एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #317 · 23 सितंबर 2023
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
महाराज जी स्वास्थ का ध्यान रखना हां आप श्री जी के हवाले है जैसे तो ये श्री जी के बल से चल रहा है जब तक चल रहा है लाभ ले लो होता है ना हवा आई है लाभ ले लो कृपा की हवा आई है नहीं तो स्वार्थ में फंसाने वाले बहुत मिल सकते हैं। लेकिन प्रिया लाल के चरणों में मन फंसाने वाले तो बहुत कम होते हैं। श्री जी ने कृपा की है अवसर है। अभी लाभ उठा लो। जो उपदेश मिल रहे हैं जो मार्ग मिला है खूब चलो। जीवन का कोई ठिकाना नहीं। कब शांत हो जाए इसका कोई नहीं। कब शाम हो जाए जीवन की कोई भरोसा नहीं।
राधा राधा हर समय जपो श्री राधा अपने कर्तव्य को भगवान को साक्षी करके पूजा मान के कर दो और नाम जप बीचबीच में और कोई भी हमसे ऐसा कर्म ना हो पावे जो हम जिस ऊंचाई पर चढ़ रहे हैं हमें गिरा दे जैसे हमें मानव देह मिली ना अब इससे बड़ा कोई लाभ नहीं है भारत की सेवा मिली जन समाज की सेवा मिली बड़े-बड़े संत एकांतिक गुफा में भी भजन करने के बाद समाज सेवा में आना पड़ेगा आपको क्योंकि समाज का शरीर है। समाज का अन्न खाया है। आपको तो समाज सेवा मिल गई। तो इसलिए उसे जैसे अपने परिवार के लोगों से हम बर्ताव करते हैं।
हम हमारे विचार ऐसे बढ़े कि जितना अधिकार हमारा सेवा का है उसको हम परिवार जैसा। जैसे कोई गलत करता है तो अपने परिवार में थप्पड़ नहीं मारते। तो दंड देना भी दुलार ही है। अगर अधर्माचरण करने वाला है और उसको हम दंड देते हैं तो मानो हम पूजा कर रहे हैं भगवान की और जो धर्म आचरण करते हैं उनका सपोर्ट करें। उनको सहयोग करें। यही आपके लिए पूजा हो जाएगी। यही भगवत प्राप्ति का हेतु हो जाए। और यात्रा मार्ग से पिछले कुछ दिनों से महाराज जी का स्वास्थ खराब है तो तीन दिन से वृंदावन वास किया है।
जानकी जी सरकार के आदेश अनुसार ये कच्छ फल है जब भगवान विष्णु ने कच्छ का अवतार लिया था तब वृक्ष को स्पर्श किया था ये दुर्लभ प्रजाति का बीज है जो कालीग्राम की तरफ पूजित है और आज भी इसे कच्छ के रूप में पूजा जाता है उत्तम स्वास्थ के लिए जी श्रीनाथ जी द्वारा जय श्री वल्लभा [गाना गाने की आवाज़] की जय श्रीमने महारानी की जय राधे रानी की सेवा की बोल श्री गिरराज धरण की जय बोल श्री राधे [गाना गाने की आवाज़] पूछड़ी के ल की फू प्यारे [गाना गाने की आवाज़] ब्रजराज खमा बड़ी मौज है तेरे दरबार [गाना गाने की आवाज़] में चक है चक्र सुदर्शन धारी तेरा भरोसा भारी शरण गिरधारी लाज हमारी गिरराज शिखर पे खबर लो हमारी माथे पे तेरा हर नखरा आ गए तेरे गन के बजरा ले आ गए बजरा ब्रजराज खमा राधे रानी की जय हो बरसाने वाली की जय हो धारी की जय हो रंगी सरकार की जय हो जुगल जोड़ी सरकार की जय हो कृष्ण राधे की जय हो कृष्ण सुदामा की जय हो आज के आनंद की जय ये भगवत पार्षद है।
हां वेद भी इनके वचन के सामने लघु है। ये भगवत पार्षद जय हो मेरी लाडली क्या जी आपकी आज्ञा हो तो मैं दो शब्द आपके लिए बोलूं। बोल बोलो क्या आप ही मेरे मथुरा काशी आप मेरे बृज धाम आप ही मेरी राधा रानी आप मेरे घनश्याम प्रणाम आपकी लाडली कैसे बनो हमारी लाडली का नाम जप करो और माता-पिता की आज्ञा में रहो ठीक है तो आप हमें जान जाएंगे कि आप हमारे हृदयस्त जो लाडली हैं वैसे ही आप लाडली हो जाओ माता-पिता की आज्ञा में रहो राधा राधा नाम जप करो जैसी माता पिता आज्ञा करें तो आप अच्छे हो जाओ।
ठीक है? जय जब से देखा है आपको दूसरा अच्छा नहीं लगता। हां राधा राधा जपो तो आप हमको असलियत में देख पाओगे। अभी आप हमारे बाहरी पांच भौतिक शरीर को देख रहे हैं। जो हमारा स्वरूप है वो राधा नाम से ही प्रकाशित होगा। मीना त्रिपाठी जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी जब से यह मनुष्य शरीर मिला है तब से ईश्वर में सदैव आस्था बनी रही। परंतु इस जीवन में बहुत सारे दुख आए महाराज जी और पति भी छोड़ के चले गए। दुख दुखालय में रह के दुख नाली के किनारे रहे दुर्गंध ना आवे।
बोले बहुत दुर्गंध नाली के किनारे रहे तो दुर्गंध आएगी ना। इसका नाम क्या है? दुखालय। बोले बहुत लोग हमारे परिवार के मर गए तो नाम क्या है? मृत्यु लोक। नाम है इसका नाम मृत्यु लोक है। इसका नाम भगवान ने दुखालय रखा है। तो आए हो दुख की बाजार में तो दुख ही तो मिलेगा। सुख का भ्रम है। केवल दुख है। सुख का रूप लेकर के दुख आता है। ऐसे गले लगाओगे क्या? दुख को गले कोई लगाता है। जब सुख की लेवल में दुख आता है और गले लगाते हैं। जब परिणाम में पता चलता है दुख तो लगता है यार यह भी दुख था।
यह भी दुख था। सब दुख था। तो दुख वाली तो बातें ही छोड़ो। कुछ दुख है नहीं है क्या दुख है सबसे बड़ा दुख है कि हमारी स्वास बेकार जा रही नाम नहीं जप पा रहे इसके लिए रो और क्या दुख है अरे जी रहे हो खा रहे हो पी रहे हो ऑक्सीजन ले रहे हो अभी ठाकुर ऑक्सीजन बंद कर दे तो सिलेंडर रखा मिलेगा बगल में नहीं सूंघना मुश्किल हो जाएगा स्वास लेना वो तो कृपा की है ना हर चर हर तरह से तुम्हें वो यहां की सुविधा दी है लेकिन सब है दुखमय यहां की हर सुविधा दुखमय पहले समझ लो ऊपर लगी मेले की लेवल सुख की लेकिन है दुख में।
अब यहां एक काम करने के लिए हम केवल आए हैं। हर श्वास राधा राधा राधा ये नहीं है तो भारी दुख है। कहे हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जो तो सुमिरन भजन अब उसकी तो वार्ता ही नहीं है। बहुत दुख पाए तो भैया है ही यही दुकाल में दुख। अब पुस्तकालय में जाओ। बोले आधा किलो जरा दूध वाली बर्फी देना। तो लोग तुम्हारी तरफ देखेंगे कि नहीं देखेंगे? ए पढ़े लिखे हो। बोले हां बोले लिखा क्या है लेबल में? पुस्तकालय मांग क्या रहे हो जाओ भैया मिष्ठान भंडार में जाओ आप ऐसे ही भगवान ने लेबल लगा दी है दुखालयम अशाश्वत मांग क्या रहे हो सुख तो हंसने की बात है दुखालय में जन्म लिया है तुम सुख चाहते हो हां एक उपाय है जिन्होंने इसको दुखालय बनाया अगर उनका भजन करोगे तो यह भी सुखमय हो जाएगा ये भी तुम्हारे लिए सुखमय दसों दिशाएं सुखमय हो जाएंगी एकमात्र भगवान का भरोसा करके नाम जप करो सुमिर पवन सुत पावन नाम अपने बस कर राखेरा कर तुम अकर्तम अन्यथा कर तुम भगवान तुम्हारे साथ बाल बांका भी नहीं होगा अरुण गर्ग जी पंजाब से श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी जीवन में अच्छे कर्म करना या भजन करना दोनों में क्या श्रेष्ठ है जल और पानी में क्या अंतर है जल पानी वार तोय वाटर शब्द केवल अलग है बात देखना अच्छा क्या है?
सद्गुण। सतगुण। सत कौन है? भगवान। बिना भगवान के परिचय के तुम जिसे अच्छा कहते हो वो बुरा ही होता है। आप हमें सोच के बताओ जो भगवान से बिलग कुछ अच्छा लगे। कुछ भगवान से बिलग हो और फिर अच्छा हो वो हमें बताओ। तो आपने उसके दो विभाग कर दिए। एक अच्छे कर्म और एक भजन। आपने उसे दो माना। दो नहीं है। बिना बुद्धि शुद्ध हुए आप जान ही नहीं सकते कि अच्छा कर्म किसे कहते हैं। समझ रहे हो? और बुद्धि शुद्ध होती है भजन से। बात एक ही हुई। जब हम भजन करेंगे तो हमारी बुद्धि शुद्ध होगी और शुद्ध बुद्धि से हम जान पाएंगे कि अच्छा क्या है।
कोई भी अपने लिए बुरा कर्म करता है क्या? चाहे वो गड़ासे से काटता हो। वो अच्छा समझता है। इसकी जेब काट लेंगे हमारा काम बन जाएगा। अच्छा समझता है वह लेकिन वह अच्छा नहीं है। हम इसको दान देंगे हमारे को बहुत करके मिलेगा। वो इसे अच्छा समझता है। यह अच्छा नहीं है। इतने में तो तुम्हारी बुद्धि शुद्ध नहीं। जब और बढ़ के मिलेगा तो तुम्हारी बुद्धि और अशुद्ध हो जाएगी। जब हम तुम्हें अच्छाई का मार्ग दिखाएंगे तो तुम्हें एक ही बात समझ में आएगी कि हमारे सामने प्रकाश सही हो तो हम मार्ग का सही चयन कर पाएंगे और वो प्रकाश है श्री भगवान।
हमारी जो बुद्धि को शुद्ध करते हैं वह श्री भगवान है। अगर भगवान का भजन हमारे जीवन में नहीं, भगवान का नाम नहीं है, भगवान का आश्रय नहीं तो आप सोच सकते हो कि मैं अच्छा कर रहा हूं पर अच्छा नहीं है। उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। गोस्वामी जी ने तुलसीदास जी ने बहुत विचार कर लिखा है बार मथे घत होए बर शिकता ते बर तेल बिनु हरि भजन भतरी या सिद्धांत अपेल विनिश्चितम बदामतेन अन्यथा वच में बिना भगवान के भजन के विश्राम शांति नहीं अच्छे कर्म का मतलब होता है सुख मिलना अच्छे कर्म का मतलब शांति मिलना अच्छे कर्म का मतलब आनंद मिलना तो आज तक आपको आनंद क्यों नहीं मिला अगर हमारे अच्छे कर्म जन्म जन्म जन्मांतर से हुए नहीं क्या हमें आनंद मिलना चाहिए पूरा जीवन हम आनंद और सुख के लिए करते हैं लेकिन आज तक नहीं मिला वही प्यास वही कामना वही लालसा वही अशांति समझ रहे हो ना हमारी इसका मतलब वो अच्छा कर्म नहीं हुआ जिसे अच्छा कर्म कहा जाता है बस वो है अच्छा कर्म भजन भजन करके देखो तुम्हारा मंगल हो जाएगा समझ में आ गया दीपक शर्मा जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम गुरुदेव कैसे समझ आएगा कि हम जो कर रहे हैं वह सही है क्योंकि सब जानते हुए भी चिंता सताने लगती है।
सही और गलत का निर्णय तो भाई कोई ऐसा पृथ्वी में नहीं है जिसको अंदर से उपदेश ना मिलता हो। कोई ऐसा नहीं। आप खुद सब लोग देखो क्या आपको प्रेरणा नहीं मिलती कि आप गलत करने जाते हो तो अंदर से रोका जाता है। बाहर से जान करके अंदर ही हम बात सीखना चाहे। बाहर की बात ज्यादा काम नहीं करती। कहां मंदिर की बात यह तुम बचपन से देख रहे हैं। जरा सा गलत बात हुई। गन्ने का खेत देखा। मन ने कहा गन्ना तोड़ लो। अंदर से बात आई गलत है। गन्ने वाला देख लेगा। पिताजी से कहेगा पीटे जाओगे।
गलत है। अब कहता है अरे कोई नहीं देखेगा तो ये बता देगा। साइड वाले खेत से घुस के जाओ और गन्ना तोड़ लो। वही बता देगा। अब जब पीटोगे तो कहेगा हमने कहा था ना तुमसे कि मत। वो अंदर बैठा हुआ परम गुरु सबको उपदेश देता है। तो यह तो बात आप कह ही नहीं सकते कि क्या अच्छा है क्या बुरा हमें ज्ञान नहीं था। ऐसा नहीं या तो बच्चा है या तो मूर्ख पागल है। दो की बात हम नहीं करते। अगर आप बीच वाले हो ना बच्चे हो ना मूर्ख हो ना पागल हो तो आपको प्रेरित करता है वो भगवान अंदर बैठकर कि गलत क्या है सही है।
आप यह नहीं कह सकते मुझे पता नहीं था। ऐसा नहीं। आप कोई भी कदम गलत बढ़ाओ तो आपके अंदर आ जाएगा। जलन होने लगेगी लगेगा गलत है ठीक नहीं अंदर प्रेरणा आप अच्छे काम के लिए तो एक हृदय शीतल होने लगेगा उत्साह होगा यार बहुत भाग्यशाली हम आज वृंदावन आए सत्संग किया प्रभु के एक अच्छा लगेगा और जब बुरा तो आप डोगे आपका हृदय घबराएगा अंदर प्रेरणा करे गलत है अरे नहीं कोई गलत नहीं है सब चलता है अब उसकी बात काट दिए तो फिर आगे का मार्ग आपका अंधकार में हो गया प्रेरणा वही देगा बल भी वही देगा यह भी ध्यान रखना वही प्रेरणा देगा आपको कि यहां से चढ़ जाओ ऐसे ऐसे चोरी कर लो और आपको बल देगा।
अरे कोई नहीं देख पाएगा। पहले वह सचेत करता है फिर आपको सपोर्ट कर देता है। क्योंकि उसी का खेल है। आप वो खेलना चाहते हो खेलो। फिर उसके हिसाब अलग-अलग है। जब डंडा चलेगा तब धीरज कहेगा। हमने मना किया था ना। इसलिए सच्चाई तो हृदय से ही पता चलती है कि भाई ये गलत है, ये अच्छा है, ये बुरा है। ऐसा। प्राची कपूर जी। प्रणाम महाराज जी। महाराज जी मैं 12वीं कक्षा में पढ़ती हूं। मैं 5 साल से ब्रजभूमि में आ रही हूं। मेरा मन हमेशा संसार की वस्तु में फंसा रहता है। पर भजन में नहीं लगता।
मुझे क्रोध भी बहुत आता है। कृपया करके मेरा मार्गदर्शन करें जिससे मैं इससे ऊपर उठ सकूं। जब तक नाम जब बच्चा नहीं करोगे तब तक हृदय में बल नहीं आएगा। जैसे हम जानते हैं हमें बुरा कार्य है नहीं करना चाहिए। पर हम ना चाहते हुए भी करते हैं। उसका मतलब आपके अंदर वो बल नहीं है जो आपको रोक सके। वो होता है नाम बल। जैसे हम राधा राधा राधा राधा जपेंगे तो हमें श्री जी का बल मिलेगा। अध्यात्म बल जिसे कहते हैं। फिर हम बुराइयों से लड़ सकते हैं। अब भजन करते नहीं चाहे जेब में दम नहीं और खड़े हैं हम हीरो जवाहरात की दुकान में तो क्या करेगा दुकान वाला?
धक्का मार के बाहर करेगा। जगह घेरे खड़ा है बाहर ऐसे ही चाहते हैं सुख शांति आनंद प्रसन्नता भजन में करना नहीं और सब जगह मन आकर्षित होता है तो धक्के के सिवा कुछ मिलेगा नहीं कहीं भी देख लो खुली बात है ये जादू टोना वाला नहीं कि हम तुम्हें जंतुर बना देंगे तुम सुखी हो जाओगे ये सब डुप्लीकेट है हां अब जैसे अलग बोले शनि विपरीत है बोले घोड़े की नाल की अंगूठी पहन लियो तो घोड़ा परमपद में चला जाए और सुखी हो उसकी नाल से यदि तुम सुखी हो जाओ तो इतने कुंतलो बोजा रोता है बेचारा काहे को
कष्ट पावे उसकी नाल में जब इतना दम है तो वो घोड़े में कितना दम होगा वो तो भगवान को प्राप्त कर ले कितने मूर्ख है लोग हैं आचमन करना है ठाकुर सेवा करनी है घोड़े की नाल की अंगूठी पहने कहो शनिचर ना लगे हम कहते हैं राधा राधा को शनिचर तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो जाएगा ये देखो अगर राष्ट्रपति के साथ तुम चल रहे हो ना तो कितना भी बड़ा देखो देखो एक अधिकारी आए थे कलेक्टर हो क्या क्या सब हुए बिल्कुल जी यस सर जी सर तो ये सब जितने हैं ना ये सब अलग-अलग विभाग के अधिकारी हैं शुक्र शनिचर राहु केतु ये सब सृष्टि विभाग के अधिकारी हैं अलग-अलग डिपार्टमेंट ढूंढता है ये दंड विभाग भी करते हैं और सुविधा विभाग भी करते हैं आप जब भगवान से विमुख होते हैं तो ये दंड विधान रचते हैं बोले साढ़ेसाती लगा तुम्हें कोई नहीं बचा सकता और जिसके साढ़ेसाती लगा और राधा राधा बोलना कुछ उखाड़ ले तो हमें बता दे ला के झोपे कृष्ण चरण मन अर्पित तो कर है का नवग्रह रंक ये बेचारे गरीब नवग्रह क्या कर लेंगे जब बादशाह हमारे अनुकूल है श्री कृष्ण
हमारे अनुकूल श्री कृष्ण नाम जप कर रहे हैं राधा राधा रट रहे हैं बस लोग समझ नहीं पाते हैं हमको चाहिए तो शांति सुख और हम कार्य करते हैं अशांति और दुख वाला कैसे हो सकता है ऐसा कैसे बंबूल का पेड़ लगाओ और कलमी आम पाना चाहो तो मूर्खता ही है कि नहीं कि हे बंबूल का पेड़ एक एक दिन तो आम दे दो ना चाहे जितना माथा घसो के कांटे लगे कुछ नहीं मिलेगा ऐसे ही हमारी दशा क्या है पाप कर्म करना मन के अनुसार चेष्टाएं करना और चाहते क्या है सुख मिले शांति मिले शांति धर्म से मिलती है धर्म से सुख मिलता है और धर्म का पालन नहीं करना कैसे बात बस यही फंस जाती है भजन में मन नहीं लगता जैसे एक प्रश्न्ता ने कहा था भजन में मन नहीं लगता और जब सेवा में बैठते हैं तो उसमें हमें रुचि नहीं है तो अब हम कहा भैया हमारे पास उत्तर ही नहीं है।
भजन में मन नहीं लगता। ठाकुर सेवा में रुचि नहीं। प्रपंच में तुम्हारा मन लगता है तो नरक की तैयारी करो। हमारे पास कोई उत्तर नहीं। क्या उत्तर दें? हां हम भजन करते हैं। मन नहीं लगता। ये बात समझ प्रयास करो आप। अब जैसे हमारा मन नहीं लग रहा। हम राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा हमको मन को क्या लेना देना? जबान से राधा राधा निकल रहा। श्री जी सुन रही ना उनका नाम ले रहे हैं। बस हो गया। इतने से ही काम बन जाएगा। पर माने तो कोई गुरु तो लाखों मान रहे हैं लेकिन गुरु की बात एकको मानने के लिए तैयार नहीं तो कैसी बात बनेगी हैं?
अच्छा समझते हैं गुरु जी को शिव संतरा दे हमारा काम चल गुरु जी भूखो मर रहे हैं शिवसंतरा के लिए डॉक्टर मृदुला इंदौर से राधे-राधे श्री सादर प्रणाम पूज्य गुरुवर अनेक संत जन कहते हैं कि भक्ति मार्ग में साधक का एक इष्ट होना चाहिए। मेरी दुविधा यह है कि प्रसंग चर्चा के अनुसार मैं कभी राम भजती हूं, कभी कृष्ण और कभी हनुमान जी। अतः मेरा प्रश्न यह है कि क्या साधक का एक इष्ट होना भक्ति मार्ग में अनिवार्य है? यदि हां तो एक इष्ट पर आस्था सुदृढ़ और स्थिर कैसे हो?
देखो उपासना सबकी सब भगवत स्वरूपों की आराधना से ही प्रारंभ होती है। जितने भी हमारे भगवत स्वरूप हैं, सब विराजमान होते हैं। लगभग लगभग प्रारंभ में धीरे-धीरे जब उपासना का रंग आता है तो फिर इष्ट आसक्ति प्रकट होती है। यह गुरु कृपा पात्रों में होती है। अपने अनुसार भगवत स्वरूपों को विराजमान करके आराधना करना मंगलमय है। लेकिन परमार्थ की सिद्धि गुरु कृपा से होती है। गुरु कृपा से उपासना का सांगोपांग स्वरूप प्रकाशित होता है। सांगोपांग स्वरूप कहते हैं गुरु प्रदत्त मंत्र गुरु प्रदत्त ग्रंथ गुरु प्रदत्त कंत कंत माने होता है इष्ट जब ग्रंथ पंथ कंत मंत्र यह गुरु प्रदत्त होता है फिर अब हमारी रुचि की बातें वहां नहीं रह जाती कि हमारी रुचि इनमें भी है इनमें भी है इनमें भी इनमें भी फिर होता है गुरु ने जो हमें उपासना दी जो मंत्र दिया जो उपास्य देव दिए अब हमें उनमें रति करनी है अब यहां से प्रेम मार्ग शुरू होता है वो निषेध नहीं है वंदनीय है पर उतना ही नहीं है।
उसके आगे जब हम बढ़ते हैं गुरु कृपा से तब हमारी प्रेम निष्ठा जागृत करने के लिए अनन्य भावना आती है। भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो कहते हैं अनन्य चेता सततम अनन्य चिंतयंतो माम बार-बार अनन्य शब्द का प्रयोग होता है। इसके दो भाव हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक है कि मेरे सिवा और कोई है ही नहीं। ऐसा भाव करके जहां पूजन कर रहे हो वहां भाव लगा लो। दूसरी बात यह है कि जितने भी तुम रूप देख रहे हो जितने भी रूप सब एक ही परबह्म परमात्म तत्व के हैं और उनको हमारे गुरु जी ने कहा है कृष्ण नाम है उनको गुरु जी ने कहा है राम नाम है अब हमको सब भावना हटा के उसी में लगा देनी है जैसे गोस्वामी जी कह रहे हैं बने तो रघुवर ते बने और बिगड़े तो भरपूर तुलसी औरन ते बने ता बनवे पे धूर तो कहा इनको ज्ञान नहीं है क्या सब भगवान के स्वरूप है अरे वो पहले कह रहे श्री राम में सब जग जानी कह रहे हैं ना तो तो फिर और कहां से आ गए?
गोस्वामी जी कह रहे हैं ना बने तो रघुवर ते बने बिगड़े तो भरपूर तुलसी औरन ते बने सबको अपने इष्ट रूप में मान रहे हैं पर तुलसीदास जी महाराज जी के हृदय की प्रीति का स्वरूप सारंग धनुष धारण किए हुए सियाजू के पार्ष में विराजमान हनुमान जी जिनके चरणों को सहला रहे हैं वो उस राम रूप के आशिक हैं। उस रूप से बने और किसी रूप से नहीं और स्वरूप इन्हीं के हैं। सिया राम में सब जग जाने करो प्रणाम जो अब आ गई अनन्यता अब आ गया प्रेम तो अनन्यता की प्राप्ति गुरु कृपा से होती है गुरु प्रदत्त उपासना से होती है और अनन्यता से भगवत प्रेम प्राप्त होता है भगवत प्रेम से भगवान अधीन होते हैं।
इसीलिए भगवान का एक नाम प्रेमाधीन है। जैसे हम अपने इच्छित रूपों को लाकर सेवा करते हैं। इच्छित नाम जप करते हैं। उसका फल होगा सद्गुरु की प्राप्ति और सद्गुरु प्रदत्त मंत्र नाम उपासना इष्ट की सिद्धि बिना गुरु के वचनों पर चले आज तक किसी को भगवत सिद्धि नहीं मिली भगवत प्रेम नहीं मिला किसका प्रश्न था हां तो आपको समझ में आ गया जी जी राम ला
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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