॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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मनोकामना पूर्ति के लिए मंदिर मे सोना-चाँदी, उपहार चढ़ाना ठीक है या नहीं ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अमन शर्मा जी राजस्थान से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम गुरुदेव मनोकामना पूर्ति के लिए देवी-देवताओं के मंदिर में सोनी चांदी के छात्र उपहार सवामणि करना आदि ठीक है या नहीं महाराज जी कृपया मार्गदर्शन करें की प्रभु की दी हुई सब वास्तु है प्रभु की सेवा में जो अर्पित की जा रही है उत्तम भाव ही है कामना से हो या निष्काम भाव से हो किसी भी तरह से जितने भी देवी देवता है सब सच्चिदानंद प्रभु ही बने हुए दूसरा कोई नहीं किसी भी

भाव से जुड़े भगवान ने आरती के लिए कोई संपत्ति प्रताप के लिए कोई भगवान को जन के लिए कोई भगवान में अवैध भाव से स्थित परमानंद का अनुभव कर रहे कर प्रकार के भक्ति बताएं तो अगर कोई किसी भी देवी देवता को स्वामी मां करके छात्र चमार भोग राज फूल बांग्ला पोशाक ौभाग्य धन्यवाद चल कपाट द्वारा चोरी द्वारा तो नहीं कर रहा है ऐसा ही करना धीरे-धीरे उसको निष्कामता के मार्ग में ले आएगा क्योंकि सत्य नहीं है सब कोई देहब हिमानी वृत्ति से सा कामता में ही विचारण करता है कोई बिरला ही ऐसा होता है स्वरूप दिशा करके अच्छा स्थिति में स्थित हो जाए इसलिए कोई उसमें निषेधात्मक भाव तो है ही नहीं पर हां अपने धर्म की कमाई से मेहनत के द्वारा जो शास्त्र विरुद्ध आचरण करके पापा चरण से कमाई की गई उसको देवी-देवता स्वीकार नहीं करते क्योंकि वो सब सातों तत्व में सत्य तत्वों में स्थित है और ये तामसिक राक्षसी व्यक्ति द्वारा कमाया गया दान वो आप मैन की सेवा है लेकिन सेवा नहीं है वो अर्पित नहीं है क्योंकि देवी देवता सब भागवत स्वरूप हैं और

वहां भाव की प्रधानता होती है आपने जो शर्म समर्पित कर रहे हैं धन्यवाद से की है प्रभु या है मां या किसी भी जो आपने आराध्यमाना है आपकी कृपा से ये जो मिला है वो आपको समर्पित कर रहे हैं आपकी सेवा में यह भाव तो ए गया लेकिन अगर धर्म आचरण करें पापा आचरण करें फिर सोच की ऐसा वो पवित्र नहीं करेगा वह माना नहीं जाएगा आपका सत्य वृद्धि द्वारा कमाया हुआ जो धन है संपत्ति है वो कभी सद्भाव प्रकट नहीं कर सकता है इसलिए जो अपने धर्म की कमाई से ऐसा करते हैं वह प्रणाम योग्य हैं भले कामना से करते हैं क्योंकि जरूर से चाहते हैं ना तो प्रभु कामना भी पूर्ति करते हैं और निष्कामता का ज्ञान भी दे देते हैं जैसे जैसे प्रभु प्रसाद जो आपको मिला है तो आपके अंदर उससे वैराग उत्पन्न होगा वो स्वयं ज्ञान देते हैं जैसे गार्डन जी महाराज पत्नी प्रताप के लिए भगवान की तपस्या की 10000 वर्ष भगवान प्रकट हुए उन्होंने मांगा मुझे मेरे अनुरूप पत्नी मिले देवभूत जी प्राप्त हुई उनको और यह नहीं मांगा की आपकी प्रताप हो और भगवान स्वयं अपनी तरफ

से कपिल भगवान के रूप में उतरी तो कर उनको शंकर योग का ज्ञान दिया परम पद्म्य अरुण होने का मार्ग दिया तो ऐसे ही जो भगवान से मांगता है तो उसके साथ भगवान की करुणा होती है जिसके उसके अंदर ज्ञान विज्ञान का प्रकाश होता है भगवान से किसी भी भाव से जुड़े देखो जो भगवान को अपने स्तन में जहर लगाकर करने के उद्देश्य गई उसको परम पद मिला अगर भगवान को प्यार से दूध पायलट हैं तो द्वेष क्रोध हिंसा वृत्ति लेकर गई थी उसे जो यशोदा मैया को गति वही भगवान ने पटना को गति थी शीशपाल गली वक्त था जैसे वेद का स्तोत्र गाने वाले निरंतर मनन करने वाले मुनियों की परम गति वैश्यपाल की गति है अगस्त्य भगवान के पीड़ा पहचाने के भाव से गए उनका परम पद मिला तो जो स्वर्ण का आभूषण या जो भावना अनुसार अर्पित करते हैं भले सा कम से तो क्या उनका पाटन हो जाएगा क्या नहीं किसी भी तरह से भगवान से जुड़ना प्रभु से जुड़ना मा मंगलमय भगवान मंगल भवन है और जितने देवी देवता हैं यह सब भगवान ही बने हुए हैं यदि यह भाव ए जाए की स्वयं भगवान है निश्चित कल्याण

हो पर जब हमको एक सीमित शक्ति के अंतर्गत देखते हैं कोई देवता है ना उसकी एक सीमित सीमाएं शक्ति की वो लोकपाल है तो उसकी उतनी समर्थ थे लेकिन भगवान महेश्वर है अनंत समर्थ साले तो जब सीमित भाव करके किसी देवता का आयोजन करोगे तो तुम्हारी तपस्या या तुम्हारी सेवा के अनुसार ही पाल मिलेगा जैसे व्यापारी की दुकान में जो ₹100 हैं तो आपको उतना ही मिलेगा ऐसे देवी देवताओं के द्वारा जो दिया जाता है वो निहित शक्ति क्योंकि आपने उनको भगवान नहीं माना अगर साक्षात भगवान ले जब कुत्ते में भागवत साक्षात्कार कर लिया नामदेव जी ने तो फिर किसी भी देवी देवता में जो भी है और सच्चिदानंद भगवान है बस फिर वो काली ही कृष्णा दिखाई देने लगेंगे शाम में वही विराजमान है तो किसी भी भाव से हम भागवत भाव में जुड़े की साक्षात प्रभु ही जितना भी चला चल रूप है कहानी एक जगह मां ले जाएगी चकांता या निष्कामता निष्कामता ऐसे नहीं आई है जब तक आज्ञा राहत है तो कामना रहती है दया अभिमानी की कामना बनी ही रहती है ये आज्ञा गुरु कृपा से नष्ट होता है जब

शास्त्र स्वाध्याय गुरुजनों की आजा में रहना गुरु प्रदत नाम मंत्र उपदेश के अनुसार चलना तो अहंकार धीरे-धीरे उनके चरणों में समर्पित हो जाता है जहां अहंकार समर्पित हुआ तो तन वाणी चिंतन सब बदलने लगता है फिर जो आनंद की अनुभूति होती है इस में निष्काम ता आई है निज सुखविन मां ही की तेरा जब तक आत्मानंद का भाग्यदानंद का अनुभव नहीं होता तब तक निष्ठा वाणी से भले बबली जाए भागवत प्रेम नहीं होता तब तक कामना पिंड नहीं छोड़ती तो उसको अपना को जोड़ दो पूरा करें की ना

करें अगर पूरा करते हैं समझ गया

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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