जब आचार्य उपेंद्र जी ने किए प्रश्न पर प्रश्न, पूज्य महाराज जी ने दिए गूढ़ उत्तर
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
आचार्य उपेंद्र जी महाराज जी इन्होंने आपको दिखाने के लिए एक बुक लाए थे यह सामाजिक समाज के उसके लिए काफी सारी सेवाएं अलग-अलग भागों में देखते हैं अलग-अलग उसमें इनका ऐसा प्रश्न था कि उसमें कि म महाराज जी भारत को फिर से विश्व गुरु बनाना है तो उसके लिए हमारा प्रयास क्या हो देखो हमारी जो भावना है हम सबकी बहुत अच्छी है प्रत्येक व्यक्ति की जब तक बुद्धि शुद्ध नहीं होगी तो विश्व गुरु का बोर्ड लगाने से कोई लाभ मिल जाएगा हम कह रहे हैं हम पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय कह दे भारत विश्व गुरु है हमारे भारत में यह गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड लिविन रिलेशन मदिरापान मानस खाना व्यभिचार हम स्पष्ट आपसे पूछ रहे हमारी नौ समाज हमारे नए बच्चे जो हमारे भारत के आगे चलकर भविष्य है वो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड लिविन रिलेशन मदिरापान व्य विचार और नशे में फंस रहे हैं तो क्या हम सब मिलकर के जगतगुरु का बोर्ड विश्व को लगा द विश्व गुरु का बोर्ड तो इससे क्या होगा भीतर तो पोल है ऊपर बोर्ड लगाने से काम चलेगा हमको जन जन मानस पटल पर अपने भागवत
धर्म को स्थापित करना होगा हमको व्यसन से ब विचार से अपनी समाज को मुक्त करना होगा जब यह मुक्त हो जाएगी ना तो बोर्ड लगाओ या ना लगाओ अपने आप विश्व गुरु भारत है आज तक कहीं भी जीवन मुक्तता की चर्चा चर्चा है तो किसी भारत के ब्रह्म ऋषि के द्वारा बीज बोजा गया है आज तक कहीं भगवत प्राप्ति की चर्चा है विश्व में तो भारत की किसी ब्रह्म ऋषि का बीज बोजा हुआ है नहीं तो नर्क स्वर्ग से आगे कोई चर्चा ही नहीं ग्रंथ उठा के देख लो तो हमारे भारत को विश्व गुरु पद पर लाने
के लिए पहले हमारी समाज को सुधरना होगा स्वयं आध्यात्मिक गुरु हमारी अंतर फाउंडेशन करके मुंबई में संस्था है और सारे गुरुओ से मैं मिलते रहता हूं हमको विश्वनंद गिरी महाराज जो हरिद्वार है उन्होंने आपके पास भेजा था ये सब बातचीत के लिए तो वही सवाल था कि जो आप बता रहे ये सब ठीक होना चाहिए तो मेरा वही सवाल है कि व हम अप्रोच जब लोगों को करते हैं वही दिक्कत आती है वही बात आती है व किस तरह से रोग किस तरह से लगाए वो क्या करे और दूसरा बात है जब हम विश्व गुरु की
बात करते हैं तो भारत अगर हमारे देश है अगर यह गुरु बनना है तो मतलब बाकी सारे जो धर्म है वो शिष्य होने चाहिए बराबर शिष्य होंगे ना तभी तो स्वीकार करें तो उनकी रीति पूरी अलग है उनका सारा आज मन में द्वेश भाव रखा हुआ है तो ये किस तरह से महाराज जी पहली बात तो है कि जो विश्व गुरु होता है वो विश्वात्मा होता है विश्वात्मा होता है वहां द्वेष का अंकुरण ही नहीं है इस सर्वत्र अपने प्रभु को देखने वाला व्यक्ति ही विश्व गुरु हो सकता है और सर्वत्र विश्व का मंगल चाहने वाला ही विश्व गुरु हो सकता है हमारा भारत ब्रह्म ऋषियों को से धर्म से युक्त देश माना गया है अब हमारी जो कमी हो रही है हमको पहले उसे ठीक करना है हमारी खुद की इंद्रियां कहां है अगर जनदरी स्त्री भोग सुख ले रही है रसेंद्र रसेंद्र का रसना का भोग ले रही है तो महाराज कितना भी ज्ञान बघरा जाए कुछ नहीं ज्ञान किसी काम का वो ज्ञान किस काम का जो काम पर विजय ना प्राप्त कर सके क्रोध पर विजय ना प्राप्त कर सके जो सर्वत्र भगवत दृष्टि ना प्रदान कर सके केवल हम
लिखने और बोलने से जगत गुरु नहीं हो जाएंगे हमें अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना होगा हमें अपने स्वरूप को बोध को अपने में अपने आप से अपने आप में देखना होगा और जब हम अपनी दृष्टि से देखेंगे तो सबका परिवर्तन शुरू हो जाएगा आप सब मिले हम सब हाथ मिलाए और अपने को जितेंद्रीय बनाए और अपने को भगवत भजन से ठोस करें और फिर हम उतरे समाज में तो पूरा विश्व बोलने लगेगा कि भारत जगत गुरु है विश्व गुरु है यह बोलने लगे हमको उनके मुह से सुनना है अपने मुंह से नहीं करना भारत विश्व गुरु है नहीं तुम बोलो देश विदेश में हमारी वाणी हमारी बात हमारी दम हमारी तपस्या हमारा भजन ऐसा जाए कि वो झुक कर के बोले कि नहीं भारत विश्व गुरु है तब माना जाता है हम अपने तपो बल से अपने भजन बल से अपने सद्विचार से हम श्रेष्ठ है यह बात तभी साबित हो सकती है जब हम पहले सब में भगवत दर्शन करें सबके आचरण का सुधार हो सबकी भावनाओं का सुधार हो आज हम क्या करते हैं महाराज आपको भले थोड़ा यह बात कम समझ में आवे आज हम प्रवचन को पेट पोषण का अपनी
वासनाओं का धंधा बना लिया है आप खुल कर के समझ लीजिए अधिक से अधिक धन संग्रह अधिक से अधिक भोग संग्रह अधिक से अधिक मान प्रतिष्ठा अपना नाम और आड़ लेते हैं हम धर्म की आड़ लेते हैं हम प्रवचन की आड़ लेते हैं हम भगवान की तो इससे उसका प्रकाश नहीं होने वाला प्रकाश तब होता है जब प्राणों की बाजी धर्म के लिए समर्पित करके और खुद तप में जीवन व्यतीत करते हुए प्रत्येक प्राणी को अपने तपोबल से बदलने की ताकत रखी जाती है यह हमारे भारत की परिपाटी रही है प्रत्येक हिंसक को चोर को व्यभिचारी को अपने तपो बल से अपने पुण्य बल से उसके माइंड को प्र साधु माइंड से खेलता है यह जो धर्म उपदेशक है ये माइंड से खेलते हैं उसके असत माइंड को सत में परिवर्तित अस्तो मा सद्गमय उसके अंधकार में काम क्रोध लोभ में फंसे हुए माइंड को बुद्धि को उसे तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यु मा अमृतम गमे इसलिए हमको जरूरत पहले एकएक व्यक्ति को अपने आप को सुधरने की है तब हमारा भारत विश्व गुरु होगा इनकी बुद्धि का परिवर्तन होना अत्यंत अनिवार्य है जब तक इनकी
बुद्धि का परिवर्तन नहीं होगा तो घर में ब विचार कर रहे हैं घर में तांडो मचा रहे हैं माता-पिता का अपमान कर रहे हैं ये नशा कर रहे हैं ड्रक्स कर रहे हैं य नाना प्रकार के कुमार अब कैसे सुधारा जाए आप हमें बताओ जब तक इन नौजवानों की बुद्धि नहीं सुधरेगी तो हमारा देश कैसे विश्व गुरु हो जाएगा हमारे भारत का प्रत्येक बच्ची और बच्चा यह प्रमाण होना चाहिए अब विदेशी परंपराएं हमारे में घुस गई हैं यह व विचार प्रवृत्ति क्या है आज एक बच्ची चार लड़कों से संबंध रखती है
एक से ब्रेकअप दूसरे से फिर तीसरे इसे क्या कहते हैं एक बच्चा चार बच्चियों से ऐसे गलत संपर्क कर रहा है इसे क्या कहते हैं य भारत की परिपाटी है यह बढ़ती चली जा रही है इसे कौन रोक रहा है केवल हम उपदेश मात्र केवल दे स्कोर कौन कूद रहा है अगर हम बार-बार चिल्ला चिल्ला के कह रहे हैं तो कुछ मान रहे हैं मान रहे हैं आप सब लोग तो जाते हो हम तो असमर्थ है शरीर स्वस्थ है और हमारा क्षेत्र सन्यास है आप तो भ्रमण करते हो इस पर दृष्टि डालिए हमारे जैसे आपने कहा कि यहां
परिवर्तन हर गुरु के पास जितने लोग आ रहे हैं वहां परिवर्तन अपने अपने से हो ही रहा है मैं बोल रहा हूं कि अधिकतर जो समाज है वो उनको कैसे यहां लेके आए एक और दूसरा आपको जाना होगा इसीलिए हम कह रहे हैं हम असमर्थ है पहला शब्द बोले कि हम जा नहीं पा रहे हमारी वाणी जरूर पहुंच रही जहां-जहां पहुंच रही है लेकिन आप लोग तो जा सकते हैं ना आप एक समुदाय हैं आप एक संगोष्ठी हैं आप जाइए बड़ी-बड़ी सभाएं कीजिए और उन सभाओं में अपने वचनों का प्रकाश दिखा कर के हमारी भूली हुई जनता को आप संभालिए हमारे नौजवानों को संभालिए यही हमारी प्रार्थना है सब उपदेश जितने भी उपदेश है धर्म गुरु हैं जो भी हमारे भारत के विभूतियां हैं उनको हाथ जोड़कर यही प्रार्थना करते हैं आप लोग समाज में जाइए हम तो असमर्थ है एक तो किडनी फेल दूसरा हमारा क्षेत्र सन्यास है हम वृंदावन से बाह नहीं हमारी ललक है अगर हमारा क्षेत्र सन्यास ना होता और किडनी ठीक होती तो हम जेलों में भी जाकर के सत्संग करने की भावना रखते हैं कि हम जा जा कर के उनको समझाएं कि एक
गलती ने तुम्हारा पूरा जीवन बर्बाद कर दिया अब एक सुधार कर तो भले जेल में रहोगे लेकिन तुम भगवान को प्राप्त हो जाओगे तुम एक अक्षय दैवी संपदा वान बन जाओगे और ऐसा नहीं कि संसर्ग से परिवर्तन ना होता हो आप देखिए ना आप जिनसे संसर्ग कर रहे हैं उनका कुछ और स्वरूप है और आप जिनसे नहीं मिल पा रहे उनका कुछ और स्वरूप है आप मिलिए आप मिलिए स्वार्थ रहित होकर मिलिए आप उनके लिए उनसे मिलिए आप उनके जाकर के उनको यह जताए कि आप जिन आचरण से चल रहे हो यही आचरण आपका नाश कर देंगे आप इन आचरण से चलोगे तो आपको किसी से आशीर्वाद मांगने की जरूरत नहीं आप खुद सुखी और खुशहाल रहेंगे आप चिंता और शोक रहित रहेंगे क्योंकि हम सब अविनाशी के बच्चा है तो जब तक अविनाशी मार्ग नहीं मिलेगा तो प्रकृति से हम कभी सुखी नहीं हो सकते प्रकृति के द्वारा हम कभी नहीं सुखी हो सकते परमात्मा का अंश परमात्मा स्वरूप में ही विश्राम पाएगा प्रकृति में विश्राम और प्रकृति में गलत तरीके से प्रकृति का भोग करते हुए हम आसुरी प्रवृत्ति को प्राप्त हो रहे हैं
इसलिए हमें चाहिए आज हमारे में गलती हो हो रही प्रभु हम खुद संयम छोड़ रहे हैं हम खुद भोग विलासी बन रहे हैं हम खुद मान सम्मान प्रिय बन रहे हैं इसलिए हमारा प्रभाव नहीं पड़ रहा इसीलिए हमारा प्रभाव पूरा विस्तृत नहीं पड़ रहा दीपक का दीपक की तरह हैलोजन का हैलोजन की तरह लेकिन विश्व गुरु बनाने के लिए सूर्य की तरह प्रकाश चाहिए तो हम सब एकजुट हो हम सब एकजुट हो और हम सबका उद्देश्य बने सबका उद्देश्य बने अपने अपने स्वार्थ की सीमाओं को पार कर के देश मंगल के लिए समाज मंगल के लिए तो भारत विश्व गुरु था और आपको सच्ची बताए भारत विश्व गुरु है और भारत विश्व गुरु रहेगा इसे कोई नकार नहीं सकता अभी अभी क्या बनाना है भारत को विश्व गुरु है और रहेगा हां यह जरूर है कि हम में जो कमियां है हमको पहले दूर करना है नहीं हम प्रमाणित नहीं कर पाएंगे कि हम विश्व गुरु हैं प्रमाणित तभी कर पाएंगे जब हमारा हर नागरिक पवित्र आचरण वाला सुख और शांति युत जीवन हो और मराज दो दो सवाल उसम और थे एक है कि जैसा आपने कहा अ अपने जो हिंदू धर्म है
उसमें अलग अलग देवता है गणपति होगा कोई विष्णु कृष्णा मानता कोई राधा मानता कोई दत्त मानता है तो अनेक देवताओं के वैसे लेकिन हमारा भी एक हम जो बोलते ओमकार एक ही अगर तो होगा सब तो दूसरे धर्म वाले तो उनको अपने इसमें लोग जो बट चुके हैं अलग-अलग परंपराओं में अलग अलग उसमें तो वो क्या बोलते हमारा आया हुआ अनुभव बता रहा हू हमारी आध्यात्मिक संस्था में वो लोग वो पूछते हैं कि पहले आप ही लोग का तो पहले द्वैत दिखता है वो अद्वैत पहले आ जाना वो मूर्ख है वो नहीं जानते बात करके देखे सवाल है कि उनको क्या बता है हां हां समझो घड़ा कुल्हड़ सकोरा इनमें है क्या मिट्टी कुंडल हार करधनी बाजूबंद है क्या सोना वो अज्ञानी वो क्या जानता है मेरा परमात्मा मेरे भाव के लिए मेरा बेटा बन सकता है मेरा पिता बन सकता है मेरा गुरु बन सकता है मेरा शिष्य बन सकता है मेरा प्रभु इतना कृपालु कि हम जिस भावना से उसे देखते हैं वो वही भावना स्वीकार करके हमारे सामने प्रकाशित हो जाता है वो ऐसा एक होते हुए भी वो अनेक भावनाओं का पोषण कर रहा है
कहीं शिव पार्वती के रूप में बैठा है कहीं गणेश और सिद्धियों के रूप में बैठा है कहीं सियाराम के रूप में कभी राधेश्याम के रूप जिधर तू चाहे उधर वो है एक ही तत्व दूसरा तत्व नहीं है कैसे तुम कह सकते हो कि हम भेद वाले हैं कैसे हम अभेद हैं हम कृष्ण बोले तुम राम बोलो वही राम रमा सम में है वही कृष्ण सबका आकर्षण कर रहा है वही गणपति है वही शिवा है वही अंबा है दूसरा कोई नहीं है अब नहीं तुम जानो तुम तुम्हें समझाने के लिए थोड़ी बैठे मान लो मूर्ख कोई कहे कि आपस में फूट कैसी फूट है कहां फूट है और फूट है जिनके अंदर वो किसी देवता को नहीं मानते किसी धर्म को मानने वाले नहीं वो केवल धर्म की आड़ में लेकर अपने द्वेष राग का खेल खेल रहे हैं नहीं तो एक को मानने वाला सर्वत्र अनेक में एक ही देखता है हमारा सिद्धांत है हमारे देश का अगर काली माना राम कृष्ण परमहंस जी ने तो उसी में कृष्ण को देखा गोस्वामी जी ने सियाराम माना तो सम में सियाराम देखा गोपियों ने श्याम माना तो सम में जित देखु तित श्याम मय है ब्रह्म दृष्टि से
महापुरुषों ने देखा तो सर्वम लमदम ब्रह्म ने नाना किंचन कहां भेद है भेद जिसकी बुद्धि में वही भेद है नहीं तो सब जगह अभेद तत्व परमात्मा विराजमान वो भेद कैसे मिटाए वही मेरा सवाल था जब तक प्रश्न करता की बुद्धि का भेद नहीं मिटेगा तब तक भेद मिटता ही नहीं है जरूरत है प्रश्न करता की बुद्धि का भेद मिटना वो अभेद हो गया तो एक ही तत्व है वही राधा है वही कृष्ण है वही अंबा है वही शिव है वही गणेश है है ही नहीं कोई दूसरा अरे वही चराचर जगत में है यह तो भगवत स्वरूप है वही चला मत्ता पर तरम नानत किंच दस्ती धनंजय मेरे सिवाय हे धनंजय किंचन मात्र कुछ नहीं है बस अब उस मेरे को आप क्या लेते हो मां लेते हो पिता लेते हो भाई लेते हो बंधु लेते हो जो भाव करो तुमहे माता च पिता तुम्हे तुमहे बंधु सखा तुम्हे हो वही अनुभव में आएगा प्रश्न करता की बुद्धि जहां भी प्रश्न हो रहा हो उसकी बुद्धि अभेद होगी तो अभेद दिखाई देगा और भेद होगा तो अभेद में भी वो भेद देख लेगा और अगर अभेद है तो भेद में भी वो अभेद देख रहा है चराचर जगत में एक
ही परमात्मा तत्व है चाहे वो स्त्री हो चाहे पुरुष हो चाहे पापी हो चाहे पुण्य आत्मा हो फिर ये गणेश गौरी अंबा और नाना प्रकार के भगवत स्वरूप वो तो है ही एक जिसकी बुद्धि में भेद बैठ गया है वो भेदी है और जो अभेद है वह अभेद तत्व देख रहा है कहां भेद है हमें बता दो कौन सा तत्व दूसरा है आप बताइए कौन सा तत्व दूसरा है एक ही है बस अगर आप स्वीकार करते कि हमारे हिंदुओ में यह दोष है तो फिर दूसरा तो थप्पड़ मारी देगा हमारे दोष करके नहीं उन उनकी मान अरे उनका मुंह बंद करने के लिए हमारे पास ज्ञान है ना हमारे पास ज्ञान है उनका मुंह बंद करने के लिए अरे हम स्त्री पुरुष विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गस्त सुनी च सुपा के पंडिता सम दर्शना तू समदर्शी दृष्टि लगा चश्मा लगा जो हम चश्मा बता रहे चश्मा लगा फिर देख एक ही रंग दिखाई देगा लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल और लाली देखन मैं चली तो मैं भी हो गई लाल दूसरा कोई है ही नहीं दूसरा कोई है ही नहीं और जो दूसरा है तो फिर प्रश्न करता के दिमाग में जब दूसरा है तो हम बैठा नहीं
सकते और जब दूसरा व हटाना चाहे तो दूसरा कोई है ही नहीं चूहे में भी वही है और गणेश में भी वही है समझ रहे हो ना गणेश की सवारी चूहा चूहे में भी वही है जो गणेश में भी वही है वही गणेश है वही चूहा है दूसरा नहीं है तत्व को जानने वाला दूसरा नहीं देखता और जो दूसरा देखता है वह तत्व ज्ञानी नहीं है और उसकी बात विचारने और माननी नहीं है कैसे बात ऐसे हो सकता है ऐसे कैसे हो सकता है आप बोलिए नहीं इसका समाधान इसलिए हम चाहते कि आपको मान लो आपने बताया कि आप समाज में इसलिए हम समाधान चाहते कि आप गरजो हम तो नहीं गरज पा रहे हैं क्योंकि हमारी इतनी क्षमता नहीं कि हम सब जगह जाए आप जाइए नौजवान शरीर है आप गरज और ऐसे मुंह को बंद कीजिए जो ये कह रहे हैं हिंदुओं के बहुत से देवता है अरे हमारा हमारी दृष्टि में तो आओ हम तो सुवर कुत्ता में भी भगवान को देखते हैं नामदेव जी ने देख लिया ना कुत्ते में भगवान को हमारे यहां तो वारा अवतार भी भगवान का माना गया है हम तो मछरी में भी भगवान देखते हैं कछुआ में भी भगवान देखते हैं हैं उपदेश
करना अलग बात है हम देखते हैं हम अनुभव करते हैं वो मेरा मत्स्य रूप है वो कर्म रूप है वो वाराह रूप है वो चराचर जगत रूप है सारा का सारा सृष्टि वही बना हुआ है दूसरा कोई है ही नहीं हमारे एक दो 10 20 भगवान नहीं चराचर भगवान है जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जानी बंधों सबके पद कमल सदा जोर जो मेरा भगवान तो इतने रूपों में विराजमान अनेक होते हुए भी एक है एक होते हुए भी अनेक है इस रहस्य को जो जान गया वो निर्मल ज्ञान को प्राप्त हो जाता है क्यों प्रभु जरूर अभी
वही आयोजन सब करना था अभी वही करेंगे आपने जो कहा आपके आशीर्वाद कर देंगे तो ही सनातन धर्म के सारे गुरु एक होने बता मुझे वही उसी के लिए भेजा था यही सवाल पूछने के लिए सारे सनातन गुरु एक होके किस तरह से आवाज एक तो तब होंगे जब उद्देश्य एक होगा उपाधि रुपया प्रणाम नमस्कार मान कीर्ति तो हम सब एक नहीं हो पाएंगे प्रभु एक तो उद्देश्य एक होगा तब हो पाएंगे जब हमारा उद्देश्य होगा केवल भगवत प्राप्ति हमारा उद्देश्य होगा जन समाज को भगवता आनंद का प्रदान करने की भावना तभी भगवान हो सकता है यहां तो बहुत कुछ उल्टा है सामने पोस्टर कुछ और है पीछे कुछ और है पोस्टर बैनर के नीचे पीछे कुछ और है पर्दे के सामने कुछ वीडियो के सामने रूप कुछ और होता है और वीडियो के पीछे कुछ रूप और होता है ऐसे जगत गुरु नहीं होता ऐसे विश्व गुरु नहीं बनता प्रभु हमारी बात पर चिंतन करना भगवान को साक्षी करके हमारी बात पर चिंतन करना कि वीडियो के सामने कुछ रूप और होता है अपने लोगों का और वीडियो के पीछे कुछ और होता है ऐसे विश्व गुरु नहीं बनता
जिसका एकांत और समाज एक होता है जिसकी वाणी और आचरण एक होता है जिसका उद्देश्य एक होता है वो घर बैठे पूरे विश्व का परिवर्तन कर देगा वो घर बैठे पूरे विश्व में जय जय मछवा देगा श्री भगवान की सत्य में ताकत है जब सुगंध आ जाती है ना पुष्प में तो भर को निमंत्रण नहीं देना पड़ता मड़ने लगते हैं और भौरे पराग पाकर फिर मुग्ध और लुब्ध हो जाते हैं इसलिए हमको अपना सुधार करना है हम जितना सुधार और बलिष्ट होते जाएंगे समाज का परिवर्तन अपने आप होता जाएगा जग का कल्याण स्वयं होगा पहले कल्याण अपना कर ले मन इंद्रिय बुद्धि चित्त अहंकार इनको तो अब प्रभु क्या हो गया है कि थोड़ा सा समझना हमारी बात को आज हम दूसरों का परिवर्तन चाहते हैं पर अपना नहीं इसीलिए परिवर्तन नहीं हो रहा हम अपना परिवर्तन चाहे अपने को जलाए फिर दूसरों का चाहे तो अपने आप परिवर्तन हो जाएगा पर उपदेश कुशल बहु तेरे यह अब इस पर आप विचार करना चूंकि हम मित्रवत इस समय बात कर रहे हैं हां समाज का या संगोष्ठी का या एक समुदाय का जब एक उद्देश एक उद्देश्य हो अपने
को जला कर के दूसरे को निर्माण करना दूसरे की भावनाओं को पुष्ट करना तो अपने को जलना है कामाग्नि क्रोधाग्नि लोभा मोहा मदा मत्सरा इनसे हम जल कर के तप कर स्वर्ण की तरह चमके हम इनसे फेल ना हो ऐसा अगर नना नाप कसौटी तो कितने निकलेंगे भगवान जाने स्वांग रख कर के सब कुछ करने का भावना और बहुत तरह से अर्थ की प्राप्ति मान की प्राप्ति बहुत बड़े-बड़े सब भोगों के संग्रह यह तो एक अलग क्षेत्र हो गया लेकिन एक आदमी का मंगल चाहना हृदय से यह एक अलग बात हो गई और यह तभी होती है जब स्वयं में वोह उद्देश्य जो हम दूसरे को देना चाहते हैं हमारे में है हमें लगता है हर व्यक्ति का परिवर्तन होना चाहिए हर माइंड का परिवर्तन होना चाहिए तभी हम सब एक होंगे नहीं तो नहीं हो पाएंगे अपनी अपनी सब स्वार्थ पूर्ति के लिए यदि हम चलेंगे तो हम फिर विश्व के लिए नहीं कर पाएंगे हम देश के लिए नहीं कर पाएंगे सर्वे भवंतु सुखना वही कह सकता है जिसका सब में अपने इष्ट का भाव है उदार चरिता नाम वसुदेव कुटुंब कम यह मेरा परिवार है पूरा विश्व इस भावना
से जब हम बड़े तब और यह बहुत कठिन भावना भगवन हो रही तो ऐसा नहीं कि ऐसे नहीं है ऐसे हैं जो हमारे देश का मंगल जगत का मंगल पर जो आपका ये वचन कि हम सब एकजुट हो जाए नहीं हो पाएंगे प्रभु क्योंकि एकजुट वही हो सकता है जो एक में स्थित होकर सबका मंगल करना चाहता है और जिसको अपनी वासनाओं की पूर्ति तो आपका स्वागत करेगा आपसे हाथ मिलाएगा लेकिन काम में नहीं आएगा अपने काम में नहीं आएगा अपने काम में जीवन समर्पित करने वाला ही आएगा मेरी जैसी भावना है शास्त्र के अनुसार सदगुरु के अनुसार कि जो भगवत जीवन है वही जगत मंगल कर सकता है जो स्वार्थी जीवन है वह कितना भी बड़े पद में कोई भी स्वांग रखे हो जगत मंगल नहीं कर सकता जगत मंगल नहीं कर सकता यह पक्की बात है सात सात सा लोकान तारती मम भक्ति यतो भलम पुना पहले अपने अंदर जैसे बम फूटता है ना विध्वंस कर देता है ऐसे भजन का इतना बल एकत्रित करें जिधर देखो जिधर बोलो जिधर छू लो जिधर निकल जाओ उधर मंगल मंगल होता चला जाए भजन खूब भगवान का स्मरण कीजिए भगवान का बल हदय में धारण
कीजिए और कोई आपसे जुड़े ना जुड़े आप अकेले इतने बलवान बनिए कि चले चलो कदम बढ़ाते हुए और हमारे देश का मंगल हो हमारी प्रजा जो हमारी समाज है ये सुखी दिमाग से हो जाए शरीर और धन सेलाई हम कह दिमाग से स्वस्थ हो जाए सबका दिमाग निर्मल हो जाए सबका मन निर्मल हो जाए
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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