॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #542 · 6 मई 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

कैलाश च चौहान जी राधे राधे राधा वल्लभ श्री हरिवंश पूज गुरुदेव भगवान आपके चरणों में दंडवत प्रणाम गुरुदेव भगवान ट के माध्यम से आपका सत्संग सुना पहले मुझे मुझसे बहुत सारे पाप हुए जैसे मदिरा सेवन नॉनवेज आदि पर जब से आपको सुना तो सब छोड़ने की इच्छा हुई आपके दर्शन की इच्छा बहुत थी लेकिन खुद को मतलब इतना योग्य नहीं समझ पा रहा था और आपके आगे आने में हिम्मत नहीं हो रही थी फिर आपकी और श राम जी की कृपा हुई मैंने नर्मदा मैया की 400 4000 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा की जिस वजह से गलत खानपान मदिरा लहसुन प्याज सब छोड़ दिया गुरुदेव भगवान अब अब कभी कुमार कु संगति में नहीं जाऊं ऐसी कृपा करें गुरुदेव भगवान मैं राम जी को अपना इष्ट और आपको अपना गुरुदेव रूप में स्वीकार करता हूं गुरुदेव भगवान आप और राम जी दोनों मुझे अत्यंत प्रिय गुरुदेवन आप कृपा करें कि मैं अभी समझ नहीं आ रहा कि मैं कैसे आगे बढूं आप राम जी राम जी जप सियाराम सियाराम जपो राम राम जपो नहीं जैसे हम राधा माधव कहते ना तो राधा का रा माधव का मा तो 6

में हो गया ना राम राम बोले तो राधा माधव राधा माधव बोले तो राम अंतर थोड़ी है ना प्रभु तो एक ही है ना उसके नाम अनेक है आप सियाराम से प्यार करो राधा राधा जैसे हम जपते हैं ऐसे तुम राम राम जप करो ऐसे सियाराम जप करो हम राधे श्याम जप रहे हैं बात एकही आप चलो जो आपको प्रश्न जो आपको चाहिए उसका उत्तर भगवान आपको दिला देंगे आप आनंद पूर्वक सत मार्ग में चलो पर अबलो नसानी अब नान से गुदव ऐसे डर लगता है कि कभी आगे ना फिसल जाए कहीं नहीं ऐसा डरना भी नहीं चाहिए हमको कौन डरा सकता है यार देखो अगर हम ना चाहे तो पूरी बाजार से निकल जाए कोई सामान दुकान की आके हमारी लिपट थोड़ी जाती है हम जहां खड़े होंगे जहां खरीदेंगे वही जो वस्तु हमें मिलेगी तो अगर हम निश्चय कर लिया कि मुझे मांस नहीं खाना मुझे शराब नहीं पीना मुझ पराई माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि नहीं करनी तो मुझे कौन गिरा देगा आप सोचो हमारे निश्चय में कमजोरी तभी हम डरते हैं कि कहीं गिर ना जाए ऐसे कैसे वो अटल संकल्प कैसे हो नाम जप करोगे नाम जप से हो जाएगा हां कुछ

कमियां ऐसी होती है जिससे अहंकार का नाश किया जाता है जैसे आवाज जाता है ना हम जितेंद्र हम ऐसे हम ऐसे भगवान को अहंकार पसंद नहीं तो छोड़ देते हैं देखो जितेंद्रिय होता करके तब जब रोता है कि प्रभु मैं तो नीच किसी काबिल नहीं तब भगवान फिर उठा लेते हैं नाम जप करो तब मजबूत ब्रेक लग जाएगी कोई कैसे गिरा सकता है कैसे गिरा सकता है नहीं गिरा सकता गुरुदेव शरणागति मंत्र जैसे मैं तो नहीं मैंने नहीं लिया किसी से भी और राम नाम का जब करूंगा इससे कुछ फर्क पड़ेगा जब आपको हम कह रहे सियाराम राम जप करो तो इसे मंत्र नहीं मान रहे क्या फिर और कौन सा मंत्र चाहिए काने में फुकने से होता है क्या और क्या हम दे रहे कह क्या रहे हैं मंत्र मूलम गुरु वाक्यम विश्वास हो तो बात बन गई हो गया गुरुमंत्र ना बोले जा बेटा राम राम जा पकड़ पकड़ यही बात चल आगे भगवत मार्ग में अब अगर चाहते हो कि भाई चला ले आवे हो कंठी बजाओ घंटा बजा तो बजवा लो बात होती बात मानने को ना मानो तो चाहे 14 जगह कान फुवा लो कुछ थोड़ी होता है बात मान ली हो गया हो

गया बात मानने से होता है जैसे आपने कहा हमने कह दिया आपको सियाराम जपो राम राम जप करो अब आपसे कोई पूछे गुरुमंत्र हां हो गया क्या गुरुमंत्र हुआ गुरुमंत्र बताने की चीज है क्या हो गया हमारा गुरुमंत्र हो गया मान लिया हमने गुरु के मुख से शब्द निकले मैंने मान लिया हो ग अब उसको तुम क्रिया रूप में चाहते हो कि हम किसी दिन आवे भाई अच्छ लाओ फल फूल लेकर के और फिर वो सब तो वो कर लो उसका कोई महत्व नहीं हमारी दृष्टि में उसका कोई महत्व नहीं देखो हमारी बात ना मानो कंठी बनवा लो तिलक लगा लो सब कर लो कल्याण नहीं होगा हमारी बात मान लो कल्याण हो जाए बात मानने का चेला होता है यह कोई सांसारिक थोड़ी कि भैया जैसे सांसारिक संबंध होते ऐसे गुरु शिष्य का संबंध आज्ञा पालन से होता है गलत नहीं करूंगा जैसा कहोगे वैसा चलूंगा अब आपने कह दिया अब यह नाम जप करूंगा बस हो गई बात बात यह है कि हमको अब महत्व कर लेना है अरे बोले ऐसे कह दिया था सियाराम राम राम जपो तो गुरु मंत्र तो मिला नहीं तो कभी गुरु मंत्र मिल भी जाएगा तो ला नहीं

मिल पाएगा क्योंकि आपको संत वचन गुरु के वचन पर विश्वास ही नहीं हुआ गुरु के वचन प्रतीति न जही फ स्वप्न में भी लाभ नहीं मिल मान लिया हो गया हमारा सब कुछ अब हम राम राम जब करेंगे अच्छे आचरण से चलेंगे तो यही नाम आपको बल दे देगा जो आप कहते हो ना कि ऐसा बल कैसे आए इसी नाम से आता है बल माया पर जीतने का जो बल है वो भगवान की कृपा से उनके नाम बल से आता है देखो नाम में इतनी सामर्थ्य भगवान को अधीन कर लिया सुमर पवन सुत पावन नामो अपने बस कर राख फिर और क्या काम क्रोध को जीत लो तो कौन बड़ी बात भगवान अजीत जीत गए भगवान कह रहे प्रति उपकार करो का तोरा सन्मुख होई न सकत मन मोरा तुम सं तात उरिन में नाही नाम जप करते हुए समाज सेवा भगवत सेवा माता-पिता की सेवा बस इससे बढ़िया और साधना क्या है बढ़िया साधना देखो बढ़िया साधना बनी गई श्री मां नर्मदा की पूरी परिक्रमा कर आए बहुत भाग्यशाली हो अब अच्छे कपड़ा साफ हो अब गंदगी भर मत डालना उसमें अब बढ़िया गंगा जी से कपड़ा धो के लाए और फिर नाली में डुबो दिए तो फ गड़बड़ हो जाएगा

नहीं मानो दे थोड़ा विवेक है धर्म से विषय सेवन करो पापा आचरण करोगे तो फिर वही पहुंच जाओगे नरक है कर्मों की बड़ी गति है इसलिए नाम जप कर लो और यह जीवन सार्थक अच्छा नाम जपने में सबसे बढ़िया बात ये कि इसमें बैठने की बात नहीं करे कि आप पद्मासन लगा के बैठो दिन भर काम करो राम राम राम राम आनंदर से राम राम चल रहा फावड़ा चला राधा राधा राधा राधा हर काम होता रहेगा जब युद्ध हो सकता है मामन स्मर युद्ध से तो युद्ध से खतरनाक कोई काम तो है नहीं दूसरे की गर्दन काटली अपनी गर्दन बचानी युद्ध में और भगवान अर्जुन को कह रहे मेरा स्मरण करते हुए युद्ध कर इसका मतलब भगवत नाम जप करते हुए सब काम हो सकता है ठीक है तुम नाम जप करो और अच्छे बनो इसी जन्म में भगवान को प्राप्त किया जाए भगवान की स्मृति में डूबा जाए तभी जीवन की सार्थकता है बाबूलाल जी मथुरा से राधे राधे राधे राधे महाराज जी जय श्री कृष्णा राधे राधे महाराज जी यदि मोक्ष प्राप्त हो जाता है तो आत्मा का स्वरूप क्या होगा और कहां विराजमान हो जाएगी उसका कोई स्थान

मोक्ष का मतलब होता है समुद्र की तरंग समुद्र में लय हो गई कोई स्थान नहीं होता जब उसको भक्ति भाव में लाते हैं मोक्ष शब्द हट जाता है फिर आता है दास भाव सख्य भाव ता भाव वात्सल्य भाव जिसे गोपी भाव सचर यह भाव आता है यह भक्ति में ज्ञान में नहीं ज्ञान में जैसे तरंग में वायु विकार है तभी तो तरंग हुआ तो समुद्र ही तो तरंग बना अब वायु विकार हट गया तो क्या कहोगे समुद्र तो समुद्र अपने स्वरूप में स्थित है तरंग नाम हुआ था वायु विकार होने के कारण तो माया विकार होने के कारण उसे जीवात्मा कहा गया था माया विकार ज्ञान के द्वारा नष्ट हुआ तो परमात्मा स्वरूप हो हो गया परमात्मा स्वरूप सर्वत्र सब स्वरूप में विराजमान है उसका कोई एक स्थान नहीं है जब हम उसको एक स्थान देते हैं तब भक्ति लागू हो जाती है वो वैकुंठ में है वह कैलाश में है व साकेत में है व वृंदावन ये भक्ति का स्वरूप है ज्ञान का नहीं ज्ञान में वह मुक्त हो गया आकाश की तरह व व्याप्त हो गया समुद्र की तरह शांत समुद्र कोई तरंग नहीं ये उदाहरण भी प्राकृतिक है क

आकाश भी प्रकृति का है और समुद्र भी है तो हम उदाहरणों के द्वारा ऐसे समझ सकते हैं जैसे हम कहते हैं देखो डाल के ऊपर एक हाथ देखो चंद्रमा दिखाई देता है तो डाल के एक हाथ ऊपर चंद्रमा थोड़ी है तो बहुत दूर पर हम देख पाते हैं ऐसे हम समझ पाते हैं कि आत्मा कोई एक बिजली का बल्व जैसा नहीं है कोई बिजली का ट्रांसफार्मर नहीं है कोई बिजली उत्पादन वाली वस्तु नहीं है वो एक परम तेजोमय ज्योति है जो संपूर्ण ब्रह्मा को अपने में समा के विराजमान होती य जीवन मुक्त महापुरुष

की बात और जब हम माया ग्रसित होते तो उसको एक ढांचे के अंदर मानते हैं मैं और तू तेरा और मेरा इसका नाम माया और मैं तू तेरा मेरा इसको मिटा दे केवल मैं रह जाए मैं ना तू रह गया ना तेरा रह गया ना मेरा रह गया केवल मैं रह जाए व शुद्ध में ब्रह्म है मैं के आगे कुछ भी जुड़ेगा मैं संत मैं महात्मा मैं आत्मा मैं कुछ भी जुड़ेगा माया हो जाएगा शुद्ध में ब्रह्म उसी में स्थित हो जाता है अब जब स्थित शब्द कहते तो मायाम शब्द है तो स्थित होने के लिए स्थान चाहिए तो भक्ति

से जुड़ेगा जाके मा आत्मा सर्वत्र समरूप यह भी मायाम शब्द है क्योंकि सर्वत्र शब्द भी माया में है ये इसीलिए कहा गया अनिर्वचनीय स्थिति माने णी के द्वारा उसे बोला ही नहीं जा सकता भक्ति में उसे बोला जाता है दास भाव तोव भगवान का निज दास बनकर भगवान के धाम गया शिव उपासक है तो कैलाश गया राम उपासक है तो साकेत धाम गया और वैकुंठ उपासक नाथ का तो बैकुंठ धाम में गया वृंदावन उपासक है तो प्रियालाल के पास गया लेकिन ज्ञान में ऐसा नहीं है ज्ञान में व मुक्त हो गया तरंग खत्म हुई अब समुद्र ही समुद्र है परमात्मा ही परमात्मा जैसे परमा क कहां जहां प्रभु ना ऐसे ब्रह्मलीन महात्मा परमात्मा स्वरूप हो गया उसकी सत्ता खत्म हो गई समुद्र नाम अब हो गया तरंग नाम नहीं रहा अ परमात्मा स्वरूप ब्रह्मविद ब्रह्म भवति जानत तुम्ह तुम्ह हो जाए जो तुम्हें जान गया व तुम स्वरूप हो गया तो वह हर हर जगह है सर्वत्र है जैसे भगवान ऐसे वह महात्मा परमात्मा स्वरूप हो गया आप समझ पा रहे हो अच्छा बिल्कुल सरल भाषा में बता रहे हैं जैसे चीनी में

बोरे में दो चीट लगे हैं एक बोरे के बाहर चीनी का स्वाद ले रहा है और एक चीनी के साथ कड़ा में पहुंचकर औट गया चीनी बन गया तो जो ट गया चीनी बन गया वह है ज्ञानी और जो बोरे के समीप लगकर स्वाद ले रहा है वह है भगत परमात्मानंद का आनंद ले रहा है तो वैसे देखो इन दोनों चीटो में ज्यादा स्वाद लेने वाला कौन समझ में आएगा जो बाहर है और जो चीनी बन गया वो तो चीनी बन गया ले बल गया इसीलिए प्रेम ज मोक्ष ल स्वीकार करते व भगवान के साथ खेलना चाहते हैं दोस्त बन कर के कांता

भाव से पुत्र बना कर के विविध भावों से भगवान को व रसास्वादन करते हैं भगवान की लीलाओं का इसीलिए वो ज्ञान का जो फल मोक्ष है भक्त जन स्वीकार हम जैसे 84 लाख योनि परमात्मा ने बनाई हुई हमारी किस योनि की पुण्य प्रताप से हमें मानव जीवन मिला भगवान की कृपा से किसी और इस जीवन में हम जो कुछ भी कर्म कर रहे हैं जी उन कर्मों के प्रभाव से क्या हमें अ इसके अगर अगर आपने भगवत प्राप्ति का कार्य इस जन्म में पूरा नहीं किया तो पहला दंड आपको मिलेगा बिना किसी कर्म के इस बात का कि आपने भगवत प्राप्ति क्यों नहीं की आपको चांस दिया गया जैसे बहुत सरलता से हम समझाते हैं कि जैसे हम आपको विदेश भेजे सरकारी भारत के संविधान के अनुसार आप भारतीय काम कीजिए जाकर भारत के लिए आप यह काम कीजिए और आप वहां जाकर जाने के लिए तैयार हो कि हमें वहां गाड़ी मिलना चाहिए बंगला मिलना चाहिए हमारी सारी व्यवस्था होनी चाहिए तो सब व्यवस्था भारत सरकार ने कर दी आप 20 वर्ष वहां रहे आपको वापस बुलाया गया आप जिस काम के लिए भारतीय संविधान के काम के लिए गए

थे वह काम बिल्कुल नहीं किया खब बच्चा पैदा किए पढ़ाया लिखाया और ब्याह सब सब काम किए अब आप बोलो भारत सरकार आपको दंड देगी नहीं देगी तो देगी ना क्योंकि आप प्रधान कार्य के लिए ही सुविधा आपको सारी दी गई थी तो मानव देह केवल संसृति माज बियाई के पायो जो मानुस देह वृथा कत रत संसृति के चक्र को रोककर भगवान ने कबक करि करुणा नर देही देत इस बिन हेतु सनेही बिना किसी कर्म के अतु की कृपा करके आपको मानव दे दी कि जाओ नर्तन कर फल विषय न भाई भजी राम सब काम बिहाई साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पाई जे परलोक संभाला सो परत दुख पावई सिर धुनि धुनि पछताए काले कर्म ईश्वर मिथ्या दोष लगाए व का हमारा भाग्य नहीं था हमारा भाग्य से भजन नहीं होता भजन से भाग्य बनाएंगे हम भजन से हम पूर्व कर्मों को मिटाए भजन से भगवत प्राप्ति करेंगे जो न तरे भवसागर अमाज नर पाय सु अति निंदक मंद मति आत्म हनन गति जाए वो आत्म हत्यारे की गति को प्राप्त होता है केवल इस बात के लिए कि तुम्हें मनुष्य शरीर मिला सारी सुविधाएं दी गई लेकिन तुमने अपना काम नहीं

बनाया 83 999999 योनियों में कोई एक भी ऐसी योनि नहीं जिससे हम भगवत प्राप्ति कर सकते केवल ये मानव दे थी और उसको तुमने विषय सेवन में प्रपंच में नष्ट किया तुम विशेष दंड के पात हो कृपा हुई और तुमने उस कृपा को ठुकराया अब भोगो अन्य योनियों में अब पता नहीं फिर किस कल्प में भगवान की कृपा होगी और मुझे मनुष्य शरीर में इसलिए मुझे इस जन्म में भगवत प्राप्ति करनी ही करनी है इस परे हमें छूट नहीं रखनी अब भवत प्राप्ति किसे कहते हैं समझना तो पड़ेगा ना कि भगवत प्राप्ति किसे कहते हैं मोक्ष को तो समझे तो मोक्ष ऐसे थोड़ी होता उसके लिए साधना बहुत कठिन साधना है स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीरों का राग त्याग करके स्मृति उसकी इसकी स्मृति का भी त्याग हो जाए तब वो अपने स्वरूप में स्थित होता बड़ा कठिन ज्ञान के पंथ ज्ञान के पंथ कृपाण के धारा और परत खगेश लगे नहीं वारा अब इसको स सहज भाव में ले लो जिसकी अखंड स्मृति भगवान की होती वही मुक्त पुरुष है और वही भगवत प्राप्त पुरुष है हर समय तुम्हारी याद में भगवान का नाम चलता

रहे राम कृष्ण हरि जो नाम प्रियो अपने तो वृंदावन वासी राधा राधा रखते हर समय नाम चिंतन करते रहो तुम मोक्ष चाहोगे तो मोक्ष मिल जाएगा भगवत प्राप्ति चाहोगे तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी भगवत प्राप्ति का मतलब होता है भगवान को जिस भाव से स्वामी भाव सखा भाव जिस भाव से वो प्राप्त हो जाए और अच्छा इसमें है कि गिरने का भय नहीं हम राधा राधा जपते हुए किसानी कर रहे हैं राधा राधा जपते करते नौकरी कर रहे हैं राधा राधा जपते हुए संसार के सब कार्य कर रहे हैं तो हमको संसार के कार्य भी हो जाएंगे और भगवत प्राप्ति भी हो जाएगी अच्छा मिथ्या भाव हमारे यहां लगाना नहीं भगवत भाव लगाना है सब में भगवान है हम जिससे मिलते हैं उनके हृदय में भगवान है ऐसे बर्ताव करते हैं चाहे पुत्र हो चाहे पत्नी हो नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी बहुत सरलता से निपट गए से बहुत सरलता पर भजन नहीं किया तोत तो दंड मिलेगा क्योंकि सरकार ने भेजा है यहां सरकारी काम करने के लिए भगवत प्राप्ति के लिए अब अगर चूक हो गई तो फ गड़बड़ हो जाएगा

अच्छा देखो तुम्हें तो कुछ गड़बड़ होना है नहीं तुम तो अविनाशी भगवान के जन हो अविनाशी स्वरूप है ना अपना सबका लेकिन जैसे स्वप्न में लाठी चलती है कुछ नहीं होता है पीड़ा होती कि नहीं होती स्वप्न के समय स्वप्न के समय अगर लाठी चलावे तो वैसे लगती नहीं स्वप्न में अगर हम डूब रहे तो वैसे डूब रहे स्वप्न में अगर पिटाई शुरू है या कोई गला काटने जा रहा तो वैसे भय लग रहा है है कुछ नहीं तो दंड तो भोगना पड़ेगा ना ऐसे ही जागृत में है ऐसे ही नरक आद में है अविनाशी आत्मा को कोई कष्ट थोड़ी होता है पर जब तक यह बोध नहीं होगा तब तक तो भोगना ही पड़ता है ना देखो स्थूल दे सैया में पड़ी होती और स्वप्न में हम देख रहे हैं कि हम समुद्र में डूब रहे हैं अब व इससे कष्ट हो रहा है समुद द्र भी दिखाई दे रहा है डूब भी रहे हैं और जो डूबने वाला शरीर है वह तत्कालिक स्वप्न में बना हुआ है क्योंकि शरीर जो स्थूल शरीर वो तो सैया में सो रहा है अब बताओ उसको कैसे बचाया जाए जो स्वप्न में समुद्र में डूब रहा है अब आप उपाय बताओ उसको कैसे

बचाया जाए हा एक उपाय है कि उसको जगा दे चाहे जितनी नौका लगा दो चाहे मंत्र वेत्ता लगा दो चाहे तैराक लगा दो उसको आप बचा ले सकते उसके बचा उपाय है जगा ऐसे ही हम सब मोह निशा सब सोव निहारा देखे स्वपन अनेक प्रकारा यही जग जामिनी जागे जोगी परमार्थी प्रपंच वियोगी जाने सुत वही जीव जग जागा जब सब विषय विलास विरागा बोले मोह निद्रा में सब सो रहे है यह पत्नी है लड़का है बच्चा है रुपया है पैसा ये ये कर लिया ये कर लूंगा ये कमा लिया ये कमा लूंगा ये जमा कर लिया य जमा

कर लूंगा और सोचते सोचते मर गए कुछ नहीं कर पाए जो करने आए थे अब कोई सदगुरु जगा दे हे उठ मोह निद्रा में सो हो रहा है जानेस तब जीव जग जब सब विषय विलास विरागा तभी जानना सत्संग का रंग चढ़ रहा है जब गंदी बातें छूटने लगे और अच्छे आचरण होने लगे और भगवन नाम जप होने लगे तो जान लेना आप जाग रहे हैं और जग गए तो स्वप्न के जैसे सारे दुख मिट जाते हैं ऐसे तुम्हारे सारे पाप दुख चिंता शोख सब नष्ट हो जाएंगे पर जगना पड़ेगा बिना जगे नहीं हो सकता बिना जगे एक ही उपाय है

जगना पड़ेगा अर्थात भगवत प्राप्ति कर पड़ेगा नहीं तो दुख से पिंड नहीं छूटेगा है झूठा पर बहुत जोर का फुस्का मार के काटता है झूठा साप है रस्सी का साप पर ऐसा काटता है व ऐसा अनुभव होता है कि जहर चढ़ गया पक्का देख लो सब पूरा जहर चढ़ा हुआ है और कुछ नहीं हुआ आत्म तत्व को ना कभी फर्क पड़ा था ना पड़ रहा है और ना पड़ेगा पर भैया यह स्वप्न है बड़ा दीर्घ स्वप्न है इससे जगो उमा का उम अनुभव अपना और सत हरि बजल और जगत सब सपने में हो ना कोई माता था ना कोई पिता था ना

है और ना रहेगा ऐसे यह रूप एक दिन नहीं दिखाई देगा लाख उपाय कर लेना मिट्टी में मिल जाएगा खत्म खेल ना पहले था ना बाद में रहेगा बीच में प्रवचन कर रहा है इसका क्या भरोसा स्वप्न है यह स्वापक है जो इसके अंदर है वह सत्य है और अंदर वाले से परिचय नहीं हुआ बाहर वाले का टिकेगा नहीं भाई इसी में हम झूठे में मारे जाते हैं हर जन्म में मारे जा रहे हैं हम झूठे से प्रेम करते बाहरी और वो टिकता नहीं और जो अंदर का है उससे प्यार हुआ नहीं खाली हाथ फिर तो एक बार तो या इस

पर विचार करो कि मेरे जन जीवन का परम लाभ क्या है भगवान का चिंतन भगवत प्राप्ति इसी से परम लाभ मिलेगा क्यों विपुल जी उनाप से इसी के गुरु वचनों पर एक प्रश्न है इनका महाराज जी यदि किन्हीं संत को हृदय से गुरु स्वीकार कर उनकी आज्ञा पर चलने का पूर्ण प्रयास कर रहे हैं हो तथा दीक्षा लेने से पहले यदि गुरु का या मेरा शरीर पूरा हो जाए तो यदि गुरु का शरीर पूरा हुआ और हृदय किसी अन्य संत को गुरु का स्थान ना दे पाएगा तो क्या बिना मंत्र लिए सिर्फ नाम जप से मुक्ति हो जाएगा हां हो जाए पक्का हो जाएगा अच्छा गुरु का शरीर छूट जाएगा गुरु थोड़ी चले जाएंगे गुरु तो अखंड मंडला काम व्याप्त में चराचर तत् पदम दर्ता में तसम तुम्हारे हृदय में गुरु जब तक तुम्हारा कल्याण नहीं होगा तुम्हारे गुरु जाने वाले नहीं अंदर बैठ गए ना गुरु हमारे भाव में जैसे मानो हमने आपको गुरु मान लिया तो आप हमारे भाव में आ गए ना अब वो अंदर वाले गुरु हमको जब तक मुक्त नहीं कर देंगे तब तक नहीं जाएंगे तो बाहर के गुरु का तो आना जाना है ही है आपि से हैं

वो किसी भी आफिस से बात कर सकते हैं सब आपि से उन्हीं की है तो ऐसा कभी ना सोचे कि हमारे गुरु मर गए गुरु मरने वाले होते नहीं मरने वाले गुरु नहीं होते गुरु अजर अविनाशी तत्व है ना तो यह शरीर तो जाएगा आज नहीं तो कल जाएगा तो भाव में आपके जो गुरु बन गए भाव में जो गुरु राधा राधा रा वह आपका कल्याण कर देंगे उसमें संशय नहीं नहीं कल्याण में तो संशय नहीं है हम कई बार प्राया रोज कहते कि बेटे के लिए पुकारा नारायण तो उसको भगवत प्राप्ति हो गई और तुम नारायण को जानबूझ के पुकारोगे नारायण तुम्हें भगवत प्राप्ति नहीं होगी सोचो जरा बेटे के बहाने पुकारा नारायण नारायण नारायण हमें लगता है कि हमें भगवान के नाम पर विश्वास होना चाहिए और गुरु तत्व का जानकारी होनी चाहिए कि गुरुदेव तत्व है व्यक्ति गुरु नहीं होता व्यक्ति कभी गुरु नहीं होता गुरु कभी व्यक्ति नहीं होता मरने वाला कभी गुरु नहीं होता गुरु कभी मरने वाला नहीं होता यह बात समझ ला गुरु अविनाशी है और वह हमारा परम मित्र भी है तो हमको डूबने नहीं देगा व कहीं ना किसी

ना किसी रूप में आकर हमको बचाएगा हमारा उद्धार करेगा बात समझ रहे हैं आप जी चंचल जी गुड़गांव इनका भी एक प्रश्न ऐसा ही है महाराज जी आपने कहा था कि जो आपकी आज्ञा या बात मानेगा वह आपका शिष्य है ऐसा तो क्या हम भी आपके शिष्य हुए क्योंकि हमने ये आपको देखना है हम क्यों कहे अब हम थोड़ी कहेंगे आप हम खद लाख कहे आप हमारे चेला हो तो थोड़ी तुम्हारा कल्याण हो जाए जाएगा आपके मानने से होगा गुरु के मानने से शिष्य का कल्याण नहीं होता शिष्य के मानने से बात होती है गुरु कह दे चल निकल हम तुझे नहीं मानते कुछ कुछ कोई फर्क नहीं पड़ने वाला आप मन वचन कर्म से मान लिए ना तो आपका कल्याण हो जाएगा देखो द्रोणाचार्य जी ने हटा दिया एकलव्य को नहीं और एकलव्य ने मान लिया द्रोणाचार्य को तो सबसे बड़ा धन उधर हुआ कि नहीं हुआ तो शिष्य के माने गुरु हुआ ना गुरु के माने शिष्य तो नहीं हुआ ना शिष्य के माने आप मान लो आपका कल्याण हो जाएगा तो यह शिष्य के मानने के हम थोड़ी कहेंगे कि आप हमारे शिष्य नहीं आपकी मान्यता है आप आज्ञा पालन करो

आप राधा राधा जप करो बिल्कुल मंगल हो जाएगा बिल्कुल कल्याण हो जाएगा नीलेश कुमार जी झांसी से राधावल्लभ श्री राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं आदम जो यहां बैठने के भी योग्य नहीं हूं गुरुदेव मैंने प्रभु के दिए इस जीवन में बहुत अपराध और हिंसक कार्य किए इसके लिए मैं आदम आपसे और श्री जी से क्षमा मांगता हूं गुरुदेव मैं अधम आपके सत्संग और गुरुदेव आपके आशीर्वाद श्री जी के आशीर्वाद से आपको जान पाया हूं गुरुदेव गुरुदेव मैं ग्रस्त हूं हमको तो नहीं

जान पाए बच्चा हमको जान जाओगे तो हमारे समान हो जाओगे जानत तुम्हे तुम्ह हो जाए ये तो पक्की हां बाहरी परिचय तो पा गए हो सत्संग बढ़िया बोल लेते हैं गोरे पीले हैं हजारों लोग आ रहे हैं ये तो जान सकते हो लेकिन यह नहीं जान सकते कि मैं कौन हूं मैं कौन हूं तुम तुम मुझे जान गए क्या मुझे जान जाओगे तो कुछ जानने बाकी नहीं रहेगा भाई अगर हमें तुम जान गए तो कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा बस इतनी बात तुम समझ लो हमारा नाम प्रेमानंद है प्रेमानंद और प्रेमानंद को जान गए तो

प्रेमानंद हो जाओगे नहीं हो जाएग ब्रह्म वित ब्रह्म भवति प्रेमानंद प्रेमानंद भवति फिर अब रह क्या गया प्रश् नहीं रह गया जब प्रेमानंद भती तो भाई विषयात का त्याग करके ही प्रेमानंद में स्थित हुआ जाता है जो भगवता अंद से भी ऊपर है भगवता से भी ऊपर प्रेमानंद है और जैसे कह दो कि महाराज हम आपको जान गए तो हमारा नाम गुरु जी ने रखा है प्रेमानंद प्रेमानंद को जान गए तो जानना कुछ बाकी नहीं रह गया प्रेमानंद में कोई प्रश्न नहीं होता ना सोचती ना कांश हां इतना जरूर है

कि हम बाहरी थोड़ा परिचय पा सकते हजारों लोग बैठते हैं थोड़ा प्रवचन कर लेते हैं थोड़ा गोरे पीले हैं बस यह है बाहरी परिचय संसार हमारा परिचय नहीं है यह तो बाहरी व्यवहार का परिचय है गुद मैं उसकी बात नहीं कह रहा आपको अपने आपको को जानने की बात कह रहा लिखा तो आप अपने को भी नहीं जाने अपने को जान लेते तो प्रेमानंद को जान गए प्रेमानंद को जान लिए तो अपने को जान गए क्योंकि बच्चा हमारा तुम्हारा स्वरूप एक ही है देखो बिजली को जान लो तो हीटर में भी वही है फ्रिज में भी वही है एसी में भी वही है और प्रकाश में भी वही है हैलोजन बलफ हाज में बिजली एक ही है यंत्र के प्रभाव से उसका अलग-अलग रंग दिखाई दे रहा है एक तेजों में प्रकाश में एक गर्मी पैदा कर रहा है ठंडी पैदा करर पर बिजली वही है तो तुम में हम में सब में बिजली वही पावर वही भगवन प्रेमानंद सच्चिदानंद वही विराजमान बच्चा तुम अपने को भी नहीं जानते हो और आगे आप गुरुदेव सत्संग में बताते हैं ना कि अब जैसे मैं हूं मैं नीलेश हूं नीलेश नहीं गुरुदेव उसम आप बताते हो कि

देखो बच्चा बात बात सुन के बोलना अलग बात है अनुभव करना अलग बात है अनुभव कर लोगे ना उसकी पहचान देखो जब डॉक्टर होता है ना वो ऐसे देख के बता देता है कि तुम निरोगी हो या पी लिया है कि क्या है क्या नहीं आजकल तो य मशीनों से जांच होती है पहले मशीनों से जाते पहले तो आंख में दृष्टि ब गई बोले जवान निकालो और फिर इसके बाद जोही कलाई पकरी तो पता चल जाता था पहले ऐसे वैद्य होते थे तो भगवता का जो वैद्य होता है वोह दृष्टि मात्र से पहचानता है ज दृष्टि गई तो पता चलता

है कि आप कितने ब्रह्मचारी हो आप कितने जितेंद्रीय हो आप कितने बे विचारी हो आपकी आपके जो ही एक शब्द बोले तो शब्द तत्काल तौर लिया गया कि आप कितने ज्ञानी हो आप कितने पानी में हो कितना आपका अनुभव है सब उसमें पता चल जाता है तो बच्चा अभी ना स्वरूप का बोध है और ना अभी गुरु का बोध है आगे बोल तो तुम्हारे कल्याण के लिए बोल रहे हैं स्वरूप का बोध थोड़ी तुम्हें अभी स्वरूप स्वरूप का बोध थोड़ी है नहीं गुरुदेव शरू तो बस य सत्संग में सुना है हमने कि बताते हैं कि मनुष्य जो है वो परमात्मा का अंश है और उसे आत्मा भी कहा गया है हां कहा वो कहां है इसी साढ़े तीन हाथ के शरीर के अंतर्गत है तो इस साढ़े तीन हाथ के शरीर में कभी घुस के अंदर ढूंढा है तो अभी तो घुसे ही नहीं हो अंदर अभी तो बाहर हो घर के बाहर हो ना इंद्रिया भी बहिर मुख है मना कष्टा इंद्रियानी प्रकृति स्थान कर सती अभी तो प्रकृति में है बच्चा अभी परमात्मा में लौटे तब पता चले नाम जप करो अच्छे आचरण करो माता-पिता गुरुजनों का आशीर्वाद लो समाज की सेवा करो पहले

ये तो इससे तुम धीरे-धीरे अंदर आने लगोगे बाहर पवित्रता हो जाएगी ना तो बा ये शरीर का एक कर्तव्य कर्म भी है अगर आप इस शरीर समाज का जैसे एक हिस्सा है आपने समाज सेवा नहीं की तो चाहे कोई भी हो चाहे महात्मा हो चाहे गृहस्थ हो आपके साधन में विघ्न पड़ जाएगा आपको समाज सेवा करनी है तपस्या करो शास्त्र स्वाध्याय करो एकांत में भजन अर्जित करो और समाज को दे ऐसे आप जैसे जवान शरीर है फावड़ा चलाओ दो 400 रुप कमाओ माता-पिता की सेवा करो और नाम जप करो तो आप धीरे धीरे अंतर में आने लगोगे इसकी पद्धति है अगर समाज सेवा नहीं करोगे परिवार की सेवा नहीं करोगे तो देखो हम लोगों क्या करना पड़ा बचपन से भागे थे समाज से और आज क्या कर रहे हैं सुबह से समाज में लगे हैं रात्रि के एक बजे जगे थे और स्नान आदि करके 2 बजे 2 पा या 210 पे समाज में उतर पड़े अब व दर्शन करते हुए यहां फि यहां अपनी दिनचर्या फिर सत्संग फिर देख रहे हो अे कर क्यों सीधे आके यही बैठे एकांतिक शुरू है अभी चलेगा 8वा 8:30 बजे तक और फिर ऊपर गए कुछ मिनट बाद फिर श्री

जी के साथ एक दिनचर्या है अपने को अर्पित कर दो समाज में अंदर-अंदर नाम जप करो भगवान का भजन करो तो ज्ञान प्रकाशित हो जाएगा असली ज्ञान जिसे कहते हैं आप सही पूछो तो परमार्थ में भी कुछ नहीं हो ऐसा मानो तो उससे क्या होगा हमारा अहंकार गलित हो जाएगा एक एक पॉइंट पर हम बता सकते हैं आपको कि अभी आप कहीं भी टिके नहीं हो तो आप जो जो हम कहे उसो करो अभी सब बात बन जाएगी माता पिता है रोज पैर छूते हो हा गुरुदेव जी हा तो ठीक माथा रख के प्रणाम करते हो रोज माता नहीं करते हा प्रात काल उठ के रघुनाथा मात पिता गुरु नाव माथा माथा र को तो बुद्धि शुद्ध हो जाएगी उनके चरणों में माता पिता साक्षात मातृ देव भव पितृ देव भव ये साक्षात भगवान है हे कहीं और मंदिर में भगवान तब मिलेंगे जब पहले घर के भगवान की पूजा कर लो ये आज कल जो है ना बूढ़े लोगों को लोग इसलिए घर से बाहर कर देते हैं हगे मते कौन इनको फेंके और ये समझ में नहीं आता उसके बेटे को कि जब तू हग मूत रहा था तब स्वयं गीले में रह कर के और तेरे को अच्छी जगह लिटाया अपने

शरीर का रक्त दूध बना के तुझे पिलाया अब जब सेवा का समय आया है तो तू स्टेशन प छोड़ के आ रहा है तू मंदिरों प छोड़ के आ रहा है भीख मांगने के लिए मजबूर कर रहा तो हमें लगता है ऐसे लोगों की नरक की जरूर गति होगी चाहे वो जाए मंदिर में जाएं और चाहे वो किसी धाम में जाएं ऐसे लोगों का कल्याण नहीं जो अपने माता-पिता की ऐसी गति करते हैं इसलिए हमारा सबसे प्रार्थना है कि थोड़ा बुद्धि शुद्ध कर लो मंदिर के भगवान को भोग लगाओ या ना लगाओ बूढ़े माता-पिता को भूखा मत रहने

दो उनको बढ़िया बढ़िया खवा पियाओ वो गाली दे तो बात भी उनकी मत सुनो वो वृद्ध हो चुके हैं उनकी मानसिकता बिगड़ चुकी है उनकी सेवा करो हम सबसे प्रार्थना करते हैं और जिनके पास ऐसा उदार हृदय हो कोई ऐसा वृद्ध दिखाई दे तो उसको अपने घर ले आओ दो-चार दिन में ऐसी संस्थाएं हैं जहां उनको सुव्यवस्थित पहुंचा दो कई ऐसे वृद्ध जन हैं जिनको अत्यंत आवश्यकता सेवा की है और लोग उस समय उनको घर से निकाल देते हैं अब बोलो कहां सोच होंगे कहां लोग शंका करेंगे अब उनको सुबह चाय चाहिए उनको भोजन चाहिए उनको को दवाइयां चाहिए कैसा हृदय होगा उसका नीच कि वो अपने ऐसी मां को जिसे भगवान की तरह सिंहासन में बैठाना ए हम आपको सच्ची कह रहे अगर बूढ़े माता-पिता को बढ़िया सोफा कपड़ा बिछाकर बैठा लो और बढ़िया भोजन पवाओ और शाम सुबह उनकी दंडवत करो रात्रि में चरण दबाओ और कोई आराधना करो ना करो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे और भगवान आए दर्शन देने जब पुंडरीक जी अपने माता-पिता की रात दिन सेवा में रहते तो जो विट्ठल भगवान है ना हां वो दर्शन देने आए इसलिए

माता-पिता की सेवा करो बच्चा संयम से रहो ब्रह्मचर्य से और नाम जप करो सब ज्ञान हो जाएगा हम वृद्ध माताओं को तो हमने देखा जो गुरुदेव है ना हमारे हा वहां पर वृद्ध माताएं रहती है उनके भी हम दर्शन करते उनसे भी हमने कुछ सीखा है हा नहीं खूब सेवा करो दूसरे की दूसरे की माता की करो अपने माता पिता की भी करो ठीक है विजय कुमार जी दिल्ली से राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी शरीर पिछले 12 साल से देश सेवा में भारतीय सेना में जवान के पद पर कार्यरत है गुरुदेव भगवान आपके सानिध्य मिलने पर जब सभी सांसारिक भोगों और पद प्रतिष्ठा मान बढ़ाई में अरुचि होने लगी तो एक साल पूर्व आपसे मैंने सब छोड़कर विरक्त रूप से श्री जी की सेवा की बात कही तो आपने आदेश किया और कृपा करके मुझे यह कहा कि देश सेवा करो और वृंदावन आते जाते रहो गुरुदेव पिछले एक साल से मैं आपकी हर आज्ञा का पालन करने का पूता प्रयास कर रहा हूं पहले महाराज जी दिल्ली में थे ये कह रहे हैं कि इनकी कहीं अन्यत्र पोस्टिंग आ गई है अब इनका दिल घबरा रहा है

कि पहले तो वृंदावन में एक हफ्ते में एक दो बार आ जाते थे अभी आना मुश्किल रहेगा नहीं जी घबराना चाहिए बिल्कुल नहीं घबराना चाहिए आप बिल्कुल ऐसे पुष्ट होक रहो कि आप वृंदावन में रह रहे हो देखो हमारी बात मानोगे ना तो आप प्रसन्न रहोगे अगर आप उदास रहोगे खिन्न रहोगे तो आप राष्ट्र सेवा नहीं कर पाओगे उत्साह संपन्न मदर सूत्रम क्रिया विधिज्ञ बसने स् शक्तम सरम कृतज्ञ द सौ हद च लक्ष्मी स्वयं यात निवास हे तो भक्त ऐसा नहीं हो भक्ति के लिए देखो हम मानते हैं आपकी प्रियता है लेकिन आप इतने अगर भावुक बनोगे तो आप हमारी राष्ट्र सेवा कैसे कर पाओगे आप चिंता मत करो आपका आपका ब्याह हुआ है ब्याह हो गया ना हा सोचना भी मत और कुछ जैसा हम कहे वैसा चलो पत्नी भी यही चाहती वो भी वो भी आपको मानती है व उसकी इच्छा है क साल हो गए आपको भारतीय सेना में 12 साल क साल और ड्यूटी निभानी है न साल और चिंता मत कर ऐसे न साल गए कोई जदा समय थोड़ी लगता है अगर प्राण भी निकल जाते हैं ना तो राधा राधा जप रहे हो भाव तुम्हारा बहुत सुंदर है

तुम्हें भगवत प्राप्ति होगी हमारी बात मान लो तुम चिंता मत करो तो आप राष्ट्र सेवा करते हुए नौ वर्ष बिताए और रही कि मिलने जुलने की बात ना तो बिना फोन के भी फोन नंबर आ जाता है अगर आप सच्चे भाव से तो आपको पता चलेगा कि महाराज हमारे साथ है आपको अनुभव में आएगा स्वप्न में भी आएगा और जागृत में भी आएगा तो तुम चिंता ना करो हमारे राष्ट्र सेवा में कर लो अभी जरूरत पड़े ना तो राष्ट्र सेवा में प्राण दे देना चाहिए हर राष्ट्र की जितने भी समाज सबको चाहिए अगर हमें राष्ट्र के लिए प्राण देने की बात आवे तो हमको उत्साह रखना चाहिए अपने देश में समर्पित होने के लिए प्राण देने का उत्साह रखना चाहिए चाहे भक्त हो चाहे व गृहस्थ हो चाहे कोई भी हो राष्ट्र के लिए प्राण समर्पित नहीं तो मुझे लगता है जीवन ही बेकार है चाहे हम राष्ट्र के प्रति तो समर्पित है हमारा एक एक जन राष्ट्र का अच्छे आचरण से युक्त हो रहा है तो हम आंतरिक राष्ट्र के उन शत्रुओं पर विजय दिलाने की बात कर रहे हैं जो गोली से नहीं दिलाई जा सकती काम क्रोध लोभ मोह

मध मत्सर ये अंदर खोखला करते हैं यह गोली से नहीं यह ज्ञान से इनको नष्ट किया जाता है तो हम भी तो राष्ट्र सेवा ही कर रहे हैं समाज सेवा ही कर रहे हैं तो हमें लगता है कि अगर दो चार वर्ष करने के बाद सरकारी सहमति से हम फिर तो और अच्छा आनंद रहेगा कहते पेंशन भी मिल जाए तो उससे मान लो संत सेवा किया गौ सेवा किया चार बांधली गौ सेवा कर रहे हैं चार संतों को भगवान के लिए दूध दे रहे हैं भोग लगाने बढ़िया सब काम बन जाएगा तीन साल छत्तीसगढ़ में हो तीन साल के लिए तो वहां से आने जाने में यार आना जाना कोई खास बात नहीं है खास बात है प्यार प्यार आपका प्यार है वृंदावन से तो आपको हर समय वृंदावन की याद आएगी आपको प्यार है संत से तो हर समय याद आएगी याद आना खास है यहां रहकर संसार का चिंतन करो वो खास बात नहीं संसार में रहकर यहां का चिंतन करो यह खास बात है पकड़ और देखो तुम्हारा प्रेम है वृंदावन से यहां से तो तुम कहीं भी जाओ तुम्हारा मन तड़पेगा और वो तड़पन ही वास्तविक वृंदावन को चिंतन यह दीप बार कोटि जन्म के अगत में काट

करे उजियार करोड़ों जन्मों के पापों का नाश हो जाता है जब हम धाम का चिंतन करते हैं प्रियालाल का चिंतन दूर रहकर ज्यादा चिंतन होगा ध्यान रखना विरह में ज्यादा चिंतन होता है नहीं होता है जो मिलन में सुख है उससे ज्यादा तड़पने में सुख होता है अपने प्या की याद की तड़पन में विशेष सुख होता है तो बच्चा तुम अभी नौकरी कर लो ठीक है सूर्य योगी दास जी कानपुर से राधे राधे महाराज जी महाराज जी नशा युवाओं को पत भ्रमित कर भारतीय संस्कृति को नष्ट कर रहा है महाराज जी उपाय बताए नशा से ज्यादा व्यभिचार भ्रष्ट कर रहा है यह जो गर्लफ्रेंड और बॉय फ्रेंड और लिविंग रिलेशन य जो गंदी बातें है ना यही नशा की तरफ पेरित करती हैं व्यभिचार में सुख है नहीं पर उसको जब सुख रूप में भोगने की प्रबल आलसा हो लालसा होती है तो उसे व्यसन का आश्रय लेना पड़ता है मानसिकता को मदांध करने के लिए कोवा मदांध मदनाडा अंधो में अंधा कौन है बोले कामी पुरुष अब कामी पुरुष को जब काम वेदना पीड़ित करती हो उसमें सुख की अनुभूति नहीं होती है तो वो शराब पीता

है तो वो ड्रग्स लेता तो और नशे करता है इस तरह से वय विचार ही व्यसन की मूल वृत्ति है जैसे क्रोध और लोभ की मूल वृत्ति काम ही है काम की पूर्ति से लोभ का प्रादुर्भाव होता है और काम की अपूर्ति से क्रोध का प्रादुर्भाव होता है ऐसे ही काम से हर व्यसन की व्यसन अगर हमारे अंदर निष्काम बढ़े तो हम व्यसन को रौद सकते हैं लेकिन यदि कामना बढ़ेगी तो व्यसनों का आश्रय लेते ही हैं लोग तो मूलता काम ही है काम कामना वासना मनते अति करि दूर तभी हर व्यसन पर हम अपने शासन कर

सकते हैं तो यह काम जो है ये अज्ञान के कारण जो हम इसे छूट देते हैं इसका चिंतन करते हैं ये हम पर हावी होता है वह चिंतन हमारे लिए बहुत दुखद होता है उसी के लिए व्यसन बनता है ध्यायतो विषन पुन सात संगा जायते संगत सं जायते कामा कामा क्रोध भी जायते क्रोधा भत सोहा सहा स्मति विभ्रम स्मृति भ सात बुद्धि नासो बुद्धि नासा प्रते हर व्यसन का मूल काम है कामना अब इस कामना को बिना अध्यात्म के नष्ट नहीं किया जा सकता इसीलिए हम हर भाई बहन समाज से प्रार्थना करते हैं पाच मिनट अगर अध्यात्म के लिए समय दे तो आपके जीवन का परिवर्तन हो जाए और परिवर्तन हो रहा है हमारे भाई लोग बदल रहे हैं हमारे नवीन समाज में थोड़ा चेतना जागृत हुई एक जती जली है जो बहुत से दुर्वेष त्याग करके भगवत नाम भगवत मार्ग भगवत धर्म का अनुसरण कर रहे हैं बिना अध्यात्म के परिवर्तन नहीं हो सकता अध्यात्म ही परिवर्तन करता है यदि माता-पिता थोड़ा सहयोग करें नए बच्चों को बैठल करके थोड़ा धर्म शिक्षा अध्यात्म की देना शुरू करें कुछ मिनट नाम जपना शुरू करें

आहार शुद्धि की तरफ आचरण शुद्धि की तरफ उनकी जागृति करें तो हमारा समाज सुधर सकता है नहीं तो काम भोग काम कामना वासना यह सब मिटिया मेट करता चला जा रहा है समाज को और लोग समझ नहीं पा रहे तो मोबाइल का दुरुपयोग कुसंग आहार विहार गलत तो इसमें माता-पिता थोड़ा सहयोग करें बच्चों को अध्यात्म की शिक्षा दे नहीं आता अध्यात्म का ज्ञान तो अध्यात्म के हमारे भारत देश में एक से एक उद्भव विद्वान है एक से एक ब्रह्म ऋषि है एक से एक महात्मा है उनके वचन सुनाए जाए तो ही परिवर्तन हो सकता है अनथा ऐसे ऐसे लोग आते हैं कि हमें आश्चर्य होता है अभी एक कल आए थे मात्र छ महीने से सत्संग सुन रहा हूं 35 वर्ष की गंदी आदत सब छोड़कर आज मैं राधा राधा जप रहा हूं और तब मैं आपके पास आया हूं कि अब मेरा क्या होगा अब आगे का निर्देश कीजिए तो देखो अध्यात्म में आए हो हमारे पास बाद में पर सुधर पहले गए हमें लगता है यदि सत्संग सुनाया जाए बच्चों को बैठ कर के धर्म की शिक्षा दी जाए उनको बताया जाए कि ये व्यभिचार बहुत बड़ी हानि है ये व्यसन बहुत

बड़ी हानि है ये गंदी बातें हैं तो समाज हमारा सुधर सके आजकल माता-पिता को फुर्सत नहीं अपने मनोरंजन से सही बात मानिए बच्चे कहां जा रहे हैं कोई मतलब नहीं है अरे कभी 10 मिनट बैठकर अपने छोटे बच्चों को दुलार करो उनसे पूछो तुम्हारा मोबाइल लाओ देखे तुम्हारे मोबाइल में तुम क्या देखते हो तुम्हारा संग क्या है तुम कैसे-कैसे दोस्त तुम किए हो तुम्हारे दोस्त तुमसे क्या बात करते हैं मित्र की तरह जब उनसे बात करो और उनकी गंदी बातों में उनको डांट नहीं उनको प्यार से यह गंदी बात है इसको छोड़ दो तुम यह ठीक नहीं है और उसको बचाओ अब जैसे 12 13 14 यही वो रास्ता है जहां से भटकाव होता है या जहां से सुधार होता है अगर इसे सुधार दिया जाए तो एक राष्ट्र भक्त हो सकता है वो राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा करने देखो अपने राष्ट्र में राष्ट्रपति समय देवी ही तो है ना तो बच्चा हो या बच्ची वो हमारे राष्ट्र के विशेष कार्य में आ सकती है व हमारे समाज के कार्य में आ सकती है इसलिए माता-पिता और गुरु तीन का अध्या में बहुत बड़ा योग होता है

यदि सही माता-पिता शिक्षण दे और सही धर्मा धार्मिक गुरु मिल जाए तो किसी का भी परिवर्तन हो सकता है अन्यथा अब समाज का जो स्वरूप है वह पूर्व जो भोगी देश हैं उनका अनुसरण किया जा रहा है वहां के वस्त्र पहने जा रहे हैं वहां की चाल चलन सीखी जा रही यह अपने देश में तो ऐसा नहीं अपना देश तो धार्मिक देश है पवित्र देश है हमारे देश का अनुसरण बाहर वाले करते हैं धार्मिक कहीं भी आप देख लीजिए भारत की जो धार्मिक व्यवस्था है वो विश्व में ऐसी कहीं नहीं है इसी का अनुसरण किया जाता है विदेशी देखने को मिलते हैं कि वो चोटी रखा रहे हैं वो धोती पहन रहे हैं वो यज्ञ पवित्र पहन रहे हैं विदेशी लोग मर्यादा से रह रहे हैं व अर्जेंट अर्जन कौन अर्जेंटीना हां वहां के आए थे राधा आधर मधु मिलिंद जय जय एक आंसू भरे आए थे बिल्कुल वसे अपनी भारतीय भेष भूषा में कंठी तिलक धारण लगा हे भगवान देखो विदेश में इनके ऊपर कपा हो गई नाम पूरे विश्व को पावन कर सकता है तो ये जो लोग आज नए नए बच्चों को देखते हैं ना कि व्यसन करके आते कितना पतित हो गए

बच्चे अभी 18 16 17 के है ये अवस्था व्यायाम करने की ब्रह्मचर्य की उत्तम विद्या अध्ययन करने के अच्छे संस्कार के स गंदे आचरण में फस रहे अगर हम एक एक अपना सुधार करें तो अपने भारत का सुधार कर सकते हैं हमारा सहयोग यही है आप सबका कि आप अपना सुधार कर लो आप अपना सुधार कर लो आप अपना तो आप 10 को सुधारो ग 10 10 को सुधारे इससे हमारे भारत का सुधार हो सकता है तो अध्यात्म के बिना तो सुधार असंभव है और अध्यात्म एन केन प्रकार जैसे हम अधम जीव हैं तो जा नहीं पाते हैं

यदि आप लोग कहीं बाहर जाते हो तो जबरदस्ती सुनाओ जबरदस्ती 102 को बैठ आओ भले प्रलोभन देके किसी भी तरह एकनाथ जी जब सत्संग करते थे ना तो पूरे एरिया को ऐलान कर देते थे कि 250 ग्राम चीनी देंगे सबको तो गरीब गरीब लोग जो है ना एकत्रित होते तो सबसे विट्ठल विट्ठल खूब राम कृष्ण हरि कीर्तन करवाते और भगवत चर्चा सुनाते फिर ढाई ढ स ग्राम चीनी देते तो चीनी के लोभ से अमृत पान करा देते हैं अब उनका व्यसन बन जाता फिर वो चीनी के लोभ से नहीं वो सत्संग के लोभ से आने लगते

तो हम अपने लोगों को चाहिए जैसे साधु महात्मा जने कोई नाना कोई ऐसा कि भाई आज ठाकुर जी का भोग लगा रहे हैं आओ 50 लोगों को पवाएं 50 लोगों बैठा के नाम कीर्तन करवावे और सत्संग सुनावे सत्संग से परिवर्तन बहुत ज्यादा होता है अब आप थोड़ा समय बदल रहा है कि साधु महात्माओं को पशुओं की तरह घेर के मारने लगे लोग कि अब वो संत महात्मा जा रहे हैं बोले बच्चा चोर मारने लगे बताओ साधु को अरे बच्चा चोर जो होते हैं उनको पकड़ ही नहीं पाओगे तुम वो ऐसे थोड़ी पूछते हैं उनको तो जान ही नहीं पाओगे सीधे सरल महात्मा अगर रास्ता पूछ रहे हैं कुछ बात कर रहे हैं आपको कोई संशय दिखाई दे रहा उनकी जानकारी कीजिए कहां से आए हैं कौन भाई वो कोई राक्षस तो है नहीं को खा जाएंगे अच्छा कोई उनके पास अस्त्र शस्त्र नहीं कि वो सूट कर देंगे आप पुलिस बुलाओ आराम से बैठ के गांव के पंचायत के लगवा हो उनकी जानक ऐसे घेर के पशुओं की तरह तो अब यह भी बहुत डर लगता है कि अगर संत गांव गांव जाकर उपदेश करें तो मारे ना जाए कहीं नहीं मान लो चार संत है जा बोले

बच्चा चोर अब बताओ क्या प्रमाण दे वो संसार को बहुत विचित्र सब है बचा के अपने को बचा के पर प्राणों की बाजी लगाकर अपने इस जगत रूप ईश्वर की हम सहायता करें कि इनको भगवान का जस सुनाए इनको सच्चा मार्ग बतावे यही उपाय आप संत माता-पिता अध्यात्म यही उपाय है जिससे हमारा समाज सुधर सकता है और कोई हमें तो उपाय समझ में नहीं आया यदि साधारण उपदेश माता पिता करें असाधारण उपदेश संत जन करें और बच्चे और समाज अध्यात्म को समझे तो परम मंगल हो जाए भगवान शिव को गांजा भांग और महात्मा लोग ये गांजा क्यों स्वीकार इसके पीछे रहस्य क्या है महाराज जी अपने मन की वृत्तियां है ऐसा कोई शास्त्रीय आदेश नहीं है यह मन की कमजोरी है ऐसा शास्त्रीय आदेश नहीं है भगवान शंकर ने हलाहल विष पिया है विष और उसको गले में रोका जगत मंगल के लिए नहीं और भगवान शिव जहां कुछ भी कोई नहीं स्वीकार करता देवता वह चीजें भगवान स्वीकार किए जैसे धतूरे का फल अगर कोई कहे कि हम भगवान शिव का प्रसाद पाते एक धतूरे के फल में 10 20 लोग मर सकते हैं और भगवान शिव को

चढ़ता है ना कौन धतूरे का प्रसाद पाता है बताओ हमें आक का फूल चढ़ता है ना कौन पाता है हमें बताओ केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए किसी व्यसन मात्र को हम कह दे कि शंकर जी का भोग है ऐसा शंकर जी कभी कहीं कोई भी शास्त्र में देखा है कहीं शास्त्र में लिखा पाया जैसे भांग आदि है धतूरा आदि है यह भगवान शिव को इस भाव से चढ़ाया जाता है कि उनको पसंद इस बात से नहीं नशा के लिए उन्होंने जहर पिया है अल जर जो कोई नहीं स्वीकार करता वो स्वीकार करते हैं भांग की पत्ती चढ़ा दे धतूरे का फल चढ़ा दे अकड़े का फूल चढ़ा दो तो ये प्रसादी कोई पा सकता है क्या दूसरा शिव प्रसादी कोई पा सकता है कोई धतूरे का फल पाए 10 पांच हमें बताए 10 पांच दाना में मर जाएगा संखिया धतूरा तो ये जो लोग कि हम चिलम भगवान शिव के और ये सब मुझे तो ऐसा कहीं प्रमाण नहीं मिला कि कोई साधु संत महात्मा के मार्ग में व्यसन ये अपनी अपनी रुचि विचित्र है ना कि सा आज्ञा शास्त्र आज्ञा नहीं करते किसी वसन करने के लिए आप हमें बताओ आप भी शास्त्र का स्वाध्याय कि हो

किसी शास्त्र में ऐसा पाया गया यह अपनी अपनी रुचि विचित्र है कि हम अपने भजन को किस ढंग से करते हैं भजन का शुद्ध स्वरूप है कोई चाह ना रह जाए निरंतर भगवदाज़्जुकाम मथुरा से राधे राधे महाराज जी पूज्य महाराज जी सादर प्रणाम महाराज जी राधा रानी की कृपा से आपके दर्शन का लाभ मिला राधा रानी की कृपा ऐसे ही बने रहे महाराज जी मैं एक दुकानदार हूं मेरी एक समस्या है कि मैं जब अपनी दुकान के मंदिर में की सेवा में होता हूं सेवा करते समय कोई ग्राहक आ जाता है तो सेवा बीच में ही छोड़कर ग्राहक को सम्मान सम्मान देने के लिए जाना पड़ता है ऐसा करने से कहीं मुझे पाप तो नहीं नहीं नहीं सच्ची सेवा यही है हम गृहस्थी में प्रधानता प्रकट पूजा का बहुत समय लगाना या आसनों में बैठकर माला जपना इसकी नहीं करते हैं गृहस्ती में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए नाम जप करना और जैसे ग्राहक आया तो पहली दृष्टि में देखो भगवान इस रूप में आए ईमानदारी से सच्चाई से अच्छी वस्तु जितना आपको मुनाफा उचित है मुनाफा लेते हुए आप उसको दीजिए और उसमें

भगवत भाव कीजिए आपकी पूजा ही हो रही है उसमें यह नहीं मानना कि अपराध बन जाएगा क्या खाली समय है तो हम पूजा कर सकते हमारा व्यापार हमारी पूजा है हमारी किसानी हमारी पूजा है हमारी नौकरी हमारी पूजा है राष्ट्र सेवा हमारी पूजा है समाज सेवा हमारी पूजा है और नाम जप हमारी भक्ति है हमें इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी ईमानदारी से धर्म से चले नाम जप करें नाम जप करते हैं आप महाराज जी जब भी समय मिलता है वसे होता गा नहीं इसमें थोड़ा सा सावधानी रखनी है कि नाम जप को हमें समय पर नहीं आधारित करना हर समय पर आधारित करना है हमें जैसे कक आया हां इस पर ध्यान देना थोड़ा मन बेईमान है अंदर की बात को इस पर अगर हम बार-बार इसे पकड़ा रहे नाम तो हमारा काम बन जाएगा महाराज जी कई बार ऐसा होता है संश यही है कि नाम जप कर रहे हैं किसी काम में व्यस्त हो गए फिर ध्यान भूल गया हां इस यही हम आपसे यही कह रहे क्योंकि हम जब तक एकाग्र नहीं होंगे तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा उस एकाग्र के साथ हमको ऐसे नाम जप करना है जैसे किसी को 56

प्रकार के भोग पवाएं इसके बाद कहा जाए आपको गोली मार दी जाएगी अब 56 प्रकार के भोग पाते समय उसको बिल्कुल किसी का स्वाद नहीं लगेगा क्योंकि उसका चिंतन हो जाएगा कि बाद में गोली मार ऐसे ही हमें है कि काल हमें कब मार दे कुछ पता नहीं गोली मारने वाले तोय बता दिया गया लेकिन हमको यही पता नहीं कि भोजन पाते पाते मार दे मार दिए जाए काल है ऐसे एक कवल लिया और दिल फेल हुआ और चले गए अच्छा खाली चले गए भगवत स्मरण नहीं हुआ तो दुर्गति हो जाएगी इसलिए हम राधा राधा राधा हर समय नाम चलाने की कोशिश करें कब हमारी आखिरी श्वास हो पता नहीं है इसलिए मैं हर समय नाम गाहक आया उसमें भगवत बुद्धि करके बातचीत करें सामान दिया जब खाली हुए फिर राधा राधा राधा राधा फिर बातचीत किया फिर नाम जब कर इससे हमारा मंगल हो जाएगा और जो कार्य करें आप मेरी दुकान कॉस्मेटिक की है कॉस्मेटिक की श्रंगार मेक मेकअप श्रृंगार औरतों का अच्छा अच्छा वो हमें ज्ञान नहीं है पर कोई भी व्यापार हो मेरी पहली दृष्टि बेकार होती थी जब से आपका सत्संग मिला है जी ऐसा

ये मेरी बहन है ये मेरी मां है बहुत बहुत सुंदर बहुत उत्तम बात है क्योंकि बेकार दृष्टि करने से मन गंदा होगा पाप बनेगा कुछ मिलना है नहीं लेकिन महाराज जी जब से आपका सत्संग सुनने का लाभ मिला है डेढ़ वर्ष से सुन रहा हूं आपका सत्संग तो तबसे ये चीज तो हा ये मेरी मां है ये मेरी बहन है इस भाव से दवाद पूरी रही बहुत

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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