सरदार जी और पूज्य महाराज जी के बीच अद्भुत चर्चा और क्या अरदास करने को बोला और क्यों हुए भावुक ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
जीवन की सार्थकता हमारा चित निरंतर यह चिंतन करता रहे जिसकी कृपा कटाक्ष से ही हमें सांसारिक उन्नति और अलौकिक परमानंद के अनुभूति होती है इस को परमेश्वर कहते हैं परमात्मा कहते हैं गुरु कहते हैं जहां भी रहो जैसे भी रहो सुमिरन रहो अगर नाम चल रहा है उसके लिए कुछ दुर्लभ नहीं है सब कुछ प्राप्त हो सकता है यह संसार के जितने पद हैं इस सेवा पद है आज है कल नहीं भी हो सकते हैं लेकिन जो हमारा परमेश्वर है मलिक जब तक उससे दृष्टि नहीं मिलेगी उसका अनुभव नहीं होगा तब
तक हमारा अधूरा जीवन राहत है परमात्मा साक्षात्कार करना ही मनुष्य जीवन का परपम पद है इस सेवाएं जिससे आपको जो पद मिला है जितनी समाज आपसे सुखी हो पाएगी सेवा हो गई उनकी सेवा होगी अगर हम फतेह नहीं कर पे तो फिर अभी हमने अपने गुरु को पहचाना नहीं कम क्रोध लो मो मैड मत सर यह हमारे अंदर एक केले के अंदर ही बैठे हुए हैं और इनको फतेह करवा सकते हैं तो सिर्फ गुरु वाणी गुरु प्रदत नाम इसलिए गुमनाम जब करो और समाज की सेवा में ऐसी भावना रखो की इन सब की सेवा से हमारे वाहेगुरु प्रश्न होंगे हमारे प्रभु प्रश्न है लेकिन गुरबाणी कहती है इस समय आप जैसे संत महात्माओं की इस देश को बहुत आवश्यकता है और ईश्वर से यह प्रार्थना की अगर हम लोग के प्राण लेकर भी अगर आपका महाराज जी कुछ हम लोग किसी इलाके हम लोग तो निमित्त मंत्र हैं हजारों हजार आप जैसे संत इस देश में शांति स्थिरता ए सके क्योंकि आप मैं मैंने पूर्व में भी कहा मैं वेदों का मुझे जानकारी नहीं है शास्त्रों की जानकारी नहीं है लेकिन आप जो बोल रहे हैं जो गुरु ग्रंथ साहब
महाराज बोल रहा है वो आप बोल रहे हैं और पूरे विश्व में सिख समाज आपकी और एक आशा भारी निगाह से देख रहा है की जो निरोल कुर्बानी में चीजें कहानी गई है वो आज एक संत महात्मा इस युग में फिर आके उन चीजों को हमारे गुरु जनों का चाहे वो किसी भी जगह विराजमान हो उन सब का आशीर्वाद कम कर रहा है हमारे हृदय में वही सब बैठ के बलवार हैं मेरी समर्थ नहीं है मैं किसी को शांति प्रधान कर सुकून किसी को ज्ञान प्रधान कर सुकून मेरे में समर्थ नहीं पर जो सामर्थ्यवान है वह बैठ करके बुला रहे हैं उससे शांति हो रही वो उन महापुरुषों को प्रणाम है जिनकी वाणी में ऐसी समर्थ जो कृपा करके ऐसा हृदय में दे मैं बस यह मैं कहना वो बता रहे बस धन्यवाद पत्र है आपका भी हृदय जो आप संतो के प्रत्येक स्वभाव क्योंकि पद आदि में रहते हुए आप गुरुवाणी को समझ रहे हैं आप संतो को समझ रहे हैं आप देश की शांति किस विषय में यह विवाद समझ रहे हैं यह बड़ी कृपा है साहब की गुरुदेव की बड़ी कृपा है आपके ऊपर ऐसे ही चलते रहिए और हमारा जीवन महापुरुषों की कृपा से
चल रहा है चुनती है परमात्मा से अरदास करेगा की हम लोगों को भी जैसे नाम सिमरन जैसे हम लोग कभी कर पाते हैं कभी नहीं कर पाते हैं आप लोग तो अब स्वयं में ही सिद्ध हो चुके हैं थोड़ा हम लोग के ऊपर ईश्वर की कृपा हो हम लोग इस ग्रह जीवन में रहते हुए भी निर्लेप रहे हैं यही खास बात ये निर्लेप शब्द जो है ना ये बहुत जोर का शब्द है गृहस्ती में रहते हुए भोगो में रहते हुए निर्लेप जो जल में कमल का फूल रहे बहुत जोर की बात है जो किसी की अपेक्षा नहीं रखते समस्त भोगो में रहते हुए भी किसी में भोगशक्त नहीं होते यह गुरु प्रसाद से होता है जो हमारे अंदर महत्व बैठ जाए नाम का तू निरंतर चलने लगे सब कुछ करते हुए नाम चल सकता है बड़े से बड़े जब युद्ध करते हुए नाम चल सकता है तो युद्ध से बड़ा कोई कार्य तो है नहीं भगवान ने कहा गीता हमको वही गुरुदेव आदेश कर सकते हैं जो हम कर सकते हैं अन्यथा में गुरु है सर्वज्ञ है तो जगतगुरु भगवान श्री कृष्णा का रहे हैं मां मुनीश्वर युद्ध क मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो अगर हम अभ्यास बनाए तो
निरंतर नाम चल सकता है और नाम निरंतर चल रहा है फिर इसके आगे कुछ नहीं फिर तो सब कुछ ए जाएगा बिना पढ़े वेद ए जाएंगे आपके हृदय में पुरी हो जाएंगे वेद का सर स्पिरिट हो जाएगा जो छुपा हुआ माया में तत्व अपने आप को गुप्त रखें ना वो आपके नेत्रों से बैक नहीं पाएगा जहां दृष्टि पड़ेगी वही वो दिखाई देगा जिससे पहले भी गुरु वाणी से आपने कहा था घट-घट में वही बोल रहा है घट-घट में वही राम है चाहे हाथी हो चाहे चींटी हो चाहे देवता हो चाहे ब्रह्मा हो वही बोल रहा है यह
अनुभूति हो जाना यह सिद्धावस्था का लक्षण अनुभूत हो गई घाट घाट में वही रामायण पुस्तक है गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने अपना पूर्व जन्म भी लिखा है और इस विचित्र नाटक लिखा है तो इसके 40वे पृष्ठ पे उन्होंने लिखा है की जहां राजा पांडू ने तपस्या किया हेमकुंड साहिब पर पांडवों के पिता जी ने वहां की पुरी इन्होंने निशानियां दी है मैं वहां पर पूर्व जन्म में तपस्या कर रहा था मेरी विनती है कभी हिंदी साहित्य है तो कभी अगर आपको बिल्कुल बिल्कुल जी महाराज के ऊपर एक
वो है इतिहास का संक्षिप्त जो हम लोग बच्चों को पढ़ते हैं आजकल और एक ही गुरु महाराज जी की छोटे साहिबजादे जो हमारे दीवार में चुंबकीय गए थे ये उनके लिए है धर्म को स्वीकार नहीं किया
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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