॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #456 · 9 फ़रवरी 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अंकित शर्मा जी राधे राधे जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं विद्यार्थी हूं और नौकरी प्राप्त करने के लिए मैंने बहुत मेहनत की लेकिन सफलता नहीं मिली वहीं मेरे मित्र जिन्होंने बहुत कम या बिल्कुल परीक्षण नहीं किया उनको बहुत अच्छी नौकरी मिली महाराज जी यह सबसे मन में तुलना की भावना आती है और आगे आने वाले समय में परम करने में म ऐसा आता है और ऐसा होता है और ऐसा होता ही रहेगा इसमें क्या होता है बच्चा कि ईमानदारी से देखो तुम पुरुषार्थ मतलब मेहनत तो खूब कर

रहे हो ऐसा कोई नहीं चाहता कि मैं फेलू ऐसा कोई नहीं चाहता कि मेरा कहीं स्तर गिरे सब बड़े बनना चाहते सब सुखी होना चाहते हैं पर प्राया सफलता किसी किसी को मिलती है जो तुमसे कम मेहनत किए होगा वोह भी सफल दिखाई दे सकता है जो तुमसे कम बुद्धि रखता वो भी ऊंचे पद पर बैठा दिखाई दे सकता है इसका तात्पर्य होता है पूर्व प्रारब्ध अब इसे माने या ना माने जैसे वर्तमान में हम मेहनत बहुत कर रहे हैं पर हमारा कर्म है हमें दुख देने के लिए तत्पर है तो हर जगह से मुझे गिरा रहा है हर जगह से परास्त कर रहा है व्यापार में घाटा पढ़ाई में वो चाहे जितना पढ़े वो उतने नंबर नहीं ला पा रहा है वो चाहे जितना प्रयास करे उसे इंजीनियरिंग पढ़े बड़े-बड़े और गांव गली में ऐसे बैठे कोई उनको नौकरी नहीं मिल रही कितने ऐसे बहुत बुद्धिमान है लेकिन खाने पीने तक की व्यवस्था सही नहीं है कितने ऐसे हैं कि उनको ज्ञान नहीं बिल्कुल बुद्धि मंद भी है लेकिन वो कार में चल रहे हैं भारी व्यवस्थाएं हैं पूर्व पुण्य और पूर्व पाप अब हम क्या करें नया ऐसा

कार्य करें कि पूर्व को विध्वंस कर दें वह है भगवान का आश्रय और भजन दूसरा कोई नहीं भजन के द्वारा हम अपने कर्मों को जो हमारी उन्नति में बाधा पहुंचा रहे हैं उनको विध्वंस करें अब वो किस कोटि के कर्म है कितने दिन भजन करना पड़ेगा इसका कोई परिचय नहीं जानता है इसीलिए हम धर्म पूर्वक वर्तमान में चले कोई पाप ना करें और नाम जप करें और विश्वास यह रखें कि एक ना एक दिन हमें सफलता मिलेगी जिस दिन हमारे असफलता प्रदान करने वाले पाप कर्म वह नष्ट हो जाएंगे पक्का मिल जाएगी मान लो आप पढ़ रहे हो तो आप पढ़ाई में एक साथ नाम को भी ले लीजिए जो व्यर्थ में समय नष्ट कर रहे हैं वह नाम में आ जाइए तो यह नाम क्या करेगा आपकी उन्नति करेगा आपकी बाधाओं को नष्ट कर देगा एक हमने घटना किसान की देखी कि एक किसान का खेत है और वह दूसरे के खेतों से पानी आता है सामने जिसका खेत है अगर वह खेत व शत्रु पक्ष खरीद लेता है तो उसकी खेती सूख जाएगी अब वो बहुत से चलने वाले भजन करने वाले अब वो लोग गए और उस जो खेत बेच रहा था शत्रु पक्ष उसका जाकर के

बोला जितने तुम लाख हजार बोलोगे हम देंगे लेकिन खेती हमें दोगे और वह पक्ष जो इतनी क्षमता नहीं रखता था अगर उसको वह खेती ना मिले तो उसका खेत सूख जाएगा धर्मात्मा पुरुष उसके पास उतना धन नहीं है और उसने भगवान से प्रार्थना की कि भगवान आप जानते हो कि अर्थ है नहीं अगर वह खेत नहीं मिला तो हमारी खेती सारी सूख जाएगी वो पानी नहीं आने देगा जानते हो वहां से उत्तर आया था जब आदमी भेजा गया था तो यह उत्तर आया था कि इनके घरों में संत जन भोजन करते हैं य धर्म से चलते हैं अगर यह हमको पैसे ना भी देंगे तो खेती हीं को लिखाए गे हम वह व्यक्ति जाकर के उनको काफी पैसे बढ़ा कर दे रहे उन्होंने उनको नहीं दिया यहां तक कि वो कचेहरी तक उनके साथ गए उनको नहीं दिया और उनको दिया जिनके पास अर्थ भी कम था और ज्यादा पावर भी नहीं था ये किसने किया भगवान ने यह बात हम और वह मिलते ही खेती में सारी सुविधाएं उनकी पहुंच जाएंगी जल आदि की जहां से ट्यूब बेल था अगर वह ना मिलता तो उनकी खेती सुखा देते ऐसे लोग स्वभाव के थे हम नहीं जाने देंगे हमें

लगता है धर्म से चला जाए और नाम जप किया जाए यह जीवन भर बात याद रही कि इनके घर में संत पाते हैं ये धर्म से चलते हैं अगर ये पैसे नहीं देंगे तो भी खेती लिखा देंगे हम बेचेंगे तो उसी को बेचेंगे व चाहे जितना कम दे पैसा यह बात किसने उनके दिमाग में डाली अर्थ तो बड़ा प्रलोभन की चीज होती है भैया बेची रहे तो जब जहां हमें ज्यादा मिल रहा है उसी को देंगे लेकिन धर्म की बात तो हम अगर धर्म से चलते हैं नाम जप करते हैं तो भगवान मति बदल देते हैं हमें लगता है यदि हम नाम जप करें और धर्म से चले तो भगवान सहायोग करते हैं य देखा गया है हर उन्नति हमारा पाप कर्म गिराना चाहता है पाप कर्म बाधा देता है अब जैसे कोई अभी वर्तमान में पाप कर रहा और बढ़ता चला जा रहा है तो उसका पूर्व का पुण्य उसे बढ़ा रहा है वर्तमान में पुण्य कर रहा है व गिरता चला जा रहा है वो उसका पूर्व का पाप नष्ट हो रहा है उसको गिरा रहा है अब जब पुण्य इस कोटि का हो जाए नाम जब भजन कि उसको विध्वंस कर दे तब मंगल होता है अब यह बात समझ में आ जाए तो है अब चार

दिन हम जपे और सोचा हमारी नौकरी नहीं लगी तो हम नाम जप छोड़ दे तो फिर धैर्य पूर्वक ना जपने के कारण फिर अश्राथ जप करें और खूब अच्छी पढ़ाई करें और प्रयास करें तो हमारा प्रयास और भगवान की कृपा दोनों इससे इससे हर काम हो जाएगा हमारा प्रयास धैर्य पूर्वक और नाम जप तो भगवान आपको परम धनी बना देंगे वो लक्ष्मी पति है क्या कमी है उनके पास वो हमारा जीवन सुधार देंगे इतना विश्वास कर लो जरूरी थोड़ी कि नौकरी के द्वारा ही तुम्हें धन मिलेगा वो कहां से कैसे व्यवस्था करते ये तो भगवान का जो भजन करते हैं वो जानते हैं वो किस दिशा से आपको धनी बना देंगे आप को पता भी नहीं चलेगा इसलिए हमें लगता है भगवान का आश्रय लो नाम जप करो खूब कर्तव्य कर्म करो जो पढ़ाई लिखाई हर प्रयास करो आज नहीं तो कल सफलता मिलेगी ऐसा तो नहीं कि इतना भाग्य में लिखा है कि हम असफल होते ही चले जाए ऐसे में निराश भी नहीं होना हमें भाग्य बदलने के लिए मानो देय मिली हम प्रयास करेंगे आखिरी दम तक प्रयास करेंगे सफलता तो मिलेगी नहीं तो हमारा नाम जब चल रहा

है भजन बल से क्या नहीं हो सकता सब कुछ हो सकता है ठीक है निराश मत होए मेरी तो यही ना अध्यात्म की कि नाम जप कीजिए और खूब पढ़ाई कीजिए खूब मेहनत कीजिए परिणाम अगर एक बार सही नहीं आ रहा दो बार सही नहीं आरहा तो आखिरी में आएगा ही भगवान आज्ञा करते हैं कर् मने वाधिकारस्ते मा फले कदाचन भगवान आज्ञा करते हैं सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभो जया जयो सुख दुख में लाभ हानि में जय पराजय में समान भाव रख आगे बढ़ तो विजय मिल जाएगी अब एक दो बार हार गए तो हम निराश नहीं होंगे हम आगे बढ़ेंगे हराने वाले जो पाप कम उनको भस्म करेंगे नाम जप के द्वारा भगवत सेवा के द्वारा भगवत आराधना के द्वारा भगवान पुकारने से आराधना करने से अवतार ले लेते हैं तो फिर हमारा काम क्यों नहीं बन जाएगा वो बना देंगे विश्वास रखो पर हमारा कौन सा पाप कर्म इतना प्रबल है जो आगे नहीं बढ़ने दे रहा उसको नाम नष्ट करेगा अब कितने नाम में नष्ट होगा यह पता नहीं इसलिए हम जपते रहे श्रद्धा विश्वास पूर्वक अच्छा इसमें यह तो है नहीं कि तुमसे कुछ मांगा जा रहा हो

कि भाई हमको झूठ में फसा दिया जाए इतना तो सुना है भगवान का नाम सत्य है और नाम जपना तुम्हारे काम उसमें पैसा तो लगना नहीं अच्छा वो फ्री टाइम में जप लो जब आप खेलकूद में गेम आदि मनोरंजन में लगते हो उस समय नाम जप कर लो और खूब मन से पढ़ाई करो खूब मेहनत करो जीवन मंगल में हो जाएगा निराश मत होना मस्त रहना यह संसार संघर्ष से जीता जाता है इसमें संघर्ष करना पड़ेगा खूब जो जितना मेहनती है जितना पुरुषार्थी उतना आगे निक निकलता है उदास नहीं होना निराश नहीं होना हमें रद है हमें अपने को र दना नहीं काम क्रोध लोभ मोह मद म सब गुलाम बनाए हुए हैं हे नाम जपक सिंव दार कोई परास्त ना कर पाए ऐसा मानव दे है परब समझ नहीं पा रहे इसलिए हम कह रहे नाम जप करो बहुत संभल कर के चलो नहीं संसार में जीवन व्यतीत करना बड़ा कठिन कोई नशा मत करो भाई गंदे आचरण मत करो नाम जप करो देखो यहां आए हो श्री जी की कृपा हुई तो इतनी बात मान लो कोई नशा मत करो कोई गंदा आचरण मत करो नाम जप करो तो पीछे जो हमसे गलतियां हुई भगवान उसको क्षमा कर देंगे

आगे हमारा जीवन मंगलमय होगा रवि सिंह जी महाराष्ट्र से राधे राधे राधे राधे महाराज आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी आपकी आज्ञा अनुसार नाम जप आपके वचनों पर चलने का पूर्ण प्रयास कर रहा हूं और शास्त्र स्वाध्याय भी कर रहा हूं महाराज जी गीता के पांचवे अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन जी के प्रश्न में कर्म त्याग और भक्ति पूर्व कर्म करने को लेकर भगवान कहते हैं कि मुक्ति के लिए कर्म का परित्याग और भक्ति में कर्म दोनों ही उत्तम है उसको बात समझना होगा

कि कर्म का परित्याग नहीं किया जा सकता समझना पड़ेगा उसे कर्म योग बनाना पड़ेगा कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता हमारा तदात्मानं और कारण शरीर अर्थात स्वभाव अंतःकरण पांच भौतिक शरीर इसमें हमारी तदा आत्म वृत्ति हो गई है अब हमारे अंदर प्रकृति का वेग हमारे अंदर का मतलब इन शरीरों की रचना प्रकृति से है स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर कारण शरीर तक हमारा इसमें तदात्मानं का वेग उदर का वेग काम का वेग क्रोध का वेग यह सब बहुत प्रकार के वेग हैं प्रकृति क्रियाशील हर्षण है प्रकृति परिवर्तनशील हर्षण है ऐसे शरीर अंतर का अंतःकरण और स्वभाव यह तीनों परिवर्तित होते रहते हैं अब इनका सुधार करना है पहला सुधार यह है कि कोई भी कर्म हमारे लिए नहीं है हमारे लिए कर्म नहीं है हमारा जो रू कर्मों से बिल्कुल अलग है उसमें कोई अभाव नहीं है उसका कोई आकार नहीं है तो हमारा स्वरूप है आकार में आकर हम फस गए हैं अब इस आकार से हमको हटना है तो हम पहले दो विभाग कर्म के करते हैं एक सत्कर्म और एक निषिद्ध कर्म निषिद्ध कर्म के

द्वारा दुर्गति होती है अज्ञान बढ़ता है जिसे पापा चरण कहते हैं तो पहले हम पाप कर्म का त्याग करें उसको तो करना ही नहीं है पक्का समझ में आ रहा बात हमको निषिद्ध पाप कर्म नहीं करना अब पाप किसे कहते हैं जिसे शास्त्र और गुरुजनों ने गुरुवाणी ने रोका है कि नहीं करना है उसे पाप कर्म कहते हैं जिसे महत् पुरुष कहते हैं यह नहीं करना है निषेध उसे पाप कर्म कहते हैं और जिसे यह करना है उसे विधि कर्म उसे शुभ कर्म कहते हैं पहले निषिद्ध कर्मों का संपूर्ण तया त्याग कर

दे किंचन मात्र ना तो चिंतन हो और ना क्रिया हो निषिद्ध की पापा आचरण की ध्यायतो विषयात ते सुप जायते संगा सं जायते काम काम क्रोध भी जायते क्रोधात भोत सम्मोहा सम्मोहा स्मति विभ्रम स्मृति भंसा बुद्धि नासो बुद्धि नासा प्रण जब कोई उपासक विषयों का ध्यान करता है चिंतन करता है उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है आसक्ति से उसे भोगने की इच्छा होती है भोगने की इच्छा काम प्रबल हो जाती है अगर भोग नहीं मिला तो क्रोध आ जाता है बाधा पड़ने पर और भोग मिल गया तो लोभ तृष्णा बढ़ जाती है और पुनः पुनः भोगने की दोनों में हानि है तो सूलतानमूवी से ढका हुआ गर्भ तो निर्णय नहीं है कि बच्चा है कि बच्ची है ऐसे ही तमोगुण से ऐसा छा जाता है भोग वासना की कामना व निर्णय नहीं कर पाता कि वास्तविक क्या यह सत है या असत है तो अब उसके अंदर सम मूलता छा गई सूता छाने तो उसकी स्मृति नष्ट हो गई मैं कौन हूं मेरा कर्तव्य क्या है स्मृति नष्ट होने से बुद्धि का नाश हुआ बुद्धि नाश हुई तो गलत काम कर बैठा इसलिए अंदर से ही विषयों के पहले ध्यान का

चिंतन का जो त्याग कर सकता है वो बाहर पाप कर्म का त्याग कर सकता है नहीं तो पाप कर्म निश्चित बनेंगे जिससे पाप कर्म बन रहे हैं वर्तमान में वह ज्ञान चाहे जितना वाणी से बोल ले उसको आंतरिक ज्ञान नहीं हो सकता उसको स्वरूप बोध नहीं हो सकता वह सही में अपने स्वरूप में स्थित नहीं हो सकता अब निषिद्ध कर्मों का त्याग करके जब सत्कर्म किए जाते हैं तो सत्कर्म में कर्ता भाव होता है तो भी मड़ता नहीं छूटती हो रहा है सत्कर्म लेकिन करता भाव है तो मढ़ता बनी रहेगी अहंकार

आत्मा करता हमति मन्नते मैं ऐसा किया मैं ऐसा किया मैं ऐसा करूंगा मैं ऐसा कर सकता हूं यह अहंकार पुरुष की भाषा होती है वह परमात्मा चिंतन करने वाला उपासक नहीं है अब सत्कर्म के करने का अहम त्याग दे यह हमारे गुरु प्रताप से हो रहा है सत्कर्म का मैं करता नहीं हूं जिन्होंने मुझे आदेश किया है वही मेरे से करवा रहे हैं जो हमें शास्त्र आदेश है गुरुवाणी का आदेश है वही गुरु साहब हमारे अंदर बैठ कर के के वही करवा रहे जो हम काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर पर विजय प्राप्त कर पा रहे हैं असत क्रियाओं का त्याग कर पा रहे हैं जो सत क्रियाएं हो रही है ये गुरु प्रताप से होते हैं अगर हमारी कहीं भी फतेह हो रही है तो गुरु प्रताप से अपना कहीं कोई बल जो नहीं देखता तो कर्ता भाव हटते ही उसके हृदय में दिव्य ज्ञान का उन्मेष होता है जैसे दर्पण पुछ जाए तो रूप दिखाई देने लगता है जहां मल हटा करता भाव का अहंकार का सोय उसको स्वरूप की तरफ अपने आप से ज्ञान दृष्टि दृष्टि तीन प्रकार की होती है एक होती है चक्षु इंद्रिय जिससे हम माया

जनित रचना ही केवल देख सकते हैं और बुद्धि में एक होता है ज्ञान नेत्र जिससे स्वरूप का चिंतन होता है हृदय में होता है प्रेम नेत्र जिससे भगवान के साकार लीलाओं का चिंतन होता है तो जब कोई उपासक ज्ञान मार्ग का होता है तो उसको बुद्धि में दिव्य नेत्र प्रकट होते हैं तब उसे बोध हो जाता है कि ना मैं स्थूल हूं ना सूक्ष्म हूं ना कारण हूं मैं आत्म स्वरूप हूं मैं ब्रह्म स्वरूप हूं परमात्मा स्वरूप हूं ऐसा अनुभव होता है जो अकाल है जो माया तीत है जो द्वंदा तीत है वही हमारा स्वरूप है ऐसा ज्ञान में और भक्ति में उसे हम अपने आराध्य देव के स्वरूप में देखते हैं तो अब हमारा कर्ता भाव यदि ज्ञान के वाला हट गया तब तो ठीक अगर नहीं हट रहा तो हम समर्पण कर दें दो कर्ता भाव हटाने के ये तो सर्वानी कर्माणि म सनस मत परा सारे कर्म समर्पित सुबह से लेकर सय तक शयन से लेकर सुबह तक हर कर्म भगवान के चरणों में समर्पित परमेश्वर के चरणों में समर्पित तो उस कर्म बंधन से जीव मुक्त हो जाता है कर्म का त्याग करना नहीं है निषिद्ध कर्म का

त्याग करना है और कर्म को योग बना देना है भगवत प्रसाद स्वरूप हमारे अंदर जो बुद्धि है जो मन है जो संपत्ति है उसके अनुसार हम परिवार की समाज की सबकी सेवा करेंगे और चाहेंगे कुछ नहीं सबकी सेवा करेंगे उनसे बदले में हम धन्यवाद भी नहीं चाहेंगे अगर धन्यवाद भी चाहने की कि वह कम से कम पानी पी केर हमको धन्यवाद दे हमारी तरफ मुड़ कर के बोले कि बड़ी आपकी यह नहीं अगर कोई चा नहीं है तो परमात्मा प्राप्ति के योग कराने वाला व कर्म बन गया जितना दैन्य होकर के हम गुरु प्रताप से कर्म करेंगे और गुरु प्रताप को ही समर्पित कर देंगे तो हमें कोई कर्म बांध नहीं पाएगा कर्म त्याग करने की बात नहीं कर्मण वाधिकारस्ते मा फले सु कदाचन फल के त्याग की बात भगवान ने बहुत जोर की कही जहां कर्म त्याग की बात आवे वहा कर्म समर्पण समझना जहां कर्म त्याग की बात आवे वहा निषिद्ध कर्म त्याग की बात समझना वहां कर्म कर्म त्यागा ही नहीं जा सकता ऐसे बैठ गए तो हम कोई कर्म नहीं कर रहे ऐसा नहीं वो अंदर से शुरू है तीन शरीर है ना तो सूक्ष्म शरीर से

शुरू है हाथ पैर बांध के बैठे जाओ तो भी आप कर्महीन नहीं हो गए आपका आंतरिक कर्म चल रहा है ये भी तो चिंतन भी तो कर्म है क्रिया है शांत थोड़ी बैठ सकते हैं तो हर क्रिया को हर चिंतन को सत बनाओ और सत को सदगुरुदेव को अर्पित कर दो भगवान को अर्पित कर दो बस जीवन मुक्त हो जाता है कर्म त्याग की बात को समझना पड़ेगा वहां जैसे यह तो सर्वा कर्म म सनस सनस का मतलब होता त्याग देना तो म सनस मेरे में त्याग कर अर्थात समर्पित कर दे उसको समझना होगा कर्म त्याग हो ही नहीं सकता ज्ञान से जब अपने स्वरूप का बोध होता है तो वो देखता है कि शरीर की क्रियाएं माया के द्वारा यंत्र बत हो रही मैं करता नहीं हूं भक्ति के द्वारा भक्त ये देखता है कि गुरु बल से इष्ट बल से ये सारी क्रियाएं हो रही है मैं करता नहीं हूं जहां मैं करता है वहां माया फसाए जहां मैं करता हटा वहां वो मुक्त कहा जाता है चाहे भक्त हो चाहे ज्ञानी हो दोनों को जाकर अहंकार रहित ही होना होता है कर्म का वेग अंतिम समय तक चलेगा कोई बिना क्रिया किए एक क्षण भी नहीं रह

सकता चाहे सिद्ध हो या साधक हो क्रिया होगी अब सिद्ध कर्ता भाव रहित है और साधक कर्ता भाव रहित होने के लिए कर रहा है और अज्ञानी अहम भाव से उसको कर रहा है तो वह जन्म जन्मांतर उसका भोग भोगे साधक मुक्त होने के लिए कर रहा है और सिद्ध मुक्त हो चुका है अब उसकी स्वाभाविक क्रियाएं हो रही जैसे पेड़ पत्ते को डला आता नहीं है हवा के संयोग से डोल रहा है ऐसे ज्ञानी के शरीर से क्रियाएं माया जनित आपको दिखाई देंगी गुणन गुण वर्तन ते पर वो करता नहीं है खाता पीता चलता फिरता सोता जागता हुआ भी वो कुछ नहीं कर रहा साधक यह सब करते हुए इनसे मुक्त होने के लिए इनको भगवान को समर्पित करता है विषय यह सब करते हुए उनका भोगो भोगता है क्रियाएं तीनों से हो रही एक जीवन मुक्त है एक जीवन मुक्त होना चाहता है और एक को पता ही नहीं वो उसी को सत्य मान करके कर रहा है इसलिए पुनरपि जनन पुनरपि मरणम पुनरपि जननी जठरे सनम बार-बार जन्म बारबार मरण और बार-बार नाना प्रकार के भोगों की विलासिता अनंत जन्म व्यर्थ हो जाते हैं समझ पा रहे आप जैसे

अश्राथा कुछ भी है कि कलयुग में जल्दी श्रद्धा विश्वास जैसे हम इसका इसका मतलब य है कि यहां का आहार संग गलत है इस समय बहुत ही गंदी प्रवृत्तियां फैल रही बहुत गंदा आहार है तो इसलिए टिक नहीं पाता दिमाग में क्योंकि जैसा आहार होगा वैसा रक्त बनेगा जैसा रक्त होगा वैसी स्थिति आएगी ना अच्छा संग अगर अभी आप 10 20 50 महात्माओं को एक भजन करते हुए देखें तो आपकी लगन बढ़ेगी अब आपको जब यहां से निकलेंगे बाहर वृंदावन से तो आपको वही समाज मिलेगी जो खा रही है पी रही मनमानी आचरण कर रही भोग विलासिता करे जेब में मोबाइल है जब जो मनावे स देख लो जो तो अब इससे क्या स्थिति क्या बनेगी भगवता आकार वृति बनेगी इससे तो विषयक बनेगी तो कुसंग की बहुतायत अशुद्ध भोजन अशुद्ध विचार इसलिए हमारी श्रद्धा फैल जाती है श्रद्धा टिकाऊ नहीं अभी पवित्र भोजन करो और अच्छों का संग करो जो भगवत मार्ग के पथिक है और से बचो तो अभी तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास दृढ़ हो जाएगा समझ पा रहे आप बहुतायत है व्यभिचार की बहुतायत हो रही है हमारे शब्दों को समझ

रहे हैं आज ये नहीं समझा जाता कि हमारा तन पवित्र होना जीवन के लिए परम पवित्र मार्ग है तन को भ्रष्ट किया जा रहा है तन को अपवित्र चरित्र को कुछ समझा ही नहीं जा रहा और चरित्र और धर्म चला गया तो पैसा किस काम का फिर तुमको पैसा थोड़ी सुखी कर पाएगा ये हमारी समाज की बुद्धि जो है धीरे-धीरे गिरती चली जा रही है अब हमको ऐसी समाज का अगर संग मिलेगा तो हम श्रद्धावन बन पाएंगे क्या तो जाके प्रियन राम बै देही तजय ताहि कोटि बैरी समम जदपि परम स सनेही वो स्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं सूरदास जी कह रहे जाके संग कुमति मति उपज करत भजन में भंग तजो रे मन हरि विमुख को संग जो हरि से विमुख है उनका संग ना हो साध समागम हो तो हमारी श्रद्धा टिके और कुसंग होगी तो श्रद्धा तो क्षीण हो ही जाएगी श्रद्धा बहुत कपूर की तरह है अगर उसको अनुकूल वातावरण मिले गुप्त रखी जाए तो पुष्ट बनी रहेगी खुला प्रतिकूल वातावरण उड़ जाएगी प्रतिकूल वातावरण मिले तो अभी भगवान हरि सब भूल जाएंगे तो ये डिपार्टमेंट है अलग-अलग है इधर तो उधर फिर तो अब

जैसा संग मिलेगा वैसा रंग चढ़ेगा ना एक बार वहां चले जाओ और खाओ पियो झूमो नाचो फिर य आओगे तो तुम्हें जलन पैदा हो जाए य सब क्या है यार और उधर जाओ तो आपको लगेगा यह सब क्या है नहीं नहीं ऐसा नहीं अब जो उनका रंग आपके ऊपर चढ़ेगा तो फिर यह रंग तो छूट ही जाएगा और वह जल्दी चढ़ेगा वो रंग जल्दी चढ़ेगा क्योंकि बहुत जन्मों से वही रंग चढ़ा रहा है यह तो गुरु कृपा से गुरुवाणी की कृपा से संतो की कृपा से चढ़ता है वह तो ऐसे चढ़ जाएगा फ्री में फ्री में चढ़ जाएगा तो ऐसे फ्री में चढ़ाने वाले बहुत हैं यह चढ़ना बहुत कठिन है गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे सुत दारा धन लक्ष्मी पापियो के घर होए संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दो अगर भगवत प्रेमी संतों का संग मिल रहा है भगवत चर्चा मिल रही ये दुर्लभ बात भगवान ने दी अगर इसको पकड़ लो तो निहाल हो जाओ आकाश कुमार जी बिहार से ध राधे राधे गुरुजी गुरुजी अहंकार और आत्मविश्वास में क्या अंतर है आत्मा को जानते ही नहीं हो तो आत्म विश्वास क्या है आत्मा को जानते तो अहंकार अंतःकरण में एक

धर्म है जैसे निश्चय किसी बात का होता है व बुद्धि से होता है संकल्प किसी बात का बनता है वो मन से होता है चिंतन किसी बात का बनता है व चित्त से होता है और क्रिया का स्वीकार करना मैंने किया मैं करूंगा मैं बहुत बड़ा विद्वान हूं मैं धनी हूं मैं भगत हूं मैं मैं मैं मैं य अहंकार है अंतःकरण में स् फुरित होता है जिस मैं के आगे कुछ भी लगे उसमें अहंकार होता है और आत्मविश्वास को लोग भाषा में कहते हैं आत्मा को तो जानते ही नहीं कोई तो अपना स्वरूप ही है भाषा में

कहा जाता है हमारे आत्मविश्वास है कि ऐसा निश्चित हो जाएगा आत्मविश्वास का मतलब होता है दृढ़ विश्वास वो आत्मा को तो नहीं समझ रहा है उसका कि मेरा आत्मविश्वास कहता मेरा हृदय कहता है कि यह बात दृढ़ ऐसा ही होगा या ऐसा मैं कर सकता हूं ऐसा करूंगा ये आत्मविश्वास का तात्पर्य वहां दृढ़ता से होता है वो दृढ़ विश्वास करके ऐसा बोल रहा है आत्म तत्व तो निर्विकार है आत्म तत्व को जब जान जाओगे तो फिर ये सब बातें ही खत्म हो जाएंगे वहां तोन सोचते न कांति अपने स्वरूप में स्थित प्रसन्न आत्मा परमानंद में स्वरूप य हमारा स्वरूप है बड़ा सुखम पर उसे जा बोले आत्मा से कह रहा हूं यार उसका मतलब होता है मैं हृदय से कह रहा हूं आत्म तत्व का तो ज्ञान नहीं है बोले आत्मा से कह रहा हूं तो हृदय से कह रहा हूं मतलब मैं हृदय से सच्चाई से कह रहा हूं कि मैं ऐसा मैं ऐसा समझ पा रहे हैं आप हां आत्म विश्वास का मतलब हृदय से कह रहा हूं और ऐसा है वो आत्म को तो जानता ही नहीं है आत्मविश्वास का मतलब हृदय से कह रहा हूं सच्चाई से कह रहा हूं

दिल से कह रहा हूं तो उसे वो आत्मा कहता है आत्म तत्व तो इन सबसे पड़े है परे है स्थूल से भी सूक्ष्म से भी और कारण से भी जी जोशना बंसल जी मुंबई से राधे राधे महाराज राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपकी चमत्कारिक वाणी ने मेरे जीवन में अद्भुत बदलाव लाया है उसके लिए आपका कोई इसमें चमत्कार नहीं आपकी जो श्रद्धा है वो चमत्कारिक है आपने बात को पकड़ लिया तो आपका मंगल होने लगा अगर बात ना पकड़े तो हमारी बात का क्या महत्व है तो सार बात जब देखी गई तो आपके पक्ष में

आई कि आपकी श्रद्धा और आपका विश्वास कि आप संत वाणी को पकड़े तो आपका मंगल शुरू हो गया इसलिए धन्यवाद तो उल्टा आपको है कि आपने बात सुनी आपने बात मानी आप वैसे चल रहे हो तो श्री जी भगवत कृपा आपके ऊपर है पक्का है नहीं तो संतों की वाणी पर चलना बड़ा कठिन है विश्वास ही नहीं होता है हमारी दृष्टि हमारी श्रद्धा इस कोटि से मलिन हो चुकी कि ऐसा लगता है कि भगवान कहां है भगवान के नाम जप करने से क्या होगा अरे नहीं देखो ना वो कहां वो तो शराब पीता है व ऐसा करता है और

देखो मौज मस्ती में है उसको ऐसे उदाहरण माया दे देगी तो यह धन्यवाद है कि आप धर्म से चल रहे हैं आप संतवाणी मान रहे हैं भगवान की कृपा आपको संभालती रहेगी आगे बढ़े यह जीवन का लक्ष्य केवल इतना ही नहीं कि खान पान की अच्छी सुविधा हो जाए नाना प्रकार की भोग सामग्री मिल जाए फिर भी शरीर छूटेगा सब छूट जाएगा फिर इसके बाद क्या है तो इसके बाद है राधा नाम जो आपको लोक परलोक सब जगह आनंद प्रदान करेगा इ परलोक सकल सुख पावत मेरी सो भैया कृष्ण गुण संचो प्रिया प्रीतम का नाम प्रभु का नाम सर्व मंगलकारी है जो धन्यवाद है जो इस नाम को स्वीकार करके आगे बढ़ रहे हैं वो अपने जीवन को सुखी कर लेंगे आज नहीं तो कल निश्चय अनुभव हो जाएगा जी प्रशांत सिंह पुंडीर जी राधे राधे गुरुदेव गुरुदेव हम सभी जीवों को पूर्व जन्म का पाप पुण्य वर्तमान जन्म में क्यों मिलता है पूर्व जन्म में क्यों नहीं खत्म हो गया पाप आज करोगे मुकदमा पाच सात साल चलेगा और जेल आजीवन मिलेगी उसी दिन क्यों निपटारा नहीं हो गया आप समझते हो ना आज छेड़ो ग दो चार दिन

लाठी डंडा चलेंगे इसके बाद मुकदमा चलेगा केस फिर इसके बाद सजा होगी आजीवन अब आप प्रश्न करो कि ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उसी दिन निपटा देते पूरे जीवन भर क्यों उसका विधान है पीछे वर्ष जो खेती किसान ने की उसके गोदाम में वही खाएगा आज बोया आज ही खा लेगा क्या छह महीना तो लगती है ना फसल में छ महीना तो लगता है समय तो लगता है मेहनत लगती है ऐसे ही यह जन्म जन्मांतर का खेल चल रहा है तुम्हारे शरीर बदलने से तुम्हारे कर्म तुम्हें नहीं छोड़ देंगे पूरा हिसाब कर्मों का है अब जैसे मानव देह मिली है तो थोड़ा पूर्व कर्मों को भोग लो नया इतिहास जो रचा है तुमने पाप और पुण्य का अपने रजिस्टर वह तुमहे आगे भोगना पड़ेगा मिटा दो तो मिटा दो जीवन मुक्त हो जाओ पीछे का भी अभी भी यह अवसर है भजन ब से तप बल से भगवान का आश्रय लेकर और ना मिटाओ तो नया पाप करते चले जाओ फिर आगे बढ़ते चले जाओ तुरंत हिसाब थोड़ी होता है भाई चोरी की तुरंत गोली मार दी जा ऐसा नहीं होता हां बहुत भारी अपराध बन जाएगा तो फिर ऐसा भी विधान हो जाएगा अगर आप ज्यादा

उद्दंडता करोगे ऐसे पकड़ा जाता है पिटाई होती है फिर उसको केस को जब न्यायालय में पेश किया जाता है तो कई महीने ल जाते हैं उसको साक्षी देने में कि हां नहीं असली चोर है जब पक्का पता चलेगा तब उसको सजा मिलती है यहां तो ऐसा विधान है भगवान के यहां इससे लंबा विधान है एक कर्म का फल हो सकता है तुम्हें एक कल्प भोगना पड़े इसीलिए तो डरो नार की गतियां से डरो उन पाप कर्मों से डरो जिनका यहां दंड नहीं मिलता हो गुप्त हो जाते हैं वो ऐसी तैसी कर देते हैं बड़े बड़ों की

कर देते धज्जिया उड़ा देते हैं मिट्टी में मिल जा आते हैं हां इसलिए भाई पाप कर्म से बचो उसका य ना सोचो कि उसी जन्म में क्यों या इसी जन्म में क्यों पाप कर्म एक तुम्हारा गोदाम है जो तुमको भोगना पड़ेगा अवश्य में भोग तव्य उसी को मिटाने के लिए यहां है मानो दे यहां मिटाने की जगह और सजा रहे हैं और बढ़ा रहे हैं उस पाप कर्म को फिर दोष देंगे कि भगवान ऐसा क्यों करते हैं इसलिए एक भी कोई ऐसी सजा आप बताओ जो य सुख कारी हो पाच मिनट किसी माई बहन को छेड़ दिया अब इसका परिणाम पूरे जीवन भोगना पड़ेगा वो रिपोर्ट होगी आपकी पिटाई होगी आपको दंड मिलेगा फिर केस चलेगा फिर उसमें आपको जेल होगी सजा होगी नाना प्रकार के क्लेश हो पाच मिनट में विचार किया उसका दंड मिलेगा पूरे जीवन भोगना पड़ेगा होता है कि नहीं होता तो फिर पूर्व जन्म के कर्मों के हिसाब के विषय में संशय क्या करना है अरे वो बूढ़ा हो जाता है कोई कोई निर्णय मिलने तक सजा उससे ज्यादा पहले ही वो भोग चुकता है फिर इसके बाद सजा होगी 10 वर्ष की सजाओ 20 हज उसको जुड़वाना

अब क्या बोलोगे कर्म का दंड है भोगना पड़ता है इसलिए पाप कर्म से बचो भगवान कहते हैं सर्व धर्मानना मेकम शरणम ब्रज अहम तवाम सर्व पापे भयो मोक्ष श्याम मा सुचा मैं तुम्हें परम पवित्र करूंगा मैं तुम्हें निर्विकार कर दूंगा भजन करो भगवान का आश्रय लो गंदे भोजन गंदा आचरण गंदा पे पदार्थ य सब त्यागो अभी आनंद आने लगेगा पूर्व के पाप नष्ट होने लगेंगे नवीन अच्छे कर्म होने लगे भगवान का भरोसा है जीवन पार हो जाएगा मंगल में न बाबा कैसे कृपा आनंद है हमारी की शोभा है बाबा अपना ध्यान रखा करो बाबा हां हम तो श्री जी का ध्यान रखते श्री जी हमारा ध्यान रखती है उन्हीं की कृपा से सुरक्षित है हमारे ध्यान ध्यान का विषय श्री जी है क्योंकि सुरक्षा आनंद संतोष तृप्ति ये उन्हीं के ध्यान से होगी अगर मुख में नाम है हृदय में ध्यान है बस हो गया अब जीवन में और कुछ नहीं चाहिए हम जब उनका ध्यान करते हैं तो आनंद सिंध को भी आनंद प्रदान करने वाली हैं जब श्री जी हमारी थोड़ा सा नेत्र ऐसे कर लिए तो हमारे जो लाल जू महाराज को पीड़ा भाई तो

वोह तो निवेदन कर तो श्री जी ने नहीं सुनी पर सखी ने निवेदन किया छाड़ दे मानिनी मान मन धरि बो हे प्रियाज आप मान मत धारण करो देखो प्रत सुंदर सुघर प्राण वल्लभ नवल वचन आधीन सो इ तो कत करव ये तो आपके वचन आधीन आपकी शरण में है और जपत हरि विवस तव नाम प्रतिप विमल मन सतो ध्यान ते निमि नहीं ट प्रिया जू हम इस बात के साक्षी हैं कि लाल जू महाराज हर समय राधा राधा राधा रटते हैं और आपका ही ध्यान करते हैं तो इसलिए प्यारी जो आप छाण दे मानिनी मान मन धरि वो तो हमारा जो ध्यान का विषय है वह हमारे प्रियालाल है और उनकी कृपा हमें चारों तरफ से घेरे हुए आनंदित कर रहे उसी कृपा का स्वरूप है कि आप सब दर्शन देते हैं आकर के आप श्री जी की जूठन पवा हैं आके उसी से हमारा आनंद है बाबा आप आप ही से शोभा है हम 24 घंटे में से 15 घंटे ठाकुर जी के चरणों में रहते हैं गिरिराज जी के पुजारी है जी पर वहां पर ठाकुर का ध्यान रहता है जी पर घर जब पहुंचते हैं जी तो इतनी सारी विधाओ में फस जाते हैं बिल्कुल फिर मन वंचित रहता है हां पर अगर हम

नाम जप शुरू कर दें और घर में कार्य करें तो क्या बाधा हो सकती है प्रगत में ठाकुर सेवा शरीर से हो रही है लेकिन मन खाली रहता है उसको खाली ना रखें तो मन का अभ्यास अगर बन जाएगा सेवा के समय नाम जप का वह घर में भी बना रहेगा तो बात बनेगी देखो गिरिराज महाराज की असीम कृपा है कि आप अपने शरीर से उनकी सेवा कर रहे हैं पर मन मन खाली रहता है अगर नाम जप करो नाम जप अंदर से होता है तो ये मन भी ठीक हो जाए मन भी स्वतंत्र रूप से जो विषयों में जा है फिर यह ना हो तो आप घर में भी आनंदित रह सकते हैं सेवा रहित जब आप है तो संसार की सेवा में जब है नाम जब चल रहा है तो आनंद आने लगेगा अगर नाम जब चलाओ प्रभु जी तो बाद में मन जाए ठीक है हां जय गिरिराज धन्यवाद जय गिरिराज जय गिरिराज महाराज जी जैसे सभी कहते और आप भी कहते हैं कि जो अपने जो वर्तमान जीवन में जो सुख दुख है वो अपने पूर्व कर्मों के हिसाब से है और जो पूर्व कर्मों क उससे पूर्व परम जी तो जो इस रिश्ते में जो सबसे पहला जन्म हुआ होगा जी वो किस आधार प हो इच्छा स्वतंत्र

इच्छा इच्छा का त्याग दो अभी खत्म हो जाएगा तुम्हारा जन्म इच्छा ही तुम्हें इस रूप में लाने की वृत्ति है अगर इच्छा का त्याग हो जाए तो अभी जीवन मुक्त हो जाओ सारी साधना इच्छा के त्याग की है वेद कहता है एक हम बहु श्याम मैं एक बहुत रूपों में हो जाऊं इसी इच्छा ने अपने को प्रकाशित कर दिया इसमें हम तुम 100 दो नहीं है ये घड़े हैं 100 दो इनमें एक प्रकाश है जैसे एक करोड़ घड़े रख दे ना तो एक करोड़ सूर्य नहीं हो गए सूर्य तो एक है एक करोड़ घड़े में प्रतिबिंब पड़

रहा है ऐसे बच्चा हम तुम सब ये जितने हैं ना इनमें एक बिजली चल रही है उसे राम कहो श्याम कहो ब्रह्म कहो परमेश्वर कहो अकाल कहो उसके अनंत लाम है ना हम है ना तुम है अब उस बिजली को जान लो उस पावर को जान लो तो अभी खत्म हो जाएगा और उस पावर को ना जानने का हमारी अलग इच्छा आपकी अलग इच्छा इन्हीं इच्छाओं से हम बन गए तुम और कोई नहीं हो वही पावर हो उस पावर अपने स्वरूप को परमात्मा स्वरूप को भूलकर देह भाव में आ गए देह भाव में आने के कारण इच्छाओं का जाल फैल गया आपकी इच्छा से आप अपनी इच्छा का त्याग कर दो अभी देख लो आप कौन है इच्छा नहीं होनी चाहिए न सोचत न कांति तो ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा इसी बात की साधना की जाती है बच्चा इच्छा त्याग की अब जब तक इच्छा त्यागो ग नहीं तो प्रश्न बनता रहेगा क्यों क्यों क्यों चलता रहेगा नाम जप करते हुए कोई इच्छा ना मंगने पावे तो आप जान जाओगे आप कौन है आप ये ढांचा नहीं है इसी ढांचे में सारे सुख दुख है आप में कभी ना सुख था ना दुख था आप परमानंद स्वरूप है अब इस ढांचे का राग कैसे

तू छूटेगा उसी बात के लिए शरणागति होती उसी के बाद ये साधना प्रारंभ होती है और बिना उसके तो क्यों में तुम्हारा चलता ही रहेगा क्योंकि देह भाव में खड़े हो तुम खड़े हो ना बच्चा देह भाव में ईमानदारी से बताओ तो बच्चा इस देह भाव से जब तक मुक्त नहीं होगे तब तक क्यों का उत्तर तुम्हे कैसे मिल सकता है इसीलिए कहा जा रहा है नाम जप करो नाम जब तुम्हारे उस संचित को जो गोदाम जमा है कर्मों का उसको भस्म करेगा अभी अंतःकरण जो मलिन है इसको निर्मल करेगा तो जो भाषा संत बोलते हैं वही आप बोलने लगेंगे हम आपको सच्ची कहते हैं हमारा ऐसा जिद्दी स्वभाव था कि अगर हमको इस मार्ग में अनुभव ना होता तो हम कह देते कि बचपन से लगे लेकिन मामला लेकिन तुम्हें पक्का कहते हैं जैसी नाम की महिमा लिखी है और जैसी शास्त्रों में संतों ने कहा है जब उस मार्ग पर चले गए तो हर कदम पर वह अनुभव सत्य होता रहा हां यह सत्य है यह सत्य जैसे जैसे चढ़ते चले गए वैसे ही सत्य का अब इसके बाद कुछ असत्य है ही नहीं कुछ असत्य नहीं बचा वही वह है वही व है दूसरा

कोई है घट घट में वही रमा हुआ है दूसरा कोई नहीं अब बच्चा अपनी इच्छा अगर भोगों की है तो पुरुष हो आप वो ना देखो इच्छा में पुरुष हो कि नहीं हो तुम अंदर से लग रहा है ना कि मैं पुरुष हूं यह सच्ची ईमानदारी की तुम हां कहते चले जाते हो अगर यही शरीर की इच्छा खत्म हो जाए तुम्हारी कि मैं पुरुष स्त्री नहीं हूं मैं आत्म स्वरूप हूं अब आपकी मांग क्या है क्योंकि भूख इसकी मांग प्यास इसकी मांग है नींद इसकी मांग है जन इद्री के भोग की इसकी मांग है नेत्र इद्री केंद्री

जितनी भी इंद्रिया सब ये माया का विलास आप आप उसके दृष्टा आपको क्या अनुभूत है आपको कौन सा दुख छू रहा है कौन सा सुख अब बिना ज्ञान के बच्चा तो हमारी पशु बुद्धि बनी रहेगी और दुख की परंपरा चलती रहेगी यह दुख ऐसा समझो बच्चा जैसे स्वप्न में हम सो रहे हैं हमने देखा कि हमें कोई पकड़ लिया चाकू से मार रहा है अब आप कैसे बचा सकते हो उसके आसपास अंग रक्षक खड़े कर दो सब राइफल लिए खड़े बचाया जा सकता है नहीं अगर उसको दुख से बचाना है तो एक उपाय उसको जगा दो जोही जगेगा

तो ना कोई बंधन था ना कोई चाकू मार रहा था ना तो बच्चा बिल्कुल ऐसे ही हम इस समय अज्ञान में स्थित है यदि हमको यह पता है कि शरीर में हूं ये घोर अज्ञान है उमा कह मैं अनुभव अपना सत हरि भजन और जगत सब सपना अगर आप साधना नहीं करोगे तो आप कितने भी प्रश्न करते जाओ उत्तर मिलते जाए आप बिल्कुल नहीं समझ पाओगे इसके लिए साधना की पूज्य राधा बाबा से जब कोई प्रश्न करता था पूछते थे कितने लाख नाम जप करते हो तो जब उत्तर देता था इतना तो बोले इतना हमारी तरफ से एक महीना जप

के आओ फिर हम तुम्हें उत्तर देंगे क्योंकि जब तक आपके अंदर पात्रता नहीं होगी तो आप समझ नहीं पाओगे इसलिए बच्चा तुम ही वह हो जिसकी खोज करनी है दूसरा कोई नहीं यह पक्की बात समझो खोज करने चले थे और जब जब खोज हुई तो जिसकी खोज कर रहे थे खोजने वाला ही वही निकला दूसरा कोई नहीं निकला अब इस बात को समझ पाओ तो समझ पाओ ना समझ पाओ तो बच्चा नाम जप करो आगे समझ जाओगे नाम जप करोगे तो सब जान जाओगे बिना पूछे जान जाओगे अगर तुम्हारी श्रद्धा है तो तुम्हारा जो प्रश्न है तुम्हारे पास उत्तर आ जाएगा विश्वास करो य में आ जाएगा तुम्हारे हृदय में आ जाएगा तुम्हें ग्रंथ में मिल जाएगा अगर संतों पर श्रद्धा नेत्र चंचल मत करो जब नेत्र हमसे मिला रहे तो इधर उधर मत यही है यही यही तुम्हें समझने नहीं दे रहा जिस दिन तुम समझने में लक्ष्य में दृष्टि लगा लोगे समझ जाओगे यही चाल रोकनी है बच्चा यही है यह लक्ष्य से हटाता रहता है मन उसी को एकाग्र कर लो लक्ष्य में लगा लो तो प्राप्त कर पाओगे तो यही इधर उधर देखना है प्रश्न करना है परब्रह्म

का बात करनी ब्रह्म ज्ञान की और स्थिति हमारी जीरो से ऊपर उठना नहीं चाहती यह आपकी कमी है आप वही हो कुछ आपको नहीं चाहिए बस जान जाओ भाई तो जान जाओ अब इसका ऐसा तो है नहीं कि दुकान की मिठाई की 100 ग्राम मंगाकर हम खवा दे ऐसा तो नहीं है यह तो गुरुजनों की चरण रज और जीवन भर उनकी आराधना करने का ये फल आया है कि बात समझ में आई जो आप सुन रहे हो प्रभु आप बड़े भाग्यशाली हो जो आप परमार्थ की बात जानना चाहते हो पर इतनी हमारी प्रार्थना है आचरण पवित्र रख के नाम जप करो हर उत्तर मिल जाएगा आचरण पवित्र कर लो जानते हो ना आचरण पवित्र करना और नाम जप करो प्रभु हम आपके मित्र हैं अगर आपको समझ में ना आ जाए तो हमें बता देना नाम जप करो आचरण पवित्र रखो हर ज्ञान अंदर प्रकाशित हो जाएगा किसी से पूछने की जरूरत नहीं आगे नाम अपने आप रास्ता दिखाई देता है यह रास्ता है ये चलो यह लक्ष्य है यह लक्ष्य के विरुद्ध है नाम गुरु है नाम गुरु है नाम इष्ट है नाम ही साधन है नाम ही साध्य है पकड़ पाओ तो भाई पकड़ लो ना पकड़ पाओ तो फिर तुम्हारी

बुद्धि को अभी कुछ ठोकर बदा है इसलिए नाम नाम नाम सब कुछ नाम यह जीवन की सार बात आपको बता रहे हैं नाम चतुर वही है जो नाम को पकड़ लिया अंदर ही अंदर नाम चल रहा है उसी को देख रहा है उसी को सुन रहा है उसी को दुलार कर रहा सिद्ध हो गया पर नाम को पकड़ पाना कोई खेल तवा सा नहीं है ज्ञान की बातें कर सकते हैं दूसरों को उपदेश कर सकते हैं पर निरंतर नाम नहीं चला सकते नाम चला लो जीत गए नानक नाम जहाज है चढ़े से उतरे अब चढ़ जाओ नाम के ऊपर कह तो रहे गुरुदेव चढ़ जा चढ़ने का मतलब क्या है यह चल रहा है वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु राधा राधा राधा राधा राधा राधा चल रहा है रात दिन शवास की माला चल रही सिद्ध हो गया चला के देख लो नाम स्वास दो बिलक चलत है इनको भेद नमो को भावे स्वास नाम नाम ही नाम स्वास को भेद मिटाए रोम रोम जब रग रग बोले तब कुछ स्वाद नाम को पावे अंदर चलाओ जब यह पूरा जीवन गुरु को समर्पित हो जाता है तब अंदर नाम चलता है ये भी लिख लो यह वाहेगुरु का खालसा वाहेगुरु की फतेह यहां जो माया पर विजय

प्राप्त करके जो गुरुदेव के वचन पर स्थित हुआ जाता है वह गुरुदेव को समर्पित मेरा तन समर्पित मेरे प्राण समर्पित मेरा मन समर्पित कोई अधिकार नहीं मेरा मेरे तन पर ये गुरुदेव का अधिकार तो फतेह ही फतेह है विजय ही विजय है इसलिए नाम जब सब करो नाम जप के बिना बात नहीं बनेगी ना किसी जंतुर से ना किसी आशीर्वाद से ना किसी जादू टोना से हमारी प्रार्थना मान ली जाए लेकिन नहीं सुनी जाती सुनी इसलिए नहीं जाती कि उसको तत्काल में यह चमत्कार चाहिए कि वो भोग भोगे और तुम तपस्या करके उसके दुख मिटा दे बस ऐसा तो हमें सिद्धांत शास्त्र में नहीं मिला इसलिए खूब नाम जप करो सब ज्ञान हो जाएगा सब मंगल हो जाएगा मस्त हो जाओगे इस समय माया का नशा इतना चला हुआ है कि उसको समझ में ही नहीं आ रहा कि हमें जो अवसर मिला है मानव दे यह केवल भगवत प्राप्ति के लिए मिला परमात्मा प्राप्ति के लिए मिला है जीव को समझे वो विषय सेवन में मस्त है प्रिया सिंह जी जयपुर से राधे राधे जी राधे राधे महाराज आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम भगवन कवि जब जिंदगी

में ऐसी परिस्थिति आती है जब खुद के अस्तित्व से नफरत हो जाती है केवल विपरीत परिस्थितियों ही दिखाई देती हैं मन असीम विचलित अवस्था में होता है भगवान में भी विश्वास खत्म सा हो पाप पाप पक्का समझो चाहे हम हो चाहे आप हो यह परिणाम पाप कर्म का है हमारे द्वारा जब पाप कर्म हो जाता है तो वाह्य और आंतरिक दोनों विपरीत होता छा जाती है बाह्य विपरीत भक्तों के जीवन में देखी गई लेकिन लेन आंतरिक विपरीत नहीं आपने इष्ट और आंतरिक और बाह्य तीनों बातें कह डाली भगवान में अ श्रद्धा आंतरिक नकारात्मक सोच और बाहर विपरीत परिस्थिति यह केवल पाप बड़े-बड़े महापुरुषों के जीवन में बाहरी विपरीत आई लेकिन अंदर की भगवत भावना वह कभी मिटी नहीं कभी नहीं मिटी पूज्य श्री गुरुदेव तेग बहादुर सिंह का जब चरित्र पढ़ रहे भारी विकल होता हो रही थी कि सिर्फ यह सामर्थ्य भगवान में दूसरे में सामर्थ्य नहीं है जितनी सहनशीलता इन गुरुजनों में देखी गई य साक्षात भगवान ही अवतरित होकर के हमको आचरण सिखा रहे अपने धर्म की निष्ठा की विचार करके देखिए उनको

लोहे के पिंजड़े में बंद कर दिया गया विविध प्रकार की यातनाएं दी गई लेकिन अपने धर्म के प्रति तनिक भी कहीं दावा डोल नहीं हुए बड़ा प्रलोभन और बड़ा भय और यहां तक कि प्राणों की आहुति दे दी लेकिन धर्म नहीं छोड़ा और आजकल हम क्या कहते हैं भगवान के प्रति अ श्रद्धा हो गई क्या हुआ तुम्हें तुम्हें क्या हुआ अरे बीच चौराहे पर खड़े होकर के चाकू से मैं चमड़ी सहित बाल उधेर लिए गए और बीच से आरा चलाया गया तो मुंह में थूक दिया उसके धर्म का परिवर्तन तुम बात करते हो ईश्वर ने सारे धर्म बनाए हैं अगर वो एक ही की तरफ चलाना होता तो ये कई धर्म क्यों बनाते कई मार्ग क्यों बनाते हैं आपका अपना धर्म आपका अपना धर्म लेकिन बला तुम राजपद और शासन के द्वारा परिवर्तन करना चाहो तो गर्दन उतार सकते हो धर्म का परिवर्तन नहीं हो सकता महापुरुषों ने अब आपको धर्म के प्रति अ श्रद्धा हो जाना अंदर नेगेटिव चिंतन करना इसीलिए एक शब्द निकला है पाप कोई ऐसा पाप है जो अंतर और बाहर तुम्हारे दुख प्रकट दुख शब्द ही पाप से प्रकट होता है अगर पाप नहीं

है तो दुख नहीं विपरीत आई तो तो क्या दुख हुआ क्या गुरुदेव श्री अर्जुन देव जी महाराज तेरा किया मीठा लागे विपरीत तो नहीं आ रही और ऐसी विपरीत इन जब महापुरुषों के चरित्र पढ़े ना मतलब एक विकल हुई कि ऐसे महापुरुषों को जहां लाड़ लड़ाना और उनका प्रतिप दुलार करना चाहिए वहा ऐसी लीला आप कर रहे हो तो लगा कि और किसी से नहीं वो अपने आप से अपनी लीला कर रहे प्रभु के सिवा तब हुई बालू उनके श्री अंग में डाली जा रहे कितना भयानक तपते हुए कड़ा पर बैठा दिया जाता है लेकिन आह नहीं निकलिए मुस्कुराते यही कहते तेरा किया मीठा लागे रावी नदी में जाकर स्नान करने की अनुमति ली और वही शरीर पूरा कर दिया तनिक भी किन चिन मात्र अपने धर्म से विचलित देखो हम उनकी संताने हैं हम उनके सेवक हैं कि वो हमें शिक्षा देकर गए हैं कि हमें अपने धर्म के लिए कितना कष्ट सह कर के भी धर्म को नहीं छोड़ आप कहते हो श्रद्धा हो गई ऐसा कौन सी बात है इसका मतलब है कि हमारे अंदर इतना अज्ञान भर गया अंधकार भर गया है कि हम इ यही तो यह आपका प्रश्न नहीं यह

लाखों की है काम बने तो जय भगवान और काम बिगड़ गया तो बात बिगड़ गई फिर हम श्रद्धा आप देखो ना इन महापुरुषों को प्रलोभन ऐसा और भय ऐसा दोनों कोटि का चरम सीमा का लेकिन धर्म परिवर्तन नहीं किया अपनी श्रद्धा को ही लेकर के और आज हम उन्ही के बल से चल पा रहे हैं उन्हीं महापुरुषों के बल से चल पा रहे हैं य क्या देखो आप गंभीरता समझो आज सत्संग में हमने कहा हम भगवान प्रसन्न हो जाए तो जेल ही मांग रहे हैं सजा ही मांग रहे हैं अगर वह नहीं दे रहे कृपा करके तो अ श्रद्धा हो रही है राष्ट्रपति स्वतंत्रता दिवस था तो एक जेल में गए और कहा समस्त कैदियों को सामने लाओ लाए आज जिसकी जो इच्छा हो मांग लो बोले साहब हमको सर्दी में एक कंबल मिलता है दो मिलने हां हमको साबुन वो जसका जो जो सबने मांगा सबको यस एक खड़ा हुआ बोले साहब आप जो बोल रहे हैं सत्य है परम स बोले मुझे जी जेल से मुक्त कर दो बोले इसको मुक्त कर दो अब सब बोले मुझे मुक्त कर बो नहीं तुमने साबुन मांगा तुमने ये मांगा तुमने ये मांगा सब पास हो गया एक बार मांग अब

आपकी मांग क्या हो सकती है भगवान का प्रेम भगवान का साक्षात्कार जीवन मुक्त होने के लिए ज्ञान यह मांग तो की नहीं जेल की तो मांग की इसी माया जेल की मांग कि मुझे यह मिल जाए मुझे यह मिल जाए मुझे यह मिल जाए अगर हमारे प्रभु तुम्हें नहीं दे रहे कि इतने में फंसे हुए हो तो तुम्हें अ श्रद्धा हो गई तुम्हारा चिंतन नकारात्मक हो गया हमें लगता है हम लोग बच्चे जैसे हैं अभी धर्म को नहीं समझते शास्त्र की आज आजकल यही तो बहुत दुखद बात हो रही है कि अगर हम संत के पास जाते तोन टंकी नाटक पसंद करते हैं अगर तुम्हें सच्ची बात बता रहे हैं कि गुरुजनों ने कहा नाम जप करो गुरुजनों ने कहा सच्चाई से चलो अच्छे आचरण करो दूसरों की सेवा करो तुम सुखी हो जाओगे यह बात समझ में नहीं आती झूठी बात तुम्हारी समझ में आ जाती है कह रहे हैं कि तुम्हें कुछ नहीं देना 10 मिनट केवल नाम जपना शुरू करो ईमानदारी से 10 10 मिनट बढ़ाते चले जाना एक दिन परम सुखी हो जाओगे अब यह बात कैसे समझ में आएगी सत्य बात सत्य मार्ग असत बुद्धि को समझे में नहीं आता

व चाहे इसीलिए फिर जो सत मार्ग को नहीं जानते ना तो फिर ऐसे ही नाटक में फस जाते हैं या नाटक करने लगते हैं हे भाई आपके कर्म जो पाप कर्म है दुख देने वाले वो जब तक भस्म नहीं होंगे तो कोई पैदा नहीं हुआ सृष्टि में कि तुम्हें सुखी कर सके उस पाप कर्म को नष्ट करने के लिए भगवान का नाम विराजमान सब गुरुजनों की वाणी पढ़कर देखा है सब ने यही जयघोष किया है कि नाम नाम नाम पकड़ लो नाम से मंगल होगा और जीवन भर उसी का गुरुजनों की कृपा से अनुष्ठान होता र इसलिए हर प्रश्न का उत्तर नाम है अगर नाम तुम्हारे जीवन में नहीं तो तुम अधूरे हो चाहे जितना ज्ञान बोल लो माया की चाल को नहीं पहचान पाओगे माया की फांसी को नहीं काट पाओगे अगर नाम में निष्ठा हो गई तो कुछ भी हो एक अद्भुत आनंद एक अद्भुत बाहरी विपत्तियां उसे छू नहीं सकती परमानंद की बाढ़ आ जाती है सत्य मार्ग ढकता चला जा रहा है सत्य मार्ग पकड़ने वाले बहुत कम लोग हैं सत्य बात सुनने वाले बहुत कम लोग हैं सबको यह चाहिए कुछ ले दे के हमारा काम हम करें पापा चरण हम भोगे

विषय और तुम सिद्ध तभी माने जाओगे कि हमको कुछ जंतुर बांध दो कि मैं सदैव सुखी रहूं अगर इस सृष्टि में ऐसा होता हम आपको बता देते कि शास्त्रों में विधान लेकिन कहीं नहीं है कहीं नहीं विधान है विधान है तुम जैसा करोगे तुम्हें भोगना पड़ेगा तुम जैसा करोगे वही तुम्हें भोगना पड़ेगा तो क्या करो राम कृष्ण हरि जो भी नाम तुम्हें प्रिय हो प्रिय हो जो गुरुदेव ने तुम्हें नाम दिया है उसे पकड़ लो सुखी हो जाओगे इस संसार समुद्र से पार होने के लिए नाम नौका है नाम जहाज है अगर इसको पकड़ लिए तो तर गए ना पकड़ो तो फिर जो भोग बधा है उसको भोगो जाकर के कहीं किसी की ताकत नहीं कि छूमंतर कर दे और तुम सुखी हो जाओ ये अपने लोग बचपन से बाबा जी हैं इस मार्ग के खूब मतलब गुरु कृपा से बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुषों के दर्शन में कभी ऐसा नहीं बताया उन्होंने जब उनसे प्रश्न हुआ तो उन्होंने कहा ऐसे ऐसे साधन करो इस साधना से तुम इस विकार पर विजय प्राप्त कर लोगे तो यह बात आजकल शास्त्र की समझ में नहीं आती है सबको समझ में आता है कोई साधु

महात्मा ऐसा बताओ जो जाते ही कुछ ले दे के और वो छू हो या कुछ ऐसा कर दे कि हम ठीक हो जाए बावरे लोगों की बावरी भीड़ इस बात को समझ नहीं पा रही कि अवश्य में वो भोग तव्य कृतम शुभ शुभम शुभ अशुभ कर्म को भोगना पड़ता है जैसे तुम यहां आए तुम्हारे मन में कामना कोई थी या अगर बाबा जी के यहां जाए कामना पूरी हो जाए तो हम जान जाएंगे बाबा जी चमत्कारी है अब संयोग बैठ गया आपके शुभ कर्म का और यह शुभ कर्म तो बना ही संत दर्शन के लिए भावना करके धाम में भगवान के आए और वह

शुभ कर्म का संयोग बैठा और काम हो गया अरे बोले बाबा बड़े चमत्कारी समझ रहे हो अब शुभ कर्म का संयोग खत्म आपने कामना की बोले कोई काम तो बना नहीं गए तो थे काम नहीं बना क्योंकि व अशुभ कर्म इस सच्चाई को समझ लो तो तुम पाखंड से बच जाओगे दम से बच जाओगे हे हम बिल्कुल आपसे प्रार्थना करके बात कर रहे हैं भगवान के पिता दशरथ जी से एक अपराध बन गया श्रवण कुमार को शब्द वेधी बाण से मार दिया उन्होंने उस कर्म का फल निश्चित किया कि जैसे मैं पुत्र वियोग से मर रहा हूं ऐसे तुम भी प्राण त्याग हो गए तो भगवान पुत्र रूप में अवतरित हुए पर वो विधान पूरा का पूरा सुरक्षित रहा भगवान के वियोग में हाराम हाराम कहते दशरथ जी प्राण त्याग नहीं अब ये लीला का क्या मतलब है कोई वशिष्ठ जी से बढ़कर ज्ञानी महात्मा है क्या त्रिका लज है वो छू छा कुछ कर देते नहीं अवश्य में भक्त कृतम कर्म शुभास हां भगवान का भजन करते शरीर छूटा तो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी यहां के सुख दुख मिटाने के लिए प्रयास मत करो जैसे बिना चाहे दुख आ रहा है कोई नहीं

चाहता ऐसे बिना चाहे सुख आ जाएगा नाम जप करो भगवत प्राप्ति के लिए नाम जप करो दुख की जड़ मिटा देने के लिए ये छोटी-छोटी पत्तियां डाले काटने के लिए नहीं जड़ से दुख वृक्ष नष्ट हो जाएगा जड़ से परमानंद की ऐसी मूल उत्पत्ति होगी तुम निहाल हो जाओगे मस्त हो जाओगे बस नाम पकड़ लो अब यह नाम पकड़ना कोई खिलवाड़ थोड़ी देखो नाम जप करके थोड़ी देर में मन भुला देता है नाम को अगर नाम पकड़ लो तो विश्वास मानो परम सुख परम सुख का मतलब यह नहीं कि तुम्हारे आगे चेक आ जाएगी तुम्हारे आगे सांसारिक भोग आ जाए ये तो बहुत छोटी बात है तुम दुख सुख सहना सीख जाओगे बड़ी से बड़ी विपत्ति में भगवान को छोड़ने की बात नहीं आएगी कि हम प्राण त्याग सकते हैं लेकिन धर्म नहीं भगवान नहीं भजन नहीं यह मिलता है भजन से और ऐसा परम पद में आरूढ़ होता है उस महान परमेश्वर की पदवी को प्राप्त होता है जहां ना जन्म है ना मरण है ना दुख है ना शोक है ना चिंता है ना भय है किसी भी तरह का कोई दुख स्पर्श नहीं कर सकता ऐसे पद की प्राप्ति होती है हमें लगता है

किसका प्रश्न है हां हमें लगता है कि आपकी सोच खराब हो रही कोई कर्म बिगड़ गया जिससे व ऐसा निर्णय दिला रहा है नाम जप करो भगवान का नाम जप करो बार अपने मुह से बोल दो राधा नाम जाप कर ले हम तो बोलते हैं राधा राधा राधा हमारा तो जीवन है पकड़ो नाम जप हा नाम जप करो नाम से सुधार हो सकता है और तो फिर बाहर से विपत्ति आना बाहर से शरीर रोगी हो जाना कर्म का फल है अंदर से हमारे विचारों में दोष ना आने पावे हमारा विचार ना बीमार होने पावे तो आनंद बना रहेगा अगर अंदर का विचार दूषित हो गया तो फिर सब नष्ट हो गया सब नष्ट हो गया स्मृति गई विचार गया तो क्या रह गया जी राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा रा राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा राधा

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा हे राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधारा राधा

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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