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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #60 · 3 जनवरी 2023

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

रस निधि sahayachari भगवान आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम भगवान आपने अपने सत्संग में बताया है की यदि प्रतिकूल परिस्थिति आवे तो उसे सहन करना चाहिए यदि कुसंग आवे तो उसका त्याग करना चाहिए कल के सत्संग में आपने बताया की यदि अंदर से विषय व्यक्ति स्थान वस्तु का चिंतन हो तो आप भ्रष्ट हैं यदि घर में ही कुसंग हो तो इस परिस्थिति में क्या करना चाहिए मेरा भजन और बड़े ऐसा क्या करना चाहिए घर तो और दूरी की चीज है हृदय का कुसंग अगर हम संभल ले तो सब जगह का संभल जाएगा हमारा मैन बुद्धि गंदी प्रेरणा करता रहता है अगर उसके अनुसार ना चल करके मैन बुद्धि को प्रभु का चिंतन कराए तो फिर हमें कोई परास्त नहीं कर सकता हम बाहर से सब ठीक करने की चेष्टा करें कभी ठीक नहीं होगा अंदर से ठीक करें अंदर सुधार भगवान का रहे की मैं ह्यूमन आदतों मैं बुद्धि निवेश है अपना मैन मेरे में लगा दो बुद्धि लगा दो हम क्या करते हैं की बाहर से सुधार की चेष्टा करते हैं पर मंजू गंदा चिंतन करता गंदी प्रेरणा करता राग द्वेष का चिंतन हम उसे पर

ध्यान नहीं देते हम वर्तमान के समय को व्यर्थ में नष्ट करते हैं भूत और भविष्य में इसलिए उपासक सावधान रहे वर्तमान के समय में भागवत चिंतन करते हुए मैन के द्वारा की हुई सुबह-सुब प्रेरणा दोनों से बचें क्योंकि शुभ विवाह भी बांधने वाला है हम नाम मंत्र वाणी भागवत चिंतन सेवा चिंतन इसमें बाहर का कोई कुसंग कहां तक हटाया जा सकता है कोई बिरला ऐसा घर होगा या बिरला ऐसा वातावरण होगा जहां पूर्ण रूप से सात्विक भगवती को वातावरण उन्हें तो दो भगवती स्वभाव वाले हैं सब बना रहता है वह बना ही रहेगा है अगर उसमें ही भाव रखेंगे तो फिर हमारा भजन नहीं बन पाएगा लड़ाई झगड़ा होता रहेगा और सब ठीक नहीं किसका प्रश्न है हान अंदर से नाम जब करो अंदर की वृत्तियों को सुधारो बाहर जिसके प्रात जैसा व्यवहार है वैसा निरपेक्ष होकर करते हो ममता रहित होकर जिसके साथ जैसा व्यवहार है धर्म के अनुसार वैसा कर दो और अंदर से भजन करो वो सुधार जाए ऐसी हमेशा मार्ट करें हम सुधार जाएं भागवत कृपा से इतनी बात स्वीकार करो रिचा जी अमित गुरुदेव भगवान

आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन सदगुरुदेव भगवान हमारी दीक्षा हुए 7 महीने हुए हैं परंतु दीक्षा से 1 वर्ष पूर्व ही हमने जुगल सरकार की श्री विग्रह सेवा श्रीजी की कृपा से विराजमान की थी उसे समय होती थी हमें भी यह नहीं पता था पर अभी अब दो-तीन दिन पहले एक-एक kamthik में किसी भक्त ने प्रश्न किया तो आपने बताया की यदि आज्ञा लिए बिना अपने अष्ट सेवा प्रारंभ कर दिया तो अपने जुगल सरकार को गुरुदेव भगवान से मिलना चाहिए एक बार दिखाना चाहिए क्या ये हम स्वयं से ले द और विराजमान हमने इनको राधा गोविंद बुलाते हैं हान बहुत ही प्यार से सेवा करो भगवान विश्वनाथ जी की उसे कांतिक सन्यास उपासना से घाटी घसीट कर रासबिहारी के चरणों में आकर्षित किया कृष्ण स्वामी जी के अंदर अलौकिक आकर और देखो एक अलौकिक परमहंस की तरह द परमहंस जी की तरह उनकी अंतिम स्थिति से आप देखो साथ ले द देखो कैसी थी बस वृंदावन प्रिया प्रिया तो देखो एक बात बता बहुत कृपा हमारी ऊपर जो paramhanson की मृत्यु स्वामी जी भले गृहस्थी में द जैसे भाई जी महाराज

गृहस्थी में द ऐसे स्वामी जी हमारी दृष्टि में सदैव संत की और शांत द संत ना किसी से राग एन किसी से देश वृंदावन धाम प्यारी जो प्यारे जो बस इतना और संत का स्वरूप क्या है की स्वामी जी अभिनय को देख रहे हैं स्वामी sakshatriya प्रीतम को देखें शास्त्र दंडवत आरती पूरा मतलब ऐसा स्वर कोकिला वृद्ध है इस भागवत की भागवत संजय बवेजा जी फरीदाबाद से महाराज जी आपके श्री चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी दिव्या कम और भौतिक कम में क्या अंतर होता है उसको कैसे समझ सकते हैं प्रेम होता है उसे कम कहते हैं प्रीतम की सेवा प्रभु की सेवा या प्रभु की ए सकती है प्रभु के साथ जो लीलाएं हैं वो प्रेम कहे जाते हैं जो शरीर संबंध से होती उसे कम कहते हैं जिसमें इंद्रियों शरीर का होता है जो भाव में होता है वह प्रीतम की सेवा में या श्री कृष्ण का मिलन इस शरीर से थोड़ी होता है इस शरीर का विस्मरण करके भजन रहित होता है चिदानंद में दे तुम्हारी विगत विकार जान अधिकारी से संबोधन किया शब्द वह mahaprem प्रेम यह जो पंच भौतिक शरीर से

क्रियाएं होती इन्हें कम के लिए कहा गया है और जो mahaprem रस है तो चिदानंद देव में रक्त मांस मत जा अस्ति ये सब dhaatviy नहीं है तो वहां ये विकार भी नहीं है समझ का रहे हैं पर अब जैसे अपने लोग प्रकृति राज्य के हैं ना तो हमारी भावना में केवल उतनी पावर है की इसके ज्यादा हम सोच ही नहीं सकते हैं इससे ज्यादा उड़ान भारी नहीं सकती बुद्धि तो भजन के बाल से पहले यह प्राकृतिक बुद्धि का परिवर्तन हो हमारी बुद्धि अभी गुना के अंदर सतोगुण रजोगुण तमोगुण तो तीन गुना से रचित माया से ज्यादा वह सोच नहीं सकते उसकी सामर्थ्य उतनी में वो कल्पना उतनी में विचार उतने में सोच सकती इसके आगे जो भगवती रस है जिसे दिव्या कहा जाता है उसे अगर कम भी कहा जाएगा वो प्रेम ही है यहां जो प्रेम कहा जाता है ना वह कम ही है वह प्रेम नहीं है वहां जो कम शब्द कहा जाता है वह प्रेम ही है शुद्ध प्रेम शुद्ध प्रेम भी मिलावट नहीं प्रकृति की प्रकृति की मिलावट में गंदगी है जैसे prakritijan नहीं है प्रभाव में पवित्रता होने के कारण कम की गंध नहीं एक

जवान बेटी कई महीने बाद इस हॉस्टल कहते हैं वहां से स्टेशन आए पिता लेने आया है 45 50 वर्ष का पिता है 20 22 वर्ष की बेटी दौड़कर कैसे गले लगे और अपनी बेटी गले लगाकर माता संघ रहे चूम रहा है दूसरा आदमी जिसके मैन में मलेता है वह क्या देखेगा अगर वह इस संबंध को नहीं जानता है इस भाव का परिचय नहीं जानता है तो दोस्त दर्शन कर सकता है तो पर जवान शरीर है स्त्री शरीर जवान है गले लगा रहा है चूम रहा है मेरा बच्चा जिन अंगों के देखने से भाव बिगड़ जाता है नर्स उन्हें

अंगों की रोज सेवा कर दे ऑपरेशन हुआ उसकी क्या उसको कम ए जाएगा क्या भाव यह मरीज है और मुझे सेवा करना इसका परम धर्म वाकई विकर्ण नहीं आएगा छोटी-छोटी आप प्रकृति राज्य में देखो जहां थोड़ी सी शुद्धता भाव की हुई तो वहां विकार का प्रवेश नहीं होता तो चिदानंद राज्य में भलाई इस विकार का कहीं प्रवेश हो सकता है क्या जैसे कोई स्त्री पुरुष हंस रहे हो मिल रहे हो आप उसे दृश्य को देखे तो कम ए जाएगा आप स्वयं सब उसकी व्यवस्था किए और दोनों बेटे बात कर रहे हैं गले लग रहे तो आपको बेकार ए जाए अब भगवान से कहोगे प्रभु आज जीवन का सुख दे दिया हमारे दोनों बच्चे ऐसे खेले ऐसे सुखी वहां विकार की गुंजाइश है क्या सोचो एक लौकिक भाव में कम क्रीड़ा के समय भी दृष्टि होने पर भी उसके अंदर कम विकार नहीं है हृदय प्रफुल्लित हो रहा है और आशीर्वाद दे रहा है मेरी दोनों बच्चे से सुखी रहे से खेलते रहे साधारण भाव में आप देखो ashadharan जो इस प्रगति राज्य से ही अतीत है उसमें कई कम श्री कृष्ण शब्दकोश में शब्द तो वही है ना जैसे आलिंगन तो

पुत्री कालीन कर रहा है पिता भाई बहन का लिंग कर रहा है तीनों आलिंगन शब्द में है लेकिन बड़ा अंतर है परमात्मा चिंतन के वृति नहीं है तो हमको लगेगा की आलिंगन शब्द मतलब वह इसी राज्य में विचरण करेगा इसलिए कम और दिव्या कम वो mahaprem है और यह मालिन वासना है यह indriyojan मालिन वासना की क्रीड़ा है और वो दिव्या प्रेम पवित्र प्रभु के प्रति जब वो पवित्र प्रेम है आप ऐसे ही समझ लो ऐसे ही मिठाई खाओ मिठाई और वही मिठाई प्रभु को समर्पित कर दो तो ऐसे इतने के लिए ललचाता है मैन कोई भी हो जरा हमको भी दे दीजिए क्यों वही मिठाई है जो पुरी दुकान खरीद के खा सकता है वह आदमी हाथ जोड़कर थोड़ा सा हमको भी दे दीजिए क्यों उत प्रसाद हो गया प्रभु शिव मिठाई जुड़ गई तो इतनी महिमा हो गई की इतना कल मिलने पर हृदय में एक अल्लाह का इतनी मिठाई है और वो मिठाई और प्रसाद मिठाई में बहुत अंतर हो गया भाव बदल गया ना अब आप इसी से अनुमान लगाएंगे की शब्दकोश इधर के ही हैं लेकिन जब वो उधर गए शब्द को शाब्दिक भी हो गए और इधर आए जैसे अंधकार और

देश ऐसे ही कम और दिव्या कम में अंतर है ऋषभ ठाकुर जी हिमाचल श्री राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी अगर भूल से प्याज खा लिया तो क्या होगा जैसे हम गनी तो वस्तुओं को निश्चित वस्तुओं को भूल से भी नहीं खा सकते जानकारी रखेंगे ना जैसे किसी होटल में मैन लो आपको कहीं व्यापार वाले नौकरी वाले आपको जाना है आपको जानकारी करना होगा प्रथम कव्वाल का जिसे अपने लोगों को कभी भिक्षा में किसी ने दे दी है रोटी मांगने गए और व्यक्ति दे दी ऐसे सामने आते ही वह बता देता की हम पड़े हैं इसमें क्योंकि इसमें दुर्गंध होती है ना गंध होती है उसमें रोटी को पानी से धो लिया रोटी पाल माना है तो जो माना है और माना है जैसे हम किसी रोग से ग्रसित हो डॉक्टर कर दे चीज माना है उसमें वकालत नहीं करते उसमें मैन लेते माना है जो भगवान के भजन पूरा भोजन तो भूल से नहीं होगा ना अच्छा वास्ते भी भूल कर रहे हैं जानबूझकर के ऐसी भूल ना की जाए क्यों हान जैसे वैष्णो हो गए sarnagat हो गए भजन मार्ग में चल रहे हैं तो अब

पूरा खा पी के फिराया की पूछ लेंगे की अगर भूल से एक केवल में तो हो सकता है जैसे कभी ऐसा हुआ भी है तो वैसे नाक तक आया है बहुत sukshmiya तो जवान में पहुंचने ही लग गया की कुछ गड़बड़ है तो उसको बाहर कर दिया हटा दिया जो गुरुजनों की आज्ञा होती है उसके अनुसार चला जाता है अगर हमें आदेश हो जाए की यह नहीं करना तो फिर नहीं करना उसका क्या मतलब गुरुजी जाने साथ जाने नहीं करना कहा है मैन लिया डॉक्टरों से हम लोग ज्यादा वकालत नहीं करते ना वो बोले यह दावा खानी सुबह

ये सांप के खाने ये नहीं खाना ये नहीं खाना है ऐसा मत करना इसको सुबह कर दो तो फिर क्या का कर भाग जाओ यहां से ऐसे ही हम जब संत महात्मा शास्त्रों के समझ मार्ग को स्वीकार करते हैं इसी को श्रद्धा विश्वास कहते हैं की जो कहा उसे पे तर्क नहीं बस स्वीकार कर लिया और क्यों क्यों का उत्तर ये है की जो हमारे भजन में बढ़ा pahunchave वो कुछ भी कोई भी हो उसे हमें छोड़ना है तो ये जैसे प्याज है लहसुन है मांस है अंडा है शराब है नशे हैं ये सब तमोगुण प्रकट करते हैं तमोगुण निद्रा अलसी प्रमाण भजन में रुचि इसलिए इनको माना किया गया है नहीं खाना यह आसुरी तो आप रक्षा तो है नहीं आप मनुष्य और भागवत मार्ग मजाक मुर्गे की तंग और शराब तो कहीं बन पाएगा क्या मतलब लोग हसेंगे आप वेयर नौटंकी साहब ले गए क्या यार तुम नाटक कर तिलक लगा करती लगा ये सब क्या है मतलब जो वेस्ट रखे उसके अनुसार चलना चाहिए ना तो याद तो फिर अश्रु प्रवृत्ति तो आशु फिर उसका हिसाब अलग होता है तो अपने लोग तो तीनों गुना से ऊपर उठने के लिए मार्ग में आए एन

सतोगुण रजोगुण तमोगुण आती है भगवान का नाम उनका रूप उनकी लीला उनका भजन ये तो बंदनी है trigunati द निरंतर भजन करने के लिए शुद्ध बुद्धि चाहिए इन सब से बुद्धि अशुद्ध हो जाती है इसलिए संतुलित से त्याग किले का है तनिष्क कुरुक्षेत्र से जय जय राधा वल्लभ श्री हरिवंश मेरे प्राण धन मेरे प्रिया प्रीतम मेरी एक जिज्ञासा है की हमारे ठाकुर जी श्री कृष्ण जी की कितनी आयु है उनकी महिमा प्रकट में भगवान कुछ समय के लिए विस्तार करते अपने रूप को फिर अंतर ध्यान कर लेते हैं antarjan का मतलब हमारी माइक दृष्टि से नहीं इसी समय यही है और हमारी दृष्टि से नहीं देखी जा सकते जब परिवर्तन होगी और भगवती दृष्टि होगी तो जैसे हम आपको देख रहे हैं ऐसे भगवान को देख रहे हैं तो वह है उत्तर जो शत है वो तीनों कल में भूत में था वो भविष्य में रहेगा वो वर्तमान में है त्रिकाल सत्य माइक लक्षणों से जीना नहीं जा सकता 10 वर्ष 20 वर्ष 50 वर्ष इतना रूप इतना बाल इतना उनकी सीमा ने इसलिए उसे आनंद है अनंत प्रभु की जब हम भक्ति करते हैं तो ऐसे

महामहिम प्रभु हमारे दृष्टि में इतने समर्थ देते हैं की हम उसे अनंत को देख पाते हैं ऐसी बुद्धि दे देते हैं क्यों उसे अनंत को समझ जाते हैं ऐसा हृदय देते हैं की उसे अनंत से हमारा प्यार हो जाता है फिर वह अनंत नहीं रहता फिर मेरा प्यारा रहता है फिर हमारे हद हो अनंत परमात्मा हमारे हृदय रूपी गुफा को छोड़कर कभी बाहर नहीं जाता वो बस जाता है

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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