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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #80 · 23 जनवरी 2023

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

पुष्पेंद्र जी मध्य प्रदेश से पूज्य सदगुरुदेव भगवान आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। गुरुदेव इस शरीर के संबंधी अभक्ष पदार्थ का सेवन करते हैं। लेकिन हम उनसे अलग रहते हैं। मेरी रसोई भी अलग है। लेकिन कभी-कभी उनके बर्तन मेरे घर आ जाते हैं और बच्चे मेरे बर्तन उनके घर ले जाते हैं। महाराज जी क्या ऐसे में श्री जी को हम भोग लगा सकते हैं? मतलब बच्चे उधर ले जाते हैं। कुछ देने आ जाते हैं। ऐसा बता रहे हैं। कैसे बोल सकते हैं इस विषय पर? क्योंकि अब जिन पात्रों में मांस रंधा गया है खाया पिया गया अगर रसोई में घुस गए तो सब पात्र फेंकने लायक है हमारी दृष्टि में हमारी वैष्णव कैसे भोग उसमें पा सकता है जब वैष्णव नहीं पा सकता तो वैष्णव के आराध्य देव कैसे पा सकते हैं ऐसा कैसे हो सकता है यदि हम भगवत मार्ग के पति है तो ऐसा खिलवाड़ हो सकता है खिलवाड़ उपासना नहीं हुई उपासना करने वाला खिलवाड़ नहीं करता ये बात समझना होगा इसमें हम कोई भी किसी भी तरह का मतलब छूट नहीं हो सकती।

इसीलिए दीक्षा बहुत होश में लेना चाहिए। समझ के लेना चाहिए। जब दीक्षा ले ली तो फिर उसका हमें पालन करना चाहिए। नहीं तो राधा राधा नाम जप करो। भगवान के आश्रित रहो। वो एक अलग। लेकिन दीक्षा लेकर वैष्णव संस्कार से युक्त होकर तो फिर यह सब नहीं चलेगा। हमारी रसोई में अगर जिस पात्रों में मांस बनाया गया हो या मांस पाया गया वह पात्र आ जाए तो पूरी रसोई फेंक देंगे। नहीं उसमें हम बना नहीं पाएंगे। जो सिद्धांत है नहीं हमें व्यवहार का पोषण नहीं करना। सिद्धांत है। नहीं तो चुपचाप अपने स्थिति के अनुसार भजन करो।

वैष्णव संस्कार मत लो। तिलक कंठी वैष्णव संस्कार गुरु दीक्षा और फिर भ्रष्ट आचरण करोगे भोगना पड़ेगा तुम्हें। इसलिए नए मत लो राधा राधा कहो सबका कल्याण नाम से होता है नाम जप करो जैसी स्थिति में अगर आपने संस्कार ले लिए हैं फिर होश में रहो अब कोई तुम ऐसे नहीं कि जैसा मना है वैसा कर लिया आचरण ऐसा कैसे हो सकता है श्री जी के भोग की बात करते हो हमें पता चल जाए कि तुम्हारे यहां एक ऐसा पाने पाया गया है पात्रों में तो उस रसोई को स्पर्श नहीं कर सकते कि ऐसा अभक्ष पदार्थ पाने वाला उन थाल में पाया और वही थाल तुम्हारी रसोई में रखी कैसे यह भगवत मार्ग ऐसा नहीं हो सकता।

राक्षसी भोजन जहां परोसा जाए, जहां पाया जाए, जहां बना ऐसा कैसे हो सकता है? तो इसीलिए फिर ऐसे लोगों को दीक्षा नहीं लेनी चाहिए। नाम जप करो। भगवान जब तुम्हें सामर्थ्य दे ऐसे कि अब हम अपना जीवन वैष्णव संस्कार से काट लेंगे तो चलना चाहिए। नहीं और भी उपाय हैं भगवत प्राप्ति के। नाम जप करो। सत्संग सुनो, नाम जप करो। धीरे-धीरे अब देख लो। जब स्थिति आ जाए तो आप निकलो। अब ऐसा नहीं कि मनमानी आचरण नहीं हो सकते। इस पर हम नहीं छूट कि देख लो ऐसा क्वेश्चन ऐसा धर्म का पालन करना ऐसा कोई खिलवाड़ समझते हो।

इतना तो ध्यान रखना ही पड़ेगा। ये नहीं चलेगा इसमें। जैसे कलयुग का प्रवाह नहीं चल रहा। कोई छोटा बड़ा नहीं। कोई जैसे हां माता-पिता को गाली दे रहे हैं। प्रणाम नहीं कर रहे। उनका आदप नहीं मान रहे क्योंकि इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं। वो पढ़े लिख के आए हैं। बूढ़े माता-पिता पढ़े लिखे नहीं। उनको गालियां दे रहे। यह सब भ्रष्टाचार है। बुद्धि का ये विपरीत मार्ग है। ऐसा नहीं है। अरे वो सब चलता है। घर में शराब पी के तुम लुढ़के हुए हो। वहां भोग लगेगा श्री जी का। तो फिर क्या करो?

नाम जप करो। ऐसे ही करो। वैष्णव संस्कार मत लो। कोई तुम्हारे घर गया है वैष्णव बनाने के लिए। मत लो संस्कार। जिसका निर्वाह नहीं कर सकते। उस मार्ग में क्यों कदम रखो? आग में क्यों चलो? और भी मार्ग हैं। राधा-धा जपो। अपने ठीक से चलो। अच्छे आदमी बनो। मनुष्य अच्छे बनो। धीरे-धीरे आगे ऊपर उठते चले जाओ। अब तिलक कंठी और सब गंदा आचरण तो फिर नरक ही जाओगे दूसरा रास्ता है क्या भाई लाइसेंस और बिल्ला सब खेल इनहीं का तो है अब बिल्ला तो लगा लिया वैष्णव का और आचरण एक भी वैष्णव के नहीं तो फिर अपराध बनता है ना ये ठीक नहीं है बहुत होश में चलना चाहिए दीक्षा नहीं लेनी चाहिए पक्की बात समझो ऐसे भी तो जीवन काटो राधा राधा बोलो ठीक से चलो संतों की बात सुनी चलो और जब आपको लगे कि हां अब अब हम संभल के तैयार [गला साफ़ करने की आवाज़] हो गए चलने के लिए।

किसी की आन, किसी की मर्यादा नहीं। हम अपने धर्म से चलेंगे। आ जाओ अखाड़े पे। लो वैष्णव मंत्र चलो। अब ऐसे मनमानी आचरण ठीक नहीं है। ये जैसे कंठी तिलक भी बांधो, मुर्गा मछली भी खाओ, शराब भी पियो। ये सब हमें लगता है कि फिर काल ले मत बने। आ काले ले राम राम राम राम जप रहा है। हलवाल जी को सोच रहा है कैसे फसा लूं। जैसे संजीवनी बूटी ना लगाए। लक्ष्मण जी पधार जाए। ऐसे नहीं ठीक से चलो ले बाद में पूछ में लपेट करके मार के फेंक दिया उसको तो फिर कोई ना कोई आपको परास्त कर देगा माया परास्त कर दे अजय सेन जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी जब से आपके सत्संग सुन रहा हूं मेरी मेरे गुरु के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई है।

महाराज जी अगर गुरु चरणों में प्रीति दृढ़ हो तब तब भी क्या इष्ट भक्ति आवश्यक है? क्या केवल गुरु भक्ति भी प्राप्त हो सकती है? गुरु ही किसका है? गुरु ही इष्ट है। इष्ट ही गुरु है। जब यह भाव मान लोगे तो सच्ची गुरु निष्ठा मानी जाएगी। फिर प्रश्न ही नहीं बचता। गुरु ही इष्ट है। इष्ट ही गुरु है। कहने को दो है एक तो फिर प्रश्न ही नहीं बचता। गुरु ने जो मंत्र दिया है, गुरु ने जो उपासना दी है, अगर उसमें रत नहीं हो तो गुरु निष्ठा ही नहीं। वो गुरु सेवा ही नहीं मानी जाएगी।

तो प्रश्न ही नहीं बनता कि फिर अलग से इष्ट आराधना करनी पड़ेगी क्या? क्योंकि गुरु का आराधन यही है कि जो उन्होंने नाम दिया, मंत्र दिया, आदेश किया उसके अनुसार चलना और वो गुरु हो नहीं सकता जो हमें इष्ट से विमुख कर दे तो फिर इस प्रश्न का हमें अस्तित्व समझ में नहीं आया। जी ये कि गुरु की पूजा ही हो जाए या फिर इष्ट भी होना आवश्यक। नहीं गुरु की पूजा आप क्या समझते हैं? उन्हीं का ध्यान उन्हीं का दिया मंत्र उसी को उनहीं के वचन में यही यही तो इष्ट है फिर क्या है प्रश्न ही नहीं बनता इष्ट किसे कहते हैं भगवान या किसी तो गुरु कौन है वही गुरु ही भगवान तो फिर आपको संशय है ना इसीलिए प्रश्न कर रहे हो तभी तो हम कहते हैं प्रश्न बनता ही नहीं ना ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष गुरु को इष्ट रूप में जो देख रहा है तो उसका ये प्रश्न कैसे बन सकता है दूसरा आप पर प्रश्न करे तो आप मुस्कुरा सकते हो कि आप जानते ही नहीं हो इष्ट इष्ट और गुरु दो थोड़ी तो एक ही गुरु गोविंद ने भेद कराए फिर हमें संशय नहीं होना चाहिए।

अब जैसे हम है हमारे गुरुदेव हैं हमारे आचार्य हैं तो हमें अपने गुरु की प्रसन्नता देखनी है। हमें प्रसन्नता होती है गुरु का पूजन करने में और गुरु को प्रसन्नता होती है श्यामा श्याम का पूजन करने में। तो हम पहले श्यामा श्याम का पूजन करेंगे। क्योंकि हमें गुरु को प्रसन्न करना है ना। गुरु को प्रणाम करने से हमें प्रसन्नता होती है कि हम गुरु को प्रणाम कर रहे। गुरु जी को नहीं तुम श्री जी को प्रणाम करो। हम श्री जी को प्रणाम करेंगे क्योंकि उससे गुरु को प्रसन्नता होगी।

जब हमारा भाव गुरु के प्रति समर्पित हो जाएगा तो हम इष्ट के दीवाने बन जाएंगे। क्योंकि इष्ट ही आया है गुरु रूप रख के अपने स्वरूप में स्थित करने के लिए। ये इष्ट थोड़ी है। ये इष्ट थोड़ी हो सकता है। क्योंकि ये तो मरेगा। ये तो मिटेगा। ये पहले नहीं था। वो बाद में भी नहीं रहेगा। बीच में प्रकाशित हुआ है। हमको अपने स्वरूप का ज्ञान कराने के लिए। हमारे जैसा रूप रख के हमारी जैसी बात हमको बोलेंगे तो हमारी समझ में आ जाएगी। नहीं गुरु वाणी तो हो तो रही है। सुनो सुन पाओगे।

उसके लिए दिव्य कान होने चाहिए। गुरु वाणी तो हर समय आकाश में गूंजती रहती है। हर समय भगवत वाणी गूंजती रहती है। ऐसे हम नहीं समझ पाएंगे। अब गुरु ने हमारे जैसा रूप रखा। हमसे बात किया। हमें डांट रहे हैं, दुलार कर रहे हैं, प्यार अब हमारी बात बन गई। तो जब गुरु कृपा होगी तो इष्ट प्रेम जागृत होगा। क्योंकि यह नाशवान है पक्का। यह जो गुरु का ध्यान है इष्ट का ध्यान करना। हमारे श्यामा श्याम जुगल सरकार यही गुरुदेव है। यही गुरुदेव रूप में आए और यही देने आए और यही आसक्त करने आए तो हम राधा राधा राधा हमारे गुरुदेव का नाम है राधा राधा राधा इससे गुरुदेव की प्रसन्नता होगी।

इससे गुरुदेव की सेवा बनेगी। समझ पा रहे हो? ना समझ पा रहे तो जितना समझ गए उसी में आसक्त हो जाओ। आगे का मार्ग आ जाएगा। समझ सबसे बड़ा भजन जो है ना भगवत आश्रय है। प्रभु के आश्रित हो जाना। अंदर से प्रभु को अपना मानना। इसीलिए संसार में इस मार्ग पर आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि वो बहुत कुछ अपना माने हुए होते हैं। अपना जाति, अपना कुल, अपनी विद्या, अपना धन, अपना महत्व, अपना परिवार, अपनी मान बहुत कुछ अपना। इसीलिए जो केवल प्रभु को अपना मानता है। देखो अमरीश जी चक्रवर्ती सम्राट थे।

पर अगर वह अपना भजन मानते अपना कि मेरे पास भजन है तो दुर्वासा जी का विरोध कर देते। ऐसे उनको पता नहीं था कि सुदर्शन चक्र सुरक्षा में लगा हो। उनको नहीं पता। अति दैन्य भाव एक कदम पीछे नहीं हटे। दुर्वासा जी ने क्रोध किया कृत्या पैदा की तो ऐसे ही। यह नहीं कहा कि मैंने अपराध क्या किया था? का है कोई इतना तपस्या का प्रभाव दिखा रहे हैं। अरे हमको तुम ऐसा वैसा समझे हो क्या? हम भी भगवान के दास हैं। प्रभु के सिवा कुछ नहीं। यह भगवान सब अंदर की जानते तो सुदर्शन चक्र लगा हुआ था सेवा में और ना दुर्वासा को पता था यह बात और ना अंबरीश जी को पता था।

कृत्या को भस्म करके दुर्वासा जी को त्रिभुवन में दौड़ाया। एक क्षण में नष्ट कर सकते सुदर्शन जी लेकिन नष्ट नहीं किया क्योंकि वो भी भगवान के है ना पर उनको तपस्या का है तभी तो कृत्या पैदा कर दी भगवान से प्रार्थना थोड़ी किए थे अपने तपोबल से कृत्या पैदा उनको अपना बल है पर है भगवान ही के इसलिए सुदर्शन जी ने उनको नष्ट नहीं किया जलाया ताप भागो भयभीत किया भागो पूरे त्रिभुवन में नहीं तो एक सेकंड में कदम नहीं बढ़ा सकते थे दुर्वासा जी सुदर्शन चक्र कोई भाई इतना ही दौड़ पाएंगे [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो भगवान का आदेश हुआ कि अमुक लोक के अमुक को नष्ट करना है।

बस इतना हुआ को नष्ट हो गया। यह थोड़ी कि मिसाइल दागिनी है। वही प्रकट हो गए। सुदर्शन जी नष्ट कर दिया। उनके लिए कोई यात्रा थोड़ी कर लिए कि त्रिभुवन में किस लोक जहां भगवान का संकल्प बना उसी क्षण विनाश शुरू हो उसका। ऐसे पार्षद थोड़ी कि अब देखो गाड़ी स्टार्ट करेंगे फिर जाएंगे वहां पहुंचेंगे। फिर ऐसा थोड़ी है। तो इतना समय दुर्वासा जी को कैसे दे दिया? पूरे त्रिभुवन में भाग रहे हैं क्योंकि केवल उनको ज्ञान कराना है। अगर उपासक केवल भगवान का आश्रय ले ले सब बात इससे बड़ा कोई साधन नहीं पर भगवान का आश्रय नहीं अपनी साधना का आश्रय होता है।

अपनी तपस्या का अपना बल शरीर का बल लोगों का महत्व और मतलब क्या-क्या कूड़ा करकट भरा हुआ है। तो जैसे ब्रजवासी जनों की या प्रभु के नित्य जो निज जन है उनकी जो महिमा इसी बात के प्रभु के उनको बैकुंठ भी अच्छा नहीं लगा सर्वलोक चूड़ामणि भगवान वहां विराज वो भी अच्छे नहीं लगे हमारा कन्हैया हमारा वो हमारा है भैया तुम तो बैकुंठनाथ बने यहां बैठे हो [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक क्षण भी नहीं रुके उनका हमें बस देखना ही था कि भगवान का बैकुंठ कैसा है हमें हटाओ तुरंत हटाओ यहां से हमारे वो श्याम सुंदर जिनके हम गले में हाथ डाल के खेलते वो सुख बैकुंठ में भी नहीं है ठसक अपने प्रभु प्रभु का एक स्वभाव जैसे जिस भाव से जो बजता है वैसे प्रभु अनुभव में आते हैं।

जो इन्होंने प्रभु को अपना यार माना तो प्रभु यार बन के मिले। प्रभु को जिन्होंने पुत्र माना तो देखो अखिल लोकों के पिता उसके पुत्र बन जाते हैं। कितने कृपालु है प्रभु को पति माना जगत पति उसके पति जैसी भावना करे प्रभु य था माम प्रपद्यते ता भजाम भगवत आश्रय प्रभु के चरणों का आश्रय प्रभु के नाम का आश्रय धाम का आश्रय रूप लीला यह सब भगवत आश्रय ही है बस सच्ची भक्ति हो गई किसी और का जिस दिन भरोसा नहीं रहेगा उसी दिन प्रभु का साक्षात्कार हो जाएगा तब तक विलंब है प्रभु की तरफ से जब तक कोई और है तुम्हारे जीवन में जिस दिन और कोई नहीं होगा वस्तु व्यक्ति स्थान कुछ भी इतना भी कुछ और कहते हैं ना डूबने

वाले को तिनके का सहारा काफी होता है तो यहां भगवत आनंद में डूबना तिनके का भी सहारा नहीं लेना नहीं वो काफी होता है वही बाधा पहुंचा देगा देखो हिरण में फंस गए पहुंचा दिया ना बाधा एक जन्म और लगा फिर सीधे सीधे दे प्रभु का भरोसा प्रभु के बल से प्रभु का भजन करना और उस भजन का फल प्रभु की प्रसन्नता वो मुस्कुरा दे बस इतनी बात अच्छा इतना बड़ा महान महिमामय ईश्वर तुम्हारा मित्र बन गया इससे बड़ा कोई चाहिए भाई 100 200 किलो सोना तुम्हारे पास है और वो नष्ट हो जाए तो क्या फर्क पड़ेगा जब पारस मणि तुम्हारी जेब में है तुम चाहोगे तो पहाड़ लगा दोगे सोने का क्योंकि पारस मणि है ना तो पूरी दुनिया बनाने वाला तुम्हारे संबंध में है।

मालिक है, मित्र है जो भी मानो तो हमको दुनिया पूरी नष्ट हो जाए तो क्या फर्क पड़ेगा? वह एक दूसरी बना देगा। उसने किसी का सहयोग थोड़ी लिया। एक क्षण भी बना दिया। यह जब विश्वास हो जाएगा कि प्रभु के सिवा बात बन जाए। पर बड़ा [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो माया का खेल है ना। कहीं ना कहीं हम ऐसे ऐसे रहते हैं। इधर माया को पकड़े इधर प्रभु को भी पकड़ना तो पकड़ में आएंगे नहीं वो वो नहीं आएंगे पकड़ में जब तक पूरा का पूरा ऐसे नहीं करोगे ना पहले ऐसे कि देखो हम किसी को नहीं पकड़े देखो द्रोपदी जी भक्त हैं महान भक्त हैं पर भरोसा अपने पतियों का किया नहीं आए मालिक फिर सभा कोई तो धर्मात्मा खड़ा हो जाएगा कोई नहीं खड़ा हुआ नहीं आए प्रभु फिर अपनी भुजाओं का नहीं आए प्रभु कि दांत से पकड़ नहीं आए प्रभु और जब ऐसे हे कृष्ण तो आना जाना थोड़ी था कपड़े बन गए भगवान का अवतार जो कहीं नहीं लिखा है चीर अवतार भगवान का हो गया वस्त्रावतार क्षण में करतुम अन्यथा कर तुम पहाड़ लग गया रंग बिरंगी साड़ी का पर यहां से नहीं हटा पल्लू पर ये चाहिए अगर पकड़े हो कहीं तो तुम देख लो फिर उतना ही विलंब तुम कर रहे हो।

कोई और सहारा है तो तभी अभी कहा ना कि केवल प्रभु का सहारा तो फिर देर थोड़ी लगती प्रभु को देखो व आ गए हजारों हाथी हाथियां उसके अनुकूल चलते थे गजेंद्र के जब वो ग्राह से लड़ाई हुई ना तो सब सूड से ऐसे एक दूसरे के उसका सहयोग कर रहे थे भैया बहुत वर्षों झगड़ा हुआ जब परिवार वालों ने देखा हाथी हाथी भैया ये तो निकलने वाला नहीं ग्राह जलचर जीव और बलवान होता है। यह थलचर जीव जल में कमजोर होता जा सब छोड़ के चले गए। अब भरोसा गया उसका कि यार कोई हमारा साथी अपना बल थक गया।

अब लगा कि अब तो ग्राह घसीट ले जाएगा। अब तो जल में तो उसे पूर्व जन्म के भजन से भगवान का भजन इसीलिए कभी नष्ट थोड़ी होता है। याद आ गई। जब तक किसी और का सहारा था तो भगवान की याद नहीं आई। जब सब सहारे हटे तो भगवान हरि भागे भगवान गरुड़ छोड़ के भागे और पहले सुदर्शन को आदेश किया जाओ ग्राह का ग्राहक को मारा थोड़ी तारा क्योंकि गजेंद्र भक्त का पैर पकड़े साला गजेंद्र का बाद में उद्धार हुआ पहले ग्राह भगवत प्राप्त हुआ सुदर्शन जी के मारने से किसी की दुर्गति थोड़ी होती सीधे भगवान को प्राप्त होता है क्योंकि ग्राह का जो स्वरूप है वो गजेंद्र इंद्र के चरणों में ऐसे पकड़े ना मुंह तो फिर उसका पतन कैसे हो सकता है?

भक्त का चरण पकड़ लिया चाहे जिस भाव से उसका तो मंगल होगा। तो सुदर्शन जी ने पहले ग्राह को भगवत प्राप्त कराया। फिर भगवान आके गजेंद्र जी को इन चरित्रों से पता चलता है कि अगर हम किसी का भी भरोसा लिए तो हमें भगवान की महिमा नहीं देखने को मिलेगी। जब केवल भगवान का आपके सिवा वही चमत्कार प्रकट हो जाता है भक्ति का इसमें तपस्या भजन थोड़ी काम किया है भरोसा देखो खास बात देखो वो गजेंद्र क्या हजारों [नाक से की जाने वाली आवाज़] हाथी हाथनियों के बीच में मतवाल होकर जिधर से निकलता है हाहाकार मचा देता है भरोसा उसको जागृत एक क्षण में भरोसा जागृत हो गया अब कोई नहीं उसी समय भगवान आ गए जरूरत है भरोसे की पर भरोसा है हमारा कई जगह फंसा हुआ है तो वही सत्संग से भजन से धीरे-धीरे हम अपना भरोसा समेट कर प्रभु के

चरणों में जब एक भरोसो एक भले एक आ बस फिर भगवत प्राप्ति के कोई दिक्कत कोई समस्या रह ही नहीं जाएगी अरे बात समझो भगवान हमारे तो यार समस्या क्या रह जाएगी जितना भाई वो सब उनके संकल्प से पैदा हुआ वो हमारे हाथ में ये विश्वास की कमी जो है ना यही हजा दृढ़ दृढ़ विश्वास हो जाए बस चमत्कार प्रकट हो जाएंगे जीवन में दृढ़ विश्वास ऐसा होगा ही ऐसा कैसे हो सकता है हम एक दिन सुनाया था सत्संग में कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक गरीब केवट था निषाद तो उसके यहां कुछ कार्य था मतलब बेटी आदि का ब्याह तो जमींदार से पैसा उधार लिए ब्याज जमींदार लोग पहले जो है ना बहुत आतंक करते थे गरीबों के ऊपर ब्याज पे ब्याज मतलब अब अगर पैसा ले लिया है तो उसका का घर और खेती उसके नाम हो गई जमींदार के वो इतने हथकंडे अपनाते थे कि मतलब जीवन भर उनसे मुक्त नहीं हो सकता तो अपना काम होने के बाद वो ब्याज सहित पैसे वापस कर दिए जाके कुछ दिन व्यतीत होने के बाद जमींदार ने कहा पैसे दो मालिक हम आप ही तो लिए थे हम तो दे गए थे आपको पैसे झूठ बोलता

है अब तो जमींदार झूठ बोलता है कहा और मुकदमा लगा दिया रिपोर्ट कर दी मुकदमा तो जो न्यायाधीश इसने पूछा कि तुमने पैसे दे दिए थे। कहा हां साहब जमींदार ने तुरंत कहा बिल्कुल ये झूठा बोल रहा है। बिल्कुल नहीं दिया। तो अब वहां प्रमाण चाहिए कि कौन कौन देख रहा था? उसने वो भगवान को मानता तो था ही। उसने कहा रघुनाथ जी हमारे देख रहे थे कि हमने आपको पैसे दिए। प्रजा जी ने कहा अगली तारीख हम निश्चित करते हैं। अपने रघुनाथ को लाना बुला। अब वो थोड़ी हम समझ रहे किसी रघुनाथ का नाम होगा किसी जनरल आदमी और वो भगवान को कह बोले हां साहब वही देख रहे थे वही आग गवाही देंगे पक्का उसको विश्वास था कि भगवान आएंगे दूसरे दिन तारीख में पहुंचा कहां है तुम्हारा गवाही और जमींदार जानता था कि कोई तो था नहीं वहां यह केवल अपनी बात को पुष्ट करने के लिए ऐसे ही कह रहा है उसको क्या पता था कि भगवान सर्वव्यापी उसकी बात सुन उसको दृढ़ निश्चय था कि मुझ गरीब की इस इस बात को भगवान ने देखा और वही और निश्चित भगवान आएंगे।

कहां है तुम्हारा? तो बोले बुलाओ जैसे रघुनाथ हाजिर हो तो ले लठिया हां सरकार पहला दर्शन निषाद भी कर रहा है भगवान साधारण जमीदार ए तुमको हमने कब देखा? कौन है तू? कहां से उस भगवान ही थे ना? बोले अमुक अलमारी में रजिस्टर नंबर अमुक में अमुक अमुक नंबर के नोट अब भी रखे हैं। हमने देखा है तुम वहां उसी समय आदमी भेजे गए रजिस्टर रजिस्टर से नोट अब तो गवाही पक्की जमींदार को पता नहीं था कि भगवान है। उसे विश्वास था। बस वह निकला और भगवान का नित्य भक्त बन गया क्योंकि उसने सोचा कि यार मैंने जब भगवान को साक्षी किया तो भगवान आकर हमारे सांसारिक कार्य का सपोर्ट किए तो वैसे भगवान का महान भगत बन गया।

हम विश्वास कर निश्चित देखो एक एक कथा सुनाई थी एक बार छरचुरा गोपीनाथ जी के पास एक गोपाल जी भी ठाकुर जी हैं उड़ीसा में विराजमान है वो वृंदावन के ठाकुर जी थे गोपाल जी तो एक ब्राह्मण ने तीर्थ यात्रा के लिए तो एक जवान ब्राह्मण गरीब था उसने कहा ठीक है हमको भी दर्शन हो जाएंगे चलो हम आपकी सेवा करेंगे आप धन लगा देना सब ऐसा हो और खूब तीर्थ यात्राओं में जब वृंदावन आए तो इतनी सेवा उसकी की कि उसका हृदय गदगद हो गया। तो उसने कहा गोपाल जी के मंदिर में कि भैया तुमने इतनी सेवा की है।

हमारी एक बेटी है। हम अपनी बेटी का ब्याह तुमसे बोले हम तो कुछ कहा नहीं लेकिन आप ही ने कहा है। बदल मत जाना वहां गांव जाके क्योंकि तुम जब बड़े आदमी हो तुम्हारे लड़का ऐसा है। बोले नहीं बदल क्यों जाएंगे? भगवान के मंदिर में कहते हैं कि हम बेटी का ब्याह कर देंगे। सब होकर सारांश में बताया। जब घर पहुंचा तो महीना दो महीना हो गए। कोई सांस ही नहीं लिए। तो उनसे कहा बाबा तुमने कहा था ना तो लड़कों ने पहले उनको उन्होंने कहा भाई हमें याद नहीं कि हमने कहा और पंचों को इकट्ठा किया।

पहले गांव के लोग प्रधान हो सब पंचायत करते थे ना। पंचों से कहा देखो हमने तो चाह नहीं की थी। इन्होंने अपनी तरफ से कहा था। तो पंचों ने कहा भाई कोई गवाही होना चाहिए। हां बुड्ढे साहब आई कौन थे? हां भगवान के सामने गोपाल जी के सामने कहा था तो बोले अगर गोपाल लड़के तुरंत बोल पड़े कि अगर गोपाल जी आकर यहां बोल देंगे तो अपनी बहन का वो जानते थे कोई मूर्ति चल के थोड़ी आती भगवान थोड़ी इसके ब्याह की ताकी दे उन्होंने कहा अच्छा अगर ऐसी बात है तो हम जा रहे हैं वृंदावन जो कुछ उसके पास पुण्य पुण्य था बेचबाच करके वृंदावन आया और गोपाल जी के मंदिर में शयन का समय था तो ठाकुर जी ने कहा देखो पीछे हम आए थे ब्राह्मण के साथ आपके दर्शन करने मंदिर में कहा था कि ब्याह कर देंगे।

सुन रहे हो चल के वहां बता दो चल के कि उसने कहा था तुम्हारा ब्याह हो जाएगा। तो जो सेवा करने वाले थे पागल आदमी क्या कैसी बातें भगवान से कर रहा है? पर्दा लगा दिया भगवान का सहन हो गया और सब चले वो बैठा सुन रहे हो ना देखो आपके सिवा कोई मुझ गरीब का साथ देने वाला नहीं ना हमारे पास पैसा जब उसने कहा था उस समय तुम सुन रहे थे कि नहीं तो अंदर से आवाज आई अरे कहीं मूर्ति चलकर के गवाही देगी बोले सुन रही मूर्ति बोल सकती चल के ले सकती भगवान आए निकल के [नाक से की जाने वाली आवाज़] भगवान ने कहा यार तुम बात करते हो तुम साथ तो चलना पड़े पर हमें वृंदावन में तुम्हें खूब खाने पीने को मिल रहा है।

तुम साथ चलोगे हमें कुछ खाने पीने को नहीं मिले। कैसे विनोद उन्होंने कहा हम पहले पता था कि जो है गवाही देने वाले खवा पिया के लाया जाता है। तो बोले इसीलिए अब कुछ हमारे पास था वो बेचवाच के लाए। खाने पीने की तो चिंता नहीं। तो बोले हम पीछे पीछे चलेंगे। तुम आगे आगे चलना। भगवान ने कहा बोले हमको देखो फुसलाओ मत। हमें कैसे पता चलेगा? बोले नपुरों की झनकार तुम्हें सुनाई देगी और जिस समय पीछे तुम मुड़ के देख लो फिर हम आगे नहीं जाएंगे। ठीक है भगवान को जब भोग लगाना होता तबवा देता पीछे पीछे भगवान गए वहां उड़ीसा प्रांत में अपने वृंदावन के ठाकुर गोपाल जी हां वहां भगवान गए और थोड़ा ही नगर रह गया तो अब उसको लगा कि केवल नऊ पर सुनाई दे रहे कि आ भी रहे हैं जो मुड़ के देखा तो भगवान मुस्कुरा बोले देखो हमारा तुम्हारा वादा था अब इतने नजदीक आप तो नहीं चलेंगे बोला चलो भी मत हमें कोई परेशानी हम बुला के लाए पूरे गांव गोपाल जी आए साक्षी सबको आश्चर्य हुआ वृंदावन से ठाकुर जी तो अब किसी को साक्षी मांगने की हिम्मत पड़ी क्या जब भगवान साक्षात ये हमें दृढ़ विश्वा देखो भगवान गए चल के मूर्ति होते हुए भी प्रगट में चल के गए हमें दृढ़ विश्वास की आवश्यकता है हमारी भक्ति में दम नहीं है विश्वास की नहीं हमें कमजोर हो गए हैं हम कि हमें इतना विश्वास नहीं जितना प्रह्लाद जी को है ध्रुव जी को है इन महान महान भक्तों को तो इनके चरित्र पढ़े, नाम जप करें, भगवान में विश्वास बढ़ावे।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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