क्या हनुमान चालीसा में "तुलसीदास सदा हरि चेरा" में तुलसीदास जी की जगह अपना नाम ले सकते हैं ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अमित जोशी जी हरिद्वार से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जब हम चालीसा आदि पढ़ते हैं तब अंत में जिस प्रकार तुलसीदास सदा हरि चेरा की जगह हम जैसे मेरा नाम अमित जोशी है तो अमित जोशी सदा हरि चेरा कह सकते हैं नहीं जो लिखा है वही बोलो भाव अंदर से करलो जब हम विभीषण शरणागति की चर्चा कर रहे थे तो विभीषण हम थे हमने शरणागति हमारी हो रही भावना उस समय हम चेरे हैं उनके दास हैं यह नाम तो बाहर ही है तुम्हारा अंदर तो वही है उन्हीं का दासत है उस समय तुलसीदास जी जैसे भाव से कह रहे हैं तुलसीदास सदा हरि चेरा ऐसे मेरा भी स्वरूप जो तुलसीदास जी का स्वरूप वही मेरा स्वरूप है उस समय में तन्मय हो गया और उसी भाव में अलग से नाम छाप उन्हीं की जिन्होंने लिखा है छाप नहीं बदलनी है नहीं व एक तरह से वो अपराध है जिसका पद है उसी की छाप होनी चाहिए तो अपनी छाप कैसे लगा सकते हो जिसकी रचना है उसी की छाप होनी चाहिए चोरी हो जाएगी य अपराध बन जाएगा जिसकी बात है उसी की बात करो पूज्य बाबा ने अमुक बात कही है पूज्य अमुक
संत ने अमुक बात कही है उसकी छाप लगाओ उनकी उनकी बात है उनकी बात हम सामने रख रहे हैं तुलसीदास सदा हरि चेरा की जय नाथ हदय म रा उस समय तुलसीदास हम बन गए हमारा भाव उसी दा सत्व में आ गया की जय नाथ हदय में डेरा छाप नहीं बदलनी कि हम अपना नाम बदल दे ठीक है महापुरुषों का जो पद है वह समाधि से समाधि भाव में रचा गया है उस नाम लेंगे ना तो वास्तविक चेहरे बन जाओगे राम जी के परम प्रेमी है गोस्वामी तुलसीदास जी जब कहोगे ना तुलसीदास सदा हर चेहरा राम जी मुस्कुराते हैं क्योंकि संबंध से वह इतने महान दासत से युक्त है कि वही दासत हमारे हृदय में भी आ जाए हमें अपनी नहीं लिखनी भाव हमें अपना रखना है कि जैसे गोस्वामी जी दासत ऐसे मेरे अंदर भी दासत भाव आवे भगवान लेकिन छाप वही बोलनी छाप नहीं बदलनी कि अपनी छाप लगा दे नहीं व अपराध बन जाएगा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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