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गीता में कर्म की प्रधानता दी गई है तो हम नामजप क्यों करें ? Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

एडवोकेट हिमांशु जी दिल्ली हाई कोर्ट राधा महाराज जी राधे राधे महाराज श्री कृष्णा ने गीता में कर्म को प्रधानता दी है अर्थात कहा है कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो तो महाराज जी नाम जपना क्यों जरूरी हां ध्यान दीजिए पहले तो हम उसी विषय पर बोलते हैं कर्म नहीं कर्म योग अगर आप पूरे शब्द का उच्चारण नहीं करेंगे तो अधूरा हो जाएगा कर्म योग का वर्णन भगवान ने किया केवल कर्म का वर्णन नहीं किया व पूरा चैप्टर कर्म योग आगे पूरा चैप्टर भक्ति योग प्रारंभ जो गीता का किया सांख्य ज्ञान जो ज्ञान योग कहा जाता है अगर आप योग नहीं बोलेंगे तो कर्म फिर बांधने वाले होते हैं चाहे वो शुभ कर्म हो या अशुभ कर्म हो अच्छा कर्म है सोने की जंजीर बुरा कर्म है लोहे की जंजीर लेकिन बंधता दोनों में है अवश्य में भुक्त कृतम कर्म शुभा शुभम शुभ और अशुभ कर्म दोनों भोगने पड़ेंगे समझ रहे ना अब योग चाहिए जो मुझे कर्म बंधन से मुक्त कर दे शुभ और अशुभ दोनों से तो गीता जी बहुत थोड़ा पढ़ोगे तो समझ में नहीं आएगी और आगे बढ़ो उसमें कहते हैं तेशाम

सतत युक्ता नाम भजता प्रीति पूर्वक ददा बुद्धि योगम तम येन माम उपया जो मेरा सतत भजन करता है नाम जप करता है मेरा चिंतन करता है मेरी सेवा करता मन मना भो मत भक्त तो मादी माम नमस कुरु तो मैं योग प्रदान कर देता हूं अब कर्म नहीं रह गया अब कर्म योग बन गया कर्म योग बन गया तो उसने विध्वंस कर दिया संचित कर्मों को फला आकांक्षा रहित होने के बाद उसके हृदय में अद्भुत प्रेमानंद कर तत्व भाव का लीन हो जाना जीवन मुक्त महापुरुष हो जाना बिना भगवान के नाम जप किए योग नहीं बन पाएगा माम निमर युद्ध च गीता जी से मेरा स्मरण करते हुए कर्तव्य कर्म कर इसीलिए कहते हैं राधा राधा बोलो हरि हरि बोलो कृष्ण कृष्ण बोलो फावड़ा चलाओ या वकालत करो या जो भी कार्य करो वह तुम्हारी पूजा होगी तुम्हारा कर्तव्य कर्म होगा और भगवत स्मरण करोगे तो योग हो जाएगा कर्म योग हो गया तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी कर्म अकेले हुआ तो बार-बार दुर्गति बार-बार लोक लोका आंतर के सुखों का शुभो का भोग लेकिन पुण्य क्षीण मृत्यु लोके बसंती काम तो बना नहीं आपको समझ

में आ रहा है इसलिए नाम जपना अत्यंत आवश्यक है बिना नाम जप किए योग नहीं हो सकता कर्म होगा कर्म दो प्रकार के शुभ और अशुभ उनका फल अवश्य भोगना पड़ेगा गीता गायक कर रहे हैं अवश्य में भोग तव्य कब तक भोगता रहूंगा पूरा स्टाक लगा हुआ गोदाम लगा हुआ अनंत जन्म हो चुके हैं और हर कर्म का फल वह हमें भोगना पड़ेगा अब क्या करें उसमें आग लगनी चाहिए गोदाम में जो हमारे संचित कर्म है वो नाम जप से होगा जो क्रि माण है है हमारी बुद्धि शुद्ध हो कि हम कौन से कर्म करें जिससे हमारा मंगल होगा वह बुद्धि नाम जप से होगी इसीलिए कहते हैं नाम जप करो बहुत शोध के बोलते हैं ऐसा थोड़ी मन मानी बोलते हैं बहुत शोध के हर शास्त्र का हर संत महापुरुष का जो अनुभव है उनका संग करके तब य बोलते हैं ऐसे नहीं कि हम वो केवल भावुकता में बोलते हैं नहीं हम भावुकता वाले पुरुष नहीं है भगवान शंकर ज्ञान समुद्र हैं बचपन से उन्हीं के गुरु वई में पले हैं इसलिए बहुत शोध करके यहां कोई भी बात मिलेगी तो केवल कोरी भावुकता की नहीं होगी कि अंधविश्वास में बोलते

चले जा रहे नहीं जिसका स्वाद नहीं लिया वो बात नहीं तुम्हें बोलेंगे और जिसका स्वाद लिया तो छाती ठोक के कहते ऐसा करो और तुम्हें स्वाद ना जाए तो मुझे बता देना ठीक समझ में आ रहा जी

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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