॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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जानिये सर्व सुख प्रदान करने वाली साधन भक्ति , भाव भक्ति और प्रेम लक्षणा भक्ति !

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

उत्तमा भक्ति चित स्वरूपा होती है इसके तीन भेद होते हैं पहला साधन भक्ति दूसरा भाव भक्ति और तीसरा प्रेम भक्ति इंद्रियों के द्वारा सारी की सारी चेष्टा प्रभु के लिए होना जैसे नाम कीर्तन करना है नाम जप करना है लीला चरित्र सुनना है सेवा करना है परिक्रमा करना इंद्रियों के द्वारा कर्म ज्ञानेंद्र के द्वारा मन सहित सारी चेष्टा प्रभु के लिए होना उसे साधन भक्ति कहते हैं इस साधन भक्ति में दो गुण प्रकाशित होते बड़े जोर के क्लेश अगनि शुभ दयनी सारे क्लेश नष्ट कर

देती है साधन भक्ति उत्तमा भक्ति के तीन साधन तीन पहला है साधन भक्ति दूसरा भाव भक्ति तीसरा प्रेम भक्ति इस भेद को पहले साधन भक्ति अगर पहली सही है तो दूसरी आ जाएगी भाव भक्ति और भाव भक्ति सही है तो तीसरी प्रेम लक्षणा भक्ति जागृत हो जाएगी पहली में कितना लाभ शुरू हो जाता साधन भक्ति में क्लेश अग्नि संपूर्ण क्लेश का नाश हो जाता है क्लेश किससे होते हैं तीन से क्लेश होते हैं पाप से वासना से अविद्या अज्ञान से जब हम साधन भ करते हैं साधन भक्ति का मतलब समझे मन सहित पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियों से जितना कुछ बन रहा है व सब प्रभु की प्रसन्नता के लिए उस साधन भक्ति के दो प्रभाव प्रकट होंगे संपूर्ण क्लेश का नाश क्लेश किससे होता है तीन बातों से पाप से क्लेश होता है वासना से क्लेश होता है और अज्ञान से क्लेश होता है यह साधन भक्ति में ज्ञान प्रकाशित हो जाता है संपूर्ण वासना भस्म हो जाती है और पाप नष्ट हो जाता है इसलिए क्लेश अग्नि संपूर्ण क्लेश का नाश साधन भक्ति में हो जाता है और शुभ दयनी कभी-कभी अज्ञान

के कारण आरोप भगवान में करते हैं कि भगवान हम पर कृपा नहीं किए इतनी भक्ति की इतना नाम जप किया लेकिन पूर्व प्रारब्ध जो है वह बहुत बलवान है जब शरीर र गया उसी समय प्रारब्ध रचा गया आपके साथ घटनाएं घटेगी इसीलिए नाम जप कर लो प्रारब्ध और अप्र्ल जिसका पाप फल प्रकट हो चुका है भोगो अपार अभी आने वाला है पहले से निश्चित है कि 55 वर्ष की अवस्था में आपको यह भोगना है पक्का भोगो चाहे जितना भजन करो भोगने की सामर्थ्य भजन से मिल जाएगी प्रारब्ध को मिटाना बहुत कठिन है और जब मिटाने वाला भजन हो जाता है तो मिटाने की इच्छा नहीं रहती क्योंकि भगवत प्राप्ति के नजदीक पहुंच चुका है तो लौटकर कौन जैसे सांप अपनी केच की तरफ नहीं देखता ऐसे भगवत प्राप्ति के योग्य महात्मा शरीर की तरफ नहीं देखता तो पाप का बीज वासना है इससे हमारे पूर्व पाप हुए दो प्रकार के प्रारब्ध बन चुके हैं एक प्रारब्ध एक अप्र्ल जो हम भोग रहे हैं अप जो आगे भोगने वाला है पाप की बीज वासना इस जन्म भी पाप करा रही तो हम जब साधन भक्ति करते हैं तो इस जन्म की वासना

का नाश होता है और पूर्व स्टाक जो पापों का है उसका नाश हो जाता है और अविद्या जिसके कारण पाप हो रहा था वासना बन रही थी उसका नाश हो जाता है पर प्रारब्ध बना रहता है यह अज्ञानी जन ना जानने के कारण कहते हैं कि अरे भजन शुरू किया बड़ा कष्ट भोग रहे हैं तो क्या भजन का फल है अनंत जन्मों से भोगते चले आ रहे हो पाप कर्म करते चले आ रहे हो तुम्हें पता नहीं लोगों की समझ में नहीं आता मछली को जल तरोई कहते हैं तो तुम कौन सी तरोई होगे तुम्हें भी पता होना चाहिए पक्का मस्या अवतार भगवान ने लिया है कि नहीं लिया मस्या अवतार भगवान ने लिया है और तुम मछली को जल तो करते हो कढ़ाई में तल के खाते हो तो तुम भी तले जाओगे अब एक बार के आहार में कितने जीव खाते हैं लोग कितना पाप कर रहे हैं अ ज्ञानियों को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते मूरख हृदय न चेत चाहे गुरु मिले बरं च समम फूल फर न बेत बास में चाहे जितनी खाद पानी लगा दो वहा सेव संतरा नहीं लगने वाले ऐसे ही जो मूर्ख स्वभाव के लोग होते नहीं समझने वाले जब साधन भक्ति का अनुष्ठान किया

जाता है तो उससे दो प्रभाव प्रकट होते क्लेश अग्नि और शुभ दयनी क्लेश अग्नि पाप से क्लेश होता है वासना से क्लेश होता विद्या तीनों का नाश हो गया लेकिन प्रारब्ध और अपार आगे आने वाला भोग यह दोनों भोगने पड़ेंगे इसलिए हिम्मत जटाओ नाम जप के द्वारा इतने बलवान बनो के प्रारब्ध धावे और हंसते हुए भोग लो प्रारब्ध का नाश करने की जब योग्यता आती तब नाश करने की इच्छा नहीं रह जाती और जब तक नाश करने की इच्छा तब तक योग्यता नहीं आई सब क्लेश का मूल कारण भगवान का भजन ना होना भगवत विमुख है तो जब हम भक्तों के संग के प्रभाव से साधन भक्ति का अनुष्ठान करते हैं तो सारे क्लेश का दुखों का नाश हो जाता है अब आगे दुख नहीं है बस इतना ही है रास्ता जिसको आप भोग ले सर्व दुख नाशक यह क्लेश अग्नि से हो गया अब शुभ शुभ का अर्थ है साधक के जीवन में परम मंगल परम आनंद का विधान यह नाम से प्रकट होता है श्री हरिवंश चंद्र शुभ नाम सब सुख सिंधु प्रेम रस धाम जाम घटी विसरे नहीं एक क्षण न मिसरो हर समय नाम जप करो यह महा शुभ प्रकाशित कर देगा शुभ

से क्या होता है जैसे क्लेश अग्नि से वासना पाप अविद्या का नाश प्रारब्ध के भोगने की सामर्थ आ गई शुभ से क्या होता है बोले शुभ सारी दैवी संपदा प्रकट कर देती है साधन भक्ति से विषय सुख ब्रह्म सुख परमेश्वर सुख यह सभी प्राप्त हो जाएगा आपको विषय सुख चाहिए तो भी साधन भक्ति करो आप देखो विषय सुख प्राप्त हो जाएगा ब्रह्म सुख प्राप्त हो जाएगा परमेश्वर सुख प्राप्त हो जाएगा और अगर इन सुखों की चाह ना करो तो प्रेम प्रकट हो जाएगा साधन भक्ति करते करते भाव प्रकट होता है भाव भक्ति तीन भेद उत्तमा भक्ति के पहला साधन फिर भाव फिर प्रेम साधन भक्ति भाव भक्ति प्रेम भक्ति साधन भक्ति में चकाचक आनंद में हो जाता है सारे क्लेश पाप वासना अविद्या नष्ट हो गई और सब शुभ संपदा प्रकाशित हो गई मंगल भवन भगवान की तरफ वृति संपूर्ण रूप से यह शुभ अब भाव भक्ति दो गुण प्रकाशित करती है साधन भक्ति दो प्रकाशित किए क्लेश अग्नि शुभ दयनी और भाव भक्ति दो गुण प्रकाशित किए मोक्ष लघुता कृत और सुदल भा क्लेश अग्नि और शुभ दयनी तो इसमें आ ही गए अपने

आप साधन भक्ति के लक्षण भाव भक्ति में तो समा ही गए क्लेश अग्नि शभ दनी पर इसमें मोक्ष लघुता कृत और सुदल भा बड़ा सुंदर इस भाव भक्ति में चार लक्षण हो गए क्लेश अग्नि सुभ दयनी मोक्ष लघुता कृत और सु दुर्लभा मोक्ष लघुता कृत इतना आनंद प्रकट होता है भाव में कि मोक्ष भी लघु लगने लगता है वो जब भाव प्रकट होगा भावो सवे भजता भाव प्रकट होगा तब आपको पता चलेगा कि मोक्ष सुख भी कड़वा लगने लगता है इसलिए प्रेमी महापुरुषों ने मोक्ष स्वीकार नहीं किया और सुदुर भा भगवान के उस सुदर्दी व्य रहस्य दिव्य दिव्य भाव उसके हृदय प्रकट होते हैं जो अन्य किसी साधन से नहीं प्रकट हो सकते तब उसमें महामहिम प्रेम लक्षणा भक्ति जागृत होती है अब प्रेम लक्षणा भक्ति में अपने दो गुण प्रकाशित हुए सांद्रानंद विशेष आत्मा पहला और दूसरा श्री कृष्णा आकर्षण यह दो गुण तो प्रेम लक्षणा भक्ति में छह गुण उपस्थित हो गए जो साधन भक्ति में क्लेश अगनी शभ दयनी और भाव भक्ति में मोक्ष लघुता कृत और सुदल भा यह तो प्रेम भक्ति में है ही और प्रेम भक्ति के अपने

दो मिल गए सांद्रानंद विशेष आत्मा और श्री कृष्णा कर्षण भक्ति छह लक्षणों से युक्त हो गई क्लेश अग्नि शुभदा मोक्ष लघुता कृत सु दुर्लभा सांद्रानंद विशेष आत्मा श्री कृष्णा कर्षण चसा क्लेश नाशिनी शुभ दयनी इस साधन भक्ति में हो गया मोक्ष लघुता कृत का तात्पर्य है धर्म अर्थ काम मोक्ष इस सब व्यर्थ नजर आने लगते हैं जब भाव प्रकट होता है श्रीमद राधा सुदा निधि में धर्मार्थ चतुष्टय विजय ताम किम तद ब्रथा वार्ता या धर्म अर्थ काम मोक्ष की बेकार की वार्ता हमारे सामने

कहते हो जगत में विजय रहे मेरे सामने जैसे भाव में डूबे हुए भरत जी महाराज कह रहे अर्थ न धर्म न काम रुचि गति न चाहो निर्वान जन्म जन्म रति राम पद यह वरदान नान तो मोक्ष लघुता कृत का तात्पर्य है सालोक सूप सामी सारि सायुज पांच प्रकार के मोक्ष का भी त्याग दिय मानम ग्रहण बिना मत से वनम जना धर्म अर्थ काम की तो बात जाने दो पांच प्रकार के मोक्ष का भी त्याग हो जाता है जब भाव भक्ति का प्रादुर्भाव होता है और सु दुर्लभा सब सिद्धियां बड़े-बड़े सुख बड़े-बड़े लाभ बड़े-बड़े रहस्य ये सब उसके सामने होते हैं जो भाव भक्ति में डूबा हुआ महापुरुष है परंतु अपनी भाव भक्ति की प्रधानता से शीघ्र उन सबको क्रॉस करके प्रेम में पहुंचने वाला है इसलिए किसी को स्वीकार नहीं करता सब कुछ निछावर कर देता है अपने प्रीतम के लिए और कृपा पर निर्भर हो जाता है तब उसके अंदर प्रेम लक्षणा भक्ति जागृत होती है और उसका गुण प्रकट होता सांद्रानंद विशेष आत्मा य सांद्रानंद विशेष आत्मा करोड़ों ब्रह्मानंद को भी इस प्रेमा अमृत के सामने नहीं गिनता

जिसके अंदर यह प्रेम लक्षणा भक्ति जागृत हो गई एक ब्रह्मा नंद क्या करोड़ों ब्रह्मानंद भी उस प्रेमानंद के सामने एक कण की तुलना के भी बराबर नहीं अपार अत्यंत महा प्रेम सुख उस भक्त को प्राप्त होता है जिसके अंदर प्रेम लक्षणा भक्ति जागृत हो जाती है और श्री कृष्णा आकर्षण बहुत जोर की महिमा इसमें उसके आराध्य देव उसके पीछे पीछे वसी भूत होकर घूमते प्रेम लक्षणा भक्ति से जो युक्त हो गया एकादशी स्कंद में भगवान ने स्वीकार किया श्रीमद् भागवत में कह रहे हैं कि निरपेक्ष मुनिम शांतम निर्वैर सम दर्शन अनु ब्रजा हम नित्यम पूजे रेण भी जो निरपेक्ष है किसी की अपेक्षा नहीं रखते मननशील है हर समय मेरा मनन करते रहते मुनि और शांतम जो हर द्वंद को शांत भाव से सह जाते हैं निरपेक्ष मुनि शांतम निर्वैर जिनका संसार में किसी से भी द्वेष नहीं सम दर्शन जो सब जगह मेरे को देखते हैं समता के भाव को प्राप्त हो गए ऐसे महात्माओं के पीछे मैं डोलता हूं कि उनकी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाए श्री कृष्णा कर्षण का अभिप्राय है कि ऐसे प्रेमी

भक्त के पीछे पीछे भगवान वसी भूत होकर डोलते हैं भक्तन पाछे यो फिरे जो बछरा संग गाय उपासक को उत्तमा भक्ति का अनुष्ठान करना चाहिए जिससे भगवत प्रेम का हृदय में प्रादुर्भाव होता है उत्तमा भक्ति के लिए साधन भक्ति अत्यंत अनिवार्य है और साधन भक्ति का स्वरूप श्री महामहिम दादू दयाल जी कह रहे हैं हम जीव ही आसरे सुमिरन के आधार दादू छट के हाथ सु तो हमको बार ना पार बड़े महापुरुषों ने कहा कि सुमिरन चल रहा तो हम जी रहे हैं अगर सुमिरन नहीं तो हमारी मृत्यु समझो परम महामहिम श्री नानक साहब जी की भी कि नाम है तो हम जीवित है नाम नहीं तो अगर नाम छूटा सुमिरन छूटा तो मानो हमारी मृत्यु हो गई हमारा जीवन ही नाम है य ऐसा उत्तमा भक्ति के लिए सुमिरन चाहिए उत्तमा भक्ति का साधन इस कोटि का चाहिए कि नाम है तो हम जीवित है नाम नहीं तो देवर्ष नारा जी कह रहे तद स्मरण परम व्याकुल ते हम परम व्याकुल हो जाए नाम छूट जाए तो यहां राग द्वेष नाना प्रकार के विकारों की धूम मची हुई है और उसको हटाने के लिए ना मैं उसको नहीं रहा साधक दादू

विषय विकार सो जब लग मन राता तब लग चीत ना आव त्रिभुवन पति दाता जब तक मन विषयों में लगा हुआ नाम जप नहीं कर रहे तो तुम्हारा चित्त त्रिभुवन पति भगवान में रति को प्राप्त नहीं हो सकता दादू अनिश सदा शरीर में हरि चिंत दिन जाई और प्रेम मगन लय लीन मन अंतर गति लोलाई शरीर में जब तक प्राण है तब तक हरि चिंत दिन जाए रात दिन हमारा प्रभु के चिंतन में जाए प्रेम मगन ल लीन मन अंत गति लो लाई अंतर ही अंदर अंदर ही अंदर चिंतन चल रहा प्रभु का निरंतर दादू आनंद आत्मा अविनाशी के साथ प्राण नाथ हृदय बसे तो सगल पदार्थ हाथ यदि तुम्हारा भगवत चिंतन चल रहा है परमानंद में प्रभु की अनुभूति हो रही है हृदय में तो क्या बकाया रह जाएगा य मारे घूम रहे जीव विश्वास नहीं कर रहे विश्वास नहीं हो रहा नाम पर विश्वास नहीं हो रहा भजन पर विश्वास नहीं हो रहा अंतर्गत हरि हरि करे तब मुख की हाजत नाही सहज धुनि लागी रहे दादू मन ही माही पहले मुख से शुरू करो नाम जप करना फिर उपांशु में आता है फिर मानसिक जब मानसिक आता है तब कोई समझाने की जरूरत

नहीं अपने आप आनंद में डूब जाओगे जियो घुन ला ग काट को लोहे ला गए काट काम किया घट जा जरा दादू बार बार जैसे गेहूं में घुन लग जाए तो ऊपर गेहूं दिखाई देगा लेकिन अंदर बेकार हो जाएगा लोहे को जैसे काटने वाला काट डालता है ऐसे ये वासना एं काट डालती है साधक को इसलिए वासना से बचने के लिए उपासना अ अनिवार्य है उपासना हर समय अपने आराध्य देव के समीप रहना कैसे चिंतन से रहना दादू कहे ज तू राखे साइया तो मार सके ना कोई बाल न बाका कर सके जो जग बैरी हो यदि नाम निरंतर चल रहा मेरा ईश्वर मेरा प्रीतम मेरी रक्षा कर रहा है तो काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ये बाल बाका भी नहीं कह सकते जे सिर सौ प्या राम को सोसर भया सनाथन दे रण भया जिसका तिस के हाथ प्रभु ने दिया था जीवन प्रभु को समर्पित कर दिया जो प्रभु को समर्पित कर दिया जिसका सर प्रभु के हाथ में कौन त्रिभुवन में ऐसा पैदा हुआ कि उसका बाल बाका भी कर सके हां प्रभु मंगल विधान करते रहते बड़े-बड़े भक्त जन जानते बाहरी लोग तो कहेंगे उनको कष्ट दिया गया उनको कष्ट दिया गया लेकिन

जिनको कष्ट दिया जा रहा उनको वह परमानंद है जो केवल उनका हृदय जानता है दूसरे नहीं जानते हैं इसलिए दादू जो साहब को भावे नहीं सो सब परि हरि प्राण मनसा वाचा कर्म ना जेत चतुर सुजान जो तुम्हारे इष्ट को अच्छा नहीं लगता व कभी मत करो यदि इष्ट के विपरीत करोगे तो धोखा ही मिलेगा जो उपासक अपने इष्ट के थोड़ा भी प्रतिकूल करेगा तो हृदय जलता रहता है जो साब को भावे नहीं सो सब परिहर प्राण संतों से इसीलिए सुना जाता है कि उनका अनुभव भी होता है किसी साधक से कह रहे थे कि तुम्हें सिद्धावत प्राप्त करने के लिए कोई विशिष्ट साधना नहीं करनी क्योंकि जैसे बट वृक्ष की छाया में बैठे हुए को धूप नहीं लग सकती ऐसे गुरु कृपा पात्र को माया नहीं सता सकती बस तुम एक आज्ञा का पालन करो असंग रहो शरीर से असंग रहो और मन से भी असंग रहो अपने आप सिद्ध हो जाओगे अपने आप भगवत प्राप्त हो जाओगे जो गुरुजनों के वचनों को मान ले तो सिद्धि गुरुजनों के वचनों में होती है मोक्ष मूलम गुरु कृपा समझो पहले मोक्ष मूलम गुरु कृपा ए तुम ऐसा करो तुम्हारा काम

हो जाएगा बोला ऐसा करने से काम कैसे हो सकता है खत्म खेल गए तुम ऐसा करो काम वह पक्का हो जाएगा पक्का हो जाएगा बिना पढ़े चारों वेद प्रकाशित हो गए ऐसा कैसे हो सकता है यह गुरु कृपा गाय चराने को आदेश कर दिया गाय चराते ही ब्रह्म प्राप्त हो गए दादू जो साहब को भावे नहीं सो बाट न बूझ रे जब लगय मन नहीं ये मन चंचल है ना साहब कहते इस गली चलो वो नहीं वो इस गली चलेगा अरे वो रास्ता नहीं चलना जिसमें हमारे साहब का आदेश नहीं साहब हमारे गुरुदेव साहब हमारे ठाकुर जी है

ये शास्त्र हमारे साहब है जो आज्ञा कर रहे हैं हमको वैसे चलना है साई सो सन्मुख रहे इस मन स जूझ रे मन से लड़ना पड़ेगा जो मन से लड़ गया वही बहादुर दूसरे को पटक देने वाले तो आपको मिल जाएंगे लेकिन मन को पटक दे ऐसे मिलने कठिन है मन की पटकी खाने वाले तो करोड़ों अरबों मिलेंगे लेकिन मन को पटक दे ऐसा कुरा कोई गुरु का चेला मिलेगा गुरु मेहरवान तो यह चेला पहलवान अब पटक देगा अपने मन को युक्ति पा गया ना जिसको गुरु का सहयोग मिल गया व माया पर विजयन प्राप्त कर ले उसका कारण उसका कोई मनो आग्रह है कुछ पकड़े है अगर पकड़ छोड़ दे और गुरु के सहारे ऐसे हो जाए तो नैया पाद एक बोर्ड लिए खड़े थे जब आ रहे थे कह थे दरिया भी तेरी लहर भी तेरी नैया भी तेरी और खिवैया भी तेरी अब क्या मुझे परेशानी दरिया भी जहां डूबने का ब वो भी तू है तेरी है लहर भी तेरी है डूबने वाली और खिवैया भी तू है नैया भी तू अब मेरे को क्या परवाह बिल्कुल परम सत्य वही दरिया है वही लहर है वही नैया है वही खिवैया है बस समझ जा और पैर पकड़ ले हरि का आश्रय

मामे प्रपद्यंते माया में ताम तरते दादू जो साहब को भावे नहीं सो बाट ना बूझ रे साई सो सन्मुख र इस मन सो जूझ रे मन से लड़ना पड़ेगा अगर गुरुमानी हो गए तो माया मुक्त हो गए मन मानी हो गए तो माया में फस गए अपने साहब को जो ना भावे वह नहीं करना चाहिए नहीं भोगो ग देखो एक प्रश्न किया परसों कि जब महापुरुष होते हैं तब यह माया समझने क्यों नहीं देती कि महापुरुष है ऐसा क्यों होता है जब होते हैं तब समझने नहीं होते जब बाद में चरित्र पढ़ते तब लगता है यार बहुत बड़ी निधि थे चले गए हम वर्तमान में दुर्योधन भी नहीं समझ पाया भगवान श्री कृष्ण को क्योंकि वह स्वयं ऐसे लीला बिहारी रचना रचते हैं कि समझ ना पावे बड़े-बड़े सिद्धों में ऐसी लीलाएं रही है कि लगता था कि ऐसा कैसे हो सकता है इछावर य फतेहपुर जिला में है जब भ्रमण कर रहे थे यह यमुना के किनारे पड़ता है तो वहां कुछ दिन रुके तो इधर बंदौर है इधर इछावर है इछावर में फक्कड़ स्वामी रहते थे फक्कड़ स्वामी उनको फक्कड़ कहते ही थे फक्कड़ किसे कहते हैं फिकर फार नहीं करे ता को

नाम फकीर निश्चिंत महात्मा जिसमें चाह मिटी चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह उनको कहते फक्कड़ महात्मा कोई फिकर नहीं कोई चिंता नहीं बस एक लंगोटी पर रहते थे और 1000 गुरिया का माला रखते थे रुद्राक्ष का मोटा वाला और गांव के लोग जब कोई भक्ति से उनके पास बाहरी जाना चाहता तो पहले ही लगे थे कह देते हाथ जोड़ते मत जाओ हमारे स्वामी जी को आप एक शब्द नहीं बोलेंगे अगर जाना है तो जाओ तुम्हें किस तरह स्वागत करेंगे भगवान जाने पर आप बोलने की हिम्मत नहीं रखते अगर उनका अपमान करोगे तो हम खड़े हम लोग आप जाओ मत हम पहले आपसे बता रहे और वह बड़े अलबेले महात्मा थे लाखों की कामनाएं सिद्ध कर दी वह सिद्ध महापुरुष थे पर सिद्ध करना उनका बहुत विचित्र था एक पुलिस विभाग के बड़े अधिकारी थे उनके संतान नहीं हो रही थी सुना फक्कड़ बाबा के पास समस्त कामनाएं पूर्ण हो जाती तो पूरे अपने लाभ लस्कर के साथ गांव के लोग पलेही लगे रहते बाहर दूर उनको भी नजदीक नहीं रहने देते फक्कड़ स्वामी दूर से उन्होने कहा साहब हाथ जोड़ते मत जाओ बो नहीं हम तो बड़ी

श्रद्धा से जा रहे बोले वहां श्रद्धा की पूजा नहीं होती वहां दूसरी श्रद्धा चलेगी बोले जो कुछ होगा सहेंगे बोले साहब हम बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे अगर हमारे स्वामी जी को आप कुछ बोले बोले कुछ नहीं बोलेंगे जो तो अस्थि मात्र हुए रहे शरीरा ऐसे थे जोही दृष्टि गई शस्त्र नाम की तरह गालियां शुरू कर दी अद्भुत यह बड़ी विचित्र गति इसीलिए बाद में ऐसे अब व तो सत्संगी होंगे तभी इतना सहनशील थे नजदीक गए कहा स्वामी जी हर उपाय करके देख लिया है संतान नहीं हो रही संतान के बिना हमें अपना जीवन व्यर्थ लग रहा है पत्नी बगल में उका प्रणाम करो अब अब गाली नहीं दे रहे थे अब शांत हो चुके थे हजार गुरिया वाला रुद्राक्ष उठाया माया मोटा मारा उनकी पत्नी के तो ऐसे पूरा रुद्राक्ष ऐसे अब वो चीख पड़े गांव के लोग बिल्कुल अलर्ट खड़े रहते क्योंकि उनका व्यवहार ऐसा था कि हर एक बर्दाश्त नहीं कर सकता पर बहुत गंभीर थे ऐसे ही खड़े रहे उने कहा जा जब हो जाए नाया संतो का भंडारा कर दे ऐसे सिद्ध पुरुष बड़े-बड़े महापुरुषों ने जो चेष्टा की उनको उस

समय समझ पाला कि यह साक्षात श्री भगवान है बड़ा मुश्किल है बड़ा मुश्किल है और जब व पधार जाते उनके जब चरित्र लिखे जाते तब समझ में आता है कि यह तो ऐसी बड़ी निधि जब लग ये मन थिर नहीं तब लगी परस न होई दादू मनवा थिर भया सहज मिला सोई वो यही बैठा है परमात्मा आप में बैठा है आपके समीप बैठा है आपके आसपास है आपका मन विश्वास कर ले आपका मन थिर हो जाए आपका मन प्रेम से युक्त हो जाए अभी भगवत साक्षात्कार कहीं दूर नहीं है ते समाज गिरजा में रहे अवसर पाए वचन कहु हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम से प्रकट होए मैं जाना जब प्रथम गुरुदेव भगवान दो वर्ष के बाद अंत ध्यान हुए तब जो घाटा लगा उसकी पूर्ति वृंदावन में आकर के श्री जी ने की गुरुदेव भगवान पुनाई स् रूप में मिले नहीं तो जो हृदय पूरा जलता रहा उसको कैसे बताए गुरु की छाया में रहने वाला उपासक कैसा निर्विघ्न होता है और जब छाया हटती है तो पूरी धूप सहनी पड़ती है और उस धूप को सहकर माया की कोई आगे निकल जाए कोई विरला ही होता है इसलिए धन्य भाग है जो गुरु छत्र छाया में है

इसलिए साहब की आज्ञा से चले मन से लड़ाई लड़े मन मानी कोई भी आचरण ना करे कहा हमारा मान मन पापी परिहर काम विषयों का संग छोड़ दे दादू मिल है राम ऐ मन पापी अब मेरा कहा मान दे ये विषयों का संग छोड़ दे विषय पुरुषों का संग छोड़ दे देख तुझे भगवान मिल जाएंगे भगवान की प्राप्ति कठिन नहीं है विषयों का राग छोड़ना बड़ा कठिन है मन की चाल को रोक पाना बड़ा कठिन है श्री चरण दास जी महाराज जिन्हें हरि भक्ति प्यारी हो माता पिता सहज छुटी जावे छुटे सुत अरु नारी हो देखो यहां छूटने का मतलब राग से है राग छोड़ने से मतलब परिवार में रहते हुए सब में भगवत भाव हो जाए तो हरि भक्ति और परिवार छोड़कर चाहे जहां भाग के जाओ नया परिवार बन जाता है अगर राग है तो शिष्य राग से भी दुर्गति हो जाएगी शिष्य राग से भी दुर्गति हो जाएगी एक सिद्ध संत जा रहे थे उनके साथ कई शिष्य थे तो एक केचुआ केचुआ समझते हैं ना जो मिट्टी खाता है बहुत कोमल शरीर वाला होता है और लाल चीटी उसमें लाखों चिपटी हुई थी तो शिष्य खड़े हो गए और गुरु जी से कहा गुरु जी

कितना भयानक कष्ट इस जीव को क्योंकि यह चीटी जब काटती है तो मनुष्य शरीर में भी बहुत पीड़ा होती है और एक दाग बन जाता है लाल लाल और देखो कितना कोमल शरीर कछुआ का लाखों चीटी है बोले मैं ध्यान के द्वारा देखकर कह रहा हूं पूर्व जन्म में गुरु जी थे केचुआ जी और ये जितने सब चेला जी हैं ये सब पीड़ा पहुंचा रहे हैं क्योंकि इन्होंने थग करके इनसे अर्थ का शोषण किया था और इन्होंने विवेक पूर्वक गुरु नहीं बनाया था तो दोनों की दुर्गति हो गई ये चीटी बनकर गुरु जी को नोच

रहे हैं गुरु जी कछुआ बन करर के बहुत होश में यदि भगवत मार्ग विमुख विषय चिंतन विषय क्रिया विषय विचार से युक्त हो तो भगवान की प्राप्ति नहीं दुर्गति प्राप्ति है और यहां कह रहे हैं कि यदि भगवान के चरणारविंद की भक्ति में तुम्हारा चित्त है तो कहीं राग नहीं रह जाएगा राग बहुत खतरनाक है यह विष है राग राग बहुत बड़ा विष है क्योंकि जहां प्रतिकूलता त द्वेष हो गया राग और द्वेष यही जन्म मरण का बंधन राग द्वेष दोनों खोए तब खोजिए पद निर्वाण जब भक्ति का रंग लगता है तो लोक भोग फीके लगे सम स्तुति गारी हो हानि लाभ नहीं चाहिए सब आशा हारी हो कोई भी आशा जब तक हृदय में है तब तक भक्ति का रंग नहीं आया केवल एक आशा प्रभु की प्रभु से नहीं प्रभु की आशा प्रभु से आशा भोगों की प्रभु से आशा कल्याण की भी नहीं केवल प्रभु की आशा तब प्रेम लक्षणा भक्ति ना हान की परवाह है ना लाभ का सुख है ना किसी लोक के भोग की आशा है जग सु मुख मोरे रहे करे मुरारी ध्यान हो जित मनवा लागो रहे भय घट उजियारी हो गुरु सुखदेव बताया प्रेमी गति भ हो चरण

दास चारो वेद सु और कछु न्यारी हो मन मारे तन बस करे साधे सकल शरीर फिकर फारी कफनी करे ता को नाम फकीर वही भक्त है कोई फिक्र नहीं कोई चिंता नहीं श्री गुरुदेव के बताए हुए मार्ग पर चलकर निरंतर भगवत आराधना में तन्मय है मनुष्य जीवन का परम लाभ उत्तम प्रेम लक्षणा भक्ति उत्तम प्रेम लक्षणा भक्ति का सरल शब्दों में निरंतर अपने प्रभु में चित्त जोड़े रहना जैसे बने वैसे कर लो गा के रो के हंस के जैसे बने वैसे चित्त को प्रभु में जोड़े रहो यही सर्वोपरि साधना है और गृहस्थ में हो तो अपनी पत्नी से केवल भाव वह भी संयम पूर्वक और भगवान की प्राप्ति के लिए सबसे ज्यादा दुश्मन है ये काम भाव बस इसी से लड़ना है सब इसी से मिट जाएंगे इसलिए पहले रखा है काम काम क्रोध फिर लोभ मोह मद मत्सर ऐसे रखा गया है पहला मिटा कि सब मिट जाएंगे पहले काम को मिटाना है जो भक्ति या ज्ञान या योग में जाना चाहता है सबसे पहले इस काम को मिटाना है काम को वही मिटा सकता है जब इसका चिंतन छूटे इसका चिंतन छोड़ने का तात्पर्य है निरंतर प्रभु का चिंतन

करना इसीलिए हम कहते हैं राधा राधा राधा राधा हर समय नाम जप करते रहो सत्संग सुनो मनन करो उसको आचरण में उतारो इसी जन्म में भगवत प्राप्त हो जाओ निहाल हो जाओगे शेष चर्चा आ ग श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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