॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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पहले सब पाठ और नाम जप होता था, अब नहीं हो पा रहा क्या करूँ ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अंकित तिवारी जी मध्य प्रदेश जय जय श्री हरिवंश महाराज जी श्री हरिदास [गला साफ़ करने की आवाज़] महाराज जी अह दास एक साल से नाम जप कर रहा है। साथ में 84 जी सेवक वाणी राधा सुदानिधि भक्त नाम वाली भक्तमाल केलीमाल रुपद रत्नाकर मीरा सुदानिधि प्रीतम काव्य का नित्य पाठ करता है। 11 माला भी करते हैं। जिससे भाव में वृद्धि हुई है। ऑफिस में काम करते हुए भी प्रियाजू का चिंतन होता था। लेकिन पिछले तीन महीने से भाव में शून्यता आ गई है। अब नाम में वो रस नहीं मिलता। प्रयास करने पर भी चिंतन नहीं होता।

कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि हमें अपने साधन का कहीं ना कहीं मीठामीठा अहम हो जाता है और हम कहीं किसी भगवत प्रेमी महात्मा भगवत भक्त भगवत मार्ग के साधक में दोष दर्शन कर लेते हैं तो ऐसी दशा आ जाती है। कभी-कभी ऐसा होता है। तो यही होता है। मीठामीठा हम जान नहीं पाते। जैसे मेरा भाव बढ़ा है। ये किसने जाना? अहम ने यह अध्यात्म है। बड़ा सूक्ष्म होता है। जब भाव बढ़ेगा तब आपको घटा महसूस होगा। आपको रोना आएगा, तड़पना आएगा, चलना आएगा। यही भाव बढ़ा है। जब यह संतोष हो रहा है कि मेरा भाव बड़ा है तो अहम को वो अहम ही तो जांच कर रहा है ना।

वो अहम है। ये अध्यात्म बड़ा सूक्ष्म ऑपरेशन है। इसमें मेरे में अभिमान नहीं है। ये किसको पता चला? अहम को वही अहम है। मेरे में भाव बढ़ा है। यह किसको पता चला? आपकी वाणी से निकला ना मेरा भाव भी बढ़ा है। किसको पता चला? भाव बढ़ा तो तब होना चाहिए। मतलब डूब रहे हो ना? तो जिसके भाव बढ़ा है उसमें तो व्याकुलता आती है। उसमें तो अतृप्ति आती है। उसमें तो असंतोष बढ़ता है। भजनानंदी का भजन में कभी संतोष थोड़ी होता है। एक व्याकुलता उससे पूछे भाव बढ़ा है क्या? तो कहेगा कि नहीं हमें जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है।

अतृप्ति प्रेम सदा बवो करे जो शशि कला सुबेश पया में पूो नहीं ताते कब न शेष प्रतिषण वर्धमान होने पर भी प्रेमी अपने में प्रेम की कमी महसूस करता है। भाव की कमी महसूस करता है। आपको कैसे महसूस हो गया कि आपका भाव बड़ा है? मतलब त्रुटि हो गई। अध्यात्म की बात को स्वीकार करो। अब इस त्रुटि ने एक त्रुटि और कर दी। यह किसी किसी ना किसी साधक पर कहीं ना कहीं दोष दर्शन कर लिया तो उससे हमारे भजन में शुष्कता आ जाती है। सरसता चली जाती है। या किसी से समानता कर बैठा या किसी में त्रुटि कर देख बैठा और किसी में समानता कर बैठा।

ये बहुत सूक्ष्म होता है। चिंतन से सब क्रॉस हो जाएगा। चिंतन में हो जाता है। बहुत बहुत दुष्ट है मन। बहुत दुष्ट है। यह बहुत जल्दी फंसा देता है। कहीं ना कहीं गलती करवा देता है। उस समय तत्काल इष्ट से गुरुदेव से प्रार्थना करें। प्रभु क्षमा करो। मैं नीच अदम आपकी कृपा से चल रहा हूं। अहंकार ऊपर से हो रहा है। चल रहे हैं हम आपकी कृपा से। दौड़ रही ट्रेन और हम समझ रहे हैं यात्रा हमारे पैरों से हो रही है। हम तो बैठे हैं प्रभु। यात्रा तो आपकी कृपा से हो रही। जैसे ट्रेन दौड़ रही।

एक आदमी दौड़ रहा था डिब्बे में इधर से उधर इधर से तो एक आदमी ने पूछा क्या बात है आप दौड़ क्यों रहे हो बोले मुझे अमुक स्टेशन जा तू बैठ जा ट्रेन चल रही तू बैठ जा स्टेशन ट्रेन पहुंचा तो तू बैठ जा अपना अहम बैठा ले तू गुरु कृपा से हरी कृपा से इष्ट कृपा से महारानी जी की कृपा से इस भाव देश में आगे दौड़ रहा है। अहम बड़ा घातक होता है। तो कई बार देखा गया है कि इस अहम के द्वारा कहीं ना कहीं दोष दर्शन या किसी महापुरुष से समानता का भाव आने पर यह शुष्क हो जाता है।

पहला जांच करना और दूसरा कभी-कभी गुण प्रभाव आता है। यह ज्यादा देर नहीं टिकता है। ये आठ घंटे 10 घंटे इसी में संभल जाएगा। ज्यादा देर ये टिकता है जो पहला बताया। गुण प्रभाव में कभी-कभी भजन में मन ना लगना एकदम मन शुष्क हो जाना। कबहु तो थो भजन ध्रुवदास जी लिख रहे हैं कबहुत विशाल मन को धीरज छूटे नहीं गए न दूजी चाल धैर्य से रहना थोड़ी देर में परिवर्तित हो जाएगा रजोगुण तमोगुण जब अपना प्रभाव दिखाता है तो भजन में रुचि नहीं रहती तीसरा कभी-कभी भोजन अशुद्ध हो जाता है।

भोजन के अशुद्ध होने के कारण भजन में रुचि नहीं होती। भजन सुख पूर्वक हम जैसा स्वाद ले करते थे वैसा नहीं होता। पर यह भोजन वाला और यह गुण वाला यह कुछ समय का होता है। लंबे समय तक अगर शुष्कता बनी रहे तो ढूंढ लेना चाहिए पहले वाले लक्षण में कि हमसे कोई त्रुटि हो गई। अहम जनित कोई दोष दर्शन अहम जनित कोई छिद्रान्वेषण दूसरे पर दोष दर्शन यही हमको भजन से विरत कर देता है और ये खूब अपने लोग बड़ी सूक्ष्मता से इसको देखे हुए हैं। ये बड़ा अंदर का विषय होता है ना सूक्ष्मता से होता है।

किसी से होड़ कर लेना। किसी से अपने को जोड़ने लगना तारतम्य गुण दोष का इससे भी भजन में हानि हो जाएगी या किसी की अवहेलना निंदा दोष भाव ऐसा वो आप देख लीजिए तीन में से प्रायश्चित कैसे होगा इसका इसका प्रायश्चित कैसे होगा बस जान लिया और अंदर से ताप पैदा हो रहा है प्रायश्चित तो हो ही रहा है कि आप जल रहे हो अंदर से कि मेरे से मेरा भजन वो नहीं हो रहा क्या बात है अब वो अगर ढूंढो आप तो आपको स्मरण में आ जाएगा अब ढूंढना आप एकांत में बैठ के नाम जप करते हुए तो आपको अच्छा मैंने अमुक संत के तब बचता है बहुत सूक्ष्म विषय है नहीं तो बहा ले जाता है बड़े धीरे-धीरे और फिर दूसरों के दोष दर्शन करता है देखो ये तो ऐसे ये तो ऐसे गिरा देता है इसे संभाल संभाल कर परमार्थ में चलाया जाए तो नहीं तो ये फंसा देता है आप समझ पा रहे हैं ना यही त्रुटि होती है नहीं तो फिर भजन धीरे-धीरे छलांग मारता है रात दिन एक आनंद की आध्यात्मिक उन्नति पर उसको हर समय महसूस होगा कि जैसा महापुरुषों में होना चाहिए वैसा मेरे में नहीं है।

ऐसा मेरा भाव बड़ा है। यह कभी जबान से मत निकालना। अब ना निकालना। ये मेरा भाव बड़ा है। कहां ठीक है। आप गुरुजनों की कृपा संतों की कृपा है। पर जैसा होना चाहिए वैसा। हर समय नहीं जैसे आपके पास एक करोड़ रुपया जेब में हो। तो आपसे कहा जाए आप करोड़ रुपया रखते हो क्या जेब में? तो आप सीधे नहीं तो आपका चलता है नहीं सब चल जाता है इधरउधर से सब चल जाता है कृपा है वो थोड़ी बताएगा कि जेब में करोड़ों रुपए रखे कि अभी चार आदमी बाहर रख के छीन ले तो हम अपने भजन को कैसे बता देंगे कि हमारा भाव बड़ा है बहुत चतुरता बहुत सावधानी जैसे हम कभी संतों गुरुजनों से कभी बात करें तो भजन कैसा चल रहा है बस जैसा चल रहा है आप तो सब जानते हो कृपा से ही है हमारे में तो क्या भजन हम क्या कर पाएंगे वो तो बस एक सांस में अपनी पूरी साधना को बता जाना।

वो आम नोट कर रहा है। सूक्ष्मता से समझ रहे हैं ना आप? अहम नोट कर रहे हैं। हम ये पाठ कर रहे हैं। हम ये कर रहे हैं। हम ये कर रहे हैं। ये कर रहे हैं। मतलब वो अहम पुष्ट हो रहा है। उसी को मारना है। साधना काहे की हो रही? अहंकार के नाश की। जिसका जितना अहंकार नष्ट हुआ है अध्यात्म में वो उतना ही उन्नति को प्राप्त हुआ है। जिसका पूरा अहंकार नष्ट हो गया वो भगवत प्राप्त हो गया। आप समझ रहे हैं ना हां मतलब अच्छा इसमें और देखो अब हम आपको अभी कहें कि तू अहंकारी है और तू कुछ तेरे पास है नहीं अब बुरा लगेगा हम कितना अहंकार का पक्ष ले रहे हैं कि हमको डॉक्टर बता रहा है कि रोग तुम्हारे अंदर है और हम रोग का पक्ष ले रहे कि नहीं मतलब दोषों को इतना सुरक्षित छुपाने वाले अपने लोग हैं कि गुरुजन भी कहे बहुत खुशी होनी चाहिए कि हम तो नहीं पकड़ पाए लेकिन पकड़ लिए कि दुष्टता भरी जी नाथ अब आपने पकड़ लिया है तो अब आप कृपा करके इसका नाश कर ही दीजिए।

अब हमारे बस का तो है नहीं। ऐसा होना चाहिए और जबकि इसका उल्टा हो जाता है। अपने दोषों को हम जो छिपाने की प्रवृत्ति रखते हैं इसको भी छोड़ना होगा। ये जो नोट कर रहा है ना कि आप इतना पाठ कर रहे हो। आप इतना जप कर रहे हो। आप इतने साधन में लगे हो और भाव बड़ा है। वो अहंकार ही है जो नोट कर रहा है। नहीं आप नहीं कर रहे। आपसे प्रभु करा है। जब प्रभु करा तो आप उसको कर्ता क्यों बन रहे हो? अहंकार विमूढ़ आत्मा कर्ता मनते तो समझ रहे हो ना आप कर्ता क्यों बन रहे हो? आपने किसने पूछा कि आप कौन सा पाठ करते हैं?

कितना करते हैं? आप क्यों भूल गए? ये आपके अंदर वो बैठा है ना? देखो आप जिस लिए आए हो अध्यात्म के लिए तो है ना। ये डॉक्टरी बच्चा है। इसको समझो। शांत गंभीर अकर्ता भगवान के द्वारा सब भजन निरंतर चलने लगेगा और जब यह बैठ गया ना तो यही दोष दर्शन करा के यही भजन में बाधा पहुंचा देता है। ये बड़ा सूक्ष्म विषय है जो हम आपसे चर्चा कर रहे हैं। अब इसको संभालिएगा। ठीक है? भगवान की कृपा बल से गुरु कृपा बल से नाम मंत्र जपते हुए शांत भाव से

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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