॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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आज का Youth नशे से पथ भ्रष्ट हो रहा है कैसे सुधार होगा ? Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

सूर्य योगी दास जी कानपुर से राधे राधे महाराज जी महाराज जी नशा युवाओं को पत भ्रमित कर भारतीय संस्कृति को नष्ट कर रहा है महाराज जी उपाय बताएं नशा से ज्यादा व्यभिचार भ्रष्ट कर रहा है ये जो गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड और लिविंग रिलेशन ये जो गंदी बातें चली है ना यही नशा की तरफ पेरित करती हैं व्यभिचार में सुख है नहीं पर उसको जब सुख रूप में भोगने की प्रबल आलसा हो लालसा होती है तो उसे व्यसन का आश्रय लेना पड़ता है मानसिकता को मदांध करने के लिए कोवा मदांध मदनाडा अंधों में अंधा कौन है बोले कामी पुरुष अब कामी पुरुष को जब काम वेदना पीड़ित करती है उसमें सुख की अनुभूति नहीं होती है तो वो शराब पीता है तो वो ड्रग्स लेता है तो वो और नशे करता है इस तरह से व्यभिचार ही व्यसन की मूल वृत्ति है जैसे क्रोध और लोभ की मूल वृत्ति काम ही है काम की पूर्ति से लोभ का प्रादुर्भाव होता है और काम की अपूर्ति से क्रोध का प्रादुर्भाव होता है ऐसे ही काम से हर व्यसन की व्यसन अगर हमारे अंदर निष्काम बढ़े तो हम व्यसन को रौद सकते

हैं लेकिन यदि कामना बढ़ेगी तो व्यसनों का आश्रय लेते ही हैं लोग तो मूलता काम ही है काम कामना वासना मनते अति करि दूर तभी हर व्यसन पर हम अपने शासन कर सकते हैं तो यह काम जो है ये अज्ञान के कारण जो हम इसे छूट देते हैं इसका चिंतन करते हैं ये हम पर हावी होता है वह चिंतन हमारे लिए बहुत दुखद होता है उसी के लिए व्यसन बनता है ध्यायतो विषन पुन सात संगा सुप जायते संगा सं जायते कामा कामा क्रोध भी जायते क्रोधात भत सोहा सहा स्मृति विभ्रम स्मृति भत बुद्धि नासो बुद्धि नासा प्रते हर व्यसन का मूल काम है कामना अब इस कामना को बिना अध्यात्म के नष्ट नहीं किया जा सकता इसीलिए हम हर भाई बहन समाज से प्रार्थना करते हैं पाच मिनट अगर अध्यात्म के लिए समय दे तो आपके जीवन का परिवर्तन हो जाए और परिवर्तन हो रहा है हमारे भाई लोग बदल रहे हैं हमारे नवीन समाज में थोड़ा चेतना जागृत हुई एक ज्योति जली है जो बहुत से दुर्वेष त्याग करके भगवत नाम भगवत मार्ग भगवत धर्म का अनुसरण कर रहे हैं बिना अध्यात्म के परिवर्तन नहीं हो सकता

अध्यात्म ही परिवर्तन करता है यदि माता-पिता थोड़ा सहयोग करें नए बच्चों को बैठल करके थोड़ा धर्म शिक्षा अध्यात्म की देना शुरू करें कुछ मिनट नाम जपना शुरू करें आहार शुद्धि की तरफ आचरण शुद्धि की तरफ उनकी जागृति करें तो हमारा समाज सुधर सकता है नहीं तो काम भोग काम कामना वासना यह सब मिटिया मेट करता चला जा रहा है समाज को और लोग समझ नहीं पा रहे तो मोबाइल का दुरुपयोग कुसंग आहार विहार गलत तो इसमें माता-पिता थोड़ा सहयोग करें बच्चों को अध्यात्म की शिक्षा दे नहीं आता अध्यात्म का ज्ञान तो अध्यात्म के हमारे भारत देश में एक से एक उद्भव विद्वान है एक से एक ब्रह्म ऋषि है एक से एक महात्मा है उनके वचन सुनाए जाएं तोही परिवर्तन हो सकता है अनथा ऐसे ऐसे लोग आते हैं कि हमें आश्चर्य होता है अभी एक कल आए थे मात्र छ महीने से सत्संग सुन रहा हूं 35 वर्ष की गंदी आदत सब छोड़कर आज मैं राधा राधा जप रहा हूं और तब मैं आपके पास आया हूं कि अब मेरा क्या होगा अब आगे का निर्देश कीजिए तो देखो अध्यात्म में आए हो हमारे पास बाद में

पर सुधर पहले गए हमें लगता है यदि सत्संग सुनाया जाए बच्चों को बैठ कर के धर्म की शिक्षा दी जाए उनको बताया जाए कि यह बे विचार बहुत बड़ी हानि है यह व्यसन बहुत बड़ी हानि है यह गंदी बातें हैं तो समाज हमारा सुधर सके आजकल माता-पिता को फुर्सत नहीं अपने मनोरंजन से सही बात मानिए बच्चे कहां जा रहे हैं कोई मतलब नहीं है अरे कभी 10 मिनट बैठकर अपने छोटे बच्चों को दुलार करो उनसे पूछो तुम्हारा मोबाइल लाओ देखें तुम्हारे मोबाइल में तुम क्या देखते हो तुम्हारा संग क्या है तुम कैसे-कैसे दोस्त तुम किए हो तुम्हारे दोस्त तुम्ह से क्या बात करते हैं मित्र की तरह जब उनसे बात करो और उनकी गंदी बातों में उनको डांट नहीं उनको प्यार से यह गंदी बात है इसको छोड़ दो तुम यह ठीक नहीं है और उसको बचाओ अब जैसे 12 13 14 यही वह रास्ता है जहां से भटकाव होता है या जहां से सुधार होता है अगर इसे सुधार दिया जाए तो एक राष्ट्र भक्त सकता है वह राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा करने देखो अपने राष्ट्र में राष्ट्रपति समय देवी ही तो है ना तो बच्चा

हो या बच्ची व हमारे राष्ट्र के विशेष कार्य में आ सकती है व हमारे समाज के कार्य में आ सकती है इसलिए माता-पिता और गुरु तीन का अध्यात्म में बहुत बड़ा योग होता है यदि सही माता-पिता शिक्षण दे और सही धर्मा धार्मिक गुरु मिल जाए तो किसी का भी परिवर्तन हो सकता है अन्यथा अब समाज का जो स्वरूप है वो पूर्व जो भोगी देश हैं उनका अनुसरण किया जा रहा है वहां के वस्त्र पहने जा रहे हैं वहां की चाल चलन सीखी जा रही ये अपने देश में तो ऐसा नहीं अपना देश तो धार्मिक देश है पवित्र देश है हमारे देश का अनुसरण बाहर वाले करते हैं धार्मिक कहीं भी आप देख लीजिए भारत की जो धार्मिक व्यवस्था वो विश्व में ऐसी कहीं नहीं है इसी का अनुसरण किया जाता है विदेशी देखने को मिलते हैं कि वो चोटी रखा रहे हैं वो धोती पहन रहे हैं वो यज्ञ पवित्र पहन रहे हैं विदेशी लोग मर्यादा से रह रहे हैं व अर्जेंट अर्जें कौन अर्जेंटीना हां वहां के आए थे राधा आधर मधु मिलिंद जय जय एक आंसू भरे आए थे बिल्कुल वैसे अपने भारतीय भेष भूषा में कंठी तिलक धारण लगा

हे भगवान देखो विदेश में इनके ऊपर कृपा हो गए नाम पूरे विश्व को पावन कर सकता है तो ये जो लोग आज नए-नए बच्चों को देखते हैं ना कि व्यसन करके आते कितना पतित हो गए हैं बच्चे अभी 18 16 17 के हैं यह अवस्था व्यायाम करने की ब्रह्मचर्य की उत्तम विद्या अध्ययन करने की अच्छे संस्कार के सु गंदे आचरण में फस रहे अगर हम एकएक अपना सुधार करें तो अपने भारत का सुधार कर सकते हैं हमारा सहयोग यही है आप सबका कि आप अपना सुधार कर लो आप अपना सुधार कर लो आप अपना तो आप 10 को सुधारो ग 10 10 को सुधारे इससे हमारे भारत का सुधार हो सकता है तो अध्यात्म के बिना तो सुधार असंभव है और अध्यात्म न केन प्रकार जैसे हम अधम जीव है तो जा नहीं पाते हैं यदि आप लोग कहीं बाहर जाते हो तो जबरदस्ती सुनाओ जबरजस्ती 10 20 को बैठा हो भले प्रलोभन देके किसी भी तरह एकनाथ जी जब सत्संग करते थे ना तो पूरी एरिया को ऐलान कर देते थे कि 250 ग्राम चीनी देंगे सबको तो गरीब गरीब लोग जो है ना एकत्रित होते तो सबसे विट्ठल विट्ठल खूब राम कृष्ण हरि कीर्तन करवाते

और भगवत चर्चा सुनाते फिर ढाई ढा स ग्राम चीनी देते तो चीनी के लोभ से अमृत पान करा देते हैं अब उनका व्यसन बन जाता फिर वो चीनी के लोभ से ल वो सत्संग के लोभ से आने लगते तो हम अपने लोगों को चाहिए जैसे साधु महात्मा जनने कोई ना कोई ऐसा कि भाई आज ठाकुर जी का भोग लगा रहे हैं आओ 50 लोगों को पवाएं 50 लोगों को बैठा के नाम कीर्तन करवावे और सत्संग सुनावे सत्संग से परिवर्तन बहुत ज्यादा होता है अब अब थोड़ा समय बदल रहा है कि साधु महात्माओं को पशुओं की तरह घेर के मारने लगे लोग कि अब वो संत महात्मा जा रहे हैं बोले बच्चा छोड़ो मारने लगे बताओ साधु को अरे बच्चा चोर जो होते हैं उनको पकड़ ही नहीं पाओगे तुम वो ऐसे थोड़ी पूछते हैं उनको तो जान ही नहीं पाओगे सीधे सरल महात्मा अगर रास्ता पूछ रहे हैं कुछ बात कर रहे हैं आपको कोई संशय दिखाई दे रहा उनकी जानकारी कीजिए कहां से आए हैं कौन भाई वो कोई राक्षस तो है नहीं को खा जाएंगे अच्छा कोई उनके पास अस्त्र शस्त्र नहीं कि वो सूट कर देंगे आप पुलिस बुलाओ आराम से बैठ के गांव के

पंचायत लगवा हो उनकी जानक ऐसे घेर के पशुओं की तरह तो अब यह भी बहुत डर लगता है कि अगर संत गांव गांव जाकर उपदेश करें तो मारे ना जाए कहीं नहीं मान लो चार संत है बोले बच्चा चोर अब बताओ क्या प्रमाण दे वो संसार को बहुत विचित्र सब है बचा के अपने को बचा के पर प्राणों की बाजी लगाकर अपने इस जगत रूपी ईश्वर की हम सहायता करें कि इनको भगवान का जस सुनाए इनको सच्चा मार्ग बतावे यही उ आप संत माता-पिता अध्यात्म यही उपाय है जिससे हमारा समाज सुधर सकता है और कोई हमें तो उपाय समझ में नहीं आया यदि साधारण उपदेश माता-पिता करें असाधारण उपदेश संत जन करें और बच्चे और समाज अध्यात्म को समझे तो परम मंगल हो जाए भगवान शिव को गांजा भांग और महात्मा लोग य गांजा क्यों स्वीकार इसके पीछे रहस क्या महाराज जी अपने मन की वृतिया है ऐसा कोई शास्त्रीय आदेश नहीं है यह मन की कमजोरी ऐसा शास्त्रीय आदेश नहीं है भगवान शंकर ने हलाहल विष पिया है विष और उसको गले में रोका जगत मंगल के लिए नहीं और भगवान शिव जहां कुछ भी कोई नहीं स्वीकार करता

देवता वह चीजें भगवान स्वीकार के जैसे धतूरे का फल अगर कोई कहे कि हम भगवान शिव का प्रसाद पाते एक धतूरे के फल में 10 20 लोग मर सकते हैं भगवान शिव को चढ़ता है ना कौन धतूरे का प्रसाद पाता है बताओ हमें आक का फूल चढ़ बता है ना कौन पाता है हमें बताओ केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए किसी व्यसन मात्र को हम कह दे कि शंकर जी का भोग है ऐसा शंकर जी कभी कहीं कोई भी शास्त्र में देखा है कहीं शास्त्र में लिखा पाया जैसे भांग आदि है धतूरा आदि है ये भगवान शिव को इस

भाव से चढ़ाया जाता है कि उनको पसंद इस बात से नहीं नशा के लिए उन्होंने जहर पिया है हलाहल जहर जो कोई नहीं स्वीकार करता वो स्वीकार करते हैं भांग की पत्ती चढ़ा दे धतूरे का फल चढ़ा दे अकड़े का फूल चढ़ा दो तो यह प्रसादी कोई पा सकता है क्या दूसरा शिव प्रसादी कोई पा सकता है कोई धतूरे का फल पाए 10 पाच हमें बताए 10 पाच दाना में मर जाएगा संखिया धतूरा तो ये जो लोग के हम चिलम भगवान शिव के और ये सब मुझे तो ऐसा कहीं प्रमाण नहीं मिला कि कोई साधु संत महात्मा के मार्ग में व्यसन ये अपनी अपनी रुचि विचित्र होता है ना कि शास्त्र आज्ञा शास्त्र आज्ञा नहीं करते किसी व्यसन करने के लिए आप हमें बताओ आप भी शास्त्र का स्वाध्याय हो किसी शास्त्र में ऐसा पाया गया यह अपनी-अपनी रुचि विचित्र है कि हम अपने भजन को किस ढंग से करते हैं भजन का शुद्ध स्वरूप है कोई चाह ना रह जाए निरंतर भगवता का वृत्ति रहे अब ये जैसे लगा पाओ अब नहीं पूरा लगा पा रहे आप कुछ व्यसन लेते हैं ये आपकी कमजोरी है कोई आज्ञा नहीं ये कोई सिद्धांत नहीं आप समझ

पा रहे हो महाराज जी जी

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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