रामकृष्ण मिशन से आए पूज्य संत जनों से शरणागती की पुष्टता पर अद्भुत चर्चा !!
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
पतित पावन संत भगवान की जय मेरे श्याम हो जाइए स्वामी गुणेशानंद जी महाराज रामकृष्ण मिशन से पूज्य महाराज जी आपके चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम महाराज जी हमें कैसे समझ आएगा कि हमारी शरणागति पुष्ट हो रही है शरणागति तन वांग मनोभिर अमलै सोहम तव वाश्रितः तन से मन से वाणी से स्वयं से और बीच में शब्द है अमलई अमलई माने किसी भी तरह की कोई भी सुसुख वांछा ना होना वासना कामना होना स्प्रह तृष्णा यह मल है। भोगे हुए भोग को पुनः भोगने की इच्छा होना तृष्णा है। सुने हुए देखे हुए भोगों को भोगने की इच्छा कामना है।
वासना रूप में जब बार-बार भोगा जाता है तो संस्कार बन जाते हैं। वासना तो दुर्वासना मम सदा परिकर्षती। लोकतर की किसी भी प्रकार की शुभ या अशुभ वासना को अगर हम स्वीकार कर रहे हैं तो वह मल है। भगवत प्राप्ति शुभ और अशुभ दोनों से परे है। शुभ ब्रह्मा के द्वारा रचे हुए जितने लोक हैं। अशुभ ब्रह्मा के द्वारा रचे हुए जो नरक आदि यंत्रणा भोग हैं। भगवत प्राप्ति ब्रह्मा के भी ऊपर की बात है। जहां से ब्रह्मा प्रकट हुए हैं। उस परम तत्व का बोध हो जाना या उसके प्रेम को प्राप्त होना।
भक्ति या ज्ञान तन मन वाणी जब हमारी अमलई हो जाए सोहम तवा मैं तो आपका हूं ही प्रभु मैं तन मन वाणी से अलग है ये मतलब अगर कोई संसारी व्यक्ति प्रश्न करता तो इसको दूसरी तरह से बताते पर अपने लोग परमार्थ के प्रतीक हैं। अपने को समझना है कि तन मन वाणी यह परमार्थ की प्राप्ति में करण मात्र हैं। करण मात्र यह मैं नहीं हूं। यह सेवा पात्र है। शरीर मन सेवा का निश्चय मनन स्वीकृति चिंतन। तो वही चार रूपों में वर्णन किया गया। बुद्धि निश्चय मन संकल्प विकल्प चित्त चिंतन अहंकार क्रिया स्वीकृति या क्रिया भोगता सुसुख भोगता अंतःकरण ये मैं नहीं हूं।
और जो वाणी है वह तो एक इंद्री है ही लेकिन स्वभाव यह भी माया जनित ही है। प्रकृति का स्वभाव रचा हुआ है। तीनों को पहले हम नाम जप के द्वारा सद्गुरु की बताई हुई सेवा पद्धति के द्वारा जब हमारा कुछ हृदय निर्मल होता है तब दिखाई देता है कि तीनों अलग हैं। हमारी कामनाएं इन्हीं को ले होती हैं। ध्यान देना। शरीरा अभिमान में ही सारी कामनाएं होती हैं। मैं स्त्री हूं, मैं पुरुष हूं। परस्पर आकर्षण मैं अमुक हूं। मुझे ऐसा मुझे जितनी भी अभाव स्थिति है अभाव में ही तो मांग होता है।
वो इन्हीं को लेकर के है। शरीर को लेकर अंतःकरण को लेकर स्वभाव को लेकर। स्वरूप में कभी भी अभाव नहीं है। जो हमारा मैं स्वरूप है कभी कोई मांग नहीं। इसलिए जिनको स्वरूप बोध हो जाता है उन्हें कहते हैं ब्रह्म भूत। और ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति न काक्षति समा सर्वेशु भूते सुमत भक्तिम लते पराम वो ब्रह्म भूत महापुरुष ना कुछ सोचता है ना कोई चाह होती बिना सोच और बिना चाह के कैसी परमानंदमय स्थिति होगी ये वही जानता है जिसकी स्थिति है दूसरा नहीं जान सकता या अनुमान से जानने वाली कोई प्राकृतिक स्थिति नहीं है ये चिदानंद स्थिति है।
अब जैसे-जैसे हमारी शरणागति पुष्ट होती जाएगी वैसे वैसे हमारे हृदय में विकार की भावना खत्म होती जाएगी क्योंकि जब तक मैं स्वीकृति होती है तभी विकारों का समुदाय रहता है और जहां मैं को समर्पित कर दिया जाता है तो जिसके प्रति समर्पित किया जाता है जिसका चिंतन किया जाता है वही हमारे सद्गुण वही स्वरूप बन जाता है जैसे भृंगी नाम का कीड़ा दूसरी तीसरी जाति के कीड़े को लाकर अपने मिट्टी के घरौंदे में पैक करके और अपना चिंतन कराता है डंक मारते हुए तो वो भन भन ऐसी आवाज निकालता है वो कुछ ही समय में बिना शरीर छोड़े वो भ्रंगी रूप को धारण कर लेता है कीड़ा ऐसे ही भगवान के हम अंश हैं जब हम भयवश या प्रीतिवश जो सभीत आवा शरणाई रख्यो ताई प्राण की नाई संसार भय से भयभीत होकर त्राहिमाम प्रभु प्रभु की शरणागति या प्रीतिवश लाडलेले आपके सिवा कोई नहीं है मैं आपका ही हूं भयवश या प्रीतिवश जब हम चिंतन करते हैं तो जिनका चिंतन करते हैं वो निर्विकार सच्चिदानंदमय तो हमारा हृदय निर्विकार और सच्चिदानंदमय स्थिति को प्राप्त जितने
जितने विकार कम होते जा रहे हैं तो आप भगवान के नजदीक पहुंच रहे हैं। आपकी शरणागति पुष्ट हो रही है। जब तक अहम बकाया रहेगा तब तक विकार पिंड नहीं छोड़ेंगे समझ लीजिए अहम रूपी घर में ही ये बहुत सुंदर आसन लगा के बैठे हुए काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर और ये अहंकार अंतःकरण की वृत्ति है अहम अंतःकरण ये बड़ी गुप्त स्थान में बैठे हैं जहां बहिर्मुख पुरुष संसारी तो जान ही नहीं सकता उसको तो ऐसा पागल बनाए हुए हैं कि वो यही सोचता है मैं भोग रहा हूं मैं मुझे रसेंद्रिय मांग रही मन के साथ मिलकर वो कह कह रहा मुझे ही अच्छा लगता है।
नेत्रेंद्र मांग रही मन मना खष्टान इंद्रियाण प्रकृति स्थान वो स्वीकार कर रहा है। मैं देखना चाहता हूं। मैं सुनना चाहता हूं। मैं मैं ये इसी मैं के धोखे से जन्म जन्मांतर से भ्रमण हो रहा है इस माया में। अब इसको थोड़ा सा गुरु कृपा से अलगाव जो है उसे देखो। जड़ चेतन ग्रंथि पड़ गई। यद्यपि मृष छूटत कठ तो जैसेजैसे आप भगवान के शरण में होते जाओगे वैसे वैसे निश्चिंतता आती जाएगी। कोई चिंता नहीं मतलब धीरे-धीरे चिंता खत्म होती है। निर्भयता ये कोई भी कितना भी बड़ा महान हो चाहे धन में चाहे पद में चाहे शरीर बल में बुद्धि बल में अगर वह भोगों को भोगेगा अगर वो अंदर से कोई धर्म विरुद्ध आचरण करेगा तो भयभीत रहेगा कोई भी हो कोई भी हो विषाद युक्त रहेगा शोक युक्त रहेगा चिंता युक्त रहेगा और जब आप धर्म पूर्वक चलेंगे तो आप चाहे शरीर बल ना हो, चाहे आपके पास धन बल ना हो, चाहे कोई पद ना हो, चाहे कोई भी सहयोगी ना हो, आप निर्भय रहेंगे, निश्चिंत रहेंगे, निर्विकार रहेंगे।
आपके हृदय की स्थिति सदैव प्रसन्न रहेगी। कोई भी हो, कोई भी हो अगर अधर्म आचरण है तो विषाद है, भय है, शोक है। आपके अंदर घबराहट पैदा कर देगा। मन वही जो अधर्म आचरण किया है। जिस स्थिति में तुम सुख लेना चाहोगे उसी स्थिति में संशय पैदा कर दे। पता नहीं पद नष्ट ना हो जाए। पता नहीं शरीर नष्ट ना हो जाए। पता नहीं जिससे हम प्रेम कर रहे हैं वो धोखा ना दे। पता नहीं जो हमने धन कमाया कोई छीन ना मतलब इतने वो अंदर तभी तो डिप्रेशन में पहुंच जाते हैं। जब अधर्माचरण का संग्रह हो जाता है तो मन की सोचनीय शक्ति नेगेटिव होते हुए इतना गिर जाती है बिना भय के भय बिना विषाद के विषाद और अगर हम धर्म से चल रहे हैं शरणागत हैं तो हमारे अंदर निश्चिंतता निशुकता निर्भयता निर्विकारता ये स्थिति बढ़ेगी क्योंकि भगवान हमारे निर्विकार हैं।
भगवान सर्वलोक महेश्वर सर्व सामर्थ्यशाली सर्वत्र सर्वज्ञ तो निश्चिंत हो गए वो है ना हमारे साथ फिर हमें कोई डर नहीं लगेगा फिर हमें कोई शोक नहीं होगा ये वस्तु नष्ट हो गई हां वो अनंत ब्रह्मांडों को एक क्षण में रच देता है मेरे लिए ये स्थिति उसको रचने में कितनी देर लगेगी वो तो अनंत महिमा निर्भय हो गया निशुक हो गया निश्चिंत हो गया बेपरवाही अद्भुत मस्ती सबसे बड़ा ये भगवत आनंद है जिसके के एक बूंद से ऐसे मारो ना तो जो कण निकलते हैं उस बूंद में उसे सीकर कहते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं जो आनंद सिंधु सुखरासी सीकर तय त्रैलोक सुपासी जिस आनंद सिंधु के एक बिंदु के एक सीकर से पूरा त्रिभुवन सुखी हो वो आनंद समुद्र भगवान जिसके हृदय में स्फुरित हो रहे और जो अपना संबंध उनसे दृढ़ स्थापित करके जो है उसी में तन्मय हो गया है वो निर्विकार हो गया जैसे कोई बमन खाना नहीं चाहेगा उल्टी किया हुआ ऐसे ही भगवदानंद का भोगता ब्रह्मादिक के भोग विषम लागत केवल प्रवचन नहीं होता है यह केवल उपदेश नहीं होते जीवन की स्थिति होती है जब असलियत समझ में आ जाएगी तो ब्रह्मादिक के भोग सब विषम लागत ताए नारायण ब्रजचंद के लगन लगी हम उसी सच्चिदानंद से प्यार करते हैं पर समझ नहीं पाते हैं अगर समझ ठीक हो जाए सब रूपों में वही बना हुआ है एक हम बहुमा अभी निर्भय अभी निर्विकार अभी निश्चित हे परिवर्तनशील नाशवान संसार में एक ही बात है तुम इस भ्रम को छोड़कर सच्चिदानंद भगवान को प्राप्त कर लो जो पद मिला है जो सेवा मिली है जो कर्तव्य मिला है उसे भगवान की पूजा समझो दूसरों का हित करो और अपने मन और
इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीखो यह तुम नहीं हो ये तुम्हारी मांग नहीं दुष्ट इंद्रियों की मांग है और दुष्ट पुरुष यदि हमसे मांग करें तो वह दंडनीय है संयम नियम के द्वारा इनको पवित्र दंड से पवित्र होता है जीव। जैसे कोई पाप आचरण करता है उसको सजा मिलती है। उसको दंड मिलता है। तो यह बड़ा उपकार होता है। वो पवित्र किया जा रहा है। उसके पापाचरण की धुलाई हो रही है। तो ऐसे अपनी इंद्रिय और मन ये जो पापाचरण में लगे हुए हैं इनको दंड देना चाहिए। संयम नियम एक भजन में कहा है देखना इंद्रियों के ना घोड़े [गला साफ़ करने की आवाज़] भगे रात दिन इनमें संयम के कोड़े लगे।
देखना इंद्रियों के ना सर्वेंद्र जितनी हमारी जो इंद्रियां है वह बहिर्मुख होकर जो विषयों का चिंतन करती है इनसे बचना है सर्वात्मना विष बहिर इंद्रियाण साधु साधक उपासक ध्यान दे वो अपनी इंद्रियों को छूट ना दे दे नहीं तो विषयों में पतित हो जाएगा गिर जाएगा फिर तो एक क्रिया मात्र रह जाएगी आनंद की अनुभूति नहीं क्रिया ये सब क्रिया मात्र रह जाएगी। वो जो वस्तु है जो आनंद है वो नहीं रह जाएगा। तो प्रतिपल निर्विकारता की तरफ हमारे कदम बढ़ रहे हैं तो हम शरणागति में सफल हो रहे हैं।
अगर शरणागति वचन से कह रहे हैं वेश भी है और हम विकारों की तरफ गिर रहे तो हमारे अहंकार की पुष्टता हो रही है। देहाभिमान पुष्ट हो रहा। शरणागति में कहीं ना कहीं दोष है। अभी निर्दोष शरणागति नहीं हुई। फिर भी यह हुई व्याख्या फिर भी जैसे हैं हम वैसे प्रभु के हैं। यह मानकर अगर हम आर भाव से पुकारे तो जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधवति मृद वो प्यार के समुद्र हैं वो हमें क्षमा कर देंगे और हमें सच्ची शरणागति प्रदान कर देंगे। हमें सावधान रखना है क्योंकि जब कोई चढ़ाई पर चढ़ता है तो उसको फिसलाने के लिए भी व्यवस्था होती है।
ध्यान रखना यह चढ़ाई है। अनंत जन्मों की बिगड़ी बात इस जन्म में हमें बनानी है। मनुष्य शरीर मिला है। क्योंकि तुम अब प्राण पति की प्राप्ति की चाह किए हो ना। अब दिखाओ तुम कि प्रभु की चाह सच्ची है या कच्ची। अब तुम्हारे सामने वह भोग भोग आ गया जिसकी तुमने कल्पना की थी। जब सामने वह भोग आया और तुम उसमें तो तुम्हारी चाह झूठी थी। अब लगो उसी में जब इससे चाह हटेगी तब वो चाह फिर देंगे वो मालिक। इसलिए बहुत बढ़िया अवसर मिला। मनुष्य शरीर, सत्संग, साधु संग हमारी समझ में आ रहा है कि हम मरेंगे।
यह बात सबको अच्छी नहीं लगती सुनने में पर सुनो हम मरेंगे। आज या कल कुछ पता नहीं। फिर तुम्हारा पद, तुम्हारा रुपया, बैंक बैलेंस यहां तुम्हारे बहुत मित्र, तुम्हारे सगे संबंधी, तुम्हारा शरीर सब यहीं जाएगा। केवल आप दुनिया में लाखों का मेला जुड़ा। हंसा जब जब उड़ा तो अकेला उड़ा। आपका कर्म केवल आपके साथ तो चतुराई करो। वो चीज कमाओ जो तुम्हारे साथ जाए। यह सब करते हुए भी राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण जो गुरुदेव ने मार्ग बताया है हर क्षण विकारों से लड़ना हमारी साधना है।
जैसे गृहस्थी में तो धर्म युक्त भोग भोगना अतिथित सेवा करना परोपकार करते हुए भजन करना वो भगवत प्राप्त हो जाएगा। विरक्ति में है बिल्कुल लाइन खींच दी। संगम तजेत मिथुन नाम मुमुक्षो सर्वात्म बंद्द्रयाण एक चरणित मन ते से युजीत तद वृत्त साधुस चेत प्रसंगा सोभरी जी जो मछली के संभोग को देखकर मैथुन को देखकर 50 ब्याह किए और एक दिन बैठे थे तब सोचा मेरी स्थिति क्या थी मैं एक दर्शन से कहां भ्रष्ट हो गया तब उन्होंने विरक्तों के लिए श्लोक लिखा है संगम तजेत मिथुन वना मुमुक्षु ऐ मुमुक्षु ऐ मुक्ति प्राप्त करने वाले उपासक वैराग्य भाव में जो चलने वाले हैं ध्यान से सुनो संगम तजेत मिथुन नाम मुमुक्षु जो मैथुन धर्म
से युक्त प्राणी हैं जो इसी सुख को सर्वश्रेष्ठ मान के भगवत विमुख है भूलकर भी संग ना करें क्योंकि परमाणु होते हैं जैसा हम संग करेंगे वैसा ही रंग चढ़ेगा अगर हम अधिक संग विषय पुरुषों का करें उनके साथ खाना पीना बैठना उठना तो हमारे अंदर विषय परमाणु ही आएंगे संगम तेज एक मछली को क्रीड़ा करते देखकर जो विघ्न से रहित होने के लिए जल में समाधि लगाकर बैठा था महात्मा समाधि भंग हुई देखा मछली क्रीड़ा कर रही मैथुन कर मछली में कौन रूप कौन सा अंग प्रदर्शन है उनको लगा इसमें सुख है परमात्म सुख का लक्ष्य करने वाला मैथुन सुख की तरफ आकर्षित और राजा मानधाता के पास जाकर 50 पुत्रियों से ब्याह किया महान तपस्या के धनी थे।
बोले हमारा ब्याह की इच्छा हुई है। मानदाता से कहा अपनी एक राजकुमारी से हमारा ब्याह करो। हड्डी हड्डी है जल में रहने से दुर्गंध आ गई जैसे मछली के ऐसे शरीर में और ना करते तो ब्रह्म ऋषि श्राप दे देंगे। तो उन्होंने कहा महाराज आपको जो कन्या प्रसन्न कर ले आप स्वीकार कर लो। मैं आपका सेवक आप और वो समझ गए कि हमें कौन से वो रूप धारण किया कि 50ों ले जाकर कहा 50ों से ब्याह किया। तब उन्होंने कहा कि कितनी बड़ी चूक हो गई मेरे से। गृहस्थी में जाना कोई चूक नहीं है।
पर विरक्त होकर गृहस्ती में जाना चूक है। आप मार्ग कौन सा चयन किए हैं? फिर गृहस्थ में रहकर धर्म युक्त भोगों को भोगते हुए प्रभु प्रसाद में वह भगवत प्राप्ति का मार्ग है। लेकिन विरक्त निवृत्ति मार्ग में होकर अब भगवत प्रसाद केवल उतना ही जितने से हमारे प्राणों का पोषण हो जाए और सब इंद्रियों पर संयम करके हम भगवत तो हमारी निर्विकारता बढ़े हम पर कृपा है। यह हमारी शरणागति है। हमें भोग सामग्रियों की बाहुल्यता मिले मेरा दुर्भाग्य है। भोग सामग्री मुझे प्रिय लग रही है।
मेरा दुर्भाग्य है। भोग बाहुल्यता बढ़ रही है। मेरा दुर्भाग्य है। इसलिए बहुत सावधान होते हुए शरणागति को इस बात में देखें कि हमारे अंदर निर्ग चाह नहीं है। पूरा विश्व घेर ले। पूरे विश्व की भोग सामग्री चाह नहीं कुछ नहीं बिगड़ने वाला। चाह है तो एक कमंडल एक लंगोटी भी फंसा देगी। गति में वह भी बाधा पहुंचा देगी। इसलिए हमारे अंदर केवल यह बात रह जाए कि मेरे स्वामी प्रभु के सिवा और कुछ नहीं है मेरे पास। वही मेरे जीवन धन में कई बार शरणागति उसमें कहा आजात पक्ष मातरम खगा जैसे छोटा सा बच्चा पक्षी का घोंसले में बैठा है पर पंख नहीं है उड़ नहीं सकता वो केवल अपनी मां की बाट जोड़ता है ऐसे में अपने केवल प्रभु की बाट जो है नाथ मेरे बनाए ना बनेगी कोटि कल्प लो आपके बनाए राधा राधा राधा शांत जो विषय त्याग का हम भष धारण किए जो विषय त्याग का उद्देश्य लिए हमें उसी में दृढ़ रहना है हम प्राण त्याग सकते हैं लेकिन कुमार मार्गगामी नहीं हो सकते।
गलत कदम नहीं रख सकते। तो फिर चाहे गृहस्थ हो, चाहे विरक्त हो, एक सीमाएं बनाई गई मार्ग की। अगर आप इधर से जाने वाले मार्ग से रफ्तार से गाड़ी लाओगे तो कितने लोगों का नुकसान होगा? आपका भी नुकसान हो जाएगा। नहीं हो जाएगा। क्योंकि आप उल्टा चल रहे हो ना। मार्ग सरकारी मार्ग नहीं बने। आप इधर से जाइए। आप इधर से जाइए। बीच में दीवार रख दिए। ऐसे ही भागवतिक मार्ग में ऐसे रख दिया। यह गृहस्थी मार्ग है। ये विरक्ति मार्ग है। आप अपने मार्ग से जाइए। आप अपने मार्ग से दोनों लक्ष्य को प्राप्त हो जाएंगे।
आप अपने मार्ग से भ्रष्ट हुए तो आप गलत। आप अपने मार्ग से गिरे तो गलत। और दोनों मार्ग वहीं जा रहे हैं। प्रभु के चरणों में ही दोनों की पूर्णता है।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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