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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #611 · 14 जुलाई 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

जति जी भोपाल से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी जब भी हम कीर्तन सत्संग और मंदिर या पाठ में होते हैं तभी हमारा मन दूसरी जगह पर क्यों भटकता है और बुरे ऐसा नहीं उस समय आप एकाग्र होते हैं इसलिए जान पाते हैं और समय आप मन के साथ विचरण करते इसलिए जान नहीं पाते जब आप भजन में होते मंदिर में होते पाठ में होते तब आप मन से अलग होकर परमात्मा में लगना चाहते हैं इसलिए आप पकड़ पाते हैं कि आपका मन चला गया और जब आप भजन में नहीं होते तो मन के साथ होते इसलिए पकड़े कौन चोर के साथ चोर मिला हुआ है तो फिर पकड़े कैसे पकड़े तो जब जब उससे अलग हटकर जब आप भजन में होते हो और फिर भागता है तब आप पकड़ पाते हो जब आप पाठ में होते हो या भगवत चिंतन में होते हो फिर मन भागता है तब आप पकड़ पाते हो भागता तो हर समय है लेकिन जिस समय आप भजन में नहीं होते उस समय आप उसके साथ होते हो यह विषय पुरुष यह जो धर्म विरुद्ध आचरण करें उनको पता थोड़ी है कि हमारा मन हमारे साथ धोखेबाजी कर रहा है वह तो मन जैसा कह

रहा है वैसा कर रहे हैं बड़े मौज का अनुभव करते हैं कि जैसा हम मन में आता है वह खाते हैं व पीते हैं व करते हैं यार हम परम स्वतंत्र हैं व मन के तदा आत्म में है और जब आप भजन में लगते हो तब उस मन से कूड़ा करकट निकलता है तो गंदी-गंदी बातें बाहर निकलती हैं आपको लगता है इस समय मन गंदी गंदी बातें क्यों सोचता है सोचता नहीं जैसे झाड़ू लगती है अब यहां गंदगी नहीं दिखाई दे रही लेकिन अभी हटाया जाए और सोनी लगाया जाए तो कूड़ा निकलेगा पोछा लगाया जाए तो गंदा हो जाएगा कपड़ा तो ये नाम जप है ये जो अध्यात्म है ये मन को निर्मल करता है तो जब हम भजन में लगते हैं तो हमारे अंदर की मन की गंदगी निकलती है और उस समय मन जब भागता है तो हम चूंकि एकाग्र हो रहे हैं तो हमारी पकड़ में आ जाता है और जब हम विषयों में ही खेलते होते हैं तो मन को पकड़ नहीं पाते हैं भजन करने से मन की गंदगी निकलती तो जब हम भजन में बैठेंगे तो आप देखना उस समय वो गंदी बातें जो है निकल रही तो साधक ना जानने के कारण परेशान हो जाता है हम उसको बिल्कुल

आधुनिक शब्दों में समझाया कि जैसे हमें कोई मैसेज डिलीट करना है तुम्हारे सामने आएगा ना सामने ही तो आता है ना तभी तो हम उसको डिलीट करते हैं ऐसे ही हमारे मन में ये बहुत पुरानी चिप है बहुत जन्मों के भरे हुए हैं काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर तो हो सकता है कि एक करोड़ बार वही काम की वृत्ति की मैसेज आवे एक डिलीट किया फिर वही काम फिर वही डिलीट करो फिर वही काम तो दसव वर्ष भजन करने पर वही बार-बार वृत्ति वही बार-बार वृत्ति आती साधक समझ नहीं पाता कि बार-बार वही वृत्ति क्यों आती है वो वृत्ति नहीं है दश हजार बार हमारे द्वारा वही क्रियाएं हुई हैं अनेक जन्मों में वह सब भरा हुआ है मन में संस्कार धीरे धीरे धीरे धीरे जब भजन करते करते शांत जहां निर्मल मन हुआ तहां भगवान का साक्षात्कार हो जाता है अभी तो बहुत कूड़ा करकट भरा हुआ है बहुत भरा हुआ है काम के क्रोध के लोभ के मोह के मद के मत्सर के ना जाने कितने हमारी स्फर वासना हैं वो भजन के द्वारा धीरे-धीरे शांत होती है नष्ट होती है तो उपासक विचलित ना हो उस समय धैर्य

पूर्वक लगा रहे कि अब ये नष्ट हो रहे हैं और नाम जप में मन लगे ना लगे तुम चिंता ना करो जैसे अग्नि को भाव से छुओ या गुस्सा हो के छुओ या कोई दूसरा छुआ दे या भूल से छू जाए वो जला देगी क्योंकि उसमें दहि का शक्ति है ऐसे ही भगवान के नाम में तारण शक्ति है आनंद शक्ति है चाहे भाव से जपो चाहे इसीलिए गोस्वामी जी ने लिखा है भाव कु भाव अनख आलस हो नाम जपत मंगल दिसि दस चाहे भाव से जपो चाहे कु भाव से जपो वो आपके पापों का नाश करके आपको आनंद प्रदान करेगी पर हमें बहुत काल तक सातु दीर्घ काल निरंतर सत्कार सेवित दृढ़ भूमि हम दीर्घ काल तक सम्मान पूर्वक निरंतर नाम जपने का अभ्यास करें तो बहुत जल्दी आनंद की प्राप्ति हो जाए मन जब तक इसमें गंदगी रहती तब तक चंचल रहता है और जहां मन की ये वासना हटी तो मन निर्मल और शांत हो जाता है निर्मल और शांत मन ही भगवत साक्षात्कार करता है निर्मल और शांत मन ही आनंद प्रकट करता है अशांत और चंचल मन हमारे हृदय में दुख चिंता शोक भय यह प्रकट करता है इसलिए हमें धैर्य पूर्वक नाम जपना चाहिए

मन की भागा दौड़ मिट जाएगी आप खूब जपि आप उसमें परेशान मत होइए बिना आपके दसक किए मन कुछ कर नहीं सकता वह तभी करता है जब आप उससे मिल जाते हैं आप मत मिलिए वह गलत सलाह दे रहा है आप मत मिलिए अपने आप व स्पूर्ण आएगी शांत हो जाएगी आपका बिगाड़ नहीं पाए मन कह रहा है इनकी जेब से ₹ लो हम क नहीं क्या कर पाएगा वो हमारे बिना वो जा जब तक हम स्वीकृति नहीं देंगे तब तक शरीर कोई हलचल नहीं पैदा करेगा बस इतना ही संभालना है पर हम लोग मन को इतना प्यार करते हैं कि वह कहता है ऐसा तो हम वैसे ही करने लगते हैं जितनी जेल भरी ना इस सब मन की सलाह में ही भरी है मन ने अनुमति दे दी और हम उसके सहयोग में हो गए हमारी दुर्गति हो गई और वही बन फी जलाता है कि यार बहुत गलत हो गया अगर ना मा ये बात मानता तो आज जेल में ना होता फिर वो रोता है तो हमें लगता है पहले से सत्संग के द्वारा शास्त्र स्वाध्याय के द्वारा हम अपने मन को कंट्रोल करना सीखें अगर मन कंट्रोल हो गया तो सब बात बन गई जितना दुख है इसी मन के द्वारा दिया हुआ है जितनी गंदी बात

है इसी मन के द्वारा फेंकी हुई है हम इसी को सुधार ले मन निर्मल वसे गांव की भाषा में कहते हैं मन चंगा तो कठौती में गंगा ले कहते अगर तुम्हारा मन पवित्र है तो कहीं जाने की जरूरत नहीं है और मन अपवित्र तो कहीं चले जाओ व सब जगह पवित्रता ही फेंके का इसलिए मन को पवित्र करने के लिए हम बार-बार इसलिए हमारे हर उत्तर में नाम जप जरूर होगा आप नाम जप कीजिए नाम जप कीजिए क्योंकि नाम ही सर्व पापों का नाश करके आपको पवित्र करेगा ये कलिकाल है यहां दूसरा साधन नहीं होने वाला ओम ध्यान यज्ञ ये सब अब नहीं होने वाला बहुत इस समय और किसी साधना से सिद्धि नहीं प्राप्त होगी एक मात्र भगवान का नाम है ये कलिकाल मला यतन मन कर देखि विचार श्री रघुनाथ नाम में ना नाना आधार एक मात्र भगवान का नाम जप करो सब मंगल हो जाएगा राज चुक जी इंदौर से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी सब्र और संतोष कैसे प्राप्त करें जब तक भगवान का आश्रय नहीं होगा तब तक नहीं हो सकता किसी व्यक्ति वस्तु स्थान के आश्रय से संतोष नहीं होता अगर 100 की चाहत है

100 मिल जाए तो हजार की चाहत हो जाएगी हजार मिल जाए तो लाख की चाहत लाख मिल जाए तो करोड़ की चाहत रुपए से संतोष नहीं हो सकता किसी व्यक्ति के भरोसे से धैर्य नहीं हो सकता क्योंकि वह सीमित बल वाला सीमित विचार वाला सीमित देह वाला हम आपको आपको धैर्य और विश्वास दिला दे सा असीम बल वाला सर्वत्र व्याप्त सर्वशक्तिमान जब तक भगवान का आश्रय नहीं लिया जाता तब तक हमारा धैर्य और हमारा संतोष जागृत नहीं होता भारी से भारी कष्ट में भी धैर्य रहता है भगवान हमारे साथ है भगवान है ना संभाल देंगे वो सब संभाल देंगे हमारा दृढ़ विश्वास भगवान के चरणों में हो भक्ति हो तो धैर्य और संतोष आ जाए हर परिस्थिति में संतोष रहेगा कब कहो या रह नि रहो श्री रघुनाथ कृपालु कृपा ते साधु स्वभाव गंगो जथा लाभ संतोष सदा काहो सो कछु ना चाहो आया ना संतोष सदा बिन संतोष न काम न साही अछत काम सुख सपन नाही ये संतोष धन तब आता है जब भगवान का भरोसा हो जाता है सब धन धूरी समान इनका कोई महत्व नहीं जब आवे संतोष धन यह सबसे बड़ा धन है संतोष से ही कामनाओं

का नाश होता है और जिसकी कामनाएं शांत हो गई वही महापुरुष है वही भगवान को प्राप्त कर लेता है वही परमानंद को यहां सब कामनाओं में परेशान है देखो कामनाओं का जाल बछा ये हो जाए ये हो जाए ये हो जाए और तोष आएगा शांति आ जाएगी यह भगवान से आएगी किसी व्यक्ति वस्तु स्थान से नहीं आती चाहे जितना बड़ा पद हो उसे संतोष नहीं उसे शांति नहीं वह तुम्हारे सामने दिखाई देगा बहुत सुखी है लेकिन जब हम लोगों से मिलते हैं तब पता चलता है और शास्त्र सम्मत है कभी भोगों से किसी को

संतोष नहीं हुआ कभी भोगों से शांति नहीं त्यागा शांति अंतरम त्याग में शांति है भगवान से संतोष है जिसके प्राप्त कर लेने के बाद कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रहता वह भगवान है भगवान का जब बल होता तब धैर्य होता है ठीक है अभी भगवान की इच्छा से विपत्ति है लेकिन कल संपत्ति भी हो जाएगी उनकी क तो हमारा धैर्य जब हमारा भगवान से संबंध नहीं रहता तो हम विचलित हो जाते अब क्या होगा अब तो हम मर गए अब तो हमारा सब कुछ बिगड़ गया तभी लोग फिर शरीर नष्ट करने लगते हैं धैर्य छूट जाता है छोटी-छोटी बातों में लोग अपने शरीर का नाश कर ले जैसे एक विद्यार्थी फे हो गया एक खिलाड़ी हार गया कई तरह के हैं हर प्रयास करने के बाद नौकरी नहीं लग रही नौकरी लगते लगते भी नहीं लग पाई मतलब बहुत सी समस्या है नौकरी लग गई सब कुछ हो गया बढ़िया ब्याह हो गया लेकिन संबंध सही नहीं हुआ अ पूरा शांति बिना भगवान के भजन के पाप नष्ट नहीं होता और जब तक पाप रहता है तब तक कामनाएं अशांति दुख बना रहता है व अशांत स्य का कुता सुखम जिसका चित्त ही अशांत है कहां

सुख मिल सकता है बहुत सावधान इसीलिए अध्यात्म के बिना मृत जीवन है मरा हुआ जीवन है संसार जीवन कोई जीवन है अध्यात्म से खिला हुआ जीवन अध्यात्म ही सब कुछ है अध्यात्म के बिना कुछ नहीं तो धैर्य संतोष शांति आनंद य सब अध्यात्म में है भगवान के चरणों में किसका प्रश्न था समझ पा रहे हो आप बच्चा मनोज कुमार जी दिल्ली से राधा वल्लभ श्री हरिवंश गुरुदेव मैं य के माध्यम से पिछले कुछ महीनों से आप के एकांतिक वार्तालाप और सत्संग से जुड़ा हूं आपके एकांतिक वार्तालाप में जीवन को जीना और राधा नाम से सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है और ईश्वर को पाने के लिए नाम रूपी नौका का सहारा मिल गया है गुरुदेव भगवान मन में एक जिज्ञासा है कि धर्म और पंथ में क्या भेद है जबकि सभी धर्म प्रेम और भाईचारे की शिक्षा देते हैं लेकिन सभी धर्म का पालन करने वाले अपना धर्म श्रेष्ठ समझते हैं देखो इसमें एक बात ये देखनी है कि यदि हम अपना धर्म श्रेष्ठ नहीं मानेंगे तो हमारी रति नहीं होगी सबको जो जहां चल रहा है वह एक ही परमा ऐसा समझो जैसे यमुना

जी हैं तो घाट अनेक है लेकिन यमुना जी तो एक ही है ना ऐसे पंथ अलग हैं धर्म अलग है लेकिन वह तत्व जिसे परमात्मा कहते हैं ईश्वर कहते हैं भगवान कहते हैं जो जो अपने भाषा में बोले कोई अंग्रेजी में उसे गड कहता है कोई उर्दू में उसे पुकारता है कोई हिंदी में पुकारता है लेकिन वो एक ही तत्व है उसके मिलने के अलग अलग है अच्छा अपना मार्ग अपने लिए श्रेष्ठ होना ही चाहिए अगर नहीं होगा तो रति नहीं होगी हमारी आसक्ति नहीं होगी लेकिन हम अपने मार्ग को बड़ा करके दूसरे के मार्ग की निंदा करना वह सच्चा परमार्थिक नहीं व अज्ञानी है हमारे लिए हमारा मार्ग श्रेष्ठ है आपके लिए आपका मार्ग श्रेष्ठ है आपके लिए आपका मार्ग श्रेष्ठ है क्योंकि सब उसी श्रेष्ठ की तरफ तो जा रहे ना उसी श्रेष्ठ की ही उपासना तो कर रहे ना लेकिन हमारे लिए हमारा मार्ग श्रे श्रेष्ठ है अगर हम अपना मार्ग श्रेष्ठ नहीं समझेंगे तो हमारी रति नहीं होगी हमारी आसक्ति नहीं होगी और भगवान ने भी कहा स्वधर्म निधन श्रेया पर धर्मो भयावह हमारे लिए हमारा धर्म जो छोटा कहा

जाए तो भी हमारे लिए महान है दूसरे का बड़ा धर्म जो कहा जाए वो हमारे लिए भय देने वाला है हमें अपने धर्म में स्थित रहना है अपने मार्ग में स्थित रहना है पर किसी की निंदा नहीं करनी अगर निंदा करते हैं तो आप अपने ही इष्ट की निंदा करते हैं क्योंकि वो दूसरा तो है नहीं वो वही है उसके मार्ग चलने के अलग है लेकिन जहां गोता लगाएंगे वो यमुना जी एकही है वो आनंद सिंध भगवान एकही है चाहे उसे अंग्रेजी में पुकारो उर्दू में पुकारो हिंदी में पुकारो वो परमात्मा जो यह नहीं जानता वो अज्ञानी है जो अपने धर्म को श्रेष्ठ मान कर के दूसरे धर्म की निंदा करता है वो कोई धर्मात्मा नहीं वो अज्ञानी है जो लड़ाई झगड़ा करता है अपना धर्म अपने लिए श्रेष्ठ है उसका धर्म उसके लिए श्रेष्ठ है और उस क्योंकि सब श्रेष्ठ की उपासना कर रहे वही परमात्मा है दूसरा कोई है नहीं यह बात जिसको सच्चा ज्ञान नहीं है व लड़ाई झगड़ा करता रहता कोई सगुण निर्गुण का झगड़ा कोई देवी देवता का झगड़ा कोई भगवानों का झगड़ा कोई अलग-अलग धर्मों का झगड़ा धर्म झगड़े

के लिए है क्या झगड़ा मिटाने के लिए कोई भी वह धर्म नहीं है जिसमें सौहार्द ना हो शांति ना हो एकता ना हो वह धर्म किस बात का यह तो सब अधर्म ही है जिसे हम धर्म मानते हैं वध कौन सा धर्म ऐसा झगड़ा सिखाता है हमें बतावे कौन सा धर्म ऐसा जो लड़ाई सिखाता है अरे धर्म तो सिखाता है नीच पुरुषों को भी गले लगाना घोर पापियों को भी महात्मा बना देना धर्म तो यह शिक्षा देता है कि अगर तुम्हारे को कोई गाली दे रहा है तो मुस्कुरा कर उसे क्षमा कर दो तुम्हारा कोई अहित कर रहा

है तुम उसका मंगल करो यह धर्म का स्वरूप है यहां तो धर्म के नाम पर लड़ाई झगड़ा मार पीट और न जाने क्या-क्या होता है ये वो धर्म की बात नहीं हां जैसे हमारे इष्ट के विषय में आप न्यून बोले चाहे जिस धर्म के हो तो हम गरज कर अपने इष्ट को प्रमाणित करेंगे कि इष्ट ही सर्वोपरि है लघु नहीं बोल सकते इष्ट के लिए अगर बोलोगे धर्म के लिए बोलोगे राष्ट्र के लिए बोलोगे तो फिर हम सन नहीं कर पाएंगे ऐसे जो जहां है वो सर्वश्रेष्ठ है आप अपनी उपासना कीजिए लेकिन अगर आप हमारे देश के राष्ट्र के लिए बोले आप हमारे धर्म के लिए बोले तो फिर हम आपको ऐसा जवाब देंगे कि तुम्हारी जबान बंद हो जाएगी संत शभु श्री पद पवादास निता आस मर्यादा काटी जीव तास जो बसाई श्रवण मंदन तो चले पराई हमारे धर्म के प्रति हमारे गुरु के प्रति हमारे इष्ट के प्रति हमारे राष्ट्र के प्रति अगर बात आएगी ना तो सब एक तरफ फिर उस समय आक्रोश आप देखोगे उस समय फिर आप बल देखोगे और ऐसे शांत सबको क्षमा सबको करना किसी की निंदा नहीं किसी का अपमान नहीं किसी की अवहेलना

नहीं परब जब धर्म की बात आ जाएगी तो डट के खड़े हो जाएंगे फिर वहां नहीं दिखाई देगा कि ऐसे नहीं हमें गाली दो हम ऐसे करेंगे देखो सामने भीष्म जी विरोध में खड़े हैं और इधर भगवान श्री कृष्ण युद्ध हो रहा है कि नहीं हो रहा एक पांडव के पक्ष में जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण है और उन्हीं के सामने उन्हीं के महा भागवत भीष्म जी है विपक्ष में तो युद्ध हो रहा है कि नहीं हो रहा ये बात समझना पड़ेगा कि एक जगह ऐसा है जहां हमको डट के खड़ा हो जाना पड़ेगा और एक जगह ऐसा जहा हम सर झुका के निकल जाएंगे आप समझ पा रहे हो धर्म का स्वरूप बड़ा सूक्ष्म है धर्म का स्वरूप पर है वही एक परमात्मा दूसरा नहीं है परमात्मा एक ही है उसके मार्ग अलग-अलग है पर अगर कोई उसी परमात्मा तत्व की जिसकी हम उपासना करते निंदा करे या तो हम असमर्थ है तो कान में अंगुली डाल के चले जाएंगे और समर्थ है तो तुम्हारी जबान बंद कर देंगे तप बल से बुद्धि बल से ज्ञान बल से या शरीर बल से किसी भी बल का प्रयोग करके तुमको हम दबाए ये का स्वरूप है काटी जीव तास जो बसाई

श्रवण मुनि काटने का मतलब उसकी जबान को रोक देना अब दोबारा तुम ऐसा नहीं बोल सकते इष्ट के प्रति नहीं बोल सकते धर्म के प्रति नहीं बोल सकते य बात समझ रहे ना इसे झगड़ा नहीं कहते अपने इष्ट के विषय में नहीं अपनी निंदा सुझाए अपनी निंदा में कोई बोले हमारे सामने कोई बोले कि आपको ऐसा बोल रहा उसकी मस्ती है जवान स्वतंत्र है गाली दे कोई हम बोले किशोरी जी के विषय में बोल रहा है ऐसा गुरुदेव के विषय में बोल रहा है वृंदावन के विषय में राष्ट्र के फिर उसकी जवान का उत्तर ऐसा सामने फिर तो बैठ ही नहीं सकता फिर बोलही नहीं सकता जितना बल भगवान दीपक अपनी जगह प्रकाश करेगा लोजन अपनी जगह सूर्य अपनी जगह जितना भगवान ने प्रकाश दिया उतने प्रकाश से उसके अं अज्ञान अंधकार का नाश करेंगे समझ पा रहे आप अमन वर्मा जी हिसार से श्री राधे गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि पणा गुरुदेव मैं जैसे को तैसा वाली बातों में विश्वास रखता था पहले जो लोग जैसा करते थे तुनीर में हर तरह के बाण होते हैं अग्नि बाण होता है तो फिर वरुणा स्त्र भी होता

है फवा वास्त्र भी होता है पर्वता स्त्र भी होता है तो वज्रा स्त्र भी होता हर बाण होता है यह नहीं कि ऐसा नहीं होना चाहिए जैसे को तैसा संस्कृत में कहते सटे साटम समाचरेत यह भी एक बाण है तुनीर में हर जगह यही काम नहीं करता है हर जगह काम नहीं करता है कहीं कहीं उस बाण का भी प्रयोग किया जाता बड़े-बड़े संत उसका प्रयोग करते हैं जब देखा गया कि साम से प्रलोभन से हाथ जोड़ने से काम नहीं चल रहा तो फिर दंड का प्रयोग किया गया नीति है ना साम दाम दंड भेद जब देखा गया

आखिरी है यह स साठ समाचर दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार समझ में उसको आएगा साधु होता का व्यवहार समझ में नहीं आएगा नहीं तुर में एक बाण यह भी होना चाहिए व ऐसा नहीं कि व्यवहार में बहुत सावधानी की जरूरत है अब जैसे कोई किसी को छे े रहा भाई साहब आप ऐसा गंदा तो आपके गाल में तमाचा मारेगा आके उसको पता है ना कि पहला थप्पड़ ऐसा पड़ा कि उसको तमार आ गया फिर वो नहीं झा केगा फिर वो समझ जाएगा तो यह भी होना चाहिए ऐसा नहीं है कि जैसे को तैसा वाली बात एकदम गलत है

नहीं सहनशील बनो लेकिन जहां आवश्यकता है एक सीमा तक फिर इसके बाद फिर ज भगवान शिशुपाल को बोले थे 100 तक बोले थे 100 गालिया दे दो 100 तक चुप रहेंगे इसके बाद आगे फि सुदर्शन चक्र के द्वारा गर्दन उतार ली एक सीमा है इसके बाद कोई बढ़ता है तो हमारा कानून है हमारी धर्म व्यवस्था है उसके अनुसार फ बर्ताव करना चाहिए कुछ ऐसे स्वभाव के लोग होते हैं कि जो इसी बाण को समझते हैं सठ साम समाचरेत वो दूसरे बाण को साम को दाम को भेद को नहीं सम वो केवल दंड नीति को समझते हैं

वो दंड के अधिकारी तभी उनकी समझ में आता है व आएगा ही नहीं पैर छू ले आप हाथ जोड़ लो आप कुछ देने की बात कह लो धाम धाम देक के शाम विनय नीति के द्वारा भेद उसको किसी तरह समझाकर व केवल दंड से सुधरने वाले जीव होते हैं तो जो दंड से सुधरने उनको ज्यादा चांस नहीं दिया जाता एक और दो और तीसरे में फिर दंड का विधान कर हमारी भारतीय कानून व्यवस्था स्वयं दंड ना दे कर के भारतीय कानून व्यवस्था को समर्पित कर दे अगर स्वयं दंड देगा तो स्वयं अपराधी बन जाएगा तो दुष्ट के साथ व्यवहार फिर साधु होता का नहीं चल पाएगा क्योंकि गृहस्थी में संसार में चलना है तो एकदम जान जाए ना आदमी तो आपको परेशान कर देगा उसको यह पता हो कि इस व्यक्ति को छेड़ने का मतलब ततैया को छत्ते पर ईट मारना वह कभी नहीं छेड़े ग तीन दिन विनय करते हुए भगवान श्री राम को हो गए समुद्र को आ जाना चाहिए था स्वयं भगवान उपवास करके विनय कर रहे जब नहीं माना लक्ष्मण बान सनु स वारिद विषिक सानु लाव अग्नि बाण कनक थार भरि मन आ गए विविध प्रकार के रत्नों से भरी थार लेकर

विप रूप महाराज तीन दिन से उपवास बैठे थे तब तुम्हारी समझ में नहीं आया अग्नि बाण से तुम्हारी समझ में आ गया कुछ ऐसा है कि कहीं कहीं विनय काम नहीं करते विनय न मानद जलद जड़ गए तीन दिन बीत बोले राम सकोप तब बिनु भय होए लक्ष्मण बान सरासन आनु सखो बरद विषिक कृ सानु सट सन विनय कुटिल सन प्रीति सहज कृपण सन सुंदर नीति ममता रत सन ज्ञान कहानी अति लोभी सन रति बखानी इनसे व्यर्थ जाएगा इनको चाहे जितनी चर्चा करो समझ में नहीं आएगा तो इसलिए हम आपकी उस बात का अनादर नहीं

करते कि जैसे को तैसा पर अगर स्वयं आप करेंगे तो आप हमारे कानून में अपराधी साबित हो जाएंगे ऐसे लोगों के लिए हमारा कानून व्यवस्था उसको कानून को समर्पित करना चाहिए जो दुष्टता का व्यवहार करे क्षमा से इनकी दुष्टता बढ़ती है और दंड से इनकी दुष्टता पर रोक लगती है अगर तुम्हारे साथ दुष्टता कर रहा तुमने दंड का प्रयोग कर दिया तो कई बच जाएंगे उनको अगर कानून की सुरक्षा में दे दिया तो कई बच जाएंगे अगर तुम क्षमा कर दिए तो दसियों से ऐसी दुष्टता करेगा तो इसलिए कहीं

ना कहीं यह छठ साठ समाचर सूत्र लिखा गया है तो ऐसे गलत नहीं लिखा गया मज जो लोग जैसा आचरण करते थे ही जवाब देता था पहले लेकिन रात को जलन और पछतावा होता था कि मुझे ऐसा नहीं करना हां पवित्र हृदय का य लक्षण है पवित्र हृदय का य लक्षण है ऐसा अपने जहां तक हो तक सहन करना चाहिए पर हम इसलिए कह रहे कि आज जो वर्तमान में समय चल रहा है लोग व्यसन व्यभिचार गंदी वृत्तियों वाले वह विनय साधु शास्त्र इनकी भाषा नहीं समझते हैं नहीं समझेंगे उनको भाषा वही समझ में आती है जो

जैसा स्वरूप हो उसके अनुसार हां जहां जरूरत है इसकी तो इसकी भी जरूरत है और जहां जरूरत है नजर टेढ़ी करने की वहां नजर टेढ़ी करने की जरूरत है पर अपने को अपराधी साबित ना होने देना ऐसे कोई आचरण ना करना कि कानून के द्वारा हम अपराधी साबित हो जाए ऐसे सावधानी से चलना चाहिए बया हम इस बात पर राजी हैं भगवान राम 14 वर्ष के लिए बनवास गए विशेष उदासी लेकिन सारंग धनुष और तण पास ही रहा आप विचार करके देखो आदेश था 14 वर्ष के लिए विशेष उदासी स्वरूप तपस्वी स्वरूप पास ही

रहा भगवान परशुराम जी निरंतर तपस्या में रत रहे लेकिन भगवान शंकर जी से प्रदत फरसा पास ही रखा बड़े-बड़े महान जो वीर योद्धा धर्म रक्षक हुए तो धर्म की रक्षा के लिए कहीं न कहीं दंड विधान की भी आवश्यकता है अगर भगवान को देखो तो सुदर्शन चक्र है गदा है को मुद की तो ये सब धारण की नहीं धारण कि तो ये तो इस समय तमोगुण और रजोगुण वृत्तियों की बाहुल्य होता है सतोगुण साधु होता इस भाषा को समझना तो किसी सत्संगी के बस में हो सकता है जो सत्संग सुनता है शास्त्र स्वाध्याय वह इस भाषा को समझ सकता है नहीं इस भाषा को आजकल नहीं समझा जाता उसे कमजोर माना जाता है जो ऐसे बात करता है जो ऐसे बात करता है उसका उपहास उड़ाया जाता है आज का समय जो है ना हा तो उस ये अंदर से रखे लेकिन नजर में दम होनी चाहिए हमारा धर्म हमारा राष्ट्र य हमारा जीवन है हमारा प्राण है हमको इस पर कि कोई हमारे राष्ट्र पर आतंक करे तो हम सहन कर ले नहीं फिर उसके लिए हमें प्राण देना पड़े तो सहज में हमारे धर्म के लिए हमारे गुरुजनों के लिए हमारे इष्ट के

लिए तो यह थोड़ा होना चाहिए इतना तो होना चाहिए यशपाल अरोड़ा जी राधा वल्लभ श्री हवं महाराज जी कुछ वर्ष पहले दास का ठाकुर जी के प्रति काफी झुकाव था अब दास का मन ठाकुर जी के प्रति ना लगकर मोह माया में लग रहा है इतने वर्षों बाद दास को भक्ति मार्ग में काफी उन्नति कर लेनी चाहिए थी जबकि दोबारा कैसे आऊं महाराज चूक हो रही है संभालो इसको देखो मटकी में अगर एक दो छेद हो जाए व कभी भरेगी नहीं उन छेद को देखो उन दोषों को देखो जो तुम्हारी भक्ति रूपी रस को हटा दिए कोई न कोई भोग णा कोई ना कोई इंद्रियों की स्वतंत्र मनमानी आचरण या कोई अपराध प्रवृत्ति जो धर्म मार्ग में नहीं होनी चाहिए वही हमारी भक्ति को क्षीण कर सकती है अन्यथा नहीं व रात दिन बढ़ना चाहिए प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम का मार्ग है भक्ति का मार्ग है कम कैसे हो गया इसका मतलब छिद्र है जैसे चलनी में गैया दु है और दोष दव को दे हरि गुरु कहो न माने तो अपन ही फल ले कोई न कोई हमारी इंद्री विलासिता कोई न कोई मन माने आचरण कोई कोई ऐसी त्रुटि है और वह आप जानते हैं

ऐसा नहीं कि आप नहीं जानते हैं जब आप साधक हैं तो निरीक्षण परीक्षण करते हैं तो आप जानते हुए भी कोई गलती कर रहे हैं जो आपकी भक्ति की हानि करने वाली उसका सुधार करने के लिए भगवान से प्रार्थना करो नाम जप करो नाम जप के बल से ही हम अपने ज्ञान का प्रयोग कर पाएंगे नहीं तो जानकारी बनी रहेगी गलतियां होती रहेंगी बहुत ज्ञान है आजकल लोगों को बहुत ज्ञान है लेकिन प्रयोग नहीं है क्यों क्योंकि भजन नहीं है अगर भजन नहीं तो प्रयोग नहीं कर सकता ज्ञान सबको है किसी के भी

हाथ जोड़ कर के उपदेश ले लो अभी आप वो तो सीधे ब्रह्म ज्ञान के नीचे बात नहीं है तो उस ज्ञान का प्रयोग क्यों नहीं कल हम चर्चा एकांतिक में कर रहे थे कौन नहीं जानता कि राम नाम सत्य है जहां शरीर छूटता है तो पूरे गांव में हल्ला मचता है राम नाम सत्य व लेकर जाते हैं ना गांव के सैकड़ों लोग पीछे लगे रहते राम नाम सत्य अरे पकड़ ना कितनी बढ़िया ज्ञान की बात कह रहे हैं सत्य बोलो मुक्त है राम नाम सत्य कौन पकड़ लेकिन उसको एक गाना गीत बना लिए हैं और जाक फूंके आते हैं और उनको यह ज्ञान नहीं होता कि यही दशा हमारे शरीर की होगी जिसके कारण हम नाना प्रकार के पापा आचरण कर रहे हैं उस शरीर की तो अंतिम दुर्दशा ये है कि जला दिया जाएगा और सत्य वस्तु तो सबको ई बोल रहा है राम नाम सत्य भगवान का नाम सत्य तो पकड़ ना सत्य को उमा काहो मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना चौपाई तो बहुतों को याद हो गी लेकिन आचरण में उतारना कठिन तो सत्य मानी भक्ति मार्ग में यदि हमारी कमजोरी हो रही तो हम अब जांच करें हमारे अंदर कोई छिद्र है

छिद्र दोष जो हमारे भक्ति रस को क्षीण कर रहा है अब उसको स्वयं निरीक्षण परीक्षण करें भगवान को साक्षी करके स्वयं जज्ज बने अपना तो जो गलत है उसको प्रश्चित करे उसका सुधार करे नियम ले अबलो नशा नहीं अना नश हो आगे बढ़ जाओगे भगवान बड़े कृपालु है हमारे प्रभु का ऐसा स्वभाव है कि विमुख भए निमस ना अ कृपा जब चित तब वैसे सन्मुख होकर हम उनकी स्तुति कर रहे हैं तो व जैसे दिखाई दे रहे ना विमुख होकर गलत आचरण बन फिर देखा तो वैसे जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधु अति मृदुल स्वभाव कैसा स्वभाव है कि अपने जन के अवगुण को नहीं देखा मेरा जन है मेरी शरण में है मेरी प्रबल माया चूक हो गई चलो फिर आगे बढ़ो जब चित तब वैसे कृपाल दिखाई दी बहुत करुणामय प्रभु है आगे बढ़ी अपने दोषों को देखिए और उनको निकालिए जो इंद्रियों का विलास और मन की मनमानी इसी से दोष होते हैं और इसी से फिर भक्ति ढक जाती है अनर्थ क्रियाएं भक्ति को ढक देते हैं इसीलिए कहा श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूल स्य विसर्जन अपने आराध्य देव प्रभु के अनुकूल आचरण हो और

प्रतिकूल आचरण का त्याग हो तब भक्ति रंग लाती है अब प्रतिकूल आचरण करता रहे तो फिर भक्ति रंग नहीं लाएगी समय चाहे 50 वर्ष हो जाए समय 50 वर्ष हो गए अंधा बटे पड़ा चबाए तो हाथ में क्या लगेगा एक अंधा एक दुकान में मूंज का रस्सी बट रहा था पड़ा आकर भैंस का चबाने लगा और जितना बटता ऐसे करता है उसको दिखाई तो दे नहीं पड़ा चबा रहा है तो वासना रूपी पड़ा हमारी भक्ति रूपी रस्सी को चबा आता चला जा रहा है बाद में क्या बचा कुछ नहीं बचा जैसे आप अभी देख रहे हो और कह रहे हो कि हमारा हृदय जैसा बढ़ना चाहिए था वैसा भक्ति रस में नहीं बढ़ा हमें लगता है हमारा भक्ति रस क्षीण हो गया तो कोई दोष है जो उस भक्ति को को हटा रहा है और वो आप जानते हैं ऐसा नहीं यह तो केवल मूर्खता वस कह दिया जाता है नहीं नहीं जी हमें पता नहीं पूरा जिस समय कह रहे हो तुम कि हमें पता नहीं तुम्हारे दिमाग में सामने खड़ा है दोस्त आप देख लो सामने खड़ा है आपको अनुभव है कि आपसे क्या गलती हो रही है अंदर से आप देख लीजिए ढूंढ लो हम खुद तुम्हे कह रहे इंद्रियों

की विलासिता मन की मानी मन माने आचरण इंद्रियों की विलास अब जैसे कोई भक्ति जन्य अपराध होते हैं व भगवान गिनते रहे सेवा अपराध बन गया कुछ नामा अपराध बन गया या कुछ धामा अपराध बन गया या कोई वैष्णव अपराध तो भगवान जल्दी जल्दी उसको निपटा देते हैं अंदर जलन होगी और प्रश्चित हो जाएगा चल लेकिन जब हम इंद्रियों की विलासिता तो फिर जो इच्छा करियो मन माई हरि प्रसाद कछ दुर्लभ नाई भगवान उसे नहीं रोकते जैसे बच्चा खिलौनों में आनंदित हो रहा है तो मां झांक के देख लेती है

आनंदित है आनंद जब वो खिलौनों में खेलने से रोएगा तब फिर वो अगला अपनी गोद में उठा कर के मां अपना स्तन पान कराएगी तो हरि देख रहे हैं कि आप भोगों में राजी हो तो खेलो खिलौनों में और अगर जिस दिन खिलौनों को छोड़कर रुदु सु श्रम राजन कृष्ण दर्शन लालसा तो भगवान कृपा करके अनुभव करा देंगे कि वो आपके हृदय में ही बैठे हुए हैं तो नाम जप करो अपनी कमियों को अपने सामने लाओ और एक-एक करके भगवान की कृपा बल से उनको ढूंढ ढूंढकर जैसे झाड़ू लगाते हैं पोछा लगाते हैं ऐसे हम एक-एक कमियों को हटाते हैं तो हमारा हृदय निर्मल हो जाता है और निर्मल जन मन सो मोही पावा जहां मन निर्मल हुआ भगवत प्राप्ति हो गई समझ पा रहे आप रितेश परमार जी कर्नाटक से गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरी एक महीने पहले आपसे ब्रह्मचर्य के विषय में वार्ता हुई थी आपने कुछ नियम दिए थे और एक महीने बाद आने की आज्ञा भी दी थी महाराज जी मैंने स्वयं से तो कोई चेष्टा नहीं की महाराज जी पर कब्ज और अपने आप वीर्यपात ही बहुत परेशानी हो रही है

और उत्साह भी नहीं हां क्या होता है कि जैसे नवीन बच्चे हमने कई बार मतलब य सावधानी बताई है कि गेहूं की फसल जब गले में काट ले तो ना दाना होगा ना भुस होगा पर्याप्त और वही फसल परिपक्व हो जाए तो मनो अन्न पैदा हो जाएगा अब छोटे-छोटे बच्चे 13 वर्ष 14 वर्ष 15 वर्ष 18 वर्ष के इन लोगों ने घर्षण क्रिया के द्वारा ऐसे अपने अंगों को शिथिल कर लिया है ऐसा अपना जीवन बर्बाद कर लिया है कि वीर शक्ति का क्या होता है एक अभ्यास होता है जैसे आपने एक दिन का अभ्यास बना लिया

तो दो दिन बहुत बहुत सन होगी तीसरे दिन निकल जाएगी अपने आप निकल जाएगी गलत अभ्यास गलत अभ्यास वही आप जिसे स्वप्न दोष कहते हो जिसे स्वयं ही वीर्यपात कहते हो वह गलत अभ्यास से हुआ है आपकी नस नाड़ियों इतनी दुर्बल हो गई को क्षमता नहीं रख र वीर शक्ति को रोकने की हमें लगता है कि हम अगर कोई गलती ना करें और वर्ष डेढ़ वर्ष इंतजार करें दंड बैठक मारे दो तीन किलोमीटर दौड़ लगाए जैसा हमने बताया खानपान शुद्ध रखें तो व धीरे धीरे धीरे अंतराय बढ़ता जाएगा आप देखना अंतराय बढ़ता चला है जैसे कि दो दिन में फिर चार दिन में फिर छ दिन में फिर ऐसे 40 दिन में धीरे धीरे अंतराय बढ़ फिर ऐसा होता है कि ठीक हो जाता है अगर कोई हरकत गलत ना करे तो ठीक हो जाता है यह पक्का ठीक हो जाएगा आप उसके विषय में चिंता ना करें पर यह अभ्यास अभी आपको लंबे समय तक े ना पड़ेगा क्योंकि आपने छोटी अवस्था में गलत आ चरणों के द्वारा वर पात आदि दोष जो किए जिससे घर्षण क्रिया आदि है तो उससे नस नाड़ियल हो जाती है और आज हमारी समाज में यह तो बिल्कुल

बहुत ही गंदगी फैल रही है य तो मतलब आप लोग सत्संग सुनकर सावधान हो गए नहीं तो नष्ट हो जाओगे स्मृति शक्ति का नाश हो जाना खड़े होने में चक्कर आना कमर दर्द करना गांठ दर्द करना पढ़ाई में मन ना लगना भोजन अपाचे भोजन ना पचने लगना च ा स्वभाव हो जाना जरा सी बात में किसी को कटु वचन बोल देना यह सब बातें आने लगेंगी जो वीर शक्ति का रास कर देते हैं यह सब दोष आ जाते और वही 20 22 परिपक्व ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में गया तो अब वो संतान उत्पत्ति क्रिया के बाद भी अस्वस्थ

नहीं होगा क्योंकि व परिपक्व अवस्था हो गई अब छोटे-छोटे बच्चे जब अभी वीर शक्ति परिपक्व ही नहीं हुई तभी तो हमारी शास्त्री पद्धति है पहला ब्रह्मचर्य फिर उसके बाद गृहस्थ फिर वानप्रस्थ और सन्यास या ब्रह्म बचर वानप्रस्थ और सन्यास ब्रह्मचर्य सबकी न्यू है तो आजकल नए-नए बच्चे ब्रह्मचर्य को कुछ समझी नहीं रहे खिलवाड़ कर रहे हैं वही खिलवाड़ बहुत भारी पड़ता जब व जवान होते तो गृहस्थी लायक नहीं रह जाते व गृहस्थ लायक नहीं रह जाते क्षमता नहीं रह जाती उनके अंदर गृहस्थ धर्म की क्षमता ही नहीं रह जाती ये छोटे-छोटे बच्चे उनको तो लगता है सुख है अब दूसरे की तो जरूरत नहीं खिलवाड़ खिलवाड़ में अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं इसलिए बहुत सावधान और आप चिंता ना करो जैसा कहा वैसे चलो अंतराय बढ़ता आपको खुद समझ में आ रहा है अंतराय बढ़ रहा है ना अब ये धीरे धीरे अंतराय बढ़ता चला जाए तुम केवल कोई हरकत मत करना वो धीरे धीरे शांत हो जाएगा धीरे पद्धति है धीरे धीरे शांत हो जाएगा बस आप जैसा हमने व्यायाम और जैसी दिनचर्या बताई वैसा

करो आपका चेहरा भी इस समय ठीक हो रहा है जैसे वो जो लक्षण होते हैं ना अब वो सुधार में है बहुत धैर्य पूर्वक चलो बस गंदे बच्चों को संगन करना मोबाइल रखते हो पास हा क्या कहते स्मार्ट मोबाइल स्मार्ट मोबाइल चाहे जितने स्मार्ट हो तुम्हें गिरा देगा पक्का समझो क्योंकि उसमें देखने सुनने की इच्छा हुई गलत आचरण वाली बातें देखिए बच्चे भ्रष्ट हो जाते हैं छोटे-छोटे बच्चों में गंदी गंदी आदतें आ रही अपने परिवार वाले जो अपने बच्चों को उन्नति चाहते हैं उनको बचावे नहीं

तो संकोच ना करें प्राया इस विषय की चर्चा नहीं की जाती है क्योंकि संकोच किया जाता है रे क्या इस विषय की चर्चा हमें लगता है माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को बैठ लकर दोस्त वत बात करें जैसे मित्र से बात की जाती है ना कि देखो ऐसी कोई बात हो तो हमें बता दो ऐसी गंदी बात मत करना इससे तुम्हारी बड़ी हानि है चाहे बच्चा हो चाहे बच्ची य जो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड य जो गंदी बातें चली ना मिलकर के उन बच्चों से उनके जीवन को सुधारो नहीं केवल पढ़ाई से कुछ नहीं होता बिल्कुल किसी काम के नहीं रह जाएंगे स्मृति शक्ति नष्ट चेतना शक्ति जब क्षीण होने लगती है ना तो फिर वो नशा करने लगते हैं फिर और नष्ट हो जाते हैं हमें लगता है माता पिता को चाहे अपने बच्चों से थोड़ी देर समय दें पैसा कमाना य सब कुछ नहीं है आधा घंटा कम से कम अपने बच्चों के पास बैठे उनसे प्रेम का व्यवहार करें माता-पिता का व्यवहार तोही एक दोस्त का व्यवहार करें उनसे बात करें उनको ऐसा लगने लगे कि पापा से हम बात करेंगे तो हमारी समस्या का समाधान हो जाएगा

ऐसा न हो कि पापा जान जाएंगे तो मार डालेंगे इतना भय नहीं देना चाहिए बच्चों को बच्चों को इतना प्यार देना चाहिए कि उनको लगे कि मेरी हर समस्या का समाधान मेरी मम्मी है मेरे पापा है तो वह अपनी गलतियां जब सामने रखे आप उनका अध्यात्म के द्वारा बुद्धि के द्वारा अगर संभाले तो बच्चे उन्नति शल हो जाएंगे तो यह छोटे-छोटे बच्चे जो गंदे आचरण में जा रहे हैं माता-पिता को चाहिए संकोच ना करके उनसे खुल के बात करके और उनकी इन कमियों को सामने रखकर उनको संभाला जाए नहीं तो आगे उनका जीवन चरित्र बहुत बिगड़ जाएगा फिर वो संभल नहीं पाएंगे सोच शक्ति खत्म हो जाती है जब 20 वर्ष तक अगर बचा ले गए तो फिर वो गृहस्ती में भी जाएंगे कुछ उनका बिगड़ने वाला नहीं 20 वर्ष के पहले ब्रह्मचार्य बहुत घातक है नाश करना व आजकल 13 14 15 वर्ष की अवस्था सेही बच्चे इधर उधर सब करने लगते हैं माता-पिता को चाहिए गुरुजनों को चाहिए टीचर को चाहिए ऐसी शिक्षा दे अब ऐसे डॉक्टर लोग शिक्षा देते हैं हमको बच्चों ने बताया कि डॉक्टर लोग ऐसी शिक्षा देते हैं

कि ऐसा करने से स्वास्थ्य बढ़ता है अरे कैसे स्वास्थ्य बढ़ता है जो ब्रह्मचर्य नहीं हो स्वास्थ्य बढ़ जाएगा य बहुत गलत गलत शिक्षाएं देते कुछ ऐसे सीरियल है कुछ ऐसी मतलब फिल्में हैं जिनके देखने से बच्चों को प्रोत्साहन मिलता है गलत कार्यों के लिए उनको प्रोत्साहन मिलता है ब्रह्मचर्य त्याग का तो ब्रह्मचर्य त्याग से किसी को लाभ मिले ऐसा आज तक तो हमने नहीं हा गृहस्थ धर्म के अनुसार व फिर जब सयाने हो जाए तब बच्चा पन में बहुत संयम से चलना चाहिए तुषार जी कानपुर

से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी एकांतिक वार्तालाप के माध्यम से जाना कि प्रभु स्वयं से स्वयं में खेल रहे हैं प्रभु ने अपना विस्तार सृष्टि रूप में किया है अगर ऐसा है महाराज जी तो फिर मनुष्य रूप में भी प्रभु ही है और फिर उनको स्वयं का विस्मरण कैसे हो गया महाराज जी यही माया है यही माया है स्वयं की तो जानकारी करनी है और किसकी जानकारी करनी है आत्मा क्या है आप ही तो है आप ही आप हैं और आप ही आप हैं भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो गीता में कहते हैं मत्ता पर तरम नान्य किंच दस्त धनंजय मेरे सिवा कुछ नहीं है मैं ही मैं बना हुआ हूं अपने आप को भूल गए इन कमरों में आकर भूल गए इस शरीर में आके अब आपको ऐसा लगता मैं पुरुष हूं पक्का 100% नहीं लगता मैं पुरुष हूं फिर अंदर देखो तो मन में इतना तदा आत्म हो गया जो मन माना वही हम माना जो मन नहीं माना वो मैं नहीं माना जो मन देखना चाहता है वो मैं देखना चाहता जो मन सुनना चाहता हूं य आप इंद्रियों का विलास है आपका नहीं है आप अपने को भूल ही तो गए ना ब य बात हो गई तो

आप अपने से अपने आप को भूल गए हैं तो आपको जगाने के लिए वही आपका आत्म स्वरूप गुरुदेव रूप बैठा वही आपको जगा दिया जब जगे तो ना गुरु ना शिष्य व एक परमात्मा है दूसरा नहीं है ये खेल चल रहा है आप जाग जाओ जब जगो के वास्तविक दृष्टि में तब देखोगे मात्मा के सेवा कोई नहीं है अब उस ही जाने चौपाई का अर्थ समझना ही जाने जग जाए हेराई जागे जथा स्वपन भ्रम जाई जिसके जानने से यह संसार खो जाता है कैसे जैसे आप स्वप्ने में देख रहे थे बहुत कुछ जब आपको जगा दिया गया तो कुछ नहीं था ना स्त्री ना पुरुष ना भोग ना विलास का ना दुश्मन ना मित्र संसार कुछ नहीं था यह कब पता चला जब जगे लेकिन स्वप्न में तो सब कुछ था ना ऐसे ही मोह निशा सब सोव निहारा देखे स्वपन अनेक प्रकारा यही जग जामिनी जाग जो गी परमारथ प्रपंच वियोगी कोई योगी जो परमार्थी है प्रपंच का त्याग करके भगवान में स्थित अब वोन आ एक चौपाई का अर्थ समझो जहां जीव भगवान को जाना तो भगवान में हो गया और भगवान ही जना हैं सोई जाने ज देव जनाई और जानत तुम्ह तुम्हे हो जाए तो वो भगवान

था ही जब जाला तो अपने स्वरूप को जान गया अब हम लोग जो इस समय शरीरा सक्त है लगता है भगवान कैसे हो सकते हैं गंगाजल एक चम्मच तो उसे क्या बोलेंगे गंगाजल तो बोलेंगे ना और एक टैकर भरा हो तो गंगाजल बोलेंगे और धारा ब रही तो गंगाजल तो हम अंश है ना भगवान के तो भगवान का अंश पूर्ण मदा पूर्ण मदम पूर्णा पूर्ण मुद चते पूर्णस पूर्ण मादाए पूर्ण मेवा वसते उस परमात्मा का जो अंश बचा ना वह भी पूर्ण ही है पर हम अपूर्ण हैं शरीर के अभिमान के कारण माया के बंधन में बन गए हम अपने अपनी द्वारा माया जैसे वो देखा है मकरी अपने मुंह से ही पूरा जाला रचती है उसी में फस जाती है बस बस ऐसे ही है हम अपने जाल में ही फस गए अपने रचे हुए जाल बंदे कीर मर कट के लाए अपने जाल में फस गए इसमें पक्का बच्चा कोई संस नहीं है यदि हम व्यवहार का त्याग करके आंतरिक और परमार्थ को देखें तो वही परमात्मा बैठा आप कौन है आपकी स ही नहीं जब आपका परिचय पूछेंगे तो आप शरीर का परिचय बताएंगे आप अपना परिचय नहीं बता जो आपका परिचय है वो परमात्मा का परिचय है जो

परमात्मा का परिचय है वो आपका परिचय है आप जो परिचय दे रहे हो वो प्रकृति का दे रहे हो ये प्रकृति के द्वारा रचा शरीर है और जहां जन्मा वहां की बात कहोगे आप अपना नाम बताओगे आप अपनी हाइट उचाई फिर सब यह जितना है सब प्रकृति का परिचय दे रहे हो परमात्मा का परिचय नहीं आप में जो बिजली है पावर है वो परमात्मा है यह बात समझना होगा य पहली बार प्रभु जी जब सृष्टि बनी महाराज जी तो उसके बाद कैसे यह विस्मरण कैसे याद तो रहा होगा जब आप स्वप्न में कोई रचना देखते हैं क्या कि कहां से शुरुआत हुई बस ऐसे ये स्वप्न है दीर्घ स्वप्न है आज तक कहीं तारीख लिखी हो किसी भी पुराण में ग्रंथ में सन संवतसर भगवान ने अमुक तारीख को अमुक संवत्सर को अमुक दिन को सृष्टि रची थी जब सृष्टि रचना की बात आती है तो अनादि शब्द आ जाता है और जब सृष्टि की बात आती है तो अनंत शब्द आ जाता है अनादि और अनंत कोई अंत नहीं पाया कोई अंत नहीं पाया इस माया का शुरुआत जैसे आप स्वप्न में क्या शुरुआत थी आप केवल विचरण कर रहे कोई आपके सिवा स्वपने में कुछ नहीं

था आप ही बाजार बने थे आप ही स्त्री बने थे आप ही पुरुष बने थे आप ही मरने वाले बने थे आप ही मारने वाले बने थे आप ही समुद्र बन गए आप ही डूबने वाले बन गए जब जगे तब पता चला कि कुछ था क्या कुछ नहीं था आप तो आराम से एसी रूम में सो रहे थे शरीर तो आपका एसी रूम में पड़ा था लेकिन स् बिल्कुल बच्चा अनादि अनंत भगवान की माया है एक भ्रम है जैसे एक कई तरह के शीशे के महल में हो शीशे के कई तरह होते हैं ना एक आपको बड़ा चौड़ा मुह दिखा देगा एक छोटा दिखा एक टेढ़ दिखा दे कई शीशे होते हैं ना अब ऐसे शीशे से बना भवन हो तो आप अपने को ही देखकर भ्रमित हो जाएंगे कि इतने रूप के आदमी इसमें विराजमान है और जबक सब रूप आपके ही है ऐसे माया का आकर्षण ऐसा है कि एक ही परमात्मा अनेक रूपों में भास रहा है य अनेक रूप है नहीं वो एक ही है एक ही पंचभूत है सबके देखो माया का खेल देखो अगर किसी की आंख यहां होती तो अलग-अलग पहचाना जाता कि उसके माथे पर सबका एक ही ढांचा है और सब अलग-अलग पहचाने जाते हैं सबकी अलग मतलब उसकी जादूगरी देखो किसकी

माया की कितनी बड़ी जादूगरी उसी माया में हम भूल गए जब जगे तो माया का अर्थ जानते हो जो नहीं है मा माने नहीं या माने जो जो नहीं है या रहस्य रघुनाथ कर बग न जाने कोई और जो जाने रघुपति कृपा तो सपने मोह अपने लोग फस गए अब इसे छूटने के लिए संगोष्ठी बलाई जा रही है अध्यात्म और नाम जप संत समागम यही साधन है जिनके द्वारा हम इस माया से कम से कम इतना तो पता चलने लगा भले हम शरीर राग नहीं छोड़ पाए लेकिन कहीं ना कहीं दिमाग में तो आ ही रहा है कि मैं शरीर तो नहीं हूं

आ रहा है ना तो जाग की शुरुआत होने लगी अब जगने जिस दिन जग गए उस दिन आपकी दृष्टि में संसार नहीं होगा वही परम तत्व परमात्मा केवल दिखाई देगा जैसे हीटर फ्रेज हाइलोजन जीरो पावर का बल्ब इन सबको देखने के बाद आपकी मानता कारण पर रहेगी कि बिजली तो सब में एकही है यंत्र के प्रभाव से कहीं ठंडा कहीं गर्म कहीं प्रकाश कहीं छोटा कहीं बड़ा लेकिन बिजली तो एक क्या जीरो पावर में बिजली नहीं है क्या जीरो वाट वाले में बिजली नहीं हाइलोजन में भी वही बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में बिजली तो वही है यंत्र के अनुसार उसका प्रयोग अलग-अलग है ऐसे ही चीटी में भी वही परमात्मा है हाथी में वही परमात्मा है विद्वान में भी वही परमात्मा मूर्ख में भी वही परमात्मा तो जो कारण तत्व परमात्मा को देखने लगते उनके हृदय से सृष्टि का मत्व चला जाता है और जो सृष्टि को देखता है उसके हृदय से परमात्मा का महत्व नहीं रहता अब देखो अपनी दृष्टि में सृष्टि है स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य अच्छा बुरा तो परमात्मा का महत्व नहीं और जिसकी दृष्टि में परमात्मा है तो फ

इसका महत्व ले तो एक म्यान में दो तलवार नहीं रहती कहते हैं तो हमारे दिमाग में अभी सृष्टि है प्रकृति है माया है परमात्मा नहीं बैठा और जब परमात्मा बैठ जाएगा तो माया प्रकृत संसार नहीं रह जाएगा देखो गोस्वामी जी ने देखा जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जान सबको भगवान देखा सब में राम जी बैठे यही देखा जड़ में चैतन्य में सब में जहां देखा वहां अपने सियाराम को देखा सियाराम में सबज जानी सबको पूरा हम कहां देख रहे हैं हम स्त्री देख रहे हैं पुरुष देख रहे हैं दुष्ट देख रहे हैं अच्छा देख रहे हैं बुरा देख रहे तो हम परमात्मा नहीं देख पा रहे और जो परमात्मा देख लिया उसकी दृष्टि में सृष्टि नहीं रह जाती यह बात है अ आगे बढ़ो भजन करो प्रभु का और वो शुद्ध ज्ञान दे देंगे तो आप भी प्रभु में हो ये अनुभव में आ जाएगा कर्मों को लेकर भी ऐसा ही था जैसे जब इंसान का पहला जन्म हुआ मनुष्य का तो उसके पहले जब उसके कोई कर्मी नहीं थे तो जो पहला जन्म हुआ वह किस कोई पहला नहीं है भा स्वप्न में आपका पहला जन्म हुआ था क्या झूठे को

आप सत्य क्यों मान रहे हो आप उसे सत्य हम यही कह रहे जब सृष्टि आप यह जो कर्म है यह जो जन्म है यह सृष्टि है ना इसलिए परमात्मा नहीं आपके ज्ञान में अ परमात्मा तो है ही नहीं ना स्वप्न में कुछ था कुछ नहीं था उसकी चर्चा नहीं है उसकी सत्ता नहीं है नासतो विद्यते भाव ना भाव विद्यते सता असत की सत्ता ही नहीं है ब्रम है व हा यही बात समझ में आ जा सु कृपा सब भ्रम मिट जाई गिरजा स्वय कृपालु अगर हम उसकी सत्यता मानेंगे तो फिर यह भ्रम जाएगा नहीं स्वप्न में प्रारंभ मध्य और अंत तीनों झूठे थे क्या प्रारंभ था क्या मध्य था क्या अंत था उसकी सत्ता ही नहीं है नासतो विद्यते भाव उसकी सत्ता ही नहीं है असत की सत्ता ही नहीं है हम सारा विद्वता सारा जोर इसी की सत्ता पर लगा देते हैं जो है नहीं उस पर हम क सत्य जो आप य आध्यात्म की चर्चा कर ना जैसे प्रपंच ज्ञान नहीं है प्रपंच की वार्ता तो हम भी शास्त्र पढ़े हैं हम अभी आपको बता सकते हैं कि भगवान ने संकल्प किया उनकी नावी से कमल प्रकट हुआ फि ब्रह मा जी प्रकट हुए फिर उन्होंने ये

ये सृष्टि रची सनक सनन सनातन सनत कुमार फिर अपने आप को जब देखा कि सब विरक्तही हो रहे तो दो भागों में कर लिया मनु और सतु रूपा फिर उससे मैथुन सृष्टि प्रकट हुई फिर कश्यप जी से ये प्रकट सब पढ़ाया सब जाना है एक शब्द में गोस्वामी जी ने भगवान शंकर का अनुभव कहा उमा कह मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब अब काहे को उसकी सिद्धि करे समझ रहे मब आध्यात्म की बात हां अब उसको प्रपंच को बढ़ावा देला तो हमको अंधेरे को अंधेरे में हमें रस्सी में सांप दिखाई दिया अब हम उसको

साप सिद्ध क्यों करें जब वह रस्सी है तो साप सिद्ध क्यों करें असली तत्व की बात यह है कि यह कभी हुआ ही नहीं जो सामने देख रहे हो केवल परमात्मा ही परमात्मा है वो दूसरा कोई नहीं है अब जैसे उसकी खोज करे कि परमात्मा पहले व फिर उससे कर्म क जैसे मान लो अभी हम आपको फसाते हैं पहले बीज हुआ कि पहले वृक्ष हुआ तो आप कहेंगे वृक्ष तो बिना बीज के कैसे हो गया तो आप कहेंगे बीच तो बिना वृक्ष के बीच कैसे फसते चले जाएंगे जब झूठा है तो फसते चले जाएंगे और सत्य बात ये है वो बिना बीच के भी सबका बीज है बिना वृक्ष के भी वो सबका वृक्ष है उर्द मूल मदा सा का मतम प्रवर यही परमात्मा शक्ति है वो अपने आप को अपने आप में विस्तार कर रहा उसको किसी बीज की जरूरत नहीं उसे किसी वृक्ष की जरूरत नहीं वो अपने आप से ऐसा जादूगर है कि अपने आप से अपने आप में खेल रहा है अपने आप से अपने आप का पालन कर रहा है अपने आप से अपने आप का संघार कर रहा है यह हम भूल गए इसलिए हमारी दुर्गति होती चली जा रही है एक प्रसंग कभी समय हो तो पढ़ना श्रीमद् भागवत

में मार् कंडे ऋषि का तो आपको पता चले मारकंडे ऋषि जी ने भगवान नारायण की तपस्या की भगवान आए प्रसन्न हुए तो उनका वरदान मांगो उनका आपकी कृपा से मुझे कुछ चाहिए नहीं क्योंकि मैं जान गया हूं संसार झूठा है पर प्रभु मैं आपकी माया को देखना चाहता हूं य है क्या तो भगवान मुस्कुरा दिए भगवान की मुस्कुराहट से ही माया का प्रादुर्भाव है जहां सृष्टि का प्रकट होने की बारता है तो भगवान की मुस्कुराहट से माया का प्रादुर्भाव माया शक्ति का प्रादुर्भाव अलग-अलग अंगों से भगवान की शक्तियां प्रकट होती ना तो मुस्कुराहट से माया का प्र अंतरध्यान हो गए जो ही अंतरध्यान हुए सो देखा कि समुद्र चारों तरफ से उफान करके एक सेकंड में पूरा आश्रम डूब गया और वो जल के थपेड़ों में और न जाने कितने वर्ष जल के थपेड़ों में से त्राहिमाम मच गया हे भगवान रक्षा करो तो देखा एक वट वृक्ष उसमें एक पत्ते में एक दोने में बालगोविंद अपने हाथ से अपने चरण का अंगूठा पकड़ कर के पी रहे करारविंदेन मुखारविंद मुखारविंद विनवे सतम टस पत्र पु सयान बालम

मुकुंदमला उस रूप को देखा तो उनको तसल्ली क्योंकि भगवान के भक्त थे भगवान हस दिए फिर हा ऐसे उनके मुख में चले गए उनके पेट में गए तो देखा वही महाप्रलय चल रही कितने कल्प तक घूमे इसके बाद एकदम विकल कहा भगवान रक्षा करो और जब विकल होकर के कहा रक्षा करो आंख खुली तो देखे कुशासन में बैठे हैं एक बूंद पानी नहीं भगवान को पुकारा भगवान प्रकट हुए बोले प्रभु यह क्या था पानी तो एक बूंद नहीं हम महाप्रलय के जल में बोले यही मेरी माया है बोले प्रभु कभी जिंदगी में मत दिखा लो हमारी हालत खराब माया का और एक बात एक दिन सुदामा जी दोस्त है ना गले में हाथ डाले समुद्र स्नान के लिए गए सुदामा जी ने कन्हैया री माया बड़ी विचित क्या है यार माया हमको माया दिखाओ बोले चलो पहले समुद्र स्नान कर लेते फिर जो इस समुद्र में डुबकी मारी तो सुदामा जी एक राज्य में पहुंच गए वहां देखा तो स्वयंबर हो रहा था जबरदस्ती सुदामा जी का ब्याह हो गया बड़ी सुंदर राजकुमारी अब इतना वैभव सब कई लड़का बच्चा हो गए इसके बाद वह रानी मर गई वहां का नियम था

कि सती तो वहा था कि पति को पतली के साथ जलाया जाता है अब सुदामा जी को बांध लिया गया कि अब सती जैसे होती है ऐसे पति को जलाया जाएगा अब वो चिल्लाए हे द्वारिकाधीश कृष्ण मेरी रक्षा करो भगवान ने ऐसे उठाया बोले बड़ी लंबी डुबकी मार गए बोले प्रभु य ब्याह हो गया लड़का बच्चा हो गया सब बोले ये प्रभु बोले यही तो कुछल कुछ नहीं पूरा नगर हो गया विवाह हो गया लड़का बच्चा हो गया सब कहानी बन गई और कुछ नहीं केवल डुबकी मारे थे कुछ नहीं केवल आसन में बैठे थे महाप्रलय का दर्शन कर लिया मार् कंडे स पढ़ के देख ले कुछ नहीं भाई यही खेल यही बात समझ ना हम ना तुम दफ्तर गुम हम ना तुम कुछ नहीं है यह स्वप्न चल रहा है और जब जगो ग तो तुम ही तुम होगे हम नहीं होंगे हम भी तुम है और तुम भी हम हो बस ये रा अब चकि बच्चा बहुत अच्छा प्रश्न कि इसलिए खोल कर के तुमहे कुछ नहीं है अब उसी को तीन प्रकार से हम जानना चाहते ज्ञान योग के द्वारा अष्टांग योग के द्वारा भक्ति योग के द्वारा तो फिर उसकी अलग-अलग पद्धतियां है लेकिन जब जानकारी पक्की होगी

तो एक ही होगी जैसे ज्ञानी जानता है तो सर्वम लमदम ब्रह्म और भक्त जानता है तो वासुदेवा सुमिति मेरा इष्ट ही सब कुछ है ऐसे योगी देखता है तो सर्वत्र परमात्मा ही है यही अनुभव सबको आखिरी में यही अनुभव होता है कि एक है एक को ब्रह्म द्वितीयो नास्ति यह सबको अनुभव होता है भक्त को अनुभव होता है ब्रह्म नहीं माया नहीं नहीं जीवन काल अपनी उस दिनारे एक रहे हो एकही पर आकर के तो एकही था एकही है एकही रहेगा यह स्वप्न है दीर्घ स्वप्न है अगर इसको जान जाए तो फिर सब कुछ बात बल गई जानने के लिए हमें मानो दे मिला संत समागम मिला है बहुत अच्छा है हम इसलिए प्रसन्न है कि नौ युवक होकर आप अध्यात्म दर्शन की तरफ बढ़ रहे भगवान बुद्धि शुद्ध करें और आगे बढ़ो इसका लाभ लो मनुष्य जीवन का लाभ यही नहीं तो नवीन अवस्था में विषयों में लोग भ्रमित होकर अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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