एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #466 · 19 फ़रवरी 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
संदीप बंसल जी हिसार से राधे राधे महाराज राधे राधे महाराज जी महाराज जी जब जाप शुरू किया है तब शरीर में अलग तरह के अनुभव हुए जैसे आज्ञा चक्र पर स्पंदन व सहस्त्र चक्र पर अनुभूति जिसकी असीमानंद की अ हां अभी अभी स्थाई नहीं अभी अभी चुपचाप पहले हमको यह देख के बताओ अंदर से कि हर समय भगवत स्मृति रहती है उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सोते जागते ईमानदारी से बच्चा देखो हम तुम बैठे वृंदावन में बैठे नहीं तो अगर मरीज अपनी सही बात बता देगा तो डॉक्टर जो है सही औषधि दे पाएगा विस्मरण हो जाता है गुरु हो जाता है ना तो अभी कोई चक्र नहीं खुला है थोड़ी देर मान लो जैसे आज्ञा चक्र है अब यहां आपको एक भार सा महसूस हो रहा है गुदगुदा हट से महसूस हो रही तो आप भगवत चिंतन की एकाग्रता कर रहे और ब्रह्मचर्य में दम नहीं है हमारी बात समझना आपके शरीर के ब्रह्मचर्य में दम नहीं है अब वो जब हम चिंतन गाढ़ करते तो फिर वो देखो एक घंटा ना साग दृष्टि करके देखना ऐसे मंत्रा का करो दर्द शुरू हो जाए क्योंकि अगर ब्रह्मचारी हो ये दर्द
नहीं हो जब सड चक्र का भेदन हो जाएगा तो देव भाव रही नहीं जाएगा भैया अभी आप पुरुष हो मांगे हैं आपके अंदर तो अभी कुछ नहीं मिला है देखो समझदा है चाहे ज्ञान में हो चाहे भक्ति में हो जब कुछ धरोहर मिलेगी ना इच्छा खत्म हो जाएगी शरीर भाव नहीं रहेगा मैं पुरुष में स्त्री भाव खत्म हो जाता है देह भाव भगवत भाव आ जाता है या जैसे ज्ञान में ब्रह्म भाव भक्ति में भगवत भाव आ जाता है यह पहचान है कि हमें कुछ मिला है क्या पहचान कोई इच्छा नहीं रह गई ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचत न कांति जिसके पा लेने के बाद कुछ पाना बाकी नहीं रहता जैसे हम बहुत प्यासे हो छक के बढ़िया शीतल जल पीने को मिल गए अब प्यास बुझ गई ना तो चाहत अगर है तो फिर प्यास कैसी बुझी अगर चाहत है पानी देख कर के मन ललचा रहा है तो अभी प्यास नहीं बुझी अगर भर पेट पी लिया है तो फिर यही होगा होगा ना नहीं अब नहीं अब कछु नाथ न चाही मोरे मतलब मिल गया ना वो भैया अभी नहीं मिला नाम जप करो और अपने में कोई सद्गुण को मत देखो अगर गुणा भिमान आ जाएगा तो मार्ग रुक
जाएगा भगवान सद्गुण देते हैं तो भगवान ने दिया है मेरे थोड़ी सद्गुण मेरी कमाई थोड़ी सद्गुण मेरे गुरु ने दिया मेरे इष्ट ने दिया तो उसका अभिमान नाने पावे और हर समय कोई ऐसी वासना ना स्पूत हो यह ध्यान रखो जो भगवान से विमुख कर दे पापा चरण की इतना तो कर लो आगे काम ईश्वर कर देते हैं दिव्यता वह प्रदान कर देते हैं हमारे मन बुद्धि की ताकत नहीं कि उन तक पहुंचे वो हमारे मन बुद्धि में आ जाते हैं उनके लिए कोई रोक नहीं हमारा मन भगवत स्वरूप हमारी बुद्धि भगवत स्वरूप हो जाती है समझ रहे हां खब नाम जप करो बड़ी कृपा है जो आप अध्यात्म में चल रहे हैं बस इस धन को छुपाया जाता है जितना नाम जप करोगे जितना अच्छे शास्त्रों का स्वाध्याय करते हुए मन बुद्धि को सत मार्ग में लगा लगाओगे उतनी दिव्यता आती चली जाती है पर वो दिव्यता विनय रूप में जागृत हो डर लगता है कि इस पद से हट ना जाए क्योंकि सामाजिक चुनौतियां रहती है ग्रस्त चुनौतिया अब आपको डरना इसलिए नहीं कि तुमको कोई पकड़े हैं तुमको कोई पकड़ के परमार्थ पर चला रहा है
अभी भरोसा नहीं हुआ क्या आपको आप नहीं चल रहे हो आपको कोई पकड़े हुए है जिन्होंने तुम्हें परमार्थ दिया है वही तुम्हारा हाथ पकड़े हैं उनको पुकारते रहना जहां तुम्हें लगे कि मैं गिरने वाला हूं तो आप देख लेना तुरंत रोक लेंगे करो सदा तिन के रखवारी जिम बालक राखे मसारी तो डरना भी नहीं कि हम गिर जाएंगे नहीं जब मम्मी साथ चलती है ना तो बच्चा छलांग लगाता है दौड़ता है क्य उसको पता है गिरने दे मेरी मम्मी है और ज्यादा उद्दंडता करेगा तो डाट दे मेंे चल पास चल वो प्रभु हमारे मां के करो सदा तिनके रखवारी जिम बालक राखे मतारी हे मम्मी तो अल्पज्ञ होती हैं वो सर्वज्ञ नहीं है मम्मी अल्प सामर्थ्य वाली होती है लेकिन यह मम्मी जो है यह सर्वज्ञ है सर्व सामर्थ्य शली है हमको क्या डर अब हम क्यों गिरंग हम भगवान के आशित है तुम हो माता च पिता तुम हो बस वो कह रहे मां की तरह मैं रखवाली करता हूं तो हमको बेटे की तरह बने रहना है अगर टाफी का मन होता है दुकान देखी मम्मी की अंगुली पकड़ के मम्मी की तरफ देखता है तो क क्या टॉफी नहीं
समझ गए मम्मी को उचित लगा तो दे दिया और नहीं उचित लगा तो डाट लगा दी तू ऐसे ही हर चीज को कहता रहता है ऐसे ये समझना है हमको कि हम जो चीज मांगे भगवान ना दे तो समझ लो मम्मी की तरह वो देख रहे हैं कि यह खाने से इसको यह देने से यह वस्तु प्रदान करने इसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी मेरे से अलग हो जाएगी वो नहीं देंगे जिससे हमारा काम चल रहा है उतने चलाए और खूब भजन करके भगवत प्राप्ति कर ले ठीक है भारत शर्मा जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरा प्रश्न है कि मैं जब भी मंदिरों में दर्शन करता हूं तो मेरा मन व्याकुल हो जाता है तब मेरे मन में रोने का भाव प्रकट होता है यह भाव किस कारण से होता है मुझे उसका कारण क्या है यह जानना है पाप ज्यादा होने के कारण हो र है मेरी भक्ति कहीं ना कहीं अपने प्यारे के सामने जब जाते तो चाहत तो कहीं ना कहीं छुपी उन्हीं की है क्योंकि वस्तु व्यक्ति स्थान जहां भी हम प्यार करते हैं वह छुपे हुए बैठे उन्हीं को प्यार करते हैं जिस शरीर से वह चले जाते हैं तो चाहे
जितना प्री संबंधी का शरीरों से फूंक देते हैं जलाई देते हैं तो गया कौन वही भगवत अंश हम वही अंश है वह हमारे स्वामी हैं तो अंजाने में भी हम प्यार उन्हीं से करते हैं तो भगवान के सामने जो हमारा सात्विक भाव प्रकट होता है तो रोने का मन होने लगता है ऐसा नहीं कि बराबर ही प्रकट होता रहे कभी रजोगुण हुआ तो जाओगे रोना नहीं आएगा पक्का बराबर ये कोई एक स्थिति थोड़ी आप सिद्ध थोड़ी हो गए ये तो थोड़ा सा वर्तमान का सात्विक भाव आया है तो अपने प्यारे के सामने रोने की इच्छा हो गई कभी प्यारे के सामने गंदी बात भी आ जाएगी देख लेना क्योंकि स्थिति के बिना मन में तीन गुणों का प्रभाव बनता है सतोगुण रजोगुण तमोगुण कभी को बहुत बढ़िया भाव बन जाए सब बातें समझ में आ रहे हैं कभी क भाव बिगड़ जाए केवल भोग चिंतन हो कभी कहो गुस्सा आ जाए ये अंतर अभी कोई सिद्ध थोड़ी हो गए तो ये जैसे निद्रा आलस्य तमोगुण आदि की वृत्तियां क्रोध आदि रजोगुण भोग आदि की वासनाओं की सतोगुण दया भक्ति थोड़ा भाव होकर के आंसू बहाना ये सतोगुण लेकिन यह प्रेम
थोड़ी हो गया क्योंकि प्रेम एक बार उदय होगा वह फिर प्रति क्षण वर्धमान वो बढ़ता रहता है पर व जीवन मुक्त महापुरुषों के हृदय काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर शरीरा भिमान और अन्य इन पूरा करकट जो भरे हुए हैं इनके बीच में प्रेम उदय नहीं होता पहले इनको साधना के द्वारा हटाया जाता है यह थोड़ा सात्विक भाव है पर इसका हम कोई गुण में ना ले कि मतलब पक्की बात समझ लेना आप लोग मतलब तो गृहस्ती में अपने लोग जैसे कभी क इतना भाव आया कि प्रभु के आगे रो रहे प्रभु के लिए रो रहे हैं और कभी इतना भाव बिगड़ गया कि भोगों के लिए रो रहे हैं नहीं प्रभु के आगे भोगों के लिए प्रभु प्यारे नहीं लग रहे भोग संसार प्यारा लग रहा है संसार के संबंध प्यारे लग तो अभी थोड़ा मन में छल है कपट है ये निश्छल और निष्कपट निर्मल होकर प्रभु को समर्पित हो जा फिर बहे वह स्थाई आंसू हैं अभी हम इन आंसुओं का विश्वास नहीं करते क्योंकि कहीं भी किसी के लिए भी निकल पड़ते हैं नहीं अभी प्रेम के आंसू काट डाले जाए तो भी नहीं निकलेंगे ध्यान रखना जिनके हृदय में
प्रेम के आंसू प्रकट करने की सामर्थ्य है वह हर कष्ट सहेंगे उसमें आंसू नहीं आ सकते वह रोएंगे तो सिर्फ प्रभु के प्रेम में रोएंगे लेकि अपने लोगों की ऐसी स्थिति तो नहीं है इसके लिए हम उसे प्रेम तो कह नहीं सकते थोड़ा सतोगुण का भाव आ गया और बढ़ाना चाहिए इसे नाम जप करे भगवत लीला गुणावा सुने खूब बारबार दर्शन करे और इस भाव को बढ़ाए और अपने को सबसे छोटा समझे तो प्रेम प्राप्त हो ही जाएगा क्योंकि हम भगवान के अंश है और इसी प्राप्ति के लिए हमें मानव देह मिली हम
खूब भजन करें अच्छे आचरण करें अभी इसको कुछ माने नहीं जैसे हम थोड़े से सात्विक भाव को को तो मान लिया कि हम में सद्गुण आ गया लेकिन कितने दुर्गुण है ईमानदारी से देख के बताओ अंदर है ना अब हम कैसे मान ले कि ये सद्गुण है क्योंकि इस सद्गुण के आते सारे दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं प्रेम प्रेम है सूर्य दुर्गुण है अंधकार जैसे सूर्य उदय होने के पहले ही अंधकार नष्ट हो जाता है ऐसे प्रेम उदय होने के पहले ही निर्वा सनिक चित हो जाता है जहां सूर्य उदय हुआ तोब अंधकार का नाम नहीं रहेगा अगर हमारे अंदर प्रेम उदय हो जाए तो काम क्रोध लोभ मोह मद मतसर ये नहीं ंगे प्रेम का एक स्वतंत्र अस्तित्व है तो हम इसे प्रेम तो नहीं कह सकते क्योंकि छिन घटे छिन बढ़े सो तो प्रेम न होए अघ प्रेम पिंजर वसे प्रीति कहावे सोय छन छन में भाव बदल रहे हैं भी प्रीति नहीं प्रीति तो अघ एक रस भगवद का व चाहे मंदिर फर जाए और चाहे ना जाए वो जहां भी खड़ा है वो उन्हीं प्रभु के प्यार में है कोई क्रिया कर रहा है या चल रहा है खा रहा है या पी रहा है या
वो हर समय उन्हीं के प्यार में रहता है एक रस भगवत रस में तो हमको वहीं पहुंचना है तो नाम जप करें लीला गुण श्रवण करें सबकी सेवा करें और सबका फल मांगे कि प्रभु से प्रेम हो जाए उसको हम प्रभु के प्रेम के लिए तो वो साधन भजन प्रभु स्वीकार करके हमें कृपा करके प्रेम दे देंगे ठीक है डॉक्टर निलेश गुप्ता जी राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी जब कर्म ही पूजा है तो क्या हम अपना अपना कार्य निष्ठा और कर्मठता से करके प्रभु की प्राप्ति नहीं कर सकते अचित भाव भगवत भाव केवल कर्म करोगे तो उसे तुम्हें भोगना पड़ेगा और दो प्रकार होते हैं उसके एक होता है निषिद्ध कर्म पाप कर्म और एक होता है पुण्य कर्म विधि कर्म जिसका शास्त्र विधान करते हैं और अवश्य में भोग तव्य कृतम कर्म शुभा शुभम कर्म तो भोगना पड़ेगा भगवत प्राप्ति तो नहीं होगी इससे इसी कर्म को जब हम भगवत भाव में कर देते तो कर्म योग हो जाता है कर्म योग से भगवत प्राप्ति हो जाएगी केवल कर्म से नहीं समझ पा रहे हैं योग कब होता है जो कर्म भगवान को समर्पित कर दिया
जाता है और हर समय भगवान का नाम जप किया जाता है तेशाम सतत युक्ता नाम भजता प्रीति पूर्वक तो ददा मि बुद्धि योगम तम नु माम उपया उसे भगवान बुद्धि योग प्रदान कर देते हैं और भगवत समर्पित कर्म वो बंधन से मुक्त कर देते हैं शुभ और अशुभ कोई बंधन नहीं लगता केवल कर्म करना तो उससे बंधन प्राप्त होगा चाहे सोने की जंजीर से आपको बांध दे खंभे में या लोहे की जंजीर से बंधन तो दोनों में हुआ तो शुभ कर्म का बंधन पुण्या लोकों को ले जाएगा भगवा के फिर मृत्युलोक लाएगा पाप कर्म का बंधन नरका आदि ले जाएगा फिर वहां से लाएगा तो दो प्रकार के कर्म जीव से सदा होते रहते हैं अब हमको इन कर्मों के बंधन से मुक्त होने के लिए कर्म योग का अनुष्ठान करना पड़ेगा जो तुम्हारे अंदर ज्ञान है जो तुम्हारे अंदर बल है यह स्वीकार करो श्री भगवान का दिया हुआ है जो तुम्हारे सामने मरीज आता है या कोई व्यक्ति आता है या कोई सेवा पड़ती है यह मानो कि मेरी पूजा है और इस पूजा से मेरे भगवान प्रसन्न हो उसका लक्ष्य बन गया भगवत समर्पित नाम जप कर्मयोग हो
गया अगर नाम जब भगवत स्मरण नहीं है भगवत समर्पित नहीं है तो कर्म योग नहीं होगा कर्म होगा कर्म का भोग होगा बार-बार जनना मरना ये हमारे कर्म के भोग है ये मिट नहीं सकते इससे नहीं मिट सकते पर इसी कर्म को भगवत अर्पित कर दे नाम जप करते हुए करें तो इसी ये योग बन जाएगा और ये आपको मुक्त कर देगा इसमें जोड़ना पड़ेगा भगवत पेरित बल से भगवत सेवा कर रहा हूं और नाम जप कर रहा हूं कोई पापा चरण नहीं तब भगवान को प्राप्त हो जाता है समझ पा रहे हो आप इसमें कोई संशय आपको हां ठीक श्याम सुंदर पाठक जी नोएडा से राधे राधे महाराज श्री महाराज जी गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि अपने धर्म में मरना भी शेष का है और दूसरे का धर्म कितना भी अच्छा क्यों ना हो उसका पालन करना बहावा है ऐसा क्यों कहा मराज जी और दूसरी तरफ गीता में के समापन के समय उन्होंने कहा कि तू सारे धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आज जा मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा तो किस धर्म की वो बात कर रहे हैं एक बात यहां ध्यान रखना है कि स्थान के अनुसार उपदेश
होता है एक स्थान के बाद दूसरे स्थान से नहीं जोड़ सकते जैसे सांख योग का वर्णन किया कर्म योग का वर्णन किया भक्ति योग का वर्णन किया इनमें कुछ अलगाव है ना साधन में तभी तो अलग-अलग वर्णन किया नहीं तो एक ही बात कह देते ऐसे उपासक की स्थितियां होती हैं भगवान जगतगुरु बोल रहे हैं तो जिसकी स्थिति सर्व धर्मानगर जितने भी धर्म है वह सब लोक धर्म है जैसे गोकर्ण जी अपने पिता को उपदेश करते हैं तो कह रहे हैं धर्मम भज स्व सततम तज लोक धर्मानना करो तो प्रश्न उठता है किस धर्म का बोले लोक धर्म का त्याग करके भागवत धर्म का प्रेम धर्म का इसका परिचय कैसे मिलेगा सेवन सदा साधु पुरुषम जहि काम तृष्णा संतों का संग करो उनका सेवन करो सेवन का मतलब उनकी आज्ञा का पालन करो और उनकी आज्ञा के पालन करने में कामना और भोगों की तृष्णा यह बहुत बाधा पहुंचाते है काम कामना और भोगे हुए भोगों को पुनः भोगने की इच्छा का नाम तृष्णा सुने हुए पढ़े हुए देखे हुए भोगों की प्राप्ति का जो चाह होती उसे कामना कहते हैं बोले जहि काम तृष्णा अगर संत
सेवन कामना और तृष्णा का त्याग करके हो तो पता चल जाएगा कि भागवत धर्म किसे कहते हैं आप स्थित हो जाएंगे लोक धर्म का त्याग करके भागवत धर्म में अब हम जब संत संग मिला और कामना के त्याग की बात सोचना हां शुरू किया तो हमें गुणा अभिमान हो जाता है इसीलिए आगे कह दिया जहां कोई साधक सच्चे मार्ग का पथिक बनता है तो सबसे पहला दोष पैदा हो जाता है गुणा भिमान उसका परिचय क्या होता है वो दूसरों पर दोष देखने ता है तो इसलिए आगे सावधानी ग ज काम तृष्णा अन्यस दोष गुण चिंतन
मा सु तक्वा किसी के भी गुण या दोष नहीं देखने उनका त्याग कर दे बोले सेवा कथा रस महो नित राम पिवमोमी इस सेवामृत का पान करें अब जहां लोक धर्म में है तो बोले तुम जिस वर्ण आश्रम व्यवस्था में हो भले व तुम्हारा छोटा धर्म कहा जाता है लेकिन तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ है यह कहां बात कर रहे हैं लोक धर्म के लिए अच्छा अब जब इसी को अध्यात्म में उतारते हैं लोक धर्म का पर धर्म भयावह तो यह शरीर पर है ना इसी से तो भय प्राप्त हो रहा है मृत्यु का तुम्हारी कभी मृत्यु हो ही नहीं सकती तुमने पर को स्व मान लिया स्वा को पर में तन्मय कर दिया अब भयावह स्वधर्म में स्थित होने का मतलब स्वा स्वरूप स्वरूप क्या निर्विकार चिदानंद में वो अमृत में है अपने स्वरूप में स्थित होकर शरीर छूटा व जीवन मुक्त है वो अमृत है और जब पर धर्म में शरीर छूटा तो भयावह दुर्गति है पुण्य हुए तो स्वर्ग लोक गए पाप हुए तो नरक गए पाप पुण्य दोनों बच कर के फिर इसी मृत्यु लोक में आ आ गए भया है ना पर धर्म देखो इसको हम अध्यात्म में बता रहे हैं जब व्यवहार
में बताएंगे तो वर्ण आश्रम व्यवस्था जो भी शास्त्र के अनुसार आपका कर्तव्य धर्म है जैसे आप किसी के पति हैं किसी के पुत्र हैं किसी के पिता है किसी के भाई है और भी संबंध है यह सब लोक धर्म के अंतर्गत आता है इसका पालन करना चाहिए लोक धर्म का पालन करने वाला ही आगे चलकर परम धर्म का परिचय जान जाता है जब परम धर्म का परिचय प्राप्त होता तब आता सर्व धर्मानना किसी का पति हूं ना किसी का पुत्र हूं ना किसी का रिश्तेदार ना किसी का नातेदार मैं एक मात्र प्रभु का दास हूं मैं एक मात्र प्रभु का मित्र हूं मैं एक मात्र प्रभु का प्रिय हूं ऐसे भाव आ गए तो सर्व धर्मानना पति धर्म पुत्र धर्म कितने धर्म का स्वरूप अब वो सब धर्मों का त्याग करके एकमात्र भगवान की शरणागति धर्म अर्थात भगवत आश्रय धर्म अब किंचन मात्र भी वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होगा भय को प्राप्त नहीं होगा कोई पाप नहीं बचेगा भगवान भस्म कर देंगे क अहम तवाम सर्व पापे मोक्ष स्याम मास कौन जो सब लोक धर्मों का त्याग करके भगवान के भरोसे आश्रित हो जाता है भगवान कहते
उसके पाप सब मैं नष्ट कर देता हूं और उसको सुचा परम पवित्र स्थिति प्रदान करता हूं आप समझ पा रहे इसमें कोई संशय आपका शैलेश कुमार द्विवेदी जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में कोटि कोटि नमन गुरुदेव भगवान जीवन उपार्जन के लिए लोगों का उपचार करता हूं मेरा संशय मेरे पेशे से संबंधित है श्री जी की कृपा से यह ज्ञात हो जाता है कि मरीज का जीवन कुछ समय का ही शेष है यह जानबूझकर मरीज एवं मरीज के परिजनों को झूठा आश्वासन देना पड़ता है कि मरीज ठीक हो जाएगा क्याय स्थिति मुझे पाप का भागीदार बनाती है या मेरी भागव स्थिति में बाधा बनाएगी थोड़ा इसमें समझना कि मरीज से नहीं कहना लेकिन मरीज के घर घर वालों से फाइनल की बात बता देनी चाहिए मरीज से नहीं बतानी चाहिए क्योंकि वह व्यर्थ में दुखी होगा चिंतित होगा और डॉक्टर का कर्तव्य भी ऐसा नहीं डॉक्टर का एक कर्तव्य होता है वैद्य का कि पहले वचन रूपी औषधि से उसे पुष्ट करें बिल्कुल कोई बात नहीं ये तो ऐसे कितनों को ठीक किया है वो कल पधार जाएगा आपको पता है लेकिन आपको कितन थे आप
बिल्कुल चंगे हो जाएंगे आप पहले वचन की औषधि दी फिर उसे औषध लेकिन घर वालों को बता मामला सीरियस है आपको मतलब इनकी सेवा करनी चाहिए इनका कुछ ही दिनों का ऐसा जैसे हमारी किडनी की जब जांच हुई तो जो डॉक्टर थे तो उन्होंने हमको डायरेक्ट बुला कहा बाबा अगर तुम्हारे पास कोई होता तो मैं उसको बताता लेकिन तुम ही हो इसलिए हमको यद्यपि नहीं कहना चाहिए पर आपसे कह रहा हूं कि आप संत हैं अब आपका जीवन मुश्किल से चार या पांच वर्ष का है आपकी किडनी फेल हो चुकी है और अब आप भजन कर लीजिए कोई और उपाय नहीं क्योंकि आपके पास ना अर्थ व्यवस्था है कि आप वो ऑपरेशन करा के दूसरी किडनी में बड़ा प्रोसेस है दवा कि अब नचन बाबा जी भिक्षावृत्ति से जीते तो उन्होंने कहा कि पाच वर्ष एकदम दिमाग में बैठा बस और सावधानी हम लोग कोई निराश होने वाले थोड़ी थे बचपन से बाबा तो और सावधानी हुई अब भगवान की कृपा देखो वो कह रहे थे 5 साल में आप मर जा और लगभग उनके कहने से 18 20 साल का नंबर आ रहा है लगभग 20 ब देखो अब उन्होंने तो कहा तो पा साल में मर
जाओगे तो अब प्रभु अभी बुलाना चाहे बुलाले लेकिन मर हुआ नजर नहीं आ रहे अभ 20 साल आपको देगी हमारे में तो ये ये हम कहते कि अगर डॉक्टर है मरीज से अगर अकेले तो फिर बोल देना चाहिए क्योंकि जैसा हमारा अनुभव है हम आपको बता देते हैं सेवा हम कर अगर मरीज का कोई परिवार का तो फिर मरीज को नहीं बताना चाहिए उससे बता देना चाहिए और वचन माधुरी वचन औषधि इसमें झूठा नहीं कहा जाता यह एक प्रक्रिया है भगवान तुम्हारे पास मरीज रूप में आए हैं उनका सम्मान करना है अब हम उनको सुख देने के लिए कह रहे हैं वो भगवान जानते हैं कि समय इनका पूरा हो गया आप निश्चित आप बिल्कुल ठीक हो जाएंगे आप बिल्कुल जो मैं औषधि दूंगा आप बिल्कुल चैन से यह झूठ नहीं होगा य उसको सुख पहुंचाने के लिए बोल रहे नहीं तो त मर जाएगा शाम तक मर जाएगा तो वो शाम तक कितनी बार मरेगा ऐसे नहीं कहा जाता नहीं कहते कि हम तो सत्यवादी है हम तो भाई बोलेंगे ऐसे नहीं यह वचन माधुरी है वचन में दरिद्रता नहीं होनी चाहिए उदारता होनी चाहिए यह उदार वचन है और हमारा प्रयास रहेगा
ठीक हो जा शायद प्रयास रहेगा तो उसमें जो अगर जर वो अकेले मरीज है फिर उसको धीरे से बता देना चाहिए कि हो सके तो आप भगवान का स्मरण कीजिए ज्यादा समय तक शरीर शायद ना रह पावे ऐसी स्थिति को प्राप्त हो गया तो उस ये धर्म का मतलब है कि हम बहुत सोच समझ कर के अब अपने स्वार्थ के लिए तो आप झूठ बोल ही नहीं रहे ना उसको विशेष घात घातक माना गया है कि आप अपने स्वार्थ के लिए छल करके झूठ बोल कर के और आप स्वार्थ की पूर्ति वो बहुत घातक ये तो उसके सुख के लिए वचन माधुरी बोलते इसमें कोई बात नहीं ये इसमें ऐसा नहीं कि हम तो सत्यवादी हम सत्य बो ऐसा नहीं है प्रत्येक डॉक्टर का यही स्वभाव होता है हमने देखा है उद्दंडता कोई जो नहीं जानता है वो बात अलग नहीं हमने देखा माता-पिता की तरह दुलार करते हैं नहीं नहीं आप बिल्कुल निश्चिंत रहे नहीं बस थोड़ा सा थोड़ा बस कहीं भी को ऐसे प्यार से ऐसे संभाल करके तो ये वचन माधुरी है वचन माधुरी से हम पहली औषधि सबसे बड़ा औषधि है मीठा बोल फिर बाद में तो शरीर के दुख निवारण की औष मीठे बोल से
तत्काल हा कोई भी आज तक 00 डॉक्टरों से इसके कोई किसी ने नहीं कहा कि हम नहीं ठीक करेंगे हमने ही कहा ठीक हो जाएगा पर वो रोगी ऐसा है साध को ठीक होने वाला नहीं वह केवल भगवान की प्राप्ति कराने के लिए आता है तो जहां कोई अकेला मरीज हो तो भले कर दे नहीं तो उनके परिवार वालो कह क्यों नाम जप करते हो आप हां करते रहना क्योंकि आपके प्र का हमारे विषय से ज्यादा संबंध नहीं पर हमारे विषय का आपसे संबंध जरूर है ले इसलिए नाम जप करते हैं ना नाम जप ही वो औषधि है जास नाम
भव भ सज हरण घोर त्रिशूल बड़ा मंगलमय समय है यार मतलब ऐसा समझ लो कि खेती बढ़िया मिली बीज बढ़िया मिला पर आप वह बीज ना बो करके बूल बो रहे हो अगर भगवान का स्मरण नहीं करते पक्की समझ लो हम बहुत हृदय से बात कहते हैं कि आप चाहे जितना धन धन कमा लो चाहे जितने बड़े पद में पहुंच जाओ चाहे जो व्यवस्था कर लो जब तक श्री भगवान का आप भजन नहीं करेंगे चिंतन नहीं करेंगे तब तक चिंता शोक भय दुख मृत्यु इससे नहीं बच सकते क्यों भाई कोई है उपाय से बचने का एक मात्र भगवान का आश्रय अच्छा यहां से जाना है पक्का अच्छा कब जाना यह पता नहीं और ले कुछ जाना नहीं और जो ले जाना है उसको हम कर नहीं रहे तो इसी को मूर्खता कहते मढ़ता कहते हैं जिस समय आपको यह पता चल जाएगा कि यहां की हर वस्तु झूठी है छूटने वाली है तो आपको भगवान का नाम प्रिय लगने लगेगा यहां की हर वस्तु प्यारी लगती है ऐसी माया का देखो जादू पना और यह लगता नहीं कि हम मरेंगे दूसरे को जला के आ रहे लेकिन ऐसा नहीं कि हम मरेंगे मन कैसा इंद्रिया कैसी जानते हुए कि हमारी रोज
स्वास घट रही आयु घट रही है और हम प्रभु को भूले हुए हैं और जो समेट रहे हैं वो सब यही छूट जाएगा सबसे प्रार्थना है कि आप व्यसन ना करें मानसा आदि ना खाए इससे बुद्धि भ्रष्ट होती है पाप कर्म ना करें इससे दुर्गति होती है जितना बने नाम जप लेने जो अपना कर्तव्य कर्म कर रहे हैं उसे भगवान को अर्पित कर दे इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी गृहस्थ का जो मार्ग है वो सरल है भगवत प्राप्ति का विरक्ति का बड़ा कठिन मार्ग है भगवान ने इसीलिए आप लोग जैसे गृहस्थ तो कृपा करके
भेजा है नहीं काहे को आ भाई पैसा लगाए हो सब य कुछ मिलता तो है नहीं प्रकट में यहां तो केवल वचन मिल रहे हैं अगर आपके ऊपर भगवान की कृपा ना होती तो यहां बैठ के नहीं सुन सकते थे आप यह धाम है और पक्की बात समझो या अध्यात्म की केवल चर्चा होती तो भगवत प्यारे ही य आते हैं जो भगवान के लाल अब यह कृपा का आदर करो ठुकराओ नहीं अब मो भाव भरोस हनुमंता बिन हरि कृपा मिल लेने संता तो जो प्रभु मोय अनुग्रह कीना तो तुम आई दर सट दिला हम ये मान रहे हैं अब इसका लाभ ले लो उठते बैठते चलते फिरते जो भगवान का नाम प्रि लगे किसी की मत सुनो बड़े सिद्धांत है बड़े प्रवचन है बड़ी चर्चा है नाम जब सन काद करते हैं सनक सनन सनातन सनक कुमार हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हर समय उच्चारण करते रहते हैं भगवान शिव पार्वती जी मैया को हर समय भगवत चर्चा सुनाते रहते हैं कौन ऐसा महात्मा कौन ऐसा भगवान क्या जो वैभव है जो नाम जापक को ना प्राप्त हो जाए हर महात्मा दर्शन देगा के आप नाम जपना शुरू करो हर वैभव हर विभूतियां आ जाएंगी पर इतना हो जाए पहले
पाप तो नष्ट हो जाए जहा शुरुआत करते हो पाप का जलन शुरू होती प्रतिकूलता होती छोड़ बैठते हैं नहीं बहादुर बनो भगवान की बड़ी कृपा है कि आप लोग सत्संग सुन रहे हो सच्ची मानना नहीं कलिकाल में सत्संग साधु महात्मा बहुत बहुत कठिन आप बुद्धि की देखो ना आप बाहर निकल के देखना बुद्धि की धरा क्या हो जाती है वस वही भोग वही संसार वही परिवार वही शरीर और पीछे यही करके आए हो आपको पता नहीं कौन सा परिवार था कौन सा शरीर था कौन फिर आ नया कर रहे हो भजन कर नहीं रहे तो फिर शरीर छूटेगा फिर नया शरीर अब नहीं अब तो भगवान के धाम की दिव्य लीला में सम्मिलित हुआ जाए यह शरीर पांच भौतिक छूटे चिदानंद शरीर मिले इसलिए नाम जप करो और यह गंदे नशा गंदा भोजन यह आपकी बुद्धि को खराब कर दे नहीं समझा जाता बिल्कुल पक्का समझो नास्तिकता लाने में भोजन का बहुत बड़ा हाथ होता है और अगर कहीं साथी कु संगी हो जाए तब तो क्या कहना है जैसे नहीं कहते चार चांद लग गए नास्तिकता भगवान नहीं है ये भगवान नहीं है कोई भक्ति नहीं है सब आडंबर है भोजन बिगड़
जाएगा कुसंग हो जाएगा तो फौरन बुद्धि बदल जाएगी सत्संग 10 दिन कुसंग एक मिनट क्योंकि पूर्व जन्मों का अभ्यास हमारा कुसंग का है तोख सब नाम जप करें अच्छे आचरण करें और भगवान की कृपा का अनुभव करें जीवन का लाभ साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पाई नजे परलोक संभरा यह हमारा जन्म परलोक बनाने के लिए मिला है यह सब भोग तो पक्षी भी भोगते हैं गृहस्थ धर्म में हो धर्म के अनुसार भोगते हुए नाम जप करते हुए भगवान को प्राप्त हो जाओगे विरक्त धर्म में थोड़ा बिल्कुल हट कर के कठिन तप में जीवन व्यतीत करना हर भोगों की आकर्षण को सह जाना ना भोगना लेकिन गृहस्थ धर्म में छूट है आपकी पत्नी है आपका खानपान विभाग परिवार है आप अपने धर्म से सेवन करते हुए नाम जप करके भगवान को प्राप्त कर ले ठीक है जय हो मेरी लाल कहां लीला अनुक म जी आपसे चर्चा हुई थी य मलू पीठ बरसाने करने का विचार था पिताजी पिताजी की स्मृति में तो मलू पीठ वा चर्चा हुई तो उन्होने अपना हॉल तैयार हो गया है तो हल में ती हज व्यक्ति बैठ सकते हैं अच्छा और वातानुकूलित है तो उसमें
हल महाराज जी ने दे दिया फिर हमने की महाराज जी आप कर रहे तो एक और है कि जो दर्शन करेंगे उसकी चर्चा आप दो घंटे कर दे जी तो महाराज जी की चर्चा भी है उसमें ज मंगला होगी तो मंगला से पहले चर्चा हो जाएगी सुबह शाम के सुबह के या में तो शाम को चर्चा अम के अनुसार चर्चा बहुत सुंदर बहुत सुंदर और महाराज जी इसमें पिताजी का जैसे आपके आशीर्वचन है संतो के आशीर्वचन एक संग्रह करके एक छोटा सा ग्रंथ बहुत बहुत सुंदर 29 तारीख को विमोचन भी है हमारे जी और उसमें अब एक मन में भाव आया प्रेरणा कंग श्री जी हैं इसमें आठ महापुरुष रखे हुए हैं हमारे जी तो मन में ये भाव था सब संत जो है सहचर स्वरूप है तो उका सच आठों संतों का सहचर में प्रकट उनका मूल रूप भी रहेगा जैसे पूज राधावा भाई जी तो मूल रूप भी रहेगा उनका और मूल में और उनका परिचय जैसे दिया जाएगा मंच के माध्यम से तो उसमें से सहचर का प्रकट हुआ और उन्होने कुछ गायन किया या कुछ संवाद किया पात्र बने स्वरूप े और सहचर प्रकट होकर के प्रिया पितम के यूथ में सम्मिलित हो गए आठ संतो
से आ सहरिया प्रकट हुई और वो प्रिया प्रीतम सम्मिलित हो गई और सम्मिलित हो गई तो वो दृष्टा भी है एक स्वरूप जो स्थूल स्वरूप है उनका तो दृष्टा नि स्वरूप जो है सेवा में अर्पित से तो भूमिका लीला में प्रस्तुतीकरण होगा अच्छा प्रारंभ में रास के प्रारंभ अब स्थूल स्वरूप जो है वो तो ोत हो गया मंगला में और नि स्वरूप रह गया स्वरूप से आ बहुत सुंदर बहुत सुंदर है अच्छा हमने पढ़ा भी कहीं नहीं प्रेरणा इन्होने की तो चर्चा जब हुई किय ऐसा मन भाव म वा महाराज प पढ़ा क मन
में ही आया तो ऐसा पूज स्मति आठ संतो के और व्यास गति जो करेंगे उनके प्रति रूप में पिताजी जो है प्रणाम करके प्रतीकात्मक प्रणाम करके व्यास ली बहुत सुंदर वो प्रिया जो देते है भाव सवे भजता रस काम जैसे आप बताए ना यह पढ़ी लिखी बात नहीं होती प्रिया जो भाव प्रेरित करती हैं जैसे स्वामी जी महाराज ना जिस समय खड़े होते थे ना तो पहले के श्रीराम शर्मा कुछ और होते थे और जिस समय युगल सरकार को प्रणाम करके खड़े होते थे ना तो खुद एक सहचर है आप गौर से आपके पिता है इसलिए शायद उस दृष्टि से ना देखा हो आप देखना उनके हमने तो बहुत गौर से देखा है कि स्वामी जी महाराज स्वयं में एक सहचर है तो वही भाव आपके अंदर मतलब ऐसे महापुरुष के आप पुत्र हैं तो वही भाव आपके अंदर प्रिया जो दे रहे हैं और यह अक्षर सा सत्य भाव जो आप ऐसा भाव केवल प्रियाज से ही आ सकता है कि किसी देवधारी महापुरुष के प्रति ऐसा भाव करके सह चरी का प्रादुर्भाव करके फिर उसकी सेवा में वास्तविक जो है यही स्वरूप है म अपने आप ही उ किशोरी जी ने कृपा की ना कोई कुछ
ना कोई भजन ना पाठ कुछ नहीं उन्होंने कृपा देखो महाराज जी आप लोग आश्रित जन है अभी संत जन जो आए थे उनसे यही कहा था कि भगवान को भजन से या साधना से हम खरीद ले ऐसी बात नहीं है वो संख्या से कभी खरीदे नहीं जा सकते जिस समय उपासक आश्रित हो जाता है वो अंदर का विषय होता है आश्रय जहां हुआ उसको भगवत प्राप्ति हो जाती है तनवा मनो भी रमल सोहम तव वाता ये जो आप अंदर से हमारे युगल सरकार रासे स्वरी रासे स्वर की शरण में हो अब आपके लिए कुछ दुर्लभ नहीं है ये आपने आश्रय जो अंदर बैठा रखा है प्रिया प्रीतम का यह सब अंदर से भाव ज्ञान सब परम पद इसी स्वामी जी महाराज की जो परमहंस स्थिति आखिरी में थी आप पुत्र है तो शायद उस बातों को ना पकड़ते हो मतलब ये एक बहुत अच्छे सिद्ध महापुरुष के लक्षण स्वामी जी में प्रकाशित हुए थे ये तो करुणा करके बोल देते थे इसलिए समझ में आ जाता था कि इनकी स्थिति कहां है नहीं तो जो परमहंश अवधूत बाल अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं भाव के वो स्वामी जी की स्थिति थी तो वो अंश तो आपके अंदर है ना वही
प्रकाशित हो रहा है हम यही चाहेंगे कि स्वामी जी के पद चिन्हों में बढ़ते हुए आप हमारे समाज को रास रस प्रदान करें जिसके बल से लाखों भूले हुए जीव प्रिया प्रीतम के अनुरागी बनते हैं सच्ची कहते हैं अगर महाराज जी अब इस विधा को चलाना बड़ा कठिन कार्य क्योंकि आधुनिकता इतनी फैल चुकी है कि लोगों की हा भावनाएं मैं तो श्री चरण में ये भी निवेदन करना हूं 2025 में शरद पूर्मा को विश्राम लेने का मना ब्रज में ही रहना कई बार ज हा है तो बा का मल म जी बहुत ऐसा हो गया आधुनिकता इतनी हो गई इतने सीरियल आ गए हैं कि जिसको मतलब जो एक ये रासला आदि जो ईमानदारी से समेट के रह गया बिल्कुल बिल्कुल और आगे चलके मार और सिमट जाएगा महापुरुष जो मर्यादा से राधा ना करने की मराज जी जो वो जो है ना प्रस्तुतीकरण किसी की निंदा नहीं कर र उनका जब तक अपना जीवन पवित्र ना हो जब तक बड़ाक जो कराने वाले हैं जो सुनने वाले हैं जैसे यहां हुआ था तो महाराज जी आप बैठे थे पू गुरुदेव और म वास्तव में पिताजी कहते थे इधर भगवंत बैठे हैं इधर संत बैठे हैं
शिकंजे में रहते हैं हम दोनों के शिकंजे में रहते हैं हम अब अनुभव करते हैं इस बात को जी जब तक संत लीला में नहीं बैठे े लीला में आनंद ही नहीं आता जी जी क्योंकि वो रसा स्वादी है ना हा तो प्रिया प्रीतम भी पुलक कर रस आस्वादन कराते हैं अपने जनों को हा प्राय सेवा दास की सेवा जो है संतों के समीप ही है जी बाहर कहीं जाने का मर भी नहीं हां वास्तविक तो बाहर मतलब स्वरूप नहीं समझ पाएंगे ना वो तो नाच कूद समझेंगे वो प्रभु के इस लीला विलास का स्वाद तो भावुक जन लेते हैं प्रेमी जन लेते हैं लाओ चुनरी लाओ तीनों को उठाओ प्रसाद दे हम आपको देखते हैं तो हमारे हृदय में बड़ा पूज्य भाव आता है कि आप हमारे स्वामी जी के हैं स्वामी जी की कृपा से ये स्थिति हुई उनको संतों से चर्चा होती उनकी दिखाई नहीं हमको दिखाई नहीं दे रहे संतों से चर्चा होती है और क देख य संतान की सेवा करो माता जी से कह रहे हैं और हम कुद से भी कह रहे हैं अब देख कोई अपेक्षा कर रहे लोग कोई उठ नहीं रहे अब उनको दिखाई दे रहे हमको दिखाई नहीं दे तो स्वयम
उठे तो स्वयम खड़े खड़े चर्चा करने लगे फिर चौक में पहुंच गए चौक में चर्चा करने ग फिर अब मैं छोड़ के आता हूं दरवाजे विदा किया और उनके वियोग में रोते उनके वियोग में रोते ऐसी स्थिति थ विनीता सरकार जी असाम से महाराज जी मैं भगवान की खोज में हूं कैसे मैं उन्हें खोजू कृपया मार्गदर्शन करें चाबी घर में खो गई थ दरवाजे के बाहर कई लोगों को लेकर खोज की जिंदगी व्यतीत हो गई मिली नहीं लौटना पड़ेगा घर में भगवान की खोज करने वाले को अंतर्मुखी नति नाम मुमुक्षु सर्वात्मका चत प्रसंग यहां वर्णन कर रहे हैं कि जो संसार के संयोग से सुख लेने वाले लोग हैं मिथुन मतलब दो संबंध से जैसे रसेंद्र का भोग जने इद्री का भोग वस्तु से संयोग होता है कहीं शरीर योग होता है ऐसे जो सुखों में मगन है इनके संग से बचे संगम त जेत मिथुन बृति नाम मुमुक्षु जो भगवान की खोज करता है उसे मुमुक्षु कहते हैं मुक्त होना चाहना भगवान की प्राप्ति करना ऐसे लोगों के संग का त्याग करें इंद्रियों को अंतर्मुखी यापन के लिए संत जन भ्रमण करते हैं तीर्थों
में गंगा किनारे ये खोज नहीं हो खोज अंदर होती है बाहर तो शरीर विचरण कर रहा है सुख दुख को समान भाव से सहते हुए पर अंतर सर्वात्मक बहिर्मुखी बाहर नहीं मिलेगा जो खोज रहे हैं वो घर में है अंतर लौटे एकस चरण अपने को असंग बनावे एक चरण का मतलब असंग ना मैं इंद्रिय हूं ना मन हूं ना बुद्धि हूं ना चित्त हूं ना अहंकार हूं ना स्वभाव हूं मैं भगवान का अंश हूं इन लोगों ने मुझे फसा रखा है अब मैं इनका कथन नहीं मानूंगा राधा राधा राधा राधा हर बात अंदर अंदर एकस चरण रहस चि मनते से जो परम रहस्य है कि हमारा चित्त हमारे प्रभु में डूब जाए प्रभु में लगा रहे गोपीजन सबसे बड़े महापुरुष हैं विश्व में अगर कोई भी संत महात्मा भक्ति की तो यथा ब्रज गोपिका नाम खास बात गोपी जनों की सब कार्य गृहस्ती की करती हुई चित्त श्री कृष्ण में लगा है मुरारी पादा आर् पित चित्त वृत्ति तो बोले एकस चरण रास चित्त मनन ते से आपका चित्त सदैव चित्त चोर प्रभु में लगा रहे चिंतन लीला गायन सेवा आद में संग का त्याग करें जो कुसंग विषय भोगों में जो लगे हुए
जन हैं उनका संग त्याग करें तो संग त्याग करें तो संग ग्रहण करें किनका बोले तद व्रते जो भगवत व्रत धारण किए हुए हैं जिनके जीवन में निर्विकार होता आ चुकी है जो भगवान के चिंतन भजन में ही केवल डूबे हुए हैं ऐसे संत जनों का तद व्रते जो भगवत व्रत धारण करने वाले उनका संग करें विषय सेवन करने वालों से असंग रहे इंद्रियों को अंतर्मुखी यहां भगवत प्राप्ति होती है किसी को भी जब होता है तो पहले यहां होता है फिर वो आख खुलता है तो सब जगह वही दिखाई देता है जो भीतर वही बाहर पहले आओ बाहर फसे हो ना पहले अंदर आओ अंदर आना सीखो अंदर पहले नाम चलाना सीखो बार-बार नाम देख रहे हैं नाम सुन रहे हैं नाम चल रहा है अब अंतर में होते चले जाओ बाहर हम रास्ता चल रहे हैं लेकिन नाम चल रहा है सोनी लगा रहे नाम चल रहा है रसोई बना रहे नाम चल रहा है अंतर में है क्रियाए बाहर हो रही चिंतन अंतर्मुखी टीवी चला लिए यह भजन नहीं य अत मुख कहां होए तुम्हारी वृतिया तो बाहर हो गई नहीं हमको हर कार्य करते हुए अंतर्मुखी नाम जैसे काम ही नार पियारी
जिम लोभी जिम प्रिय दम व अंतर में चिंतन करता है बाहर से शांत बैठा है अंतर में चिंतन उसका चलता है काम नारी पियार जिम लोभी जिम प्रिय दम तिम रघुनाथ निरंतर प्रि लागो मरा भगवान किससे मिलते हैं प्रेम से प्रेम कैसे होता है सर्वत्र का प्रेम समेटकर भगवान के चरणों में समर्पित कर दो जननी जनक बंध सुत दरा तन धन धाम शद परिवारा सब की ममता ताग बटोरी मम पद मन बांध बर डोरी सब जगह से हटा के और नाम जप कर रहे तो यही प्रकाशित हो जाते हैं कोई कठिन बात नहीं वो बैठे हैं बस हमें जरूरत है भगवान के भजन की इतनी तन्मयता कि अब जिया ना जाए भगवान के बिना जैसे प्यास लगे हमें कोई रबड़ी दे तो हम रबड़ी नहीं पिएंगे पानी चाहिए ऐसे हमारी मांग भगवान की हमें भगवान चाहिए कोई भोग नहीं अभी भगवान की जहां हमारे अंदर विकल बढ़ती है तो वह एक एक क्षण हमको देख रहे हैं देखो अभी देखो आप जितनी आपकी भक्ति वैसी तुम्हारे आगे भावना बनती है कि नहीं भगवान की जाकी बनती है ना हम जैसी जितनी हमारी क्षमता है वो सत्य है वो कोई कल्पना नहीं है जिस दिन
आपका हृदय परम पवित्र हो जाएगा तो तुम्हारे मानस पर केवल भगवान छाए रहेंगे दर्शन की चाह होते हुए दर्शन मिलते हुए फिर भी चाह बढ़ती चली जाए यही प्रेम का स्वरूप है नाम जप करो अंतर्मुखी चय अगर प्राप्त हो तो भगवान भगवान बाहर खोज आप लोग तो मतलब गृहस्थ में हम लोग तो बाबा जी बचपन से मन को पढ़ना इंद्रियों को पढ़ना भगवान के मान हमारा ग्रंथ जानते हो कौन मन इंद्रिया इन्हीं को पढ़ते रहे इनकी क्या हरकत है इनको कैसे रोका जाता है इनको कैसे भगवान में लगाया जाता है भगवान की प्राप्ति कोई कठिन नहीं है पर बाहर ढूंढने से नहीं अंदर ढूंढने से राम राम कृष्ण कृष्ण हरि हरि राधा राधा सब कुछ हो जाएगा इसी में ये नहीं है ना तो और सब लेनदेन होगा 100 दोगे हजार मिल जाएगा हजार दोगे लाख मिल जाएगा माया पति फेंकता रहेगा तुम्हारे आगे सामाग्री वो नहीं मिलेगा हम एक उदाहरण एकांतिक में एक दिन दिया था कि बच्चा जब मां की गोद में चढ़ने के लिए रोता है उसको रो है ना पहले वो खिलौने भेजती है देव शांत हो जाए खेले खिलौनों को फेंक देता है
फिर वो निज जनों को भेजती बेटी को मौसी को ऐसे घर परिवार जाओ जरा गोद में ले लो लेकिन उनकी गोद में राजी नहीं होता तब उसको विवस होकर आना पड़ता है ऐसे ही भगवान पहले भोग बेचते हैं राजी हो जा खिलौनों में फिर रिद्धि सिद्धियां भेजते हैं फिर भी नहीं रोना बंद हुआ तब आप आ जाते हैं त्रिभुवन की राज्य लक्ष्मी देने पर आधे पल के लिए जो भगवान को ना छोड़े उनका स्मरण ना छोड़े वह महा भागवत भगवान का साक्षात्कार कर लेगा उसी के लिए प्रयास किया जाता है पूरे जीवन प्रयास किया जाता है राधा राधा राधा खूब नाम जप करो अच्छे आचरण करो और अंत मुख से अंतर्मुखी करो अगर अंतर्मुखी रहे हो कि अंतर्मुखी साधन का विषय है ना अंतर हम देखते हुए भी नहीं देखते हम बोलते हुए भी नहीं बोल रहे आपके बीच में बैठे हुए भी हम आप में नहीं है क्योंकि जीवन में अभ्यास किया इसी बात का हम जहां ठाड़े बैठे परे उना कबीर का हम रा ठिकाना हम अपने ठिकाने पर रहते हैं नहीं तो सुबह जैसे 20 हजार लोग रोड में खड़े होते सबकी आकृति बस जाए ना तो ध्यान किसका होगा
उन्ही आकृतियों को होगा कोई परिचय नहीं है सबको हजारों को ऐसे देखते हैं लेकिन हजारों को नहीं देखते एक को देखते हैं केवल मेरा प्रभु उन में विराजमान बस जैसे सब है ना मेरा प्रभु है उन्हीं से बात कर रहे उन्हीं को देख रहे हैं अंतर की बात हम किसी से इसीलिए जैसे कोई कहता है अरे इतने पापी आदमी आया अने समा तुम पापी नजर आ मेरा तो प्रीतम आया है मेरा प्यारा आया है अब तुम पापी देखो हम प्यारा देखे यही हम तुम में अंतर तुम्हारा चश्मा भी बनवाने लायक है ठीक नहीं है चश्मा सही हो जाएगा तो बस समझ में आ तो अंत मुख हो जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी बाहर ढूंढने से नहीं कहीं भी ढूंढ जाओ कहीं भी खोज जाओ बाहर बाहर तो आपको कहीं भी आप चलो मंदिर में चलो थोड़ी देर के बाद मन कहेगा चलो नहीं मिले ना और भजन करो ना तो पशु पक्षी जड़ चैतन्य सब में वही तुम्हें नजर आएगा वही नजर आएगा मंदिर की बात क्या सर्वत्र नजर आएगा वही नजर आएगा जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जा बंदों सब के पद कमल सदा जूर पान महाराज जी अगर हम जैसे आपने बोला अपना
समझ के उनसे मांगिए अगर वो पूरा नहीं कर रहे तो इसके पीछे हमें क्या समझना चाए बहुत बढ़िया मंगल विधान है उनका हम जान नहीं पा रहे हैं उनके मंगल विधान में हमारी कामना बाधा पहुंचा रही थी इसलिए भगवान ने पूरा नहीं कि 100% समझ मर जी बहुतों का प्रश्न है हां बहुत क्या होता है संसार के जीव बात समझ नहीं पा रहे आप भगवान से मांगा लेकिन आपने भगवान को अपना नहीं माना सच्ची मानिए सच्ची मानिए अब श्रद्धा और श्रद्धा पराय से होती है प्रभु से नहीं वो हमारे स्वामी हैं वो
हमारे लिए जो विधान करेंगे बहुत बढ़िया विधान करेंगे बिल्कुल सच्ची मानिए आप समझते नहीं अरे बोले कैंसर हो गया बहुत बढ़िया विदा हां अनंत जन्मों में हमने पाप कर्म किए उसका परिणाम आज कैंसर रूप में आया अब देख लो कि अब शरीर छूटेगा भय सवार हो गया तो जितनी स्वास राधा राधा जप लो तो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी अगर कैंसर जैसा दुख ना होता तो भगवान की यादना आती भोगों में भूल जाते यह बड़ी कृपा हुई शरीर तो जाएगा ही शरीर क्या केवल कैंसर से जाता है अरे भैया ऐसे ऐसे दृश्य हैं खूब खाए पिए फिल्मी गाना बज रहे महंगी गाड़ी में बैठे और एक क्षण में गाड़ी में आग लगी सब भस्म हो गए कितने ऐसे समाचारों में नहीं कितने ऐसे खूब आनंद एक्सीडेंट हुआ चिथड़ा उड़ गए इसका कोई भरोसा है हमारी कामना नहीं पूर्ण हुई कोई भगवान मंगल विधान है नहीं भगवान के पास कोई कमी है कुबेर जैसे जिनके सेवक हैं वह हमको क्यों नहीं दे रहे जरूर ना जरूर हमारे ऊपर कृपा है क्या कृपा है हम गरीबी से जी रहे हैं बड़ी विपत्तियां हैं क्योंकि संसार में सुख नहीं है
यह तुम्हें अनुभव कराने के लिए भगवान अब तुम चलो भगवान की तरफ भगवान रास्ता देते हैं पर जीव हट करता है नादान बालक की तरह जैसे छोटा बालक कार हवाई जहाज वो प्लास्टिक केलिए होते और वो बिरज गया कि मुझे ये चाहिए नहीं देगा तो व फैल के रोने लगता है फिर विवस होकर माता-पिता या तो लाकर दे देते हैं और या फिर एक और नया काम करते हैं थप्पड़ आ देते हैं तो हम लोग कुछ ऐसे ही जिद्दी बालक है तो फिर थप्पड़ भी देते हैं या तुमको समझाया समझ में नहीं आ रहा पहली बात यहां इतना समझो यहां कुछ टिकाऊ नहीं है बोलो विचार करके कुछ टिका हु है ना हमारा शरीर टिका हु है ना कोई भोग टिकाऊ यदि भगवान हमको ये टिका जो टिकने वाली वस्तुएं नहीं ना देकर हमें अपनी भक्ति दे दे वह अपने को दे दे अपना प्रेम दे दे तो हम पर कृपा ही तो कर रहे हैं तोय भक्ति का मार्ग ही तो खुल रहा है जब सब जगह ठोकरें लगती कोई नहीं अपना हो तब भगवान याद आते द्रोपदी जी को तब तक भगवान याद नहीं आए जब तक किसी और का सहारा रहा हमें लगता है हर विधान मेरे भगवान का मंगलमय
है यदि हम कह रहे मांगो यदि नहीं पूरी हो रही तो य विचार कर लो कि कोई मंगल भगवान का विधान है नहीं उनको देने में क्या था अब हम शांत हो जाते हैं ना भगवान पर श्रद्धा करते हैं और ना उस मांग आप देख लेना मंगल होता चला जाएगा हमने ऐसा देखा है कि अगर यह मिनट भगवान कृपा ना करते तो बस खत्म जीवन ही खत्म ऐसी ऐसी परिस्थितियां देखिए बचा लिया बचा लिया एक एक कदम पर वो अपने जनों को बचाते हैं विश्वास करो बिना मांगे वो देते हैं बिना चाहे वो सुरक्षा करते हैं हमें सत्संग में बताया एक बार हम गंगा के किनारे जब भ्रमण कर रते थे गंगा के किनारे रहते थे तो वहां की कुछ एक ऐसी मिट्टी होती है कि जैसे कुछ सूख गई तो मजबूत हो गई और कुछ ऊपर से सूख गई और नीचे दलदल ही दलदल है और ऊपर वो एकदम प्लेन और सूखी हुई बिल्कुल आपको पता नहीं चलेगा कि यहां दलदल है अब हम उधर ही जा रहे थे कोहेरे का समय था सर्दी बहुत थी उस समय कोई घाटों में नहाने आता था अन्य जगह तो था नहीं अब अगर हमारा कदम अगला पहुंच जाता और हम वहां फस जाते तो कब कौन आता
पता नहीं और कितना हम धस जाते पता नहीं आवाज आ ये आगे दलदल है डंडा छड़ी रखते थे ना ऐसे आगे डंडा किया तो मलाई जैसा पापड़ी हटी और मलाई जैसी आ गई मतलब समाते चले जाते अब हम लौट के देखा कोई आदमी नहीं बार-बार ये भगवान भगवान बोले भगवान बचाए ऐसे सैकड़ों जगह हमने देखा कि हमारे भगवान हमको कैसे दुलार करते हैं कैसे रक्षा करते हैं वह हमारे वह आपके लेकिन आप अपना उनको नहीं मान रहे अपना मान करके यदि बात रखें तो पक्का वही वह करेंगे जिससे मंगल होगा दे देते हैं तो हमारी हानि नहीं होगी और नहीं देते तो जरूर हानि होने वाली थी इसी इसलिए भगवान ने नहीं दिया हमको लगता है अगर इतना हो जाता तो यार उनका क्या बिगड़ जाता लेकिन उनको कुछ है कुछ ऐसी परिस्थितियां देते हैं जिससे तुम्हें जन प्राप्त हो घेर देते हैं ऐसी परिस्थिति में नहीं देते भाई भोग सामग्री अब उसको एकही बात याद अच्छा भगवान ही एक सहायक है वो पूरा मन भगवान की तरफ अगर हमें दुख ना मिले संसार से विपत्ति ना मिले तो भगवान की तरफ चलने का मन नहीं करेगा भोगों में ज
अच्छा अनुकूल भोगों कहां उनको भगवान थोड़ी सुवाई देते हैं उनको तब सुवाई देंगे जब दुख विपत्ति आएगी इसलिए हमें लगता है भगवान से मांगे और कामना पूर्ण ना हो नाराज ना हो उसमें कोई मंगल विधान भगवान का पक्का मान लीजिए पक्का भगवान जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे खुद को देते हैं यह टिकाऊ चीज नहीं है यहां कोई भी इतना स हम कई बार उदाहरण दिया है एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती प्रसन्न मुद्रा में थे तो बोले चलो आज भक्तों के दर्शन करते हैं माता जी ने कहा चलो भगवान
एक साधु के वे में हो गए माता जी पीछे साधवी के रूप में हो गई एक धनी आदमी चारपाई पर बैठा सुपड़ी कतर के खा रहा था पचास गाय भैंसे सब खूब उससे कहा भाई 100 ग्राम दूध दे दो हमारे ठाकुर को स्नान करवाना है तो बिगड़ गया जाने क्या क्या अशुद्ध शब्द बोल गए पार्वती जी एकदम रुद्ध दृष्टि में हम दर्शन कराने आए भक्त के पहले ूप का कष्ट सहले तो छाया का सुख मिलता है पहले आप भक्त के दर्शन करो तब तुम्हें भक्त के दर्शन कराएंगे हटे भगवान शिव और कहा हे भगवान श्री हरि इसके
पास जितनी संपत्ति है इससे और 100 गुना इसकी बढ़ जाए माता जी और ढर दनी तो कहते ही उसने 100 ग्राम दूध नहीं दिया गाली दी ऊपर से और भगवान फिर भगवान बोले आओ चलते हैं तुम्हें भक्त के दर्शन कराने एक गांव में गए तो फुसा की झोपड़ी थी उसमें उसकी मां रहती थी एक गाय थी जवान आदमी गंगा जी पार्श्व में बहती थी गंगा नहा के भजन करता माता की सेवा के लिए मेहनत करता और गाय जो थी 100 200 ग्राम दूध देती थी उससे माता जी की सेवा भगवान शिव गए और भैया ठाकुर जी की सेवा के लिए 100 ग्राम दूध तो जो देसी गाय होती है ब बृद्ध हो गए हो आधा लीटर 500 ग्राम एक लीटर बस ऐसे ज्यादा नहीं अपनी जो देश नवीन हो तो पाछ लीटर तक ये 20 2 लीटर अपने देसी गायों में नहीं होता तो थोड़ा दूध देती थी पूरा दूध रख दिया पाओ आप ऐसे पाया थोड़ी देर भगवत चर्चा की चल दिए और कहा हे भगवान इसकी गैया और मैया दोनों ले लो अंबा जी को अब नहीं रहा गया बोले जो 100 ग्राम दूध ले दिया उसको 100 गुना संपत्ति दे दी यह हिसाब हमारी समझ में नहीं आया और जिसने तला था उतला
दे दिया गरीब आदमी तो उसके दूध की जो वृति आती थी वह गैया और बात करने के लिए थी मैया दोनों आप ऐसा बोले यही तो समझ ठीक नहीं समझो अभी इसका कुछ समय गैया और मैया में जाता है अब यह अखंड भजन करके परमात्मा प्राप्ति करेगा और वोह उतने वैभव में तो अपमान संत का कर दिया जब 100 गुना और बढ़ेगा तो महापाप करेगा नरक जाएगा समझ रहे तो भगवान के विधान को हम लोग समझ नहीं पा रहे अगर हमें भगवान नहीं दे रहे तो जरूर हम पर कृपा करें ऐसा हमें मानना चाहिए नाम जप करो दूसरों की सेवा करो तभी आप ये भक्ति का रास से समझ पाओगे दूसरों से सुख लेने की भावना भगवान को भूलकर संसार में रमना तो आप अध्यात्मा नहीं समझ पाओगे भक्ति नहीं समझ पाओगे तो पापा आचरण बनेंगे हृदय अशांत रहेगा दुर्गति हो जाएगी इसलिए नाम जप करो भगवत सेवा भाव से परिवार की समाज की सेवा करो भगवान से जो मांग करो एक तो मांगना नहीं चाहिए अगर मांग करो तो छूट दे दो कि पूरा करो तो जय जय और ना पूरा करो तो जय जय आपका हमारा जो भाव संबंध है वो कभी टूटे ना प्रभु और ना पूरा करने
पर हमें इतनी हिम्मत देना कि आपके प्रति हमारी श्रद्धा कभी तो आपकी जय हो जाएगी जिनको कई कई दिन भोजन मांगने पर नहीं मिलता था सुदामा जी को उनकी सुदामा पूरी बन गई जैसे द्वारिका पुरी जिस दिन हमारे प्रभु की नजर हो जाएगी निहाल हो जाओग पक्का मानना पापा चरण मत करो नाम जप करो सर्वानंद की प्राप्ति इसी से हो जाती है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा रा राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा रा राधा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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