एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #523 · 17 अप्रैल 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
गुरुदेव मैं यहां आया तो मेरी पिताजी बोलते हैं कि मेरा जलन जलन हो रहा है तुम मतलब वृंदावन में शपथ कहो कि तुम वहां नहीं जाओ वृंदावन हा हा ऐसे माता-पिता के बच्चे जो बिगड़ बिगड़ते चले जाते तो व सब वो सब जी आपके सत्संग से सकारात्मक प्रभाव है वो मेरी बिटिया है स्कूल में हम पिछली बार कुछ ऐसा था कि इसने मुझे आते ही रिपोर्ट किया कि क्लास में ऐसा होता है और वो मैं उसके साहस की आपके सत्संग से आया महाराज हम इसीलिए बच्चों से प्रार्थना करते हैं जैसे स्कूल के बच्चे आते हैं कि अपने मम्मी पापा को फ्रेंड की तरह दोस्त की तरह उनसे बात करो बिल्कुल डरने की जरूरत नहीं हमारे पापा है हमारी मम्मी है यार वो हमें बहुत बहुत डांट सकते हैं लेकिन वो सीरियस मैटर को वो समझ सकते हैं व हमारे बड़े जन हैं वो हमें संभाल सकते हमें बचा सकते हैं अगर ऐसा नहीं तो अब देखो वह पिता जो सतमा आग में जाने के लिए कह रहा कसम खाओ सतमा के लिए असत मार्ग के लिए कसम खानी चाहिए बेटा कसम खाओ कि ऐसे गंदे बच्चों का संग नहीं करोगे जो शराब पीते हैं
जो व्यभिचार करते हैं जो ऐसे वो यही तो समस्या है कि माता-पिता अगर चरित्रहीन है तो कैसे संभाल पाएंगे बच्चों को वही वही हाल हो रहा है ना पढ हां तो इसलिए आज समय तो बहुत विचित्र हो रहा है लेकिन आज हम प्रणाम करते हैं समाज को कि ऐसे कलयुग के समय में भी लाखों सत्संगी हैं आपके सत्संग आपको ही आता है ला नहीं श्रेय इस समाज को जाता है कि बाबा जी की बात मान रहे हैं लाखों नौजवान भाई है जो मतलब बात मान कर के अपने आप को सुधार की तरफ ले जा रहे हैं और यह बहुत हानिकारक है देखो गुरुदेव हमको तकलीफ इस बात कहे कि मेरे पापा बोले कि वृंदावन नहीं जाना है शपत अब हमको आने का मनोगत शपथ तोड़ देंगे बिल्कुल तोड़ देना तुम यस गंदी बात की शपथ नहीं मानी जाती है हम पासन करते थे तो तब उनको बोलता है ये सब होता है जब आपका सत्संग सुन के सुधार कर दिए मतलब फिसल गए या पता नहीं तुम यार पूर्व जन्म कैसे भजनानंद आदमी हो कि ऐसी जगह जन्म लिए नहीं तो देखो मतलब बहुत विरोधी बात है तुम इतने सज्जनता की तरफ बढ़ रहे हो तो माता-पिता को सुख
होना चाहिए बाबा जी बनने के लिए नहीं हम कह रहे लेकिन सज्जनता तो होनी चाहिए ना गंदे आचरण नहीं होने चाहिए गंदे आचरण हो चुके हैं उसका बिल्कुल कपड़ा गंदा हो जाए तो क्या साबुन नहीं है क्या धोने के लिए लेकिन सत्संग सुनने के बाद भी अगर फिसल गए तो फिर भी चिंता मत करो कुश्ती लड़ने वाला ही दांव फ में चुकता है फिर हम आगे तैयार होंगे हे कमजोरी नहीं हजार बार गिर जाओ तो भी तैयार हो जाना है चिंता गलाई जा रहा है हमको नहीं चिंता मत कर यार नाम जप कर बुत सा संपन्न म
दीर्घ सूत्रम क्रिया विज्ञ व्यसन स्व शक्तम सरम कृतज्ञ दृढ सौ हृद च ए फिसला तू ही है तू ही खड़ा होगा तू ही पैर जमाए तू ही रौंद के निकल जाएगा मेरी बात मान हारने की जरूर जत नहीं तू भगवान कांस बन सकता हूं रवान वर ए हम भगवान के अंश है चिनगारी अगर सही ढंग से चिनगारी को सजाया जाए फूस डाल के तो ज्वाला बनने में देर लगेगी क्या हम उसी ज्वाला की चिंगारी है जिसे परमात्मा कहते हैं जिसे ईश्वर कहते हैं उसी की चिनगारी है तो चिनगारी को आप चिनगारी मत रहने दो अगर चिनगारी एक बूंद पानी से बुझ सकती है तो चिंगारी को अनुकूल अगर फूस मिल जाए तो ज्वाला बनने में देर नहीं लगेगी ये तू चिंता मत कर बस गंदी दृश्य देखना बंद कर मोबाइल से और गंदी हरकत करना बंद कर और डंड बैठक मार दो-तीन किलोमीटर दौड़ सात्विक भोजन कर सत्संग सुन नाम जप कर देख तेरे जीवन में प्रकाश आता है क्या जब आपका सत्संग सुनते हैं तोरी मां बोलती है मोबाइल फोड़ देंगे मोबाइल फोड़ देंगे हां तो सुन अब हम उसका उपाय बता रहे हैं जब उनके बीच में रहो तो सुनो ही मत
सत्संग और कान में ऐसे सत्संग आजकल लगा कोई पूछे क्या सुन रहे हो फिल्मी ला सुन रहे भैया झूठ से झूठ को निकाल दे हो जैसे कांटा लगता है तो कांटे जैसी आकृति से कांटा निकालते हैं यह संसार झूठा है इसको झूठे देखो एक बार विभीषण जी के मकान में लिखा था राम राम राम रावण को शिकायत पहुंची कि आपके शत्रु का नाम तो आपका भाई लिखे रावण मंदोदरी के साथ वहां पहुंचा उ कहा ये राम हमारा दुश्मन तो तुम उस कैसे लिखे हो बो उनका थोड़ी नाम लिखे रा से रावण मा से मंदोदरी आप दोनों
का नाम लिखे मुस्कुरा दे चल जी भगवान के मार्ग में चलने के लिए झूठे संसार को झूठ से बहला के निकल चलो अब जैसे हम रो रहे हैं भगवान के लिए और हम किसी से बताएंगे भगवान के लिए रो रहे हैं तो हमारा भाव हट जाएगा तो रो काहे के लिए आज थोड़ा दर्द है हम उसे बहानेबाजी कर देते हैं हम उसे झूठ बोल वो झूठ नहीं किसी का प्राण ले रहा हो झूठ किसी का अपहरण धन कर रहा हो झूठ किसी को कष्ट दे रहा हो झूठ उस झूठ से बचना है जिससे कि हमारा झगड़ा बच जाएगा और हमारा भजन बच जाएगा अगर हम कहते कि हम वृंदावन जाएंगे हम भजन करेंगे हम सत्संग सुनेंगे तो अभी कल हो जाएगी सत्संग नहीं सुनना पक्का नहीं सुनेंगे और जब एकांत में कान में लगा के सत्संग सुन लिए भगवान का नाम अंदर अंदर जप कर रहे हैं कभी अवसर मिला लोग जाते दुनिया में मनोरंजन करने तुम भाग के एक दिन वृंदावन आ जाओ भाग भाग के पांच बार आ गए वृंदावन अरे बड़ी कृपा है बच्चा य एक बार भी आना मुश्किल है श्री राधिका कृपा बन सबके मनन गम श्री जी की आपके ऊपर कृपा है बिना आप नहीं करेंगे सब
माफ हो जाएंगे हमारी बात सुन रहे हो ना हम नहीं कह रहे हमारे भगवान कह रहे हैं सर्व धर्मानना मेकम शरणम ब्रज अहम तवाम सर्व पाप मोक्ष स्याम मा सुचा जो गलती हो गई है देखो कहीं ना कहीं हमसे अज्ञान से गलती हुई हम भले ज्ञानी बनते हैं कि हमें पता था कि नहीं होना चाहिए पर वास्तविक हमें ज्ञान नहीं था हमसे गलती हो गई तो भगवान कृपालु है वो क्षमा कर देंगे नाम जप करो नाम जप जानते हो वो बोर्ड जैसे लिखा हो उसको मिटाने वाले क्या कहते डस्टर नाम जप डस्टर है ऐसे मिटा देगा सब नाम सं कीर्तनम यस्य सर्व पाप प्रणास हम कोई बात मनमुक नहीं कहते तस्मा शास्त्रम प्रमाण नाम सं कीर्तनम यस तुम्हारे हृदय रूपी बोर्ड में जो पाप लिख गया है ये डस्टर की तरह मिटा डिलीट कर देगा भूल ही नहीं पा रहा हूं पाप जो हुआ है नाम को पकड़ो तो भूल जाओगे उसे नाम को याद करो राधा राधा राधा राधा ठीक है और जब जब पाप की वोह बात याद आवे तो भगवान से प्रार्थना करो प्रभु जब तक वो नष्ट नहीं होगा तब तक वो याद आता रहेगा और जिस दिन नष्ट हो जाएगा दोबारा याद
नहीं आएगा ध्यान रखना तो नाम जप करते रहो राधा गुरुदेव हम आप के पास आएंगे मेरा पापा शराब भी दे दे तो श्राप दे देगा लगता है हमको श्राप श्राप दे देगा तो तब भी आऊंगा यार श्राप वरदान देने के लिए पावर चाहिए व पावर है श्राप वरदान देने के लिए पावर चाहिए व पावर राधा राधा जप और ऐसे माता-पिता के भी पैर छू तब हमारा त मित्र कहलाएगा हमारे दोस्त तभी कहलाओगे जब वो हमारी निंदा करें हमें गाली दे और तुम झुक के उनके पैर छुके कि गुरु की आज्ञा है महाराज जी की आज्ञा है पैर छुओ उनके और कह दो जैसा आप चाहे वैसा ही चलने की कोशिश करूंगा थोड़ी बाड़ी कुछ अगर गलती लगे तो क्षमा करो ये हमारे संघ का असर हो ये थोड़ी होगा तुम खींच के थप्पड़ मार दो जवान हो ऐसा नहीं कभी मत करना उनमें भगवान की भावना करो वो तुम्हें गाली दे हम हमें गाली दे अच्छे से चलो सत मार्ग को जो गाली देता है वो बेचारा दया का पात्र है आप सोचो दया का पात्र कि नहीं तो छोटा बच्चा जिसे गाली दे तो क्या करेंगे हंस देंगे ऐसे वो छोटे बच्चे हैं चाहे व 70 साल के बूढ़े
हो अज्ञानी क्या है ज्ञानी के सामने बालक के समान है तो वो बालक के समान देखा जाता है उसका विरोध नहीं किया जाता है अंदर-अंदर से प्यार मत रखो अंदर प्यार करो प्रभु से और बाहर से व्यवहार ऐसे रखो पागल बन कर के जी जाओगे तो बुद्धिमानी से निकल जाओगे और या ये साबित करना चाहोगे भक्ति तो फिर ऐसे-ऐसे शब्द आएंगे कि निकलना मुश्किल हो जाएगा बंद दीजिए कि हमसे जीवन में कोई पाप ना हो अब यार तुम बहुत अच्छे आदमी हो ऐसा तुम्हारी भावना है उसका हम आदर करते हैं और बल तो श्री भगवान से ही मिलता है हम और आप दोनों मिलकर प्रार्थना करें कि आप आपको भगवान ऐसा बल दे कि आप अपने धर्म पर चल सको और उनकी भी सेवा करो माता-पिता की और भाई को भी नफरत ना करो दुलार करो अंदर से असंग रहो बाहर से सबको प्यार दो जिसका जो अधिकार है तो बच्चा बहुत जल्दी भगवान प्रसन्न होंगे क्योंकि पिता में भी पावर भगवान ही है माता में भी भगवान है भाई में भी भगवान है हमारी बात को समझना ये बाहरी यंत्र कड़वे हैं तो कड़वे शब्द निकल रहे लेकिन जहां पावर है वो
श्री भगवान है कभी भी अपने माता-पिता का अपमान मत करना हमारी ये बात ध्यान रखना और कभी भी ऐसी परिस्थिति आवे तो तन मन प्राण मेहनत चा लेवरी करनी पड़े पैसा कमाकर अपने माता-पिता की सेवा करते हुए नाम जप करना भले मेरे पास मत आना तो यह देखोगे हम तुम्हारे साथ रहेंगे अगर उनको पैसे की जरूरत है तो मेहनत करके वो पैसा जो यहां आने में लगाओगे उनको लगा दोगे ना तो ये तुम देखोगे हम तुम्हारे दिमाग में बैठे मिलेंगे तुम्हारे भाव में बैठे मिलेंगे संतों का सानिध्य यहां से
होता है यही तुम्हें लगेगा गुरुदेव यहीं बैठे दिमाग में ना अच्छे धन्यवाद आप नौजवान होकर अपना ार कर भगवान मंगल करें उनका बड़ा मंगलमय स्वरूप है नाम जप करते रहना और टूटना नहीं बस यह बात ध्यान रखना बड़ी कृपा है कि घर में विरोध है भक्ति में जब विरोध होता है तो रंग लाती है हा गुरुदेव बोलता है कि मेरा मानसिक स्थिति हमारे बारे में इनका गबरा गया है बाबा के चक्कर में फस गया है फस गया बाबा के चक्कर में फसना तो गुरु मतलब एक बात कहना चाहूंगा कि आपसे जुड़ने के बाद पताला भगवत प्राप्ति करना है और भगवत प्राप्ति इतना आसान है आज तक लगता था ये पूजा करो ये यहां जाके यज्ञ कराओ ये कराओ देखो इस समय भगवान की कृपा की हवा चली है अब जो जो लाभ ले पावे वो ले ले पावे देखो चक्कर में फसाने का तो तात्पर्य तब होता जब हम कोई जंतुर तुम से बांधते कोई पैसा लेते कोई राख बांधते कोई किसी भी तरह का स्वार्थ का व्यवहार होता गलत तुम करोगे तो हम तुम्हें टोक देंगे सही चलोगे तुम्हारी जैसी बुद्धि शुद्ध सबकी हो जाए हम यही चाहते नशा ना
करें गंदी बात ना करें और जो गंदी बात हो गई उसके लिए जले और उसका सुधार करे कि ऐसा नहीं तुम्हारी बुद्धि नहीं खराब बुद्धि शुद्ध हो रही तुम्हारी अब ये कि इस मार्ग के पथिक को संसार कडुआ लगता है संसार वाले मार्ग को इधर का कड़वा लगता है तो इसलिए भगवान की कृपा धैर्य पूर्वक चलो अपनी बात किसी से कहो मत अपनी बात किसी से कहने से क्या होता है उपहास होता है जैसे आप जिस मार्ग में चल रहे हो चार मित्रों से बात करोगे उपहास होगा बात करो तो उसी मार्ग के पथिकोंडा है कि हमारे राष्ट्र में मंगल में भावना जागृत हो हमारे बच्चे हमारी नवीन पीढ़ी अपने माता-पिता को सुख देने वाले बने समाज की सेवा करने वाले बने ऐसा दुष्ट स्वभाव ना बने यही हमारा प्रयास रहता है कि जीव का परम मंगल परम कल्याण हो अब ये कि जो विपरीत बुद्धि वाले उनको तो हम बुरे लगेंगे ही मा पता सहमती बनी हो किसी बात प फिर क्या करना चाहिए उनका अनादर करके हमें लगता हो वो चीज सही है तो वही करनी चाहिए या नहीं बच्चा हमें लगता है सही यह बात नहीं देखनी है हमें यह
देखना है कि शास्त्र और संत जनों के द्वारा वो बात प्रमाणित है कि नहीं हमें अपना सही नहीं देखना तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या का व्यवस्थित देखो प्रहलाद जी को सजा करके जब माता ने भेजा तो साष्टांग दंडवत किया हिरण कश्यप को को तो गोद में बैठा लिया उका बेटा सबसे प्यारी चीज तुम्हें क्या वो मैं आज देना चाहता हूं तो उनका पिताजी सबसे प्यारी चीज है भगवान श्री हरि के श्रवण कीर्तनम स्मरणम विष्णु पाद सेवन अर्चन वंदनम दास सख्या आत्म समर्पण उठाकर पटक दिया हम मेरे दुश्मन हरि की बात करता है फिर पिता श्री नहीं कहा प्रहलाद जी ने कहा दैत्य राज यह मेरी जो बुद्धि हरि में लगी है वोह किसी के सिखा पढ़ाने से नहीं ये गुरुदेव देवर्ष नारद जी के चरण रज के प्रताप से लगी है और तेरे विरोध करने पर कुछ नहीं होने वाला भाले चलवा हाथी क्या क्या करवाया बाल बाका हुआ क्या आखिरकार भगवान ने फाड़ के फेंक दिया रण क फिर भी देखो प्रहलाद जी ने प्रहलाद जी ने ऐसे हाथ जोड़कर कहा प्रभु मेरे मन में बात आ रही है उ कहा बोलो बोले प्रभु क्या
आपका विरोध करने पर मेरे पिता का गति बिगड़ जाएगी दुर्गति होगी उनका जिसके तेरे जैसा बालक हो उसकी दुर्गति कैसे हो सकती भले वो मेरी निंदा करे भले तेरा विरोध करे पर तेरे जैसा जिसके बालक हो मतलब पिता भी सद्गति को प्राप्त होता है माता भी सद्गति को तो सत मार्ग को तो जानते हो ना सत मार्ग पर चलने पर यदि कोई विरोध करे तो हमें उसकी बात नहीं माननी असत मार्ग में चलने पर यदि हमें सपोर्ट करे तो हम उसकी बात नहीं मानेंगे जैसे की बात ले लीजिए कि अगर हम जै घर में कोई प्रहार है कुछ दान देते हैं इस पर हम नहीं बोलेंगे इस पर नहीं बोलेंगे तुम्हारा अधिकार नहीं देने का अगर माता-पिता मना करते हैं तो तुम्हारी संपत्ति नहीं तुम्हारा अधिकार नहीं देने और हम इस बात पर सपोर्ट भी नहीं करते हम दान वन की बात कभी नहीं करते कभी यह सब बाहरी बातें दान की बात है स्वास दान हमें किसी गरीब जरूरत मंद नहीं पहली बात तुम्हारा अधिकार नहीं है अधिकार नहीं जब तुम अधिकार युक्त होग तब तुम्हें उस बात का उपदेश हो जाएगा अभी तुम माता पिता के
अधिकार में हो गरीब को देना ना देना यह माता-पिता जाने हमारा कर्तव्य है हर स्वास में नाम जप करते हुए अपने चरित्र को पावन रखते हुए आगे उन्नति के मार्ग में बढ़ना जब हम रप कमाने लगेंगे तब उसमें सोचेंगे कि दो रुपए हम किसी गरीब को दे दे अभी माता-पिता की संपत्ति से नहीं ऐसा नहीं करना चाहिए इससे मतलब जो धर्म युक्त बात है प्रार्थना कर सकते हैं जैसे कोई भूखा है माता-पिता से प्रार्थना कर सकते हैं कि आज हम अपने हिस्से की रुट से दे दे जो आप हमें देंगे अगर उसके
लिए मना करते तो राधा राधा राधा हम झगड़ा नहीं करें क्योंकि मेरा अधिकार अभी नहीं है जब अधिकार युक्त हो जाए क्या अधिकार माना जाता है जब स्वयं कमाने लगे तब फिर हम अपनी कमाई से दूसरों को दे सकते हैं दूसरों की सेवा कर अभी नहीं बिल्कुल अभी अभी नहीं क्योंकि वो धर्म विरुद्ध हो जाएगा हां बिल्कुल नहीं ऐसा आदेश हम कभी नहीं करते हम देखो इन बातों को मत्व नहीं रखते रुपया का दान यह सब दान यह सब दान है भाई तो तुम्हारे पास तो कर दो नहीं है तो भगवान ने इसके लिए आदेश नहीं किया भगवान ने आदेश किया माम नि स्मर युद्ध च अपना कर्तव्य करो राधा राधा राधा अब हमें दिखाई दे रहा सामने वाला भूखा है तो चार रोटी हमारे पास है बन जाएगा तो दो उसको खवा देंगे दो हम पा लेंगे और ज्यादा भूखा है तो आज हम भूखे रह जाएंगे उसको दे देंगे हम इस बात को सपोर्ट करते हैं कि आपके पास ₹1 है सब्जी लेने जा रहे हो कोई आपको बीमार दुखी दिखाई दे रहा है तो आज हम नमक रोटी खा लेंगे 00 का उसको औष करा देते हैं हम इसका महत्व देते हैं हम और सब बातें वो
जब आप कमाने लायक हो जैसे शास्त्रों में लिखे की को नहीं आप इस समय हो क्या आप टीचर हो आपको डॉक्टर हो आप पैसा कमा रहे हो हां जी पैसा कमा रहे तो अपने पैसे पर अधिकार को बोलो माता-पिता की बात नहीं अगर आप पैसे कमा रहे हैं तो कुछ हिस्सा आपको आता है तो आप दे सकते हो उसमें माता-पिता का विरोध होना ही नहीं चाहिए अगर वो विरोध भी करते हैं तो मत मानिए क्योंकि आप कमा रहे हैं ना हमें लगा कि मतलब आप माता-पिता के अर्थ से सेवित है तो फिर आपका अधिकार नहीं बनता अगर आप
ब्याह हो गया है हां जी है हां जी तो फिर माता-पिता से उसमें क्या भी पति की सलाह जरूरी है वो कहते हैं हम ब्राह्मण को देना चाहिए तो मुझे लगता है ब्राह्मण की जगह हमें किसी गरीब में दे देना देखो दान का मतलब समझो दान किसको आवश्यकता वाले को अगर कुत्ता भूखे तो कुत्ते को रोटी दे दो हमारी बात समझो दान का मतलब क्या होता है कोई प्यासा है पानी पिला दो किसी को औषधि की जरूरत है औषधि दे दो कोई भूखा है भूखे दे दो सब में परमात्मा वास करते हैं किसी एक के लिए दान की
बात नहीं दान पात्रता का दान का शब्द आता है तो पात्र का जैसे सर्दी का समय है कोई कांप रहा है अब वो कौन सी जाति का है कौन से देश का हैन हमें कुछ नहीं देखना हमें अपना साल उतार करके उसको उड़ा देना है और ये कर दिया तो बहुत बड़ा दान हो गया हमारे पास नहीं है व्यवस्था लेकिन हम ठंडी सह जाएंगे इसको आज अपना वस्त्र दे भगवान ये बात देखकर प्रसन्न हो जाए हमारी बात समझो हमारी किसी सीमा में बात नहीं होती वो एकदम खुली बात होती है अगर आवश्यकता किसी को है और वह वस्तु मेरे पास है और मैं देने में समर्थ हूं तो मैं उस समय दे देता हूं वो कौन है यह सब बातें नहीं देखी जाती भूखा है हम तीन बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं कोई भूखा प्यासा है या कोई सर्दी का समय है या कोई बीमार है इस पर जरूर ध्यान देना चाहिए रुपया देते समय बहुत होश में रहना चाहिए यह रुपया लेकर शराब पिएगा जाके ये रुपया ले के ब विचार करेगा तो हमें बहुत होश में देना चाहिए फिर दुर्गति तुम्हारी भी होगी रुपया देने में होश में रहना चाहिए और भोजन देने में
किसी को भी कुत्ते को भी दे सकते हैं बीमार कोई है पशु पक्षी उसकी भी सेवा कर सकते हैं ठंडी में कोई काप रहा है उसको भी हम दे सकते हैं वस्त्र ऐसा आदित्य जी केरला से राधे राधे महाराज जी महाराज जी मुझे जब से आपसे एक प्रेममय दिव्य स्थिति के बारे में वर्णन मिला तब से एक आनंद में इच्छा प्रकट हुई उस स्थिति के बारे में जानने की महाराज जी आपने एक सत्संग में कहा था कि चलते चलते वृंदावन का पूरा नजारा बदल जाएगा बिल्डिंग वगैरह गायब हो जाएंगी संसार दृश्य बंद हो जाएंगे और इस वर्तमान वृंदावन में दिव्य प्रेम में वृंदावन प्रकाशित होते हुए दिखेगा महाराज जी उसका अनुभव करना चाहते हैं निरंतर नाम जप करो अच्छे आचरण करो अच्छा पवित्र भोजन करो अच्छा व्यवहार लोगों के साथ करो भगवान का चिंतन करते हुए जब हम दूसरों को सुख पहुंचाने की चेष्टा करते हैं तो हमारे अंदर दिव्यता प्रकट होती है और जब हम दूसरों से सुख भोगने की इच्छा करते तो हमारे अंदर राक्षसी बुद्धि प्रकट होती है अभी तो हम मनुष्य तोव भी नहीं धारण कर पाए दैवी संपदा
और फिर दिव्य चिदानंद वृंदावन तो हमें लक्ष्य तो ऊंचा बनाना है पर हमको अपनी योग्यता भी बढ़ानी होगी ना योग्यता बनाए आवश्यकता और योग्यता ये दो चीजें जब पाई जाएंगे तो आप मिल जाओगे भगवान के अं से हम सब भगवत प्राप्ति का अधिकार पर हमारे अंदर लालसा हमारे अंदर योग्यता तो ये योग्यता और लालसा नाम जप और सत्संग से आती है जितना नाम जप करोगे जितना सत्संग सुनकर सावधान रहोगे उतने अच्छे बनते अंदर से चले जाओगे और हृदय में एक दिन आ जाएगी योग्यता भगवत दर्शन की क्या रुदु सु श्रम राजन कृष्ण दर्शन लालसा रोना आ जाएगा कि प्रभु अब आपके बिना जिया नहीं जा सकता तो दृश्य बदल जाएगा वहीं मान लो यह तो वृंदावन है तुम लखनऊ में हो अमेरिका में हो दूर देश में हो प्रदेश में हो कहीं भी वहीं सामने वृंदावन प्रकाशित हो जाएगा वृंदावन कोई जड़ वस्तु थोड़ी चिदानंद है पर हमारी देखो गीता वाटिका में बैठे बैठे राधा बाबा पूज्य भाई जी महाराज देख रहे हैं ना दिव्य वृंदावन की लीला तो कैसे नाम जप से नाम जप जितना बढ़ाते चले जाओगे अच्छे आचरण और
नाम जप तो फिर दिव्यता आती चली जाएगी यह आपकी पोशाक है या आप नहीं है शरीर आप भगवान के दिव्य अंश है जब नाम जप करोगे य राग खत्म होगा शरीर का भोगों का तो आप जो दिव्य है वही आपको प्रकाशित और उसी में सब कुछ भरा हुआ है आपका जो दिव्य भगवत स्वरूप है वही वृंदावन को देख सकता है ये पार्थिव शरीर नहीं जैसे इन्हीं नेत्रों से देखने गए तो इन्हीं नेत्रों में दिव्यता आ जाएगी अंदर के नेत्र हृदय के खुले और इन्हीं नेत्रों में वृंदावन प्रिया प्रीतम अचानक घटना घटेगी दृश्य बदला और दिव्य भगवान के रूप और भगवान की शोभा उनका धाम ये सब पर उसके लिए नाम जप रूपी खजाना बढ़ाओ और चरित्र अच्छा रखो चरित्रहीन गंदे व्यक्ति को ये सब भावना नहीं जागृत होती पवित्र हृदय में भावना तो खूब नाम जब देखो भगवान क निर्मल जन मन सोप मोहि भावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा भगवान कह रहे हैं मन को निर्मल करने केलिए के लिए बढ़िया नाम है और नाम में रुचि हो कैसे बनकर नाम जपा जाता है यह सत्संग रोज रोज सत्संग सुनो नाम जप करो धीरे-धीरे आगे आ जाए
हिमांशु जी राधे राधे गुरु राधे राधे महाराज जी प्रणाम महाराज जी क्या प्रभु को गुरु मानकर नाम जप करने से भाव दे की प्राप्ति हो जाएगी भगवान को जब आप गुरु मानेंगे और नाम जप करेंगे तो आपको निश्चित प्रकट गुरु को सानिध्य दिवा देंगे वो निश्चित आगे का काम वो कर देंगे तुम्हें चिंता नहीं करनी भगवान ही गुरु है गुरु ही भगवान है देखो प्रगट में तुम्हें कैसे गाइड करके चलाना है कैसे डांटना है कैसे प्यार करना है कैसे दुलार करना है यह भगवान अव्यक्त रूप में नहीं कर सकते प्रगट रूप में ही होता है जब तक प्रगट रूप में आपको मंत्र नहीं मिलेगा प्रगट रूप में आपको गाइड नहीं मिलेगा परमार्थ का भाव देय की प्राप्ति का तब तक आप कैसे प्राप्त कर पाएंगे अगर ऐसा होता तो स्वयं संदीपनी जी को गुरु बनाकर चरणों में बैठे हैं जिनके स्वांसों से वेद प्रकट हुआ है उन्होंने स्वयं विश्वामित्र जी को गुरु बनाया उन्होंने स्वयं वशिष्ठ जी को गुरु बनाया कृष्णावतार में संदीपनी जी को गुरु बनाया तो हमको चाहिए कि उनको गुरु मानकर प्रार्थना करें कि
प्रगट रूप से गुरुदेव के रूप में मिलो या हमें वहां पहुंचा दो या आप आकर हमसे मिल जाओ क्योंकि प्रगट गुरुदेव की हमें आवश्यकता है उन्होंने भी प्रगट गुरुदेव बनाया भगवान ने बनाया ना इसलिए महाराज जी कह रहे थे कि अपने भाव के गुरु ना मिले तो क्या भाई जी के बताए मंत्र को जप कर सकते हैं हां बिल्कुल कर सकते हैं भाई जी को गुरु रूप में मान कर के विराजमान करें तो भाई जी देखिएगा आपको प्रकट में गुरुदेव रूप में आपको जरूर सानिध्य दिलाई देंगे क्योंकि यह प्रक्रिया हुई
है यह जो प्रक्रिया बता रहे हैं ना इसी प्रक्रिया से आगे बढ़ा गया है और हमको सब कुछ प्राप्त करवाया गया जो प्रकट में क्योंकि जब भाव में प्रवेश होना होता है तो उसमें गुरु कृपा शक्ति काम करती अपनी कोई साधना काम नहीं करती है तो वह कृपा शक्ति प्रगट गुरुदेव की कृपा से होती है राधा बाबा उपासना में कोई कमी थी क्या लेकिन प्रगट में जब भाई जी का सानिध्य मिला तभी तो ना तभी तो सारा भाव परिवर्तन होता चला गया नहीं प्रकट का बड़ा प्रभाव है क्योंकि भगवान जब प्रकट होते हैं तब का प्रभाव और भगवान यहां अपक बैठे हैं तब का प्रभाव देख लो जब यहां प्रकट होते जैसे आज रामनवमी है भगवान आज के दिन अवध में प्रकट हुए थे तो अगर इस हृदय में भगवान है सबके कि नहीं है पर प्रकट नहीं है तो देखो सब सुना पड़ा है और यही जब प्रगट कर लिया जाता है तो परमानंद की बाढ़ आ जाती है प्रगट का महत्व है जग जग में कोई ऐसा कण नहीं जहा भगवान हो क्या आनंद मिल रहा है क्या और जाओ बिहारी जी में प्रकट रूप धारण किया देखो आनंद बढ़ेगा दीवाल के देखने से
आनंद नहीं बढ़ रहा है यहां भी भगवान है लेकिन प्रगट में जैसे हम कहते हैं कि दूध में घी है पूड़ी बना केर दिखाओ नहीं बनेगी जब प्रक्रिया हुई तो उसी से घी निकला और फिर पूड़ी बन जाएगी नहीं आ ऐसे ही भगवान गुरु रूप है लेकिन हमको जो प्रक्रिया है वो प्रकट में चाहिए उनका चरण स्पर्श उनका दर्शन उनका अनुशासन उनके नेत्रों का प्यार उनका गाइड तभी हम पहुंच पाएंगे तो हम भाई जी को गुरु मानकर उनके द्वारा दिए हुए मंत्र को जब जपेंगे तो अपने आप देखना आगे वो जहां से जोड़ना अपने आप जोड़ अपने आप पहुंचा देंगे अपने को ऐसे रहना है अपने ऐसे रहे तो पहुंच जाएंगे अपनी बुद्धि ना लड़ा वो अपने आप सब बला देते हैं स्पष्ट आज्ञा हुई थी किसी रस संप्रदाय के किसी रसिक से जाकर के जुड़िए जहां जोड़ना था उन्होंने जोड़ दिया जैसे चलाना था उन्होंने चला दिया ये मतलब आंतरिक विषय होते इनको तो कोई प्रकट किया नहीं जा सकता आप जो कह रहे हैं बस वैसे ही कीजिए आगे का मार्ग वो खुद बना देंगे आप देख लीजिएगा ना अपराजिता राधा राधावल्लभ श्री हरिवंश
राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मुझे भगवान ने मनुष्य का शरीर दिया और सब अच्छी व्यवस्थाएं दी परंतु जीवन में लगातार मिल रही असफलताओं से मेरा आत्मविश्वास टूट गया जिससे अकर्मण्यता और उदासीनता रहती है जीवन पूरी तरह से दिशाहीन लग ऐसा हम मान ही नहीं सकते कि किसी के जीवन में 100% असफलता ही असफलता है नहीं मान सकते क्योंकि दिन है तो रात आएगी रात तो दिन आएगा ऐसा हम नहीं मान सकते आपके जीवन में सफलता और असफलता दोनों का चक्र चलता है दोनों सबके जीवन में आते हैं हां आपकी मांगे इतनी बड़ी है कि उनकी पूर्ति करने के लिए आपके पास कर्म सामग्री नहीं है इसलिए आत्मविश्वास आपका टूट रहा है अब आप हीरा का हार पहनना चाहो जेब में 00 रुपया है और आप फिर भगवान को कोसो और अपने को कोसो तो अगर 00 रुपया है तो आप 00 रुपए की ही कामना कीजिए की वस्तु की तो आपको परेशानी नहीं होगी ऐसे ही आपका प्रारब्ध कर्म आया है अब आप उसके अनुसार चलेंगे तो ठीक है और उसे ज्यादा मांग करेंगे तो उसकी पूर्ति होगी नहीं तो
आप चाहे भगवान को कोशो चाहे अपने को कोशो उससे कोई लाभ होने वाला है नहीं इसीलिए विवेक की जरूरत है ज्ञान की जरूरत है क्या आप असफलता समझते हैं आपको बोलना सिखाया आपके कान है कितनी सामग्री आपको भगवान ने दी सफलता ही सफलता है और आप हमको कोई ऐसे तो दिखाई नहीं दे रहे कि आप फटे पुराने कपड़े पहन किसका प्रश्न है हां तो आप भगवान को या अपने को क्यों निराश शब्दों मिला रहे हैं आप आगे से आगे कामनाए आवश्यकताएं सबकी भगवान पूर्ण कर रहे कर्म के अनुसार आपको जो अत्यंत आवश्यक है वह भगवान पूर्ण कर रहे हैं वायु फ्र अभी बीमार हो जाओ ऑक्सीजन लगवा पैसा लगेगा फ्र ऑक्सीजन भगवान दे रहे हैं जल दे रहे पृथ्वी दे रहे आकाश दे रहे हैं बुद्धि का देखो आ कितनी सुंदर हम सब देख स किसी किसी के आंख नहीं थोड़ी देर सोचो उसका कैसा जीवन होगा कोई बोल नहीं पा रहा कोई सुन नहीं पा रहा कोई तीनों से रहित है ना बोल पा रहा है ना सुन पा रहा है अब उसका जीवन कैसा है आप कभी भगवान को धन्यवाद दीजिए कि आपको कितना सुंदर जीवन दिया है और आप खा पी रहे
आपने कभी वह गरीबी देखी है जिसके लिए आप कोसने के शब्द में बोले वह गरीबी देखी है आप तो बहुत ऐसा लग रहे है कि अच्छे घर से हैं तो आप ऐसा क्यों बोले नहीं आप ऐसा बोले क्यों आपने अपनी वासना को इतना क्यों बढ़ा दिया आप ऐसी इच्छाएं क्यों कर रहे हैं कि जो आपके पास पावर नहीं है उससे ज्यादा आप कर रहे हैं आप नाम जप कीजिए आप तपस्या बढ़ाइए आप सत्कर्म बढ़ाइए उसके अनुसार आपको लाभ मिलेगा यहां संसार में कुछ फ्री नहीं है अगर कोई राष्ट्रपति बनी बैठी तो तपस्या की है कोई यहां फ्री नहीं है अगर कोई अरब अरबों रुपया में खेल रहा तो उसने दान किया है पुण्य किया है तपस्या की तो है अब पाप कर रहा है तो उसका परिणाम आएगा सब नष्ट होगा लेकिन पूर्व में उसने उसका फल उसको मिल रहा है यहां यहां एक पैसा भी फ्री नहीं है हमारे कर्म के अनुसार ही हमें मिलता है हमारे कर्म के अनुसार ही जाता है अब वर्तमान में तुम्हारी खेती क्या है यह तो तुम्हारी पूर्व की खेती है अब वर्तमान में आप क्या कर रहे हैं राज जी वर्तमान में सब चीजों की वजह से
मतलब कोई भी काम शुरू करो उसम मुझे उत्सुकता नहीं र नहीं नहीं नहीं यही गलती कर रहे हो पूर्व की खेती तो बिगड़ी हुई थी हमारी अब पूर्व को लेकर वर्तमान की बिगाड़ दे तो मूर्खता ही है ना वर्तमान की खेती चकाचक करो उत्साह संपन्न मदीर सूत्रम क्रिया विधिज्ञ विस सुक्तम सरम कृतज्ञ दृढ़ सदन च लक्ष्मी स्वयं यात निवास हे तो ऐसे थोड़ी है उत्साह से संपन्न र हर सफलता को प्राप्त करने के अंदर असफलता को रौते जाओ एक बार असफल होंगे दो बार असफल होंगे तीन बार असफल होंगे चौथी बार मुझे ज्ञान हो जाएगा मैं क्यों असफल हो रहा हूं और उसमें निकल जाएंगे ऐसा नहीं कि किसी के भाग्य में इतना लिखा है कि हर बार अफल होता ही चला जाए ऐसा कभी हम नहीं मान सकते हमारा मनुष्य जीवन कोई पशु जीवन नहीं कि हम केवल प्रारब्ध के अधीन है हम नवीन कर्म करके नवीन प्रारब्ध की रचना करने आए हैं हमें निराश नहीं होना हमें नाम जप करना है पवित्र चरित्र रखना है दूसरों के अधिकार की रक्षा करनी है क्योंकि आप किसी एक परिवार में होंगे आपका कोई परिवार के सदस्य
जन होंगे उनके भाव की रक्षा करनी उनकी सेवा करनी है और सास िक उन्नति के लिए हमें प्रयासरत रहना है अगर हम असफल हो जाते हैं व्यापार में नौकरी में प्रयास में तो हमें निराश हो के लिए बैठना हमें फिर और उपाय करने हैं किसी ना किसी दिन सफलता हाथ लगी जाएगी ऐसा नहीं है कि हम असफल होते ही चले जाए हम आपको एक शास्त्री दृष्टांत देते हैं विद्यारण्य नाम के बहुत बड़े सन्यासी हुए हैं वह गरीब ब्राह्मण के घर पैदा हुए थे माता-पिता के पोषण के लिए उनके पास व्यवस्था नहीं थी तो वह चकि ब्रह्मण में थे तो उन्होंने संतों का संग किया था तो गायत्री अनुष्ठान किया 24 लाख गायत्री का एक पुरष चरण होता है उन्होंने एक पुरष चरण का अनुष्ठान पवित्रता से गायत्री अनुष्ठान माता गायत्री का कुछ नहीं मिला दूसरा अनुष्ठान तीसरा अनुष्ठान चौथा 2 पुरष चरण की 2 24 24 लाख गायत्री के 2 पुर चरण के अब माता-पिता पधार चुके थे यवन अवस्था से ऊपर अवस्था क्रॉस कर गई थी गायत्री अनुष्ठान करते करते हार गए और उन्होंने सन्यास लिया ज ही सन्यास लिया तो आद्या
शक्ति देवी गायत्री प्रकट हो गए और उनका बेटा यहां से लेकर ब्रह्म पदवी तक तू मांग अभी तुझे दे दूंगी तो उनका माता अब तो मैं सन्यासी हो गया जब मैं धन मांग रहा था तब आप क्यों नहीं आई तो उनका तुम्हारे 24 ऐसे महत पाप थे 23 पुरष चरण से व सब नष्ट हो गए एक और बचा था तो सन्यास ले लिया उससे वो नष्ट हो गया अब तुम देवराज इद्र पद का कुबेर का खजाना मांगो तो मैं दे दूंगी बोले अब सन्यासी हो गया मुझे इसकी जरूरत नहीं है तो इससे हमको यह मिला कि जब तक हमारे पूर्व के पाप हैं तो वह हमको उन्नति में बाधा डालते हैं हमारा प्रयास असफल हो जाता है तो हमको साथ में भजन ही करना है भजन भी करना है हम इसलिए कहते राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण हरि हरि राम राम जो नाम तुम्हें प्रिय हो भगवन नाम वो नाम जप करो क्योंकि वो नाम तुम्हारे उन पापों को नष्ट करेगा 24 पुरष चरण मतलब एक तरह से हुए 23 पुरष चरण एक सन्यास तब वो निष्पाप हुए तो अपने लोगों के पास कितना होगा पाप चार माला जपयो काम नहीं बना तो अश्र ा हो गई सोचा ऐसा नहीं वो चार
माला फ्री नहीं जाएगा वो 23 पुरष चरण फिर नहीं गए 24 वा सन्यास लेते ही माता जी साक्षात प्रकट हो गए कहा जो तो उन्होंने कहा बहुत बड़े महापुरुष हुए हैं विद्यारण्य जी उनके बड़े-बड़े ग्रंथ है बहुत उच्च कोटि के महापुरुष तो हमारी प्रार्थना है असफलता में हमको निराश नहीं होना हमें रौना है इस असफलता को हम मनुष्य दे प्राप्त करके भगवद अंश है हम कोई पशु नहीं है कि हम असफलता में बस झुक गए उत्साही हो गए भगवान से श्रद्धा हो गई जीने से अ श्रद्धा हो गई और क्रियाओं से अ श्रद्धा हो गई ऐसा नहीं हर बा ब हम लड़ेंगे एक बार विजय होंगे जीवन में एक बार तो हम विजय होंगे हम परास्त करेंगे दो साधन चलना चाहिए एक आंतरिक नाम जप और एक बाह प्रयास तो हम सफल हो जाएंगे बिल्कुल सफल अर्जुन जी से यही भगवान कह रहे हैं मैं तुम्हारे साथ हूं मा मामन स्मर युद्ध च मेरा स्मरण और युद्ध कर युद्ध माने कर्तव्य कर्म अपने कर्तव्य में लगे रहो और मेरा स्मरण करो स्मरण क्या करेगा पाप को नष्ट करेगा कर्तव्य क्या करेगा आगे की उन्नति का रास्ता खोल
देगा अब हम लोग सही पूछो तो धर्म का आश्रय नहीं लेते भजन का आश्रय नहीं लेते और मनमानी आचरण करते हैं कोई बिरला ऐसा होगा जो अपने जीवन के चरित्र को पावन करके धर्म युक्त चल कर के ऊंचाई पर चढ़ना चाहे नहीं तो ऊंचाई पर चढ़ना चाहता है लेकिन जहां से ऊंचाई बनती है उसे खो देता है तो वो ऊंचाई कुछ दिन के बाद उसकी मिट्टी पलित हो जाती हैय हमारी बात ध्यान रखो धर्म के बिना आज तक कोई ऊंचाई पर नहीं चढ़ पाया है ऊंचाई पर चढ़ने के लिए चरित्र पावन और आपका विचार और उत्साह
पावन अगर चरित्रहीन जीवन रहा तो कुछ भी रुपया इकट्ठा कर लो तुम्हें शांति नहीं मिलेगी कुछ भी कर लो शांति नहीं मिलने वाली यह हमारा धर्म प्रधान देश है ऐसा ही रहा है और अब जो हैय नवीन पीढ़ी इस बात धर्म क्या है किस इससे कोई मतलब नहीं रह गया चरित्र क्या है इससे कोई मतलब नहीं रह गया अब आप जैसे कहो कि कैसे कह सकते हो चरित्र नहीं तो आप हमें बताओ आज इस लड़के से बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड वाला जो संबंध चलता है फिर इसके बाद एक शब्द आया है ब्रेकअप फिर आया नवीन बॉयफ्रेंड फिर आया है ब्रेकअप फिर आया नवीन अब जो हंसी में उनसे बात पूछो तो बोले नौ गर्लफ्रेंड दसवीं व 10 इसको आप क्या कहेंगे यह क्या हो रहा है हमारे समाज में इसको क्या कहा जा इसको बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड को कुछ दिमाग में नहीं रखा जा रहा है लेकिन अपवित्र होता का संचार हो रहा है कि नहीं हो रहा देह अपवित्र मन अपवित्र विचार अपवित्र चरित्र अपवित्र नहीं हम मानते हैं दोस्ती करो मानते हैं लेकिन एक को स्वीकार करो और माता-पिता की सहमति से पाणी ग्रहण करके फिर
गृहस्थी धर्म का तो पवित्र जीवन हो जाएगा हम इस पक्ष में नहीं जाते हम पक्ष में आज का जैसा समय अगर आपको दोस्ती भी करनी है तो एक से करो खूब पहले परिचय बना लो फिर एक से करो और फिर दोनों माता-पिता की शरण में हो कि हम लोगों ने दोस्ती की यदि आपका अनुमति हो आपका आदेश हो आजीवन फिर ब्याह करके घर गृहस्ती यह कौन सा चरित्र है हम दोस्ती के लिए नहीं रोकते करो दोस्ती शास्त्रों में ऐसा वर्णन आया है पिता ने छूट दे दिया आप वर स्वयंवर क्या है स्वयंवर स्वयं वर्ग का वर्ण करो वर्ण कर लिया माता-पिता को भी चाहिए कि ज्यादा उसमें ना पड़े अपने बच्चों की सुख में सुखी रहना सीखे बच्चों को जिसमें सुख मिले पर एक पर आज के बच्चे इन बातों को बहुत हल्के में ले रहे समझ नहीं रहे तो उससे क्या हो रहा है बच्चों की प्रवृत्तियां बिगड़ गई अब वही बच्चे जब वर भरेंगे ना तो वो ब्रेकअप वाला अभ्यास वहां भी आ जाएगा तो ना वो पति पत्नी से आजीवन भाव रख पाएगा ना वो पत्नी पति से आजीवन भाव रख पाएगा और दोनों के जीवन व्यर्थ हो जाएंगे इसलिए हमें
लगता है कि अगर चरित्र पावन रखा जाए और हम धर्म पूर्वक चले नाम जप करते हुए और अपने कर्तव्य का पालन करें तो उत्साह हीनता कभी नहीं आएगी असफलता में भी उत्साह हीनता नहीं आएगी हम सफलता को एक दिन चूमेंग एक दिन उसको प्राप्त करेंगे हमारी बात को अच्छे से समझ लीजिएगा प्रश्न तो आपका है लेकिन ल लग प्रश्न य सभी का है यह प्रश्न लगभग सभी का समाज का है और ये लाखों लोग सुनते हैं इसलिए हम इसको विस्तार से कह रहे हैं चरित्र पावन उद्देश्य महान नाम जप कर्तव्य का पालन विजय ही होगे कहीं भी हो पूर्व का कर्म आपको बाधा पहुंचाने के लिए आएगा तो हमारे पास नाम है हम नाम से उसको मिटाए जो नाम जप कर रहे हैं ना उस भजन बल से उसको मिटाए गे वो भजन बल से नष्ट होता है बाहरी व्यवहार से नष्ट नहीं होता है जी
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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