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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #265 · 2 अगस्त 2023

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

ऋषभ त्रिपाठी जी प्रयागराज से अहमदाबाद जी आपके पास बैठने से जो मां की स्थिति रहती है यह हमेशा बनी रहे यहां से जान के बाद भी यह संभव कैसे हुआ क्योंकि यह मां ऐसी ऐसी जगह ले जाता है बाद में सोने पर भी अपने आप से धाम का प्रभाव है नाम का प्रभाव है वहां से हटा के नाम में लगाते रहे जी व्यक्ति में जाएगा देखो लोग समझ नहीं रहे ऐसी भगवान कैसे हो सकता है हमारे मां में ब्रह्म आता है ना प्रश्न ए जाता है हीटर गम कर रहा है ना पावर कौन है बिजली है ना यह तेज रूप में प्रकाशित हो रहा है प्रकाश यह बिजली है ना तो कहानी ना कहानी मेरे जीवन का योगदान है बहुत बड़ा और ऊ जाए तो मृत्यु है ना भला जो जीवन दे रही वो मृत्यु कैसे हो शक्ति है लगता है बिजली के प्रभाव को बिजली की महिमा चल रही है फ्रिज में ठंडा कर रही है हीटर में गम कर रहे यंत्रों के प्रभाव से बिजली का बहुत रूप देखा जा रहा है कोई भागवत स्वभाव वाला पावर भागवत शक्ति सब में एक ही है अगर उसको जान जो तो अमर हो जो इस को जन के लिए मनुष्य शरीर मिला है तो जहां मां

जाए है धनंजय मेरे शिवा किन-किन मंत्र कुछ नहीं है भगवान के मनी संख्या आपको ग रहा है ये रक्षा है पापी सुबह वाला है एक गंदा है ठीक है धैर्य रखिए आप सवाल में मनी संख्या लिखिए की इसमें भी प्रभु है हम इन्हीं के लिए यही प्रभु है वास्तविक यही प्रभु है पर लाभ लिखिए इसमें भी प्रभु है इसमें भी प्रभु है और नाम जाप कीजिए जहां जहां मां जाए वहां से हटाइए और जहां जहां मां जाए वहां प्रभु की भावना कीजिए दोनों स्थिति में एक दिन आज्ञा नष्ट हो जाएगा अब आपको बड़ा विचित्र नाटक चल रहा है बिना भगवान की कृपा के ब्रह्म नहीं जा सकता जसु कृपा सब ब्रह्म मिट्टी जाए गिरजा स्वीकृति या रहस्य रघुनाथ कर बिग एन जान कोई जो जान रघुपति कृपा सपना में सच्ची सच्ची बड़ा नाटक चल रहा है एक नाटक अनेक रूप में कर रहा है इसलिए समझ में नहीं आया वही आप कभी स्वरूप है पर आप भ्रमित है इसलिए नहीं समझ का रहे नहीं हमारा स्वरूप ही है शांतम शास्त्रतम धारी भगवान शेष की सजा में और स्थिति क्या है शांता कर्म भगवान शिवा के गले में वासुकी बैठे हुए

हैं शांतम शास्त्रतम मां प्रवेश पापी में तुम भगवान देख सकते हो क्या गर्मी फेक रहे हो वही ठंडी फेक रहे समझो ना वही पावर गम वही पावर ठंडा जो ठंडा हो ग्राम कैसे हो सकता है जो ग्राम वो ठंडा कैसे हो सकता है यह यंत्र के प्रभाव से पावर दोनों में समाज है जो सड़क है वो तब तो देखा है उसे स्वभाव के अनुसार अलग-अलग पावर का प्रयोग दिखाई दे रहा है वही जहां यह बात समझ में आने लगी है भाई तो हर स्थिति में शांति शांति कभी छोड़ेगी नहीं अभी क्या अनुकूल हुआ तो थोड़ा आरक्षित हो गए प्रतिकूल हुआ तो शकित हो गए अच्छा हुआ आनंद का अनुभव बड़ा हुआ तो क्लेश कम इसी स्थिति से ऊपर उठने के लिए साधना की जाति है आराधना की जाति है बाहरी कोई छोटा तुम्हें सुख नहीं कर सकता बस इस संबंध में तुम्हारे हमारी बात ए जाए तुम खुद सुख स्वरूप हो तुम विवेक धरण करो किसी बाहरी वास्तु की आवश्यकता ने आप खुद सुख का दरिया हो क्योंकि ईश्वर का अंश है ना आनंद समुद्र भगवान का अंश आनंद में है भाई यह बात सब हम आनंद की खोज रुपए में करते हैं पद में करते

हैं भोगो में करते हैं इसीलिए हमें आज तक आनंद नहीं मिला है एक बार राजस्व यज्ञ में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन पासी बेटे थे तो एक चिता एक दाना लेकर के चावल का टूटा हुआ बड़ी मुश्किल से चल का रहा था क्योंकि उसकी एक टांग टूटी हुई थी तो अर्जुन जी की दृष्टि पर का प्रभु आनंद ले रहे हैं यह चिता कितना कष्ट का रहा है क्या इसको भी कभी सुख मिलेगा तो भगवान ने कहा तुम तो इसके आगे को देखने पर पूर्व को यह 14 बार इंद्र बन चुका है जीता भगवान ने क्या कहा 14 बार वो इंद्र बन चुका है आज दशा क्या है एक दाना लेकर लंगड़ा के चल रहा है समझ रहे हो हम इंद्र भी बन चुके हैं हम देवता बन करके खूब भिगे हैं हम नरक में जाकर खूब दंड भिगे हैं कुछ याद नहीं है माया का कम है विषमरण कर दे अब नया शरीर मिला भागवत प्रताप के लगता है भोग लो जो तुम कर रहे हो इससे बढ़कर तुम्हें मिल चुका है लेकिन आज तक तुम्हें तृप्ति नहीं हुई अब क्या होगी तृप्ति हनी है अंदर से देखो जो तुम छह रहे हो वह तुम्हें मिल जाता है तो विश्राम मिल जाना चाहिए ना

विश्राम का मतलब अब मुझे नहीं चाहिए प्रभु मैं जो कर रात हो मुझे मिल गया क्या ऐसा कभी हुआ है कभी भी क्षण भर के लिए तो लगता है फिर इसके बाद फिर इसका मतलब मां हमारा खुद का रहा है की जो मैं छह रहा हूं वह सही अभी मिल नहीं का रहा देखो केवट जी को भगवान के चरण मिले धोने को तो भगवान का रहे हैं की लोग प्रिया जी की मुद्रा का अब कछु नाथ ना अब का गया अब ए गया मेरा जिन्ना से नहीं पे जी पे मैंने राम रतन धन अब मिल गया मतलब मेरे मां को विश्राम तभी मिलेगा जब भगवान का भजन होगा भगवान की अनुभूति होगी और वो तभी होगी जब हम अभ्यास रस रहे इस सबकी समझ में नहीं आएगा तो देखो जैसे पति का बहुत प्यार शरीर है और मेरे भगवान वहां से अंतर्ध्यान हो जाए कितने मिनट के लिए लगाओगे डर लगेगा चुने में और पैसा देकर नष्ट करवा डॉग नहीं पैसा देकर लकड़ी लगे और उसकी चिता लगाओगे और उससे पूछे की ये जो तुम आज लगाने जा रहे हो ये वही तो शरीर है जिसको आप पति मां रहे थे या पत्नी मां रहे थे या प्रिया मित्र जो भी मां रहे हो आप बोले नहीं वो तो

चला गया कौन चला गया तुमने उसको जाना तुमने उसको पहचाना बोले नहीं तो जाना तो शरीर को था इसे गले लगाओ अब इसे रखें रहो नहीं नहीं अब कैसे रख सकते हैं वह चला रहे अनजाने में भी हम प्यार उससे कर रहे थे कौन से जो भगवान अंदर में थे जो भगवान का हंस है आज्ञा की धारा में हम जी रहे इसलिए समझ नहीं का रहे हमारा स्वरूप ही शांत है हमारा अखिलेश दे कोई अखिलेश ऊ नहीं सकता ए रहा है कोई अग्नि की ताकत नहीं जल सके अशोक से कोई व्यू की ताकत की सुख सके हमारा स्वरूप जो है वैसा है इसलिए नाम जाप करती हुई जहां जहां मां जाए वहां वहां भागवत भावना और या वहां वहां से मां हटाकर अपने प्रभु के नाम में लगाना दीर्घकाल ना निरंतर सत्कार से भी तो उधर भूमि ये दीर्घकाल तक निरंतर ऐसा अभ्यास किया जाए तो सिद्ध हो जाएगा दृढ़ भूमि फिर परमानंद के अनुभव होती है सही सही लागू सुन लीजिए गरुंजी से अपना अनुभव कहते हैं की कोई ऐसी यानी नहीं जहां मैं गया ना हो कोई ऐसा कर्म नहीं जो मैंने किया ना हो लेकिन सुखी एन भयो आज की राय आज जैसा मुझे सुख

भगवान की भक्ति में मिला वैसा कहानी नहीं मिला ये बड़े-बड़े महापुरुषों का है विश्वास करके चल दो तो क्या करना कुछ बदलना थोड़ी है वैसे रहो पत्नी पुत्र परिवार वैसे ही जो ड्यूटी कर रहे हैं वही ड्यूटी करो बस भावना बदलना है यह ड्यूटी भगवान की सेवा है यह परिवार भगवान का ही दिया हुआ कर्तव्य है तो हम उसका नीर पत्नी के साथ पति का कर्तव्य पुत्र के साथ पिता का कर्तव्य माता के साथ पुत्र का कर्तव्य अपनी-अपने कर्तव्य का निर्वाह रूपी पूजा करते हुए और नाम जब करो भगवान के सहारे रहो जो एक सिद्ध संत को गति होती वही आपकी गति है उदयराज चौधरी जी कानपुर से क्षेारगंज महाराज जी आपके श्री चरणों में कोटक दंडवत प्रणाम महाराज श्री जी विश्वविद्यालय में मैं सांसारिक शिक्षा हेतु प्रयासरत हूं वहां सभी साथिगवां विरोधी स्वभाव के हैं कृपया आप मार्गदर्शन करें की साथ रहते हुए भी सॉन्ग दोष के प्रभाव से किस प्रकार सुरक्षित रहा जाए यदि हमारा लक्ष्य दृढ़ है तो हमें कोई नहीं गिरा सकता जो रहीम उत्तम प्रकृति काकर्षाकत कुसंग चंदन

विश्व व्यापत नहीं लपटे रहे भजन अगर उत्तम विचार वाला करो या ना करो वैसे कोई मित्रता नहीं करता क्योंकि जो बात करने के लिए उनको चाहिए मसाला आपके पास नहीं होगा तो बात नहीं करेंगे अगर आप उनके अंगामी बनेंगे तो आपसे मित्रता रखेंगे अन्यथा तो हरि मित्र हुए हरि मित्र तो सब बात बन गई ऐसा मित्र ही क्या जो कूपर्ट मार्ग में चला देव तो शत्रु है मित्र की पहचान कुपथ निवार सुपांत छलावा जो हमें कुमार्ग से हटाकर सात मार्ग में स्थित कर दे उसे मित्र कहते हैं और जो सदा

चरणों से भ्रष्ट कर दें वो तो शत्रु होता मित्र आजकल मित्रता का भाव दिखाकर सतप्रुता की जाति है आज लगे इसी मित्रता में जो कुमार्ग्गामी प्रवृत्तियां को बढ़ावा दें तो इसलिए वैसे आपका भाव बहुत वंदनीय है की आप इस अवस्था में सावधान रहना चाहते पर है कठिन पे तुम्हें पता नहीं क्या यहां चल चली जा रही कौशल्या जी की दासी बन्ना पड़ेगा फिर वो दोबारा जब पेस हुई अपने रंग में उदास क्यों है बताना बस मैं तो आपके सॉन्ग आई हूं दासी बैंक तो मैं आपका सदा ही चाहती हूं पर एक ही बार बोला तो आपने साड़ी बात अगर दोबारा बोलूंगी तो आप बोलो ना तो मैं सत्य को साक्षी करके कहती हूं जहां राम का राजा विषय हुआ महाराज उनके अधीन है कौशल्या के आप रंग छोड़ने लगा और इतना रंग चड्ढा दिया महाराज के प्राण निकाल गए प्रभु का 14 वर्ष का बनवास हुआ पुरी अयोध्या महान दुख से युक्त हो गई नाम जाप किया जाए और बचाने की चेष्टा की जाए तो बच्चा जा सकता है राहुल जी मर्जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जैसी अपनापन शरीर का पारिवारिक जनों से है

वैसा श्रीजी और लालजी के प्रति नहीं हुआ इसे राज कहते हैं इसे मो कहते हैं यह विद्या आज्ञा के करण हुआ है जब यह विद्या नष्ट होगी तो राज रहित होंगे तब अनुराग का पद रोग भाव होता है चाहे वो आत्मृति हो या कृष्णर्ती हो जिसे हम भक्ति में कृष्णा कहते हैं वही ज्ञान में आत्मा है दूसरा कोई थोड़ी है पर ये रति तभी प्राप्त होगी पहले विरती आवे पहले राज रहित हो तो यह जो राज हुआ है यह ज्ञान के करण हुआ है और आज्ञा का नस करने के लिए ही तो साधु समागम होता है जिसे आज्ञा

कहते हैं उसे मो कहते हैं मुझे निर्विकार के अंदर अभाव पैदा हो गया मुझे यह भूख चाहिए मुझे यह भूख चाहिए यह भूख चाहिए जहां कहानी किन-किन मंत्र भाव नहीं है वह अभाव मुझे महसूस हो रहा है देव भाव को लेकर तो विवेक के द्वारा मो का नस करके फिर हम समझते इस राज से मुक्त हो सकते हैं बिन सत्संग विवेक ना ही राम कृपा बिन सुलम सोई हो विवेक मो ब्रह्मा का विवेक प्रकट हुआ मो आज्ञा राज जिसे कहते वो नष्ट हो जाता है जो सत्संग में सुनो उसे अपने आचरण में उतारो यह पक्का समझ लो की आज भी तुम प्रेम भगवान से ही कर रहे हो जी शरीर को तुम प्रिया मां रहे हो अपना या दूसरे का उसमें भी आत्म तत्व के प्रकाश के करण ही प्रियता है अगर वो अंतर्ध्यान हो जाए इस शरीर को नष्ट कर देते हैं अर्थात हम शरीर को प्यार नहीं करते हैं फिर भी हम मानते हैं की हम सभी को प्यार करते हैं हमारी बात समझ का रहे हो माता और पिता और कोई भी हो उसके अंदर से जब हमारे प्रभु अंत हो जाते हैं तो उसे शरीर को नष्ट कर देते हैं ऐसा नहीं की प्रभु चले गए उसमें भी

प्रभु है मुर्दे में भी प्रभु है प्रभु है वन के शरीर का मंथन हुआ दाहिनी भुज से भगवान पृथ्वी महारानी मुर्दे का मंथन हुआ अगर का दिया मडम भगवान नहीं तो कहो उसको कहां जहां प्रभु की फिर सर्वव्यापी प्रभु का फिर अनदर हो जाएगा वो हर जगह है कोई कान ऐसा नहीं जाना हो पर वो अंतरहीत हो गए तो इसलिए फिर उसे शरीर को नष्ट कर देते हैं अर्थात हम शरीर से प्यार नहीं करते आज भी आज्ञा के करण समझ नहीं का रहे हम प्रभु से प्यार करते हैं अगर जान करके प्यार करो प्रभु से तो अभी शुद्ध बुद्ध परमानंद में निबंध हो जाओगे सब प्रभु से प्यार करते हैं मेरी दृष्टि में साफ प्रभु में प्रभु से प्यार करते हैं पर वो समझ नहीं का रहा है समझने के लिए ही शास्त्र और सद्गुरु संत जान है यहां से याद कर लोट के आओ प्राण किस परी ग रहे हैं किसके प्रति ने आत्म तत्व से ही प्राण पर ग रहे हैं जब आत्म तत्व का परिचय हो जाएगा तो पुराने का भी मौका बताऊंगा गुरु अंदर ही बैठा हुआ है वो रास्ता बताता चला जाता है अपने आप से अपने आप को जाना जाता है किसी करण

से नहीं मां बुद्धि बात है इसके लिए नाम जाप करो अच्छा खानपान रखो और अच्छा संघ करो गंदे विचार गंदा चिंतन इसको कार्टून आचरण शुद्ध रखना नहीं तो फिर नहीं बनेगा गंगा स्नान किया ऊपर फिर गांधी धूल डाली कृष्णा के फिर बात नहीं बनेगी स्नान किया तो विद्युल से बचाना है अर्थात ये जो मेमे कम क्रोध आदि की ऐसी विचित्र आकर्षण में प्रेरणा है या भ्रष्ट हो जाति है उससे अपने को बचाना है और आप बच्चा सकते हैं क्योंकि आपने वो पावर है मां आपके ही पावर से आपका नस कर रहा है

आप उसको अनुमति दे देते हैं सहमति दे देते हैं हां कर देते ममता के मां की बात को अपने में मां लेते हैं की मेरी बात है मुझे भोगना है मुझे चीन है यही हर जाते हैं अगर आप यह देखें मां की चल है तो आप उसे पर शासन कर सकते हैं राधा गोविंद शर्मा जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम महाराज जी पिताजी का स्वर्गवास होने के बाद पारिवारिक पारीक जिम्मेदारियां बढ़ाने से नाम जाप के लिए बहुत कम समय दे का रहा हूं और महाराज जी मां में क्रोध अहंकार ईशा चल कपाट इन सब की उत्पत्ति ना हो और नाम जाप में निरंतर आए बेटी को पढ़ा लिखा कर ब्याह करना बेटे को पढ़ा लिखा कर कोई व्यापार नौकरी देनी है आए हुए अतीत का सत्कार करना है पूरे खर्च निवा उसके चिंतन में बहुत कुछ चला राहत है उसे चिंतन को प्रभु के नाम में जोड़ना बड़ा कठिन लगता है बस इसी कठिनता को यदि उलझा ले तुझे योगी की गति होती वही उसे गृहस्ती की गति होगी इतना अंतर नहीं पड़ेगा जो एक कम करो महात्मा निरंतर एक आंतरिक भजन में लगा हुआ उसको जो परम पद मिलता है वही परिवार का

पोषण करते हुए बच्चा रिश्ता नता अतिथि सबका करते हुए भी उसको परम पद की प्रताप होती है बस अभ्यास और आश्रय इन दो बटन पर ध्यान देना है जितना बुद्धि बाल भगवान के द्वारा हरि के शिवा कौन ऐसा है जो तुम्हारा साथ दे सकता है हमारे उनसे हरि निकाल जाए तो 100 हो जाएंगे ना मतलब हरि खास बात है परिवार पुत्र मित्र कोई भी हरि देखो है तो उसकी सत्ता है वो हरि नहीं है उसकी सत्य नहीं तो हम फिर जिनकी सताई नहीं उनसे क्यों आश्चर्य अंदर की बात है जैसे गजेंद्र ने लिया हर गया

द्रोपदी जी ने लिया हर गए कोई बाल नहीं रहा अगर वह अस्त्र सत्संग के द्वारा प्राप्त विवेक से हमारे हृदय में जागृत हो जाए या किसी ऐसी स्थिति से भगवान का भगवान के चरणारविंद का श्री लिए बिना भजन नहीं हो सकता क्योंकि देखो ना एक क्षण छोड़ो तो मां कितनी जैसे बंदर दाल पर दाल शाखा पे शाखा भगत घूमता है ऐसे घूम रहा है अपने मां को देखो अपनी इंद्रियों को देखो भगवान का पहले सबसे पहले कार्य आश्रय बड़ी कृपा है जो आप सत्संग सुन रहे हो बड़ी कृपा है जो आप अपना समाधान

छह रहे हो भजन का एक कृपा है उनकी कृपा ठाकुर जी की है इसका मतलब मेरा कल्याण होना दुर्लभ नहीं क्योंकि अगर प्रभु ने कृपा एन की होती तो साधु समागम साधु संगति हो रही तो हमारा हिट होना नहीं तो ऐसा सौभाग्य कैसे मिलता है कैसे आचरण अंदर से मैं जानता नहीं हूं आपको पर जो कोई भी हो तो मैं आपका क्योंकि अनंत महिमा भयभीत हो गए हमें लगता है बाली ने स्वयं तो आने शक्ति ऋषि मुख पर्वत पर तो यह राजकुमारों को भेजो है और ये इनकी भुजाएं देखकर लगता है मुझे मार डालेंगे क्योंकि महाबल साल स्वरूप समुद्र सिंह घबरा गया हनुमान जी महाराज से कहा तुम पता लगा के हो अगर ये ऐसे ही वन विचारण करने के लिए आए तो मैं इनके चरण पकड़ लूंगा क्योंकि बहुत बलशाली नजर ए रहे हैं और अगर ये बाली के द्वारा जीत सकता दूर से देख के हनुमान जी गए और भगवान को परिचय देकर कंधे पर बैठाल खिलाएं हम जो बताना चाहते हो देखना जो हनुमान जी ने कहा है अयोध्या नरेश चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ खिलाड़ी लता है हनुमान जी महाराज ने भगवान से कहा की बहुत दुखी हैं

बहुत मारा है ये तो वो बस प्राण नहीं लिया है प्रभु आप निर्भय कर दो सुरगी ने अपनी बात बताई किस करण से ऐसा पुरी बात भगवान अग्नि को साक्षी करके भगवान ने इस समय मित्रता स्वीकार के आज से मैं तुम्हारा मित्र प्रभु बाली बहुत बलवान है शायद आप जानते हो भगवान ने कहा की तुम कैसे विश्वास करोगे की मैं बाली पर विजय प्राप्त कर सकता हूं बोले लाल के लगातार वृक्ष खड़े वो आगे ढूंढ रक्षा की हड्डियां हैं अगर एक बार में आप इतने सब लाल के वृक्ष बिंदु विरक्ष के हड्डियों को भेज डॉग तो मैं जान जाऊंगा की आप बाली को मार दूंगा आप जैसा मित्र मिल गया स्वामी आप समझ रहे हैं सुग्रीव कभी आपके सामने भी ए सकता है वह आज ललकार रहा है क्यों क्योंकि भगवान उसके साथ हो गए तो उनका पागल हो तुम भगवान सुंदर से मुझे क्यों मारेंगे मैंने उनको बेर तो किया सुग्रीव के जी हुई घूस का पर किया ट्रे में बोलो थे क्योंकि महा बलशाली 6 महीना काक में रावण को दबे रखा बाली में में जो बात हम कहना चाहते हो उसे समझना भगवान ने दिखा दिया की तेरे में समर्थ

नहीं सुग्रीव वो भाग पड़े आए बोले रूप पिटवा दिया ना नस-नस दर्द कर रही इतना मारा है बोले हम क्या करें तुम दोनों एक रूप थे एक रूप ही समझे में नहीं ए रहा था कौन सुरगी और कौन बाली अच्छा ये माला हमारा पेन और स्पर्श करके साड़ी पीड़ा आप जो पहले में दर्शाया की तू स्मृति एन ऐसा समझ अब मेरी समर्थ का चलो अब तो सिंघवत महान बलशाली सुग्रीव और भगवान ने एक बार वाले को मूर्छित होकर गिरा फिर चेतन आए तो सामने देखा नो किशोर अवस्था प्रभु करण स्वामी आप तो सारे जगत के मलिक हो आपने ऐसा क्यों किया मैं बचपन से देख रहा हूं तो आपने उसका पक्ष ले लिया जैसा मैं वैसा वो आचरण हमारे बराबर दोनों भाइयों के ऐसे ही रहे हैं तो मुझे क्यों मारा उसका पक्ष की खास बात कोई साधना की बात नहीं है आश्रय ले लिया भगवान ने कहा मेरा इसने आश्रय ले लिया और जो मेरी शरण में हो जाता है शरणागत का मित्र मेरा मित्र शरणागत का दुश्मन मेरा दुश्मन कोई पहले शब्द गृष्टि में संसार में रहते हुए भागवत प्रताप का उपाय भागवत आप से भगवान की अंदर से शरण और

दूसरी बात अभ्यास जो मां हमारा संसार का चिंतन कर रहा है उसे मां में इतनी समर्थ है की वो दो बातें एक साथ कर सकता है और ऐसा नहीं की यह नाम जाप में नहीं ग रहा है नहीं तो अगर ना लगे तो वाक्यंदरी बोली नहीं पाएगी मां के सहयोग से इंद्री कम करती है और वाकिंदरी तो बोल रही राधा राधा और अवसर लगा के विषय चिंतन कर रहा है मुझे बिल्कुल डरना नहीं चाहिए अब उसका विषय चिंतन हमारे ऊपर प्रभाव नहीं दाल पाएगा पर हमको जब हिलानी पड़ेगी और वो वक्त वो गाडियां या जीव भाग्य वर्तते नाम तो व्यायाम सिद्ध पुरुष का स्वाभाविक होता है सड़क को अभ्यास करना पड़ता है राधा राधा राधा हमने तो कहा की 10 मिनट में एक एक बार का अभ्यास बना लो लगा तो पड़ेगा 10 मिनट में एक बार बोलो राधा जितनी डर जागते उसमें 11वां मिनट ना होने पाव और आप फिर कुछ दिन बाद बताना की आपको बजट कितना होता है क्योंकि हर दिन आप 10 मिनट में उसको चिंता होने लगेगी क्या बोलना है राधा कई मिनट हो गए क्योंकि राधा बोलना है कितनी बार वो स्मरण करेगा राधा राधा हमको उसको

फसाना है और एक दिन सच्ची मानिए सब कम करते हुए भजन कर लगा क्योंकि जीभ्य का कम है हिल हिल करके नाम जाप करना और अंगों से चेष्टाएं करते रहना यह मां बड़ा ताकतवर है यह करवा लगा यह बहुत ताकतवर है बहुत साक्षात भगवान का स्वरूप भी है इंद्रियां मनुष्य भगवान कहते हैं तो इतना हमने उसको छठ दे दी इसलिए भजन नहीं कर रहा नहीं भजन करते हुए सब कम हो सकता है जब भगवान करें युद्ध जैसा कार्य मेरा स्मरण करते हुए कल खेती व्यापार नौकरी लगे हो कार्य में तो घंटा तो घंटा कभी तो अलग हुई ना उससे जब अलग हुए तो राधा फिर घंटा दो घंटा फिर राधा और जितना समय लगाया संसार के कार्यों को भगवान को समर्पित कर दो कृष्णा और पूनम वास्तु इतने बजे से इतने बजे तक जो भागवत प्रताप कर देगा आपको समझ का रहे हो किसी करो चाहे व्यापार करो चाहे नौकरी करो भगवान को अर्पित वो कार्य करते रहो और बीच-बीच में नाम जपने का अभ्यास पर यह तभी कर सकते हो जब मांस नहीं खाओगे शराब नहीं पियोगे परिस्तरी गण नहीं करोगे गांधी बटन से बचोगे तब कर सकते हो नहीं केवल सुन

लो कर नहीं पाओगे गंदे आचरण करने वाला कभी अध्यात्म की चेष्टा नहीं कर सकता वो बकवास केवल होती है पवित्रता चाहिए ना अंतकरण की पवित्रता शरीर की पवित्रता आपके विचार पवन तब तो यह पवन मार्ग है तभी तो परम पवित्र भगवान का भजन कर पाओगे अनुभूति कर पाओगे अब गंदे गंदे भजन करो गंदे गंदे दृश्य देखो गंदी-गंदी विचारधारा है और सोचो की भजन शंकर से स्वभाव भजन मूर्तियां अच्छे आचरण करो भगवान की अष्ट्रों नाम जाप करो जो गति एक मनी को मिलती है वही गति आपको मिलेगी क्योंकि

भगवान के दो मार गए प्रवृत्ति एक निवृत्ति तो निवृत्ति है ये मार्ग अप्रवती है आपका मां कितना बड़ा मार्ग है कर रोटी बनाई एक रोटी निकाल ले उससे गे को दे दी कौवा को चिड़ियों को दे दी कोई साधु महात्मा मुंह खाया खवाद इस से भागवत प्रताप का योग बने लगेगा जितने भी संत प्रगति हुए गृहस्ती से ही आए माता पिता तो गृहस्ती थे ना भरण पोषण गृष्टि से हुआ है वस्त्र आदि गृहस्ती से जिसका अन्य लगाएं स्तन में जिसका वस्त्र पहन रहे हैं हम जो हमें भिक्षा दे रहा है क्या उसका

कल्याण नहीं होगा अगर वह स्वयं थोड़ा भजन कर लेट है और ऐसे सत्कार करता है तो बढ़कर के है वो आगे की गति को प्राप्त करेगा वो अपना उदार पोषण करता है सन्यासी परमहंस विकटों का भरण पोषण करता है अन्य जीवन का भरण पोषण करता है और जितना बंता है नाम जाप करता है वो महात्मा ही है अब विचार करो और सब बंदे आचरण करो तो वो कोई भी करें तो दंड तो मिलेगा ना बहुत बढ़िया गृष्टि मार्ग में भागवत प्रताप हो शक्ति भागवत पवित्र हर अतिथि सेवा समाज सेवा नाम जाप निश्चित भगवान की प्रताप हो जाएगी ए ए

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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