हमें धन, नौकरी, सुख-संपत्ति चाहिए, ऐसी बातें दूसरे लोगों से क्यों नहीं करनी चाहिए ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
कृष्णा वेरिएबल जी कोलकाता से फर्जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी हमें अपने भौतिक इच्छाओं की बातें दूसरे लोगों से क्यों नहीं करना चाहिए आज की त्याग की चर्चा से प्रश्न आया है क्योंकि उसकी सत्ता दृढ़ होती है तो यह आगमन पी अगर इनको हम बार-बार चिंतन करेंगे इनकी वार्ता करेंगे तो हमारा हृदय इनमें आसक्त हो जाएगा इनमें महत्व बुद्धि हो जाएगी इनकी सत्ता दृढ़ लगेगी और यही हमारा नस है यही हमारा पाटन है विषयों का चिंतन विषयों का भोग विश्वरता विषय लाल सा यही हमारी बार-बार जन्म और मृत्यु का करण दुर्गति का करण यही है इसीलिए इनकी ना तो वार्ता करनी वार्ता करनी है परस्पर मेरी वार्ता करो तुम्हारी वाणी पवित्र हो जाएगी अगर आपको भोग चाहिए तो जो भोग प्रभु को समर्पित किया जाते हैं प्रसाद बनाकर उनका सेवन करो धर्म युक्त धर्म की सीमा के अंतर्गत तो वो किसी से खाने की जरूर नहीं है भगवान से भी मांगने की जरूर नहीं क्यों क्योंकि भगवान से हम सत्य वास्तु मांगे की भोग मांगे एक जैसे गरीब आदमी है वह किसी
चक्रवर्ती सम्राट के पास जाए उससे कहा जाए तुम्हारी जो इच्छा मांग लो 1 साल का भैंस गे का चार दे दो 1 साल की रोटी की व्यवस्था कर दो भाई यह नहीं समझ रहा की चक्रवर्ती सम्राट अगर वो ये बोल दे की आपको जो भावेश दे दो तो इतना दे देगा की तुम जीवन भर का नहीं पाओगे ऐसे ही हमारे भगवान सुख समुद्र हैं ज्ञान समुद्र है हम अज्ञानी जी पता नहीं क्या मांगे उसकी सत्ता नहीं जो हम मांगेंगे तो मनी के ऊपर छोड़ देते हैं की प्रभु आप जैसे प्रश्न हो और जो प्रसाद आप दीजिए तो फिर हम मांगे वो करेंगे हम तो उनके आश्रित होकर दूसरों से जब हम विषय वार्ता करते हैं तो उसकी सत्ता दृढ़ होती समझ में ए रही आपकी अगर भजन नहीं करते तो क्या समझ में ए गया अध्यात्म वार्ता है हम अंदर से समझते हैं की मेरी इंद्रियों की कमजोरी है निकाल जाओगे और उनकी सत्ता दे दी हर्षित होकर भिगे तो अनंत जन्म हो गए उन्हें भोगो को भगते हुए माया की एक बड़ी शक्ति है जिसका नाम है विस्मृति करना परसों आप मतदान में क्या पे थे पिछले जन्म में आपके क्या थे देखो उसका
कम माया का कम है विस्मृति करना मतलब बार-बार मां के गर्भ में भयंकर दुख भिगे हैं बार-बार नाना प्रकार की भोग वासनाओं में हम दंड भोग है लेकिन विस्मृति है सबकी संसार की सुखद दुखद घटनाओं की कोई ऐसी स्मृति इस जन्म की बड़ी वाली हां हां ऐसा नहीं तो तात्कालिक पूछा जाए तो हमारी जितनी स्मृति वो सब धूल दूसरी करती जाति माया और भक्ति का क्या कार्य है स्मृति प्रधान करना सत्य वास्तु की स्मृति इससे संपूर्ण गीता सुनने के बाद से अर्जुन जी का रहे हैं नष्टों मा स्मृति
मटका भाया का कम विस्मृति तो आपको लगता है की अगर मैं भोग लूं ये वस्तुएं हूं मैं इनका स्वामी हूं तो मैं सुखी हो जाऊं कितने वर्ष कितने दिन जब हमारी मृत्यु वाणी ही है शरीर छटना ही है तो हमें वो वास्तु प्राप्त करनी है जो सनातन हो जो नित्य हो और जहां दुख का ली ना हो वह भगवान का नाम वी धर्म के आचरण और भगवान की भक्ति युक्त जीवन यह मैंगो इसके लिए कभी कोई रॉक नहीं है हां चलो अगर सांसारिक बात भी मंगनी है तो सांसारिक पुरुष ने भगवान से कहो और उनको छूट दे दो की उचित लगे तो दे देना मेरी मांग यह है अगर मैं फसून नष्ट हो जो तो मेरे मांगने पर भी मुझे मत देना भक्तों की जो भावनाएं होती हैं भगवान ने उनको भी अपना ही माना है जो अर्थात ही है जो आरती पर ज्ञानी को अपनी आत्मा कहा है अर्थात मैं ही ज्ञानी ज्ञान आपको समझ में ए रही है की किसी से खाने की क्या जरूर है ना तो इनकी सत्ता दृढ़ होती है ऐसे नहीं मेरी सताई नहीं अब तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता राधा राधा वो स्पिरिट होगा जलाएगा खत्म हो जाएगा फिर पुरी होगा अब उससे
कम चलाएगा फिर खत्म हो जाएगा फिर फ्री होगा फिर और कम जलाए एक दिन आएगा की श्रीति नहीं होगा इंद्रियां और मां यह मदद कर देते हैं व्याकुल कर देते हैं और हमारे को पता नहीं है इसे कैसे अटना है मां और इंद्रियों में तादाद में तुम भोगो में शांति के लिए उतार जाते हैं और भगवान ने कहा त्याग शांति अंतर और हम समझते होगा जानते तो भोग से क्या हुआ और वासना तृष्णा बढ़ हम गिरते चले जाते हैं इसलिए कहा गया की आप अपनी इच्छाओं को दमन कीजिए ना की इच्छाओं को प्रकाशित कीजिए अच्छा जैसे-जैसे आप इनको सत्य माने लगेंगे तो फिर दुख भी सत्य हो गया नरक भी सत्य हो गया पापा चरण भी सत्य हो गए वो तुम्हें भोगनी पढ़ेंगे बिल्कुल आप यह समझो की आप जैसा सोचोगे वैसा बन जाओगे जैसा सोचोगे वैसा दिखाई देने लगेंगे जादू का तमाशा है भगवान की माया का ऐसा जादू है तुम जैसा सोचोगे वैसे तो मैं अनुभव में आने लगेगा और जैसा तुम्हारा भाव होगा वैसे ही तुम्हें दृष्टि प्राप्त हो जाएगी जैसे कम ही पुरुष है और उसकी दृष्टि जब किसी को भी देखें अपनी
कामना सीखने देखेगा निष्कामी पुरुष है वो अपनी भाव से और जो भगवान का प्रेमी है वह सर्वत्र भगवान देख रहा नहीं देख जड़चेतन जगजीव जाट सकल राम सिया राम में सब जग जानी चित-चित लक्षण हम जैसा यह यथा मैं प्रपत्य ताश कटाई भजम में अगर आप भगवान को विषय मानकर भजोगे तो विषय दिखाई देगा ब्रह्ममन दिखाई देगा है वही दूसरा नहीं जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत अच्छी एक ही भगवान कंस के रंगमंच पर पधार रहे लेकिन अलग-अलग सब को दिखाई दे रहे एक ही राम जी जनक जी चौहान मंच पर विराजमान सबको अलग-अलग दर्शन तो भगवान का अलग-अलग दर्शन भाव दृष्टि के अनुसार जैसी हमारी वासना होगी तो हमारी वासना गांधी है शरीर भाव है भोग में सत्यता सुख बुद्धि है इसलिए माना किया जाता है की आप अपनी इस बात को समझो अगर इनको आप नित्यमनों को इनको सच्चा मनोज तो इसी में फसी रहोगे कभी निकाल नहीं पाओगे ये भूत के लड्डू हैं ना खाएं तो परेशान खाए तो परेशान बुलवाए ना ले ना खाए तो ललचाए प्यार कितना बढ़िया और खाए तो कभी तृप्ति नहीं भूत के लड्डू है हां तो एक भूत
लगाओ बड़ा समस्या है अब यह आध्यात्मिक बिना भजन के इसका रहस्य समझ में नहीं आता है सत्य मार्ग का अवलोकन सत्यव्रत हेतु भगवान की कृपा है की आप यहां सुनने आए हो यहां बैठे शास्त्रों के वाक्य और संत जो भागवत अनुराग जी उनका सत्संग बड़े दुर्लभ है अगर आप ही जाए तो कुछ ले नहीं पाते तारक भी तारक देह विमान और अगर पकड़ ली पर अगमियों दुर्गम हो अगर आप उनकी बात समझ गए निश्चित आप परमानंद में डब जाएंगे देखो जब पारसमणी मिल गई तो 100 200 ग्राम सोनी की कोई बात र जाति है क्या पहाड़ बना लो पुरी सृष्टि बनाने वाला प्रभु अगर मिल जाए तो आपके पास कमी क्या र जाएगी तो हम घाटे में हो जाते हैं जब प्रभु से कहते हैं की हमको ये वास्तु दे दो ये पदार्थ दे दो तुम घाटे में हो जाते हैं जब 10000 वर्ष तपस्या की शिखर धवन जी ने भगवान प्रश्न भगवान ने कहा क्या आपकी इच्छा है तो उन गांव में पत्नी चाहिए तो भगवान के आंसू ए गए इस से बिंदु सर बना भागवत में पढ़ कर देखना बिंदु सरकार जो प्रादुर्भाव हुआ भगवान के अश्व से हुआ गजब है मेरी प्रताप
के बाद भी है तब कहा की ठीक है आपने पत्नी के लिए मेरी आराधना की तो विश्व सुंदरी और परम पवन करने वाली महाराज मां और शतरूपा से प्रगति देवभूति नाम की कुमारी आएंगे और तुम्हारा वर्णन करेगी और फिर आगे वाली बात स्वयं का रहे हैं की मैं स्वयं पुत्र रूप में आऊंगा और तुम्हें उपदेश करके तुम्हारा उधर करूंगा देखो भगवान के लिए कामना जो भगवान से की गई तो भगवान ने अपने आप ठेका उधर का भी ले लिया और कपिल भगवान के रूप में अवतरित होकर शंकर योग्य प्रकृति और परमात्मा का
बड़ा सुंदर उपदेश करके किसी गार्डन जी को परम पद प्रधान किया तो अगर हम कोई चाय भी करें तो भगवान से करें और भगवान के ऊपर छोड़ दें तो छह के साथ जिसे संख्या जहर है तो मा जाएगा उससे शोध कर अन्य औषधीय से मिला के देता है तो रोग निवारण ऐसे विषय में मार देगा और वही विषय जब भागवत अर्पित प्रसाद हो जाता है तो प्रसाद सर्व दुख का नाम महानिदेशक रहते इसलिए रोकने हैं की असत वास्तु की सत्ता को दृढ़ मत करो ना तो विद्यापी भाव ना भाव विधि सेटा समझ का रहे हैं
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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