जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री धराचार्य जी ने महाराज जी से क्या प्रश्न किए ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
नाम जिसकी जिया प आ गया अब उसकी दुर्गति नहीं हो सकती नाम जापक के सेवक बनते हुए पाए गए अखिल कोटि ब्रह्मांड उ के स्वामी देखिए रूप नाम आदिना रूप का प्रकाश जो नाम करता है ना वो त्रिभुवन में कहीं नहीं है यदि आप अशुभ प्रवाह करते हुए कृष्ण कृष्ण बोलेंगे तो कृष्ण अशुभ प्रवाह करते हुए आपका चिंतन करेंगे हम महापुरुषों की बात कह रहे हैं तो उन्होंने कहा कि नामी प्रभु के आ जाने पर भी नाम का विस्मरण ना हो क्योंकि जिसके प्रभाव से वह आए हैं वह टिके रहेंगे फिर जीवन
का सबका परम सुख का संविधान नाम है भागा आत्म विद्या वि य नव योगेश्वर के लिए आत्म विद्या वि ये अपने आप से अपने आप का बोध अपने आप हो जाएगा नाम जप करता रहे जो हमारा स्वरूप है उसको जो भूल कर के हम देव भाव को प्राप्त हुए हैं इस भ्रम को केवल वेदांत विद्या के द्वारा नहीं मिटाया जा सकता चाहे जितना श्रवण कर ले और चाहे जितना प्रवचन कर ले नाय मात्मा प्रवचने लभ बहु दस श्री रामानुज चार्य जी इसलिए कहते यमस ते तेन यम जीव परमात्मा ते जी तो कम ण तो किसको वर्ण करते
हैं प्रियतम एव ही आत्मी वर्ण भवती जो अत्यंत प्रियतम होता है उसी को भगवान वर्ण करते है और ये प्रियतम प्रियता नाम से भगवान नाम और नामी अभेद है फिर भी भेद है नाम स्वामी है और नामी सेवक है जहां नाम विराजमान होता है वहीं नामी को प्रकाशित पाया गया नाम के द्वारा ही नामी का परिचय है इसलिए यद्यपि को बड़ छोट कहत अपराध पर नाम ऐसा महामहिम है कि भगवान सबके हृदय में विराजमान है लेकिन सब दिन दुखी और माया कृत आकर्षणों में फंसकर दुर्गति को प्राप्त हो रहे हैं भगवान है लेकिन नाम जिसकी जिया पर आ गया अब उसकी दुर्गति नहीं हो सकती उनको छुप के त्रिगुण माया के पर्दे में बैठने नहीं देगा नाम उनको हृदय मंदिर में प्रकाशित होना पड़ेगा जिसकी जिव्या पर नाम है इसलिए सर्वोपरि भगवत प्रीति प्रदान करने वाला साधन और साध्य नाम है हमारी वाणी जी में वर्णन करते हैं जो रसिक आचार्य महापुरुष है कि प्रेम मूल यह नाम है प्रेमी रसिक जपत यह नाम तो प्रेम मगन निज बन विश्राम श्री हरिवंश जहां रहे प्रेम प्रवाह परे जन सोई तब क्यों लोक वेद
सुधि होई जब हरिवंश कृपा करे जब नाम का निरंतर नाम स्वास दो बिलक चलत है इनको भेदन मो को भावे स्वास नाम नाम ही स्वासा नाम स्वास को भेद मिटा है तो रोम रोम जब रग रग बोले नाम जा के सेवक बनते हुए पाए गए अखिल कोटि ब्रह्मांड के स्वामी नाम जाप कों के ऐसी महिमा किसी और साधन में नहीं देखे गई भगवान अपनी भगवता भूलकर अपने नाम जापक प्रेमियों के सेवक बन कर के दिखाई दिए बहुत से ऐसे चरित्र महापुरुषों के है जिनमें भगवान सेवका करते हुए पाए गए इसलिए यह कलिकाल मला यतन मन कर देख विचार श्री रघुनाथ नाम बिन नान आन अधार अगर नाम जप नहीं है जीवन में और सब कुछ है मन विश्राम को प्राप्त नहीं होगा निरंतर चिंतन नाम जप से भगवता का वृति तन्मया स्थिति अव्यावहारिक विस्मरण ना करे वो जीत गया इसलिए रामानुजाचार्य जी भी कहते तैल धारा स्मृति संतान रूपा भक्ति ल तैल धारा निरंतर जीवन का सार ये पाया गया सब साधन मार्ग से जैसे चलते है ना संसार का विस्मरण अत्यंत आवश्यक है और तभी होगा जब उधर आकर्षण होगा नाम क्या करता है महाराज जी जीव के
जीववू कहीं प्रियतम पति बन गए कांत भाव कहीं दास भाव स्वामी बन गए नहीं तो यह जो नाम की महिमा है इसके आगे अब हमें कुछ सूझता नहीं है मब जीवन का ऐसा कुछ नशा हो आता है ना जैसे तो आप गुरुजनों के प्रताप से बात समझ में आ नाम हर समय नेत्र खुले हो या बंद हमारे सामने नाम उसी में रूप समाया रहता है देखि रूप नाम आदिना रूप का प्रकाश जो नाम करता है ना वह त्रिभुवन में कहीं नहीं है जो नाम में है रूप वह त्रिभुवन में कहीं नहीं और नाम सब बराबर है महाराज जी गुरु प्रदत नाम गुरु मुख नाम उसी की महिमा है जो गुरु जी ने हमें नाम दे दिया बस उस नाम की महिमा है और वह निरंतर चलना चाहिए बस शर्त य है निरंतर चलना चाहिए सोवत रसना रटे राधा कृष्ण सुनाम जागृत स्वप्न सुषुप्ति स् फुरत में राधा पदा जत छटा वैकुंठे नरके थवा मम गतिर नान स्तु राधाम बिना अपने इष्ट में ऐसी अनन्य हो जाए जागृत स्वप्न सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का बाद हो कर के भगवता का स्थिति वो जग रहा है तो प्रभु में वो सुषुप्ति में तो प्रभु में स्वप्न में तो प्रभु में
त्रिगुणा तीत अवस्था नाम प्रदान कर देता है नाम अब चाहे वह प्रणव जपे राम जपे कृष्ण जपे हरि जपे जो गुरु ने दिया है जैसे अपना तो जीवन धन राधा नाम है राधा राधा राधा बस य इससे इसके आगे मतलब क्योंकि जो जहां होता वहां की महिमा प्रकाशित होती है जब हमारे हरि है ना वह भी राधा नाम मुरली में राधा उच्चारण करते हैं हरि रसना राधा राधा रट प्रियता का है भाव यथा माम प्रपद्यंते ता स्त बजा में हम यदि आप अशुभ प्रवाह करते हुए कृष्ण कृष्ण बोलेंगे तो कृष्ण अशुभ प्रवाह करते हुए आपका चिंतन करेंगे एक बार युधिष्ठिर जी महाराज युद्ध क्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण चंद्र जू के शिविर में किसी सलाह के लिए गए तो देखा पद्मासन लगाकर ध्यान स्थ थे तो उनको आश्चर्य हुआ कि सारा जगत तो इनका ध्यान करता है य किनका ध्यान कर रहे हैं तो वो जिस प्रश्न के लिए गए थे व तो गौड़ हो गया मुख्य प्रश्न यह हो गया कि प्रभु किसका ध्यान कर रहे हैं और पुलकित हो रहे हैं गदगद अश्रु प्रवाह हो रहा प्रभु का तो जब प्रभु बाह दशा को आए देखा युधिष्ठिर तो शांत
युधिष्ठिर जी ने कहा प्रभु मैं बहुत देर से आपको देख रहा हूं आपके अशु प्रवाह हो रहे आप ध्यान स्थ है प्रभु हमें यह प्रश्न आता है कि हम सब आपका ध्यान करते हैं त्रिभुवन के सब ऋषि मुनि आपका ध्यान करते हैं आप किसका ध्यान कर रहे थे आपका आराध्य कौन होगा आप सबके आराध्य परब्रह्म की प्रतिष्ठा है फिर आप किसका तो उनका इस समय सर सैया पर पड़े हुए भीष्म इसी तरह मेरा स्मरण कर रहे हैं इसलिए मैं उनका ध्यान कर रहा हूं ये था प्रपद्यंते त हदय म साध बिल्कुल नाम नाम नाम निरंतर नाम जप महापुरुष जन कलयुग में नाम के प्रभाव के लिए ही प्रकट होते हैं कल खल भविष्यति नारायण पराय इसलिए नाम जो है नाम और नामी को उपाय उपे दोनों मानते हैं कोई बस प्रियता हो जाए नाम में महत्व बुद्धि हो जाए नाम में नाम के समान कुछ ना रखे जैसे त्रिभुवन की सारी संपत्ति वैभव सिद्धियां और यहां तक कि नामी प्रभु के आ जाने पर भी नाम का विस्मरण नहीं होना चाहिए नामी प्रभु के आ जाने पर भी ना महापुरुषों की बात कह रहे हैं तो उन्होंने कहा कि नामी प्रभु के आ
जाने पर भी नाम का विस्मरण ना हो क्योंकि जिसके प्रभाव से वह आए हैं वो टिके रहेंगे फिर नाम न छूटने पावे नाम डोरी पतंगो यथा तोवा मनुम हां नाम जो है वो डोरी और प्रभु पतंग है रूप पतंग है जैसे डोरी खींचो वैसे ही रूप नजदीक आता जाएगा पतंग नजदीक आती जाएगी खूब निरंतर नाम और जो नाम जापक वो लीला गायन तो करेगा ही और लीला श्रवण करेगा ही और जो लीला गायन लीला श्रवण नाम जप करता है व ठाकुर सेवा तो करेगा ही सेवा के बिना उसका तन निर्वाण नहीं हो सकता ना तो सेवा करेगा
तो मानसिक स्थिति में सेवा में पहुंच ही जाएगा प्रगट सेवा मानसिक सेवा में पहुंचाती है वो प्रति प्रति क्षण अपने आराध्य देव की समीप प्राप्त कर लेता है छिन छिन बिहर संग छिन छिन निरख प्रेम भरी छिन जस कहत अभंग यह जो कृपा हरिवंश की प्रतिपल आराध्य देव मानस पटल पर नेत्रों में छाए रहते हैं जब नाम जप का एक तार स्वरूप प्रकट होता है अव्यावहारिक औरन कुछु सुहाय फिरे अपने रस मातो कुटुंब देते जाए छूट सब ही विधि नातो जहां जहां पी की बात सुने खोजत तिन गन मेरे प्रीतम
की कोई बात सुना दे मत चिता मगत प्राणा बोध अंता परस्पर कथ माम नित्यम तु तेशाम सतता ब वो बुद्धि योग प्राप्त महापुरुष जो है वो निरंतर भगवत साक्षात्कार की स्थिति में रहता है हर समय भगवान उसके नेत्रों में बसे रहते हैं रूप छके घूमत रहे तन को तनिक न भान बस नाम इसीलिए जो भाई जन आते हैं सबसे कहते हैं देखो नाम जप करने के लिए अगर आप मदिरा पान करोगे मांस खाओगे वय विचार करोगे तो आप नाम जप नहीं कर सकते पाप वंत कर सहज स्वभाव भजन मूर्ते तो ये छोड़ो और नाम जप करो
देखो हर दुख मिट जाएगा क्योंकि दुख प्राप्त ही होता अशुभ कर्म से है और जब नाम जप करोगे नाम कीर्तन करोगे तो नाम सं कीर्तनम यस्य सर्व पाप प्रणास जो दुख की जड़ है अशुभ कर्म वो सब भस्म हो जाएंगे और नवीन इसलिए नहीं होंगे कि नाम रूपी पहरेदार अशुभ कर्म होने नहीं देगा नाम पहार दिवस ली जो रात दिन नाम जप हा नाम जप करते ना तो यह नाम पहरेदार है यह गलत होने नहीं देगा नाम चल रहा होगा तो गलत सोचोगे भी तो जलन पैदा कर देगा और वह आपको गलत जाने नहीं देगा इसलिए जीवन का सबका परम सुख का संविधान नाम है यज्ञ नाम जप यज्ञ भगवान स्वयं कह बड़ी बड़ी यज्ञों से जो बात नहीं बनती हो नाम रूपी महान जप यज्ञ से हो जाता है खूब नाम जब हृदय में नाम निरंतर चलने लगता है तो उपासक को परमानंद की स्वयं अनुभूति होने लगती है पर नाम में मन नहीं लगता नाम में मन जबरदस्ती लगाना पड़ता है दिखता है हा हा इसीलिए एक तंत भगवान पधारे थे उन्होंने बहुत सच्चे हृदय से बात की थी उन्होंने कहा कि महाराज वेदांत का अनुशीलन करता हूं गंगा स्नान करता हूं
नित्य विश्वनाथ जी का दर्शन करता हूं पर मैं आपसे प्रार्थना करने आया कि मेरे मन को विश्राम अभी तक नहीं है जितने भी साधन है सब कर रहा हूं पर विश्राम तो हम कहा महाराज जी एक बात हमारी अगर आपको रुचे होता है ना कि ये औषधि रुचे तो कहा अभी आप निरंतर क्या मंत्र का या नाम का चिंतन करते हैं बोले नहीं बस हमका यही कमी है सब हो रहा है गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक पद में कहा है राम राम राम जी है जोलो तू न जपि है तोलो तू कह जाए हु ताप तप है सुर सर तीर बिन नीर दुख पाई है सुर तर उतरे तो ही दारद सताई है गोस्वामी जी छूट वे के जतन विशेष बांधे जाएग होए है विष भोजन जो सुधा सान खागो राम राम राम जी जोलो तू न जपि है निरंतर चाहे प्रणो आप जपो लेकिन आपकी प्रणवा का वृत्ति हो जाए आपकी दृष्टि में हर समय नाचना चाहिए जो गुरु मंत्र है देखो गंगा नहाना यह सब करना ये तो बाह्य पवित्रता है हृदय की गुफा में जो अंधकार है उसको मिटाने के लिए मंत्र और नाम है उसका जब सतत चिंतन होता है तो प्रकाश इससे होता है दीपक बारा नाम का ही उजी आ र
हो हृदय गोस्वामी जी कह रहे राम नाम मणि दीप धर जी देरी द्वार तुलसी भीतर बाहर जो चाह उन्होंने स्वीकार किया हम क एक चीज की कमी रह गई शून्य शून्य तो बहुत है अंक नहीं लगा बस इसीलिए संख्या पूरी नहीं हो पा रही अगर अंक लग जाए तो जितना शून्य है 10 गुना लाभ देता चला जाता है तो तो उन्होंने कहा आज से हमय अभ्यास करते हैं तो हम कहा उठते बैठते चलते फिरते जो गुरु जी ने दिया है उस मंत्र का अभ्यास करें बस जीत गया संसार में जीत गया
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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