जीवन में Stress क्यों होता है, मूल कारण और बचने का उपाय !
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
आदित्य भरद्वाज जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी जीवन में तनाव होने का मूल कारण क्या है उसे पहचानना कैसे अज्ञान अज्ञान भ्रम उसी अज्ञान भ्रम से हमारे अंदर कामनाएं उत्पन्न होती हैं और जब कामनाओं की पूर्ति नहीं होती तो हमारे अंदर असंतुष्ट आती है हमारे कामा सं जाते क्रोधा हमारी बुद्धि मलिन होने लगती है कामनाओं की पूर्ति में भी लोभ जागृत होता है और भोगने की इच्छा जागृत होती कामना की पूर्ति में बाधा पड़ने पर क्रोध जागृत होता है क्रोध हमारी स्मृति को छिनता है स्मृति में मढ़ता आते बुद्धि नष्ट हो जाती है बस वो तनाव जिसे डिप्रेशन कहते हैं ना तो डिप्रेशन होना शुरू हो जाता है विषय विषयों का जो चिंतन है यही नाश की जड़ है अज्ञान के कारण हमको ऐसा लगता है कि यद हमें मनमानी विषय भोगने को मिल जाए तो सुखी हो जाए देखो हमें जो धन प्रिय है ना वो धन नहीं प्रिय है धन से विषय मिलते हैं इसलिए प्रिय है अगर रुपया प्रिय हो तो उसकी कोई खास बात है रुपया प्रिय नहीं रुपया से सामग्री मिलती है हम जो चाहे वो भोग सकते हैं
जहां चाहे जा सकते हैं रुपए का प्रयोग प्रिय है इसलिए रुपए की मान्यता है अब वो प्रयोग क्यों प्रिय है क्योंकि मन और इंद्रिया उसे अच्छा मानते हैं यह भोग लू यह देख लू ये छू लू तो मन और इंद्रिया जिनके पास ये सब भोग हैं उनके क्यों नहीं तृप्त हो गए मान लो आपने पास तो है नहीं लेकिन व चीज किसी के पास है वो क्यों नहीं तृप्त हो गया तो इसका मतलब है कि हमको ड्रामे में फसाया गया अज्ञान में फसाया जा रहा है बार-बार भोगो बार-बार देखो देखो इस संसार का सबसे बड़ा सुख
कहां निहित किया गया है निहित माने स्थापित किया गया है आप दिमाग में अपने ढूंढो दिमाग में ढूंढ के जब आओगे तो इंद्री भोग केवल सबसे बड़ा सुख है आप देख लो सब अपने दिमाग में देखो मैं पढ़ लिख कर के अच्छा नौकरी करूं या व्यापार करूं खूब धन कमाऊ धन कमाकर मकान बनाऊं और सुंदर ब्याह करूं खूब खाने पीने की सामग्री हो बढ़िया हमारे पास मित्र हो जो हमारी अर्धांगिनी हो मन मानी जो मैं चाहूं वैसा भोग लेकिन यह सब है किसी के पास जैसा तुम सोच रहे हो इससे भी अच्छा है किसी के पास लेकिन वोह भी तृप्त नहीं है विडंबना है कि जिस शरीर को देखकर तुम चाहते हो ऐसा हो तो मैं सुखी हो जाऊं उसी को कोई भोग रहा है और वह उधर से निरपेक्ष व किसी तीसरे की तरफ देख रहा है और वह तीसरा जिसके ऊपर वह चौथे की तरफ देख रहा है यह है क्या बड़ा सूक्ष्म विषय है अगर इसको देखा जाए तो य है क्या बोले अज्ञान ये सबका मूल जड़ अज्ञान है जिसमें हम थस रहे हैं जिस हमारे को अब निकलना होगा वह निकलने के लिए अध्यात्म है अध्यात्म ही निकाल सकता है अन्यथा बहुत
बुरी तरह से अपने लोग दलदल में फंस गए दलदल में नहीं मन डरता है अगर छोड़ने की बात सोच लो तो मन भयभीत हो जाता है ऐसा लगता फ संसार में रह क्या गया अब देखो हम लोग जो बात जानते हैं व तुम्हारे मन से मन मिलाकर जानते हैं जैसे थोड़ी देर के लिए हमने आपसे मन मिला दिया अब आपके में जो चल रहा है वो हमारे तो तुम्हें लगेगा ये तो मेरे मन की बात बता रहे हैं वो सारी सृष्टि के मन की बात है अगर आपसे कहा जाए कि यह झूठा है आप इसे छोड़ दो तो छोड़ने की बात सोचने मात्र से लगता है फिर तो हम मर गए जीवन ही किस काम का इसी में पूरा जीवन निकल जाता है और उसे विश्राम नहीं मिल पाता है हम कह रहे हैं भोगो लेकिन धर्म पूर्वक भोगो धर्म उसे एक सीमा में बांध दिया गया है धर्म एक सीमा में बांध देता है तुम्हें यह खाना है तुम्हें यह पीना है तुम्हारी पत्नी तुम्हारा ऐसा तुम इस सीमा में रहो नाम जप करो और धर्म को भोगो तो निकल जाओगे फसो ग नहीं लेकिन आप गौर से देखिए ईमानदारी से वृंदावन की भूमि में बैठे हो क्या मन सीमा में राजी है ईमानदारी
से देख लीजिए मन को नवम नवम चाहिए भाई नवम नवम और यह इसीलिए पाप कर बैठता है चाहे जितना पैसा लगे नवम नवम आप हमारी बात को अंदर से समझ लीजिए अब इसी अज्ञान की धरा से हमारी दुर्गति होती चली गई और नवम नवम असली में है तो भगवान है जिनकी नयो नेह नव रंग नयो रस नवल श्याम ब्रस भानु किशोरी नव पीतांबर नवल चूनरी नई नई बूंदन भीज गोरी नव वृंदावन हरित मनोहर नव चातक सब नवीन सब नवीन और उष नवीन में आ तो तृप्त हो गया जी मन विश्राम बिना भगवान के नहीं मिलेगा इसलिए हम सबसे
प्रार्थना करते हैं कि थोड़ी हमारी बात मान कर के पहले गंदे दृश्य देखना बंद करो गंदी बातें बोलना बंद करो गंदी क्रियाएं करना बंद करो तब तुम्हारे गंदे विचार छूट जाएंगे और गंदे विचार छूटे पॉजिटिव हुए कि हर परिस्थिति में आप आनंदित रहोगे परिस्थिति हमें दुख नहीं दे सकती यदि हमारे विचार सही है जिसे सुख चाहिए उसे कष्ट होता है और जो सुख में स्थित है उसको कष्ट क्या पहुंचाए थोड़ी सी दवा इतनी सुन्न वाली कष्ट को नहीं होने देती और चित्त भगवान में जोड़ दो कष्ट होगा बड़े से बड़े कष्ट को हंस के सा आ जाता है तो बच्चा डिप्रेशन क्यों दिमाग में भार क्यों क्योंकि वह अहंकारी अज्ञानी जीव भगवान से परिचय नहीं प्राप्त किया अध्यात्म को नहीं जाना इसलिए दुखी हो र नहीं बोलो चिंतन की क्या परेशानी है तुम्हारा दिमाग स्वस्थ हो शरीर स्वस्थ हो तो कोई फर्क नहीं भगवान का भरोसा अध्यात्म बल जब तक जागृत नहीं होगा तब तक विश्राम नहीं मिलना किसी को क्यों चिंता करते हो अगर आप चिंतन करने लगो नाम जप करने लगो सत शास्त्रों का स्वाध्याय
करो माता-पिता बड़े बूढ़ों की सेवा करो समाज को सुख पहुंचाओ अभी आप प्रसन्न होने लगोगे अब इतना सोच सोच कर अपने सुख के विषय में हम आज सत्संग में कहते सबसे ज्यादा जीव परेशान है ओवर थिंकिंग परेशानी सबसे ज्यादा है सामने भोजन रखा है खाकर उस उसका आनंद नहीं ले रहा परसों क्या होगा कल क्या होगा आज जो अभी इसका स्वाद तो ले इसका तो वो तो गया है वो तो परसों के लिए परेशान है ओवरथिंकिंग में परेशान है हम कह रहे हैं जिसने आज संवारा है वो कल भी संवा रेगा वो परसों पर उससे तुम्हारा अपना पल नहीं परिचय नहीं इसलिए तुम परेशान हो रहे हो
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- किसी को कोई बात समझाने पर वो न समझे तो क्रोध आ जाता है — शशांक वर्मा जी मुजफ्फरनगर से राधे-राधे श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी ऐसा कई बार होता है कि किसी को अपनी बात समझाते हुए…
- स्वर्ग में वो कौन-सा सुख है, जो धरती पर भी नहीं है? — पारस कोहली जी नई दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सुख और दुख एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। मेरा प्रश्न यह है कि वह कौन सा सुख स्वर्ग में है…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1401 — विक्रम पांडे जी मिर्जापुर से श्री हरिवंश महाराज जी राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी आपका सत्संग सुनता हूं और कृपा का अनुभव है महाराज जी…
- संत भगवान के प्रश्न पर महाराज जी ने साधना जीवन के लिए क्या उपदेश दिया? — महाराज जी कुछ हम लोगों को आप बता दें कि जैसे साधना जीवन में क्या कैसे कुछ भी आप अपने मुखारविंद से कुछ सब बातों की केवल एक ही बात है ना विषय चिंतन होने पावे ना विषय क्रिया बस…
- परिवार में नकारात्मकता व कलह हो तो क्या करें? — एसवी चतुर्वेदी जी दिल्ली से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी परिवार में नकारात्मकता हो घर में कलह हो रही हो गृह युद्ध जैसी परिस्थिति बन रही हो तो अध्यात्म के रास्ते पर…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1400 — संजीव मुखर्जी शेयर इवें राधे-राधे महाराज आईआईटी धनबाद से महाराज जी कृपया मुझे बताइए कि मैं कैसे कम बोलूं अधिक सुनूं बोलते समय नरम रहूं दूसरों को अपनी बात रखने का मौका दूं फिर…