंतन हुआ तो सर्वनाश हो जाता है बुद्धि का नाश होना ही सर्वनाश बनाया तो हमारा चिंतन ना छूटने पावे जो गुरु जी ने नाम मंत्र दिया उपासना रात दिन उसका अखंड चिंतन बस शरीराध्यास नष्ट होना चाहे वह वैष्णव हो चाहे जिस
मार्ग का पथिक हो प्रथम अनिवार्य है। अगर देहा अभिमान पुष्ट बना रहा तो ना दासत्व पुष्ट हो पाएगा ना सख्य ना वात्सल्य ना कांता ना सहचरी और अध्यात्म में देह भाव को मिटाने के ही प्रथम प्रणाली है जिसे गुरुजनों के चरणों के आश्रय लेते हैं तो तन वांग मनो भी रमल सोहम तवा वासिता शरीर से मन से वाणी से बिके हुए दास की तरह गुरु आज्ञा में रहने से अहंकार गलित हो जाता है। देहा अभिमान गलित हुआ तो स्वरूप जागृत हो जाता है। वो चाहे दास स्वरूप चाहे सख्य स्वरूप वात्सल्य स्वरूप या ज्ञान मार्ग में है तो आत्म स्वरूप तो अखंड चिंतन ही हमारा परम लक्ष्य है।
अपने प्रभु का अव्यावृत भजनात तन्मया देवर्ष नारद जी तन्मय होकर अखंड भजन उठते बैठते चलते फिरते हर समय विषय चिंतन ना होने पावे ये सावधानी और आराध्य देव का सतत चिंतन यही जीवन का परम सार सब शास्त्रों का परम सार विषय चिंतन विषय क्रिया रहित भगवत चिंतन भगवत क्रिया सहित भगवत सेवा और भगवत चिंतन विषय चिंतन विषय क्रिया रहित भगवत चिंतन भगवत क्रिया क्रिया सहित तो जीते जी जीवन मुक्त और परमहंस है वो परम पद में आरूढ़ है उसे और कोई परम पद नहीं चाहिए जो मंगल यतन भगवान के चिंतन में परम सुखी रहता है उसके जैसा सत सा मम भक्तो भ
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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