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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #375 · 20 नवंबर 2023

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

रानी मिश्रा जी दिल्ली से राधावल्लभ श्री राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी परम पूज्य श्री सदगुरुदेव भगवान आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मुझे शरणागति मंत्र लिए तीन साल होने वाले हैं जो आपकी ओर श्री जी कृपा से ही संभव हुआ मुझ में तो इतनी सामर्थ्य नहीं कि मैं आपसे प्रश्न करूं गुरुदेव मेरे मन में एक बात बहुत परेशान कर रही थी पहली बात मेरे मन में एक बात बहुत परेशान तो शरणागत किससे हुए हो मेरा तन मेरा मन मेरी बुद्धि मेरा तो किसको शरणागत किया है तीन साल शरणागत हुए तीन में से एक को शरणागति नहीं हुई ना तन की ना मन की ना वचन की तो फिर आगे का सवाल जो होगा उसका उत्तर फिर समझना कठिन हो जाएगा जो शरणागति है व तन वा मनो भीर अमल सोहम त आशिता शरीर से मन से वाणी से मैं स्वयं आपकी शरण में हूं अब जब मन हमने प्रभु को दे दिया है फिर हमारे मन की दशा क्यों नहीं बदल रही इसका मतलब नहीं दिया है मेरा मन मेरा तन मेरे वचन तो फिर शरणागति किसको किया है तीन साल से शरणागति किसकी हुई है हम शरणागत से पूछ रहे हैं

कि किसक शरणागति हुई है बस यही हम में कमी होती है कि हम केवल बिल्ला लगा लेते हैं कि शरणागत है लेकिन एक भी शरणागति नहीं होती अंदर अगर शरणागति है तो हमारा तन हमारा मन हमारा वचन प्रभु के नाम हो गया है हमारी कोई समस्या ही नहीं है सच्ची शरणागति में कोई समस्या नहीं है तो पहले तो हम शरणागति को समझे कि अभी कुछ शरणागति नहीं भाई कंठी बनवा लिया मंत्र ले लिया ये तो बिल्ला हो गया लेकिन अंदर से कोई शरणागति नहीं है अगर अंदर से शरणागति हो जाएगी तो यह शब्द जो आप कह रहे हैं वह सुधार हो जाएगा आप निश्चिंत हो जाएंगी निर्भय हो जाएंगी निशोक हो जाएंगी संसर कोई प्रश्न नहीं रह जाएगा एक अद्भुत आनंद क्योंकि हमारा मन हमारा तन हमारे वचन हमारे तन से जो क्रियाएं होंगी वो श्री जी के लिए होंगे पति पुत्र परिवार सबकी सेवा श्री जी के लिए अब उनका व्यवहार हमें दुखी नहीं कर पाएगा क्योंकि हम उनके लिए उनकी सेवा नहीं कर रहे हम श्री जी के लिए उनकी सेवा कर रहे तो हमारे मन में दुख नहीं होगा मेरे प्रभु तो देख रहे हैं ना उनके लिए मैं

कर रहे हूं अ मेरा मन जब हम प्रभु की शरण में है मधुर मधुर स्मृति मन में साव मन कृष्ण पदार विंद नाम में मन लगा है श्री जी में मन लगा है अब उसमें प्रश्न की जरूरत कैसे आ जाएगी मेरा मन नहीं तो मैं नाम कर चुका हूं प्रभु के शरणागत हुए ना मतलब हम प्रभु को दे दिया अब मन प्रभु को दे दिया तभी मन निर्मल होगा जब दे पाओगे जैसे कहा जाता है ना नाम तो जप रहा हूं यह भी शरणागति ई लेकिन विकार अंदर मन में है इसलिए विकार है कि अभी दिया नहीं मन मन को दिया नहीं गया नहीं

काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर ये हमारे निका नहीं निकलेंगे यही प्रभु के वाले करते हैं तोय निर्मल होने लगता है य शांत होने लगते हैं एक बार अंदर से सोचो कि हमारी शरणागति किसकी हुई है किस किसको हमने प्रभु की शरण में किया है तो आपको खुद उत्तर मिल जाएगा कि अभी तो प्रारंभ ही नहीं हुई शरणागति ना तन के ना मन के ना वचन के अभी तोम प्रभु के हुए ही नहीं अंदर से देखो सही माने में शरणागति जहां आएगी उसमें निश्चिंत बढ़ती है निर्भय बढ़ती है कोई शोक स्पर्श नहीं कर सकता कोई संशय नहीं आ सकता कोई विपरीत भावना नहीं आ सकती अब आनंद ही आनंद प्राप्त शरणागति साधन भी है और शरणागति सिद्धावना गति जैसा कोई साधन भी नहीं बहुत अद्भुत आनंद प्रारंभ से क्योंकि भरोसा इष्ट का होता है चिंतन इष्ट का होता है अब मन तो प्रभु के हवाले कर दिए जल रहा है तो तू जल प्रभु की इच्छा है जल तो पवित्र हो रहा है आनंदित है तो प्रभु की इच्छा है अब हमारा अधिकार नहीं शरणागति का जो रंग आता है तो चतुराश्रम भावे अब कहा अब सिकवा शिकायत कहां रह गई जोई

जोई प्यारो करे सोई मोही अब तो कोई सिकवा शिकायत र है अगर आप दिन को रात को मुझे दिन दिखाई दे रहा है पर हम यही कहेंगे मेरी निग बड़ी आंखों का दोष है क्योंकि आप कह रहे हो रात है तो पक्का रात है ये मेरा देखने का तरीका दिन कह रहा है लेकिन मैं नहीं मानू मैं मानूंगा रात क्योंकि आप कह रहे हो प्रेम के समर्पण की बात देखो और हम प्रिया प्रीतम के समर्पण करने वाली बात हमारी दशा क्या है अब आप प्रश्न महाराज जी ये कह रहे हैं कि भगवान शरणागति मंत्र केवल मुझे मिला है

मेरे पति को नहीं मिला मैं बहुत प्रयास कर रही हूं कि मेरे पति भी राधा नाम जप करें अगर आप शरणागत हो गए तो जैसे फूल में खुशबू आ जाती है तो आसपास से भौरे आकर के लुभाए मान हो जाते हैं पराग में जब आपके अंदर शरणागति का प्रभाव जग जाएगा तो पति पुत्र जो भी परिवार के सदस्य हैं आपको किसी से प्रार्थना नहीं करनी पड़ेगी आपकी वह भक्ति आपकी व दैन्य उनके अंदर असरा हम एक आपको चरित्र सुनाते थोड़ा सा सूक्ष्म है व अंगत जी नाम के बहुत बड़े महा भागवत रामायण वाले अंगद जीने भक्त माल चरित्र में है उनके भतीजा राजा थे और वह प्रधान थे पर राजा उन्हें बनाए हुए थे पर वो राजा की ही तरह थे उनका ब्याह हुआ बहुत सुंदर राजकुमारी से और वह भगवान की अनन्य भक्त थे और गुरुदेव की कृपा से अनन्य भक्ति आती है तो गुरुदेव के प्रति उसका भगवत भाव था साक्षात मेरे भगवान है और वहां उनके घर में संत सेवा होती रहती थी अब जब यहां ब्याह हो तो यह पूरे रजोगुण ना संतों को मानना ना भगवान को मानना बस जैसे एक संसारी आदमी वैसे अब ब्याह हो के आया तो

पति तो जीवन भर का साथी है अब उनको बहुत अंदर दुख हुआ कि ना यहां संत सेवा होती ना य भगवान की पूजा होती ना य भगवान की चर्चा होती वही सब रजोगुण राज वैभव पर वो अनन्य भगवान की और गुरु भक्ता कुछ ही समय हुआ उसे नहीं बढ़ी ना संत दर्शन ना सत्संग ना गुरुदेव के दर्शन और वह सखत महलों में व्यवस्थित ढंग से रानी राजकुमारियां रहती तो वो रानी हो चुकी थी महलों के अंतर्गत बाहर निकल नहीं सकती बड़े नियमावली थी तो उन्होंने अपनी एक दासी को पत्र लिखा और कहा जाकर मेरे माता-पिता को दे दो माता-पिता और भक्त थे यहां किसी भी तरह की कोई भक्ति का सपोर्ट नहीं और अगर हमें गुरुदेव के दर्शन नहीं होंगे तो हमारे प्राण व्याकुल हो र तो पत्र लेकर गुरुदेव के पास गए तो गुरुदेव ने कहा अगर उसको आने को नहीं मिल रहा तो मैं स्वयं चला जाता हूं बड़े कृपालु माता पिता का जैसा प्रेम होता है उससे अधिक गुरुदेव का प्रेम होता है वह पहुंच गए और घर में जी देखा गुरुदेव तो प्रसन्न हो गई बैठाला चरण पखारे चरणामृत लिया और जो कुछ भोग पवाया वो तो राज

घराना ऐसे प्रेम की बात हो रही थी कि उनका पति प्रवेश हुआ उसने देखा कि मेरी स्त्री साधु से बात कर रही बहुत बुरा शब्दों का प्रयोग किया उनके गुरुदेव को और न जाने कैसे-कैसे शब्द गंदे गंदे प्रयोग किए एकांत में स्त्री से संभाषण करता है बिना आज्ञा के मेरे अब गुरुदेव तो पहले ही पत्र से समझ चुके थे कि उनके पति कैसे तो बड़े गंभीर थे उन्होंने उसे कहा बेटी तुम चिंता मत करो शांत र मैं अभी जा रहा हूं और वो चले गए अब उनको लगा कि मेरा जीवन मेरे कारण मेरे गुरुदेव का मेरे सामने अपमान कहा आज से मैं ना तो पानी पिऊंगी ना भोजन पाऊंगी और अपने प्राण त्याग दूंगी ऐसे है और ना तुमसे संभाषण करूंगी ना तुम्हारी तरफ देखूंगी यह शरीर तुम के तुम पति बने हो ना इसको तुम्हारे सामने ही ऐसे ना भोजन पाऊंगी और ना पानी पिऊंगी जितने दिन में छूटेगा छूट जाओ अब वह अत्यंत आसक्त थे पत्नी में बढ़िया बात ये हो गई कि वो अपने पत्नी में इतने आसक्त थे कि बात सुनते ही घबरा गए एक दिन दो दिन तीन दिन हुआ फिर वो नजदीक गए उन्होंने कहा मुझे नहीं

पता ऐ सब भक्ति क्या होती है संत महात्मा क्या होते हैं तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार उनको बोला अगर आपको ऐसा लग रहा है कि मेरे से गलती ई तो मैं गलती मानता हूं क्योंकि उससे आ सकते थे आप भोजन पाइए और पानी पीजिए आगे से कभी गलती नहीं करूंगा उन्होने कहा ऐसे नहीं आप स्वयं जाएं गुरुदेव को प्रणाम करके लाए और फिर हम रसोई बनाएंगे गुरुदेव पाएंगे तब उनकी जूठन पाऊंगी बोले ऐसा ही करेंगे वो गए गुरुदेव को प्रणाम करके लाए मना संतो का क्या संतों का तो बहुत करुणा में स्वभाव होता है अब जही गुरुदेव पाए और दोनों ने उच्छिष्ट पाया तो रानी से भी अधिक महान भागवत उनके पति बन गए क्योंकि वो पूरा चरित्र तो बड़ा विशाल चरित्र है रानी से भी ज्यादा महा भागवत वो बन गए मतलब उनकी ऐसी स्थिति पूरा चत क तो घंटों लगेंगे उनकी ऐसी स्थिति हुई कि राजा ने किसी कारण व उनको एक ऐसे हीरे का मुकुट वो जीत के लाए थे बहुत महंगा था उन्होंने सोचा कि ये हीरा तो भगवान जगन्नाथ जी को देंगे राजा को ये पता चला उन्होंने पहले विनय के द्वारा क्योंकि चाचा

लगते थे जब नहीं माने तो उन्होंने जो रसोई में भोजन बनाते थे उनको अपनी तरफ करके उसमें जहर मिलवा दिया अब वो जहर भरा भोग पहले ठाकुर जी को लगा और फिर वो अंगज जब अंगज जी के सामने तो उनकी जो बहन थी उनकी बेटी अंगत जी के साथ पाती थी उन्होंने बुलाया उनका नहीं आज नहीं पाएगी क्यों नहीं पाएगी रोज पाती है प्रधान रसोइया की देखरेख उन्हीं के हाथ में थी वो जानती थी उ कहा नहीं आप पाई हो बाहर खेलने बोले जब तक नहीं आएगी तब तक नहीं पाएंगे हमारा नियम उस बच्ची के साथ पाते बुलाओ उसको तो उनको लगा मैं कितनी नीच हूं मेरी बेटी से तो इतना प्यार करते तो उनका भाई मत पाना इसमें जहर मिला दिया उका भगवान का भोग लग गया जहर मिला दिया अरे दुष्ट शभा वाली जब भगवान ने पा लिया तो पूरा प्रसाद अकेले पाए कुछ नहीं हुआ कुछ नहीं मतलब पूरा जहर पड़ा हुआ था कुछ नहीं कितने महान भागवत के जब भगवान पा लिए भोग लग गया तो अब मैं क्यों नहीं पाऊं मैं पाऊ कुछ नहीं हुआ वो बड़े महा भागवत हुए तो अगर अपने पति को या परिवार को किसी को भक्ति में लाना है

तो पहले हमारी भक्ति में दम आ जाए पहले हमारे भजन में ऐसी निष्ठा आ जाए तो अपने आप सामने वाले का या रिश्ते ना दार का अपने आप परिवर्तन हो जाएगा पहले हमको चाहिए कि हम अपनी भक्ति को पुष्ट करें नहीं तो जब वो कट व्यवहार करेंगे तो आपको खुद अपनी भक्ति पर असर पड़ते नजर आएगा क् वो कम हो रही है वो पहले हमको अपनी निष्ठा मजबूत करनी अगर हमारे हृदय में भक्ति निष्ठा बढ़ गई तो पति पुत्र परिवार जिधर जो हमारे संपर्क में आएगा वह भक्त बन ही जाएगा चाहे जितना विरोध करें मीरा जी का उनके देवर ने बहुत विरोध किया ब बहुत हद तक जहर तक पिलाया मारने की चेष्टा अंततोगत्वा चरणों में गिरे मान सिंह जी राजा थे अपनी पत्नी का बहुत विरोध किया रत्नावती जी का चरित्र पढ़ अंततोगत्वा चरणों में प्रणाम करके और कहा कि मैं आपका शिष्य हूं भक्ति एक दिन झुका के रखती है बस यह कि अपनी निष्ठा अपनी निष्ठा परिपक्व बनी रहे यह बड़ा कठिन है अपने को परिपक्व कर लो पति और पुत्र आदि तो अपने आप हो जाए जब हमारे हृदय में भक्त देखो संतों को भक्ति का ही तो

प्रभाव होता है अपने हृदय की दीपक से लाखों दीपक ज जग मगाने लगते हैं तो उनके दीपक में कोई फर्क पड़ता है क्या पहले भक्ति का दीपक हमारे हृदय में वास्तविक जल जाए अपने आप देखो पति में भी भगवान है पुत्र में भी भगवान है और आप भगवान की भक्ति करते हो तो उनको बदलने में कितनी देर लगेगी क्षण में बदल गए अंगत जी क्षण में महान भक्ति का भाव आ गया तो हमें लगता है हम अपनी भक्ति को पुष्ट करें अभी जोर दबाव ना करें क्योंकि उनका विरोध हम सहने की अभी सामर्थ्य नहीं हमारे

अंदर मीरा जी जैसी सामर्थ्य रत्नावती जी जैसी सामर्थ्य नहीं हम थोड़ा अपनी भक्ति को पहले परिपक्व कर ले फिर उसका प्रभाव खुद देखेंगे एक ना एक दिन जब हम कुसंग करते हैं तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और जब सत्संग करते हैं तो एक ना एक दिन रंग चढ़ता है तो आप अगर भक्त हो तो आपके पति आपको अपना मानते हैं तो एक दिन उनकी बुद्धि का परिवर्तन निश्चित हो जाएगा उनका कल्याण भी निश्चित हो जाएगा भगवान के मार्ग में चलने वाले उपासक के 21 पीढ़ियां तर जाती है यदि भगवत प्राप्त हो गया तो मुझे चिंता नहीं करनी चाहिए मुझे चिंतन करना चाहिए अपनी भक्ति को पुष्ट करना चाहिए आशीष पांडे जी म जी कह रहे हैं कि क्या सदगुरु देव के दर्शन के बाद भी ईश्वर दर्शन की आवश्यकता होती है इसमें प्रबल श्रद्धा की आवश्यकता है जब हमारी प्रबल श्रद्धा होती तो हम पाषाण से भगवान को प्रकट करते देखा भक्तों को प्रबल श्रद्धा हो जाती तो भूत से नामदेव जी ने भगवान प्रकट कर लिया कुत्ते में भी भगवान प्रकट कर लिया प्रहलाद जी ने खंभे से भगवान प्रकट कर

लिया तो भगवान का साक्षात स्वरूप गुरुदेव तो ही है गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुदेव महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम पर ऐसी भावना नहीं होती हम गुरु को साक्षात परब्रह्म मानते नहीं हम गुरु को एक व्यक्ति मानते हैं या बहुत बहुत संत मानते हैं और यह सोचते हैं कि यह साधन है साध्य तो भगवान की प्राप्ति होगी हम यह नहीं देख पाते कि साक्षात बंदों गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि साक्षात हरि ही नर रूप धारण करके अपना परिचय देने के लिए मुझे उपदेश कर रहे हैं जिनकी ऐसी भावना है तो गुरु में साक्षात पर ब्रह्म का अनुभव हो गया तो अब किसका दर्शन पर ऐसा बहुत कठिन है मतलब कोई बेरला अपने गुरु को साक्षात परब्रह्म देख पाता है नहीं तो नहीं क्योंकि भावना का ही तो सारा खेल है वैसे परब्रह्म तो सब में विराजमान है गुरु तो है य जब किसी ने अपनी उपासना की परिपक्व अवस्था में देखा तो जड़ चेतन जग जीव सकल राम में जान जैसे गोस्वामी तु किसी ने अपनी परिपक्व अवस्था में श्याम देखा तो सब में श्याम दिखाई गुरु में

क्या है अगर गुरु तो साक्षात परब्रह्म ही है अगर हमारी भावना बन जाए तो सब में प्रभु विराजमान सब में अनुभव हो जाए फिर अलग से थोड़ी कोई अनुभव पर ऐसी भावना नहीं बन पाती ऐसी नहीं बन पाती बहुत मुश्किल से इतनी भावना बनेगी कि बहुत अच्छे संत हैं मेरे परब्रह्म है जैसे गुरु ग्रंथ साहब ही साक्षात परब्रह्म गुरुदेव हैं देखो साक्षात परब्रह्म चम डला जा रहे हैं उनका सम्मान उनकी वाणी ही सब कुछ साक्षात तो गुरुवाणी इतना गुरुवाणी साक्षात परब्रह्म है ऐसा कहां मान्यता अपने लोग स्वीकार कर पाते कि हमारे गुरुदेव की जो वाणी है वह परब्रह्म की वाणी है साक्षात परब्रह्म बोल रहे हैं तो बस मानना ही तो है ना भावना ही तो है ना तो हम श्री विग्रह में तो सोच सकते हैं भगवान है लेकिन इनमें भगवान को नहीं देख पाते मनुष्य है ना तो ऐसे मनुष्य आकृति में गुरुदेव है हमारी दृष्टि बस वही थी कि आप प्रभावशाली है तपस्वी हैं संत है इनकी बात हम मानेंगे तो हमें भगवान मिल जाएंगे तो वैसे ही आपको अनुभव होगा ये यथा माम प्रपद्यंते ताजाम जब यह बात

आ गई कि अहो भाग्य मुझे भगवान मिल गए ग तो ये ढांचा फिर नहीं दिखाई देने लगेगा कुछ दिन बाद जो है अंदर वस्तु व ओहो साक्षात परब्रह्म बैठे क्योंकि है तो परब्रह्म कस क जहा प्रभु नहीं जब सर्वत्र है तो गुरु के हृदय में भी विराजमान है पर हम ऐसा भाव नहीं कर पाते अगर भाव कर ले तो साक्षात तत्व ही विराज चद चद लक्षणं सर्वम राधा कृष्ण मयम जगत सब में राधा कृष्ण विराजमान है हम कहां देख पा रहे हैं फि गुरु में तो है ही है प्रभु गुरु गोविंद ने भेद कराई गोविंद और गुरु

दो थोड़ी है वो तो एक ही वस्तु है पर हम कहां ऐसा भाव कर पाते हैं ऐसा भाव हो जाए तो फिर और कोई साधन ही नहीं करना गुरु साक्षात परब्रह्म अपने परब्रह्म का दर्शन कर रहे हैं मुझे और किसी के दर्शन की जरूरत नहीं है और कोई है ऐसी हमें भावना नहीं अखंड मंडलाकारं व्याप्तम चर अचर में मेरे गुरुदेव विराजमान है और सामने मेरे साक्षात परब्रह्म बैठा हुआ है अब मुझे क्या निहाल पर ऐसी भावना होना बड़ा कठिन है हम गुण दोष मय वृत्तियों वाले बस गुण दोषों को देखते हैं चार प्रणाम कर रहे तो हम भी प्रणाम कर रहे हैं क्यों प्रणाम कर रहे हैं इसका उत्तर हमारे पास नहीं वो प्रणाम कर रहा है इसलिए मैं प्रणाम कर रहा हूं तो हम लोग ऐसी भावना के हमारे अंदर पर्सनल भावना इतनी सुदर नहीं कि वो वो पता नहीं क्यों प्रणाम कर रहा हम ऐसे नहीं हम तो देखेंगे हमारी श्रद्धा कितनी बनती है हमारा भाव कितना बनता है तो ऐसे तो गुरु तो लाखों लोग बना लेते हैं लेकिन गुरु की बात मानना गुरु के प्रति वो भाव पाना कोई बिरला होता है तभी बिरला वो जो होता है

उसे भगवत प्राप्ति होती है नहीं तो लाखों गुरु बनाने के बाद फिर हम संसार में भटक जाए ऐसा कैसे हो सकता है गुरु तो हमको भगवत प्राप्ति भगवत तत्व का अनुभव कराने के लिए आया हुआ है क्योंकि वही भगवत तत्व है सही जाने जी देव जनाई तो अपने आप को जनाने के लिए आए हुए पर ऐसी भावना बहुत कठिन है बहुत दुर्लव है यदि ऐसी भावना बन जाए तो अम उगस निश्चित व गुरुदेव में अपने साक्षात्कार की जो भावना है जिस भाव की राम कृष्ण हरि निर्गुण सगुण जो भी वह गुरु में ही देख पाएगा कि

मेरे गुरुदेव साक्षात है शिवांगी जी बनारस से श्री हरि श्री हरिवंश गुरुदेव गुरुदेव पहले तो बहुत धन्यवाद आपके श्री वचनों से जीवन में उचित सुधार हो रहा है महाराज श्री सांसारिक जीवन में बच्चों का उद्देश्य माता-पिता और उनकी सेवा ही होती है माता-पिता का शरीर पूरा हो जाने पर अब जीवन का उद्देश्य समझने में असमर्थ हूं कृपया मार्गदर्शन करें घर में अपने प्रिया प्रीतम को विराजमान करके घर के जो भी सदस्य हैं पति है पुत्र है उसमें भगवत भावना करके हम सेवा कर रहे हैं माता-पिता की सेवा पूर्ण हुई अंतरध्यान हो गए तो ऐसा तो नहीं कि आप सेवा रहित हो गए आपका शरीर आपके शरीर संबंधी पुत्र अतिथि पति जो भी हैं जिनके साथ जैसा हमारा धर्म का संबंध उसके साथ हम भगवत भाव करके सेवा करें हमारे पूरा जीवन सेवा में है यह शरीर भी तो ह नहीं अब यह धर्म के कार्यों में हमारा सहयोग कर रहा है भगवत कार्यों तो हम इसकी भी सेवा करते हैं स्नान करना भोजन देना इसको स्वस्थ रखने की चेष्टा रखना तो यह भी भगवत सेवा हो जाएगी जब इसे मैं मान के

करोगे तो बंद जाओगे और इसे भगवत जैसे तांबे का पात्र और हम ठाकुर जी को उससे स्नान कराते हैं बढ़िया मान के नहीं रखते और बड़ा अच्छा भाव रखते हैं कि ठाकुर जी का लोटा है ऐसे ही ठाकुर जी की सेवा का पात्र शरीर है ही दूसरे शरीरों में भी ठाकुर जी हैं तो ऐसा तो है नहीं कि आप बिल्कुल अकेले हैं कोई न कोई तो हमारा संबंधी है कोई न कोई तो है उसी में भगवत भावना कर लेते हैं और भगवत भावना करके जो हमारा धर्म है उसके अनुसार सेवा करते हैं तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा हमारी सेवा पूर्ण हो जाएगी तो ऐसा तो नहीं कि एकदम अगर एकदम अकेले हैं तो फिर परम सेवा आओ अंदर से आओ भगवान की शरण में असंग होकर के निरंतर भगवान का चिंतन करते हुए जीवन त करें पर ऐसा तो नहीं है ना अब तो इसलिए कोई न कोई तो है ना उसमें भगवत भावना कर लेते हैं और धर्म के अनुसार वरता करते सेवा करते हैं वही हमारी भगवत प्राप्ति का हेतु हो जाएगा यदि नाम जब चलता रहे तो भगवत भाव सामने और नाम जप दोन दो आवश्यक है दो के बिना तो सब एक दूसरे में आसक्त है ही है ममता

यु भगवत प्राप्ति थोड़ी हो जाती है दो भाव पहला उसमें भगवत भाव और दूसरा नाम चलना चाहिए जो नाम प्रिय हो तो हम तो वृंदावन वासी राधा राधा राधा कहते जो नाम प्रियो भगवान के सब नाम सामर्थ्य शली है नाम जप करते हुए जो संबंधी हैं उनमें हम भगवत भावना करके उन धर्म के अनुकूल बर्ताव करें मंगल हो जाएगा देखो सबसे प्रार्थना है मनुष्य जीवन परमानंद की प्राप्ति के लिए भगवान ने दिया है परमानंद उसी को प्राप्त होता है जो नाम जप करता है जो भगवान निषेध किए गंदे आचरण गंदा भोजन गंदे पे पदार्थ गंदी क्रियाएं इनका त्याग अब जैसे शराब पिए मांस खाए पराई माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि रखे गंदे आचरण करें उसे अशांति मिलेगी उसका हृदय जलेगा उसका हृदय भत रहेगा एक कल्पनात्मक भय बना रहेगा क्योंकि गलत आचरण हो रहे यदि हमसे अच्छे आचरण हो और हम नाम जप करें और भगवान का भरोसा हो तो गृहस्थ धर्म में भी जो एक संत के हृदय में आनंद होता है वही आनंद सिंधु आपके हृदय में वही आपको आनंद देने लगेगा देखो हमारे कर्म ही हमको दुख सुख देते हैं तो हम

अपने कर्मों का सुधार कर ले अभी तक जो गलती हुई मानो अनजाने में या वासना के दबाव अब तो संभाल अगर संत दर्शन संत संभाषण इसका मतलब भगवान की हमारे ऊपर विशेष कृपा अब म भा भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता अगर संत मिल गए तो इसका मतलब भगवान हम पर बहुत प्रसन्न है अब हमको आज से अपने जीवन को संभाल लेना चाहिए अब लो नसानी अब नान सेयो अब तक गलती हुई अब आगे नहीं करेंगे तो जितनी स्वास बची उतने में मंगल हो जाएगा जब अपने पुत्र के बहाने नारायण पुकारा अंतिम स्वास में भगवान की प्राप्ति हो गई अजामिल को तो हम जानबूझकर राधा राधा बोलेंगे तो हमको भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी इसलिए हम प्रार्थना करते हैं कि हम अपने आचरण पर ध्यान दे कोई हमारा कर्म भगवान के विपरीत ना हो जाए धर्म के विपरीत ना हो जाए और खूब नाम जप करें इसी से हमको लाभ मिल जाए परम लाभ मिल जाएगा संतों का आशीर्वाद जैसे नहीं कहते संतों का आशीर्वाद का मतलब य होता है कि हम भगवान की तरफ चले गंदे आचरण से बचे अरे बोले देखो यह सत्संग करते हो तुमय खाते हुए

पीते ऐसे यह सत्संग करते हो मतलब तुम तिलक लगाए कंठी बांध तुम कहां खड़े हो क्या बोल रहे हो मतलब हमको अपनी जबान अपने आचरण अपने विचार पवित्र करने क्योंकि अब हमें संत समागम मिल गया है हमें मानव दे का परम लाभ भगवान शंकर जी कह रहे गिरजा संत समागम समन लाभ कछु आन अब आपको क्या मिलाया वचन अगर वचनों को आप पकड़ लो तो जो बड़ी बड़ी साधना से होता व आपकी बात बन जाए सब शास्त्रों का सार तुम्हें बता रहे हैं आचरण पवित्र देखो बहुत विद्वान हो आचरण खराब हो तो हमारे य माना नहीं गया रावण बहुत विद्वान है बहुत भारी विद्वान हां और फलस्तीन ऋषि का हां पर आचरण नहीं संभल पाए तो उसे राक्षस कहा गया उत्तम कुल पुलस्की उत्तम कुल पुस्त उसे राक्षस कहा गया नहीं कहा गया आचरण हीन होने के कारण नहीं तो आज भी जहां भगवान शंकर जी का अभिषेक होता है उसका लिखा हुआ स्तोत्र गाया जाता है जटा टवी गलत ज्वल प्रवाह पावितस्थले लं लता भुजंग तुंग मालिका डम डम डम निनाद डमर वयम सकार चंद तांडव तनो तुना शिवा ये उसी की रचना है अगर संत समागम हुआ हमारे

आचरण नहीं सुधरे तो फिर हा मतलब क्या लाभ मिला संत समागम इसलिए अपने आचरण पर ध्यान रखें कर्म ना बिगड़े और खूब नाम जप करें राधा राधा राधा की जय कमल नेतर कति पितांबर अदर मुरली गिर धरम मुकत कुंडल करल कुतिया सावरे राधे वम कूल यमुना देनु आगे सकल गोपय के मन हरम पीत वस्तर गरुर वाहन चरण सुख नित सागरमल केल कलोल निश दिन कुंज भवन उजागर अजर अमर अदल निश्चल पुरुषोत्तम अपरा परम बज दीना नाथ दयालु गिरिधर कं चरन शुप हरम गल फूल माल विशाल लोचन अधिक सुंदर केशवम वंशीधर वसुदेव चलिया बल चलियो हरि वामनम जल डूबते गज राख लीनो लंका चेद रावण सपत दीप नव कंद चौध भवन कीनो राम जी एक पदम श्री द्रोप दज की लाज राखी कहां लगे उपमा करम भज दीन नाथ दयालु पूरण करुणा में करुणा करम कवि दस्त दास विलास निशदिन नाम जपत नित सागर प्रथम गुरुजी के चरण बंद यस्य ज्ञान प्रकाशित आदि विष्णु युगा आदि ब्रह्मा सेवितम शिव शंकर श्री कृष्ण केशव कृष्ण केशव कृष्ण यदुपति केशवम श्री राम रघुवर राम रघुवर श्री राम जी रघुवर राघवम श्री राम कृष्ण गोविंद माधव

वासुदेव हरि वामनम मच कच वरा नरसिंह पार रघुपति पावनम मथुरा में य शराय विराजे गोकुल बाल मुकंद जी श्री वृंदावन में मदन मोहन गोपीनाथ गोविंद जी धन धान्य मथुरा धन्य गोकुल जहां श्री पति अवतरे धन दन यमुना कनीर निर्मल ग्वाल बाल सखाव नवनीत नागर करत नितन शिव वृच मनमोहित कालिंदी तत कृत सराबा अद्भुत सुंदरम ग्वाल बाल सब सखा विराजे संग राधे वामनी वंसी वत तत नि कत यमुना श मुलीक ठ सुहावनी भज राघव रघु अंच उत्तम परम राजकुमार जी सीता के पति भगत श्रीपति जगत प्राण अधार जी जनक राजा प्रण राखो धनुष वान चढ़ाव सततो सीता नाम जाके श्री रामचंद्र प्रणाम ही जन्म मथुरा खेल गोकुल नंद के हरि नंदनम श्री बाल लीला पतित पावन देव की वासुदेव कम और श्री गिरिराज श्री गिरिराज बास में पाऊ ब तज बैकुंठ न जाऊ श्री गिरिराज पास में पाऊ ब्रज कज बैकुंठ ना जाऊ बिचर में लता पतन में गिरिराज टी वन में आनर जती पुरा में राधा कुंड गोवर्धन में अर कुंडल के कर अनान करू जल पान पढ़ो रह रज में पड़ो रह रज में दीजो प्रभु बारंबार जन्म मोहे ब्रज में जो

कछु मिले ब्रजवासी इन को जो कछु मिले प्रसाद पाई के गोविंद के गुण गाऊ ब्रज तज बैकुंठ न जाऊ बोलो गिरिराज की जय राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा रा राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा

राधा राधा मे राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा धा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्यामा लाड़ली राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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